Thursday, May 21, 2026

बतकाव बिन्ना की | जा मैंगाई सो अबई से लूघरा छुबान लगी | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बतकाव बिन्ना की  
जा मैंगाई सो अबई से लूघरा छुबान लगी
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
‘‘सुनियों तनक ठंडो पानी पिलइयोे!’’ भैयाजी कऊं बायरे से आए। पसीना में भींजे भए दिखा रए हते। बेर-बेर अपनो माथा गमछा से पोंछत जा रए हते।
‘‘कां से आ रए भैयाजी?’’ मैंने पूछी।
‘‘अरे का बताएं, बजार गए रए। बेजा गरमी पर रई। रामधई, भुंटा से भुन गए।’’ भैया जी अकुलाने से बोले।
‘‘हऔ गरमी सो खीब जम के पर रई। कल अपने करीब 46 डिग्री रओ औ उते खजुराहो में 47 लौं पोंच गओ। आगी से बर रई बायरे तो।’’ मैंने कई।
‘‘जेई से तो हमने कई रई के अबे ने जाओ संझा खों ले आइयो। ऐसो कोनऊं जरूरी को सामान ने हतो।’’ भौजी भैयाजी खों पानी को गिलास पकरात भईं बोलीं। फेर मोंसे पूंछी,‘‘तुमें पीने?’’
‘‘नईं, अबई तो पियो रओ।’’ मैंने कई।
‘‘इत्ती देर घाम में फिरत रए औ जे का ले आए इत्तो सो?’’ भौजी ने थैलिया उठात भए पूंछी।
‘‘अब तुमई देख लेओ।’’ भैयाजी बोले। ठंडो पानी पी के उने तनक सहूरी सी लगी हती।
‘‘जे का? जे इत्ती सी भिंडी, दो ठइयां करेला? बस? औ धना तो ले न पाओ हुइए आपने। जबके बे ओरें कोनऊं मूफत-वूफत में नईं देत आएं। बे तो सब्जी में पैले से धना के पइसा जोछ़े रैत आएं।’’ भौजी ने भैयाजी से कई।
‘‘अरे अब कोनऊं नहीं दे रओ धना-मना। हमने तो ऊसे कई रई, मनो बा बोलो के धना सोई मैंगी हो गई सा अब हम ने दे पाबी। खरीदने होए सो खरीद लेओ।’’ भैयाजी ने बताई।
‘‘हऔ खरीद लेओ।’’ भौजीे मों बनात भईं बोली,‘‘ हम तो होते तो ऊसे कैते के हऔ हम धना खरीद लेत आएं मनो तुम सबई सब्जियन पांच-पांच रुपइया कम करो। औ जे इत्ती सी सब्जी को का हुइए? जे दोई सब्जियां बनात में पुचक जात आएं। चटनी घांई खाने परहे।’’ भौजी बोलीे।
‘‘अब चटनी खाबे के दिन आ गए समझो।’’ भैयाजी बोले।
‘‘का मतलब?’’भौजी ने करेला खों उलट-पटल के देखत भईं पूंछी।
‘‘मतलब जे के अब तो थैलिया भर के पइसा ले जाओ औ मुठिया भर के सब्जी लाओ। जे हो रओ। सबई सब्जियन के दाम बढ़ गए।’’ भैयाजी बोले।
‘‘सई कै रै भैयाजी!’’ काल मैंने र्सोअ फतकुली के दाम पूछे औ पलट के मोए कैने परो के नईं भैया रैन देओ। तुम तो जोन कछू कम की होए सो बताओ।’’ मैंने भैयाजी से कई।
‘‘उते सब्जी वारे के इते हमाओ एक दोस्त मिलो रओ बा बता रओ तो के अब तो होअलन में भी सब्जी रोटी के दाम बढ़ गए। बा अबे बी मोबाईल से पइसा नईं देत। ऊसे बनत नइयां। सो बा जित्ते नोट ले के परों अपनी फैमिली को होटल में खबावे खों ले गओ रओ, उत्ते नोट कम पर गए। बा तो ऊको मोड़ा मोबाईल से पइसा देबो जानत आए औ ऊके मोबाईल में पइसा हते सो ऊने बाकी पइसा मोबाइल से दे दए ने तो उन ओरन की बड़ी फजीयत होती।’’भैयाजी ने बताई।
‘‘तेल तो ऊंसई कम खा रए। तलो-फुलो बनाबो छोड़ दओ, का अब साग-भाजी खाबो बी छोड़ने परहे?’’ भौजी बोलीं।
‘‘हऔ, बे चाए हवाई जाहज में उड़े, बे चाए दावतें करें, बे चाए दौरा में फूंके, मनो पब्लिक खों ने तो तेल खाने, ने तो गाड़ी पे चलने औ ने सोनो खरीदने। अब औ का-का छोरने परहे बा औ बता देते संगे। तुमें पतो के जे दो ठइया करेला कितेक में आए?’’ भैयाजी बोले।
