बतकाव बिन्ना की
तनक सोचियो के राखी बंधाबे को असल मतलब का आए?
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
अपने इते राखी को त्योहार जेई लाने मनाओ जात आए के भैया हरें अपनी बैंनों से राखि बंधवा के उनकी रच्छा को बचन दैवें। भैया हरंे मनों अपनो बचन निभाउत बी आएं। पर का आए के आजकाल बिटियां सुरच्छित ने रै गईं। कछू बुरए आदमियन औ लरकन के मारे। लरका हरों को सोचबो जे चाइए के हरेक मोड़ी कोनऊं ने कोनऊं भैया की बैन होत आए। सो हर मोड़ी की इज्जत करो चाहिए औ ऊकी रच्छा के लाने ठाड़े रैबो चाइए। तनक सोचबे वारी बात आए के जो कोनऊं मोड़ी के साथ कोऊ बदमास गलत काम करे सो बा पूरो परिवार के लाने गलत कहाओ, काए से के बिटियां तो घर की इज्जत मानी जात आएं। सो जबे कोऊ बदमास कोनऊं मोड़ी खों परेसान कर रओ होए तो सो जे सोच के आगे नईं बढ़ने के जे कोन हमाई बैन आए, के जे कोन हमाए परिवार की लुगाई आए? जो ऐसी सोच होए तो राखी को त्योहार मनाए से फायदा काए को? बैन से राखी बंधाई, ऊके पांव परे, नेग के पइसा दए औ हो गओ काम पूरो, मन गओ त्योहार। जे त्योहार ऐसो हल्को नोंई। ईको मनाए को मतलब भूलो नईं चाइए। तनक सोचो के मुगलों को राजा हुमायूं जोन के लाने राखी बंधाए को कोनऊ मतलब ने हतो, ऊने बी राखी को मान राखो औ जोन को बैन मानो, ऊकी रच्छा करबे को दौर परो तो। चलो जोन को जा किसां पतो नईयां उनके लाने बताए दे रई।
जे बात आए सन 1535 की। जे सांची किसां आए काए से ईके बारे में राजस्थान को इतिहास लिखबे वारे कर्नल टाड ने औ इतिहासकार चंद्रशेखर शर्मा जू ने सोई अपनी किताबन में लिखो आए। का भओ के महाराज राणा संागा के मारे जाबे के बाद उनकी महारानी करणावती जू ने राजकाज को भार सम्हारो। गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह ने देखो के रानी सो अकेली पर गई आएं सो ऊने हमला कर दओ। खींब लड़ाई भईं। मनो जबे रानी खों लगो के अब कोनऊं से सहायता मांगने परहे तो उन्ने बादशाह हुमायूं को राखी के संगे चिट्ठी भेजी के आओ औ अपनी ई बैन औ ऊके राज की रच्छा करो। हुमायूं खों जैसी जा चिट्ठी मिली बा निकर परो अपनी बैन करणावती जू की रच्छा के लाने। मनो ऊ टेम पे कोनऊं हवाई जहाज तो हतो नईं, सो सेना संगे मेवाड़ पौंचबे में ऊको देरी हो गई। उते सुल्तान बहादुर शाह मेवाड़ के महलन में घुस परो। रानी करणावती ने देखी के अब लड़े से कछू हात ने लगहे सो उन्ने सैंकड़ां खांड़ राजपूती लुगाइयन के संगे आगी में कूंद के जौहर कर लओ। उन्ने अपनी जान दे दई, मनो आन ने दई। जा खबर जबे हुमायूं लौं पौंची तो ऊको भौतई दुख पौंचो। ऊने मेवाड़ पे कब्जा करे बैठे सुल्तान बहादुर शाह पे चढ़ाई कर दई औ ऊंसे मेवाड़ छीन के बैन रानी करणावती दोई बेटों खों सौंप दओ। आगे चल के हुमायूं को बेटा अकबर सोई राखी को त्योहार मनवाऊत रओ।
जा किसां याद राखबे की जरूरत आए जीसें हमें ग्यान रए के एक मुगल बादशाह ने राखी को मान रखो सो हमाए लरका आजकाल राखी को मान काए नईं राख सकत? औ जो नईं मान राख पा रए उने मान राखबो सिखाओ चाइए। कोनऊं खो हक नोंई के कोऊ की बैन के संगे बदसलूकी कर सके। चाए कोऊ प्रेमिका होए, चाए घरवारी होए, चाए रोड पे जा रई लुगाई होए बे ओरें बी कोनऊं ने कोनऊं की बैन होत आएं। उनकी रच्छा करबो बी सबको धरम आए। फेर बा लुगाई चाए कोनऊं जात धरम की काए ने होए। राखी को त्योहार जोई तो सिखात आए।
राखी हमाओ कोनऊं नओ त्योहार नोंई। ईके बारे में पुराणों में किसां मिलत आए। पैले राखी रच्छा के लाने बांधी जात रई वा बी खाली लुगाइयन की नोंई देवता हरों की रच्छा के लाने बी। ‘‘भविष्य पुराण’’ में लिखो आए के देवों औ राच्छसों के बीच भौतई जम के लड़ाई भई। इत्ती भैंकर के 12 बरस लौं चली। इन्द्र देव जू राच्छसों से खींबईं टक्कर लेत रए मनो एक समै ऐसो आओ के लगो के अब इन्द्र देव जू हार जाहें। उनकी हार मनों सबई देवों की हार। सो इन्द्रणी ने सोची के कछू उपाय करो चाइए। उन्ने तीनों लोकों की सक्तियों खों याद करो औ एक राखी बनाई। ऊ राखी में तीनों लोकों की सक्तियां डार के इन्द्र देव के हात में बांध दई। ईके बाद इन्द्र देव औ सबरे देवता राच्छसों ने लड़े औ जीत गए। कई जात आए के तभईं से रच्छा के लाने रक्ष्छा को धागा मने राखी बांधी जान लगी।
