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Wednesday, June 12, 2024

चर्चा प्लस | बहुत कुछ सिखाती है ‘खांडव वन दहन’ की घटना | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर

चर्चा प्लस   
बहुत कुछ सिखाती है ‘खांडव वन दहन’ की घटना
    - डाॅ (सुश्री) शरद सिंह                                                                                        
      हम प्रकृति को नुकसान पहुंचाते हैं। प्रकृति उदार है, वह हमें दंड नहीं देती। वह हमारे अपराधों को भूल भी जाती है, लेकिन हमारे ही अपराध हमें भविष्य में दंड देते हैं। इसका सबसे अच्छा उदाहरण महाकाव्य “महाभारत” में खांडव वन की प्रलयंकारी अग्नि की कथा के रूप में मौजूद है। खांडव वन को जलाने में दो मनुष्यों ने अग्नि की मदद की, लेकिन उनमें से एक को एक वन वृक्ष ने सुरक्षा प्रदान की। प्रकृति और मनुष्य में यही अंतर है। आज जब दुनिया के बड़े-बड़े जंगल हर साल जलकर राख हो रहे हैं, तो हमें इस कथा से सबक लेना चाहिए और जंगलों को जलने के लिए छोड़ने के बजाय उनके रक्षक बनना चाहिए। तो आइए एक बार फिर खांडव वन की कथा को याद करें ताकि हम उस गलती को दोहराने से बच सकें।
जब हम ‘‘महाभारत’’ पढ़ते हैं तो कृष्ण और अर्जुन को सत्य और मानवता के पक्ष में खड़ा पाते हैं। लेकिन खांडव वन की घटना को पढ़ते हुए हमें कुछ अजीब भी लगता है। इस कथा में प्रकृति और मानवीय व्यवहार में अंतर मौजूद है। अर्जुन ने एक पूरे जंगल को जलाकर राख करने में अग्निदेव की मदद की थी, जबकि इस घटना के बाद भी उसी अर्जुन को एक पेड़ ने अपना गांडीव धनुष छिपाने के लिए आश्रय दिया था। यही प्रकृति और मानवीय स्वभाव में अंतर है। प्रकृति उदात्त है जबकि मनुष्य स्वार्थी है। अपने स्वार्थ के कारण मनुष्य प्रकृति को नुकसान पहुंचाने से कभी नहीं चूकता है। तो एक बार फिर खांडव वन की कथा याद कीजिए।

महाभारत के आदिपर्व में खंडव वन दहन की घटना का उल्लेख मिलता है। महाभारत काल में खांडव वन या खांडवप्रस्थ यमुना के पश्चिमी तट पर पथरीली भूमि का एक ऊबड़-खाबड़ इलाका था जहां नागवंशी और असुर जाति के लोग रहते थे। एक तरह से खांडवप्रस्थ का हिस्सा होते हुए भी यह हस्तिनापुर का हिस्सा नहीं है और धृतराष्ट्र पर अन्याय का आरोप न लगे, इसके लिए पांडवों को खांडवप्रस्थ दे दिया गया, जो भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव को पसंद नहीं आया। जब राज्य के बंटवारे को लेकर कौरवों और पांडवों में कलह हो गई, तो मामा शकुनि की सिफारिश पर धृतराष्ट्र ने पांडवों को खांडवप्रस्थ नामक वन देकर कुछ समय के लिए शांत कर दिया। इस वन में एक महल था, जो खंडहर हो चुका था। अब पांडवों के सामने उस वन को नगर बनाने की चुनौती थी। खंडहर महल के चारों ओर भयंकर वन था। यमुना नदी के तट पर खांडव वन नामक बीहड़ वन था। पहले इस वन में एक नगर हुआ करता था, फिर वह नगर नष्ट हो गया और केवल उसके खंडहर ही बचे। खंडहरों के चारों ओर जंगल विकसित हो गया था।
एक बार जब भगवान कृष्ण और अर्जुन यमुना के तट पर घूम रहे थे, तो उनकी मुलाकात एक अत्यंत तेजस्वी ब्राह्मण से हुई। कृष्ण और अर्जुन ने ब्राह्मण को प्रणाम किया। उसके बाद अर्जुन ने कहा, ‘‘हे ब्रह्मदेव! आप पांडवों के राज्य में आए हैं, इसलिए आपकी सेवा करना हमारा कर्तव्य है। बताइए कि मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूं?’’
‘‘हे धनुर्धर अर्जुन! मुझे बहुत भूख लगी है। तुम मेरी भूख मिटाने का प्रबन्ध करो। किन्तु मेरी भूख साधारण भूख नहीं है। मैं अग्नि हूँ और इस खाण्डव वन को जलाकर अपनी भूख मिटाना चाहता हूँ। किन्तु इन्द्र मुझे ऐसा नहीं करने देते, खाण्डव वन में रहने वाले अपने मित्र तक्षक नाग की रक्षा के लिए वे मेघ वर्षा करके मेरे तेज को शान्त कर देते हैं और मुझे अतृप्त रहना पड़ता है। अतः जब मैं खाण्डव वन को जलाने लगूँ, तब तुम इन्द्र को मेघ वर्षा करने से रोक देना।’’ ब्राह्मण ने कहा।

