Thursday, May 7, 2026

बतकाव बिन्ना की | चाए कछू हो जाए हम दाम ने देबी | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम


बतकाव बिन्ना की  
चाए कछू हो जाए हम दाम ने देबी
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
‘‘तुम बड़े रोंटियाई वारे ठैरे। चाए कछू हो जाए हम दाम ने देबी।’’ जैसी मैं भैयाजी के इते पौंची सो भौजी के बोल सुनाई परे।
‘‘का हो रओ भौजी? भैयाजी बेईमानी कर रए का?’’मैंने भौजी से पूछी।
‘‘तुमाए भैयाजी? कोन से बेईमानी? हमें नईं पतो।’’ भौजी अचरज करत भईं बोलीं।
‘‘आप ओरें काना-दुआ नईं खेल रए?’’ मैंने देखी के उते काना-दुआ की ने तो चौकड़िया हती औ ने गोटी, ने चईंयां।
‘‘नईं हम ओरें नईं खेल रए काना-दुआ। औ तुम इनकी बेईमानी की का कै रईं?’’ भौैजी ने मोसे पूछी।
‘‘अरे, आपई तो कै रई हतीं भैयाजी से के तुम बड़े रोंटियाई वारे ठैरे औ चाए कछू हो जाए हम दाम ने देबी। सो मैंने सोची के आप ओरें काना-दुआ खेल रए।’’ मैंने कई।
‘‘अरे, बा तो हम कै रए हते उते बंगाल के चुनाव के बाद की। उते देखो तो जिज्जी कैसी अड़ी दे रईं के हम कुर्सी ने छोड़बी। अरे, जो पब्लिक ने बता दई के हमें आपके बदले कछू नओ चाउने तो तो ऊको तनक मान राखो। जो का बच्चों घाईं कर रईं? हम जेई तुमाए भैयाजी से कै रए हते के जिज्जी खों सदमा बैठ गओ जेई से बे लरकोरा पना दिखा रईं। जैसे पैले अपन ओरें लरकपन में खिपड़ी गद्दा, छुआ-छुआउव्वल खेलत्ते औ जो कोनऊं हार जात्तो तो ऊको दाम देने परत्तो। तब कोऊ-कोऊ हारबे वारो अड़न लगत्तो के तुम ओरन ने रोंटियाई करी आए। चाए कछू हो जाए हम दाम ने देबी। ऊंसई सो जिज्जी बाई उते कर रईं।’’ भौजी ने कई।
‘‘बिलकुल सई कै रईं आप। अब हार गईं सो हार गईं। अपनी हार मान के देखो चाइए के उनसे चूक कां भई ताके अगली चुनाव में जीत सकें। उने समझो चाइए के आजकाल सोसल मीडिया पे ट्रोल करबे वारों की कमी नोंई। बे ऊंसई चीथत रैत आएं औ जे ऐसे करे से तो बे धजी बना दैहें। सो उने तनक सहूरी रखो चाइए।’’ मैंने भौजी की बात को समर्थन करो।
‘‘हमें तो ऊ टेम याद आ गओ जबे इंदिरा गांधी चुनाव हारी हतीं। बे ई टाईप से ने रोई हतीं। उने तो पकर के जेल ले जाओ गओ रओ। फेर बी उन्ने बिरोध ने करो हतो। ईको असर जे परो के अगली चुनाव में फेर के कुर्सी पे लौट आई रईं। औ बे अपने अटल बिहारी बाजपेयी हरें तो मुतके बेर हारे मनो बे बी कभऊं ऐसे ने रोए। जे काए अपनी भद्द उड़वा रईं?’’ भैयाजी बोले।
‘‘कछू कओ पब्लिक जिज्जी से खफा तो रई हुइए तभईं तो ऊने कुर्सी से नैंचे पटक दओ।’’ भौजी बोलीं।
‘‘काए नईं रई? खूब रई। ने तो बटन चटका के उनके लाने वोट ने दे देती?’’ मैंने कई।
‘‘का होत आए बिन्ना के जब कोनऊं एक ई कुर्सी पे कुल्ल टेम से जमो रैत आए तो ऊको जे गल्तफेमी होन लगत आए के ऊको कोनऊं हरा नई सकत। बो चाए तो कछू बी कर सकत आए। पब्लिक की अटकी रई सो ऊने जिताओ, जो जीत गए सो काए की पब्लिक औ कां की पब्लिक।’’ भैयाजी बोले।
‘‘मनो आप कछू कओ भैयाजी पर जे तो मानने परहे के जे अपने मोटा भाई, छोटा भाई दोई बेजा चतुरा आएं। ऐसो चक्रब्यूह रचत आएं के ऊमें उरझ के बड़े-बड़े महारथी धूरा चाटन लगत आएं। उन ओरन को दांव कोऊ भांप नई सकत। अब आगे देखियो के का-का होत आए।’’ मैंने भैयाजी से कई।
‘‘का आए बिन्ना के हमें एक किसां याद आ रई जेई पे से।’’ भौजी बोलीं।
‘‘कोन सी किसां?’’ मैंने भौजी से पूछीं।
