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Wednesday, September 18, 2024

चर्चा प्लस | पितृपक्ष का महत्व पुराणों से ले कर पर्यावरण तक | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर

चर्चा प्लस  
पितृपक्ष का महत्व पुराणों से ले कर पर्यावरण तक 
- डाॅ (सुश्री) शरद सिंह                                                                                      
           पितृपक्ष हमें अतीत का सम्मान करना सिखाता है, अपने पूर्वजों के प्रति कृतज्ञ होना सिखाता है। अपने पितरों की आत्मा को शांति प्रदान करना सिखाता है। साथ ही सिखाता है प्रकृति के तत्वों के साथ मिल कर रहने की कला। पितृपक्ष जीवन और भावनाओं के लिए पर्यावरण की आवश्यकता को भी सिखाता है। क्योंकि यदि जल नहीं होगा तो हम तर्पण कहां और किससे करेंगे? कौवे नहीं होंगे तो हम श्राद्ध-भोग किसे खिलाएंगे? पुराणों के अनुसार कौवों के माध्यम से ही तो आते हैं हमारे पितर हम तक। यही तो है पितृपक्ष का महत्व पुराणों से ले कर पर्यावरण तक।  
      पितृपक्ष की शुरुआत भाद्रपद मास की पूर्णिमा तिथि से होती है और आश्विन मास की कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि को समापन होता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पितर पितृपक्ष में पृथ्वी लोक पर अपने परिवार के सदस्यों से मिलते हैं। इसके बाद पितरों के नाम का दान, तर्पण और श्राद्ध कर्म किया जाता है। पितृपक्ष में शादी-विवाह, गृह-प्रवेश, मुंडन संस्कार और सगाई समेत सभी मांगलिक कार्यों की मनाही होती है। शास्त्रों में देवी-देवताओं की पूजा के साथ पूर्वजों की पूजा वर्जित है। स्वाभाविक रूप से अनेक लोगों के मन में यह प्रश्न उठता है कि पितृपक्ष के श्राद्धकर्म का आरम्भ कब से हुआ? तो पुराणों और महाकाव्य में इसका उल्लेख मिलता है। महाभारत में तो इसके मनाए जाने के आरम्भ का भी उल्लेख है। महाभारत काल से शुरु हुई पितृपक्ष की परंपरा जो आज तक है चल रही है। भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर को महाभारत के युद्ध के दौरान पितृपक्ष में श्राद्ध और उसके महत्व के बारे के बताया था। जिसका उल्लेख गरुड़ पुराण में भी है। 

कथा के अनुसार महर्षि निमि ने पुत्र की अचानक मृत्यु से दुखी होकर पूर्वजों का आह्वान करना शुरू कर दिया। इसके बाद पूर्वज उनके सामने प्रकट हुए और कहा कि ‘‘हे निमि, आपका पुत्र पहले ही पितृ देवों के बीच स्थान ले चुका है। चूंकि आपने अपने दिवंगत पुत्र की आत्मा को खिलाने और पूजा करने का कार्य किया है। इसलिए आज से यह श्राद्ध अनुष्ठान विशेष माना जाएगा।’’ उस समय से श्राद्ध को सनातन धर्म का महत्वपूर्ण अनुष्ठान माना जाने लगा। इसके बाद से महर्षि निमि ने भी श्राद्ध कर्म शुरू कर दिया जो वर्तमान में भी पितृ पक्ष के तौर आज भी जारी है।

पितृपक्ष या श्राद्धपक्ष, 16 दिन की यह अवधि होती है इसमें हिन्दू अपने पितरों को श्रद्धापूर्वक स्मरण करते हैं और उनके लिये पिण्डदान करते हैं। इसे सोलह श्राद्ध, महालय पक्ष, अपर पक्ष आदि नामों से भी जाना जाता है। गीता के अध्याय 9 श्लोक 25 के अनुसार पितर पूजने वाले पितरों को, देेव पूजने वाले देवताओं को और परमात्मा को पूजने वाले परमात्मा को प्राप्त होते हैं। मार्कण्डेय पुराण में भी श्राद्ध के विषय मे एक कथा मिलती है जिसमे रूची नाम का ब्रह्मचारी साधक वेदों के अनुसार साधना कर रहा था। वह जब 40 वर्ष का हुआ तब उसे अपने चार पूर्वज जो अपने अनुचित आचरण पितर बन कर भी कष्ट भोग रहे थे। तब पितरों ने रूची से कहा कि हमारा श्राद्ध कर के हमें मोक्ष दिलाओ। तब रूची ने अलग से पितरों का श्राद्ध किया और उन्हें मोक्ष दिला कर मुक्ति दिलाई।

18 पुराणों में पितृपक्ष का उल्लेख मिलता है। विष्णु पुराण में पितरों के श्राद्ध और तर्पण का महत्व बताया गया है. इसमें कहा गया है कि पितरों को अर्पित जल और अन्न से उनकी आत्मा को शांति मिलती है। ब्रह्म पुराण में पितरों के लिए श्राद्ध की विधियों का विवरण है। शिव पुराण में श्राद्ध की प्रक्रिया और इसके लाभों का उल्लेख है। भागवत पुराण में पितरों के तर्पण और श्राद्ध की विधियां और उनका महत्व वर्णित है। इसमें पितरों को अर्पित सामग्री की विधि भी बताई गई है। मत्स्य पुराण में पितरों के श्राद्ध की विभिन्न विधियों, जैसे एकोदिष्ट और नित्य श्राद्ध, का विवरण है। नारद पुराण में पितरों के प्रति श्राद्ध की विधियां और इसके महत्व का विस्तृत वर्णन किया गया है। वामन पुराण में पितरों के श्राद्ध और तर्पण की प्रक्रिया का उल्लेख इस पुराण में है। इसमें पितरों को शांति देने के उपाय बताए गए हैं। कूर्म पुराण में पितरों की आत्मा को शांति देने के लिए श्राद्ध की प्रक्रियाओं का वर्णन है। लिंग पुराण में पितरों के श्राद्ध और तर्पण की विधियों का वर्णन है। गरुड़ पुराण, श्रीभगवत पुराण, सत्यम्बुधि पुराण, ब्रह्मवैवर्त पुराण, स्मृति पुराण, प्रदीप पुराण, अग्नि पुराण, श्री भागवत पुराण और कालिक पुराण में भी पितरों के श्राद्ध की विधियां, आत्मा को शांति देने के लिए प्रक्रियाओं और धार्मिक महत्व के बारे में बताया गया है।
पितृपक्ष का धार्मिक एवं भावनात्मक महत्व तो है ही, साथ ही इसका पर्यावर्णीय महत्व भी है। पितृपक्ष सीधे प्रकृति से जोड़ता है। यह पक्ष प्रकृति और मानव के अंतर्संबंधों को मजबूत करता हुआ प्रकृति के महत्व को बताता है। प्रकृति के जड़ और चेतन मानव जीवन के लिए आधारभूत तत्व हैं। श्राद्ध के दौरान नदी अथवा जलाशय में तर्पण किया जाता है। तर्पण जल से किया जाता है। अर्थात जल के बिना तर्पण संभव ही नहीं है। अतः यदि हम अपने पितरों अर्थात पूर्वजों की आत्मा को शांत करने के लिए श्राद्ध करना चाहते हैं तो सबसे पहले हमें जल को संरक्षित करना आवश्यक है।    
पितृपक्ष के दौरान कौवे को भोजन करने का विशेष महत्व बताया गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, कौवा यम के प्रतीक के रूप में जाना जाता है। इस दौरान कौवे का होना पितरों के आस पास होने का संकेत माना जाता है। मान्यता है कि पितृपक्ष में पूरे 15 दिन कौवे को भोजन करना चाहिए। पितृपक्ष में कौए का घर या आंगन में आना शुभ संकेत माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पितृपक्ष के दौरान पितर कौओं के रूप में धरती पर आते हैं। शास्त्रों में इस बात का वर्णन किया गया है कि देवताओं के साथ ही कौवे ने भी अमृत को चखा था। जिसके बाद से यह माना जाता है कि कौवों की मौत कभी भी प्राकृतिक रूप से नहीं होती है। कौए बिना थके लंबी दूरी की यात्रा तय कर सकते हैं। ऐसे में किसी भी तरह की आत्मा कौए के शरीर में वास कर सकती है और एक स्थान से दूसरे स्थान पर जा सकती है। इन्हीं कारणों के चलते पितृ पक्ष में कौवों को भोजन कराया जाता है। ण्क मान्यता और भी है कि जब किसी व्यक्ति की मृत्यु होती है तो उसका जन्म कौवा योनि में होता है। इस कारण कौवों के जरिए पितरों को भोजन कराया जाता है। पितृ पक्ष के दौरान कौवों के अलावा गाय, कुत्ते तथा अन्य पक्षियों को भी भोजन कराया जाता है। माना जाता है कि अगर इनकी ओर से भोजन को स्वीकार नहीं किया जाता है तो इसे पितरों का रुष्ट होना माना जाता है।

पौराणिक कथा के अनुसार, इंद्रदेव के बेटे जयंत ने कौवे का रूप धारण किया था। उस जयंत ने एक दिन सीता माता के पैर में चोंच मार दी, इस पूरी घटना को श्रीराम देख रहे थे। श्रीराम ने जयंत को मारने के लिए धनुष पर तीर चढ़ा लिया। जयंत घरा कर श्रीराम के चरणों पर गिर पड़ा। श्रीराम ने कहा कि उनका तीर व्यर्थ नहीं जा सकता। तब श्रीराम ने उसकी एक अंाख पर तीर चला दिया। साथ ही उसे क्षमा करते हुए आशीर्वाद दिया कि पितृ पक्ष में कौए को दिए गया भोजन पितृ लोक में निवास करने वाले पितर देवों को प्राप्त होगा।

