चर्चा प्लस
पुण्यतिथि पर विशेष
पं. दीनदयाल उपाध्याय की चुनावी रणनीति का पहला उसूल था - “वोट फार पर्सन, नाट फार द पर्स”
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
पं. दीनदयाल उपाध्याय जनसंघ में एक ऐसे व्यक्ति थे जिन पर संघ अगाध विश्वास करता था। पं. दीनदयाल ने भी अपना सर्वस्व संघ के विचारों के पोषण एवं विस्तार के लिए अर्पित कर दिया था। उनकी संदेहास्पद परिस्थितियों में हुई मृत्यु पर अटल बिहारी वाजपेयी ने संसद में कहा था-‘‘ वे संसद के सदस्य नहीं थे लेकिन भारतीय जनसंघ के जितने सदस्य इस सदन में और दूसरे सदन में बैठे हैं उनकी विजय का, जनसंघ को बनाने का, बढ़ाने का यदि किसी एक व्यक्ति को श्रेय जाता है तो वह श्री उपाध्याय जी को है। देखने में सीधे-सादे लेकिन मौलिक विचारक, कुशल संगठनकर्ता, दूरदर्शी नेता, सबको साथ ले कर चलने का जो गुण उन्होंने अपने जीवन में प्रकट किया, वह नई पीढ़ी के लिए मार्गदर्शन का कार्य करेगा।’’
वह समय था जब एक ओर डाॅ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की असामयिक संदेहास्पद मृत्यु और दूसरी ओर जनसंघ में अंतरकलह - ये दोनों कारण दीनदयाल जी को चिन्ता में डालने लगे थे। जनसंघ के अध्यक्ष पं. मौलिचन्द्र शर्मा से कार्यकर्ता रुष्ट होने लगे थे। जनसंघ के केन्द्रीय अधिकारी एकनाथ राणाडे के कारण भी संघ में असंतोष बढ़ने लगा था। इनके अतिरिक्त विभिन्न रजवाड़ों को जनसंघ से जोड़ने वाले वसंतराव ओक भी इस अंतरकलह के शिकार हुए और उन्हें जनसंघ छोड़ना पड़ा।
एक समय ऐसा आया कि लगने लगा जैसे जनसंघ पूरी तरह टूट कर बिखर जाएगा। कलह से भ्रमित कार्यकर्ताओं ने भी संघ को छोड़ना शुरू कर दिया था। ऐसा लग रहा था कि राष्ट्रीय राजनैतिक दल का दर्जा पा लेने वाला जनसंघ जैसे नेतृत्वविहीन हो गया हो। ऐसी विकट परिस्थिति में डाॅ. रघुवीर ने जनसंघ की अध्यक्षता सम्हाल ली। दुर्भाग्यवश सन् 1962 में एक दुर्घटना में उनका निधन हो गया। इसके साथ ही एक बार फिर जनसंघ में नेतृत्व का संकट गहरा गया। लेकिन दीनदयाल जी किसी भी परिस्थिति में जनसंघ का पराभव नहीं देख सकते थे। उन्होंने डाॅ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की आशाओं के अनुरूप संगठनकर्ता के रूप में सक्रिय राजनीति में भाग लेना तय किया। संघ के अन्य पदाधिकारी एवं कार्यकर्ता भी उनके इस निर्णय से उत्साहित हो उठे। जनसंघ में मानों पुनः आशा की लहर दौड़ गई। किन्तु जनसंघ अंतर्कलह से पूरी तरह उबरा नहीं था, जिसका परिणाम शीघ्र ही सामने आया।
जौनपुर उपचुनाव
दीनदयालजी जनसंघ की राजनीतिक प्रतिष्ठा को बचाने के लिए कृतसंकल्प थे किन्तु वे स्वयं एक राजनेता के रूप में चुनाव लड़ कर पद प्राप्त नहीं करना चाहते थे। सन् 1963 में लोकसभा के उपचुनाव हुए। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सरसंघ चालक माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर ने दीनदयाल जी से आग्रह किया कि वे जौनपुर से चुनाव लड़ें। दीनदयाल जी चुनाव नहीं लड़ना चाहते थे किन्तु वे गुरूजी अर्थात् माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर का आग्रह भी टाल नहीं सकते थे।
