पुस्तक समीक्षा
पीड़ा की समग्रता को जानने पर ही संभव है पीड़ा से सम्वाद
- समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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दोहा संग्रह - पीड़ा से सम्वाद
कवि - डॉ. श्याम मनोहर सीरोठिया
प्रकाशक - नवदीप प्रकाशन, 821-बी, गुरु रामदास नगर एक्सटेंशन, गुरुद्वारा रोड, लक्ष्मी नगर, दिल्ली-110092
मूल्य - 225/-
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दोहा हिंदी साहित्य की सबसे लोकप्रिय, प्राचीन और सशक्त काव्य विधाओं में से एक है। इसका प्रयोग आदिकाल से लेकर आधुनिक काल तक नीति, प्रेम, भक्ति, और लोक-व्यवहार की बात कहने के लिए किया जाता रहा है। माना जाता है कि अपभ्रंश से हिंदी तक की यात्रा में सिद्ध कवि सरहपा ने इसका प्रयोग सबसे पहले किया। कबीर, रहीम, रैदास और तुलसीदास ने दोहे के माध्यम से अमर साहित्य रचा। उन्होंने अपने दोहों में जीवन के हर आवश्यक पक्ष पर विचार किया। दोहा छंद अपनी लघुता में गहन अर्थ समाहित करने की क्षमता अर्थात गागर में सागर भरने की विशेषता के कारण आधुनिक हिंदी साहित्य में भी अत्यंत लोकप्रिय और महत्वपूर्ण बना हुआ है। परंपरा और आधुनिकता के सेतु के रूप में, यह आज भक्ति व नीति के साथ-साथ व्यंग्य, समसामयिक सामाजिक विषयों, और जीवन के अनछुए पहलुओं को सशक्त रूप से अभिव्यक्त कर रहा है। आधुनिक काल के दोहाकार सामाजिक विद्रूपताओं, राजनीतिक भ्रष्टाचार और आम आदमी की समस्याओं पर चोट करने के लिए दोहा विधा का प्रभावी ढंग से उपयोग कर रहे हैं। पारंपरिक क्लिष्ट भाषा के बजाय, आज के दोहे सीधी, सरल और मारक हिंदी भाषा में लिखे जा रहे हैं, जो सीधे पाठकों के दिल को छूते हैं।
डॉ. श्याम मनोहर सीरोठिया गीत एवं छांदासिक काव्य के सिद्ध हस्ताक्षर हैं। उन्होंने अनेक दोहे लिखे हैं जिनमें कुछ शताधिक दोहे तो एक ही विषय पर केन्द्रित रहे हैं। उनका दोहा संग्रह ‘‘पीड़ा से सम्वाद’’ जीवन के विविध पक्षों पर लिखे गए दोहों का संग्रह है। पीड़ा जीवन का एक शाश्वत पक्ष है। इस धरती पर कोई ऐसा व्यक्ति नहीं है और न होगा जो यह दावे से कह सके कि उसने पीड़ा का अनुभव कभी नहीं किया। यह अवश्य है कि प्रत्येक व्यक्ति के अनुभव में भिन्नता होती है। यथा किसी को प्रेम में पीड़ा मिलती है तो किसी को अर्थाभाव के कारण, किसी को अपनों से अवहेलना के कारण तो कभी शारीरिक कष्ट के कारण। पीड़ा का कारण कुछ भी हो किन्तु उसकी तीव्रता का चरमबिन्दु सभी में लगभग एक-सा होता है। फिर भी पीड़ा के मूल भाव एवं प्रकृति को जान कर पीड़ा की तीव्रता को कम किया जा सकता है। अपने दोहों के माध्यम से डॉ. सीरोठिया ने यही कहना चाहा है जिसे उन्होंने ‘‘पीड़ा से सम्वाद’’ नाम दिया है। वस्तुतः पीड़ा से सम्वाद वही व्यक्ति कर सकता है जो पीड़ा की समग्रता को समझता हो, जानता हो। यहां उल्लेख करना जरूरी है कि पेशे से चिकित्सक रहे डॉ. सीरोठिया को हिन्दी साहित्य से अगाध प्रेम है। इसीलिए उन्होंने एमबीबीएस होते हुए भी, शासकीय चिकित्सक होते हुए भी हिन्दी साहित्य में एम.ए. किया क्योंकि वे हिन्दी और उसके साहित्य को भली-भांति जानना और समझना चाहते थे। इसी के साथ गीत एवं छांदासिक विधाओं में निंरतर सृजन कार्य करते रहे। डॉ. सीरोठिया के सृजन में सतहीपन नहीं है, वरन एक गंभीरता की अनुभूति होती है क्योंकि उन्होंने अपने सृजनकर्म को ‘‘टाईम पास’’ या त्वरित ‘‘नेम-फेम’’ के साधन के रूप में नहीं लिया अपितु काव्य की जिस विधा को अपनाया, उसमें पूरी तरह रमते चले गए।
