बतकाव बिन्ना की
जबरा मारे रोन न दे, अंसुवा बी लौं बोन न दे
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
‘‘आज मोए जे कहनात खींबई याद आ रई के- जबरा मारे रोन न दे, अंसुवा बी लौं बोन न दे।’’ मैंने भैयाजी से कई।
मोरी बात सुन के भैयाजी हंसन लगे। जा देख के मोए अचरज बी भओ औ गुस्सा बी आओ। भला ईमें हंसबे वारी बात का आए?
‘‘आप काए हंस रए?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘बुरौ ने मानियो मगर मोए हंसी जा बात पे आई के जे कहनात तुमें कछू ज्यादई पुसात आए। जब देखो जेई कहनात कैत रैत हो।’’ भैयाजी ऊंसई हंसत भए बोले।
‘‘अब का करो जाए भैयाजी! जब दसई नईं बदलत तो कहनात कां से बदल जैहे?’’ मैंने कई।
‘‘का मतलब? कोन सी दसा? का कैबो चा रईं?’’ भैयाजी ने पूछी।
‘‘देख नईं रै के कैसो दोंदरा मचो आए।’’ मैंने कई।
‘‘का हो गओ?’’ भैयाजी ने तनक गंभीर होत भए पूछी।
‘‘होने का आए? मोए कछू नई भओ।’’ मैंने कई।
‘‘तुमें नईं कछू भओ, सो कोन की कै रईं?’’ भैयाजी ने पूछी।
‘‘आप अखबार नईं पढ़त का?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘काए नईं पढ़त? संकारे से सबसे पैले अखबारई बांचत आएं।’’ भैयाजी बोले।
‘‘सो ऊमें पढ़ो नईं के जनगणना वारों में से कछू को फटकारो गओ के काम धीमो काय चल रओ।’’ मैंने कई।
‘‘सो, ईमें का खास आए?’’भैयाजी बोले।
‘‘ईमें आपके लाने कछू खास नई दिखा रओ?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘तुमई बता देओ के ईमें का खास आए? अरे, बे ओरें समै पे काम पूरो नईं कर पाए हुइएं सो उने फटकारो गओ। कओ चिट्ठी पकरा दी गई होए। जे तो चलत रैत आए।’’ भैयाजी तनक लापरवाई से बोले।
‘‘भैयाजी आप मोए एक बात बताओ।’’ मैंने कई।
‘‘हऔ पूछो।’’ भैयाजी बोले।
‘‘हमें जे बताओ आप के जो कऊं अपनी भौजी कऊं टीचर होतीं औ उनकी ड्यूटी ई काम में लग जाती तो आप का करते?’’ मैंने पूछी।
‘‘करते का? सूदे कलक्टर आफिस जाते औ तुमाई भौजी की ड्यूटी कटवा के आते।’’ भैयाजी तुरतईं बोले।
‘‘काए? उने ड्यूटी काए नईं करन देते?’’ मैंने पूछी।
‘‘अरे, इत्ती घाम में बे कां फिरतीं? चाए कछू हो जातो, हम तो जान नईं देते।’’ भैयाजी ने कई।
‘‘जे का बात भई भैयाजी? अपनी भौजी, भौजी औ दूसरी लुगाई कछू नईं? औ लुगाई की तो छोड़ो लुगवा हरों की बी कछू नईं?’’ मैंने भैयाजी खों आड़े हाथो लओ।
‘‘तुम मनो कैबो का चा रईं?’’ भैयाजी तनक झेंपत भए बोले।
‘‘मैं जे कै रई भैयाजी के इत्ती गरमी पर रई, घाम चटक रओ औ सरकार को गिनती कराबे की परी। अरे करा लइयो तनक साजे मोसम में। मनो नईं उने तो ई गरमी में ई कराने।’’ मोए बोलत-बोलत गुस्सा सी आन लगी।
‘‘तुम काए खिजियां रई? अब राजकाज में जा सब तो चलत रैत आए।’’ भैयाजी ने मोए समझाबे की कोसिस करी।
‘‘खिजियाबे वारी बातई आए भैयाजी! अब आपई सोचो के अपन ओरें जो घरै रैत आएं तो दुफारी को दोरे बंद कर के, कूलर चला के पर जात आएं। फेर कोनऊं दोरे की घंटी टनटनाए उठ के दोरे खोलबे को जी नईं करत। फेर ई गरमी में गली-मोहल्ला इत्तो सूनो हो जात आए के कोनऊं अनजाने के लाने दोरे खोलबे में डर लगत आए। उनके मों पे थोड़े लिखो रैत आए के बे गिनती करबे वारे आएं के कोनऊं औ। अबई चार दिनां पैले की घटना मैंने आपके लाने सुनाई हती के दो जने एक फटफटिया पे चढ़ के आए रए। उन्ने मोरे घर के दोरे की घंटिया बजाई। मैंने खिरकी से तनक झांक के देखो सो मोए लगो के यां तो पोस्टमेन, ने तो कूरिया वारो हुइए। मैंने बैठक को दोरो खोलो औ बरांडे में पौंची तो मोए तनक डाउट भओ। मैंने उन ओरन से पूछी के का काम आए? सो उनमें से एक बोलो जोन फटफटिया से उतर के ठाड़ो हतो, ‘‘नमस्ते! आप कैसी हो? जब आपकी जिज्जी हतीं तो हम आपके इते आत रए।’ इत्तो बोल के बा सोचो के हम ऊकी बातन में आ जाहें औ बरांडे को गेट खोल दैहें। लेकन मैंने ऊसे साफ-साफ कई के भैया, हमने आपको पैचानों नईं। तो बा बोलो के अरे, आपकी जिज्जी हमें पैचानत्तीं, आप सोई पैचानत्तीं। फेर बा पलट के अपने संगवारे से कछू बोलो औ फेर मोरी तरफी देखन लगो। सो मैंने कई के भैया, हमने आपको खों पैचानो नईयां। आप जो जिज्जी के समै पे आत रए तो जिज्जी के गए पे काए नईं आए रए? जा सुन के बा बोलो के हम काम के लाने बायरे चले गए रए। बाकी हमने जिज्जी के बारे में सुनी रई। औ आज इते से निकरे तो सोची के आपसे मिलत चलें। मैंने कई के मगर मैंने आप ओरन खों नईं चीन्हों आए सो आप ओरें फेर आइयो। इत्तो कै के मैंने दोरे बंद कर लए। मैंने खींब देर सोची मनो मोए तनक बी याद ने आई के बे ओरें कौन हते? मैंने ई बारे में जोन के बी बताओ बे सबई बोले के अच्छो करो के दोरे नईं खोले, को जाने को हते बे ओरें। बा बी दुफारी के सन्नाटा में। अब ऐसे में को आ चीन्ह पा रओ के बे गिनती करबे वारे आएं के कोनऊं ऊंसई चोर-उचक्का आएं। सो, अब आपई बताओ के ऐसे में बा गिनती करबे वारों के लाने घरों के दोरे नईं खुल रए तो ईमें उन ओरन को का दोस? औ ने ना खोलबे वारन को कोनऊं दोस। काए से दुफारी में घरे लुगाइयां, बच्चा औ बुड्ढा हरें रैत आएं। अरे अच्छो मोसम रए तो मोहल्ला में मुतके जने घूमत रैत आएं, ऐसे घाम में को आ मूंड चटकात फिरहे? पूरो सूनो डरो रैत आए।’’ मैंने भैयाजी से कई।
‘‘सई कै रईं बिन्ना! ऐसे में उनको काम धीमो सो चलहेई।’’ भैयाजी बोले।
‘‘जेई तो मैं कै रई के एक तो ऐसे बुरए मोसम में जो काम करा रए औ जो काम ठीक से हो नई पा रओ तो खटिया खड़ी कर रए। अब जे दसा देख के जेई कहनात सो याद आहे के जबरा मारे रोन न दे, अंसुवा बी लौं बोन न दे।’’ मैंने कई।
‘‘हम समझ गए के तुम सोई एक जमाना में टीचर रईं, जेई से तुमें उनके लाने दुख हो रओ।’’ भैयाजी मुस्कात भए बोले।
‘‘मैं तो कच्ची वारी टीचर रई औ मोरी कभऊं ऐसी ड्यूटी नई लगी। मनों, जे इंसानियत की बात आए।’’ मैंने कई।
‘‘बा तो ठीक आए बिन्ना, मनो नौकरी मने नौकर घांई जिनगी।’’ भैयाजी बोले।
‘‘सो, नौकर बनाओ, जे तो गुलामी घांईं कहानो।’’ मैंने चिढ़ के कई।
‘‘अच्छा चलो, ने तिन्नाओ। हमाए-तुमाए सोचे से कछू ने हुइए, बोलने तो उनई को परहे। भैयाजी बोले।
‘‘सई कै रए आप।’’ मैंने भैयाजी से कई।
बाकी बतकाव हती सो बढ़ी गई, हड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हप्ता करबी बतकाव तब तक लौं जेई की जुगाली करो। मनो सोचियो जरूर के पक्को करबे, पईसा बढ़ाबे के लाने तो सबई कट्ठे ठाड़ें हो जात आएं, सो ईके लाने काए नईं बोलत कोऊ?
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बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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