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Tuesday, February 17, 2026

पुस्तक समीक्षा | कहन के नए सलीकों की ग़ज़लें हैं “लम्हों की तपिश” में | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण


पुस्तक समीक्षा
कहन के नए सलीकों की ग़ज़लें हैं “लम्हों की तपिश” में
- समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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ग़ज़ल संग्रह- लम्हों की तपिश
कवि - अमन मुसाफ़िर
प्रकाशक - नीरज बुक सेन्टर 109-ए, पटपड़गंज गाँव, दिल्ली-110091
मूल्य - 250/-
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20 जुलाई 1999 को उत्तर प्रदेश की बरेली के बहरोली में जन्मे मात्र 27 वर्ष के अमन कुमार उर्फ़ अमन मुसाफ़िर की ग़ज़लों में जो गहराई और नयापन है वह उन्हें ग़ज़लकारों की आम पंक्ति से अलग खड़ा करता है।
अमन मुसाफ़िर ने बी. एससी. (ऑनर्स) भौतिकी (किरोड़ीमल कॉलेज, दिल्ली विश्व विद्यालय) से, एम.ए. हिन्दी (इग्नू), डिप्लोमा इन ट्रांसलेशन (अंग्रेजी-हिंदी), एकल विषय (संस्कृत) में द्विवर्षीय प्रमाणपत्र हासिल किया है। नेट-जेआरएफ (हिन्दी) उत्तीर्ण पीएचडी (हिन्दी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय) से।
    उनका एक ग़ज़ल संग्रह 'हवा में आग' इसके पूर्व प्रकाशित हो चुका है। राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय पत्रिकाओं में अनेक शोध-पत्र प्रकाशित हुए हैं।
   अमन मुसाफ़िर अपनी अभिव्यक्ति को लेकर पूर्णतया आश्वस्त हैं। जब कोई शहर अपनी शायरी को लेकर स्वयं पर भरोसा करता है तो उसकी शायरी अधिक मुखर और संवादी साबित होती है।  “अपनी बात” में वे अपने  इस नए ग़ज़ल संग्रह की ग़ज़लों के बारे में लिखते हैं कि “शायरी जब महफ़िलों की वाहवाही से निकलकर सड़क के सन्नाटों और रसोइयों के धुएँ तक पहुँचती है तब वह सिर्फ़ 'शायरी' नहीं रहती, वह समय का 'दस्तावेज़' बन जाती है। 'हवा में आग' के बाद मेरे दूसरे ग़ज़ल-संग्रह 'लम्हों की तपिश' को पाठकों के हाथों में सौंपते हुए मुझे कुछ वैसी ही अनुभूति हो रही है जैसे कोई अपने 'जले हुए पलों' की राख और 'सुलगते हुए ख़्वाबों' की चिंगारी किसी अपने के हवाले कर रहा हो।
इस संग्रह का नाम 'लम्हों की तपिश' अनायास नहीं है। जीवन साल या महीनों में नहीं बल्कि उन गिने-चुने लम्हों में जिया जाता है जो हमारे ज़हन पर अपनी छाप छोड़ जाते हैं। कभी वह छाप प्रेम के किसी बेहद नाजुक पल की 'गुनगुनी तपिश' होती है तो कभी व्यवस्था के ख़िलाफ़ उपजे आक्रोश की 'झुलसा देने वाली आँच'। यह किताब इन्हीं दोनों छोरों के बीच तनी हुई एक रस्सी है जिस पर एक शायर नंगे पाँव चल रहा है।”
     अर्थात शायर को फता है कि वह क्या लिख रहा है और क्यों लिख रहा है। अपनी अभिव्यक्ति को लेकर उसके मन में किसी तरह का भी संशय नहीं है।
     अमन मुसाफ़िर ने यह भी लिखा है कि “मैंने कोशिश की है कि मेरी ग़ज़लें झूठी तसल्लियों का झुनझुना न बनें। इसीलिए जहाँ एक ओर मैंने लिखा है कि "पत्थर को मत पूजो अब, पत्थर को औज़ार करो", वहीं दूसरी ओर मैंने उस मानवीय पीड़ा को भी जगह दी है जहाँ इंसान "भीड़ में चलकर भी तन्हा" रह जाता है। यह संग्रह उस आदमी की आवाज़ है जो प्रेम में टूटकर भी जुड़ना जानता है और जो सिस्टम से टूटकर भी लड़ना जानता है।”
      'लम्हों की तपिश' में कुल 110 ग़ज़लें हैं। इन ग़ज़लों में आमजीवन से उठाए गए बिम्ब हैं जो चौंकाते हैं गुदगुदाते हैं और मन के साथ-साथ विचारों को भी आंदोलित कर देते हैं। इसका उदाहरण संग्रह की पहली गजल में ही देखिए की किस खूबी से शायर पेड़, पौधे, फूल और पंछी की बात करते-करते दाल, चावल, साग रोटी तक जा पहुंचता है-
पेड़ पौधे फूल पंछी पत्तियों की बात कर
दाल चावल साग रोटी सब्ज़ियों की बात कर