कौवों को पितृपक्ष में भोजन कराने के यदि वैज्ञानिक पक्ष को देखें तो इसकी आवश्यकता स्वयं सिद्ध हो जाती है। भादो माह में पितृ पक्ष आता है और यह ऐसा समय होता है जब मादा कौवा अंडे देती है। इस दौरान मादा कौवा बच्चों को छोड़कर ज्यादा दूर नहीं जा सकती और उसे बच्चों के लिए अतिरिक्त भोजन की जरूरत भी होती है। ऐसे में पितृपक्ष के दौरान कौवों को भोजन कराकर कौवों की प्रजाति को संरक्षित किया जाता है। इसके साथ ही दूसरा पक्ष है कि कौवा बरगद और पीपल के फल खाता नहीं बल्कि निगलता है। कौवे का शरीर फल के गूदे को तो पचा लेता है, लेकिन उसके बीज को बीट के रूप में बाहर निकाल देता है। ऐसे में कौवे जहां बीट करते हैं, वहां यह पेड़ उग जाते हैं। बरगद और पीपल के पेड़ हमारे वातावरण के लिए बहुत उपयोगी हैं। इसलिए कौवों का संरक्षण बहुत जरूरी है। तीसरा पक्ष है कि कौवे ऊंचे वृक्षों की ऊंची डालियों पर अपना घोंसला बनाते हैं। अतः यदि हमें कौवों की उपलब्धता चाहिए तो अपने आस-पास ऊंचे-ऊंचे वृक्षों को भी बचाए रखना होगा। आज यदि हमें पितृपक्ष में कौवे दिखाई नहीं पड़ते हैं तो इसके लिए हम स्वयं जिम्मेदार हैं क्योंकि हमने बस्ती और घरों का विस्तार करने के लिए ऊंचे वृ़क्षों को बेरहमी से काट दिया है। यानी हमने उनके घर मिटा दिए हैं। अब यदि हम पौराणिक मान्यताओं को मानें तो यह तय है कि पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने के हमारे अपराध से हमारे पितर भी कदापि खुश नहीं होंगे। यूं भी हम जानते हैं कि जिस पर्यावरण को हमारे पूर्वजों ने लाखों वर्ष तक सहेजा, सम्हाला उसे हमने कुछ ही दशकों में संकटग्रस्त कर दिया। अतः इस बार पितृपक्ष में अपने पितरों को प्रसन्न करने और उन्हें मोक्ष दिलाने के साथ ही वाले प्राकृतिक तत्वों के संरक्षण का भी संकल्प लेना चाहिए।
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Friday, June 14, 2024

शून्यकाल | आवारा पशु, पर्यावरण और बेख़बर हम | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नयादौर

दैनिक नयादौर में मेरा कॉलम 
"शून्यकाल"

आवारा पशु, पर्यावरण और बेख़बर हम
 - डाॅ (सुश्री) शरद सिंह                                                                                                हम पशुओं का सम्मान करते हैं। गाय को अपनी माता मानते हैं। हम यह बर्दाश्त नहीं कर सकते कि कोई भी गाय माता को जरा भी चोट पहुँचाए। जब हम सड़क पर कुत्तों को घूमते देखते हैं, तो हमें उन पर दया आती है। जब कोई गाय किसी वाहन की चपेट में आकर मर जाती है, तो हमें उसकी दुखद मृत्यु पर दुःख होता है। हमारे मन में पशुओं के लिए कोमल भावनाएँ हैं। लेकिन ये भावनाएँ अक्सर सुप्त क्यों रहती हैं? क्या आपने कभी सोचा है? विदेशी सड़कों पर आवारा पशु नहीं घूमते, लेकिन हमारे देश की सड़कें हमेशा आवारा पशुओं से भरी रहती हैं। कभी सोचा है कि ये आवारा पशु कहाँ से आते हैं और ये क्या हैं और इनका पर्यावरण पर क्या प्रभाव पड़ता है? आप मेरे इस लेख के आईने में अपने-अपने शहर का प्रतिबिंब देख सकते हैं।
      मेरा शहर सागर (म.प्र.) उन कई भारतीय शहरों में से एक है, जहां लोग रोजाना आवारा पशुओं की समस्या से जूझता रहते हैं। जी हां, सागर में भी अन्य शहरों की तरह डेयरी विस्थापन की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। यह अलग बात है कि इस प्रक्रिया को लागू हुए दो दशक बीत चुके हैं। लेकिन, मुद्दा डेयरी पशुओं का नहीं है। उन्हें डेयरी से सैर-सपाटे के लिए भी ले जाया जाता था, इसलिए उनका एक निश्चित समय होता था। मुद्दा उन आवारा गायों और कुत्तों का है, जो सड़कों पर घूमते हैं। मान लीजिए कि हमारे देश में कुत्ते पीढ़ियों से घूमते आ रहे हैं। फिर, जब से माननीय मेनका गांधी जी ने यह कानून बनवाया कि आवारा कुत्तों को जहर की गोलियां देकर नहीं मारा जाना चाहिए, तब से उनकी संख्या में काफी वृद्धि हुई है। मैं खुद पशु हत्या के खिलाफ हूं। किसी भी पशु को जहर देकर मारना मानवीय विकल्प नहीं है। इसके लिए एक प्रावधान को बढ़ावा दिया गया कि आवारा कुत्तों की नसबंदी की जानी चाहिए। लेकिन मुद्दा यह है कि हमारे देश में कई अच्छे प्रावधान हैं, लेकिन उनके क्रियान्वयन में कई खामियां हैं। इन खामियों के कारण आज भी गाँवों और शहरों में कुत्ते बड़ी संख्या में घूम रहे हैं और सभी आवारा पशु अपना-अपना दुर्भाग्य जी रहे हैं।

वेदों और पुराणों को उठाकर देख लीजिए कि हमारे गौवंश कभी आवारा नहीं रहे। वे या तो पशुपालकों के आश्रमों में होते थे या ऋषि-मुनियों के आश्रमों में। गौवंश में गौदान को विशेष रूप से पुण्य का कार्य माना जाता था। वेदों में गाय को पूजनीय बताया गया है क्योंकि इसमें 33 कोटि यानी 33 प्रकार के देवताओं का वास माना गया है। इन 33 प्रकार के देवताओं में 12 आदित्य, 8 वसु, 11 रूद्र और 2 अश्विन कुमार हैं। इसलिए माना जाता रहा है कि केवल एक गाय की सेवा-पूजा कर लेने से 33 कोटि देवताओं का पूजन संपन्न हो जाता है। लेकिन हम सुबह घर के दरवाजे पर भिक्षुक सी खड़ी भूखी गाय को एक रोटी दे कर 33 कोटि देवताओं को प्रसन्न करने का भ्रम पाल लेते हैं। 
गायों को भूखे मरने के लिए आवारा पशु के समान छोड़ देना भी गोहत्या ही है। जबकि ऋग्वेद में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि गौहत्या महापाप है और यह मनुष्य की हत्या के समान है।
हे गोहा नृह वधो वो अस्तु (ऋग्वेद 7/56/17)

‘‘स्कंद पुराण” के अनुसार, ‘‘गाय सर्वोच्च देवता है और वेद सर्वोच्च हैं।’’ जबकि ‘‘श्रीमद्भगवद्गीता’’ में भगवान कृष्ण ने स्वयं को कामधेनु कहा हैदृ ‘‘धेनुनामस्मि कामधेनु’’ अर्थात मैं गायों में कामधेनु हूं। वेदों में भी माना गया है कि- ‘‘गावो विश्वस्य मातरः।’’ अर्थात गाय विश्व की माता है। 
ऋग्वेद 6/48/13 के अनुसार गाय प्रत्यक्ष रूप से तो दूध देती ही है, पर अप्रत्यक्ष रूप से जैविक कृषि के माध्यम से संसार को अन्न भी देती है। ऋग्वेद 1/29 का प्रथम मंत्र कहता है कि अल्प ज्ञान वाला अर्थात् बुद्धिहीन और साधनहीन व्यक्ति भी गोवंश का पालन करके हजारों प्रकार के वास्तविक ज्ञान को प्राप्त कर लेता है, परिश्रमी बनता है और फिर यशस्वी और ऐश्वर्यशाली बनता है।
यच्चिद्धि सत्य सोमपा अनाशस्ताइव स्मसि।
आ तू न इन्द्र शंसय गोष्वश्वेषु शुभ्रिषु सहस्रेषु तुवीमघ।।
भावार्थ - आलस्य के मारे अश्रेष्ठ अर्थात् कीर्ति्तरहित मनुष्य होते हैं, वैसे हम लोग भी जो कभी हों तो हे इन्द्र! हम लोगों को प्रशंसनीय पुरुषार्थ और गुणयुक्त कीजिए, जिससे हम लोग बहुत उत्तम-उत्तम हाथी, घोड़े, गौ, बैल आदि पशुओं को प्राप्त होकर उनका पालन वा उनकी वृद्धि करके उनके उपकार से प्रशंसावाले हों।
इसीलिए हमने गोवंश को सदैव सम्मान दिया। 