‘‘हे अग्निदेव! मैं और मेरे मित्र कृष्ण भगवान इन्द्र से युद्ध करने की क्षमता रखते हैं, किन्तु हमारे पास उनसे लड़ने के लिए अलौकिक अस्त्र नहीं हैं। यदि आप हमें अलौकिक अस्त्र प्रदान करें, तो हम आपकी इच्छा पूरी कर सकते हैं।’’ अर्जुन ने कहा।
अग्निदेव ने तुरन्त वरुणदेव को बुलाया और राजा सोम द्वारा दिया गया गाण्डीव धनुष, अक्षय तूणीर, चक्र और वानर ध्वज सहित रथ अर्जुन को दिला दिया। तब अग्निदेव ने अपनी प्रचंड ज्वाला से खांडव वन को भस्म करना आरंभ कर दिया। खांडव वन से उठती हुई तीव्र ज्वालाओं से संपूर्ण आकाश भर गया और देवतागण भी दुखी हो गए। अग्नि की प्रचंड ज्वाला को बुझाने के लिए भगवान इंद्र ने भारी वर्षा आरंभ कर दी, परंतु श्रीकृष्ण और अर्जुन ने तुरंत ही अपने अस्त्रों से उन बादलों को सुखा दिया। क्रोधित होकर इंद्र अर्जुन और श्रीकृष्ण से युद्ध करने आए, परंतु उन्हें पराजित होना पड़ा। अग्निदेव की प्रचंड ज्वालाओं की ऊष्मा से व्याकुल होकर सभी वन्य जीव, जंतु अपनी जान बचाने के लिए इधर-उधर भागने लगे, परंतु श्रीकृष्ण के चक्र और अर्जुन के बाणों ने उन्हें भागने नहीं दिया।
दरअसल, इस कथा का आरम्भ होता है राजा श्वेतकी की लिप्सा से। श्वेतकी पराक्रम और बल में इंद्र के समान था। यज्ञ, दान और बुद्धि में पृथ्वी पर कोई भी उसकी बराबरी नहीं कर सकता था। श्वेतकी ने पांच महायज्ञ और अनेक छोटे यज्ञ किए। श्वेतकी ने इतने वर्षों तक यज्ञ किए कि एक समय ऐसा आया कि यज्ञ करने वाले पुरोहितों की आंखें निरंतर धुएं के कारण खराब हो गईं। बहुत कमजोर हो जाने के कारण वे राजा को छोड़कर चले गए और अब उसके यज्ञ में सहायता करने को तैयार नहीं थे। राजा ने कुछ अन्य लोगों की सहायता से यज्ञ पूरा किया। कुछ समय बाद राजा ने एक और यज्ञ करना चाहा जिसमें सौ वर्ष लगने थे। लेकिन वह इस यज्ञ को कराने के लिए किसी भी पुरोहित को नहीं पा सका, भले ही उसने उनसे बहुत विनती की, उन्हें बहुत धन आदि भेंट किया। तब ब्राह्मणों ने उससे कहा, ‘‘हे राजन! आपके यज्ञ अनंत काल तक चलते रहते हैं। इतने लंबे समय तक यज्ञ में आपकी सहायता करते-करते हम थक गए हैं। हमें जाने दीजिए। रुद्र के पास जाइए। वे यज्ञ संपन्न कराने में आपकी सहायता करेंगे।’’

श्वेतकी ने अपनी तपस्या से भगवान शिव को प्रसन्न किया और यज्ञ में मदद मांगी। भगवान शिव ने कहा, ‘‘मैं एक शर्त पर यज्ञ में आपकी सहायता करूंगा। यदि आप बारह वर्षों तक ब्रह्मचारी का जीवन जीते हुए अग्नि में मक्खन की आहुति डालते रहेंगे, तो आपको वह मिलेगा जो आप चाहते हैं।’’ श्वेतकी ने 12 वर्षों तक भगवान शिव के कहे अनुसार कार्य किया। 12 वर्ष पश्चात वह भगवान शिव के पास वापस आया। तब भगवान शिव ने उससे कहा, ‘‘मैं तुम्हारे कार्य से संतुष्ट हूँ। किन्तु यज्ञ में सहायता करने का कर्तव्य ब्राह्मणों का है। इसलिए मैं स्वयं तुम्हारे यज्ञ में सहायता नहीं करूँगा। दुर्वासा नामक एक श्रेष्ठ ब्राह्मण हैं, जो मेरे ही अंश हैं। वे तुम्हारे यज्ञ में सहायता करेंगे। तुम यज्ञ की तैयारी कर सकते हो।’’