आदमी की भूख ने बर्बाद कितने कर दिए
जंगलों को खा गयीं हैं कुर्सियों की बात कर

अब पुनः बरसात में बह जाएगी यह झोपड़ी
गर्मियाँ तो काट लेंगे सर्दियों की बात कर

धीरे-धीरे आग नफ़रत की जला देगी इन्हें
हस्तियाँ आधार इसका पीढ़ियों की बात कर
    अमन मुसाफ़िर अपनी ग़ज़लों में उस हुनर के साथ खेलते हैं जिसमें कहां जाता है कि एक ग़ज़ल का हर शेर अपने आप में मुक़म्मल होता है और दूसरा शेर बिल्कुल ही अलग मिजाज़ का हो सकता है। उदाहरण के लिए एक गजल के यह कुछ शेर देखिए-
जब सबने लगाया ही था आवास में बिस्तर
हिस्से में मेरे आया है फिर घास में बिस्तर

तकिया भी लिपट रो रहा दर्दों में हो शामिल
आकर ये सिमट बैठा मेरे पास में बिस्तर

बिस्तर को बताया कि वो आयेंगे दोबारा
शरमा रहा इस प्यार के एहसास में बिस्तर
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अमन मुसाफ़िर किसी एक बिंदु पर नहीं टिकते हैं। उनकी दृष्टि का संसार विस्तृत है। वे अंतर्मन से बाहिर्संसार तक निरंतर अवलोकन करते हैं और फिर ग़ज़ल कहते हैं। तीखी चोट करने वाली यह उनकी ग़ज़ल, इसके कुछ  शेर देखिए-
दिन में फ़सलें रात को भूख उगाता है
सब कहते वह भारत-भाग्य विधाता है

उसके चेहरे की ख़ामोशी है रोती जब मज़दूरी करके वापस आता है

'धनिया' दिन भर बैठी रहती है भूखी
'होरी' अपनों से ही धोखा खाता है
       नए छत के बिंबो को चुना और उन्हें अपनी गजलों में पिरोना अमन मुसाफिर के लिए मनु बहुत सहज कार्य है वह इतनी सहजता से नूतन बिंदुओं का प्रयोग करते हैं कि उन्हें पढ़कर यही लगता है कि इससे बढ़कर सटीक और कोई बम हो ही नहीं सकता था जैसे अपनी एक ग़ज़ल में उन्होंने “यादों का राशन” का बड़ी खूबसूरती से प्रयोग किया है। इसी गजल में “प्रमोशन” शब्द का भी बेहतरीन प्रयोग है -
मूर्छित एक ख़्वाब जीवन चाहता है
आपकी साँसों की धड़कन चाहता है

भूख से रोता हुआ मेरा हृदय ये
आपकी यादों का राशन चाहता है

तन को दफ़्तर में रखो मंजूर लेकिन
मन हमारा अब प्रमोशन चाहता है
    इस डिजिटल युग में सबसे बड़ी चिंता का विषय बना हुआ है सोशल मीडिया में युवाओं का डूबे रहना। सोशल मीडिया में उलझे युवाओं के जीवन का दिलचस्प विश्लेषण किया है अमन मुसाफ़िर ने अपनी इस ग़ज़ल में-
वो गिन रहा कमेंट बचा ये ही काम है
डिजिटल सदी का एक यही तो पयाम है

प्रोफ़ाइलों में साथ दिलों में नहीं हैं साथ
एक दूसरे के प्यार का कोई न दाम है

स्क्रीन पर ही कटते हुए जाए जिंदगी
मिलती नहीं है फुर्सतें कैसी ये शाम है

मत खोज प्यार के ख़तों को रोज़-रोज़ तू
इनबॉक्स में जो आ गया वो ही इनाम है
      सच का साथ देना शायर को ज़रूरी लगता है। बल्कि वे पूरी निडरता के साथ अपनी अभिव्यक्ति के पक्ष में खड़े होते हैं, ठीक शायर अदम गोंडवी की तरह -
बात कड़वी है मगर स्वीकार है
ये ग़ज़ल मेरी नया हथियार है

सिर्फ लफ़्ज़ों का नहीं यह खेल अब
शेर में देखो 'अदम' की धार है।

देश को मिल कर यहाँ सब लूटते
चोर ही अब देश की सरकार है।

झूठ को ही सच बताता है सदा
बिक चुका पूरा यहाँ अखबार है।

आदमी की अब नहीं क़ीमत बची
हर तरफ़ बस झूठ का व्यापार है।
     दरअसल, कहन के नए सलीकों की ग़ज़लें हैं “लम्हों की तपिश” में। इस संग्रह की ग़ज़लें युवा शायर अमन मुसाफ़िर को साहित्य की दुनिया में विशेष स्थान दिलाने की पूरी संभावना व्यक्त करती हैं। संग्रह की ग़ज़लें अक्षरशः पठनीय हैं तथा चिंतन मनन के योग्य हैं।
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