‘‘आए हुइएं बीस रुपइया में।’’ भौजी अटकल लगात भईं बोलीं।
‘‘हऔ, का धरे बीस रुपइया में? जे दो ठइया करेला साठ रुपइया के आएं।’’ भैयाजी ने बताई।
‘‘हे माई! इत्ते मैंगे? सो काए खों ले आए? कछू दूसरो ले आउते।’’ भौजी बोलीं।
‘‘का ले आते? सबई तो मैंगी हो गईं। मनो बे ओरें बी का करें? उने बी तो मंडी से बजरिया लौं लाबे में गाड़ी को खर्चा लगत आए। औ गाड़ी को किराया सोई बढ़ गओ आए। गरीब खा खाए, का पैने औ का ओढ़े?’’भैयाजी बोले।
‘‘काए गरीबन के लाने बा मुतकी योजनाएं सो चल रईं। जे लच्छमी बा लच्छमी। मुफत को तो बंाट रई सरकार। बा नईं दिखा रओ?’’ भौजी बोलीं।
‘‘सो का? उने का सामान ने खरीने परहे? जोन मिलत आए, बा बी पूरो ने परहे।’’ भैयाजी बोले।
‘‘एक बेर कोरोना में मुतके निपट गए औ अब जे मैंगाई लील जैहे। कोनऊं से जुट्ट बना के जे नईं दबाव डारत बन रओ के लड़ाई खतम करी जाए। बे लड़-मर रए औ संगे अपन सोई निपटाए जा रए।’’ भैयाजी फिर के भड़कत भए बोले।
भैया खों भड़कबो सई हतो, काए से के जोन को तीस रुपइया में एक ठो करेला खरीदने परहे बा तो भड़कहे ई। मोए सोई लगत आए के जे जो मैंगाई ऐसई बढ़त रई तो का हुइए?
‘‘भैयाजी, मोए जे बताओ के डीजल औ पेट््रोल बचाबे के लाने सायकिल पे चलबे की फोटुएं छप रईं। जबके सई तो जा आए के पब्लिक के पास अब सायकिल रैती कां आए? गांव दो किलोमीटर से बारा किलोमीटर लौं पसर गए। सहर बीस-तीस किलोमीटर लौं फैलत चले गए। औ पांछू कछू दिनां से तो जेई चलन बन परी के कालोनी इते बनाओ तो बसस्टेंड उते सहर से बायरे बनाओ। अब सायकिल ने तो पैदल कोऊ कैसे जा पा रओ। ऊपे से आदत लौं नई रई। फेर तुमके घर ऐसे आंए जीमें बच्चा सबरे बायरे दूसरे सहर, ने तो दूसरे देस चले गए कमाबे के लाने औ घरे बुड्ढा-बुड्ढी रै रए। बे का करहें?’’ मैंने भैयाजी से कई।
‘‘तुम तो उन ओरन की सोंस रईं, अब तो जे कए रै के इत्ते करै घाम में सायकिल चलाबो ने तो पैदत चलबो का आसान आए? पेड़ सो पैलई सबरे कटा दए गए। मूंड़ पे छायरी लौं ने बची।’’ भैयाजी बोले।
‘‘मनो जे बी तो कै कए रए के गाड़ी में एक-दूसरे के संगे चलो।’’ मैंने याद कराई।
‘‘कोऊ कोनऊं खों संगे नईं ले जा रओ। फेर अपने इते के लोग इत्ते साजे बी नोंई के एक दिनां एक पेट््रल भरा ले औ दूसरे दिन दूसरो। बे कैने लगहंे के हमाई सो कड़की चल रई। औ दोई दिनो में जा अपनी गैल, बा अपनी गैल।  
‘‘रामधई बिन्ना, जे मैंगाई तो लूघरा छुबान लगी। आगे का हुइए? मोरो तो सोचई के जी घबरान लगो।’’ भौजी बोलीं।
‘‘ने घबड़ाओ भौजी। एक तो ऊंसई गरमी पर रई, ऊमें तुम ने अपनी तबीयत बिगार लई तो बड़ी सल्ल बींध जैहे।’’ मैंने भौजी खों समझाई।        
बाकी बतकाव हती सो बढ़ी गई, हड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हप्ता करबी बतकाव तब तक लौं जेई की जुगाली करो। मनो सोचियो जरूर के जे मैंगाई चुनाव से पैले काए ने बढ़ी जबके लड़ाई तो पैले से चल रई हती?    
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बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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