Wednesday, March 8, 2023

होली पर व्यंग्य | लला, सम्हर के आइयो खेलन होरी | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | दैनिक भास्कर

मित्रो,  आज "दैनिक भास्कर" में प्रकाशित  मेरा यह व्यंग्य लेख ...
"लला ! सम्हर के आइयो खेलन होरी !"
🎉हार्दिक धन्यवाद #दैनिकभास्कर 🙏🎉
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व्यंग्य
*लला ! सम्हर के आइयो खेलन होरी !*
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह 

"होली है!"
"नारीशक्ति ज़िन्दाबाद !!"
इसे कहते हैं नेचुरल जस्टिस अर्थात प्राकृतिक न्याय। मेरी महिला विंग बड़ी खुश है कि इस बार होली और अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस एक साथ, एक ही दिन मनाया जा रहा है। सो, इस बार कुछ हिसाब-किताब बराबर होने वाले हैं। मुझे तो लगता है कि उस जमाने में भी ऐसा ही चमत्कारी संयोग पड़ा होगा जब एक गोरी को छलिया कृष्ण उर्फ़ गोविंद से हिसाब बराबर करने का मौका मिला था। वह होली की तिथि थी जिसने यह सुनहरा मौका दिया, वरना हमेशा गोपीयों को ही सारी मुसीबतें झेलनी पड़ती थीं। कभी माखन चुराना, कभी गगरी फोड़ना, कभी नहाती हुई गोपियों के कपड़े छुपा देना - इस तरह न जाने कितना परेशान करते रहे श्रीकृष्ण बेचारी गोपियों को। इसीलिए होली के दिन गोपियों ने भी बदला ले ही लिया। यानी एक गोपी ने कृष्ण को मज़ा चखा दिया। यक़ीन न आए तो कवि पद्माकर की यह पंक्तियां पढ़ लीजिए -
फागु के भीर अभीरन तें गहि, गोविंदै लै गई भीतर गोरी ।
भाय करी मन की पदमाकर, ऊपर नाय अबीर की झोरी ॥
छीन पितंबर कंमर तें, सु बिदा दई मोड़ि कपोलन रोरी ।
नैन नचाई, कह्यौ मुसक्याइ, लला ! फिर खेलन आइयो होरी ॥
      अपनी दुर्गति के बाद लला गोविंद को दुबारा होली खेलने जाने की हिम्मत नहीं हुई होगी और अगर गए भी होंगे तो बड़े सलीके से होली खेली होगी। यहां एक राज़ की बात बता दूं मैं कि यह ब्रज की गोपी नहीं बल्कि बुंदेलखंड की गोपी थी। इसीलिए उसने ईट का जवाब पत्थर से दिया और कृष्ण को न केवल रंग लगाया बल्कि उनका पीतांबर भी छीन लिया।
      तो प्यारे भाइयो, जीजाओं, देवरों, अंकलों और मित्रो ! होली के बहाने महिलाओं को परेशान करने का अगर मूड बना रहे हैं तो अपने उस मूड को भेज दीजिए तेल लेने। इस बार होली में हम महिलाएं भी अपने पूरे मूड में हैं। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस ने  हमें जोश से भर रखा है और हमने तय कर रखा है कि होली के बहाने जो 'हमसे टकराएगा, चूर-चूर हो जाएगा!', नहीं, ये थोड़े ओल्ड फैशन की बात हो गई। दरअसल हमने यह तय किया है कि "हमसे जो टकराएगा, फ्रेंडशिप से ब्लॉक कर दिया जाएगा"। ज़रा सोचिए कि ये भला क्या बात हुई कि गुझियां, खुरमा, पपड़ियां हम बनाए और आप सब भंग चढ़ा कर हमारे अच्छे-खासे रंग को भंग करने लगें, इस बार ये नहीं चलेगा! नो! नेवर ! यूं भी जो सोशल मीडिया की फ्रेंडशिप में ब्लॉक कर दिया जाता है उसकी लाइफ अपने आप चूर-चूर हो जाती है। सो, हम महिलाओं की "न" को "न" ही समझिए, यदि हमारी "न" को "हां" समझने की भूल करेंगे तो इस बार बचने वाले नहीं हैं। 
        और हां, एक और वार्निंग है! "बुरा न मानो होली है" के जुमले को अगर ज़बरदस्ती थोपते हुए रबर बैंड की तरह खींचकर अनलिमिटेड करने की कोशिश की तो टॉक टाईम तुरंत समाप्त समझिए!
       अगर कहीं ओवर स्मार्ट हुरियारे बनने की कोशिश की तो महिला पुलिस विंग भी डंडों में रंग-गुलाल वाला तेल लगा कर तैयार है। सो,  लला ! सम्हर के आइयो खेलन होरी ! बाकी मेरी तो यही सलाह है कि-

होली खेलें खूब, पर, रहे हमेशा ध्यान।
हुल्लड़ में होवे नहीं, नारी का अपमान।।
नारी का अपमान करे वह नहीं बचेगा
उसके चेहरे पर, फिर काला रंग रचेगा।।
गांठ बांध लो सीख "शरद" कहती है मानो।
हो जाओगे 'ब्लॉक' यक़ीनन ये तुम जानो।।

 ।।अच्छी होली, सच्ची होली ! हैप्पी होली! ।।
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