Tuesday, May 5, 2026

पुस्तक समीक्षा | संस्मरण जो जीवन को देखने का नज़रिया बदल सकते हैं | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह

पुस्तक समीक्षा
संस्मरण जो जीवन को देखने का नज़रिया बदल सकते हैं
- समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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संस्मरण - मेरा आसमान: यू लिव ओनली वंस
लेखिका - जया आर्य
प्रकाशक - भव्या पब्लिकेशन, एल.जी. 42, करतार आर्केड, भोपाल, म.प्र.- 462023
मूल्य - 200/-
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प्रत्येक व्यक्ति का अपना जीवन होता है और उसके अपने जीवनानुभव होते हैं। जिस प्रकार उंगलियों की रेखाएं दिखने में सबकी भले एक-सी दिखें किन्तु होती अलग-अलग हैं, ठीक इसी प्रकार किन्हीं भी दो लोगों का जीवन ऊपर से देखने में भले ही एक-सा दिखाई दे किन्तु उसके अनुभव, जीवन के प्रति उसका दृष्टिकोण, अपने अनुभवों को ग्रहण करने और उनका आकलन करने की क्षमता में भिन्नता, अपने अनुभवों को महसूस करने की तीव्रता की भिन्नता होती ही है। यही अंतर हर व्यक्ति के अनुभवों को परस्पर एक-दूसरे से अलग करता है और स्मृतियों में भी अलग तरह से संस्मरण के रूप में स्थायित्व पा लेता है। हाल ही में लेखिका एवं उद्घोषिका जया आर्य की संस्मरण पुस्तक ‘‘मेरा आसमान: यू लिव ओनली वंस’’ को पढ़ने का अवसर मिला। इसे पूरा पढ़ा तो मुझे लगा कि उनकी इस पुस्तक में दर्ज़ उनके संस्मरण लिखे भले ही अति सहजता से गए हैं किन्तु इनमें संस्कार के परिकृष्त बीज मौजूद हैं। जया आर्य के संस्मरणों में लोगों का दृष्टिकोण बदलने की क्षमता है।

संस्मरण विधा यूं तो हिन्दी साहित्य में पुरानी है किन्तु इसे पुनर्स्थापना दी सागर, मध्यप्रदेश के ही डॉ. क्रांति कुमार जैन ने। किन्तु उनके संस्मरण लोगों के सामाजिक व्यवहार को प्रस्तुत करते हैं जबकि जया आर्य ने अपने अनुभवों के आधार पर अपने दृष्टिकोण को संस्मरण के रूप में सहेजा है।
जया आर्य तमिल भाषी है। उन्होंने अंग्रेजी में एम. ए. किया। फिर आकाशवाणी मुम्बई, जगदलपुर और भोपाल में ग्रेड-ए, हिंदी उद्घोषक के रूप में सेवारत रहीं। उस दौरान अनेक उभरते हुए उदघोषकों को प्रशिक्षित किया। अपने जीवन के बारे में अपने संस्मरणों के रूप में लिखा है। ‘‘अपनी बात’’ के अंतर्गत उन्होंने अपने लेखकीय पक्ष पर प्रकाश डाला है जो प्रेरक है। विशेषरूप से उन लोगों के लिए जो अपने जीवन की दूसरी पारी में थकान और हताशा का अनुभव करने लगते हैं। उन्होंने लिखा है- ‘‘अपनी बात’’ - ‘‘एक व्यक्ति के विकास में कई लोगों का हाथ होता है साहित्यिक क्षेत्र में प्रवेश करना मेरे लिए बड़ी बात थी मन में लिखने की खलबली रहती थी, पर बड़े-बड़े विद्वानों को देखकर ठिठक जाती थी, इस बीच बाल साहित्य शोध केंद्र के निदेशक श्री महेश सक्सेना जी बार-बार कहा करते थे, लिखना शुरू करिए, मैं सोचती थी मेरा काम तो बोलना है मैं तो आकाशवाणी की वरिष्ठ उद्घोषिका हूँ, मैं उसी में नित्य नवाचार करती रहती थी मुझे लिखने के लिए क्यों बार-बार कहते हैं, तब जवाब मिला कि आपके पास अनुभवों का खजाना है, लिखना शुरू तो करिए शुरुआती दिनों में डॉक्टर हरीश नवल से चर्चा होती थी, तभी श्रीमती काँता राय से मिलना हुआ, फेसबुक पर लघु कथा के परिंदे ग्रुप चलाती थी उन्होंने मुझे जुड़ने की सलाह दी, मैं जुड़ी और हर रोज अलग-अलग विषय पर लिखकर मार्गदर्शन प्राप्त करती रही, और मेरी पहली पुस्तक ‘‘लघु कथा शतक’’ प्रकाशित हुई, जिस पर आदरणीय कैलाश चंद्र पंत जी ने लिखा कि 50 साल की उम्र में कोई शतक बना दे तो बड़ी बात है, यहाँ तो 70 वर्ष की उम्र में शतक जड़ जाना एक अद्भुत मिसाल है। मुझे प्रोत्साहन मिलता गया दूसरी पुस्तक ‘‘जीवन के सच’’ काव्य संग्रह ‘‘गुनगुनाते बोल’’ प्रकाशित हुई, और आज अपने संस्मरण के लिए लेखनी उठाई है।’’