‘‘किसां जे आए के भौत समै पैले की बात आए। एक देस में एक राजा रओे। जब बा राजा ने बनो रओ हतो सो ऊको दिन रात जेई लगत्तो के मोए राजगद्दी कबे मिलहे। ऊकी उमर सोई हो चली ती राजगद्दी सम्हारने जोग। सो एक दिनां तंग आ के ऊने अपने बापराम से सूधई कै दई के अब तुम गद्दी छोरो, ऊपे हमें बैठने। बापराम जो ऊ देस को महाराजा हतो, बोलो के हम काए गद्दी छोड़ें? हम ने छोड़बी, तुमसे जो दिखाए सो कर लेओ। जा सुन के ऊके बेटा खों आ गओ गुस्सा। ऊने तुरतईं एक फौज जोरी औ महल पे धावा बोल दओ। बाप औ बेटा में खींबई घमासान भई। अखीर में बाप हार गओ औ बेटा जीत गओ। फेर का रओ, ऊने बापराम खों गद्दी से उतार फेंकों औ खुद जा बैठो। ऊ राजा बन गओ। सुरू-सुरू में तो ऊने अपनी परजा को बरो खयाल राखो। मनो फेर ऊके राज में ढिलाई आन लगी। दसा जे भई के मुतकी परजा के पास ने तो खाबे खों नाज औ ने पहनबे खों हुन्ना। परजा देखत्ती के पड़ोस के देस में भौत कछू नोनों हो रओ औ उनके देस में खाली बतकाव होत रैत आए। सो परजा सोई अकुलान लगी। बा सोचन लगी के ईसे तो साजो आए के पड़ोसी राजा इते आए औ इते को भी राज सम्हार ले। कम से कम कछू तो अच्छो हुइए। अब का आए के परजा तो ऊंसई मंदर के घंटा घांई होत आए। जोन चाए ऊको बजात रए। ऊपे ऊको जेई भरम रैत आए के हम तो भगवान के काम आ रए। हमाई आवाज सो भगवान सुन रए। सो, बा तो ठुकत-पिटत रैत आए। सो, फेर भओ जे के एक दार पड़ोस के राजा ने चढ़ाई कर दई। दोई राजाओं में घमासान भई। मनो परजा तो जेई ताक में बैठी हती सो ऊने पड़ोसी राजा को साथ दओ औ अपने राजा खों हरा दओ। हारबे वारो राजा खों भरोसो ने हो पा राओ तो के ऊकी परजा दूसरे को साथ दे सकत आए, सो ऊने परजा से पूछी के तुम ओरन ने ऐसी काए करी? तो परजा ने अपने हारे भए राजा के आंगू एक दरपन धर दओ औ बोली के ईमें अपनी सकल देखो औ बताओ के आप पैले कैसे दिखत्ते औ अब कैसे दिखात आओ। औ जो अबे ने बता सको तो सोच के बताइयो। जो तुम अपनी परजा के लाने ने बदले होते तो तुमाई परजा बी तुमें ने बदरती। सो बिन्ना, जे किसां हमें याद आ रई हती।’’ भौजी पूरी किसां सुनात भई अखीर में बोलीे।
‘‘बिलकुल सांची किसां आए जा तो। जे तो उते भओ आए। सो अब रोए, चिचियाए से का हुइए?’’ मैंने कई। 
‘‘हऔ बिन्ना! उते पच्छिम बंगाल में ऊंसई भौत गरीबी आए। औ भीर तो इत्ती के ने पूछो। हम तो एक बेर कोलकत्ता गए रए सेा हमें पसीनों छूट गओ रओ। दो दिनां में जैसे-तैसे अपनो काम निपटाओ औ भाग आए रए।’’ भैयाजी बोले।
‘‘मैंने नईं देखो कोलकाता, मनो जाबे को जी भी नईं करत। मोए ऊंसई भीर से घबराट होत आए। मनो उते के साहित्य में उते के बारे में खूब पढ़ो। देसी-बिदेसी सबई ने कोलकाता के बारे में खूब लिखो। एक किताब मैंने पढ़ी रई डोमनिक लैपियर की। ऊको नांव आए ‘‘सिटी ऑफ ज्वाय’’। ऊमें ऊने कोलकाता के बारे में खूबई खोल के लिखो आए। बाकी मोए तो जेई लगत आए के जां पे इत्ते बरस जिज्जी को मने एक लुगाई को राज रओ उते सोनागाछी की रेड लाईट बुझ ने सकी। मैंने कऊं पढ़ी रई के जैसे एशिया की सबसे बड़ी झोपड़पट्टी मुंबई की धारावी आए ऊंसई सोनागाछी एशिया की सबसे बड़ी लुगाइयन की मंडी आए।’’ मैंने कई।
‘‘ऐसो का? मनो कल को जे ने बोलियो के एशिया में सबसे ज्यादा दारू को अहाता अपने प्रदेस में आए।’’ भौजी ने मोसे कई।
‘‘अरे, जो का कै रईं आप? ऐसो ने कओ। ने तो बे अहाता वारे मारहें औ रेबेन्यू वारे अलग मारहें। आप तो अपनी दार-रोटी चलन देओ।’’ मैंने भौजी खों हंस के समझाओ। 
‘‘जिज्जी खों इतई ने बुला लेवें? इते बे दारू चढ़ा के अपनो गम भुला लैहें।’’ भैयाजी ने सोई हंस के चुटकी लई। उनकी बात सुन के मोए औ भौजी खों खींबई हंसी आई।        
बाकी बतकाव हती सो बढ़ी गई, हड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हप्ता करबी बतकाव तब तक लौं जेई की जुगाली करो। मनो सोचियो जरूर के ई के बाद अब आगे का हुइए? मैं मैंगाई की नईं राजनीति की कै रई।  
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बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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