आज भी ऐसे बहुत से लोग दिख जाएंगे जो गोमाता के सामने झुकते या उसके पास से गुजरते समय उसके माथे को छूकर उसे सम्मान देते हैं। पर क्या आपने कभी सोचा है कि वह भावना कहां चली गई जिसमें गायों को गोशाला में रखकर उन्हें सम्मानपूर्वक पालने की प्रथा थी। आज सड़कों पर ऐसी बहुत सी गायें दिखती हैं जो दूध देना बंद कर चुकी हैं, अर्थात वे पशुपालकों के लिए अनुपयोगी हो गई हैं। ऐसे बहुत से बैल दिखते हैं जो बिना किसी उपयोग के सड़कों पर मरने के लिए छोड़ दिए जाते हैं। वे दूसरों को कष्ट पहुंचाते हैं और स्वयं भी कष्ट पाते हैं। उनकी इस स्थिति के लिए हम स्वार्थी मनुष्य ही जिम्मेदार हैं, अर्थात जो हमारे काम के नहीं हैं, उनकी हम परवाह नहीं करते। हमारे घर के दरवाजे पर कई आवारा गायें आ जाती हैं। हम उन्हें पुण्य कमाने की नीयत से दो रोटी या बचा हुआ खाना दे देते हैं। क्या उनका इतना बड़ा शरीर उस दो रोटी या बचे हुए खाने से जिंदा रह सकता है? हमने अपनी गौ माता को भिखारी बना दिया है। वह दो रोटी की भीख मांगने के लिए हमारे दरवाजे पर खड़ी रहती है। कहने, सुनने या लिखने में यह कड़वा है लेकिन यह सच है। गााय-बैलों के सड़कों पर बैठने या आपस में लड़ने के कारण आए दिन सड़क दुर्घटनाएं होती रहती हैं। उस समय हम गौवंश को कोसते हैं और उन लोगों को कोसना भूल जाते हैं जो गौवंश को इस तरह सड़कों पर ला रहे हैं। कांजीहाउस वह जगह हुआ करती थी जहां आवारा पशुओं को पकड़कर रखा जाता था। वहां उन्हें खाना-पीना दिया जाता है और उनकी पूरी देखभाल की जाती है अब तो ‘‘कांजीहाउस’’ शब्द भी सुनाई नहीं देता है

कुछ कुत्ते पालतू के रूप में अच्छा जीवन पा जाते हैं किन्तु अधिकांश आवारा पशु के रूप में भूख, मार और नृशंस मृत्यु की भेंट चढ़ जाते हैं। जबकि भारतीय संस्कृति में कुत्ते को पवित्र पशु माना गया है। बैदिक कालीन कुछ ग्रंथों में कहा गया है कि कुत्ते स्वर्ग और नरक के दरवाजे की रक्षा करते हैं। 
भगवदगीता के अध्याय 5 श्लोक 18 में कहा गया है कि ज्ञानीजन विद्या और विनययुक्त ब्राह्राण में तथा गौ, हाथी, कुत्ते और चाण्डाल में भी समदर्शी ही होते हैं-
विद्याविनयसंपन्ने ब्राह्राणे गवि हस्तिनि ।
शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः।।

महाभारत के अनुसार धर्मराज युधिष्ठिर की मृत्यु नहीं हुई थी, वे सशरीर ही स्वर्ग गए थे तथा उनको धरती से स्वर्गलोक ले जाने के लिए स्वयं यमराज श्वान का रूप धारण करके आए थे। पांचों पांडवों व द्रौपदी में से सबसे पहले द्रौपदी की मृत्यु हुई थी, तत्पश्चात क्रमशः सहदेव, नकुल, अर्जुन तथा भीम की मृत्यु हुई थी। किन्तु युधिष्ठिर सशरीर स्वर्गलोक पहुंचे थे तथा श्वान के रूप में यमराज निरंतर उनके साथ रहे। यदि इसे दूसरे शब्दों में व्याख्यायित करें, तो श्वान धर्म और जीवन का रक्षक होता है। यूं भी कुत्ता सबसे वफादार प्राणी माना जाता है। किन्तु हम ऐसे प्राणी को आवारा जीवन जीने को विवश करते हैं। उनके नन्हें पिल्ले जब भूख से लड़खड़ाते दिखते हैं तब भी हम उनके लिए कोई स्थाई व्यवस्था किए जाने के बारे में गंभीरता से विचार नहीं करते हैं।

हमारे तमाम कानूनों और संवेदनशीलताओं के बावजूद सड़कों पर आवारा पशु घूम रहे हैं। क्या हमें उन विदेशों से आवारा पशुओं की समस्या से निपटना नहीं सीखना चाहिए, जिनसे हम अपने देश की सड़कों की तुलना करते हैं? अमेरिका की सड़कों पर आवारा पशु नहीं दिखते, क्योंकि वहां पशुओं को आवारा छोड़ना अपराध है और इसके लिए कड़ी सजा का प्रावधान है। वहां पालतू जानवरों को बाहर ले जाते समय गंदगी फैलाना भी अपराध है। ऐसा करने वाले को जुर्माना भरना पड़ता है, अन्यथा जेल की सजा काटनी पड़ती है। हमने इस मामले में उनके जैसा बनने में रुचि नहीं दिखाई है। सुबह-सवेरे संपन्न, पढ़े-लिखे लोग अपने अच्छे नस्ल के कुत्तों को इधर-उधर ‘‘पाॅटी’’ कराते नजर आते हैं। क्या यह अच्छी नागरिकता की निशानी है? पालतू कुत्तों को इस तरह शौच के लिए गंदी जगहों पर ले जाने से जहां कुत्तों के स्वास्थ्य के लिए खतरा रहता है, वहीं वातावरण भी प्रदूषित होता है। इससे मानव स्वास्थ्य के लिए भी खतरा बढ़ता है। जो पालतू कुत्तों को ‘‘पाॅटी’’ के लिए घर से बाहर ले जाते हैं, वे भला आवारा पशुओं की चिंता क्यों करेंगे? इससे भी अधिक आवारा पशु वातावरण में जहां-तहां गंदगी फैलाते हैं, किन्तु हम उस ओर ध्यान ही नहीं देते हैं। गोया न हमें प्रदूषण की चिंता है और न अपने स्वास्थ्य की।

हममें से ज्यादातर लोग ऐसे हैं जिन्हें आवारा पशु अधिनियम के बारे में कोई जानकारी नहीं है। इस संबंध में न तो सरकार की ओर से कोई गंभीर जानकारी दी जाती है और न ही कोई सख्ती बरती जाती है। आवारा पशुओं के लिए सुरक्षित आश्रय स्थलों का भी अभाव है। कांजीहाउस लगभग गायब हो चुके हैं। नगर निगम या नगर पालिका के कर्मचारियों को आवारा पशुओं को पकड़ने का कोई औपचारिक प्रशिक्षण नहीं दिया जाता, इसलिए जब वे ड्यूटी पर होते हैं, तो अपनी जान जोखिम में डालकर जैसे-तैसे काम करते हैं। हम चाहे जितना भी स्मार्ट सिटी या शहरों के सौंदर्यीकरण का राग अलापें, लेकिन जब तक हम आवारा पशुओं की समस्या का समाधान नहीं करेंगे, तब तक सारी प्रगति अपने हाथों अपनी पीठ थपथपाने जैसी ही होगी। हमारे द्वारा छोड़े जा रहे आवारा पशु हमारे पर्यावरण को प्रदूषित और नष्ट कर रहे हैं और हम चुपचाप देख रहे हैं, क्योंकि इसके लिए हम ही जिम्मेदार हैं।      
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Wednesday, June 5, 2024

चर्चा प्लस | रामकथा में है पर्यावरण की अतुलनीय चेतना | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर

चर्चा प्लस   
रामकथा में है पर्यावरण की अतुलनीय चेतना
    - डाॅ (सुश्री) शरद सिंह                                                                                        
      रामकथा एक ऐसी कथा है जो अनेक काव्यों एवं महाकाव्यों में प्रस्तुत की गई है। वाल्मीकि कृत ‘‘रामायण’’ सबसे अधिक लोकप्रिय है और उत्तर भारत में तुलसीदास कृत ‘‘रामचरित मानस’’। विभिन्न भाषाओं एवं विभिन्न देशों में भी रामकथा लिखी गई है। क्योंकि यह कथा सभी के लिए श्रद्धा की पात्र है। लेकिन रामकथा के उन पहलुओं पर गौर नहीं किया जाता है, जिन्हें अगर हम समझ लें, तो हमारी आने वाली पीढ़ियों का भविष्य सुरक्षित हो सकता है। रामकथा सिर्फ एक धार्मिक कथा नहीं है वरन यह एक जीवनशैली है जिसमें हर कदम पर प्राकृतिक तत्वों का महत्व स्थापित किया गया है। एक बार इस दृष्टि से भी रामकथा पढ़ कर देखिए, पर्यावरण के प्रति चेतना जाग उठेगी।
रामकथा में प्रत्येक जड़-चेतन की पारस्परिक महत्ता और उसमें निहित संतुलन को पात्रों के रूप में सामने रखा गया है। तुलसीदास के ‘‘रामचरित मानस’’ की चैपाइयों और दोहों को याद करें तो मनुष्य का समस्त जड़-चेतन से अंतर्सम्बन्ध ज्ञात हो जाता है। पत्थर की बनी अहिल्या, वनवासी मानव, बंदर, जटायु जैसे पक्षी आदि प्रसंग यूं ही नहीं है, बल्कि इनके माध्यम से प्रकृति के महत्व को समझने का संदेश दिया गया है। आज जब हम ग्लोबल वार्मिंग से भयभीत हो कर पर्यावरण चेतना को बढ़ावा देने की बात करते हैं, तो उस समय याद रखना खहिए कि पर्यावरण संतुलन का संदेश हमारे वेदों, पुराणों, उपनिषदों और महाकाव्यों में समाहित है। जो हमारे पूर्वज सैंकड़ों, हजारों वर्ष पूर्व हमारे लिए लिख कर छोड़ गए हैं।
‘‘रामायण’’ और ‘‘रामचरित मानस’’ में वर्णित रामकथा पर्यावरण के प्रत्येक तत्व की महत्ता को प्रस्तुत करती है। वस्तुतः रामकथा केवल धर्म और आस्था से जुड़ी कथा ही नहीं है, बल्कि इसमें पर्यावरण चेतना का अद्भुत रूप देखने को मिलता है। जिसका प्रमाण है कि रामकथा में जीव, आर्जव अर्थात जड़ और चेतन सभी तत्वों को मानवीय दृष्टिकोण से देखा गया है। रामकथा में बंदर, हिरण, हाथी, घोड़े आदि पशुओं का उल्लेख मिलता है। इसी प्रकार मोर, चकोर, तोता, कबूतर, सारस, हंस, कौआ, गिद्ध, चील आदि पक्षियों का महत्वपूर्ण स्थान है। जहां मृग का पत्ते पर विचरण करने का वर्णन और स्वर्ण मृग का वर्णन जंगली पशुओं की उपस्थिति को दर्शाता है, वहीं स्वर्ण मृग की घटना मृग शिकार के दुष्परिणामों को सामने रखती है। जब रावण द्वारा सीता का हरण कर लिया जाता है, तब श्रीराम व्याकुल होकर प्रत्येक प्राकृतिक तत्वों से सीता का पता पूछते हैं। श्रीराम लताओं और वृक्षों से पूछते हैं कि-‘‘हे पक्षी! हे पशु-पक्षियों! हे भौंरों! क्या तुमने मृगनयनी सीता को कहीं देखा है? खंजन, तोता, कबूतर, मृग, मछली, भौंरों का समूह, प्रवीण कोयल तुम बताओ क्या तुमने सीता को देखा है?’’
हे खग मृग हे मधुकर श्रेनी। तुम्ह देखी सीता मृगनैनी।।
खंजन सुक कपोत मृग मीना। मधुप निकर कोकिला प्रबीन।।