भाऊराव देवरस ने दीनदयाल जी से संबंधित अपने एक संस्मरण में लिखा है कि ‘‘हमारे तीस वर्ष के सहचर्य में उनके मन के विरुद्ध मैंने केवल एक ही बात की और वह थी उन्हें जौनपुर से लोकसभा के लिए चुनाव लड़ने को विवश करना। सन् 1962 के लोकसभा चुनाव में वाजपेयी के हारने के कारण जनसंघ की दृष्टि से लोकसभा में एक प्रकार की रिक्तता उत्पन्न हो गई थी। उसे भरने के लिए सबकी सम्मति थी कि पण्डित जी चुनाव लड़ें। लेकिन पण्डित जी इसके लिए अपनी सहमति नहीं दे रहे थे। उनका कहना था कि मैं स्वयंसेवक और प्रचारक हूं। चुनाव लड़ना मेरे लिए उचित नहीं होगा। प्रचारक भी चुनाव लड़ते हैं, ऐसी गलत परिपाटी इससे पड़ जाएगी और भविष्य में संगठन पर इसका विपरीत असर पड़ेगा। हम सभी सहयोगियों ने एक मत से उन्हें चुनाव लड़ने के लिए कहा, तब कहीं वे माने।’’
अंततः दीनदयाल जी ने जौनपुर से नामांकन भर दिया और चुनाव की तैयारी करने लगे। यद्यपि एक दिन उन्होंने अवसर पा कर अपने मन की बात गुरूजी से कह डाली थी कि ‘‘आपने मुझे किस झमेले में डाल दिया। मुझे प्रचारक का काम ही करने दें।’’
इस पर गोलवलकर गुरूजी ने उन्हें समझाया था कि ‘‘तुम्हारे अतिरिक्त इस झमेले में किसको डालें। संगठन के कार्य पर जिसके मन में इतनी अविचल श्रद्धा और निष्ठा है वही उस झमेले में रह कर कीचड़ में भी कीचड़ से अस्पृश्य रहता हुआ सुचारु रूप से वहां की सफाई कर सकेगा।’’
जौनपुर में जनसंघ के कार्यकर्ता जातिवादी समीकरण का सहारा लेना चाहते थे। जाधवराव देशमुख के अनुसार कार्यकर्ताओं ने दीनदयाल जी से निवेदन किया कि ‘‘कांग्रेस ठाकुरवाद चला रही है तो हम ब्राह्मणवाद चला दें। इसमें क्या हानि है? चुनाव-युद्ध में सभी कुछ क्षम्य होता है न!’’
यह सुन कर दीनदयाल जी क्रोधित हो उठे। वे कार्यकर्त्ताओं को डांटते हुए बोले-‘‘सिद्धांत की बलि चढ़ा कर जातिवाद के सहारे मिलने वाली विजय, सच पूछो तो, पराजय से भी बुरी है।’’
उनकी यह बात सुन कर वहां सन्नाटा छा गया। इस पर दीनदयाल जी ने संयत होते हुए शांत स्वर में समझाया -‘‘भाईयों! राजनीतिक दल के जीवन में एक उपचुनाव कोई विशेष महत्व नहीं रखता, किन्तु एक चुनाव में जीतने के लिए हमने यदि जातिवाद का सहारा लिया तो वह भूत सदा के लिए हम पर सवार हो जाएगा और फिर कांग्रेस और जनसंघ में कोई अंतर नहीं रहेगा।’’
दीनदयाल जी का कहना था कि राजनीति में विचारधारा, सिद्धांत, नीति और कार्यक्रमों में सुन्दर ताल-मेल चाहिए, टकराव या विरोधाभास नहीं। वे कार्यकर्ताओं के ही नहीं, अपितु जन-सामान्य के राजनीतिक प्रशिक्षण पर भी बल देते थे। वे मतपत्र को कागज का टुकड़ा न मानकर अपना अधिकार-पत्र मानने को कहते थे। इस संबंध में उनका सिद्धांत स्पष्ट था जिसे वे तीन बिन्दुओं के रूप में कार्यकर्त्ताओं एवं आमजन के समक्ष रखते थे -
1. वोट फार पर्सन, नाट फार द पर्स
2. वोट फार पार्टी, नाट फार पर्सन
3. वोट फार आइडियोलोजी, नाट फार पार्टी
जब चुनाव का परिणाम घोषित हुआ तो स्पष्ट हो गया कि जनसंघ में अंतर्कलह समाप्त नहीं हुआ था। जौनपुर में संघ के कुछ कार्यकर्ता ऐसे थे जो दीनदयाल जी की ‘आइडियोलोजी’ के समर्थन में नहीं थे और आरम्भ से ही चाहते थे कि दीनदयाल जी वहां से चुनाव न लड़ें। उन कार्यकर्ताओं ने दीनदयाल जी के चुनाव अभियान को सहयोग देने के बदले उनका विरोध किया था। इसका मतदाताओं के मन पर बुरा असर पड़ा और दीनदयाल जी चुनाव हार गए। किन्तु उनकी संघ के प्रति तत्परता एवं निष्ठा का देश के अन्य कार्यकर्ताओं पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा। स्वयं दीनदयाल जी को इस बात का संतोष था कि भले ही वे उपचुनाव हार गए किन्तु उन्होंने अपने और संघ के सिद्धांतों को जातिवादी समीकरण की भेंट नहीं चढ़ाया।
