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Monday, January 18, 2021

दैनिक जागरण, नईदुनिया के सप्तरंग परिशिष्ट में मेरे उपन्यास ‘‘शिखण्डी’’ की वरिष्ठ समीक्षक राजेन्द्र राव जी द्वारा की गई समीक्षा - डाॅ शरद सिंह


Shikhandi, Novel of Dr Sharad Singh - Review in Dainik Jagran, Saptrang, Punarnava, 18.01.2021 by Rajendra Rao
Shikhandi, Novel of Dr Sharad Singh - Review in Jagaran, Naidunia, Satrang Punarnava, 18.01.2021 by Rajendra Rao

 आज दिनांक 18.01.2021 को दैनिक जागरण, नईदुनिया के सप्तरंग परिशिष्ट में मेरे उपन्यास ‘‘शिखण्डी’’ की वरिष्ठ समीक्षक राजेन्द्र राव जी द्वारा की गई समीक्षा प्रकाशित हुई है। 
https://epaper.naidunia.com/mepaper/18-jan-2021-74-indore-edition-indore-page-10.html


ब्लाॅग पाठकों की पठन-सुविधा हेतु प्रकाशित समीक्षा लेख जस का तस मैं यहां टेक्स्ट रूप में प्रस्तुत कर रही हूं- 

"डाॅ. शरद सिंह हिंदी के उन विरल कथाकारों में हैं, जो लेखन पूर्व शोध में संलग्न होते हैं। यह कृति विरल कथासागर महाभारत से एक अनोखे चरित्र के जीवन और संघर्ष को पर्त-दर-पर्त उद्घाटित करती है, एमदम नए नज़रिए और नए अंदाज़ से।

काशी नरेश की ज्येष्ठ पुत्री अंबा और उसकी दो बहनों का अपहरण भीष्म द्वारा बलपूर्वक किए जाने के और कुरु वंश के राजकुमारों से विवाह किए जाने को सहन न करने और प्रतिकार करने के बाद वह निस्संग और निरुपाय हो कर भी अपने साथ हुए अन्याय का प्रतिशोध लेने की प्रतिज्ञा करती है और इसके लिए उसे किस तरह तीन जन्म और स्त्री-पुरुष दोनों के चोले धारण करने पड़ते हैं, इसका उद्देश्यपूर्ण और रोचक चित्रण इस उपन्यास में हुआ है। अंत होते-होते इसका वैचारिक पक्ष सघन स्त्रीविमर्श के रूप में सामने आता है जो पाठक को सहज ही स्वीकार्य हो सकता है। यूं तो शिखंडी की कथा युग-युग से सुनी जाती रही है परंतु इसे मानवीय और समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से कहा जाना एक अभिनव प्रयोग है।"

- राजेन्द्र राव

दैनिक जागरण (सप्तरंग), नईदुनिया (सतरंग) साहित्यिक पुनर्नवा, 18.01.2021


हार्दिक धन्यवाद आदरणीय राजेन्द्र राव जी 🌹🙏🌹

हार्दिक धन्यवाद नईदुनिया 🌹🙏🌹

Shikhandi Novel of Dr (Miss) Sharad Singh



Thursday, June 25, 2020

बुंदेलखंड में आज भी कमी है महिला उद्योगों की - डॉ.(सुश्री) शरद सिंह


Dr (Miss) Sharad Singh
दैनिक जागरण में प्रकाशित मेरा यह लेख ... आप भी पढ़िए...
हार्दिक आभार "दैनिक #जागरण"🙏
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विशेष लेख

