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Saturday, December 21, 2019

बुंदेलखंड की संस्कृति को सहेजती माटी कला - डॉ. शरद सिंह - नवभारत, 21.12.2019 में प्रकाशित

Dr ( Miss) Sharad Singh
बुंदेलखंड की संस्कृति को सहेजती माटी कला
   - डॉ. शरद सिंह     
   ( नवभारत, 21.12.2019 में प्रकाशित)
       जब मनुष्य ने आकृतियां बनाना आरंभ किया होगा तब सबसे पहले उसने मिट्टी का ही सहारा लिया होगा । खाने के उपयोग में लाए जाने वाले बर्तन, बच्चों के खिलौने,  महिलाओं के पहनने वाले आभूषण सभी वस्तुएं मिट्टी से ही बनाना शुरू किया होगा। मनुष्यों ने बुंदेलखंड में प्रागैतिहासिक काल से मनुष्यों का निवास स्थान रहा है। अनेक स्थानों से प्रागैतिहासिक कालीन खिलौने और आभूषण के अवशेष प्राप्त हुए हैं जो यह साबित करते हैं बुंदेलखंड में मिट्टी से बनाई जाने वाली कलाकृतियों की परंपरा बहुत पुरानी है। ग्रामीण क्षेत्रों में आज की  मिट्टी से अनेक कलाकृतियां बनाई जाती हैं। जिनमें कुछ सजावटी होती हैं तो कुछ बच्चों के खेलने के लिए खिलौनों के रूप में, कुछ दैनिक जीवन में उपयोग में लाए जाने वाले बर्तनों के रूप में तथा कुछ आभूषण के रूप में।
बुंदेलखंड की संस्कृति को सहेजती माटी कला     - डॉ. शरद सिंह - नवभारत, 21.12.2019 में प्रकाशित
           बुंदेलखंड में बच्चों के खेलने के लिए हाथी, पक्षी,  गुड्डे-गुड़िया आदि खिलौने बनाए जाते हैं। कुछ खिलौने आमतौर पर कुछ विशेष त्योहारों के समय बनाए और बेंचे जाते हैं। जैसे संक्रांति के समय मिट्टी के घोड़े और हाथी बनाए जाते हैं, जिनमें  पाहिए लगे होते हैं। इनकी सुंदरता देखते ही बनती है। इनमें लगाम और महावत सहित सुंदर चित्रकारी भी होती है। ये हाथी, घोड़े इस प्रकार के होते हैं कि जिनमें सुतली बांधकर बच्चे आसानी से दौड़ा सकते हैं। खिलौने  के रूप में बैलगाड़ी की बनाई जाती है। इसी प्रकार बालिकाओं को घरेलू कामकाज की शिक्षा देने वाले खिलौनों में गेहूं पीसने की चक्की बनाई जाती है। इसमें बाक़ायदे दो पाट होते हैं। गेहूं अथवा अनाज डालने के लिए छेद भी बना होता है। साथ ही चक्की में  मूठ फंसाने के लिए भी छेद होता है। बच्चों के खेलने के लिए गुड्डा और गुड़िया बनाई जाती हैं जिन्हें पुतरा- पुतरियां कहते हैं। यह पुतरा- पुतरिया खेलने के काम आती हैं और अक्षय तृतीया के समय इनका विवाह भी रचाया जाता है, जो सामाजिक संस्कारों की शिक्षा देने का एक बेहतरीन माध्यम बनता है।  मिट्टी की इन पुतरा- पुतरियों को सुंदर कपड़े पहनाए जाते हैं तथा हाथ से बने सुंदर ज़ेवरों से सजाया जाता है। बच्चों के खेलने के लिए है पानी भरने के लिए छोटे-छोटे घड़े, रसोई घर के बर्तन, चूल्हा आदि बनाया जाता है। आजकल आधुनिक युग में छोटे-छोटे गैस के सिलेंडर की बनाए जाते हैं, जिन्हें बड़ी खूबसूरती से लाल रंग से रंगा जाता है जिससे वे देखने में असली कुकिंग गैस के सिलेंडर जैसे दिखाई देते हैं।
        धार्मिक आयोजनों के  लिए मिट्टी की बनी कलाकृतियां बनाई जाती हैं।  दीपावली के दिए तो सर्वविदित है और यह लगभग सभी जगह बनाए जाते हैं किंतु कुछ कलाकृतियां ऐसी हैं जो देवी-देवताओं की हैं और जिनका संबंध बुंदेलखंड से ही है। जैसे  महालक्ष्मी की पूजा के लिए महालक्ष्मी की प्रतिमा बनाई जाती है। यह प्रतिमा गज पर सवार महालक्ष्मी की होती है। इसकी विशेषता यह होती है कि इसे पूर्ण पकाया नहीं जाता है अर्थात  इसमें कच्चा रहता है किंतु इसकी साज-सज्जा बहुत ही सुंदर ढंग से की जाती है। चटक रंग का प्रयोग करते हुए साड़ी, कपड़े और सोने के रंग के आभूषण उकेरे जाते हैं। हाथी को भी सजाया जाता है। ग्वालन की मूर्तियां बनाई जाती है जो पूजा के दौरान दीप स्तंभ यानी कैंडल स्टैंड का काम भी करती हैं। इनमें पांच या पांच से अधिक दिए बनाए जाते हैं जिनमें तेल भरकर बाती लगाकर प्रज्वलित किया जाता है। देश के अन्य प्रांतों की भांति बुंदेलखंड  मे भी मिट्टी की गणेश प्रतिमाएं बनाई जाती हैं। पूजा के उपयोग के लिए अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमाएं भी बनाने में बुंदेलखंड के कलाकारों को महारत हासिल है।
        दैनिक जीवन में काम में आने वाली वस्तुओं में मिट्टी से बनाई जाने वाली अनेक वस्तुएं हैं जैसे घड़े, नांद और तसले आदि।  ये दो प्रकार के होते हैं- लाल रंग के और काले रंग के। लाल रंग के बर्तनों में अधिक छिद्र होते हैं और इन पर हल्की रंगों से अथवा सफेद रंग से चित्रकारी की जाती है।   वही काले रंग के बर्तन ग्लेज़्ड होते हैं। इस प्रकार के बर्तनों का उपयोग आमतौर पर दही जमाने, भोजन पकाने, दूध-दही रखने और अचार आदि अधिक दिनों तक रखी जाने वाली खाद्य वस्तुओं  को रखने के लिए होता है।
          सुदूर ग्रामीण अंचलों में आंखें मिट्टी की गुरियां बनाई जाती हैं। इन गुरियों से तरह-तरह की मालाएं बनाई जाती हैं।  आजकल इस तरह की माला तथा आभूषणों का चलन बढ़ गया है। इनकी मांग शहरों की दुकानों से लेकर एंपोरियम तक होती है। यद्यपि इन्हीं बनाने वाले कारीगरों को इस बात का ज्ञान नहीं रहता है कि उनसे ओने पौने दामों में खरीदी गई उनकी ये कलाकृतियां बड़ी दुकानों में ऊंचे ऊंचे दामों पर बेची जाती हैं।  यही हाल उन सजावटी वस्तुओं काफी है जो बुंदेलखंड के माटी शिल्पकार अपनी शिल्पी हाथों से गढ़ते हैं। ड्राइंग रूम को सजाने के लिए छोटे-छोटे घरों की आकृतियां, फेंगशुई में प्रचलित कछुए, लाफिंग बुद्धा, विंड चाइम्स, लैंपशेड आदि अनेक वस्तुएं यहां के कलाकार बनाते हैं। यह आमतौर पर बाजार हाट में अपनी छोटी-छोटी दुकानें लगाकर बेचते हैं।   मेलों में भी इस प्रकार की वस्तुएं बेची जाती हैं। ऐसे स्थानों पर इन कलाकारों को उनकी कला का उचित मूल्य कम ही मिल पाता है किंतु उन्हें इसकी बिक्री का आनंद अवश्य मिलता है। वहीं कुछ एजेंसियां कलाकारों से सीधे संपर्क करके उनकी कलाकृतियां बहुत कम दामों में खरीद लेते हैं। यदि दूसरे शब्दों में कहा जाए तो यह माटी की कलाकृतियां माटी के मोल ही खरीद ली जाती हैं और इन्हें पर्यटन स्थल शहरों की इंटीरियर डेकोरेशन की दुकानों में ऊंचे दाम पर बेचा जाता है। 
          दरअसल,  बुंदेलखंड की माटी कला को पर्याप्त संरक्षण दिए जाने की आवश्यकता है किससे आधुनिकता की दौड़ में यह कला कहीं पीछे न छूट जाए साथ ही माटी कला की कुशल कलाकारों को भी संरक्षण दिए जाने की जरूरत है ताकि ये कलाकार  आर्थिक तंगी को सहते सहते अपनी कला से मुंह मोड़ लें। बुंदेलखंड की माटी कला में बुंदेली संस्कृति बस्ती है अतः यदि माटी कला को बचाया जाएगा, तो बुंदेली संस्कृति को बचाने काफी महत्वपूर्ण कार्य स्वतः होता रहेगा।
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#नवभारत #बुंदेलखंड #शरदसिंह #माटीकला

Wednesday, October 2, 2019

बुंदेलखंड में महात्मा गांधी की यात्राओं का लोक पर प्रभाव - डॉ (सुश्री) शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh

बुंदेलखंड में महात्मा गांधी की यात्राओं का लोक पर प्रभाव
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
 
(नवभारत में प्रकाशित)
   