सत्तर की आयु कोई कम आयु नहीं होती है। सत्तर से अस्सी की ओर यात्रा करते हुए अपने संस्मरणों को एक पुस्तक के रूप में सहेजना निश्चित रूप से सराहनीय कार्य है क्योंकि इस आयु में पहुंचते तक विचार भी अपनी परिपक्वता को पा चुके होते हैं तथा दृष्टिकोण भी समभाव में ढल चुका होता है। इस संस्मरण संग्रह में कुल 48 संस्मरण हैं। इनमें कुछ संस्मरण पारिवारिक जीवन से जुड़े हुए हैं तो कुछ कार्यक्षेत्र से और कुछ देश-विदेश भ्रमण से। उनका जीवन और जीवन शैली ठीक उसी प्रकार की प्रतीत होती है जैसा उनके इस संस्मरण पुस्तक का नाम है-‘‘मेरा आसमान: यू लिव ओनली वंस’’। जब कोई अपना आसमान पा जाए तो समझ जाना चाहिए के उसने जीवन जीने का सही तरीका अपना लिया है। पुस्तक के नाम की टैग लाईन इस बात को पूरा करती है-‘‘यू लिव ओनली वंस’’। अर्थात जब व्यक्ति इस शाश्वत सत्य को स्वीकार कर लेता है कि जीवन को एक ही बार लिया जा सकता है तो वह जीवन के एक-एक पल को जी लेने का हुनर स्वतः सीख जा है। यही से शुरू होती है जीवन के हर अनुभव से सीखने की।

संग्रह में एक संस्मरण है ‘‘मेरा परिवार पूरा हिन्दुस्तान’’। जिसमें जया आर्य ने अपने परिवार में ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ के चरितार्थ होने के बारे में लिखा है-‘‘मेरी माँ श्रीमती मेरी डेविड तेलगू भाषी आन्ध्रपदेश से थीं। मेरे पिताजी श्री ई.सी.जे. डेविड तमिल भाषी तिरूचलापल्ली से थे, वे आर्मी ऑफिसर थे। मेरे पति श्री ज्ञानसिंह आर्य जो आकाशवाणी में डायरेक्टर थे वे यूपी अलीगढ़ के पास रायपुर दलपतपुर गाँव से थे। मेरी बहू अंतरा सिंह आर्य अम्बिकापुर, छत्तीसगढ़ से हैं। मेरी बेटी तमिल भाषी राजेश कॉलीन से ब्याही, चेन्नई निवासी अब यू.एस. में है। दोनों पति-पत्नी वहां वॉलमार्ट में डायेक्टर हैं। मेरी छोटी बेटी बंगाली से ब्याही शिवाजी सेन गुप्ता बचपन के क्लासमेट हैं। दोनों ही इनफोसेस में हैं और अब कनाडा में है। तीनों के एक बेटा और एक बेटी हैं। धन्य है प्रभु का, मुझे इतनी भाषाओं से सम्पन्न, और इतनी संस्कृति के साथ सामन्जस्य बैठाकर जीने का मौका मिला दिया। इस प्रकार से देखा जाए तो पूरा हिन्दुस्तान मेरे एक परिवार की तरह है क्योंकि मैं हर दृष्टि से सभी तरह से देश के विभन्न हिस्सों से कनेक्ट हूँ। और फिर हमारा तो मंत्र भी यही है ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ अतः हम सभी एक परिवार की तरह ही हैं।’’

