पुस्तक समीक्षा
परंपरागत शास्त्रीयता के परे माटी की गंध लिए सोंधे गीत
- समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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सांझा गीत संग्रह- बुन्देली माहुलिया
कवि - बिहारी ‘सागर’ एवं स्व.श्री बालमुकुन्द ‘नक्श’
प्रकाशक - कु. नंदिनी कोरी, जबलपुर (प्राप्ति पता- बिहारी सागर, धर्मश्री पुल के आगे, काम्प्लेक्स रोड, अम्बेडकर वार्ड, सागर, मध्यप्रदेश-4)
मूल्य - 250/-
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सागर शहर में लोक शैलीबद्ध गीत रचने वालों में बिहारी ‘सागर’ एक चिरपरिचित नाम हैं। उनके बड़े भाई स्व. बालमुकुन्द नक्श भी रचनाकार रहे। नक्श जी के जो गीत अप्रकाशित रहे, उन्हें बिहारी सागर ने अपने गीत संग्रह में शामिल करते हुए संग्रह को एक साझा संकलन का रूप दिया है। संग्रह का नाम है ‘‘बुन्देली माहुलिया’’। दरअसल, बुन्देलखंड में ‘‘माहुलिया’’ उर्फ़ ‘‘मामुलिया’’ का विशेष महत्व है। यह एक ऐसा त्योहार है जो बचपन से ही साझा जीवन का पाठ पढ़ाता है। साथ ही सिखाता है जीवन के आने वाले दुखों को खुशियों में बदलने की कला। इस त्योहार में कांटेदार डाली, आमतौर पर बबूल की डाली को धो कर, नहला कर, उसके कांटों में तरह-तरह के फूल सजाए जाते हैं और यह कार्य बालिकाओं एवे बालको द्वारा किया जाता है। फिर वे फूलों से सजी हुई डाल को ले कर जुलूस के रूप में गांव में घूमते हैं और गाते हैं-‘‘झमक चली मोरी मामुलिया’’। जी हां, समूचे बुंदेलखंड में मनाए जाने वाले इस बाल त्योहार को कहीं मामुलिया कहते हैं तो कहीं माहुलिया। माहुलिया का यही साझापन पिरोया है बिहारी सागर ने अपने इस नवीनतम गीत संग्रह में। इस संग्रह में 55 गीत बिहारी सागर के हैं तथा शेष 56 से 127 तक स्व. बालमुकुन्द नक्श की रचनाएं हैं।
“गीतऋषि” के रूप में ख्याति प्राप्त डॉ. श्याम मनोहर सीरोठिया ने संग्रह की भूमिका में लिखा है कि “इस संग्रह में संकलित स्व. बालमुकुंद नक्श के कुछ गीतों के केसिट सुप्रसिद्ध गायकों की आवाज में संगीत कंपनियों द्वारा भी बनाए गए हैं जो बुंदेलखंड में शादी-विवाह या अन्य जुलूसों में होने नृत्यों में अक्सर बजाए जाते हैं, जैसे- ‘केंन लगे मो सें बब्बा /कहाँ गव चिलम तमाखू को डब्बा’ -ऐसा ही एक गीत और जो बेदद लोकप्रिय एवं प्रचलित है। ‘बंसी में फस गई बाम, बरौनी घरे चलो’ - प्रचलित हैं। इसके अतिरिक्त इस काव्य संग्रह के अनेक गीत बुंदेलखंड क्षेत्र में कवि बिहारी श्सागरश् एवं स्व. बालमुकुंद श्नक्श ने करमा, स्वांग, ढिमरयाई, दादरा, सोहरे, रसिया आदि अनेक प्रकार के लोक गीत लिखे हैं, ये गीत भाव पूर्ण, सरल भाषा में रचित हैं जो समाज में सहज स्वीकार्य हैं, इनका अर्थबोध प्रभावी है। कवि बिहारी श्सागर का यह दसवाँ काव्य संग्रह है जो उनकी सतत रचनाधर्मिता का परिचायक है।”
उपन्यासकार, समीक्षक एवं स्तंभ लेखक आर के तिवारी ने लिखा है कि “मैं समझता हूँ आज 10 पुस्तकें प्रकाशन कराना छोटी बात नहीं है। जिसमें परिश्रम भी लगता है और पैसा भी खर्च होता है! यह बहुत बड़ी बात है। जब आज हमारे समाज में पैसे के लिए भाई-भाई में द्वेष पैदा हो जातें हैं भाई-भाई का बैरी हो जाता है तो वहीं बिहारी सागर ने अपने स्वर्गीय भाई के लिए अपने दिल की गहराइयों में बसाये रखा है! जिसका ही उदाहरण यह पुस्तक है जिसमें आपने अपने भाई की रचनाएं भी इसमें प्रकाशित कराई हैं। जिसके लिए आप बहुत-बहुत बधाई के पात्र हैं।” संग्रह में लोकगीत गायिका श्रीमती मालती सेन का शुभकामना संदेश भी है।
कवि बिहारी सागर ने बड़ी ही विनम्रता से इस बात को स्वीकार किया है कि उन्होंने ‘बुंदेली शब्दों को गूंथने का प्रयास’ किया है वे लिखते हैं- “मैंने अपनी रचनाओं में बुंदेली शब्द गूंथने का प्रयास किया है। मेरी रचनाओं में त्रुटियां हो सकती हैं। फिर भी मैं अपना प्रयास जारी रखता हूं।”
जीवन में लगन और अभ्यास यह दोनों महत्वपूर्ण तत्व है जो मनुष्य के कर्म में निरंतर निखार लाते हैं। कवि बिहारी सागर भी निरंतर रचनाशील हैं। कला पक्ष की अपेक्षा उनका भाव पक्ष सशक्त है। बिहार सागर के भजन की ये पंक्तियां देखिए जो ‘भगत’ के रूप में मां जगदंबा के लिए लिखी गईं हैं-
टेक- जगदंबा विराजीं मोरे आंगना हो मां।
(1) कहां से ल्याऊं मैया, बेला चमेली,
कहां से ल्याऊं रंग चुलना। जगदंबा विराजीं मोरे...
