Tuesday, May 19, 2026

बोध कथा | पहले मन को करो चंगा - शरद सिंह | नया हिन्दुस्तान


आज "नया हिन्दुस्तान" समाचारपत्र में ...

हार्दिक आभार नया हिन्दुस्तान एवं सामयिक प्रकाशन 🙏

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बोध कथा | पहले मन को करो चंगा

- शरद सिंह

गुरु नानक देव किशोरावस्था में संतों की सेवा करते समय खाना-पीना तक भूल जाते थे। इससे उनकी सेहत गिरने लगी। वे दुबले हो गए। पुत्र की ऐसी दशा देख कर उनके पिता ने गांव के सबसे योग्य वैद्य हरिदास को बुलाया।

     वैद्य गुरु नानक देव की नाड़ी देखने लगे। जब उन्होंने वैद्य से पूछा कि वह क्या कर रहे हैं, तो वैद्य ने जवाब दिया कि वे उनकी नाड़ी की गति से उनके रोग का पता लगा लगा रहे हैं। इससे उनका सही इलाज हो सकेगा। नानक साहब ने वैद्य से कहा कि उनका शरीर बीमार नहीं है। हां, अगर उनका मन बीमार हो, तो क्या वे उसका इलाज कर देंगे? वैद्य उनकी बात समझ नहीं पाया और उन्हें फटी हुई आंखों से देखने लगा। यह देख गुरु नानक ने वैद्य से कहा कि पहले वे अपने तन-मन का इलाज करें।

     यह सुन कर वैद्य ने गुरु नानक से कहा कि वे यह क्या कह रहे हैं। उन्हें तो कोई बीमारी नहीं है। वे तो एकदम स्वस्थ और प्रसन्न हैं। उन्हें लगा कि ऐसा कहकर बालक नानक उनका अपमान कर रहे हैं।

     गुरु नानक देव ने शांत स्वर में फिर कहा, 'वैद्यजी, आप अत्यंत गंभीर बीमारी से पीड़ित हैं।'

बताओ 'मैं, और गंभीर बीमारी से पीड़ित हूं? यह तुम क्या कह रहे हो?' वैद्य को क्रोध आ गया। 'मैं सच कह रहा हूं।' गुरु नानक देव ने कहा। 'ऐसा है, तो कि मुझे कौन-सी बीमारी है?' वैद्य ने पूछा।

'वैद्यजी, आपको जन्म और मृत्यु की चिंता की बीमारी है। जन्म और मृत्यु की चिंता से बड़ी बीमारी इस दुनिया में दूसरी नहीं है। इस बीमारी का इलाज नब्ज देख कर नहीं किया जा सकता है। इस बीमारी को दूर करने की औषधि भी आपके औषधि विज्ञान के पास नहीं है।' गुरु नानक देव ने कहा।

वैद्य उनकी तरफ देखने लगे। गुरु नानक ने वैद्य से कहा, 'मन स्वस्थ हो, तो तन की बीमारी शीघ्र दूर हो सकती है, किंतु यदि मन अस्वस्थ है, तो तन की बीमारी लाख उपाय करने पर भी दूर नहीं की जा सकती। मन की बीमारी मृत्यु के भय से पैदा होती है और मृत्यु होने के भय से ही बढ़ती जाती है। यह भय ईश्वर रूपी चिकित्सक की शरण में जाने पर ही दूर हो सकता है।'

गुरु नानक देव की बात सुन कर वैद्य हरिदास की आंखें खुल गईं। उसे अपनी नासमझी पर लज्जा आई। उन्होंने उनके पिता से कहा, 'भाई मेहता कालू, आपका पुत्र सच कह रहा है कि मुझे तन की बीमारी दूर करने का ज्ञान तो है, किंतु मन की बीमारी दूर करने का ज्ञान नहीं है। आपको अपने पुत्र के विषय में चिंतित होने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि वह बीमार नहीं है, बल्कि ईश्वर के प्रेम में डूबा हुआ है। यह तन और मन दोनों की बीमारी का इलाज है।' इसके बाद पिता मेहता कालूराय अपने पुत्र गुरु नानक देव के भक्तिपूर्ण व्यवहार के प्रति चिंतित होने के बदले गर्व का अनुभव करने लगे।

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(साभारः 'श्रेष्ठ सिख कथाएं', सामयिक प्रकाशन,नई दिल्ली)


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