 वह स्वतंत्रता आंदोलन का दौर था। प्रत्येक भारतीय स्वतंत्रता पाना चाहता था और एक ऐसे नेता के पीछे चलने को आतुर था जो आडंबर रहित और अहिंसावादी विचारों का था। वह नेता थे महात्मा गांधी। उन्होंने स्वयं को कभी नेता नहीं माना किन्तु सारी दुनिया ने उन्हें भारत का सर्वोच्च नेता माना। 
Navbharat -  Bundelkh Me Mahatma Gandhi Ki Yatrayen Aur Lok pr Prabhav  - Dr Sharad Singh
        राष्ट्रीयस्तर पर जिस मुद्दे को गंभीरता से किसी ने नहीं लिया उस ओर गांधी जी ने दृढ़तापूर्वक कदम उठाया। महात्मा गांधी ने 12 मार्च, 1930 को वायसराय को सूचित किया कि वे अपने 78 अनुयाइयों के साथ ‘दांडी मार्च’ (दांडी यात्रा) करने जा रहे हैं। ‘दांडी मार्च’ से अभिप्राय उस पैदल यात्रा से है, जो महात्मा गांधी और उनके स्वयंसेवकों द्वारा 12 मार्च, 1930 ई. को प्रारम्भ की गयी। इसका मुख्य उद्देश्य था, अंग्रेजों द्वारा बनाए गए ‘नमक कानून’ को तोड़ना। आश्रम के कई सदस्य, पुरुष और महिलाएं 24 दिन की ऐतिहासिक यात्रा पर रवाना हुए। गरीब किसान ब्रिटिश कानून के कारण अपनी ‘नमक की खेती’ नहीं कर पा रहे थे। गांधी जी ने वेब मिलर सहित अपने 78 स्वयंसेवकों के साथ साबरमती आश्रम से 358 कि.मी. दूर स्थित दांडी नामक स्थान के लिए 12 मार्च, 1930 ई. को प्रस्थान किया। लगभग 24 दिन बाद 6 अप्रैल, 1930 को दांडी पहुंचकर उन्होंने समुद्रतट पर नमक कानून को तोड़ा। महात्मा गांधी ने दांडी यात्रा के दौरान सूरत, डिंडौरी, वांज, धमन के बाद नवसारी को यात्रा के आखिरी दिनों में अपना पड़ाव बनाया था। यहां से कराडी और दांडी की यात्रा पूरी की थी। नवसारी से दांडी का फासला लगभग 13 मील का है।
11 मार्च, 1930 को गांधी जी ने इच्छा प्रकट की कि आंदोलन लगातार चलता रहे, इसके लिए सत्याग्रह की अखंड धारा बहती रहनी चाहिए, कानून भले ही भंग हो पर शांति रहे। लोग अहिंसा और धैर्य का रास्ता अपनाएं। 11 मार्च की संध्या की प्रार्थना नदी किनारे रेत पर हुई, उस समय गांधी जी ने कहा, ‘‘मेरा जन्म ब्रिटिश साम्राज्य का नाश करने के लिए ही हुआ है। मैं कौवे की मौत मरूं या कुत्ते की मौत, पर स्वराज्य लिए बिना आश्रम में पैर नहीं रखूंगा।’’
12 मार्च को प्रातः वह ऐतिहासिक दिन आरम्भ हुआ जब 61 वर्षीय महात्मा गांधी के नेतृत्व में 78 सत्याग्रहियों ने यात्रा आरम्भ की। उस समय किसने सोचा था कि सुदूर बुंदेलखंड में भी इसका गहरा प्रभाव पड़ रहा होगा। महात्मा गांधी के तेजस्वी और स्फूर्तिमय व्यक्तित्व ने देश की जनता के मन में ऊर्जा का संचार किया। बुंदेलखंड में भी इस आंदोलन के विचार पहुंचे और देखते ही देखते अनेक स्वतंत्रता प्रेमी महात्मा गांधी के समर्थन में आ खड़े हुए। उस समय यह बुंदेली गीत जोर-शोर से गाया जाता था-
हमें सोई नमक तोड़बे के लाने जाने है
गांधी को साथ निभाने है,
अंग्रेजन खों मार भगाने हैं....
लगभग दस वर्ष पहले पन्ना (म.प्र.) के 75 वर्षीय ठाकुर लच्छे दाऊ ने अपना संस्मरण सुनाते हुए मुझे यह गीत सुनाया था और साथ ही एक घटना भी बताई थी कि उनकी दादी और मां इस गीत को गाती हुई चक्की चलाया करती थीं। पन्ना में नियुक्त अंग्रेजों के नुमाइंदे अधिकारी को किसी ने इस बात की शिक़ायत कर दी कि ठाकुर परिवार के घर की महिलाएं अंग्रेज विरोधी कार्यक्रम में संलिप्त हैं। इसके बाद घर पर दो सिपाही आ धमके। मां और दादी ने पर्दे के भीतर से ही बात की और गीत को बदल कर सुनाते हुए फटकार लगा दी। बेचारे सिपाही अपना-सा मुंह ले कर लौट गए। लेकिन इस घटना ने महिलाओं के बीच दांडी यात्रा की चर्चा को और हवा दे दी।
महात्मा गांधी की दांडी यात्रा के संबंध में एक और गीत प्रचलित था-
मैंहगो नमक हमें नई खाने
अंग्रेजन को सबक सिखाने
आए हमाए ऐंगर गांधी
जेई बात हमखों समझाने
बुजुर्ग बताते हैं कि महात्मा गांधी सागर भी आए थे। यहां उनकी यात्रा से संबधित पोस्टर छापे गए थे। वे अनंतपुरा से 2 दिसंबर की शाम 4 बजे सागर आए थे। स्टेशन के पास उनकी आमसभा हुई थी, जो शाम 7 बजे तक चली। आज़ादी के दौर में हर तरफ गांधी का नाम गूंज रहा था। वक्ता के तौर पर उनको सुनने काफी लोगों की भीड़ जमा हुआ करती थी।
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Thursday, September 26, 2019

बुंदेलखंड की काव्यात्मक कहावतों में जीवन की सच्चाई - डॉ. शरद सिंह ... नवभारत में प्रकाशित

Dr (Miss) Sharad Singh
बुंदेलखंड की काव्यात्मक कहावतों में जीवन की सच्चाई
  - डॉ. शरद सिंह

(नवभारत में प्रकाशित)
कहावतें जीवन का सबसे रोचक पक्ष होता है। कहावतों के माध्यम से वह सब कुछ संक्षेप में कह दिया जाता है जो शिक्षाप्रद होता है लेकिन सुनने वाले को यह झुंझलाहट नहीं होती है कि उसे कोई सीख दी जा रही है। कहावतें अनुभव से उपजती हैं। उनका कोई रचयिता अथवा लेखक नहीं होता है। प्रत्ये क्षेत्र, प्रत्येक भाषा और प्रत्येक बोली की अपनी कहावतें होती हैं। बुंदेलखंड में भी अनेक कहावतें प्रचलित हैं। जिनमें कुछ गद्यात्मक कहावतें हैं तो कुछ काव्यात्मक। तुकबंदी में कही गई कहावतें और अधिक रोचक एवं असरदार हैं तथा इनमें जीवन के यथार्थ को बड़े ही सुंदर ढंग से व्यक्त किया गया है। ये कहावतें  वाचिक परम्परा के द्वारा एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तांतरित होती रहती हैं। ये सामाजिक जगत में व्यवहारिक ज्ञान के रूप में भी हमारे बीच उपस्थित रहती हैं। कहावतों का चुटीलापन उन्हें समसामयिक एवं कालजयी बनाता है।
Bundelkhand Ki Kavyatmak Kahavton Me Jeevan Ki Sachchai  - Dr Sharad Singh, Navbharat, 26.09.2019
      बुंदेलखंड की काव्यात्मक कहावतों में लोकनीतियां और व्यावहारिक ज्ञान के तत्व एक साथ मिलते हैं। इनमें स्वास्थ्य सम्बन्धी ज्ञान से ले कर लोक दर्शन तक, मौसम संबंधी ज्ञान से ले कर कृषि संबंधी ज्ञान तक इन कहावतों में मौजूद है। लोकविश्वास, इतिहास, परम्परा और सामाजिकता भी इन कहावतों में निहित है। इन काव्यात्मक कहावतों में भले ही साहित्यगत शास्त्रीयता देखने को नहीं मिलती हो किन्तु इनकी लयात्मकता और काव्यात्मकता देखते ही बनती है।
कहावतें मूलतः घटनाओं से जन्मती हैं। जब कोई घटना घटित होती है तो उस पर की गई टीका-टिप्पणी में से ही वे कथन जिनमें घटना का सार और शिक्षा रहती है, कहावत के रूप में स्थापित हो जाते हैं। जैसे बुंदेलखंड में प्रचलित यह काव्यात्मक कहावत है-
        कंडा बीने लक्ष्मी,
        हर जोतें धनपाल
             अमर हते ते मर गए 
        नोने ठनठन गोपाल
इस कहावत के पीछे एक किस्सा प्रचलित है कि एक गांव में एक व्यक्ति था जिसका नाम था ठनठन। वह अपने नाम से असंतुष्ट था। एक दिन उसने अपने पिता से कहा कि मेरा नाम बदल दो। उसके पिता ने उससे कहा कि ठीक है जो नाम तुम्हें अच्छा लगे, मुझे बताओ। मैं तुम्हारा वही नाम रख दूंगा। ठनठन अपने लिए अच्छा नाम ढूंढने निकल पड़ा। उसे एक औरत मिली जो कंडा बीन रही थी। ठनठन ने उससे उसका नाम पूछा तो पता चला कि उसका नाम लक्ष्मी है। ठनठन चकित रह गया कि धन की देवी लक्ष्मी के नाम वाली गोबर का कंडा बीन रही है। कुछ दूर पर एक हलवाहा मिला उसने बताया कि उसका नाम धनपाल है और वह खेतिहर मजदूर है। कुछ दूर पर एक शवयात्रा मिली। पूछने पर पता चला कि मृतक का नाम अमर था। ठनठन समझ गया कि नाम अच्छा या बुरा नहीं अपितु कर्म अच्छे या बुरे होते हैं और वह नाम बदलने का इरादा त्याग कर वापस अपने पिता के पास लौट आया।
मौसम के परिवर्तन की सूचना देने वाली काव्यात्मक कहावतें भी बुंदेलखंड में प्रचलित हैं। जैसे यदि घड़े का पानी ठंडा न हो, चिड़ियां को धूल में नहाती दिखाई दें, चीटियां अपने अंडे एक स्थान से दूसरे स्थान ले जाती दिखाई दें तो समझना चाहिए कि बारिश जम कर होगी। इस पर यह कहावत है-
कलसा पानी को तचौ, चिरई नहाए धूर
चिंटिया लै अण्डा चलैं, तौ बरसे भरपूर
बुंदेलखंड में घाघ और भड्डरी की कहावतों के अतिरिक्त लोकव्यवहार से उपजी अनेक कहावते हैं जिनमें स्वास्थ्य से जुड़ी कहावतों का एक अलग संसार है। ये कहावतें सरल शब्दों में स्वस्थ रहने के बुनियादी नुस्खे याद करा देती हैं। जैसे यह कहावत है-
दोऊ बेरा घूमै जो, तीन बेर जो खाय
बनौ निरोगी वो रहे, जो रोजई भोर नहाय
कहा जाता है कि वही ज्ञान उचित है जो सब के समझ में आए और जिससे सबका भला हो सके। कई बार ज्ञान का अनावश्क प्रदर्शन अथवा आडंबर में लिप्त अनावश्यक प्रयोग आतमघाती साबित होता है। इस संबंध में बुंदेलखंड में एक सटीक कहावत प्रचलित है। कहावत की कथा इस प्रकार है कि गांव का एक आदमी एक बार फारस देश गया। वहां उसने फारसी के चंद शब्द बोलने सीख लिए। जब वह वापस गांव आया तो वह उन्हीं शब्दों को बोल-बोल कर झूठी शान दिखानी शुरु कर दी। गांव के लोग चूंकि फारसी नहीं जानते थे अतः मुंह बाए उसे देखते रह जाते और वह अकड़ में फिरता रहता। एक दिन उसकी तबीयत खराब हो गई। उसे जोर का बुखार आ गया। बुखार में वह पानी-पानी के बदले ‘आब-आब’ कहले लगा। लोगों को समझ में नहीं आया कि वह क्या मांग रहा है? किसी ने उसे पानी नहीं दिया और वह प्यास से मर गया। कहावत देखिए-
फारस गये फारसी पढ़ आये, बोले वा की बानी
आब आब कह मर गए, धरो रै गओ पानी
जब दो ज्ञानवान व्यक्ति मिलते हैं तो उनके बीच ज्ञानभरी बातें होती हैं लेकिन जब दो मूर्ख मिलते हैं तो उनके बीच मूर्खता की बातें होती हैं। इस सत्य पर आधारित बड़ी ही रोचक कहावत है कि-
ज्ञानी से ज्ञानी मिलैं, करैं ज्ञान की बातें,
गदहे से गदहा मिलैं, होवै लातई लातें।
बुंदेलखंड में कहावतों का प्रचलन आज भी मौजूद है। भले ही नई पीढ़ी इन कहावतों का मर्म नहीं समझ पाती है क्योंकि उसका जीवन अनुभव इन कहावतों से अलग हैं फिर भी बुंदेली काव्यात्मक कहावतें जीवन की नई सच्चाइयों को आत्मसात करते हुए चलती रहेंगी।
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(नवभारत, 20.09.2019)
#बुंदेलखंड # काव्यात्मक  #
कहावतें #नवभारत #शरदसिंह
 