‘‘विष्णु पुराण’’ में सोई एक किसां मिलत आए के विष्णु जू ने वामन को रूप धर के राजा बलि से तीन लोक नप्प के ले लए रए। मगर बदले में राजा बलि ने कई रई के आपको जो चाउंने आप ले लेओ, मनो ईके बाद आपको हमाए महल में रैने परहे। भगवान विष्णु ने राजा बलि की कई मान लई हती। पर जबे विष्णु जू छीर सागर ने लौटे तो लक्ष्मी जू परेसान हो उठीं। उन्ने विष्णु जू के पास खबर भिजाई के अब लौट आओ, मनो बचन तो बचन ठैरो, विष्णु भगवान ने लौटबे से मना कर दओ। उनके ने लौटने से शेषनाग सोई दुखी हो गओ। छीरसागर के सबरे पिरानी दुखी हो गए। तब लक्ष्मी जू ने जुगत लगाई औ बे राजा बलि के पास राखी ले के पौंची। राजा बलि जा देख के भौतई खुस भओ। खुद लक्ष्मी जू उनके लिंगे राखी बांधवे खों आई हतीं, ईसे बढ़ के नोंनी का बात हो सकत्ती? ऊने खुसी-खुसी राखी बंधाई औ हीरा-मोती देन लगो। तब लक्ष्मी जू बोलीं के, ‘‘नईं भैया, हमें जे हीरा-मोती नईं चाऊने। जो तुम हमें राखी को नेंग देओ चात आओ तो हमाओ पति हमें नेग में लौटा देओ।’’
राजा बलि बचन को पक्को हतो। ऊने मना ने करी, तुरतईं विष्णु भगवान से कई के आप हमाई बैन के संगे जा सकत हो, अब हम आपको ने रोकबी। सो, ई तरां से लक्ष्मी जू ने राजा बलि खों राखी बांध के ऊके बचन से विष्णु जू खों छुड़ाओ रओ।
एक औ किसां आए जीके बारे में सबई जानत आएं। जा किसां ‘महाभारत’ की आए। का भओ के एक बेर राजसूय यज्ञ के टेम पे किसन भगवान की उंगरियां उनईं के सुदरसन चक्र से कट गई। मुतको खून बहन लगो। जा देख के उतई ठांड़ीं द्रौपदी ने तुरतईं अपनी चुन्नी फाड़ी औ ऊकी पट्टी बना के किसन भगवान की उंगरिया में बांध दई। खून बहनों बंद हो गओ। जा देख के किसन भगवान ने द्रौपदी से कई के ‘‘तुमने अपनी चुन्नी की पट्टी से हमाओ खून बहनों बंद कर के हमाई जान की रच्छा करी आए सो ईके बदले जो कछू तुमें हमसे मांगने होए सो मांग लेओ।’’
‘‘हमें अबे कछू नईं चाउनें, जबे चाउने हुइए सो मांग लेबी।’’ कै के द्रौपदी ने कछू बी लेबे से मना कर दओ। ईपे किसन भगवान ने कई के ‘‘तुमाई जे रच्छा की पट्टी हम पे करज रई, जबे तुमें कछू बी मांगने होए सो मांग लइयो।’’
भौत दिनां बाद जब द्रौपदी पे संकट आओ। दुस्सासन भरे दरबार में ऊको चीरहरन करन लगो तब द्रौपदी ने किसन भगवान खों पुकारो औ बोई बचन उनको याद दिलाओ के आज हमाई इज्जत की रच्छा करबे की जरूरत आए। आप आओ औ अपनों बचन निभाओ। सबई जानत आएं के किसन भगवान दरबार में ऐसे पौंचे के द्रौपदी खों तो दिखाने मगर औ कोऊ उनें ने देख पा रओ तो। उन्ने द्रौपदी की धुतिया इत्ती बढ़ा दई के दुस्सासन खेंचत-खेंचत थक के गिर परो, मनों धुतिया उतार ने पाओ। जो हतो राखी के बचन को चमत्कार।
सो, राखी के बारे में जबे सोचियो सो ऊकी असली महत्ता समझियो। राखी को मतलब अकेलो जो नईं होत के राखी बंधाई, मिठाई खाई औ बदले में कछू रुपैया, नें तो गिफ्ट दओ औ मन गई राखी। राखी कोनऊं सौदा नोंई। ईमें रच्छा की भावना होनी चाइए। लुगाइन के लाने इज्जत औ सम्मान से बड़ो कोनऊं गिफ्ट नईं होत, जे छुड्डा में बांध के राखबे की बात आए।
ऐई संगे बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की। मनो सोचियो जरूर ई बारे में के राखी बंधाबे को असल मतलब का आए।
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बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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