राजा ने दुर्वासा की सहायता से यज्ञ का संचालन किया। यज्ञ सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। किन्तु अग्नि के मुख में बारह वर्षों तक निरंतर मक्खन डाला गया। इतना मक्खन पीकर अग्नि बीमार पड़ गए और पीला पड़ गया। वह पहले की तरह चमक नहीं पा रहा था। उसे भूख कम लगने लगी। उसकी ऊर्जा का स्तर कम हो गया। अपनी ऊर्जा धीरे-धीरे कम होती देख अग्नि ब्रह्मा के पास गए और मदद मांगी। ब्रह्मा ने उसे खांडव वन का भक्षण करने को कहा। ब्रह्मा की सलाह पर अग्निदेव बहुत तेजी से खांडव वन की ओर बढ़े। उन्होंने वायुदेव की सहायता से आग जलाई। वहाँ रहने वाले प्राणियों ने आग को बुझाने का बहुत प्रयास किया। हजारों हाथी अपनी सूंड में पानी भरकर आग पर डालने लगे। हजारों सांपों ने अपने फन से पानी डाला। वन में रहने वाले अन्य सभी प्राणियों ने विभिन्न तरीकों से आग को बुझाने का प्रयास किया।
अग्नि ने सात बार वन को भस्म करने का प्रयास किया और सातों बार वहाँ रहने वाले प्राणियों ने उसे बुझा दिया। अग्नि निराश और क्रोधित हो गए। तब ब्राह्मा ने अग्नि को सलाह दी कि वह कृष्ण और अर्जुन से सहायता ले। कृष्ण और अर्जुन ने अग्नि की सहायता की किन्तु खंडव वन के निरीह, निर्दोष पशु, पक्षियों और वनस्पतियों के बारे में जरा भी विचार नहीं किया। बल्कि पशु,पक्षियों को वन से बाहर भागने में रोकने का जघन्य अपराध किया। इस अग्नि से केवल छह प्राणी ही बच पाए, वे थे मय दानव, अश्वसेन और चार रंग-बिरंगे पक्षी।

खंडव वन दहन के बहुत समय बाद अर्जुन को खंडव वन में अपने गांडीव धनुष शमी वृक्ष में छिपाने की आवश्यकता पड़ी। उस समय शमी वृक्ष ने एक क्षण के लिए भी यह नहीं सोचा कि यह वही अर्जुन है जिसने खांडव वन को जलाने में अग्नि की सहायता की थी।

मेरे कहने का तात्पर्य यह है कि प्रकृति ने हमेशा मनुष्यों को क्षमा किया है लेकिन हम मनुष्य हमेशा से प्रकृति के प्रति क्रूर रहे हैं। हमने पिछले कुछ वर्षों में दुनिया के सबसे बड़े जंगलों में लगी विनाशकारी दावानल से कोई सबक नहीं सीखा है। आज भी हम जंगलों और पेड़ों को बचाने के लिए उतना प्रयास नहीं कर रहे हैं जितना हमें करना चाहिए। हम यह क्यों भूल जाते हैं कि जब जंगल जलता है तो उसमें असंख्य वन्यजीव भी जलकर मर जाते हैं। इंद्र में अनेक बुराइयां होने के बावजूद भी उन्होंने खांडव वन को बचाने का प्रयास किया जबकि अर्जुन और कृष्ण अनेक अच्छाइयों के होते हुए भी जंगलों और वन्यजीवों को जलाने में सहायता करके अपराधी बन गए। जिसका परिणाम उन्हें बाद में भुगतना पड़ा। अर्जुन को अज्ञातवास के दौरान वनों में भी भटकना पड़ा और कृष्ण को तो हिरण के भ्रम में आखेटक के द्वारा चलाए गए तीर से अपने प्राण गंवाने पड़े। इसलिए हमें जल, जंगल और जमीन की रक्षा के लिए अपने विवेक का प्रयोग करना चाहिए अन्यथा इसका दृष्परिणाम भी हमें ही भुगतना पड़ेगा। यूं भी जो हमें संरक्षण देता है, उसे संरक्षित रखना हमारा नैतिक कर्तव्य है।
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Wednesday, August 2, 2023

चर्चा प्लस | पर्यावरण के बारे में बहुत कुछ कहता है ‘महाभारत’ | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर

चर्चा प्लस  
पर्यावरण के बारे में बहुत कुछ कहता है ‘महाभारत’         
    - डाॅ (सुश्री) शरद सिंह                                                                                      
     हमारे आदिग्रन्थ, हमारे महाकाव्य हमारे आदर्श ग्रन्थ हैं। हम उन्हें आदरपूर्वक पढ़ते हैं। हम उनका ‘पाठ’ करते हैं। लेकिन हम इस बात पर ध्यान नहीं देते कि ये महाकाव्य हमें पर्यावरण का महत्व भी बताते हैं। महाभारत महाकाव्य, जिसे हम राजनीतिक दांव-पेचों से भरी कहानी के रूप में देखते हैं, उसमें भी कई स्थानों पर पर्यावरण की चर्चा की गई है। राजनीति में माहिर विदुर सिर्फ राजनीति पर ही सलाह नहीं देते बल्कि पर्यावरण संरक्षण की भी सलाह देते हैं। भीष्म सिर्फ राज्य की रक्षा की बात नहीं करते बल्कि युधिष्ठिर को पेड़ों को कटने से बचाने की सलाह देते हैं। खांडव वन के जलने की कहानी अपने आप में एक गंभीर पर्यावरणीय शिक्षा देती है। यानी महाभारत पर्यावरण के बारे में बहुत कुछ कहता है, बस इस पर ध्यान देना जरूरी है।
महाभारत में धर्म और नीति के आदर्श के साथ-साथ प्राकृतिक जगत का विस्तृत चिंतन मिलता है। पर्यावरण संरक्षण पारिस्थितिकी की चिंता में हिंदुओं ने बहुत सकारात्मक प्रतिक्रिया दी है। कहते हैं ‘‘एक वृक्ष दस पुत्रों के समान होता है’’। महाभारत में इसका विस्तार से वर्णन किया गया है। महाभारत में अनेक स्थानों पर वृक्षों का महत्व देखने को मिलता है। इसके अंतर्गत महाभारत के वनपर्व में विदुरनीति के अंतर्गत वृक्षों एवं वनस्पतियों के संवर्धन के प्रयासों के अनेक उदाहरण दिये गये हैं। अनेक प्रकार की वनस्पतियों का वर्णन है। पौधे के प्रकार के सन्दर्भ में कहा गया है-
वनस्पतेरपक्वानि फलानि प्रचिनोति ।
स नाप्नोति रस तेम्यो बीज चास्य विनश्यति ।।
व्यस्तु पक्वमुपादत्ते काले परिणत फलम् ।
फलाद्रसं से लगते बीजाच्चैव फलं पुन ।
- विदुर ने लोगों को उपदेश दिया कि जिस प्रकार भ्रमर फूलों से रस लेकर शहद प्राप्त करता है, उसी प्रकार न तो फूल को कोई नुकसान पहुंचता है और भृंग भी अपना भोजन प्राप्त कर लेते हैं। हमें भी प्रकृति के प्रति ऐसा ही व्यवहार करना चाहिए अर्थात हमें प्रकृति से इतना लेना चाहिए कि उससे प्रकृति को कोई नुकसान भी न हो और हमारी जरूरतें भी पूरी हो जाएं। हमें पौधों से फूल तो इकट्ठा करने चाहिए, लेकिन कभी भी उन्हें पूरी तरह से नष्ट करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए।