Friday, September 20, 2019

बुंदेलखंड की अधिकतर बेटियां आज नहीं जानतीं मामुलिया - डॉ. शरद सिंह ... नवभारत में प्रकाशित

Dr (Miss) Sharad Singh
बुंदेलखंड की अधिकतर बेटियां आज नहीं जानतीं मामुलिया
    - डॉ. शरद सिंह
      (नवभारत में प्रकाशित)
     बुंदेलखंड में अनेक त्योहार मनाए जाते हैं जिन्हें बड़े-बूढ़े, औरत, बच्चे सभी मिलकर मनाते हैं। लेकिन कुछ त्यौहार ऐसे भी हैं जिन्हें सिर्फ बेटियां ही मनाती हैं, विशेष रूप से कुंवारी कन्याएं। ऐसा ही एक त्यौहार है मामुलिया। बड़ा ही रोचक, बड़ा ही लुभावना है यह त्यौहार। यह जहां एक और बुंदेली संस्कृति को रेखांकित करता है, वहीं दूसरी ओर भोली भाली कन्याओं के मन के उत्साह को प्रकट करता है। दरअसल मामुलिया बुंदेली संस्कृति का एक उत्सवी-प्रतीक है। आज के दौड़-धूप के जीवन में जब बेटियां पढ़ाई और अपने भविष्य को संवारने के प्रति पूर्ण रूप से जुटी रहती है उनसे कहीं सांस्कृतिक लोक परंपराएं छूटती जा रही है मामुलिया का भी चलन घटना स्वाभाविक है। आज बुंदेलखंड की अधिकतर बेटियां नहीं जानती मामुलिया। यूं तो मामुलिया मुख्य रूप से क्वांर मास में मनाया जाता है।
बुंदेलखंड की अधिकतर बेटियां आज नहीं जानतीं मामुलिया - डॉ. शरद सिंह ... नवभारत में प्रकाशित)
       इस त्यौहार में अलग-अलग दिन किसी एक के घर मामुलिया सजाई जाती है। जिसके घर मामुलिया सजाई जाने होती है, वह बालिका अन्य बालिकाओं को अपने घर निमंत्रण देती है। सभी बालिकाओं के इकट्ठे हो जाने के बाद वे मिलकर गोबर से आंगन लीपती हैं। आंगन लीपने के बाद आंगन के बीच एक सुंदर चौक पूरा जाता है। इस चौक के बीचो-बीच बेर की हरी शाखा को खड़ा किया जाता है। बेर न मिलने पर बबूल की शाखा भी काम में लाई जाती है या फिर नींबू संतरा आदि कांटेदार पेड़ की शाखा। वैसे बेर की शाखा को सबसे अच्छा माना जाता है। चौक में खड़ी की गई बेर की शाखा को पहले हल्दी चावल से पूजा जाता है। फिर उसके ऊपर लहंगा और चुनरी डालकर उस पर महावर लगाया जाता है। इसके बाद बेर के कांटों में रंग-बिरंगे फूल लगा कर उसे सजाया जाता है। यही सजी हुई शाख मामुलिया कहलाती है। चावल की लाई, मखाने आदि भी कांटों पर लगाए जाते हैं जिससे मामुलिया का सौंदर्य बढ़ जाता है। मामुलिया को सजाने के बाद भुने चने, ज्वार की लाई, केला, खीरा आदि का प्रसाद चढ़ाया जाता है। इसके बाद बालिकाएं हाथों में हाथ डालकर मामुलिया के चारों ओर घूमती हुई गाती है-                                 
मामुलिया के आए लिवौआ
झमक चली मोरी मामुलिया......

मामुलिया के पूजन के बाद मामुलिया को लेकर जुलूस के रूप में बालिकाएं घर से निकल पड़ती हैं। साथ ही वे गीत गाती चलती हैं कि -
ले आओ आओ चंपा चमेली के फूल
सजाओ मोरी मामुलिया
ले आओ आओ गेंदा हजारी के फूल
सजाओ मेरी मामुलिया.....
   
    इस प्रकार गांव भर में घूमती हुई बालिकाएं नदी अथवा तालाब के किनारे पहुंचती हैं। वे मामुलिया को नदी या तालाब में सिरा देती हैं। मामुलिया सिरा कर लौटते समय पीछे मुड़कर नहीं देखा जाता। कहते हैं कि पीछे मुड़कर देखने से भूत लग जाता है। घर लौटने पर वह बालिका जिसके घर मामुलिया सजाई गई थी, शेष बालिकाओं को भीगे चने का न्योता देती है।
मामुलिया के इस त्योहार से एक रोचक कथा जुड़ी है।   एक गांव में मामू लिया नाम की एक लड़की रहती थी वह बेहद गरीब थी लेकिन उतनी ही सुंदर थी एक बार एक राजकुमार मामूली आके गांव से गुजरा तो उसने मां मूल्य को देखा और उसे देखते ही मुक्त हो गया राजकुमार नेमा मूल्य से विवाह करने की इच्छा प्रकट की मां मूल्य की सहेलियों को जब यह पता चला तो वह बहुत खुश हुए सभी लड़कियां मामू लिया और राजकुमार को गांव की सीमा पर स्थित नदी तक पहुंचाने गई मां मूल्य को विदा करके लौटते समय उन्होंने यह सोचकर पीछे मुड़कर नहीं देखा कि इससे उनके बीच का मुंह जाग उठेगा फिर ना तो मामूली अपना गांव छोड़कर जा सकेगी और ना उसकी सहेलियां उसे जाता हुआ देख सकेंगे इस कथा के अनुसार मामू लिया के प्रतीक स्वरूप वेज की शाखा को सजाया जाता है और पूजा अनुष्ठान तथा गाना बजाना करके उसे विदा कर दिया जाता है ।
आज जब समय तेजी से बदलता जा रहा है और ग्रामीण क्षेत्रों की बेटियां भी पढ़-लिख कर अपना कैरियर बनाने में जुटी रहती है, वे लोक परंपराओं से दूर होती जा रही हैं। मामुलिया जैसे पर्व त्योहार कहीं पीछे छूटते जा रहे हैं जबकि यह त्यौहार बेटियों को प्रकृति से जोड़ने और उनमें सौंदर्यबोध को बढाने का त्योहार है। लेकिन आज बुंदेलखंड की अधिकतर बेटियां नहीं जानती मामुलिया के बारे में। जीवन में प्रगति भी आवश्यक है किन्तु उतनी ही आवश्यक है लोकपरंपराओं से खुद को जोड़े रखना। लोक परंपराएं अतीत और भविष्य, नवीनता और पुरातन, आधुनिकता और संस्कार को परस्पर जोड़े रखने का काम करती हैं। ये जातीय गौरव से जोड़ कर व्यक्ति में आत्मगौरव की भावना बढ़ाती हैं। बुंदेली लोक-संस्कृति की गहरी समझ रखनेवाले विद्वान डॉ. श्यामसुंदर दुबे  लोक की परंपरा प्रवाह एवं पहचान पर चिंता जताते हुए आधुनिकता के बढ़ते दबावों से उत्पन्न खतरों की ओर ध्यानाकर्षण करते रहे है। उनके अनुसार ‘हमें अपनी परंपराओं से खुद को जोड़े रखते हुए आगे बढ़ना चाहिए।’

     मामुलिया बेटियों के पारस्परिक बहनापे का भी त्यौहार है। इस त्यौहार में बड़ों का हस्तक्षेप न्यूनतम रहता है अतः इससे बेटियों में सब कुछ खुद करने का आत्मविश्वास और कौशल बढ़ता है। इस प्रकार के त्यौहारों को उत्सवी आयोजन के रूप में मनाते हुए बचाया जा सकता है। जैसे दिसम्बर 2012 में झांसी महोत्सव में भी मामुलिया सजाने की प्रतियोगिता करा कर बेटियों को मामुलिया के बारे में जानकारी दी गई थी। इसी प्रकार 12 अक्टूबर 2016 को हमीरपुर आदिवासी डेरा में ‘बेटी क्लब’ द्वारा लोक परंपरा का खेल मामुलिया और सुअटा खेला गया।  इसका संरक्षण आवश्यक है। क्योंकि यह परंपरा बेटियों के सम्मान के लिए बनाई गई है। ग्राम बसारी, हटा आदि लोकोसत्वों में भी मामुलिया जैसी परम्पराओं पर ध्यान दिया जाता है किन्तु जरूरी है शहरी जीवन को इन रोचक परम्पराओं से जोड़ना।
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(नवभारत, 20.09.2019)
#बुंदेलखंड #लोकपरंपरा #मामुलिया #नवभारत #शरदसिंह

Wednesday, June 19, 2019

चर्चा प्लस .. सभी के लिए जानना जरूरी है पॉक्सो एक्ट और इसके प्रावधान - डॉ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
चर्चा प्लस ..