जब दो भिन्न परिवेश के लोग परस्पर मिलते हैं और एक-दूसरे के जीवन साथी बन जाते हैं तो बहुत कुछ सकारात्मक होता है जो समाज को भी प्रभावित करता है। जैसे जया आर्य ने अपने संस्मरण ‘‘मेरे गाँव में 1974 में बना पहला टायलेट’’ में उस अनुभव को लिखा है जब वे उत्तर प्रदेश के गांव में स्थित अपनी ससुराल गईं। उन्हीं के शब्दों में- ‘‘मेरा विवाह आकाशवाणी मुम्बई में कार्यरत श्री ज्ञानसिंह आर्य से हुआ जो ड्यूटी ऑफिसर थे, उनका गाँव अलीगढ़ के पास रायपुर दलपतपुर था। मुझे गाँव में रहने का बड़ा शौक था। जब हम गाँव गए तो माताजी ने घूंघट खींचा। मैं खाट के पास पिताश्री के पैरों के पास बैठकर बातें किया करती थी। मुझे उनसे और नंदों तथा देवरों से बहुत स्नेह मिला। मेरे पति के निधन के बाद जब मैं गाँव गई तो पिताजी खाट पर थे, उनको लकवा मार गया था। वो बोले बहू ये सब ननदें तुम्हारा कहना मानेंगी। तुम चिन्ता मत करों। फिर मैं उनको रोज नहलाती थी, खाट के नीचे पानी डालकर, डेटाल डालकर धोती थी। सेवा में अजब सुख और सुकून था। उसके बाद जब जाना हुआ तो गाँव में टॉयलेट बनाया। सासू माँ कहती क्यों पैसे बिगाड़ रही है। तो मैंने कहा माता जी बारिश में खेतों में पैर फिसलेंगे। मैं तो साल में एक बार आती हूँ पर आपकी और बहुए बच्चों के संग है। तो उनको तो आराम हो जाएगा। 1974 में गाँव का पहला टायलेट बना जो चर्चा का विषय था। पति देव भी गौरवान्वित थे।’’

जीवन में प्राथमिकता का बहुत अधिक महत्व होता है। आज लोग प्राथमिकता को ले कर ही भ्रमित हैं। बहुत सारा पैसा, शोहरत, ऐशोआराम प्राथमिक है या परिवार? इस प्रश्न का कोई स्पष्ट उत्तर आज नहीं दे पाता है। इस सिलसिले में जया आर्य का संस्मरण ‘‘रोटरी क्लव ईस्ट की बेस्ट सेक्रेटरी और बेस्ट प्रेसिडेन्ट’’ महत्वपूर्ण है। जिसका एक अंश इस प्रकार है कि ‘‘एक जिंदगी में इंसान को कई जिदंगी बार-बार नए सिरे से जीना पड़ता है, और इंसान जी भी लेता है अपने आप को सँभाल भी लेता है, अपने पति के निधन के बाद मैंने मंच संचालन छोड़ दिया था जबकि भोपाल के हर मंच पर चाहे वह बीजेपी का हो, चाहे वह कांग्रेस का हो या शासकीय कार्यक्रमों का हो, मैं संचालन किया करती थी। लोग घर से आकर ले जाते थे, जब मैंने संचालन बिल्कुल बंद कर दिया तो लोग कहने लगे ऐसे तो लोग आपको भूल जाएंगे। मैंने कहा भूल जाने दो, एक दो बार जब जबरदस्ती ले गए, तो मंच पर तैयार होकर जाने इच्छा नहीं होती थी, चक्कर से आते थे, तो छोड़ दिया, मुझे अपने बच्चों पर ध्यान देना था। क्योंकि मैं यही सब करती रहती तो वे सब भटक जाते, मैं घर पर रहती थी, नौकरी करती थी। और अपनी संस्था शांति निकेतन को सँभालती थी, शांतिनिकेतन का स्टाफ मेरा परिवार था मेरे सुख दुख के साथी थे।’’