  रामकथा में कौए और गरुड़ को विशेष स्थान दिया गया है। ये दोनों जंगली और शहरी पक्षियों के प्रतिनिधि समान हैं। कागभुशुंडि, जटायु, सम्पाती और गरुड़ के रूप में पक्षियों का महत्व दर्शाया गया है। कागभुशुंडि वह पात्र हैं, जिन्होंने पक्षीराज गरुड़ को उनकी शंका दूर करने के लिए रामकथा सुनाई थी। जयंत की कथा में जयंत को जीवनदान इसीलिए मिला क्यों कि वह कौए का रूप धर कर पहुंचा था। ‘‘रामचरित मानस’’ में तुलसीदास ने इस कथा का विस्तार से वर्णन किया है। कथा के अनुसार एक बार देवराज इंद्र के पुत्र जयंत ने श्रीराम की परीक्षा लेने की ठानी। उसने कौए का रूप धारण किया और सीता के पास पहुंच गया। उसने सीता के पांव को अपनी चोंच से घायल कर दिया।
सीता चरन चोंच हति भागा। मूढ़ मंदमति कारन कागा।।
चला रुधिर रघुनायक जाना। सींक धनुष सायक संधाना।।
यह देख कर श्रीराम क्रोधित हो उठे। उन्होंने अपने कोदंड नाम के धनुष पर सरकंडे को चढ़ाकर उस कौए पर निशाना साधा। यह देख कर कौए के रूप में आया जयंत भयभीत हो उठा। वह भाग कर  अपने पिता देवराज इन्द्र के पास पहुंचा। इन्द्र सहित सभी देवताओं ने उसकी रक्षा करने से मना कर दिया। तब नारद ने उसे सलाह दी कि ‘‘श्रीराम के बाण से कोई तुम्हें नहीं बचा सकता है। उनके बाण से तुम्हारी रक्षा सिर्फ स्वयं श्रीराम ही कर सकते हैं। तुम उन्हीं के शरण में जाओ।’’
पठवा तुरत राम पहिं ताही। कहेसि पुकारि प्रनत हित पाही।।
नारद की सलाह मान कर जयंत श्रीराम के पास पहुंच कर उनके चरणों में गिर पड़ा। तब श्रीराम ने कहा कि वे अपने बाण को वापस तो नहीं ले सकते हैं, लेकिन फिर भी जीवनदान दे सकते हैं। तब श्रीराम ने अपने उस बाण से कौए के रूप में मौजूद जयंत की एक आंख फोड़ दी। उसी दिन से कौए को एक आंख वाला माना जाने लगा। यदि यह कुकर्म जयंत ने अपने वास्तविक रूप में किया होता तो संभवतः श्रीराम उसे जीवनदान नहीं देते, किन्तु कौए के रूप में होने के कारण उन्होंने उसे एक उद्दंड पक्षी मानते हुए मात्र दंड दिया, उसके प्राण नहीं लिए।
पक्षीराज जटायु ने सीता को रावण से छुड़ाने के लिए अपने प्राण तक दांव पर लगा दिए थे। यह भी मानव जीवन में पक्षियों के महत्व को सिद्ध करने वाला प्रसंग है। जब रावण सीता का हरण कर लंका ले जा रहा था, तब जटायु ने सीता को रावण से छुड़ाने का प्रयास किया था। इससे क्रोधित होकर रावण ने उसके पंख काट दिए जिससे वह जमीन पर गिर पड़ा। जब राम और लक्ष्मण सीता को खोजते हुए वहां पहुंचे, तो उन्हें सीता हरण का पूरा विवरण जटायु से ही पता चला।
तब कह गीध बचन धरि धीरा। सुनहु राम भंजन भव भीरा।।
नाथ दसानन यह गति कीन्ही। तेहिं खल जनकसुता हरि लीन्ही।।

स्मरण रहे कि जटायु गिद्ध प्रजाति का था। अर्थात रामकथा हमें बताती है कि जिस पक्षी को हम मरे हुए जानवरों का मांस खाने वाला पक्षी कहकर नीची नजर से देखते हैं, वह भी मानव जीवन के लिए लाभकारी है। वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए तो गिद्ध उच्च कोटि का सफाईकर्मी है।
रामकथा में अहिल्या की कथा जड़ तत्व के रूप में पत्थर की महत्ता को उजागर करती है। ‘‘रामचरित मानस’’ में अहिल्या को शिला कहा गया है जबकि वाल्मीकि कृत रामायण के बालकाण्ड, सर्ग 48, श्लोक 30 में उसे भस्म अर्थात राख में पड़ी हुई कहा गया है-
वातभक्षा निराहारा तप्यन्ती भस्मशायिनी।
अदृश्या सर्वभूतानामाश्रमेऽस्मिन् वसिष्यसि।।
अर्थात ऋषि गौतम ने अहिल्या को शाप देते हुए कहा कि- ‘‘दुराचारिणी! तू भी यहां कई हजार वर्षों तक केवल हवा पीकर या उपवास करके कष्ट उठाती हुई राख में पड़ी रहेगी। समस्त प्राणियों से अदृश्य रहकर इस आश्रम में निवास करेगी।’’
 चाहे राख में दबा पाषाण हो या उजागर शिला, बात एक ही है। वस्तुतः अहिल्या की कथा को वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए तो पृथ्वी के अकार्बनिक घटकों के निर्माण में कार्बनिक घटकों के मिलने की प्रक्रिया पाई जाती है। विशालकाय वृक्ष जब गिरकर जमीन में दब जाते हैं तो लाखों-करोड़ों वर्षों में पत्थर में बदल जाते हैं। अहिल्या भी पहली जीवित स्त्री थीं, जिसे श्राप देकर चट्टान बना दिया गया था। श्रीराम के चरणों का स्पर्श पाकर वह पुनः जीवित हो उठी। ठीक वैसे ही जैसे वातावरण की अनुकूलता पाकर चट्टानों से अंकुर फूट पड़ते हैं।
रामकथा में जिन जलाशयों जैसे कुएं, नदी, झील और समुद्र आदि का उल्लेख किया गया है, वे सभी जल से भरे हुए हैं, इनमें से किसी में भी जल की कमी का कोई चिन्ह नहीं है। इन जलाशयों का वातावरण स्वच्छ और जलीय जंतुओं से भरा हुआ है। अर्थात त्रेतायुग में जल संरक्षण जीवनशैली का अभिन्न अंग था। किसी को भी जल की कमी का दंश नहीं झेलना पड़ता था। राम कथा में एक मनोरम प्रसंग है जिसमें सीता पहली बार श्री राम को देखती हैं। ऐसा बगीचा जहां सरोवर भी है, कमल भी है, पक्षी कल-कल कह रहे हैं और भौंरे गुनगुना रहे हैं।
मध्य बाग सरु साह सुहावा। मनि सोपान विचित्र बनावा।।
बिमल सलिलु सरसिज बहुरंगा। जलखग कुजत गुंजत भृंगा।।

आज वनों का उत्पादन तेजी से घट रहा है। जब वन ही कम होते जा रहे हैं तो वनों का उत्पादन कहां से अधिक होगा? शहरों के विस्तार ने भी पर्यावरण को भारी क्षति पहुंचाई है। लेकिन रामकथा में शहरों के साथ-साथ गांवों और वनवासियों का भी समान रूप से वर्णन किया गया है। आज हम समुद्र के किनारों को सुखाकर अपनी बस्तियां फैला रहे हैं। यह समुद्र के जल और भूमि पर अतिक्रमण है। इस संदर्भ में उस घटना को याद करना आवश्यक है जब श्रीराम तीन दिनों तक समुद्र की स्तुति करते हैं लेकिन समुद्र पार जाने का रास्ता नहीं देता। तब श्रीराम मानव अवतार के वश में होकर समुद्र पर क्रोधित होते हैं और उसे सुखाने के लिए धनुष पर बाण चढ़ाते हैं। तब समुद्र प्रकट होकर श्रीराम से कहता है कि आप सर्वशक्तिमान हैं, आप चाहें तो मुझे क्षण भर में सुखा सकते हैं लेकिन सूखना मेरा स्वभाव नहीं है। इसलिए आप इसमें सफल नहीं होंगे।
तत्स्वभावो ममाप्येष यदगाधोहमप्लवहः
विकारस्तु भवेद् गाध एतत ते प्रवदाम्यहम।
तब श्रीराम समुद्र से कहते हैं कि आप कोई उपाय बताएं। इस पर समुद्र रामनाम की चट्टानों को जल में तैराने का उपाय बताता है। जिस पर अमल करते हुए वानरों और भालुओं की सेना चट्टानों पर श्रीराम का नाम लिखकर ‘‘रामसेतु’’ बना देती है। अर्थात रामकथा कहती है कि समुद्र हो या नदी, प्रकृति को नुकसान पहुंचाए बिना विकास का रास्ता खोजना चाहिए। लकिन आज हम मनुष्य समुद्र अथवा नदियों के मूल स्वभाव की परवाह किए बिना उस पर अतिक्रमण करते जा रहे हैं, उन्हें गंदा कर रहे हैं।
रामकथा में कहीं भी पर्यावरण असंतुलन या पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने का जिक्र नहीं है। जब लक्ष्मण क्रोध में आकर अपने बाण से जल में आग लगाने को तैयार हो जाते हैं, तो वहां भी जल देवता हमें जल जीवों की रक्षा करने की याद दिलाते हैं और जल जीवों को नुकसान नहीं पहुंचाया जाता। रामकथा में पर्यावरण के हर तत्व को महत्व दिया गया है। इसलिए यदि रामकथा के पर्यावरणीय सार को आत्मसात कर लिया जाए, तो पर्यावरण संरक्षण के मार्ग में आने वाली बाधाओं को आसानी से दूर किया जा सकता है और पर्यावरण चेतना को आम जनमानस तक बहुत आसानी से पहुंचाया जा सकता है।
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Wednesday, April 3, 2024