सभी के लिए जानना जरूरी है पॉक्सो एक्ट और इसके प्रावधान
  - डॉ. शरद सिंह                                   
   आजकल आए दिन नाबालिगों के साथ दुष्कर्म की घटनाएं घटित हो रही हैं। इन घटनाओं के संबंध में पॉक्सो एक्ट के अंतर्गत अपराध पंजीबद्ध किए जाते हैं। किन्तु कानून संबंधी आवश्यक ज्ञान की कमी के कारण अधिकांश लोग नहीं जानते हैं कि पॉक्सो एक्ट क्या है और इसके अंतर्गत क्या प्रावधान रखे गए हैं? वर्तमान में बच्चियों के विरुद्ध बढ़ती आपराधिक गतिविधियों के चलते प्रत्येक व्यक्ति को पाक्सो एक्ट जैसे कानून के बारे में जानकारी होनी चाहिए।
चर्चा प्लस .. सभी के लिए जानना जरूरी है पॉक्सो एक्ट और इसके प्रावधान - डॉ. शरद सिंह  About POSCO ACT in Charcha Plus Column by Dr Sharad Singh
बच्चों के साथ आए दिन यौन अपराधों के समाचार समाज को लज्जित करते रहते हैं। बच्चे न घर में सुरक्षित हैं और न ही खुले आसमान के नीचे। विकास के दावों के बीच भारत के अनुभव और ज़मीनी सच्चाई बच्चों की असुरक्षा की अलग कहानी कहती है। विगत वर्ष उत्तरप्रदेश के रामपुर में 7 साल की बच्ची को जंगल में ले जाकर बलात्कार किया गया। अमरोहा में 5 साल की बच्ची से बलात्कार हुआ। मुज़फ़्फ़रनगर में एक चिकित्सक ने सिरदर्द का इलाज़ कराने आई 13 साल की बच्ची के साथ बलात्कार किया। मध्य प्रदेश के इंदौर में 20 अप्रैल 2018 को फुटपाथ पर सो रही चार महीने की बच्ची को चुपचाप उठा लिया गया। उस मासूम के साथ बलात्कार किया गया और उसका सिर पटक पटक कर उसकी हत्या कर दी गई। उस बच्ची का परिवार राजबाड़ा में गुब्बारे बेचकर जीवनयापन करता था। हाल ही में हुए अलीगढ़कांड जैसे अपराधों ने तो नृशंसता की सारी हदें पार कर दीं। यह चिंताजनक स्थिति दिन प्रति दिन और भयानक रूप लेती जा रही है।

इस तरह के मामलों की बढ़ती संख्या देखकर ही सरकार ने वर्ष 2012 में एक विशेष कानून बनाया था। जो बच्चों को छेड़खानी, बलात्कार और कुकर्म जैसे मामलों से सुरक्षा प्रदान करता है। उस कानून का नाम पॉक्सो एक्ट। इस पॉक्सो एक्ट का पूरा नाम है - ‘‘प्रोटेक्शन आफ चिल्ड्रेन फ्राम सेक्सुअल अफेंसेस एक्ट’’। महिला और बाल विकास मंत्रालय ने पॉक्सो एक्ट-2012 को बच्चों के प्रति यौन उत्पीड़न और यौन शोषण और पोर्नोग्राफी जैसे जघन्य अपराधों को रोकने के लिए बनाया था। वर्ष 2012 में बनाए गए इस कानून के तहत अलग-अलग अपराध के लिए अलग-अलग सजा तय की गई है। जिसका कड़ाई से पालन किया जाना भी सुनिश्चित किया गया है। इस अधिनियम की धारा 4 के तहत वो मामले शामिल किए जाते हैं जिनमें बच्चे के साथ दुष्कर्म या कुकर्म किया गया हो. इसमें सात साल सजा से लेकर उम्रकैद और अर्थदंड भी लगाया जा सकता है।

पॉक्सो एक्ट की धारा 6 के अधीन वे मामले लाए जाते हैं जिनमें बच्चों को दुष्कर्म या कुकर्म के बाद गम्भीर चोट पहुंचाई गई हो। इसमें दस साल से लेकर उम्रकैद तक की सजा हो सकती है और साथ ही जुर्माना भी लगाया जा सकता है। पॉक्सो अधिनियम की धारा 7 और 8 के तहत वो मामले पंजीकृत किए जाते हैं जिनमें बच्चों के प्राईवेटपार्ट से छेडछाड़ की गई हो। इस धारा के आरोपियों पर दोष सिद्ध हो जाने पर पांच से सात साल तक की सजा और जुर्माना हो सकता है। पॉक्सो एक्ट की धारा 3 के तहत पेनेट्रेटिव सेक्सुअल असॉल्ट को भी परिभाषित किया गया है। जिसमें बच्चे के शरीर के साथ किसी भी तरह की हरकत करने वाले शख्स को कड़ी सजा का प्रावधान है। दरअसल, 18 साल से कम उम्र के बच्चों से किसी भी तरह का यौन व्यवहार इस कानून के दायरे में आ जाता है। यह कानून लड़के और लड़की को समान रूप से सुरक्षा प्रदान करता है। इस कानून के तहत पंजीकृत होने वाले मामलों की सुनवाई विशेष अदालत में होती है।

पॉक्सो एक्ट लागू किए जाने के बाद बारह वर्ष से कम उम्र की बच्चियों के साथ दुष्कर्म में फांसी की सजा का प्रावधान रखा गया था,  किन्तु बाद में अनुभव किया गया कि बालकों को भी इस एक्ट के तहत न्याय दिए जाने की व्यवस्था होनी चाहिए। इसीलिए एक्ट में संशोधन किया गया और  बालकों को भी यौन शोषण से बचाने और उनके साथ दुराचार करने वालों को फांसी की सजा का प्रावधान तय किया गया। इसके अंतर्गत केन्द्रीय मंत्रिमंडल ने लड़की-लड़कों दोनों यानी बच्चों को यौन उत्पीड़न से बचाने के बाल यौन अपराध संरक्षण कानून (पॉस्को) 2012 में संशोधन को मंजूरी दे दी। संशोधित कानून में 12 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के साथ दुष्कर्म करने पर मौत की सजा तक का प्रावधान है। इसके अलावा बाल यौन उत्पीड़न के अन्य अपराधों की भी सजा कड़ी करने का प्रस्ताव है।

बच्चों के हित संरक्षित करने और बाल यौन अपराध को रोकने के उद्देश्य से लाया जा रहा पोस्को संशोधन विधेयक  के संबंध में तत्कालीन महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने स्पष्ट कहा था कि सभी बच्चों को इससे बचाने के लिए जेन्डर न्यूट्रल कानून पोस्को में संशोधन किया जाएगा। संशोधित कानून में पोस्को कानून की धारा 4, 5, 6, 9, 14, 15 और 42 में संशोधन करने का प्रस्ताव है। धारा 6 एग्रीवेटेड पेनीट्रेटिव सैक्सुअल असाल्ट पर सजा का प्रावधान करती है। अभी इसमें न्यूनतम 10 वर्ष की कैद है जो कि बढ़कर उम्रकैद व जुर्माना तक हो सकती है। प्रस्तावित संशोधन में न्यूनतम 20 वर्ष की कैद जो बढ़ कर जीवन पर्यन्त कैद और जुर्माने के अलावा मृत्युदंड तक का प्रावधान किया गया है। धारा 5 में संशोधन करके जोड़ा जाएगा कि अगर यौन उत्पीड़न के दौरान बच्चे की मृत्यु हो जाती है तो उसे एग्रीवेटेड पेनीट्रेटिव सैक्सुअल असाल्ट माना जाएगा। इसके अलावा प्राकृतिक आपदा के शिकार बच्चे का यौन उत्पीड़न भी इसी श्रेणी का अपराध माना जाएगा।
धारा चार में संशोधन करके 16 साल से कम उम्र के बच्चे के साथ पेनीट्रेटिव सैक्सुअल असाल्ट में न्यूनतम सात साल की सजा को बढ़ा कर न्यूनतम 20 साल कैद करने का प्रस्ताव है जो कि बढ़ कर उम्रकैद तक हो सकती है। पैसे के बदले यौन शोषण और बच्चे को जल्दी बड़ा यानी वयस्क करने के लिए हार्मोन या रसायन देना भी एग्रीवेटेड सैक्सुअल असाल्ट माना जाएगा। धारा 15 में संशोधन होगा जिसमें व्यवसायिक उद्देश्य से बच्चों की पोर्नोग्राफी से संबंधित सामग्री एकत्रित करने पर न्यूनतम तीन साल की सजा का प्रावधान किया जा रहा है इससे ये धारा गैर जमानती अपराध की श्रेणी में आ जाएगी।

भारतीय दंड संहिता में धारा 376 में बलात्कार के अपराधी को सजा दी जाती है। लेकिन अगर बलात्कार पीड़िता कोई नाबालिग हो, तो उसके साथ एक और धारा बढ़ जाती है। उसे बलात्कार के अलावा पाक्सो ऐक्ट के तहत भी सजा दी जाती है. 27 दिसंबर, 2018 को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अगुवाई वाली कैबिनेट ने इसी पॉक्सो ऐक्ट को और भी कड़ा कर दिया। अब इस ऐक्ट के तहत दोषी लोगों को फांसी तक की सजा हो सकती है। इस ऐक्ट को बच्चों को यौन अपराधों से बचाने, यौन उत्पीड़न और पोर्नोग्राफी से बचाने के लिए लागू किया गया था. 2012 में ये ऐक्ट इसलिए बनाया गया था, ताकि बच्चों के साथ होने वाले यौन अपराधों का ट्रायल आसान हो सके और अपराधियों को जल्द सजा मिल सके. इस ऐक्ट में 18 साल से कम उम्र वाले को बच्चे की कैटेगरी में रखा जाता है. 2012 से पहले बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों को लेकर कोई खास नियम-कानून नहीं था।
यदि पीड़ित बच्चा अथवा बच्ची मानसिक रूप से बीमार है या बच्चे से यौन अपराध करने वाला सैनिक, सरकारी अधिकारी या कोई ऐसा व्यक्ति है, जिस पर बच्चा भरोसा करता है, जैसे रिश्तेदार, पुलिस अफसर, टीचर या डॉक्टर, तो इसे और संगीन अपराध माना जाएगा। अगर कोई किसी नाबालिग लड़की को हॉर्मोन्स के इंजेक्शन देता है, ताकि वक्त के पहले उनके शरीर में बदलाव किया जा सके, तो ऐसे भी लोगों के खिलाफ पॉक्सो ऐक्ट के तहत केस दर्ज किया जाता है।