संग्रह के बर्ल्ब में डॉ. श्याम मनोहर सीरोठिया की अपने सृजन के प्रति यह टिप्पणी बहुत अर्थपूर्ण है-‘‘किसी भी काव्य की रचना मानसिक वृत्तियों एवं विभिन्न प्रकार के सम्वेदनों के सामंजस्य से होता है। एक-एक भाव के लिए शब्द का चयन, और उसे सौन्दर्ययुक्त आकर्षक बनाने, अलंकृत करने का तन्मय भाव ही काव्य को सजीव बनाता है। कई बार यह किसी चित्र को बनाकर उसमें प्राण भरने जैसा कठिन भी होता है। कवि और काव्य का महिमा वर्णन हमें वेदों में भी मिलता है, यजुर्वेद में तो कवि को परमेश्वर के समतुल्य सम्मान दिया गया है। खैर, मेरे लिए काव्य साधना किसी सम्मान के लिए नहीं, स्वान्तः सुखाय की एक सहज प्रक्रिया मात्र है। मूक हृदय की मुक्ति साधना के लिए मनुष्य की वाणी जो विधान करती आयी है, मेरे लिए वही कविता है।’’
यूं तो संत कबीर ने यह दोहा किसी और संदर्भ में कहा है किन्तु यदि साहित्य सृजन की सार्थकता पर इसे लागू किया जाए तो कवि के हृदय में साहित्य के प्रति सम्मान एवं लगन के रूप में भी इसे समझा जा सकता है-
सांच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप ।
जाके हिरदे सांच है, ताके हिरदे आप ।।
डॉ. सीरोठिया के इस दोहा संग्रह की विशेषता यह है कि इसमें दोहों का मूल आधार भले ही जीवन की जटिलताएं है, किन्तु इसमें विषय की विविधता है। किसी को इनमें प्रेम-संयोग मिलेगा, तो किसी को प्रेम-वियोग, किसी को सामाजिक समरसता, तो किसी को विसंगतियों के दृश्य दिखाई देंगे। जैसे संग्रह की भूमिका लिखते हुए प्रो. डॉ. रघुनांदन प्रसाद तिवारी, डी.लिट., पूर्व विभागाध्यक्ष, हिंदी विभाग, मोतीलाल नेहरू महाविद्यालय, दिल्ली ने ‘‘सामाजिकता समरसता के सशक्त और समर्थ दोहे’’ शीर्षक से लिखा है कि ‘‘दोहा-संग्रह ‘‘पीड़ा से सम्वाद’’ मेरे हाथ में है। इस संग्रह को पढ़ते हुए एवं अपने पूर्व अनुभवों के आधार पर एक बात मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि डॉ. सीरोठिया तन्मयी भाव के रचनाकार हैं। डॉ. सीरोठिया की रचनाओं में विषय के साथ जुड़ने की अद्भुत क्षमता है। डॉ. सीरोठिया जिस तदाकार भाव से काव्य रचना करते हैं वह मन को छू जाता है।’’
यह ‘‘तन्मयी भाव’’ डॉ. सीरोठिया के रचनाकर्म को स्थापना दिलाने में सक्षम है। प्रत्येक रचना तब हृदय को स्मर्श कर पाती है जब उसके भाव एवं विषय से तादात्म्य स्थापित कर लिया गया हो। इस संग्रह के दोहों की एक विशेषता यह भी है कि इनमें समस्याओं के साथ समाधान भी सुझाया गया है। जिससे इनकी उपादेयता और अधिक बढ़ जाती है।
‘‘पीड़ा से सम्वाद’’ दोहा संग्रह के कुल दोहों को विषयवार 11 शीर्षकों में बांटा गया है- 1. मन से मन की बात 2. बाँटो सबको प्यार 3. इन्सान-सूरत और सीरत 4. दोस्त और दोस्ती 5. सपन करें साकार 6. समय बड़ा अनमोल 7. उपकार और उपकारी 8. कलह 9. निन्दा और निन्दक 10. जल, जंगल, जमीन 11. कभी-कभी ऐसे भी। इन शीर्षकों को पढ़ कर ही समझ में आने लगता है कि कवि ने जीवन के हर बिन्दु को परस्पर जोड़कर इस संग्रह के दोहों की रेखा खींची है। दरअसल पीड़ा का सबसे बड़ा कारण होता है छल, कपट, धोखा। जब समय विपरीत हो और लोग मुंह फेर लें तो पीड़ा का जन्मना स्वाभाविक है-