चर्चा प्लस | लोक जीवन में जल और पर्यावरण के सरोकार | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर

चर्चा प्लस  
लोक जीवन में जल और पर्यावरण के सरोकार
    - डाॅ (सुश्री) शरद सिंह                                                                                        
      गर्मियां शुरू होते ही सबसे पहली चिन्ता जागती है जल समस्या की। जल का घटता हुआ स्तर इस बात की संभावना प्रकट करने लगता है कि आगे चल कर दिन और कठिनाइयों भरे और शुष्क होंगे। वहीं यदि हम अपनी लोक चेतना को टटोलें तो पाएंगे कि लोक जीवन में जल और पर्यावरण के प्रति हमेशा जागरूकता रही है। यह जागरूकता किसी नारे या अभियान के समान नहीं थी बल्कि प्रकृति ये आत्मीयता के रूप में थी। एक रिश्तेदारी के रूप में थी। संकट तभी से शुरू हुआ जब से हमने प्रकृति से अपनी रिश्तेदारियां को भुला दीं और हम उसके शोषणकर्ता बन गए।      
    महात्मा गांधी ने 26 सितम्बर 1929 के ‘यंग इंडिया’ के अंक में लिखा था- ‘‘ऐसी हालत में वृक्ष-पूजा में कोई मौलिक बुराई या हानि दिखाई देने के बजाए मुझे तो इसमें एक गहरी भावना और काव्यमय सौंदर्य ही दिखाई देता है। वह समस्त वनस्पति-जगत् के लिए सच्चे पूजा-भाव का प्रतीक है। वनस्पति-जगत तो सुन्दर रूपों बौर आकृतियों का अनन्त भण्डार है। उनके द्वारा वह मानो असंख्य जिह्वाओं से ईश्वर की महानता और गौरव की घोषणा करता है। वनस्पति के बिना इस पृथ्वी पर जीवधारी एक क्षण के लिए भी नहीं रह सकते। इसलिए ऐसे देश में जहां खासतौर पर पेड़ों की कमी है, वृक्ष पूजा का एक गहरा आर्थिक महत्व हो जाता है।’’

जल और पर्यावरण दोनों ही जीवन के आवश्यक तत्व हैं। जल के बिना जीवन संभव नहीं है और स्वस्थ पर्यावरण के बिना जल की उपलब्धता संभव नहीं है। हमारे ऋषि-मुनियों को पर्यावरण का समुचित ज्ञान था। उन्होंने जड़ जगत अर्थात् पृथ्वी, नदियां, पर्वत्, पठार आदि तथा चेतन जगत अर्थात् मानव, पशु, पक्षी, वनस्पति आदि के पारस्परिक सामंजस्य को भी समझा और इस सामंजस्य को पर्यावरण के एक आवश्यक तत्व के रूप में निरूपित किया।वे समझ गए थे कि जड़ एवं चेतन तत्वों में किसी की भी क्षति होने से प्रकृति का संतुलन बिगड़ सकता है। इसीलिए उन्होंने प्रत्येक तत्व के प्रति आदर-भाव को प्रतिपादित किया। ताकि मानव किसी भी तत्व को क्षति न पहुंचाए। हम धीरे-धीरे इन प्राचीन मूल्यों को भूलते गए जिसके फलस्वरूप आज हमें पर्यावरण असंतुलन के संकट से जूजना पड़ रहा है। उदाहरण के लिए - जब तक हमारे मन-मस्तिष्क में वृक्ष देवता के रूप में अंकित रहे तब तक हमने वनों की अंधाधुंध कटाई नहीं की। किन्तु जैसे-जैसे हमने वन एवं वृक्षों को देवतुल्य मानना छोड़ दिया वैसे-वैसे वे हमें मात्र उपभोग की वस्तु दिखने लगे और हमने उन्हें अंधाधुंध काटना शुरू कर दिया।
 
आज दुनिया के अधिकांश देश जल-संकट से जूझ रहे हैं। भारत जैसे विशाल जनसंख्या वाले देश में पेय-जल का संकट सबसे भयावह संकट कहा जा सकता है। जिस देश में कभी कुए, तालाब और नदियों की कमी नहीं रही वहां के आमजन को आज पीने के पानी के लिए जूझना पड़ रहा है। देश में कई ऐसे क्षेत्र हैं जहंा एक घड़ा पानी लाने के लिए औरतों को चार-पांच किलोमीटर से भी अधिक की दूरी तय करनी पड़ती है। हमारे देश में पानी के संकट का सबसे बड़ा कारण आबादी के अनुपात में घटते हुए जल संसाधन हैं। इस मामले में कहा जा सकता है कि हमारे पूर्वज हमसे कई गुना अधिक दूरदर्शी थे। क्यों कि जिस समय जल की कोई कमी नहीं थी उस समय भी उन्होंने जल को संरक्षित करने के आचरण को अपनाया। वैदिक ग्रंथों में इस तथ्य का अनेक स्थानों पर उल्लेख है।
 
लोक जीवन में आज भी जल और पर्यावरण के प्रति सकारात्मक चेतना पाई जाती है। एक किसान धूल या आटे को हवा में उड़ा कर हवा की दिशा का पता लगा लेता है। वह यह भी जान लेता है कि यदि चिड़िया धूल में नहा रही है तो इसका मतलब है कि जल्दी ही पानी बरसेगा। लोकगीत, लोक कथाएं एवं लोक संस्कार प्रकृतिक के सभी तत्वों के महत्व की सुन्दर व्याख्या करते हैं। लोक जीवन की धारणा में पहाड़ मित्र है तो नदी सहेली है, धरती मंा है तो अन्न देवता है। प्रकृति के वे सारे तत्व जिनसे मिल कर यह पृथ्वी और पृथ्वी पर पाए जाने वाले सभी जड़-चेतन मनुष्य के घनिष्ठ हैं, पूज्य हैं ताकि मनुष्य का उनसे तादात्म्य बना रहे और मनुष्य इन सभी तत्वों की रक्षा के लिए सजग रहे।
आज हम नदियों की स्वच्छता और जल-स्तर को ले कर चिन्तित हैं वहीं एक नदी लोकजीवन में किस तरह आत्मीय हो सकती है यह तथ्य बुन्देलखण्ड में गाए जाने वाले बाम्बुलिया लोकगीत में देखा जा सकता है। एक नदी लोकजीवन में किस तरह आत्मीय हो सकती है यह तथ्य बुन्देलखण्ड में गाए जाने वाले बम्बुलिया लोकगीत में देखा जा सकता है। बुंदेलखण्ड में नर्मदा को मां का स्थान दिया गया है। नर्मदा स्नान करने नर्मदातट पर पहुंची मनुष्यों की टोली नर्मदा को देखते ही गा उठती है-
नरबदा मैया ऐसे तौ मिलीं रे
अरे, ऐसे तौ मिलीं के जैसे मिले मताई औ बाप रे
नरबदा मैया... हो....
भोजपुरी लोकगीत में गंगा को मां, यमुना को बहन, चांद और सूरज को भाई कहा गया है और साथ ही स्त्री की झिझक को प्रकट करते हुए यह भी कहा गया है कि इनके द्वारा अपने परदेसी पति को संदेश कैसे भिजवाऊ?
चननिया छिटकी मैं का करूँ
गुझ्या गंगा मोरी मइया,
जमुना मोरी बहिनी,
चान सुरुज दूनो भइया,
पिया को संदेस भेजूं गुंइया।