इस ऐक्ट ने यौन अपराध को रिपोर्ट करना अनिवार्य कर दिया है। यानी अगर आपको किसी बालिका के साथ होने वाले यौन अपराध की जानकारी है, तो ये आपकी कानूनी ज़िम्मेदारी है कि उस संबंध में रिपोर्ट की जाए। ऐसा न करने पर अपराध की जानकारी छिपाने के अपराध में 6 महीने की जेल और जुर्माना हो सकता है। ऐक्ट के अनुसार किसी केस के स्पेशल कोर्ट के संज्ञान में आने के 30 दिनों के अंदर क्राइम के सबूत इकट्ठे कर लिए जाने चाहिए और स्पेशल कोर्ट को ज़्यादा से ज़्यादा से एक साल के अंदर ट्रायल पूरा कर लिया जाना चाहिए। बालिका का मेडिकल 24 घंटे के भीतर हो जाना चाहिए। ऐक्ट के तहत स्पेशल कोर्ट को सुनवाई कैमरे के सामने करने की कोशिश करनी चाहिए। साथ ही, कोर्ट में बालिका के माता-पिता या कोई ऐसा व्यक्ति उपस्थित होना चाहिए, जिस पर पीड़ित बालिका भरोसा करती हो।
पॉक्सो ऐक्ट अनुसार केस जितना गंभीर हो, सज़ा उतनी ही कड़ी होनी चाहिए। बाकी कम से कम 10 साल जेल की सज़ा तो होगी ही, जो उम्रकैद तक बढ़ सकती है और जुर्माना भी लग सकता है. बच्चों के पॉर्नॉग्राफिक मटीरियल रखने पर तीन साल तक की जेल और जुर्माना हो सकता है। अप्रैल 2018 में  केंद्र सरकार ने पॉक्सो में एक अहम बदलाव किया। जिसके तहत प्रावधान रखा गया कि 12 साल से कम उम्र की बच्चियों से बलात्कार करने पर मौत की सज़ा दी जाएगी अर्थात् इस ऐक्ट की कुछ धाराओं में दोषी पाए जाने पर मौत की सजा तक का प्रावधान कर दिया गया है। इस ऐक्ट में कहा गया है कि अगर कोई आदमी चाइल्ड पोर्नोग्राफी को बढ़ावा देता है, तो उसके खिलाफ भी पॉक्सो ऐक्ट के तहत कड़ी सजा का प्रावधान किया गया है। इस ऐक्ट की धारा 4, धारा 5, धारा 6, धारा 9, धारा 14, धारा 15 और धारा 42 में संशोधन किया गया है। धारा 4, धारा 5 और धारा 6 में संशोधन के बाद अब अपराधी को इस ऐक्ट के तहत मौत की सजा दी जा सकती है।

बच्चों को नृशंस अपराधों से बचाने के लिए तथा उन्हें न्याय दिलाने के लिए सभी को यह जानकारी होनी चाहिए कि पाक्सो एक्ट क्या है और उसके तहत कौन से प्रावधान हैं क्योंकि कानून की जानकारी अपराध का विरोध करने की शक्ति देती है।
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(दैनिक ‘सागर दिनकर’, 19.06.2019)

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Tuesday, September 11, 2018

आचार्य विनोबा भावे देवनागरी को विश्वलिपि के रूप में देखना चाहते थे - डॉ. ‪शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
भूदान आंदोलन के जनक ‘भारत रत्न’ आचार्य विनोबा भावे यानी विनायक नरहरी भावे आज ही के दिन अर्थात् 11 सितम्बर 1895 को जन्मे थे। वे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, सामाजिक कार्यकर्ता तथा प्रसिद्ध गांधीवादी नेता थे। सन् 1051 में आचार्य विनोबा भावे ने भूदान आन्दोलन आरम्भ किया था। इस आंदोलन का उद्देश्य था स्वैच्छिक भूमि सुधार। विनोबा चाहते थे कि भूमि का पुनर्वितरण सिर्फ सरकारी कानूनों के द्वारा न हो, बल्कि एक आंदोलन के द्वारा जनता में जागरूकता लाते हुए पुनर्वितरण हो। 20वीं सदी के पचासवें दशक में भूदान आंदोलन को सफल बनाने के लिए विनोबा ने गांधीवादी विचारों पर चलते हुए रचनात्मक कार्यों और ट्रस्टीशिप जैसे विचारों को प्रयोग में लाया। उन्होंने सर्वोदय समाज की स्थापना की। यह रचनात्मक कार्यकर्ताओं का अखिल भारतीय संघ था। इसका उद्देश्य अहिंसात्मक तरीके से देश में सामाजिक परिवर्तन लाना था। इसके साथ ही आचार्य भावे देश के ही नहीं अपितु विश्व की सभी भाषाओं की पारस्परिक दूरी को समाप्त करना चाहते थे और इसका आरम्भ वे भारतीय भाषाओं का पहले देवनागरी लिपि से परस्पर जोड़ना चाहते थे। उनका मानना था कि सम्पर्क लिपि एक होने से विभिन्न भाषाओं को सीखना आसान हो सकता है।
Bharat Ratna Acharya Vinoba Bhave
सभी भारतीय भाषाओं के लिए देवनागरी का प्रयोग हो, इससे राष्ट्रीय एकता और अन्तर्राष्ट्रीय सद्भाव लाने में सहायता मिलेगी। सन् 1972 में उन्होंने कहा था कि-
''इन दिनों यही मेरा एक लक्ष्य है। मैं नागरी लिपि पर जोर दे रहा हूं। मेरा अधिक ध्यान नागरी लिपि को लेकर चल रहा है। नागरी लिपि हिन्दुस्तान की सब भाषाओं के लिए चले तो हम सब लोग बिल्कुल नजदीक आ जायेंगे। खासतौर से दक्षिण की भाषाओं को नागरी लिपि का लाभ होगा। वहां की चार भाषाएं अत्यन्त नजदीक हैं। उनमें संस्कृत शब्दों के अलावा उनके अपने जो प्रान्तीय शब्द हैं, तेलुगु, कन्नड़ और मलयालम के उनमें बहुत से शब्द समान हैं। वे शब्द नागरी लिपि में अगर आ जाते हैं तो दक्षिण की चारों भाषाओं के लोग चारों भाषाएं 15 दिन में सीख सकते हैं। 

Devanagiri Script
 ....विभिन्न लिपियोंं को सीखने में हर एक की अपनी-अपनी परिस्थिति आड़े आती हैं। मैंने हिम्मत की, हिन्दुस्तान की हर एक लिपि का अध्ययन किया। परिणाम में विचार आया कि दूसरी लिपियां चलें उसका मैं विरोध नहीं करता। मैं तो चाहता हूं वे भी चलें और नागरी भी चले। मैं बैंगलोर की जेल में था वहां डेढ़ दो साल रहा। वहां मैंने दक्षिण भारत की चार भाषाएं सीखना एकदम शुरू किया। जेल में विभिन्न भाषाओं के लोग थे। तो किसी ने मुझसे पूछा विनोबा जी, आप चार भाषाएं एकदम से क्यों सीख रहे हैं। मैंने कहा, पांच नहीं हैं इसलिए अगर पांच होतीं तो पांच ही सीखता। चार ही हैं इसलिए चार ही सीख रहा हूं। मैंने देखा कि उन भाषाओं में अत्यंत समानता है। केवल लिपि के कारण ही वे परस्पर टूटी हैं एक नहीं बन पा रही हैं।’’

विनोबा जी राष्ट्र संत थे। वे सभी के अभ्युदय की कामना करते थे। सर्वोदय आंदोलन का उद्देश्य भी यही था। वे किसी राजनीतिक दल में नहीं थे। वे तो भारतीय समाज को एकसूत्र देखने के लिए प्रयत्नशील रहते थे। उन्होंने स्वयं को
आजीवन सर्वाभ्युदय में लगाए रखा। वे सबका  हित चाहते थे। लिपि-संबंधी उनके विचार भी सर्वहित से ही प्रेरित थे। बीसियों भाषाओं के ज्ञाता विनोबा भावे देवनागरी को विश्वलिपि के रूप में देखना चाहते थे। भारत के लिये वे देवनागरी को सम्पर्क लिपि के रूप में विकसित करने के पक्षधर थे। वे कहते थे कि मैं नहीं कहता कि नागरी ही चले, बल्कि मैं चाहता हूं कि नागरी भी चले। उनके ही विचारों से प्रेरणा लेकर नागरी लिपि संगम की स्थापना की गयी है जो भारत के अन्दर और भारत के बाहर देवनागरी को उपयोग और प्रसार करने के लिये कार्य करती है। 
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Monday, September 10, 2018

लियो टॉल्सटाय की जन्मतिथि 9 सितम्बर पर मेरा एक पत्र अन्ना करेनिना के नाम...

Dr (Miss) Sharad Singh
प्रिय अन्ना करेनिना,
तुम्हारे अस्तित्व ने कब जन्म लिया यह तो मात्र लियो टॉल्सटाय ही बता सकते थे। उन्होंने तुम्हारी कल्पना की, तुम्हें अपने समय से आगे की स्त्री के रूप में आकार दिया और संवारा। कल ही तो थी वह तारीख जो तुम्हारे सर्जक लियो टॉल्सटाय की जन्मतिथि थी यानी 9 सितम्बर 1828। यह पत्र मैं तुम्हें कल भी लिख सकती थी लेकिन कल दिन भर मैंने बिता दिया तुम्हारे बारे में सोचते हुए। तुम हमेशा मेरे दिल के बहुत करीब रही हो। अपनी कॉलेजियट उम्र के साथ तुम्हें पढ़ कर मैंने सुना और समझा था स़्त्री आंकांक्षा का वह स्वर जो मुझे मेरे आस-पास कहीं दिखाई नहीं दिया था। 
From Anna Karenina movie

तुम्हें मिला एक स्वछन्द चरित्र। इतना स्वच्छंद भी नहीं कि तुम एक ‘बिगड़ी हुई औरत’ कहलाओ। मगर टॉल्सटाय ने पाया कि तुम्हें तो तत्कालीन सामाजिक ठेकेदार ‘बिगडी हुई औरत’ ही मान रहे हैं। क्योंकि टॉल्सटाय ने तुम्हें अपनी ज़िन्दगी अपने ढंग से जीने की आजादी दी। तुम कॉर्सेट मेें भर कर उभारे गए शरीर के भीतर सांसों की घुटन के साथ जीना नहीं चाहती थी। तुम्हें अच्छा लगता था खुली हवा में घोड़े पर सवारी करते हुए प्रकृति की सुंदरता को अपनी आंखों में समा लेना। वहीं आंखें जिन्हें तुम्हारा पति कभी पढ़ नहीं सका। जानती हो अन्ना, आज भी न जाने कितनी औरतें जीना चाहती है तुम्हारी तरह अपनी ज़िन्दगी अपने ढंग से। क्यों कि उनकी आंखों को भी कोई नहीं पढ़ता है। सदियां बीत गईं। तुम्हारी जन्मभूमि ने भी सामाजिक और राजनीतिक चोला बदला, एक नहीं दो बार। उन्होंने सन् 1875 से 1877 में तुम्हारे जीवन को विस्तार दिया। वह समय अलग था आज से लेकिन पूरा तरह से नहीं। आज भी औरतें सिसक रही हैं घर की चौखटों के भीतर, यहां भारतीय उपमहाद्वीप में। आज जितनी भी औरतें व्यवसाय या नौकरी के द्वारा पैसे कमा रही हैं, उनमें से गिनती की ही हैं जिन्हें अपने परिवार में निर्णय लेने का अधिकार पुरुषों के बराबर मिला है। तुम्हारी जैसी आर्थिक सम्पन्नता प्राप्त स्त्रियों की दशा भी जो दिखती है, वह नहीं है। वे तुम्हारी तरह खुले आकाश में उड़ना चाहती हैं लेकिन नहीं उड़ पाती हैं। 
Title page of first edition of Anna Karenina

