Sunday, February 13, 2022

नक़ाब के ज़माने में हिज़ाब का हल्ला | व्यंग्य | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नवभारत

मित्रो, प्रस्तुत है आज "नवभारत" के रविवारीय परिशिष्ट "सृजन" में प्रकाशित मेरा व्यंग्य लेख "नक़ाब के ज़माने में हिज़ाब का हल्ला" ...😀😊😛
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व्यंग्य 
नक़ाब के ज़माने में हिज़ाब का हल्ला
- डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
     क़सम से! कोरोना वायरस को किसी ने यदि उकसाया है तो वह है वायरल करने की हमारी प्रवृत्ति ने। कोई सेलीब्रिटी छींक भी दे तो वह पोस्ट वायरल हो जाती है। इंटरनेट में वायरल होना एक जुनून है। इसीलिए जब कोरोना वायरस ने देखा और सोचा कि ‘‘इंसानों को वायरल होने का शौक़ चढ़ा हुआ है तो ज़रा अपुन भी वायरल हो कर दिखा दें। अपुन तो वायरस हैं ही।’’ मजे की बात तो ये है कि वायरल होने की इस दौड़ में कोरोना थक कर अपना बोरियर-बिसतर समेटने की तैयारी में लग गया है लेकिन इंसान नहीं थके हैं। आजकल जिधर देखो ‘‘हैशटैग हिज़ाब’’ ही दिखाई देता है। इन दिनों ‘‘हैशटैग हिज़ाब’’ इतना ट्रेंड कर रहा है कि अगर यह शेयर बाज़ार के सेंसेक्स के कांटे पर खड़ा हो जाए तो एक ‘‘बूम’’ के साथ कांटा टूट जाए। खैर, बहती गंगा में सभी हाथ धोते हैं। मुझे लगा कि भैयाजी इस मामले में पीछे थोड़े ही रह सकते हैं, उन्होंने भी शाम-सवेरे ‘‘हैशटैग हिज़ाब’’ पर एक न एक पोस्ट डालने का मोर्चा सम्हाल रखा होगा।
‘‘भैयाजी! कैसा चल रहा है आपका हैशटैग हिज़ाब?’’ भैयाजी जैसे ही मिले, वैसे ही मैंने एक टीवी रिपोर्टर की भांति उन पर प्रश्न का गोला दाग़ दिया।
‘‘काहे का हैशटैग हिज़ाब? इस पल्टी मारती ठंड में खिज़ाब लगाना तक तो मुश्क़िल हो रहा है और आप पूछ रही हैं हिज़ाब के बारे में!’’ भैयाजी अपने सफ़ेद हो चले बालों पर हाथ फेरते हुए बोले।
‘‘अरे वाह, ये कैसी बात कर रहे हैं आप? आप तो हर ट्रेंड करते मुद्दे के साथ गलबहियां डाल कर खड़े रहते हैं, फिर इस बार यह अनमनापन क्यों?’’ मुझे जिज्ञासा हुई। कहीं कोई जेंडर डिस्कोर्स का मामला तो नहीं है? वैसे भैयाजी स्त्री-अधिकारों के पक्के समर्थक हैं। अतः उनसे ऐसी उम्मींद तो नहीं है। फिर भी मैंने पूछ लिया-‘‘क्यों भैयाजी, ये महिलाओं का मुद्दा है, इसलिए आप हिचक रहे हैं क्या?’’