 वनस्पति के मानवीकरण भोजपुरी लोकगीतों में बड़े सुन्दर ढंग से मिलता है। जैसे उपनयन, विवाह आदि सरकारों में तीर्थस्थल गया को और तीर्थराज प्रयाग को निमत्रण भेजा जाता है-
गया जी के नेवतिले आजु
त नेवीती बेनीमाधव हो।
नवतिले तीरथ परयाग,
तबही जग पूरन...।
अर्थात जब गया और तीर्थराज प्रयाग जैसे पावन स्थलों का आवाहन किया जाएगा तभी यज्ञ तभी पूरा होगा। आधुनिक समाज में जिन लोक संस्कारों को पुरातन मान्यता कह कर अनदेखा कर दिया जाता है उन लोक संस्कारों में भी जल और पर्यावरण के प्रति जागरूकता के अनेक तत्व मौजूद हैं। कुछ उदाहरण यहां प्रस्तुत हैं -
मातृत्व साझा कराना - सद्यःप्रसूता जब पहली बार प्रसूति कक्ष से बाहर निकलती है तो सबसे पहले वह कुएं पर जल भरने जाती है। यह कार्य एक पारिवारिक उत्सव के रूप में होता है। उस स्त्राी के साथ चलने वाली स्त्रियां कुएं का पूजन करती हैं फिर प्रसूता स्त्री अपने स्तन से दूध की बूंदें कुएं के जल में निचोड़ती हैं। इस रस्म के बाद ही वह कुएं से जल भरती है। इस तरह पह पेयजल को अपने मातृत्व से साझा कराती है क्योंकि जिस प्रकार नवजात शिशु के लिए मां का दूध जीवनदायी होता है उसी प्रकार समस्त प्राणियों के लिए जल जीवनदायी होता है।
कुआ पूजन - विवाह के अवसर पर विभिन्न पूजा-संस्कारों के लिए जल की आवश्यकता पड़ती है। यह जल नदी, तालाब अथवा कुए से लाया जाता है। इस अवसर पर रोचक गीत गाए जाते हैं। ऐसा ही एक गीत है जिसमें कहा गया है कि विवाह संस्कार के लिए पानी लाने जाते समय एक सांप रास्ता रोक कर बैठ जाता है। स्त्रियां उससे रास्ता छोड़ने का निवेदन करती हैं किन्तु वह नहीं हटता है। जब स्त्रियां उसे विवाह में आने का निमंत्रण देती हें तो वह तत्काल रास्ता छोड़ देता है।
सप्तपदी में जल विधान - विवाह में सप्तपदी के समय पर जो पूजन-विधान किया जाता है, उसमें भी जल से भरे मिट्टी के सात कलशों का पूजन किया जाता है। ये सातो कलश सात समुद्रों के प्रतीक होते हैं। इन कलशों के जल को एक-दूसरे में मिला कर दो परिवारों के मिलन को प्रकट किया जाता है।
पूजा-पाठ में जल का प्रयोग - पूजा-पाठ के समय दूर्वा से जल छिड़क कर अग्नि तथा अन्य देवताओं को प्रतीक रूप में जल अर्पित किया जाता है जिससे जल की उपलब्धता सदा बनी रहे।
मृत्यु संस्कार में जल का प्रयोग -  मृत्यु संस्कार में जल से भरा हुआ घट उपयोग में लाया जाता है।  

कहने का आशय यही है कि लोक जीवन में जीवन के आरम्भ से ले कर जीवन के समापन तक जल की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है।
जीवन में जल के महत्व, उसके संरक्षण और पर्यावरण संतुलन के विचार को व्यापक रूप से प्रचारित और प्रसारित करने के लिए आवश्यक है कि हम आधुनिक वैज्ञानिक संसाधनों एवं धारणाओं के साथ-साथ परम्परागत लोकमूल्यों एवं विचारों को भी माध्यम बना कर चलें। इस तरह हम उन सभी में जल और पर्यावरण के संरक्षण के प्रति पुनः चेतना ला सकेंगे जो उपभोक्तावादी आधुनिकता से भ्रमित हो कर इस पृथ्वी सहित स्वयं के भविष्य को नष्ट करने की दिशा में चल पड़े हैं। या दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि ऐसे लोग जिस डाल पर बैठे हैं, उसी को काट रहे हैं। इस डाल को बचाने के लिए लोक थाती से चेतना के तत्व उठा कर उन्हें वैज्ञानिक दृष्टिकोण से लोक मानस में एक बार फिर संचारित करना होगा ताकि वे सारे लोकतत्व जो जल और पर्यावरण संरक्षण में सहयोगी भूमिका निभा सकते हैं, उनका उपयोग किया जा सके। लेकिन इन सबके लिए हमें अपनी उस आत्मीयता पूर्ण लोक व्यवहार की ओर लौटना होगा जहां प्रकृति हमारी है और हम प्रकृति के हैं। आज जब हम अपने रक्तसंबंधियों से, पड़ोसियों से, परिचितों से तक दूर होते जा रहे हैं तो प्रकृति से निकट होने की आशा करना खोखली आशा प्रतीत होती है। हमें अपने भीतर उस आत्मीयता को फिर से जगाना होगा जो यह सिखाती है कि यदि हमारे पास एक रोटी है तो हम उसे आपस में बांट कर खाएं। जरा सोचिए यदि एक समर्थ व्यक्ति बिजली की मोटर लगा कर जलस्रोत का पूरा पानी खींच ले तो बाकी लोगों के हिस्से में तो जल संकट ही आएगा। यदि उसी पानी को मितव्ययिता से और आपस में बांट कर काम में लाएंगे तो कोई संकट पैदा नहीं होगा। लोकजीवन में यही मूलमंत्र था जिसने प्रकृति को हर तरह के संकटों से सदियों तक बचाया।  
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Wednesday, August 2, 2023

चर्चा प्लस | पर्यावरण के बारे में बहुत कुछ कहता है ‘महाभारत’ | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर

चर्चा प्लस  
पर्यावरण के बारे में बहुत कुछ कहता है ‘महाभारत’         
    - डाॅ (सुश्री) शरद सिंह                                                                                      
     हमारे आदिग्रन्थ, हमारे महाकाव्य हमारे आदर्श ग्रन्थ हैं। हम उन्हें आदरपूर्वक पढ़ते हैं। हम उनका ‘पाठ’ करते हैं। लेकिन हम इस बात पर ध्यान नहीं देते कि ये महाकाव्य हमें पर्यावरण का महत्व भी बताते हैं। महाभारत महाकाव्य, जिसे हम राजनीतिक दांव-पेचों से भरी कहानी के रूप में देखते हैं, उसमें भी कई स्थानों पर पर्यावरण की चर्चा की गई है। राजनीति में माहिर विदुर सिर्फ राजनीति पर ही सलाह नहीं देते बल्कि पर्यावरण संरक्षण की भी सलाह देते हैं। भीष्म सिर्फ राज्य की रक्षा की बात नहीं करते बल्कि युधिष्ठिर को पेड़ों को कटने से बचाने की सलाह देते हैं। खांडव वन के जलने की कहानी अपने आप में एक गंभीर पर्यावरणीय शिक्षा देती है। यानी महाभारत पर्यावरण के बारे में बहुत कुछ कहता है, बस इस पर ध्यान देना जरूरी है।
महाभारत में धर्म और नीति के आदर्श के साथ-साथ प्राकृतिक जगत का विस्तृत चिंतन मिलता है। पर्यावरण संरक्षण पारिस्थितिकी की चिंता में हिंदुओं ने बहुत सकारात्मक प्रतिक्रिया दी है। कहते हैं ‘‘एक वृक्ष दस पुत्रों के समान होता है’’। महाभारत में इसका विस्तार से वर्णन किया गया है। महाभारत में अनेक स्थानों पर वृक्षों का महत्व देखने को मिलता है। इसके अंतर्गत महाभारत के वनपर्व में विदुरनीति के अंतर्गत वृक्षों एवं वनस्पतियों के संवर्धन के प्रयासों के अनेक उदाहरण दिये गये हैं। अनेक प्रकार की वनस्पतियों का वर्णन है। पौधे के प्रकार के सन्दर्भ में कहा गया है-
वनस्पतेरपक्वानि फलानि प्रचिनोति ।
स नाप्नोति रस तेम्यो बीज चास्य विनश्यति ।।
व्यस्तु पक्वमुपादत्ते काले परिणत फलम् ।
फलाद्रसं से लगते बीजाच्चैव फलं पुन ।
- विदुर ने लोगों को उपदेश दिया कि जिस प्रकार भ्रमर फूलों से रस लेकर शहद प्राप्त करता है, उसी प्रकार न तो फूल को कोई नुकसान पहुंचता है और भृंग भी अपना भोजन प्राप्त कर लेते हैं। हमें भी प्रकृति के प्रति ऐसा ही व्यवहार करना चाहिए अर्थात हमें प्रकृति से इतना लेना चाहिए कि उससे प्रकृति को कोई नुकसान भी न हो और हमारी जरूरतें भी पूरी हो जाएं। हमें पौधों से फूल तो इकट्ठा करने चाहिए, लेकिन कभी भी उन्हें पूरी तरह से नष्ट करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए।

महाभारत के अनुशासन पर्व में जल संरक्षण को महान धार्मिक कार्य घोषित करते हुए देश या ग्राम में एक तालाब के निर्माण को धर्म-अर्थ-काम तीनों का फल देने वाला बताया गया है-
तस्य पुत्राः भवन्त्येते पादपा नात्र संशयः ।
परलोकगतः स्वर्ग लोकाश्चाप्नोति सोव्ययान।।

नदियों के मौलिक रूप तथा उनका मानवीयकरण कर के महाभारत में कई कथाएं मौजूद हैं। महाभारत में भीष्म पितामह सबसे महत्वपूर्ण पात्रों में से एक हैं। वे हस्तिनापुर के महाराज शांतनु और गंगा नदी की आठवीं संतान थे। उनका मूल नाम देवव्रत था। भीष्म का समूचा जीवन ही केवट कन्या मत्स्यगंधा के कारण ब्रह्मचर्य में ढल गया। वस्तुतः भीष्म अर्थात् देवव्रत के पिता शांतनु केवट पुत्री मत्स्यगंधा पर मोहित हो गए। शांतनु ने केवट से उनकी पुत्री का हाथ मांगा किन्तु केवट ने कहा कि यदि मेरी पुत्री की संतान को राजा बनाए जाने का वचन दो तभी मैं अपनी पुत्री से तुम्हारा विवाह करूंगा। देवव्रत बड़ापुत्र था अतः वही राज्याभिषेक का अधिकारी था। जब देवव्रत ने अपने पिता को व्यथित देखा तो उसका कारण पता किया तथा केवट से जा कर भेंट की। देवव्रत ने केवट के समक्ष प्रतिज्ञा की कि वे कभी राजा नहीं बनेंगे। तब केवट ने शंका जताई कि भविष्य में यदि तुम्हारी संतान ने विरोध किया तो? इस पर देवव्रत ने भीष्म प्रतिज्ञा करते हुए आजन्म ब्रह्मचर्य का पालन करने का वचन दिया। अर्थात् एक नदी को पार कराने वाले केवट और उसकी पुत्री के आकांक्षा ने देवव्रत को भीष्म बना दिया। केवट और उसकी पुत्री नदी की निर्मलता और उपादेयता को नहीं समझ सके थे अन्यथा वे ऐसी प्रतिज्ञा नहीं कराते जो भविष्य में धर्म और अधर्म के बीच असंतुलन का कारण बनती।