अन्ना, शायद मैं भावुक हो गई हूं तुम्हारे बारे में सोच-सोच कर। एक टीस है मन में जो आज मैं तुमसे साझा करना चाहती हूं। मुझे तुम्हारा अंत कभी पसंद नहीं आया। नारी दृढ़ता की प्रतिमूर्ति अन्ना रेल के पहिए से कट कर अपनी जान दे दे, भला यह कैसा अंत? यह तो अन्याय है तुम्हारे चरित्र के साथ, तुम्हारे व्यक्तित्व के साथ। तुम्हें तो जीवित रखा जाना चाहिए था तुमहारी स्वाभाविक मृत्यु तक। भले ही तुम्हारा शरीर शिथिल पढ़ चुका होता, भले ही तुम्हारे बातों में सफेदी छा चुकी होती, भले ही तुम्हारी चंचलता आयुगत गंभीरता में दब चुकी होती फिर भी तुम्हें जीवित रहते देखना मुझे सुखद लगता। जब मैंने तुम्हारे बारे में पहली बार पढ़ा था तो तुम्हारे अंत ने मेरी आंखों में आंसू ला दिया था लेकिन आज जब दुनिया के अनेक रंग देख चुकी हूं तो मुझे तुम्हारे अंत कें बारे में साचे कर क्रोध आता है। अगर आज लियो टॉल्सटाय होते तो शायद मैं उनसे झगड़ा करती कि अन्ना का अंत इस तरह मत करिए। भले ही मैं उन्हें अपना प्रेरक-लेखक मानती फिर भी उनसे लड़ती। एक जुझारू औरत का अंत भला आत्महत्या के रूप में? चुभता है मुझे आज भी।
आज मैं चाहती हूं कि मैं जब भी तुम्हारे बारे में पढूं, या सोचूं तो तुम्हारे अंत को बदला हुआ देखूं। मेरी अन्ना करेनिना रेल के पहिए के नीचे कट कर अपना अंत नहीं कर सकती, वह तो डटी रहेगी अंतिम सांस तक।
तो अन्ना, जान लो कि तुम मेरी आशाओं में हमेशा जीवित रहोगी एक अडिग स्त्री की तरह।
तुम्हें हमेशा याद करती हूं आन्ना!
तुम्हारी - 
शरद सिंह
 

Wednesday, April 5, 2017

सदा प्रासंगिक हैं श्रीराम ....   

Dr (Miss) Sharad Singh
Happy #RamNavmi  !
#रामनवमी पर विशेष लेख "सदा प्रासंगिक हैं श्रीराम' मेरे कॉलम #चर्चा_प्लस में "दैनिक सागर दिनकर" में ( 05.04. 2017) ..My Column #Charcha_Plus in "Sagar Dinkar" news paper
चर्चा प्लस
 रामनवमी पर विशेष:
 सदा प्रासंगिक हैं श्रीराम    
   - डाॅ. शरद सिंह                                                                                      
                                                           
श्रीराम सर्वशक्तिमान राजा दशरथ के घर भले ही जन्में थे किन्तु उन्होंने एक सामान्य व्यक्ति से भी कठिनतम जीवन जिया। वनवास काल में अपने अनुज लक्ष्मण और अपनी अद्र्धांगिनी सीता के कष्टों को देखना और उन्हें सहन करना आसान कार्य नहीं कहा जा सकता। अपनों को होने वाला कष्ट जो पीड़ा देता है, उससे बढ़ कर और कोई पीड़ा नहीं होती है। श्रीराम मानवीय चरित्र का एक ऐसा समुच्चय हैं जो आचार, व्यवहार और कत्र्तव्यों के प्रति जागरूकता का सीमाबोध कराता है। आवश्यकता है श्रीराम के चरित्र को जानने और समझने की, वह भी बिना कोई धार्मिक चश्मा लगाए। श्रीराम के चरित्र को समझने के बाद ही उनकी प्रसंगिकता को भली-भांति समझा जा सकता है।

    आपदामपहर्तारं दातारं सर्वसम्पदाम्।
   लोकाभिरामं श्रीरामं भूयो भूयो नमाम्यहम् ।।

जब कोई कथा सदियों से मान्यरूप में चली आ रही हो और उसके प्रभाव को अकाट्य रूप् से स्वीकार किया जाता हो तो यह मानना ही होगा कि उस कथा में ऐसे चरित्र विद्यमान हैं जो स्थान और काल की बाधा को पार करते हुए सम्पूर्ण विश्व और प्रत्येक युग को प्रभावित करने में सक्षम हैं। रामकथा ऐसी ही एक कथा है जो प्रत्येक मनुष्य को प्रभावित करने में सक्षम है। श्रीराम इस कथा के आधार चरित्र हैं। एक ऐसा चरित्र जो इस बात का संदेश देता है कि किसी भी संकट से जूझने का साहस प्रत्येक व्यक्ति के भीतर होता है बस, आवश्यकता होती है उस साहस को पहचानने और स्वीकार करने की। श्रीराम का चरित्र अलौकिक होते हुए भी पूर्णतया लौकिक था। उन्होंने जन्म लिया, जीवन के समस्त बंधनों को स्वीकार किया, समस्त कत्र्तव्यों का निर्वहन किया और एक मनुष्य की भांति दुख-सुख से प्रभावित होते हुए मृत्यु को वरण किया। श्रीराम सर्वशक्तिमान राजा दशरथ के घर भले ही जन्में थे किन्तु उन्होंने एक सामान्य व्यक्ति से भी कठिनतम जीवन जिया। वनवास काल में अपने अनुज लक्ष्मण और अपनी अद्र्धांगिनी सीता के कष्टों को देखना और उन्हें सहन करना आसान कार्य नहीं कहा जा सकता। अपनों को होने वाला कष्ट जो पीड़ा देता है, उससे बढ़ कर और कोई पीड़ा नहीं होती है। श्रीराम मानवीय चरित्र का एक ऐसा समुच्चय हैं जो आचार, व्यवहार और कत्र्तव्यों के प्रति जागरूकता का सीमाबोध कराता है। आवश्यकता है श्रीराम के चरित्र को जानने और समझने की, वह भी बिना कोई धार्मिक चश्मा लगाए। श्रीराम के चरित्र को समझने के बाद ही उनकी प्रसंगिकता को भली-भांति समझा जा सकता है।
भगवान विष्णु ने असुरों का संहार करने के लिए राम रूप में पृथ्वी पर अवतार लिया और जीवन में मर्यादा का पालन करते हुए मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाए। ‍तभी से लेकर आज तक मर्यादा पुरुषोत्तम राम का जन्मोत्सव तो धूमधाम से मनाया जाता है, परंतु उनके आदर्शों को अकसर ठीक से समझा ही नहीं जाता है। अयोध्या के राजकुमार होते हुए भी भगवान राम अपने पिता के वचनों को पूरा करने के लिए संपूर्ण वैभव को त्याग कर चौदह वर्षों के लिए वन चले गए। उन्होंने अपने जीवन में धर्म की रक्षा करते हुए अपने हर वचन को पूर्ण किया। हर माता-पिता चाहते हैं कि उनका पुत्र राम के समान चरित्रवान हो क्योंकि माता-पिता के प्रति श्रीराम की आज्ञाकारिता अनुपम है। लेकिन रामकथा के इस प्रसंग को दूसरी दृष्टि से भी देखा जा सकता है। वह दूसरी दृष्टि है कि गोया श्रीराम इस तथ्य को सामने लाना चाला चाहते हैं कि आज्ञाकारिता की भी सीमा होनी चाहिए। अनुचित आज्ञा को शिरोधार्य करने से न केवल परिवार बल्कि प्रजा (या परिचित, संबंधी) को भी कष्ट होता है। यदि श्रीराम ने माता कैकयी की अनुचित आज्ञा नहीं मानी होती तो उन पर कोई दोष नहीं आता क्योंकि आज्ञा ही दोषपूर्ण एवं कपटपूर्ण थी। यदि उन्होंने वनवास का आदेश नहीं माना होता तो न तो पिता दशरथ की मृत्यु होती और न ही उनके साथ सीता और लक्ष्मण को वनगमन करना पड़ता। इससे भी बढ़ कर श्रीराम के सुशासन का आनंद अयोध्या की जनता चैदह वर्ष तक नहीं उठा सकी। भरत ने श्रीराम का स्मरण कर के शासन अवश्य चलाया किन्तु श्रीराम का शासन भरत के शासन से कहीं अधिक उत्तम था, तभी तो राम का शासन काल ‘‘राम राज’’ के नाम से सदियों से ख्यातिनाम रहा।
Charcha Plus Column of Dr Sharad Singh in "Sagar Dinkar" Daily News Paper
श्रीराम के चरित्र ने दूसरा उहारण यह प्रस्तुत किया कि निर्बल कोई नहीं होता हैं, छोटा कोई नहीं होता है। हर व्यक्ति किसी न किसी विशेषता से परिपूर्ण होता है। जैसे जो पढ़ा-लिखा नहीं है और मेहनत-मलदूरी करता है वह पढ़े-लिखे तबके से किसी मायने में कमतर नहीं कहा जा सकता है। जिस बल के साथ वह फावड़ा या कुदाल चला सकता है अथवा बोझा ढो सकता है वह बल पढ़ेलिखे तबके के पास होता ही नहीं है। इसके विपरीत पढ़ालिखा व्यक्ति वह ज्ञान भी रखता है जो अनपढ़ मजदूर के पास नहीं होता है। यानी दोनों तबका अपने-अपने क्षेत्र में योग्य होता है। श्रीराम ने वानरों और भाल्लुकों से सहायता ले कर इस बात को सिद्ध कर दिया कि जीवन में हर व्यक्ति का महत्व होता है। किसी भी व्यक्ति को देश, काल अथवा उसकी सामाजिक व्यवस्थाओं के कारण कम कर के नहीं आंका जा सकता है।
श्रीराम का चरित्र यह भी संदेश देता है कि अनाचारी के विरुद्ध शस्त्र उठाना, उसे दण्डित करना जरूरी होता है अन्यथा वह अपने छल-कपट से नारीजाति सहित उन सभी को कष्ट देता रहेगा जो भोले हैं, निष्कपट हैं और परोपकारी हैं। अनाचारी चाहे कितनी भी विद्वान क्यों न हो, वह दण्ड का भागी होना ही चाहिए। रावण में पांडत्यि की कमी नहीं थी। वह इतना ज्ञानी था कि स्वयं श्रीराम ने भी उसके ज्ञान को पूरा सम्मान दिया किन्तु उसके अनाचारी आचरण ने उसे खलपात्र बना दिया। यही तो कहती है रातकथा कि ज्ञान के साथ संयम और सदाचार भी जरूरी होता है।
जब राम के चरित्र का विश्लेषण किया जाता है तो प्रायः यह बात भी उठती है कि मर्यादापुरुषोत्तम होते हुए भी श्रीराम ने एक आदमी के लांछन लगाने पर गर्भवती सीता का त्याग कर दिया और उन्हें वनवास भेज दिया। प्रथदृष्ट्या यह रामचरित्र में बहुत बड़ी कमी दिखाई देती है किन्तु कोई भी आकलन तभी सही अर्थ में पूरा होता है जब उसके सभी पक्षों पर दृष्टि डाली जाए। इस प्रसंग में श्रीराम का चरित्र यही तो कहना चाहता है कि मात्र आदर्श स्थापना के लिए उस बात को आंखमूंद कर नहीं मानो जो मानने योग्य न हो। सीता के चरित्र पर उंगली उठाने वाले व्यक्ति का अपना अनुभव अथवा उसका अपना पूर्वाग्रह रावण के पास सीता के बंदी रहने और फिर अग्निपरीक्षा दे कर तत्कालीन सामाजिक आदर्श को पूरा करने से अलग था। फिर भी श्रीराम ने मात्र इसलिए उसके उलाहने को गंभीरता से लिया क्योंकि वे आदर्श प्रस्तुत करना चाहते थे अथवा तत्कालीन आदर्श का पोषण करना चाहते थे। लेकिन इसी का दूसरा पहलू यह भी है कि आदर्श का अतिवाद सबके लिए दुखदायी होता है। श्रीराम और सीता ने तो दुख झेला ही, साथ में लव और कुश ने भी पिता का अभाव झेला। श्रीराम के इस कदम से प्रजा की वैचारिकता भी अराजक हुई। जब एक व्यक्ति की अनुचित बातें मान ली जाएं तो दूसरा व्यक्ति मुंह चलाने में देर नहीं करेगा। फिर भी श्रीराम ने सफलतापूर्वक शासन किया। लेकिन वे स्वयं इतने अधिक दुख और क्लेश का अनुभव करते रहे कि अंततः उन्होंने सरयू के जल में चिरविश्राम का मार्ग चुना। संभवतः यह अतिवादी आदर्श की स्थापना के प्रयास का दुखद अंत था। लेकिन इस विश्लेषण का अर्थ यह नहीं है श्रीराम का चरित्र दोषपूर्ण था। वस्तुतः श्रीराम का चरित्र एक ऐसा चरित्र है जो आदर्श की समुचित व्यख्या करता है। साथ ही आदर्श की सीमाओं एवं उसके अच्छे-बुरे पक्षों को खोल कर सामने रखता है। दिक्कत तब आती है जब रामकथा को पढ़ने वाला व्यक्ति अपने पूर्वाग्रह का चश्मा लगा लेता है और अपने पसंद के अनुरुप रामकथा को गढ़ने लगता है अथवा उसमें मीनमेख निकालने लगता है।
सांस्कृतिक मूल्य आर्थिक, राजनीतिक परिवर्तनों की तुलना में दीर्घकालीन रूप से अपरिवर्तित रहते हैं. आज भी राम-कथा विश्व के अनेक लोगों को प्रभावित करती है क्यों कि इस कथा में चारित्रिक विविधता के साथ ही आचरण और संवेगों का यथार्थ प्रस्तुतिकरण है। यह सत्य और असत्य की, अच्छाई और बुराई, धर्म और अधर्म के बीच चलने वाले संषर्घ की कथा है। यह संघर्ष आज भी है, मात्र उसका रूप बदला है। इसीलिए रामायण के विभिन्न प्रसंग, पात्र हमारे लोक जीवन  में आज भी प्रासंगिक होते रहते रहते हैं। क्रोध, मोह, लोभ, क्षोभ, शोक, वचन-पालन आदि के प्रसंग तथा भरत, मंथरा, हनुमान, सुग्रीव, रावण, विभीषण आदि कुछ पात्र उदाहरण हैं। स्मरण रहे कि वाल्मीकि रामायण का आरंभ ही एक शाप-प्रसंग से होता है। जिस रचना का उद्देश्य मर्यादा-पुरुषोत्तम का चरित्र प्रस्तुत करना हो, उसका ऐसा आरंभ किस उद्देश्य से किया गया यह ध्यान देने योग्य है। मर्यादा को भंग करनेवाला सदैव दंड का अधिकारी होता है। निषाद को आखेट के लिए नहीं, वरन काम-मोहित अवस्था में क्रौंच पक्षी के आखेट के लिए शाप मिला। स्वयं वाल्मीकि भी क्रोधावेश में शाप देकर मर्यादा भंग करते हैं, तो उसका मार्जन भी हुआ। इसी तरह, पूरी रामायण के विविध प्रसंग मर्यादा-भंग के कुपरिणाम और उसकी पुनप्र्रतिष्ठा का प्रयत्न है। यह एक संपूर्ण सांस्कृतिक दृष्टि प्रस्तुत करती है, धर्म के वास्तविक स्वरूप को स्थापित करने में सक्षम है।
श्रीरामचंद्र कृपालु भजु मन हरण भवभय दारुणं।
नवकंज लोचन, कंजमुख कर, कंज पद कंजारुणं।।
कंदर्प अगणित अमित छवि नव नील नीरज सुन्दरं।
पट पीत मानहु तडित रूचि-शुची नौमी, जनक सुतावरं।।
भजु दीनबंधु दिनेश दानव दैत्य वंष निकन्दनं।
रघुनंद आनंद कंद कोशल चन्द्र दशरथ नंदनम।।