समय बदलते ही यहाँ, अक्सर बदलें लोग।
देता है धोखा बहुत, अपनेपन का रोग।।
चली जिन्दगी, उमर भर, इच्छाओं के साथ।
लेकिन फिसली रेत सी, अब हैं खाली हाथ।।
यदि व्यौहार एवं आचरण में अपनत्व हो तो बड़े से बड़ा दुख भी कम हो जाता है। इसीलिए तुलसीदास ने लिखा है कि -
आवत ही हरसे नहीं, नैनन नहीं सनेह।
‘तुलसी’ वहां न जाइए, चाहे कंचन बरसे मेह।।
इसीलिए डॉ. श्याम मनोहर सीरोठिया अपने दोहों में कहते हैं कि-
घर आये हर अतिथि को, दें समुचित सम्मान ।
संस्कार कहते यही, रखिये सबका ध्यान।।
सबसे होना चाहिए, सुख कारक व्यौहार ।
इससे फलता-फूलता, है अपना परिवार।।
बाजारवाद के इस खुरदुरे समय में प्रायः देखने को मिलता है कि लोग विलासिता की वस्तुएं अथवा एक अदद बड़ा अवसर पाने मात्र को आत्मसम्मान एवं स्वाभिमान गिरवी रखने में तपिक भी हिचकते नहीं है। ऐसे लोगों का आह्वान करते हुए डॉ सीरोठिया लिखते हैं-
जिसने खुद का ही नहीं, कभी किया सम्मान।
उसको फिर संसार में, मिलता है अपमान।।
वृक्ष अकेले ही सहें, हर मौसम की मार।
देते हैं फल-फूल वह, निज गुण के अनुसार।।
गलाकाट प्रतियोगिता के इस दौर में मित्रघात भी आम बात हो चली है। ऐसी अनेक घटनाएं आए दिन समाचार पत्रों में पढ़ने को मिल जाती हैं जिनमें कभी किसी दोस्त के द्वारा धोखा दिए जाने अथवा एक तरफा प्रेम में पड़ कर जघन्य अपराध कर बैठने का विवरण होता है। जबकि मित्रता और प्रेम परस्पर विश्वास एवं एक-दूसरे की भावनाओं के सम्मान का विषय होता है। जैसे संत कबीर ने कहा है-‘‘प्रेम ने बारी ऊपजै, प्रेम न हाट बिकाय।’’ अर्थात प्रेम न किसी खेत की बाड़ में उगता है और न बाजार में बिकता है। जो व्यक्ति इस सत्य को समझ नहीं पाता है वह स्वयं की और दूसरों की पीड़ा का कारण बनता है। अतः डॉ. सीरोठिया लिखते हैं कि-
कभी दोस्त का ना करें, भूले से अपमान ।
आदर और समानता, का नित रक्खें ध्यान।।
मुश्किल में है डालता, इक तरफा का प्यार।
कभी-कभी कारण बने, दुख का यही अपार।।
संत होना वैराग्यधारी होना नहीं है। संत होना सद्गुणों से युक्त होना है। जो संत है वहीं जगत का उद्धार कर जगत पर उपकार कर सकता है-
सन्तों का इस जगत पर, सदा रहा उपकार।
दुनिया को इनसे मिलें, सुन्दर, सरल विचार।।
डॉ. श्याम मनोहर सीरोठिया के दोहे बेहद सरल, सुबोध और जनभाषा में हैं, जिन्हें आम आदमी आसानी से समझ सकता है। उनके दोहे कम शब्दों में समूचा जीवन दर्शन प्रस्तुत करने में सक्षम हैं। डॉ. सीरोठिया ने प्रेम, सौंदर्य, विरह, नैतिकता, राजनीति, दर्शन, और अध्यात्म जैसे विविध विषयों पर दोहे लिखे हैं जो निराशा के क्षणों में उनके दोहे ‘‘हार न मानने’’ की प्रेरणा देते हैं। जैसे-
सच के सूरज की नहीं, कभी हुई है रात।
हों विरोध की आँधियाँ, धोखे की बरसात।।
दोहा संग्रह ‘‘पीड़ा से सम्वाद’’ पठनीय संग्रह है क्योंकि यह मानवीय चेतना और संवेदना के साथ दोहों के समकालीन सरोकारों को गहनता से रेखांकित करता है।
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