बतकाव बिन्ना की
सबरे लड़इयों को ब्याओ भओ जा रओ, मनो पानी ने बरस रओ
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
जब हम लोहरे हते तो हमाए इते खाना पकाने वारी बऊ बड़े मजे-मजे की किसां सुनात्तीं। उनईं से सबसे पैले हमने लड़इयों के ब्याओ की किसां सुनी हती। जा किसां खाली किसां ने हती, ईमें मोसम की खासियत सोई बताई गई हती।
का हतो के पैले 15 जून लौं बरसात को मौसम सुरू हो जात्तो। हप्ता भर में चकौड़ा/चरौंटा हरियान लगत्ते। मनो कोऊ-कोऊ दिनां ऐसो बी होत्तो के सूरज बी दिखात रैत्तो औ पानी की झला आन के कढ़ जात्तो। ऊ टेम पे इन्द्रधुष सोई देखबे खों मिल जात्तो। ऊके बारे में बऊ कैत्तीं के जबे सूरज निकरो होए औ झला परे तो ऊ टेम पे लड़इयन को ब्याओ होत आए। अब ऊ टेम पे हमें तो समझ में ने आत्ती के लड़इयन को ब्याओ कैसो होत आए? हमें ऊ समै पे जेई लगत्तो के जोन टाईप से दूला-दुलैया को ब्याओ होत आए, मंड़वा तरे, ऊंसई लड़इयन को ब्याओ होत हुइए। का उनके इते बी पंगतें बैठत आएं? हम जेई सोचत्ते। बऊ से एक बेर हमने पूछई लई के जे लड़इयन को ब्याओ कैसो होत आए? उनके इते बी ढोलक बजत आए का? गारी सोई गाई जात हुइए, मनो का बे ओरें गारी गा लेत आएं? बऊ ने हमाई बात सुनी तो बे खूब हंसी। फेर उन्ने हमें जे किसां सुनाईं जोन हम आप ओरन खों सुना रए-
का भओ के एक हतो जंगल। ऊ जंगल में एक लड़इया रैत्तो। बा भड़यागिरी सोई करत्तो। जब बा जंगल में शिकार करत-करत बोर हो जात्तो तो कभऊं-कभऊं मुर्गा-मुर्गी चुराबे के लाने गांव में पौंच जात्तो। एक बेर बा गांव पौंचो सो ऊने देखी के गांव में कोनऊं को ब्याओ हो रओ। घासलेट वारी अच्छी लालटेनें जल रईं। पूरो घर, आंगन औ अहातो लौं जगमगा रओ। उत्तई नईं, बा लाईटन से पूरो गांव दमक रओ तो। अब इत्तो उजालो होए तो कोऊ भड़या भला कछू कैसे चुरा सकत? सो बा लड़इया इत्तो तो समझ गओ के आज मुर्गा-मुर्गी कछू नईं मिल पाने। मनो ऊको लगो के जब इते लौं आ ई गए आएं तो तनक ब्याओ देख लओ जाए। बा बाड़ के जरवा की ऊ तरफी छिप के बैठ गओ औ ब्याओ देखन लगो। पूरो ब्याओ देख के ऊको जी बी कुलबुलान लगो के जेई टाईप से अपनों ब्याओ करो जाए। जेई सोचत भओ बा भुनसारे जंगल खों लौट परो।
जंगल पौंच के ऊको लगो के ब्याओ तो तब हुइए जब एक ठइयां लड़इयन मिले। सो बा सब कछू भूल-भाल के एक लड़इयन ढूंढने निकर परो। कछू मेनत के बाद ऊको एक लड़इयन मिल गई।
‘‘तुम हमसे ब्याओ करहो?’’ लड़इया ने लड़इयन से पूंछी।
‘‘काए नईं, जरूर करबी!’’ लड़इयन सरमात भई बोली।
मने लड़़इया ने एक दोरो तो पार कर लओ हतो। ऊको ब्याओ के लाने नोंनी सी लड़इयन मिल गई हती।
‘‘कबे करने ब्याओ बोलो?’’ लड़इयन ने लड़इया से पूछी।
‘‘अबे गम्म खाओ! हम तनक रोसनी-मोसनी को इंतजाम तो कर लेवें फेर करबी ब्याओ।’’ लड़इया बोलो।
अब लड़इयन ने तो इंसानों को ब्याओ देखो ने हतो सो ऊको का पतो के लड़इया के दिमाग में का चल रओ? बा बोली, ‘‘ठीक आए, जबे करने हो सो बतइयो।’’
लड़इया ने सोच तो लओ रओ के घासलेट की लाइटें जला के ऊके उजियारे में ब्याओ करहे, मनो ऊके इते कां धरी लालटेनें? तब ऊने सोची के जोन टाईप से बा मुर्गा मसक लात आए ओई टाईप से लालटेनें दबा लाहे। अगली रात खों बो लड़इया गांव पौंचो। मुतकी देर तको रओ। ऊको अबेर होबे की परवा ने हती, बा तो लालटेन चुराबे के लाने मों दताए बैठो हतो।
कुल्ल देर बाद गांव के सब ओरें अपनी-अपनी लालटेंनें बुझा के सो गए। लड़इया दबे पांव उठो औ एक घरे की खिड़की से कूंद के भीतरे पौंचो। उते ऊको लालटेन खूंटा पे टंगी दिखानी। लड़इया उचको औ ऊने लालटेन निकारबे को कोसिस करी। लालटेन ऊके पंजा में ने अटकी औ जमीन पे जा गिरी। आवाज सुन के घर वारे जाग परे। उन्ने लड़या खों देखो तो लट्ठ उठा के ऊको मारबे दौरे। लड़इया बरया-बरके अपनी जान बचा के उते से भागो।