महाभारत के अनुशासन पर्व में जल संरक्षण को महान धार्मिक कार्य घोषित करते हुए देश या ग्राम में एक तालाब के निर्माण को धर्म-अर्थ-काम तीनों का फल देने वाला बताया गया है-
तस्य पुत्राः भवन्त्येते पादपा नात्र संशयः ।
परलोकगतः स्वर्ग लोकाश्चाप्नोति सोव्ययान।।

नदियों के मौलिक रूप तथा उनका मानवीयकरण कर के महाभारत में कई कथाएं मौजूद हैं। महाभारत में भीष्म पितामह सबसे महत्वपूर्ण पात्रों में से एक हैं। वे हस्तिनापुर के महाराज शांतनु और गंगा नदी की आठवीं संतान थे। उनका मूल नाम देवव्रत था। भीष्म का समूचा जीवन ही केवट कन्या मत्स्यगंधा के कारण ब्रह्मचर्य में ढल गया। वस्तुतः भीष्म अर्थात् देवव्रत के पिता शांतनु केवट पुत्री मत्स्यगंधा पर मोहित हो गए। शांतनु ने केवट से उनकी पुत्री का हाथ मांगा किन्तु केवट ने कहा कि यदि मेरी पुत्री की संतान को राजा बनाए जाने का वचन दो तभी मैं अपनी पुत्री से तुम्हारा विवाह करूंगा। देवव्रत बड़ापुत्र था अतः वही राज्याभिषेक का अधिकारी था। जब देवव्रत ने अपने पिता को व्यथित देखा तो उसका कारण पता किया तथा केवट से जा कर भेंट की। देवव्रत ने केवट के समक्ष प्रतिज्ञा की कि वे कभी राजा नहीं बनेंगे। तब केवट ने शंका जताई कि भविष्य में यदि तुम्हारी संतान ने विरोध किया तो? इस पर देवव्रत ने भीष्म प्रतिज्ञा करते हुए आजन्म ब्रह्मचर्य का पालन करने का वचन दिया। अर्थात् एक नदी को पार कराने वाले केवट और उसकी पुत्री के आकांक्षा ने देवव्रत को भीष्म बना दिया। केवट और उसकी पुत्री नदी की निर्मलता और उपादेयता को नहीं समझ सके थे अन्यथा वे ऐसी प्रतिज्ञा नहीं कराते जो भविष्य में धर्म और अधर्म के बीच असंतुलन का कारण बनती।

महाभारत के अनुशासन पर्व के 58वें अध्याय में भीष्म ने युधिष्ठिर से कहा था-
अतीतानागते चोभे पितृवंश च भारत।
तारयेद् वृक्षरोपी च तस्मात् वृक्षांश्च रोपयेत।
- हे युधिष्ठिर! वृक्षों का रोपण करने वाला मनुष्य अतीत में जन्मे पूर्वजों और भविष्य में जन्म लेने वाली संतानों एवं अपने पितृवंश का तारण करता है। इसलिए उसे चाहिए कि पेड़-पौधे लगाए। दूसरे उपदेश में कहा गया -
तस्य पुत्रा भवन्त्येते पादपा नात्र संशय।
परलोगतरू स्वर्ग लोकांश्चाप्नोति सोव्ययानं।
- मनुष्य द्वारा लगाए गए पौधे वास्तव में उसके पुत्र होते हैं, इस बात में कोई शंका नहीं है। जब उस व्यक्ति का देहावसान होता है तो उसे स्वर्ग एवं अन्य अक्षय लोग प्राप्त होते हैं।

उद्योग पर्व में कहा गया है-
निर्वनो वघ्यते व्याघ्रो निव्र्याघ्रं  छिद्यते वनं।
तस्माद्व्याघ्रो वनं रक्षेद्वयं व्याघ्रं च पालयेत।।
अर्थात जंगल न हो तो बाघ मारा जाता है. यदि बाघ न हो तो जंगल नष्ट हो जाता है। इसलिए, बाघ जंगल की रक्षा करता है और जंगल बाघ की रक्षा करता है।