(2) बगिया से ल्याऊं मैया बेला चमेली,
हाट से ल्याऊं रंग चुलना। जगदंबा विराजीं मोरे...
बुंदेलखंड में कार्तिक गीत गाने का विशेष चलन है। कार्तिक मास आते ही स्त्रियां कातकिया गाते हुए स्नान करने मुंहअंधेरे निकल पड़ती हैं। इसी कातकिया के तर्ज पर बिहार सागर ने यह गीत लिखा है जिसकी धुन उन्होंने कन्हैया भजन की बताई है-
टेक- कर दो दया की नजरिया, कन्हैया मोरे...
मैं दुखियारी शरण तुम्हारी,
1-ले लो मोरी खबरिया, कन्हैया मोरे...
2-बड़े-बड़े बैठे बलधारी, हस्तनापुर की नगरिया, कन्हैया मोरे...
बिहारी सागर ने ढिमरयाई गीत भी लिखे हैं जैसे एक बानगी देखिए -
टेक- बंशी बाजी दुफरिया में, राधा जी की नगरिया में।
1. धुन गूंजत है कानों में जिनकी,
भूले काम दुफरिया में
राधा जी की...
2. ग्वाल बाल जे दौड़त आ रे, दौड़त बीच डगरिया में
राधा जी की...
जिस प्रकार बिहारी सागर ने होली गीत, दिवाली गीत, सोहर, विदाई गीत, देवी गीत, हास्य गीत आदि विविध प्रकार के गीत लिखे हैं ठीक उसी प्रकार उनके भाई स्वर्गीय बालमुकुंद “नक्श” के गीतों में भी पर्याप्त विविधता है। उनके होली गीत के कुछ पंक्तियां देखिए -
टेक- रंग डारी सांवरिया ने रंग डारी ।
मोरी भींज गई चूनर सारी ।।
1. होली के दिन होली खेलें संवरिया,
भर भर मारें पिचकारी
रंग डारी सांवरिया ने...
2.रंग-बिरंगी है मोरी चुनरिया,
कर डारी कारी-कारी
रंग डारी सांवरिया ने...
कवि स्व. “नक्श” ने कई सोहर गीत लिखे हैं जिनमें से एक गीत की कुछ पंक्तियां देखिए जिनमें भावनाओं की कोमलता अत्यंत प्रभावी है-
टेक- झुलाय दैयो रे, लाल झूले अंगनवा।
1.चंदन के पलना हों रेशम की डोरी,
डराय दैयो रे लाल...।
2. चंदा के गोटा हों तारों के झूमर,
लगाय दैयो रे लाल...
कवि स्व. “नक्श” ने चुलबुले हास्य गीत भी लिखे हैं। एक उदाहरण -
टेक - ऐसी मिली घरवाली,
भैया मोखों भरी जवानी में,
आग लगा रई पानी में।
1- रोटी पानी कछु न जानें,
निशदिन मोसे करे बहाने,
मोरी एकऊ बात न माने,
कर रई छेदा छानी में।
2- अपनी का कहिये हैरानी,
खा-खा कें जा खूब मुटानी,
मरोजात भर-भर के पानी,
चैन नहीं जिदगानी में।
बिहार ‘सागर’ एवं स्वर्गीय श्री बालमुकुंद ‘नक्श’ के सजा संकलन “बुंदेली महुलिया” में जो बुंदेली गीत सहज गए हैं उनमें गेयता के गुण भरपूर हैं। इनके व्याकरणीय दोषों को यदि अनदेखा कर दिया जाए तो यह सभी गीत ढोल, मंजीरे और नंगड़िया पर बखूबी गए जा सकते हैं। बुंदेली बोली के प्रति कवि बिहारी सागर का रुझान प्रशंसनीय है, और उतनी ही प्रशंसनीय है उनकी रचना कर्म के प्रति लगन। रचनाशीलता के लिए स्थानीय स्तर पर उन्हें कई सम्मानों से सम्मानित भी किया जा चुका है। लोक धुन पर आधारित गीतों में रुचि रखने वालों के लिए यह संग्रह रुचिकर साबित होगा।
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