पर बा लड़इया इत्ते पे हार मानबे वारो ने हतो। चार दिनां बाद ऊने फेर गांव को चक्कर मारो। अब के बा एक लालटेन मों में दबाबे में सफल हो गओ। मनो ऊको तुरतईं लालटेन उतई पटकने परी। काए से के लालटेन को कांच ऊ समैं बी भौतई गरम हतो। लड़इया को मों चिहुंक गओ। बा मों झटकत भओ भाग खड़ो भओ।
तीसरी बेरा बा फेर के गांव में घुसो। ई बेर ऊने पैले से बुझी भई लालटेन ताकी औ मौका परतई ऊको मों में दबा के भाग खड़ो भओ। जंगल पौंच के बा भौतई खुस भओ के अब तो लालटेंन की रोसनी में ऊको ब्याओ हुइए। ऊने लड़इन खों बुला लओ। चार लड़या औ बुला लए जोन से बे ओरें देखें के ऊको कित्तो नोंनो ब्याओ हो रओ। सबरी तैयारी हो गई। मुर्गा-मुर्गी सोई भड़याई से ला के धर लए गए। सबने कई के अब ब्याओ सुरू करो जाए। जा सुन के लड़इया ने लालटेन जलाबे की कोसिस करी। पर ऊको जे ने पतो रओ के लालटेन जलाई कैसे जात आए। ऊने भौतई कोसिस करी। इत्ती कोसिस के कोसिस करत-करत भुनसारो हो गओ। तनक देर में भुनसारो सोई ढरक गओ औ दुफारी हो गई। लालटेन ने जलनी ती, ने जली। लड़इया बी थक गओ हतो। मगर करे सो का करे। अब तो ऊकी इज्जत पे बन आई हती। धूप सोई चटक रई हती। इत्ते में कऊं से तनक से बदरा घिर आए, बिजुरिया चमकन लगी औ पानी बरसन लगो। लड़इयन समेत सबरे लड़यों ने कई के ‘‘पानी में भींगबे से अच्छो आए के अब बढ़ लओ जाए। ब्याओ कोनऊं औ दिनां कर लइयो।’’
‘‘तुम ओरें औ फुर्रा आओ! तुमें पतो नइयां के अबई भोलेबाबा ने हमसे कई आए के लड़इयों को ब्याओ इंसानों की लालटेन में नईं होत आए। तुमाए लाने तो हम घाम में बिजली चमकाहें औ पानी बरसाहें। इत्तोई नईं, तुम ओरन के ब्याओ के लाने इंदर भगवान अपनों रंग-बिरंगो धनुष से आसमान सजा देहें। सो जल्दी करो औ ब्याओ कर लेओ।’’ चतुरा लड़इया ने अपनो दिमाग चलाओ औ सबई खों मनगढ़ंत किसां सुना दई। मजे की बात जे के सबरे ऊकी बात में आ बी गए। काए से के ईके पैले उन्ने कभऊं जा सब पे ध्यान ई ने दओ रओ। उनें पतो ई नईं हतो के घाम के संगे बिजुरी बी चमकत आए औ पानी बरसत भए इन्द्रधनुष सोई दिखान लगत आए। काए से के बे ओरे ज्यादातर दिन में सोत रैत्ते और रात के टेम पे शिकार औ भड़याई के लाने निकरत्ते। सो उने बी लगो के जा सांची कै रओ। जरूर भोलेबाबा ने ईको बताओ हुइए। तभई तो घाम में पानी बरस रओ।
फेर का हतो, तुंरतईं लड़या औ लड़इयन को ब्याओ हो गओ। ओई समै से सबरे लड़इयन ने तै करो के अब जब बी घाम के संगे बिजुरी चमक के पानी बरसहे, मनो झला परहे तभईं लड़यां हरें अपनो ब्याओ किया करहें।
सो जे हती किसां लड़यों के ब्याओ के महूरत की।
लेकन आजकाल का हो रओ के 15 जून तो कब को कढ़ गओ मनो बरसात ने आई। बाकी कभऊं-कभऊं झला आ जात आए। सो लड़यों को ब्याओ हो जात आए। मनो अब बरसात आबे में इत्ती देर होन लगी आए औ घाम के झला इत्ते बार आत-जात आएं के हमें लगत के अब तक तो सबरे लड़यों को ब्याओ हो गओ हुइए। औ बरसात आत-आत सो उनकी मोड़ा-मोड़ी उनके अंगना में खेलन लगहें। जा मौसम की देरी कऊं लड़इयों की जमात ने बढ़ा दे। पता परी के पैले तो लड़इयां गांव में घुसत्ते औ अब सहर में सोई घुसन लगे।
मनो जे बी आए के सहर में जंगल वारे लड़इयों की दाल ने गलहे। काए से के इते राजनीति वारे मुतके लड़या कैमरा की लाइटें चमकवात भए फिरत रैत आएं। औ कऊं कोनऊं लड़या कोऊ टीवी के न्यूज चैनल वारे से टकरा गओ तो समझो के हो गओ ऊको बेड़ो गरक। ऊकी घींच पकर के ऊसे सवाल बी पूंछहें औ ऊको बोलन बी ने दैंहे। खैर, जे सब छोरो, आप ओरे जब देखियो के घाम निकरो औ पानी बरस रओ तो समझ जाइयो के लड़इयों को ब्याओ हो रओ।
बाकी बतकाव हती सो बढ़ी गई, हड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हप्ता करबी बतकाव तब तक लौं जेई की जुगाली करो। मनो सोचियो जरूर के लड़या बी तभई लौं हैं, जब लौं जंगल बचे हैं। जो जंगल ने बचहें तो लड़इन को का हुइए? बे कां जीहें?
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बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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