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Friday, February 3, 2017

" निराला’ का मानवतावाद " वसंत पंचमी-‘निराला जयंती पर विशेष

Dr Sharad Singh
मेरे कॉलम चर्चा प्लस में "दैनिक सागर दिनकर" में ( 01.02. 2017) .....My Column Charcha Plus in "Sagar Dinkar" news paper
चर्चा प्लस 
  

‘निराला’ का मानवतावाद’
वसंत पंचमी-‘निराला जयंती पर विशेष 
    - डॉ. शरद सिंह
                                                                                       
 आज मानवतावाद ज्वलंत विषय है। इस विषय पर बड़े-बड़े सेमिनार होते हैं, चर्चाएं होती हैं एवं गोष्ठियां आयोजित की जाती हैं। इन सबके द्वारा इस बात को परखने का प्रयास किया जाता है कि मानवदावाद आखिर है क्या? इसे समाज में कैसे स्थापित किया जाए? जबकि हिन्दी साहित्य की मूल चेतना ही मानवतावादी है। इसमें मानवजीवन के प्रत्येक मूल्यों को बारीकी से जांचा-परखा गया है। मानवतावाद के प्रति सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला का अपना एक अलग दृष्टिकोण रहा। वे जब मानव की बात करते थे तो सबसे पहले दुखी-पीड़ित मानवता के प्रति उनकी संवेदनाएं मुखर होती थीं। ‘निराला’ का मानवतावाद सदा प्रासंगिक है। 
    
भारतीय दर्शन, संस्कृति एवं साहित्य में मानवतावादी तत्व सनातनकाल से विद्यमान रहे हैं। साहित्य में मानवीय चेतना लेखनी की प्राणवाहक का काम करती है। जिसे सुख का आनंद और दुख की पीड़ा सतहीतौर पर हो वह अपने अनगढ़ विचार उद्घाटित तो कर सकता है किन्तु साहित्य सृजन नहीं कर सकता है। हिन्दी साहित्य की मूलचेतना ही मानवतावादी है। इसमें मानव जीवन के प्रत्येक मूल्यों को बारीकी से जांचा-परखा गया है। आधुनिकयुग के साहित्यकारों में महाप्राण कहे जाने वाले सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ ने अपने साहित्य में मानवीय मूल्यों और संवेदनाओं को जिस सूक्ष्मता से उकेरा है, वह उन्हें वास्तव में ‘महाप्राण’ सिद्ध करता है। ‘निराला’ में कालिदास की उदात्त कोमल भावनाएं थीं तो कबीर का फक्कड़पन और विवेकानंद की गंभीरता भी थी। ‘निराला’ काव्यजगत् में जितने स्थापित हुए, उतने ही अपने गद्य साहित्य के लिए भी चर्चित हुए। वे बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। उन्होंने स्वयं पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि-‘‘देखते नहीं मेरे पास एक कवि की वाणी, कलाकार का हाथ, पहलवान की छाती और फिलासफर के पैर हैं।’’
‘निराला’ ने सन् 1915 से कविता लिखना आरंभ किया था। सतत् मंथन के बाद उनका पहला काव्य ‘परिमल’ सन् 1929 में प्रकाशित हुआ। ‘निराला’ ने काव्य के छायावादी दृष्टिकोण को अपनाया वहीं प्रयोगवादी मानकों को भी आत्मसात किया। उनके अन्य काव्य हैं- अनामिका, तुलसीदास, कुकुरमुत्ता, अणिमा, बेला, नए पत्ते, अर्चना एवं आराधना। अनामिका में संग्रहीत ‘तोड़ती पत्थर’ कविता मानवीय मूल्यों की उत्कृष्ट धरोहर है। आचार्य नरेन्द्र शर्मा ने ‘निराला’ एवं ‘तोड़ती पत्थर’ के बारे में लिखा है-‘‘वह आधुनिक कवियों में शैलीगत अपनी आधुनिकता के कारण आधुनिकतम, किन्तु वेदान्त, दर्शन और वीरपूजा संबंधी भावना के कारण पुरातन बने रहे। एक ओर वह घोर अहंवादी है तो दूसरी ओर अपनी उदार मनःसंवेदना के कारण वह पददलितों के हिमायती है। ‘तोड़ती पत्थर इलाहाबाद के पथ पर’ ऐसी भी है उनकी कविता। वह कविता एक ओर तो मार्गी है और दूसरी ओर वह पत्थर तोड़-तोड़ कर नए युग का मार्ग बनाती है।’’
Charcha Plus Column of Dr Sharad Singh in "Sagar Dinkar" Daily News Paper