महाभारत के अनुशासन पर्व के 58वें अध्याय में भीष्म ने युधिष्ठिर से कहा था-
अतीतानागते चोभे पितृवंश च भारत।
तारयेद् वृक्षरोपी च तस्मात् वृक्षांश्च रोपयेत।
- हे युधिष्ठिर! वृक्षों का रोपण करने वाला मनुष्य अतीत में जन्मे पूर्वजों और भविष्य में जन्म लेने वाली संतानों एवं अपने पितृवंश का तारण करता है। इसलिए उसे चाहिए कि पेड़-पौधे लगाए। दूसरे उपदेश में कहा गया -
तस्य पुत्रा भवन्त्येते पादपा नात्र संशय।
परलोगतरू स्वर्ग लोकांश्चाप्नोति सोव्ययानं।
- मनुष्य द्वारा लगाए गए पौधे वास्तव में उसके पुत्र होते हैं, इस बात में कोई शंका नहीं है। जब उस व्यक्ति का देहावसान होता है तो उसे स्वर्ग एवं अन्य अक्षय लोग प्राप्त होते हैं।

उद्योग पर्व में कहा गया है-
निर्वनो वघ्यते व्याघ्रो निव्र्याघ्रं  छिद्यते वनं।
तस्माद्व्याघ्रो वनं रक्षेद्वयं व्याघ्रं च पालयेत।।
अर्थात जंगल न हो तो बाघ मारा जाता है. यदि बाघ न हो तो जंगल नष्ट हो जाता है। इसलिए, बाघ जंगल की रक्षा करता है और जंगल बाघ की रक्षा करता है।

आज हम ऐसी कई घटनाएं सुनते हैं। क्या आपने कभी सोचा है कि हाथियों के झुंड गांवों पर हमला क्यों करते हैं या सांप जैसे जहरीले जानवर घरों में क्यों घुस जाते हैं? क्योंकि हम उनके घरों पर कब्जा कर रहे हैं, हम उनसे उनके आवास छीन रहे हैं। इसका परिणाम हमें किसी न किसी रूप में भुगतना ही पड़ता है। इस संबंध में महाभारत के आदिपर्व की दो कथाए बहुत महत्वपूर्ण हैं जो प्रकृति को नुकसान पहुँचाने से होने वाले नुकसान के बारे में आगाह करती हैं। ये दोनों कहानियां बताती हैं कि अगर मनुष्य प्रकृति को नुकसान पहुंचाएगा तो बदले में प्रकृति भी उसे नुकसान पहुंचाएगी और दुश्मनी का यह सिलसिला हमेशा चलता रहेगा। इससे किसी को फायदा नहीं होगा बल्कि नुकसान दोनों का होगा। पौराणिक कथा के अनुसार, अग्निदेव के अनुरोध पर श्रीकृष्ण और अर्जुन ने इंद्रप्रस्थ के पास खांडव वन को जला दिया था। अग्निदेव ने इस वन को जलाने की सात बार कोशिश की थी लेकिन हर बार असफल रहे। क्योंकि खांडव वन में देवराज इंद्र का मित्र तक्षक नाग रहता था। उसकी रक्षा के लिए इंद्र हर बार जल की वर्षा करते थे और अग्नि को जंगल जलाने के लिए हार माननी पड़ती थी। तब अग्नि ने कृष्ण-अर्जुन की मदद मांगी और इंद्र के विरोध करने पर कृष्ण को चक्र और कौमोद की गदा, अर्जुन को गांडीव धनुष, दो अक्षत तरकश और इंद्र सहित देवताओं से युद्ध करने के लिए दिव्य कपिध्वज रथ दिया गया। तब कृष्ण-अर्जुन ने दिव्यास्त्रों की सहायता से विशाल खांडव वन को जला डाला। इस घटना के समय तक्षक जंगल में नहीं था, हालांकि इंद्र ने जंगल को बचाने की पूरी कोशिश की लेकिन वे उसे बचा नहीं सके। परिणामस्वरूप, जंगल के लाखों पेड़ भीषण आग में जल गए, उसमें रहने वाले असंख्य पशु-पक्षी भी आग में जलकर राख हो गए। तक्षक के पुत्र नाग अश्वसेन, मयासुर और चार शारंग पक्षियों को छोड़कर कोई भी जानवर और वनस्पति नहीं बची।
आदि पर्व के आस्तीक पर्व में कथा है कि खांडव वन जलाने के प्रतिशोध में तक्षक नाग ने अर्जुन के पौत्र परीक्षित को काटकर मार डाला था। तब जब जनमेजय ने परीक्षित की हत्या का बदला लेने के लिए नागयज्ञ किया। तभी आस्तिक मुनि ने आकर उसे रोका। उस यज्ञ में बहुत से साँप जलकर भस्म हो गये, परन्तु तक्षक बच गया। मानो आस्तिक मुनि ने जनमेजय के बहाने हम सभी मनुष्यों को प्रतीकात्मक रूप से यह शिक्षा दी कि यदि प्रतिकार की प्रतिक्रिया प्रतिशोध ही है तो यह चक्र कभी समाप्त नहीं होगा। प्रकृति को अनावश्यक क्षति उस पर्यावरण को हानि पहुँचाती है जिसमें हम सभी मनुष्य रहते हैं। आज जलवायु परिवर्तन के भयावह परिणामों को देखकर इसे आसानी से समझा जा सकता है। इस तथ्य की व्याख्या हजारों वर्ष पहले ही महाभारत में कर दी गई थी। सबके साथ रहना भी हमारे हित में है, जब हम केवल अपने स्वार्थ की पूर्ति पर ध्यान केंद्रित कर वनों के विनाश का कार्य करते हैं तो एक समय यह सही लगता है, लेकिन इसका दुष्परिणाम हमें आने वाले समय में भुगतना पड़ता है। पीढ़ियों. प्रकृति और पेड़ों के विनाश से न केवल अकाल और जहरीली हवा का दुष्प्रभाव पड़ता है बल्कि अंत में हमारी भावी संतानों को भी इसकी कीमत चुकानी पड़ती है।

वेदव्यास ने वृक्षों में चेतना का होना माना है-
सुखदुःखयोश्च ग्रहणच्छिन्नस्य च विरोहणात।
जीव पश्यामि वृक्षाणामचैतन्य न विद्यते ।।

महाभारत में एक पूरा वन पर्व ही रखा गया है। जो वन संस्कृति का परिचायक है। महाकाव्य में कदलीवन, काम्यकवन, द्वैतवन, खाण्डववन जैसे अनेक वनों के नाम हैं और अनेक महत्वपूर्ण प्रसंग वन अंचल में ही घटित हुए हैं। वृक्ष, गुल्म, लता, वल्ली, त्वक्सार तथा तृण के रूप में स्थावर भूत वृक्षों की छह जातियों का भी वर्णन है। इनमे ऋषि-मुनियों के तपस्थल और आवास रहा है। अनेक राजा भी अपने गृहस्थाश्रम के कर्तव्यों से मुक्त होकर यथासमय वानप्रस्थी होकर वन की ओर उन्मुख होना अपना धर्म समझते हैं। कथा में देवापि से लेकर धृतराष्ट्र तक के वन गमन की कथाएं इसकी प्रमाण हैं। हिन्दू धर्म में जीवन के 4 प्रमुख भाग (आश्रम) किये गए हैं- ब्रम्हचर्य, ग्रृहस्थ, वानप्रस्थ और सन्यास। अर्थात तीसरे भाग वानप्रस्थ का अर्थ वन प्रस्थान करने वाले से है। मनुष्य की आयु 100 वर्ष मानकर प्रत्येक आश्रम 25 वर्षों का होता है- 1.ब्रम्हचर्य आश्रम (जन्म से 25 वर्ष तक)- शैक्षणिक उपलब्धियां एवं बौद्धिक विकास हेतु। 2.गृहस्थ आश्रम (25 से 50 वर्ष तक)- सामाजिक विकास हेतु धर्म,अर्थ,काम की प्राप्ति हेतु। 3.वानप्रस्थ आश्रम (50 से 75 वर्ष तक)-आध्यात्मिक उत्कर्ष हेतु। 4.सन्यास आश्रम (75 से 100 वर्ष तक)- मोक्ष प्राप्त करना।
वानप्रस्थ आश्रम को दो रूपों ‘‘तापस’’ और ‘‘सांन्यासिक’’ में विभाजित किया गया था। माना जाता था कि जो व्यक्ति वन में रहकर हवन, अनुष्ठान तथा स्वाध्याय (वेद और स्वयं का अध्ययन) करता था, वह ‘‘तापस वानप्रस्थी’’ कहलाता था। जो साधक कठोर तप करता तथा ईश्वराधना में निरन्तर लगा रहता था, उसे ‘‘सांन्यासिक वानप्रास्थी’’ कहा जाता था। वानप्रस्थ की ये दोनों अवधि वन में ही व्यतीत की जाती थी। अतः सामाजिक व्यवस्थाओं के अनुसार भी वनों का विशेष महत्व था। महाभारत में भीष्म द्वारा युधिष्ठिर को वृक्ष न काटने का स्पष्ट आदेश दिया गया है। हे युधिष्ठिर! अपने राज्य में भी फलदार वृक्ष न काटें। -
वनस्पतीन् भक्ष्यफलान् न च्छिन्द्युविषये तव ।
ब्राह्मणानां मूलफलं धर्म्यमाहुमनीषिणः ।।