आज हम ऐसी कई घटनाएं सुनते हैं। क्या आपने कभी सोचा है कि हाथियों के झुंड गांवों पर हमला क्यों करते हैं या सांप जैसे जहरीले जानवर घरों में क्यों घुस जाते हैं? क्योंकि हम उनके घरों पर कब्जा कर रहे हैं, हम उनसे उनके आवास छीन रहे हैं। इसका परिणाम हमें किसी न किसी रूप में भुगतना ही पड़ता है। इस संबंध में महाभारत के आदिपर्व की दो कथाए बहुत महत्वपूर्ण हैं जो प्रकृति को नुकसान पहुँचाने से होने वाले नुकसान के बारे में आगाह करती हैं। ये दोनों कहानियां बताती हैं कि अगर मनुष्य प्रकृति को नुकसान पहुंचाएगा तो बदले में प्रकृति भी उसे नुकसान पहुंचाएगी और दुश्मनी का यह सिलसिला हमेशा चलता रहेगा। इससे किसी को फायदा नहीं होगा बल्कि नुकसान दोनों का होगा। पौराणिक कथा के अनुसार, अग्निदेव के अनुरोध पर श्रीकृष्ण और अर्जुन ने इंद्रप्रस्थ के पास खांडव वन को जला दिया था। अग्निदेव ने इस वन को जलाने की सात बार कोशिश की थी लेकिन हर बार असफल रहे। क्योंकि खांडव वन में देवराज इंद्र का मित्र तक्षक नाग रहता था। उसकी रक्षा के लिए इंद्र हर बार जल की वर्षा करते थे और अग्नि को जंगल जलाने के लिए हार माननी पड़ती थी। तब अग्नि ने कृष्ण-अर्जुन की मदद मांगी और इंद्र के विरोध करने पर कृष्ण को चक्र और कौमोद की गदा, अर्जुन को गांडीव धनुष, दो अक्षत तरकश और इंद्र सहित देवताओं से युद्ध करने के लिए दिव्य कपिध्वज रथ दिया गया। तब कृष्ण-अर्जुन ने दिव्यास्त्रों की सहायता से विशाल खांडव वन को जला डाला। इस घटना के समय तक्षक जंगल में नहीं था, हालांकि इंद्र ने जंगल को बचाने की पूरी कोशिश की लेकिन वे उसे बचा नहीं सके। परिणामस्वरूप, जंगल के लाखों पेड़ भीषण आग में जल गए, उसमें रहने वाले असंख्य पशु-पक्षी भी आग में जलकर राख हो गए। तक्षक के पुत्र नाग अश्वसेन, मयासुर और चार शारंग पक्षियों को छोड़कर कोई भी जानवर और वनस्पति नहीं बची।
आदि पर्व के आस्तीक पर्व में कथा है कि खांडव वन जलाने के प्रतिशोध में तक्षक नाग ने अर्जुन के पौत्र परीक्षित को काटकर मार डाला था। तब जब जनमेजय ने परीक्षित की हत्या का बदला लेने के लिए नागयज्ञ किया। तभी आस्तिक मुनि ने आकर उसे रोका। उस यज्ञ में बहुत से साँप जलकर भस्म हो गये, परन्तु तक्षक बच गया। मानो आस्तिक मुनि ने जनमेजय के बहाने हम सभी मनुष्यों को प्रतीकात्मक रूप से यह शिक्षा दी कि यदि प्रतिकार की प्रतिक्रिया प्रतिशोध ही है तो यह चक्र कभी समाप्त नहीं होगा। प्रकृति को अनावश्यक क्षति उस पर्यावरण को हानि पहुँचाती है जिसमें हम सभी मनुष्य रहते हैं। आज जलवायु परिवर्तन के भयावह परिणामों को देखकर इसे आसानी से समझा जा सकता है। इस तथ्य की व्याख्या हजारों वर्ष पहले ही महाभारत में कर दी गई थी। सबके साथ रहना भी हमारे हित में है, जब हम केवल अपने स्वार्थ की पूर्ति पर ध्यान केंद्रित कर वनों के विनाश का कार्य करते हैं तो एक समय यह सही लगता है, लेकिन इसका दुष्परिणाम हमें आने वाले समय में भुगतना पड़ता है। पीढ़ियों. प्रकृति और पेड़ों के विनाश से न केवल अकाल और जहरीली हवा का दुष्प्रभाव पड़ता है बल्कि अंत में हमारी भावी संतानों को भी इसकी कीमत चुकानी पड़ती है।

वेदव्यास ने वृक्षों में चेतना का होना माना है-
सुखदुःखयोश्च ग्रहणच्छिन्नस्य च विरोहणात।
जीव पश्यामि वृक्षाणामचैतन्य न विद्यते ।।

