Thursday, March 26, 2026

बतकाव बिन्ना की | जरूरत आए ‘‘माई’’ को मतलब समझबे की | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बतकाव बिन्ना की
जरूरत आए ‘‘माई’’ को मतलब समझबे की
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
‘‘जो कोनऊं त्योहर चलत आएं तो समै को पतो नईं परत। आज प्रथमा, सो काल दुतिया औ परों तृतिया औ जेई तरां से सप्तमें औ आठें सोई गुजर जात आएं। मनो दिन को सोई पतो नई परत के कैसे गुजर जात आए।’’ मैंने भौजी से कई।
‘‘हऔ बिन्ना! ऐसई करत-करत जिनगी गुजर जात आए।’’ भौजी तनस सोंसत सी बोलीं।
‘‘ऐसी काए कै रईं? ई दफा तो चैत की नवरातें बी पैले पर गईं औ बीच में तनक पानी सोई गिर गओ सो ठंडक बनी रई। नें तो जो कभऊं अप्रैल में नवरातें परत आएं तो धूप तपन लगत आए औ उपास राखबे में सोई परेसानी होत है। ई दफे तो मंदिर-दिवाला गए में गोड़े बी नईं जरे। जोन दिनां मैं ज्वाला देवी के मंदिर गई रई ऊ दिनां उतई पानी परसन लगो रओ। भौतई अच्छो सो मौसम हो गओ रओ। बाकी फसल के लाने जरूर चिंता भई रई काए से के रसता में देखी रई के फसल कट के खेतन में सूखबे खों धरी हती औ कऊं-कऊं तो खड़ी हती। मने कटाई बी नईं भई रई।’’ मैंने भौजी से कई।
‘‘जा सब तो ठीक आए बिन्ना मनो जे देखो के अपने इते नौ-नौ दिन लौं देवी माई की पूजा होत आए। सबरे लुगवा सोई माई की पूजा करत आएं, उपास रखत आएं। कोऊ-कोऊ तो नौ दिनां चप्पलें नईं पैनत, दाढ़ी नईं कटात औ धरती पे सोऊत आएं। मनो माई खों प्रसन्न करबे के लाने खूब-खूब जतन करत आएं।’’ भौजी बोलीं।
‘‘हऔ, जे तो आप सांची कै रईं। मनो लुगाइयां सोई नौ दिनां उपवास राखत आएं। कोऊ फलाहारी करत आएं तो कोऊ निरजला लौं रैत आएं। माई को खुस को नईं करबेा चात आए? सबई चात आएं के माई की किरपा उनपे बनी रए।’’ मैंने कई।
‘‘जेई तो बात आए बिन्ना, के एक तरफी तो सब चात आएं के माई की किरपा उनपे बनी रए औ दूसरी तरफी बे मरई को मतलब नईं समझत आएं।’’ भौजी बोलीं।
‘‘का मतलब आपको? तनक खुल के बोलो आप।’’ मैंने कई।
‘‘हम का खुल के बोलें? सब कछू तो आंगू में खुलो डरो।’’ भौजी बोलीं।
‘‘मनो मोए समझ नईं पर रई के आप का कैबो चा रईं? सो तनक जे सोई बताओ के जे आप काए के बारे में कै रईं?’’ मैंने भौजी से कई।
‘‘अरे, मोए तो रै-रै के बोई खयाल परत आए के बा बिचारी खों कैसो लगो हुइए जब ऊके घरवारे ने ई ऊको मारो औ गाड़ी में बार दऔ।’’भौजी बोलीं।
‘‘कऊं आप बा डाक्टर वारी घटना की तो नईं कै रईं?’’मैंने भौजी से पूछी।
‘‘हऔ, ओई की बात कर रई। कैसो राकस डाक्टर रओ ऊ?’’ भौजी बोलीं।
‘‘हऔ बा घटना के बारे में मैंने सोई पढ़ी रई औ मोए बी बुरौ लगो रऔ।’’ मैंने भौजी से कई।
‘‘नईं, तुमई सोचो बिन्ना के जो का मतलब भओ? एक तरफी तो सबई जने माई की पूजा करत आएं। औ कओ बी जात आए के जां लुगाई की इज्जत होत आए उते देवता रैत आएं। औ इते तो लुगाइयन की इज्जत का, जान को ठौर नइयां। अरे तुमें नईं पुसा रई तो छोड़ो। छोर-छुट्टी करा लेओ औ दूसरी राख लेओ। जे का के तुमे अब नई पुसा रई सो तुमने ऊको मार के ठिकाने लगा दओ। का बा इंसान नोंई? कोनऊं सामान आए का के बोर हो गए सो तोड़-ताड़ के कूडा में मेंक दओ, ने तो बार दओ। बा जोन डाक्टर ने अपनी लुगाई खों कार में बार दओ, अबे तो पतो परहे के मार के बारो के बारत समै बा जिन्दा हती?’’ भौजी बोलीं।