एक और संस्मरण बिलकुल अलग ही परिवेश का ‘‘सड़क यात्रा विदेश में’’ शीर्षक से। जया आर्य ने लिखा है कि ‘‘बात तब की है जब हम आरकंसास से शिकागो जा रहे थे, शिकागो को विंडी सिटी कहा जाता है क्योंकि वहाँ ठंड बहुत पड़ती है। हमारा परिवार ज्यादातर कार में ही सफर करता है। जिसमें पूरे 5 लोग या 6 लोग समा जाते हैं फ्लाइट के सारे पैसे बच जाते हैं और सुरक्षित एक जगह से दूसरी जगह लंबी यात्रा कर पहुँच जाते हैं। रास्ते में रुकना और खाना-पीना हो जाता है। दामाद बेटी और बच्चे सभी साथ थे। ऐसे ही एक ड्राइव पर जब हम जा रहे थे दामाद जी ड्राइव कर रहे थे तो पीछे से पुलिस की गाड़ी आ रही थी। पुलिस की गाड़ी की जब लाल बत्ती दिखाई देती है तो रियर मिरर पर गाड़ी चालक देखकर गाड़ी रोकता है, यह एक संदेश है कि आपने कोई गलती की है, इसलिए पुलिस आपको पकड़ रहा है। हमारे दामाद जी ने गाड़ी रोक ली, किनारे कर ली। दो तगड़े पुलिस वाले आए गाड़ी के सारे पेपर और लाइसेंस दिखाने के लिए कहा, उसके बाद एक टिकट काट कर दे दिया। दामाद जी ने कहा ‘थैंक यू सर।’ और हम लोगों से कहा ‘मुझे टिकट मिल गया है अब मेरा फाइन लगेगा क्योंकि मैं गाड़ी बहुत तेज चला रहा था।’ मैंने कहा ’अरे दामाद जी आपने क्यों नहीं बोला सॉरी सॉरी हम आगे से तेज नहीं चलाएँगे।’ जवाब मिला ‘जब हमने गलती की है तो हमें सजा भी मिलनी चाहिए यही ईमानदारी का तकाजा है।’ हमने भी मन में सोचा यह कितनी अच्छी इमानदारी है, जो आपको संतोष देती है। और कोई होता तो गाड़ी और तेज करके भाग जाता फिर और बड़ा फाइन लगता।’’

इसी तरह के छोटे-छोटे रोचक संस्मरण इस संग्रह में हैं जो जीवन को देखने का नजरिया बदल सकते हैं। वरिष्ठ साहित्यकार देवेंद्र दीपक ने संग्रह में ‘‘आश्वस्ति’’ के रूप में सही लिखा है कि ‘‘जया आर्य बहुभाषी हैं। बहुविद हैं। बहुआयामी हैं। नवाचारी हैं। नवोन्मेषी हैं। जया आर्य बहुभाषी हैं। बहुविद हैं। बहुआयमी हैं। नवाचारी हैं। नवोन्मेषी हैं। देश-विदेश में उनका अच्छा घूमना हुआ। इस घूमने फिरने ने उन्हें अनुभव समृद्ध किया जो उनकी लघुकथाओं और कविताओं में परिलक्षित है।’’ यह बात उनके इस संस्मरण स्रगंह में अनुभव की जा सकती है।

जया आर्य ने मध्यप्रदेश के जेलों में कैदियों को साक्षर होने में मदद की। 10 वर्ष तक शांतिनिकेतन नशा मुक्ति एवं पुनर्वास केंद्र 15 बिस्तरों वाले अस्पताल का संचालन किया। सेवा निवृत्त होकर जी ई आई इंडस्ट्री में मैनेजर ट्रेनिंग और एच आर हेड का कार्य किया। इंडस्ट्री के वर्कर्स के लिए विशेष कार्य सम्पन्न। 60 वर्ष के बाद अपनी शैक्षणिक योग्यता बढ़ाई। सेडपा वाशिंटन से कोच की ट्रेनिंग ली। अमेरिकन इंस्टीट्यूट टेसोल से ट्रेनर्स ट्रेनिंग कोर्स किया। मुम्बई पॉलिटेक्निक से एच आर. सॉफ्ट स्किल पर्सनालिटी डेवलोपमेन्ट, हेल्थ इंवारमेन्ट सेफ्टी और 9001-2008 में डिप्लोमा कोर्स किया। बैंक और कॉलेज में सॉफ्ट स्किल ट्रेनिंग दी, मोटिवेशनल स्पीकर और वॉइस एंड एक्सेंट ट्रेनर रहीं। उन्हें हिन्दी की सेवा, साहित्य सेवा एवं समाजसेवा के लिए कई प्रतिष्ठित सम्मान मिले। इन सब क्षेत्रों से जुड़े उनके संस्मरण इस संग्रह में मौजूद हैं जिन्हें पढ़ कर जीवन की अपनी समझ को विस्तार दिया जा सकता है। इस दृष्टि से यह संस्मरण पुस्तक बहुत महत्वपूर्ण है। जया आर्य का यह संग्रह रूपी आसमान सबको अपना आसमान छूने का हौसला दे सकता है।
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