महाभारत में एक पूरा वन पर्व ही रखा गया है। जो वन संस्कृति का परिचायक है। महाकाव्य में कदलीवन, काम्यकवन, द्वैतवन, खाण्डववन जैसे अनेक वनों के नाम हैं और अनेक महत्वपूर्ण प्रसंग वन अंचल में ही घटित हुए हैं। वृक्ष, गुल्म, लता, वल्ली, त्वक्सार तथा तृण के रूप में स्थावर भूत वृक्षों की छह जातियों का भी वर्णन है। इनमे ऋषि-मुनियों के तपस्थल और आवास रहा है। अनेक राजा भी अपने गृहस्थाश्रम के कर्तव्यों से मुक्त होकर यथासमय वानप्रस्थी होकर वन की ओर उन्मुख होना अपना धर्म समझते हैं। कथा में देवापि से लेकर धृतराष्ट्र तक के वन गमन की कथाएं इसकी प्रमाण हैं। हिन्दू धर्म में जीवन के 4 प्रमुख भाग (आश्रम) किये गए हैं- ब्रम्हचर्य, ग्रृहस्थ, वानप्रस्थ और सन्यास। अर्थात तीसरे भाग वानप्रस्थ का अर्थ वन प्रस्थान करने वाले से है। मनुष्य की आयु 100 वर्ष मानकर प्रत्येक आश्रम 25 वर्षों का होता है- 1.ब्रम्हचर्य आश्रम (जन्म से 25 वर्ष तक)- शैक्षणिक उपलब्धियां एवं बौद्धिक विकास हेतु। 2.गृहस्थ आश्रम (25 से 50 वर्ष तक)- सामाजिक विकास हेतु धर्म,अर्थ,काम की प्राप्ति हेतु। 3.वानप्रस्थ आश्रम (50 से 75 वर्ष तक)-आध्यात्मिक उत्कर्ष हेतु। 4.सन्यास आश्रम (75 से 100 वर्ष तक)- मोक्ष प्राप्त करना।
वानप्रस्थ आश्रम को दो रूपों ‘‘तापस’’ और ‘‘सांन्यासिक’’ में विभाजित किया गया था। माना जाता था कि जो व्यक्ति वन में रहकर हवन, अनुष्ठान तथा स्वाध्याय (वेद और स्वयं का अध्ययन) करता था, वह ‘‘तापस वानप्रस्थी’’ कहलाता था। जो साधक कठोर तप करता तथा ईश्वराधना में निरन्तर लगा रहता था, उसे ‘‘सांन्यासिक वानप्रास्थी’’ कहा जाता था। वानप्रस्थ की ये दोनों अवधि वन में ही व्यतीत की जाती थी। अतः सामाजिक व्यवस्थाओं के अनुसार भी वनों का विशेष महत्व था। महाभारत में भीष्म द्वारा युधिष्ठिर को वृक्ष न काटने का स्पष्ट आदेश दिया गया है। हे युधिष्ठिर! अपने राज्य में भी फलदार वृक्ष न काटें। -
वनस्पतीन् भक्ष्यफलान् न च्छिन्द्युविषये तव ।
ब्राह्मणानां मूलफलं धर्म्यमाहुमनीषिणः ।।

महाभारत में वन का बहुत महत्व है। वन ही तो द्यूतक्रीड़ा में पराजित पांडवों की शरणस्थली थे। जब कौरवों और पांडवों के बीच द्यूतक्रीड़ा हुई तो उसमें दुर्योधन ने शर्त रखी थी कि यदि पांडव हार जाएंगे तो उन्हें  बारह वर्ष का वनवास तथा एक वर्ष अज्ञातवास के काटने पड़ेंगे। युधिष्ठिर ने इस शर्त को मान लिया था तथा पराजित होने के बाद उसे अपने भाइयों एवं द्रौपदी तथा माता कुंती के साथ वनगमन करना पड़ा था। वन में ही राक्षसी हिडिम्बा से भीम का विवाह हुआ था। अर्जुन ने शमी वृक्ष में अपना गांडीव धनुष छिपा कर रखा था। कहने का आशय है कि विविध संदर्भों के अंतर्गत महाभारत में वन के महत्व को बताया गया है।
          महाभारत कहता है, वस्तुतः मानव जीवन का अस्तित्व तभी तक सुरक्षित है, जब तक हमारा संपूर्ण पर्यावरण संतुलित एवं शुद्ध है। यह संतुलन तभी प्राप्त हो सकता है जब हम किसी भी जीवित प्राणी को नष्ट न करें, पेड़ों को न काटें और सभी चराचरों के प्रति प्रेम भाव रखें।
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Wednesday, April 19, 2023

चर्चा प्लस | वर्तमान महाभारत-राग और बुन्देली लोकगाथाओं में ‘महाभारत’ | सागर दिनकर