‘‘कैसी बात कर रही हैं आप? आप तो जानती हैं कि महिलाएं पीछे रह जाएं पर मैं उनके हक में पहले खड़ा मिलता हूं। मगर इस मुद्दे में दो पेंच हैं।’’ भैयाजी ने चिंतन की मुद्रा में कहा।
यह सुन कर मैं खुश हुई कि मेरा तीर सही निशाने पर लगा। अब हिज़ाब मामले में भैयाजी की उदासीनता के असली कारण का पता चलेगा। 
‘‘तो अब बता भी दीजिए कि आपकी चुप्पी का कारण क्या है? अभी पिछले दिनों उत्तर प्रदेश के चुनाव पर तो आपने ऐसे कूद-कूद कर टिप्पणियां पोस्ट कीं जैसे चुनाव उत्तर प्रदेश में नहीं वरन अपने मध्यप्रदेश में हो रहे हों। जबकि हिज़ाब के मामले में तो अपने मध्यप्रदेश में भी बोल-बच्चन हो रहा है और आप चुप हैं। उस पर आप कह रहे हैं कि इस मुद्दे में दो पेंच हैं?’’ मैंने भैयाजी को ज़रा और उकसाया।
‘‘बिलकुल! इसमें दो पेंच हैं। पहला पेंच तो ये कि अपने पढ़ाई-लिखाई की उम्र में विद्यार्थियों को ऐसे विवाद में पड़ना ही नहीं चाहिए। उस पर दूसरा और सबसे बड़ा पेंच ये है कि अभी नक़ाब यानी मास्क के दिन लदे नहीं हैं कि हिज़ाब की चिंता में लोग दुबले होने लगे। पिछले डेढ़-दो साल से हर मौसम में नक़ाब लगा-लगा कर चेहरे की रंगत ही दो रंगी हो गई है। पिछली गर्मियों का सनबर्न अभी तक ठीक नहीं हुआ है। मास्क न लगाओ तो भी ऐसा दिखता है कि मास्क लगा हुआ है। ये देखो, मास्क वाला हिस्सा गोरा है जबकि बाकी काला पड़ गया है। देखो, ठीक से देखो!’’ भैयाजी ने अपना चेहरा मेरे आगे कर दिया। उनकी बात सही थी। उनका बदरंगा चेहरा देख कर मुझे भी अपने चेहरे पर दया आने लगी। मेरे चेहरे की दशा भी उनसे अलग नहीं है। 
‘‘आपने सही कहा।’’ मैंने उनकी बात का दिल से समर्थन किया। 
‘‘आई एम आॅलवेज़ राईट!’’ भैयाजी को शान आ गई। वे सोशल मीडिया के क्रंातिकारी नेता की तरह बोल उठे,‘‘अरे, सिर-चेहरा ढंाकने का जो मुद्दा उठाना था उसके लिए थोड़ी प्रतीक्षा की जानी चाहिए थी। अभी तो नक़ाब से ही पीछा नहीं छूटा है। और आप बुरा मत मानिएगा शरद जी, इस नका़ब यानी मास्क के पहले भी तो बालिकाएं चेहरे पर लंबा दुपट्टा बांध कर अरेबियन बनी घूमती थीं। जैसे उन्हें अक्षय कुमार के ‘बुर्ज़ ख़लीफा’ पर अपना हवाईजहाज लैण्ड करना हो। अब आप ही बताइए कि धूप से और कभी-कभी अपने घर वालों से छिपने के लिए ही सही लेकिन रहती तो पर्दे में ही थीं। तो फिर अब हंगामा क्यों? फिर वो वाला पर्दा धर्म निरपेक्ष था। वह हर धर्म की बालिकाओं के चेहरे पर होता था।’’ भैयाजी की भावनाएं वायरल होने की दिशा में बहकने लगीं। सो, मैंने उन्हें टोका।
‘‘बस-बस, भैयाजी! आप अब धर्म-वर्म की बातें मत करो। ये कोई चुनाव क्षेत्र नहीं है और न आप किसी राजनीतिक पार्टी से हो। आपको ऐसी बातें शोभा नहीं देतीं। आप तो इस मुद्दे पर ही अपना पक्ष तय नहीं कर पा रहे हो कि स्कूलों में छात्राएं हिज़ाब लगा सकती हैं या नहीं?’’ मैंने उन्हें आगाह किया।
‘‘ठीक है, अभी मैंने अपना पक्ष तय नहीं किया है। जिधर का पलड़ा भारी दिखेगा, उधर का रुख कर लूंगा।’’ भैयाजी बोले।
‘‘यानी अवसरवादिता!’’
‘‘जी हां, अवसरवादिता ही तो है जो हारी हुई पार्टी के होनहारों को विजयी पार्टी के पाले में पहुंचने की प्रेरणा देती है और उन्हें कैबिनेट मिनिस्टर तक बनवा देती है। फिर मैं भी अवसरवादी क्यों न बनूं? बाकी, इसलिए तो मुझे बालिकाओं की नासमझी पर दुख हो रहा है कि नक़ाब के ज़माने में हिज़ाब का किस्सा छेड़ कर उन्होंने ज़ल्दबाज़ी से काम लिया है। अरे, कोरोना वायरस को पूरी तरह से टाटा-टाटा, बाय-बाय तो कर लेने देतीं।’’ भैयाजी ने ऐसा उदासा मुंह बना कर कहा कि मुझे हंसी आ गई।
‘‘हंस लीजिए, हंस लीजिए! आपकी हंसी भर सुनाई दे रही है, हंसता हुआ मुंह तो दिख नहीं रहा है।’’ भैयाजी भी चिढ़ाते हुए बोले,‘‘इस जमाने में तो नक़ाब और हिज़ाब सब बराबर हैं, सिर्फ़ दिखता है तो खि़ज़ाब!’’
जी हां, भैयाजी की बात में दम तो है। है न!  
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(नवभारत, 13.02.2022)
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