बुंदेलखंड में आज भी कमी है महिला उद्योगों की 
- डॉ.(सुश्री) शरद सिंह

     वे सिर पर दो-दो, तीन-तीन घड़े उठाए चार-पांच किलोमीटर जाती हैं और अपने परिवार की प्यास बुझाने के लिए सिर पर पानी ढो कर लाती हैं। पहाड़ी या घाटी भी इनका रास्ता रोक नहीं पाती है। बढ़ते अपराध और सूखे की मार भी इन्हें डिगा नहीं पाती है। कोरोना भी इन्हें अपने परिवार के लिए मेहनत करने से नहीं रोक पाया है। जीवट हैं बुंदेलखंड की महिलाएं। बुंदेलखंड में महिलाएं घर-परिवार की अपनी समस्त जिम्मेदारियां निभाती हुई अपने परिवार के पुरुष सदस्यों का हाथ खेतीबारी में बंटाती आ रही हैं। दोहरी-तिहरी जिम्मेदारी के तले दब कर भी उफ न करने वाली बुंदेली महिलाओं के लिए मुसीबतों की कमी कभी नहीं रही। देश की आजादी के अनेक दशक बाद भी बुंदेली महिलाओं में साक्षरता का प्रतिशत कम है। उन्हें झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की गाथाएं तो हमेशा सुनाई और रटाई गईं किन्तु लक्ष्मीबाई जैसी शिक्षा, आत्मरक्षा कौशल अथवा आर्थिक संबल उन्हें प्रदान नहीं किया गया। फिर भी यह बुंदेली महिलाओं की जीवटता थी कि वे बीड़ी निर्माण, वनोपज संग्रहण आदि के द्वारा अपने परिवार की हरसंभव आर्थिक मदद करती रही हैं। लेकिन अब बीड़ी उद्योग और वनोपज संग्रहण के क्षेत्र में आमदनी के अवसर कम हो चले हैं। बीड़ी उद्योग तो स्वयं ही घाटे में चल रहा है। विगत दो-तीन वर्ष में सात से अधिक बीड़ी कारखाने बंद हो गए। 
Dainik Jagaran, Article of Dr (Miss) Sharad Singh, 25.06.2020
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    महिला सशक्तीकरण की दिशा में अभी और प्रयास किये जाने की जरूरत है, ताकि महिलाओं को रोजगार के अवसरों में वृद्धि हो और ज्यादा संख्या में महिला उद्यमी तैयार करने लायक माहौल बन सके। सरकारों को समझना होगा कि देश में महिला श्रमशक्ति की भागदारी बढ़ाने के लिये महिलाओं को क्षमता विकास प्रशिक्षण उपलब्ध कराने को बढ़ावा देने, देश भर में रोजगार के अवसर उत्पन्न करने, बड़ी संख्या में चाइल्ड केयर केन्द्र स्थापित करने तथा केन्द्र एवं राज्य सरकारों द्वारा हर क्षेत्र में महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने सम्बन्धी प्रयास किया जाना बेहद जरूरी है।
आर्थिक पिछड़ेपन का दृष्टि से जो स्थान भारत के मानचित्र में उत्तर प्रदेश तथा मध्य प्रदेश का है, वही स्थिति झांसी तथा सागर सम्भाग के जनपदों के दतिया-ग्वालियर सहित है। यहां पर विकास की एक सीढ़ी चढ़ना दुभर है। बुंदेलखंड का प्रत्येक ग्राम भूख और आत्महत्याओं की करुण कहानियों से भरा है। बुंदेलखंड में महिलाओं की शिक्षा एवं आर्थिक विकास की क्रियाओं में भागेदारी भी अपेक्षाकृत न्यून है। इस स्थिति में यदि गांवों का औद्योगीकरण करना है तो पहले महिलाप्रधान ग्रामोद्योग को बढ़ावा दिया जाना जरूरी है। इसके लिए बाहर से उद्योगपति को गांव में आमंत्रित करने की आवश्यकता ही नहीं है। इस काम के लिए महिलाओं को ही सक्षम बनाना पर्याप्त होगा। समूह आधारित सहकारिता के माध्यम से यह काम बखूबी किया जा सकता है। बुंदेलखंड के बाहर के क्षेत्रों में महिलाओं द्वारा खड़े किए सेवा बैंक और लिज्जत पापड़ तो इसके अनुकरणीय उदाहरण हैं। 
मध्यप्रदेशीय बुंदेलखंड में भी महिलाओं को अपने पैरों पर खड़ा करने व प्रदेश के क्षेत्रीय असंतुलन को दूर करने के लिए शासन ने महिलाओं को उद्योगों में बढ़ावा देने के लिए समय-समय पर कई कदम उठाए गए। महिला उद्यमी प्रोत्साहन योजना- 2013 के तहत औद्योगिक इकाई लगाने वाली महिलाओं को ऋण पर छूट प्रदान की जाने लगी। लेकिन बुंदेलखंड में उद्योगों में महिलाओं की भागीदारी बहुत कम है। इसे तथ्य को ध्यान में रखते हुए मध्यप्रदेश शासन ने उद्योगों में महिलाओं को प्राथमिकता देने का निर्णय लिया। महिलाओं को गुह एवं लघु उद्योग के लिए ऋण दिए जाने का प्रावधान रखा गया। बुंदेलखंड में लागू इस योजना मेें ऋण लेकर उद्यम लगाने वाली महिलाओं को पांच प्रतिशत की दर से एक साल में अधिकतम पचास हजार और पांच साल में ढाई लाख रुपये ब्याज में छूट देने का प्रावधान किया गया। लेकिन यहां भी आड़े आ गई साक्षरता की कमी। एक सबसे बड़ी बाधा यह भी है कि पुरुषसत्तात्मक बुंदेलखंड में आज भी महिलाओं को स्वनिर्णय का अधिकार पूरी तरह नहीं मिल सका है, विशेषरूप से आर्थिक मामलों में। जिस प्रकार राजनीतिक क्षेत्र में पंच, सरपंच, पार्षद आदि स्तर पर महिलाएं रबर स्टैम्प की भांति पदासीन रहती हैं और उनके सारे राज-काज उनके पति यानी पंचपति, सरपंचपति, पार्षदपति सम्हालते हैं उसी प्रकार आर्थिक क्षेत्र में महिलाओं को सरकार द्वारा अनेक योजनाओं के अंतर्गत दिए जाने वाले ऋण एवं लघु उद्योग का वास्तविक संचालन महिलाओं के हाथों में न हो कर उनके परिवार के पुरुषों अथवा उनके पति के हाथ में होता है। इसीलिए बुंदेलखंड में महिलाओं के लिए उस प्रकार के उद्योगों की विशेष आवश्यकता है जो पूर्णरूप से महिलाओं द्वारा संचालित हों और जिनमें महिलाओं को निर्णय लेने का पूरा अधिकार हो। इस प्रकार के उद्योगों की स्थापना से ही बुंदेली महिलाओं में आर्थिक आत्मनिर्भता को बढ़ावा मिल सकेगा और वे बुंदेलखंड के आर्थिक विकास में अपना भरपूर योगदान दे सकेंगी।   
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(दैनिक जागरण में 25.06.2020 को प्रकाशित)
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