चर्चा प्लस  
वर्तमान महाभारत-राग और बुन्देली लोकगाथाओं में ‘महाभारत’
     - डाॅ (सुश्री) शरद सिंह                                                                   
          ‘‘महाभारत’’ और ‘‘रामायण’’ जैसे महाकाव्य इसलिए रचे गए कि इंसान उनसे सबक ले और अपने वर्तमान तथा भविष्य को हर तरह के विवाद से दूर रखे। सुई की नोंक बराबर ज़मीन के चक्कर में अट्ठारह अक्षौहिणी  सेना मारी गई थी। महाभारत का युद्ध समाप्त होने के बाद हिंसा पर रुदन और पछतावे के अलावा और क्या बचा था? वर्तमान एक बार फिर महाभारत राग से गुंजायमान हो रहा है। लोकतंत्र में चुनाव किसी महाभारत से कम नहीं होते हैं। चुनाव का समय जैसे-जैसे निकट आते जाएंगे वैसे-वैसे महाभारत राग के स्वर तेज होते जाएंगे। फिलहाल हम सुनें बुंदेली लोकगाथाओं में महाभारत का स्वर।    
वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य महाभारत कालीन परिदृश्य से अलग नहीं दिख रहा है। परस्पर एक-दूसरे को नीचा दिखाने की प्रवृति और वैचारिक चीरहरण हर दूसरे बयान में ध्वनित हो रहा है। यह महाभारत राग नहीं तो और क्या है? आज महाभारत की सुई की नोंक की प्रसंग के भांति सत्ता की एक अदद कुर्सी का द्वंद्व है। किन्तु लोकगाथाओं में, विशेषरूप से बुंदेली लोगाथाओं में महाभारत के प्रसंग एक सबक की भांति गाए और सुनाए जाते हैं। इनमें संदेश निहित होता है युद्ध के विरुद्ध शांति का। इनमें द्रौपदी के चीरहरण की पीड़ा है तो कृष्ण-सुदामा के आपसी प्रेम की चर्चा भी है।  

बुन्देली की प्रसि़द्ध महाभारतकाल संदर्भित लोकगाथाएं हैं- बैरायठा, कृष्ण-सुदामा, द्रौपदी चीरहरण तथा मेघासुर दानव आदि। इनके अतिरिक्त राजा जगदेव की लोकगाथा में भी पाण्डवों की चर्चा का समावेश है। महाभारत कालीन चरित्रों से जुड़ी गाथाओं का इस प्रकार बुन्देलखण्ड में रुचिपूर्वक गाया जाना इस बात का द्योतक है कि बुन्देली जन प्रकृति से जितने वीर होते हें तथा मानवीय संबंधों के आकलन को लेकर उतने ही संवेदनशील होते हैं। उन्हें व्यक्ति के अच्छे अथवा बुरे होने की परख होती है तथा साहसी, वीर, उदार, दानी और सच्चा व्यक्ति अपना आदर्श प्रतीत होता है। इसीलिए जन-जन में गाए जाने वाली बैरायठा लोकगाथा में ‘महाभारत’ महाकाव्य की लगभग सम्पूर्ण कथा को जन-परिवेश में पस्तुत किया गया है।
इसी गाथा में द्यूतक्रीड़ा तथा चीर-हरण का अत्यंत दृश्यात्मक वर्णन मिलता है-
जब जूटो तो पकरो ओने आज रे कै
जब रानी खों लै गव अपने साथ रे कै
जब आ गई सभा के नोने बीच रे कै
जब सबरो से करी है गुहार रे कै
जब कोऊ खों ने आई लाज रे कै
जब भरी कचेरो महराज रे कै
जब कोनऊ ने करे सहाय रे कै
       इस विवरण में  जिन तथ्यों को विशेष रूप से रेखांकित किया गया है वे ध्यान देने योग्य हैं कि जब व्यक्ति अनुचित कर्म करने लगता है तो ‘धरम’ और ‘राज’ दोनों गंवा बैठता है। इसी प्रकार जब ‘पांच पती’ अर्थात् सगे-संबंधी भी रक्षा नहीं कर पाते हैं उस समय ‘हरि’ अर्थात् ईश्वर सहायता करता है। यह मानव मन की वह अवस्था है जो राजनीतिक अस्थिरता एवं असुरक्षा के दौर में प्रभावी हो उठती है। यही भाव ‘चीरहरण’ लोग गाथा में मिलते हैं।

दुश्शसन द्वारा चीरहरण किए जाने पर द्रौपदी पतियों द्वारा निर्धारित नियति नियति को चुपचाप स्वीकार करने के बदले सहायता के लिए कृष्ण को पुकारती है-
हे श्याम मेरी सुध लइयो, रे प्रभु मोरी लाज बचइयो रे
शकुनी दुर्योधन ने मिल के, कपट के पांसे डारे
जुआ खेल के पति हमारे, राजपाट सब हारे
मोरी बिगड़ी आज बनइयो, रे प्रभु मोरी लाज बचइयो रे
इसी गाथा में द्रौपदी की पुकार सुन कर श्री कृष्ण के आने का वर्णन भी कम महत्वपूर्ण नहीं है क्योंकि इसमें इस बात का ध्यान रखा गया है कि श्री कृष्ण द्रौपदी की लाज बचाने पहुंचे तो किन्तु किस साधन अथवा किस वाहन से?
बेगी चलो गरुड़ मोरे भाई, कारज बिगड़ो जाई
नौ सौ कोस हस्तिनापुर बसो है, जल्दी देव पहुंचाई, बेगी चलो .....
नौ गज चलत हवा से आगें, दस गज की ऊंचाई
तीन लोक को भार जो लावे, और चाल प्रभु कहां से आई, बेगी चलो .....
गरुड़ पर सवार हो कर श्री कृष्ण सभा में पहुंचे जहंा द्रौपदी के पांचों पति मूक दर्शक बने बैठे थे -
पांचई पति मौन हो बैठे, अर्जुन भीम सही
हरि से द्रौपति टेर करी
जब नन्दलाल आये सभा में, बढ़ गओ चीर सही
खेंचत चीर दुसासन हारे, चीर पे भीर भरी