चुनाव में पराजय के बाद दीनदयाल जी के व्यवहार के बारे में भाऊराव देवरस ने अपने एक संस्मरण में लिखा कि ‘‘चुनाव में हारने के दूसरे दिन ही वे (दीनदयाल जी) काशी के संघ वर्ग में पहुंच गए। वहां उनका आचरण देख कर हम सभी लोग आश्चर्य पड़ गए कि इतने बड़े चुनाव में हारने वाले क्या ये ही दीनदयाल जी हैं? उनका अत्यंत सहज और शांत आचरण देख कर मैं स्वयं दंग रह गया था।’’
चुनाव में पराजित होने के बाद पत्रकारवार्ता में एक सम्वाददाता ने उनसे प्रश्न किया कि ‘‘देश में जब कांग्रेसविरोधी वातावरण है तो आप चुनाव कैसे हार गए?’’ इस पर दीनदयाल जी ने विनम्रतापूर्वक बिना किसी संकोच के कहा कि ‘‘स्पष्ट बताऊं, मेरे विरुद्ध खड़ा कांग्रेस का प्रत्याशी एक सच्चा कार्यकर्ता है। उसने अपने क्षेत्र में पर्याप्त काम किया है, इसीलिए लोगों ने उसे अधिक मत दिए।’’
गोलवलकर गुरूजी ने एक बार दीनदयाल जी के संबंध में कहा था ‘‘बिलकुल नींव के पत्थर से प्रारम्भ कर जनसंघ के कार्य को इतना नाम और इतना रूप देने का श्रेय यदि किसी एक व्यक्ति को देना हो तो वह दीनदयाल जी को ही देना होगा।’’
जनसंघ के अध्यक्ष घोषित
सरसंघ चालक गोलवलकर गुरूजी को दीनदयाल जी की क्षमता पर पूरा भरोसा था, इसीलिए दल की ओर से उन्हें सबसे बड़ी जिम्मेदारी सौंपी गई। सन् 1967 में जनसंघ का चौदहवां अधिवेशन कालीकट में हुआ। दल के सभी पदाधिकारियों ने एकमत से निर्णय लेते हुए दीनदयाल जी को जनसंघ का अध्यक्ष घोषित किया।
दीनदयाल जी के जनसंघ के अध्यक्ष बनने से भारतीय राजनीति में एक नया अध्याय शुरू हुआ। जिस जनसंघ को डाॅ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी एक सुदृढ़ राष्ट्रीय राजनीतिक दल के रूप में देखना चाहते थे वह जनसंघ अब वास्तव में सुदृढ़ता प्राप्त करने वाला था। दीनदयाल जी के संगठनात्मक कौशल का लाभ जनसंघ को मिलने वाला था। दीनदयाल जी के द्वारा जनसंघ का अध्यक्ष पद स्वीकार करने से भारतीय राजनीति में पड़ने वाले प्रभाव पर शिकागो विश्वविद्यालय के लिए ‘‘जनसंघ आइडियोलाॅजी एण्ड ऑरगेनाइजेशन इन पार्टी बिहेवियर’’ विषय पर किए गए अपने शोध में वाल्टर कोरफिट्ज़ एण्डरसन ने लिखा है कि ‘‘पण्डित दीनदयाल जी के सन् 1967 में जनसंघ का अध्यक्ष पद स्वीकार करने का यही अर्थ था कि दल की संगठनात्मक नींव डालने का काम पूरा हो गया है और राष्ट्रीय स्तर पर एक प्रबल प्रतिस्पर्धी के नाते सत्ता की प्रतियोगिता में उतरने का उसका संकल्प है।’’
यही तथ्य वाल्टर कोरफिट्ज़ एण्डरसन एवं श्रीधर डी. दामले की पुस्तक ‘‘द ब्रदरहुड इन सेफराॅन: द राष्ट्रीय सेवक संघ एण्ड हिन्दू रीवाइवलिज़्म’’ (वेस्ट व्यू प्रेस, आई एस बी एन: 0-8133-7358-1) में सन् 1987 के संस्करण में प्रकाश में आया।
जनसंघ का अध्यक्ष बनने के बाद दीनदयाल उपाध्याय का ध्यान इस ओर गया कि जनसंघ की छवि एक हिन्दू सम्प्रदायवादी संस्था के रूप में मानी जा रही है। वे अपने दल को किसी सम्प्रदायवादी शक्ति नहीं वरन् देशभक्ति की शक्ति के रूप में स्थापित करना चाहते थे। चुनावी रणनीति में भी उन्होंने स्वच्छ संकल्पना की और उसी पर अमल किया। उनके चुनावी आदर्श आज पथप्रदर्शक साबित हो सकते हैं और राजनीतिक स्वच्छता स्थापित कर सकते हैं, यदि कोई आदर्शों को आत्मसात करने का साहस करे।
(राष्ट्रवादी व्यक्तित्व श्रृंखला के अंतर्गत सामायिक प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशित मेरी जीवनी-पुस्तक ‘‘दीनदयाल उपाध्याय’’ पर आधारित।)
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(दैनिक, सागर दिनकर में 11.02.2026 को प्रकाशित)
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