कुछ आलोचकों ने निराला के काव्य पर क्लीष्टता का आरोप लगाया है। ऐसे आलोचकों ने ‘निराला’ को ‘कठिन काव्य का प्रेत’ कहा है। ‘निराला’ का ऐसा आकलन इसलिए हुआ क्योंकि वे आलोचक ‘निराला’ के काव्य में निहित मानवीय संवेदनाओं एवं रागात्मक लय को पूरी तरह समझ नहीं सके। उनकी इस दुर्बलता से परे ‘निराला’ के काव्य में मानव जीवन का विकासक्रम और उसका संगठन परिलक्षित होता है। मानव की सतत् संघर्षशीलता के चलते मानवमन में होने वाले परिवर्तनों एवं उतार-चढ़ाव का एक अनूठा दर्शन मिलता है ‘निराला’ के काव्य में। वस्तुतः कवि ‘निराला’ युगयुगीन मानवीय मूल्यों की पड़ताल करते हुए युग के साथ चलते रहे।
‘निराला’ सम्पूर्ण गद्य के विविध रूपों और विशेषकर कथा साहित्य में आस्थावान रहे। ‘निराला’ का आध्यात्मिक दृष्टिकोण भी मानवतावादी था। इसीलिए मानव मन-मस्तिष्क में संचार करने वाले सुख-दुख, राग-द्वेष ‘निराला’ के गद्य साहित्य में मुखर रूप में विद्यमान हैं। ‘निराला’  का मानव देवत्व की तलाश में नहीं, उसकी ऊर्जा देवत्व को गंतव्य मान कर गतिमान नहीं होती किन्तु देवत्व का पर्याय बन कर सामने आती है। ‘निराला’ के गद्य में वेदान्त की अनुप्रेरणा और विवेकानंद की वाणी का प्रभाव ही नहीं बल्कि उनके व्यक्तित्व की विराटता भी विद्यमान है। जब हम ‘निराला’ के काव्य और उनके गद्य में मौजूद मानवचेतना से साक्षात्कार करते हैं तो इस सत्य का अहसास होने लगता है कि पद्य जल नहीं है और गद्य पाषाण नहीं है। वस्तुतः काव्य और गद्य के बीच स्पष्ट धारणात्मक रेखा खींचना कठिन है। हर गद्य में कविता संभव है और हर कविता में गद्य। यह भी सच है कि क्रियात्मक रूप में कविता और गद्य के बीच एक पारंपरिक अंतर माना जाता है और इसी आधार पर कविता में अधि सूक्ष्मता, वाक्संक्षिप्तता, संयम एवं लयात्मकता दिखाई पड़ती है तथा गद्य में अधिक विस्तार, खुलापन एवं व्यापकता का बोध होता है। कुछ आलोचक यह मानते हैं कि काव्य की अपेक्षा गद्य में मूल्यनिर्णय की क्षमता अधिक होती है। जबकि ‘निराला’ के काव्य और गद्य को एक-दूसरे के समान्तर रख कर देखा जाए तो दोनों ही विधाएं समान रूप से मूल्य-निर्णायक साबित होती हैं। अतः यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि वे कौन से कारण रहे होंगे जिन्होने ‘निराला’ को काव्य के साथ-साथ गद्य सृजन से भी जोड़ा, वह भी समउत्कृष्टता और समर्पण के साथ। इस प्रश्न का उत्तर इस एक तथ्य में निहित है कि ‘निराला’ के भीतर एक संवेगतत्व निरंतर प्रवाहित रहा। जीवन के विविध पक्षों में विचरण के कारण ही ज़मीन से जुड़े ‘निराला’ के भीतर हमेशा एक अंतर्द्वन्द्व चलता रहा। वे उद्वेलित होते रहे। जीवन की विषमताओं को ले कर उनके मन में सदा पीड़ा रही कि एक मानव दूसरे मानव का शोषण क्यों करता है? यह सहज प्रश्न और जिज्ञासा उन्हें आकुल करती रही और अंतर्मन में अनजाने में ही एक चिंतन प्रक्रिया बराबर चलती रही। यह उनके भीतर क्रांतिचेतना की पीठिका एवं प्रेरक बनी। यही क्रांतिचेतना अथवा मानववाद ‘निराला’ से काव्य के साथ-साथ गद्य सृजन भी कराती रही।
‘निराला’ के गद्य में विद्यमान मानववाद का तीन बिन्दुओं में आकलन किया जा सकता है- ‘निराला’ के उपन्यासों में मानववाद, कथासाहित्य में मानववाद और रेखाचित्रों-संस्मरणों में मानववाद। इन तीन बिन्दुओं के अध्ययन के उपरांत ‘निराला’ के मानवतावादी दृष्टिकोण की विराटता, गहनता और विस्तार को समझना आसान हो जाता है। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो ये तीनों बिन्दु ‘निराला’ के मानस के मानवीय पूर्णत्व से परिचित कराते हैं।
‘निराला’ का प्रथम उपन्यास ‘अप्सरा’ सन् 1931 में प्रकाशित हुआ। सन् 1933 में ‘अलका’, 1936 में प्रभावती एवं ‘निरुपमा’, 1946 में ‘चोटी की पकड़’ तथा 1950 में ‘कालेकारनामे’ उपन्यास प्रकाशित हुआ। ‘निराला’ की विचार प्रक्रिया को आधार बना कर यह कहा जा सकता है कि लगभग 25 वर्ष तक ‘निराला’ गद्य साहित्य के माध्यम से मानवमूल्यों एवं संवेदनाओं के आकलन और उद्घाटन में संलग्न रहे। इस सतत् प्रवाहित प्रक्रिया के चलते उन्होंने ‘अप्सरा’ में समर्पण, त्याग और बलिदान की प्रेरणा का आधार बनाया। जीवन को आस्वाद की आश्वस्ति दी, कर्म की मानववादी मनोभूमि पर निर्भीकता और स्वावलम्बन को स्थापित किया। ‘अलका’ में नारी के स्वाभिमान, मानव का अधूरापन, मानवीय विवशता, विडम्बना, अत्याचार, उत्पीड़णन और शोषण के विविध रूपों को प्रस्तुत किया। ‘प्रभावती’ में नारी गौरव के साथ प्रेम की उन्मुक्त चेतना को रेखांकित किया। ‘निरुपमा’ में उन्होंने सामाजिक वैषम्य, नारी गरिमा के साथ मानसिक वृत्तियों का विश्लेषण एवं कर्मचेतना को प्रकट किया। ‘चोटी की पकड़’ और ‘कालेकारनामे’ उपन्यास स्वदेशी आंदोलन और आंदोलन की सामाजिक भूमिका पर आधारित है, जिन्हें मानवीय गरिमा, मानवीय औदात्य के साथ-साथ मानवीय बोध और मनुष्य की साधना को मुखर किया है।
‘निराला’ की कहानियां हैं -चतुरी चमार, देवी, राजा साहिब ने ठेंगा दिखाया, हिरनी, अर्थ, सफलता, क्या देखा, सुकुल की बीवी, श्रीमती गजानन और कला की रूपरेखा। ‘चतुरी चमार’ और ‘सुकुल की बीवी’ दो समांतर धरातल की कहानियां हैं। एक में मानवीय विडम्बना और जीवन का आक्रोश उद्घाटित हुआ है तो दूसरी में नारीजीवन की विडम्बना के प्रति रूढ़ि से मुक्ति का आह्वान किया गया है। ‘निराला’ ने ‘देवी’ में मानवीय पर्तां की अंदरूनी बखिया को सामने रखा है तो ‘राजा साहिब ने ठेंगा दिखाया’ में अभिजात्यवर्ग के बौद्धिक दिवालियापन पर कटाक्ष किया है। ‘हिरनी’ मानवीयबोध का प्रश्न उठाती है और ‘श्रीमती गजानन’ नारी के स्वाभिमान से ओतप्रोत है। ‘क्या देखा’ स्वच्छंद प्रेम की मानववादी अभिव्यक्ति है तो ‘कला की रूपरेखा’ मानवीय दुष्प्रवृत्तियों पर चोट करती है।
‘निराला’ के रेखाचित्र एवं संस्मरणों में ‘कुल्लीभाट’ और ‘बिल्लेसुर बकरिहा’ का सृजन निराला-साहित्य की अनन्यतम घटना मानी जा सकती है। वस्तुतः ‘कुल्लीभाट’ में कुल्ली का स्वरूप विद्रोही चेतना के उद्वेलन से आंदोलित हुआ है वहीं ‘बिल्लेसुर बकरिहा’ को मनुष्य की महत्वाकांक्षा का प्रस्तुतिकरण कहा जा सकता है। ‘निराला’ ने जीवन को समझा, जिया और इसी जीवन को अपने गद्य साहित्य में सम्पूर्णता के साथ उतारा। ‘परिमल’ के छायावादी ‘निराला’, ‘कुकुरमुत्ता’ के प्रयोगवादी ‘निराला’ और ‘बिल्लेसुर बकरिहा’ के चरित्र-अन्वेषी ‘निराला’ -इन तीनों में एक तत्व समान रूप से मौजूद है, वह है मानवतावादी दृष्टिकोण।    
इसे दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि ‘निराला’ के कथा साहित्य को या तो केवल खानापूरी के लिए मूल्यांकित कर दिया जाता है अथवा बंधे-बंधाए नियमों और कसौटियों पर उसका परीक्षएा कर के अपनी अध्ययन-मूल्यांकन की औपचारिकता की पूर्ति कर दी जाती है। यही कारण है कि ‘निराला’ का कथा साहित्य एक अप्रत्यक्ष उपेक्षा का शिकार रहा और वह प्रेमचंद के कथा साहित्य के प्रभामंडल के पीछे छिपा रह गया। ‘निराला’ का कथा साहित्य चर्चित अवश्य हुआ लेकिन उचित मूल्यांकन की कमी के चलते अपने जनबोध को भली-भांति उजागर नहीं कर पाया। वर्तमान चिंतक आज के समय को राजनैतिक समय मानते हैं और आज की रचनाओं में इसी राजनैतिक समय को लिखते और समीक्षा का आधार बनाते हैं जबकि ‘निराला’ के गद्य के मर्म को समझने के बाद वर्तमान मानवचरित्र को समझना आसान हो जाता है।
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Tuesday, January 17, 2017

Dr Sharad Singh in World Book Fair 2017 With Maitreyi Pushpa

मेरी प्रिय एवं वरिष्ठ लेखिका मैत्रेयी़ पुष्पा और मै डॉ. ‪शरद सिंह ...

Dr Sharad Singh with Maitreyi Pushpa 


Dr Sharad Singh in World Book Fair 2017 ... विश्व पुस्तक मेला 2017 में डॉ शरद सिंह

विश्व पुस्तक मेला, प्रगति मैदान, नई दिल्ली के मानुषी थीम पवेलियन में 'नारी चेतना’ पर मैंने कहानी-पाठ किया। यह कार्यक्रम साहित्य अकादमी एवं राष्ट्रीय पुस्तक न्यास द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित किया गया था। (12.01.2017)
Dr Sharad Singh World Book Fair 2017, Theme Pavilion Manushi, Pragati Maidan, New Delhi

Dr Sharad Singh World Book Fair 2017, Theme Pavilion Manushi, Pragati Maidan, New Delhi

Dr Sharad Singh World Book Fair 2017, Theme Pavilion Manushi, Pragati Maidan, New Delhi

Dr Sharad Singh World Book Fair 2017, Theme Pavilion Manushi, Pragati Maidan, New Delhi

Dr Sharad Singh World Book Fair 2017, Theme Pavilion Manushi, Pragati Maidan, New Delhi

Dr Sharad Singh World Book Fair 2017, Theme Pavilion Manushi, Pragati Maidan, New Delhi

Dr Sharad Singh World Book Fair 2017, Theme Pavilion Manushi, Pragati Maidan, New Delhi

Dr Sharad Singh World Book Fair 2017, Theme Pavilion Manushi, Pragati Maidan, New Delhi

Dr Sharad Singh World Book Fair 2017, Theme Pavilion Manushi, Pragati Maidan, New Delhi