बुन्देली लोकगाथाओं में महाभारत के विविध प्रसंगों के साथ ही विविध पात्रों एवं चरित्रों को भी स्थान दिया गया है। ‘कृष्ण सुदामा’ लोकगाथा में कृष्ण और सुदामा की मित्रता का सुन्दर वर्णन है।
दोई पढ़ें इक गुरुकुल में, नन्द नन्दन और सुदामा।
ईंधन की हुई महा तबाही, घर में से मिसरानी आई
जल्दी लकड़ी दो मंगवाई, अधकचरी है दाल
भोजन खों हो गई शामा, नन्द नन्दन और सुदामा।
जब गुरुकुल के लिए ईंधन हेतु लकड़ियां लाने कृष्ण और सुदामा जंगल में गए उसी समय दोनों की मित्रता का अनुकरणीय भविष्य तय हो गया।
चने चबा तेने सब लीने, हमको तनक भी न दीने
पिटबे के लांछन कर लीने
यह सोच किया है कान्हा, नन्द नन्दन और सुदामा।

वर्षों बाद अपनी पत्नी के कहने पर अपने मित्रा से मदद मांगने पहुंचे सकुचाए हुए सुदामा की आवभगत मित्र कृष्ण ने की। अपने हाथों से सुदामा के चरण धोए तथा सिंहासन बैठने को दिया। मित्र कृष्ण की सम्पन्नता देखकर सुदामा भेंट में लाए चावल देने का साहस नहीं कर पा रहे थे जिसे कृष्ण ने ताड़ लिया।
कासी दास श्रीकृष्ण कांख से, तुदुल खेंच चबावे
सुदामा जी के तंदुल मोहन खावें
तंदुल खाय मुट्ठी भर कें, मन में बहुत सराहवें
कंचन महल बनाय मित्रा के, संपति अमित भरवें
सुदामा जी के तंदुल मोहन खावें

‘मेघासुर’ लोकगाथा में पांडवों के साहस एवं कौशल का वर्णन मिलता है। मेघासुर संग्राम से पूर्व  देवी भवानी पांडवों को एक मढ़िया बनाने का निर्देश देती हैं-
बोले भुवानी सुनो पांडवा, ले के गजा तुम जाय
गजा लाये जब अर्जुन डगरे, धरनी झोंका खाय
 भरे समुंद समतल करे माया, मढ़ के करे विस्तार
कै गज की माई नींव डराऊं, कै गज के विस्तार

‘राजा जगदेव’ लोकगाथा में भी पाण्डवों का उल्लेख आया है। यह उललेख प्रश्नों के रूप में है। किसने पृथ्वी को रचा? किसने संसार को रचा? किसने पाण्डवों को बनाया? पाण्डवों को किस उद्देश्य से बनाया गया? इन प्रश्नों का उत्तर भी इन्हीं के साथ दिया गया है कि देवी ने पाण्डवों को बनाया। पृथ्वी से अन्याय और अधर्म का विनाश करने के लिए पाण्डवों की रचना की गई।
कौना रची पिरथवी रे दुनियां संसार, कौना रचे पंडवां उनई के दरबार
बिरमा रची पिरथवी रे दुनियां संसार, माई रचें पंडवां रे अपने दरबार
रैबे खों रची पिरथवी रे दुनियां संसार, रन खों रचे पंडवा रे अपने दरबार ।।

लोक गाथाएं लोक परम्पराओं के साथ चलती हैं। इनमें जन की आस्था, विश्वास और धारणाएं निहित होती हैं। लोग गाथाएं जन के चरित्र को समझने में मदद करती हैं। कुल मिला कर ये सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, धार्मिक एवं चारित्रिक परम्पराओं का प्रतिबिम्ब होती हैं।  

भारतीय जनमानस को चरित्रों की विविधता से परिपूर्ण ‘महाभारत’ महाकाव्य ‘रामायण’ के बाद सबसे अधिक प्रभावित करता है। बुन्देली जनमानस इससे अलग नहीं है। अन्याय, दासता के विरुद्ध युद्धघोष करने वाले बुन्देलों के लिए महाभारतकालीन प्रसंगों का विशेष महत्व होना स्वाभाविक है। यदि मुग़लों अथवा अंग्रेजों के विरु़द्ध बुन्देलों के संघर्ष का इतिहास पढ़ा जाए तो यही तथ्य सामने आता है कि बहुसंख्यक शत्रुओं से अल्पसंख्यक बुन्देलों ने सदैव डट कर संघर्ष किया। ठीक उसी तरह जिस प्रकार पाण्डवों ने कौरवों का सामना किया था। अतः इसमें तनिक भी संदेह नहीं है कि ऐसे संघर्षपूर्ण अवसरों पर ये लोग गाथाएं आमजन में साहस का संचार करती रही होंगी। आज भी सुदूर ग्रामीण अंचलों में ये लोक गाथाएं गाई जाती हैं। यद्यपि आधुनिकता के आज के दौर में इन लोक गाथाओं के मूल स्वरूप के लुप्त होने का भय बढ़ चला है। बुन्देलखंड को अपनी लोकगाथाओं में मौजूद महाभारत राग के स्वरों को सुनना चाहिए ताकि लोकतंत्र में वैचारिक मतभेद भले ही हो मगर महाभारत न हो। 
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