‘‘हऔ भौजी! कोन टाईप के होत आएं जे ओरें जो कोऊ खों ऐसे मारबे को करेजा रखत आएं। इते ब्लड टेटस्ट के लाने जाओ तो खून नईं देखो जात आए। मैं तो अपनों मों दूसरी तरफी फेर लेत आओं। बा तो भौतई बुरौ करो बा नीच आदमी ने। ऊको तो डाक्टर कैबे में डाक्टरन को अपमान होत आए।’’ मैंने कई।
‘‘एक बोई का? अखबार उठा के देख लेओ, मुतकी खबरे मिल जैहें ई टाईप की। कऊं दहेज के लाने मार डारत आएं तो कऊं इज्जत लूट के बार देत आएं तो कऊं खाली दूसरी लाबे के चक्कर में निपटा देत आएं। मनो लुगाई ने भई कोनऊं बेजान चीज हो गई के मन भर गओ तो तोड़-मोड़ के मेंक दओ। ऊपे दम भरत आएं माई की पूजा की। अरे, जोन समाज में ऐसे लुगवा रैत होंए ऊपे माई काए खों प्रसन्न हुइएं?’’ भौजी तनक गुस्सा सी करत भई बोलीं। मनो उनकी बात सांची हती।
‘‘आप सई कै रईं भौजी, जो माई खों समझबे को दम भरत आएं उने लुगाई की जान की बी इज्जत करो चाइए। हमें तो जे देख के लगत आए के अपने ई समाज में धरम खों समझबे वारे कित्ते आएं औ धरम के नांव पे ठेकेदारी करबे वारे कित्ते आए? अब आपई देखो के ज्यादा से ज्यादा व्रत त्योहार अपन ओरन मने लुगाइन के करे से चल रए। या तक के मैंने देखी आए के कई मंदिरन में मंगल के मंगल सुंदरकांड को पाठ करो जात आए, बा बी लुगाइयां करत आएं। कम से कम बजरंगबली के लाने तो लुगवों खों टेम निकारने चाइए। पैले जोई होत्तो, मंगलवार खों लुगवा हरें मंदर में भजन गाउत्ते और बजरंबली की पूजा करत्ते। अब उने मोबाईल पे टिपियाबे से फुरसत नइयां।’’ मैंने भौजी से कई।
‘‘औ का, जेई से तो जे सब कांड होन लगे। औरन बी मोबाईल पे बा न्यूज देख-सुन लई औ अगली पोस्ट पे बढ़ गए। कोन खों परी के ऊके विरोध में कछू हल्ला-गुल्ला करें। जितनी बहस फिलम पे होत आए उत्ती तो ई टाईप की घटना पे लौं नई होत। औ ईके लाने अपन लुगाइयां सोई जिम्मेवार कहाईं।’’ भौजी बोलीं।
‘‘बा कैसे?’’ मैंने पूछी।
‘‘बा ऐसे के अपन माई के नौ रूपों की पूजा तो करत आएं मनो उनके घांईं बनबे की सोचत बी नइयां। तनक अपने भीतरे जो माई को भाव ले आवें सो कोन की हिम्मत के अपन खों कछू कर सके। बोलो सई कई के नईं?’’ भौजी ने मोसे पूछी।
‘‘बिलकुल सई कै रई आप। का आए के डरने या घबड़ाने का नईं, हिम्मत से मुकाबला करबे की जरूरत आए। जो कोनऊं बदमाशी करे सो ऊको इूंसई-ठूंसा मारो फेर देखो माई कैसे साथ देत आएं।’’ मैंने भौजी से कई।
‘‘जेई लाने ई दफा सो हमने माई से जेई मांगो के सगरे लुगवा औ लुगाइयन खों बुद्धी दे माई औ लुगाइयन खों तनक बुद्धी के संगे शक्ति देंवें के बे जो खतरा देखें तो बुद्धी से काम लेवें। पैले खुद सामना करें औ जो लगे के मदद की जरूरत आए तो संकोच ने करें औ सबई से मदद मांगे। कुट-पिट के बाथरूम में अपट परी कैबे से काम ने चलहे। इसे बुरै इंसानों के हौसले बढ़त आएं। काए सई कई के नईं?’’ भौजी बोलीं।
‘‘बिलकुल सई भौजी। जब तक सबरे जे ने समझहें के माई को मतलब का आए तब तक खाली पूजा करे से कछू ने मिलहे। सबई खों माई को मतलब समझबे की जरूरत आए।’’ मैंने कई।  
आकी बतकाव हती सो बढ़ी गई, हड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हप्ता करबी बतकाव तब तक लौं जेई की जुगाली करो। मनो सोचियो जरूर के आप ओरें माई को मतलब कित्तो समझत हो?    
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बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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