महाभारत में वन का बहुत महत्व है। वन ही तो द्यूतक्रीड़ा में पराजित पांडवों की शरणस्थली थे। जब कौरवों और पांडवों के बीच द्यूतक्रीड़ा हुई तो उसमें दुर्योधन ने शर्त रखी थी कि यदि पांडव हार जाएंगे तो उन्हें  बारह वर्ष का वनवास तथा एक वर्ष अज्ञातवास के काटने पड़ेंगे। युधिष्ठिर ने इस शर्त को मान लिया था तथा पराजित होने के बाद उसे अपने भाइयों एवं द्रौपदी तथा माता कुंती के साथ वनगमन करना पड़ा था। वन में ही राक्षसी हिडिम्बा से भीम का विवाह हुआ था। अर्जुन ने शमी वृक्ष में अपना गांडीव धनुष छिपा कर रखा था। कहने का आशय है कि विविध संदर्भों के अंतर्गत महाभारत में वन के महत्व को बताया गया है।
          महाभारत कहता है, वस्तुतः मानव जीवन का अस्तित्व तभी तक सुरक्षित है, जब तक हमारा संपूर्ण पर्यावरण संतुलित एवं शुद्ध है। यह संतुलन तभी प्राप्त हो सकता है जब हम किसी भी जीवित प्राणी को नष्ट न करें, पेड़ों को न काटें और सभी चराचरों के प्रति प्रेम भाव रखें।
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Wednesday, May 11, 2022

चर्चा प्लस | पृथ्वी की छत में कोई छेद न होने दें | डॉ. (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर

चर्चा प्लस 
पृथ्वी की छत में कोई छेद न होने दें !
 - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह                                                                                
         पिछले कोरोना काल में बड़ी संख्या में हताहत हुए। जबकि, वैज्ञानिकों ने पाया कि दुनिया के अलग-अलग देशों में लॉकडाउन ने हानिकारक उत्सर्जन को कम किया, जिससे ओजोन परत में बढ़ते छिद्रों को कम करने में मदद मिली। लेकिन यह स्थायी समाधान नहीं था। दुनिया हमेशा के लिए लॉकडाउन नहीं रह सकती। अगर जंगलों को काटा गया, जलाया गया और फिर से जहरीले उत्सर्जन में वृद्धि हुई, तो फिर से ओजोन परत के लिए खतरा पैदा हो जाएगा। ये बातें आम आदमी को अनावश्यक लग सकती हैं, लेकिन ओजोन परत का संबंध इंसानों समेत हर जीव की सांस से है। इसलिए सभी को सोचना होगा।


प्रत्येक मनुष्य, प्रत्येक प्राणी को जीवित रहने के लिए श्वास की आवश्यकता होती है। हवा और पर्यावरण की पवित्रता ही स्वस्थ सांस दे सकती है। लेकिन हम इंसानों ने अपने हाथों से अपना घर जलाने और प्रदूषण फैलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। दिल्ली को ही लें तो हर साल सर्दियों में स्मॉग की वजह से वहां लोगों का दम घुटने लगता है. सांस की बीमारियां बढ़ती हैं और अब सांस लेने से तेजी से फैलने वाले कोरोना संक्रमण ने खतरा बढ़ा दिया है। मास्क के पीछे फंसी सांसें और उस पर साफ हवा की कमी स्वास्थ्य के लिए घातक परिणाम दे सकती है। लेकिन शुद्ध हवा, शुद्ध वातावरण कहां से आता है, जब हमने वातावरण को जहरीली गैसों का ‘‘डंपिंग स्टेशन’’ बना दिया है। यह सोचकर सुखद है कि इस कोरोना काल में दुनिया भर के देशों में किए गए लॉकडाउन ने पृथ्वी की छत यानी ओजोन परत की मरम्मत की है। कोरोना वायरस के प्रकोप के चलते दुनिया के ज्यादातर देशों को लॉकडाउन कर दिया गया है। उद्योगों का संचालन बंद था। सड़कों पर परिवहन सीमित हो गया। इससे वायु प्रदूषण अपने न्यूनतम स्तर पर पहुंच गया। नदियों का पानी साफ होने लगा, आसमान साफ और नीला नजर आने लगा। लॉकडाउन के दौरान बड़े पैमाने के उद्योग बंद होने से जहरीली गैसों के उत्सर्जन में भारी गिरावट आई, जिससे ओजोन परत के छिद्र सिकुड़ने लगे, सिकुड़ने लगे. लेकिन यह स्थायी समाधान नहीं है। कोरोना संक्रमण के बावजूद दुनिया अपनी पुरानी पटरी पर लौट आई है। यह आवश्यक भी है। उद्योग के बिना, अर्थव्यवस्था और विकास ढह जाएगा, और बेरोजगारी और भूख का प्रबंधन करना कठिन और कठिन हो जाएगा। कहने का तात्पर्य यह है कि जो हम अपनी नग्न आंखों से नहीं देखते हैं, वह हमारे जीवन के लिए भी महत्वपूर्ण है - ओजोन परत।

ओजोन परत में छेद का पता पहली बार वर्ष 1980 में लगाया गया था। जैसे-जैसे प्रदूषण बढ़ता गया, ओजोन छिद्र भी बढ़ता गया। जिससे सूरज की अल्ट्रावायलेट किरणें धरती पर पहुंचने लगीं, इससे त्वचा का कैंसर, मोतियाबिंद और प्रतिरक्षा प्रणाली को नुकसान के साथ-साथ पौधों को भी नुकसान पहुंचा। इससे बचने के लिए वर्ष 1987 में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल संधि की गई। ओजोन परत पृथ्वी के वायुमंडल की एक परत है। ओजोन परत सूर्य से आने वाली पराबैंगनी किरणों से हमारी रक्षा करती है। वायुमंडल में 91 प्रतिशत से अधिक ओजोन गैसें यहां मौजूद हैं, वहीं दूसरी ओर जमीनी स्तर पर ओजोन परत सूर्य की पराबैंगनी किरणों से बचाने के लिए एक सन स्क्रीन की तरह काम करती है। ओजोन परत की खोज 1913 में फ्रांसीसी भौतिकविदों फैब्री चार्ल्स और हेनरी बुसन ने की थी। पृथ्वी से 30-40 किमी की ऊंचाई पर 91 प्रतिशत ओजोन गैस मिलकर ओजोन परत बनाती है। ओजोन सूर्य की उच्च-आवृत्ति प्रकाश का 93 से 99 प्रतिशत अवशोषित करती है। ओजोन परत में छेद के लिए क्लोरोफ्लोरोकार्बन यानी सीएफसी गैसों को भी जिम्मेदार माना जा रहा है। 1985 में, ब्रिटिश अंटार्कटिक सर्वेक्षण के वैज्ञानिकों ने पहली बार अंटार्कटिक के ऊपर ओजोन परत में एक बड़े छेद की खोज की। वैज्ञानिकों को पता चला कि इसके लिए क्लोरोफ्लोरोकार्बन जिम्मेदार हैं। जिसके बाद दुनिया भर के देश इस गैस के इस्तेमाल को रोकने के लिए राजी हो गए और 16 सितंबर 1987 को मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर किए गए।
         मानव द्वारा बनाए गए रसायनों से ओजोन परत को काफी नुकसान होता है। ये रसायन ओजोन परत को पतला कर रहे हैं। कारखानों और अन्य उद्योगों से निकलने वाले रसायन हवा में फैलकर प्रदूषण फैला रहे हैं। ओजोन परत के क्षरण के कारण जलवायु परिवर्तन हो रहा है। ऐसे में अब गंभीर संकट को देखते हुए इसके संरक्षण को लेकर पूरी दुनिया में जागरूकता अभियान चलाया जा रहा है. लेकिन कोरोना संक्रमण के दौरान जहां लॉकडाउन ने उद्योगों को बाधित किया है और ओजोन परत को अस्थायी रूप से सैनिटाइज किया है, वहीं दूसरी ओर स्थायी समाधान की दिशा में कदम उठाकर लोगों और उनके धरना-प्रदर्शनों में बाधा आ रही है. अक्सर सरकारें बड़े उद्योगों के उत्पादन के घातक तरीकों को अपने दम पर रोकने में सक्षम नहीं होती हैं, लेकिन जब उन्हें जनता के दबाव के रूप में समर्थन दिया जाता है, तो वे ठोस कदम उठाने में सक्षम होते हैं। पर्यावरण के हित में किए जा रहे सक्रिय सामूहिक प्रयासों की गति में आई मंदी एक बार फिर पर्यावरण के समीकरण और जहरीली गैसों के उत्सर्जन को चिंताजनक स्तर पर ले जा सकती है। जितना भी फॉसिल फ्यूल एनर्जी का इस्तेमाल कर रहे हैं उतना पृथ्वी का तापमान बढ़ रहा है। आईपीसीसी की रिपोर्ट के अनुसार तापमान 1850 ईसवी की तुलना में 1.25 डिग्री सेल्सियस डिग्री बढ़ चुका है और अगले 10 साल में 1.5 डिग्री सेल्सियस तापमान और बढ़ने की आशंका है। वैश्विक स्तर पर जिस तेजी से गर्मी बढ़ती जा रही है, वो निश्चित ही सबके लिए खतरे की घंटी है।
और अंत में, एक बहुत ही रोचक कहानी। बहुत पहले एक राजकुमारी हुआ करती थी जिसका नाम विद्योत्तमा था। वे असाधारण विद्वान थीं। उसने वादा किया था कि वह उससे शादी करेगी जो उससे ज्यादा विद्वान है। कई विद्वान उनसे शादी करने आए लेकिन बहस में उन्हें हराकर लौट गए। विवाह में असफल विद्वानों ने अपने अपमान का बदला लेने की साजिश रची और उसकी शादी किसी महान मूर्ख से करने का फैसला किया। वे सब कुछ महान बेवकूफ खोजने के लिए निकल पड़े। रास्ते में उसकी मुलाकात एक व्यक्ति से हुई जो उस पेड़ की डाली काट रहा था जिस पर वह बैठा था। ऐसा मूर्ख उसने कभी नहीं देखा था। उसे पेड़ से नीचे उतारा गया और समझाया गया कि अगर वह पूरी तरह चुप रहा तो उसकी शादी राजकुमारी से कर दी जाएगी। उस व्यक्ति का परिचय विद्योत्तमा को यह कहकर दिया गया था कि वह एक अद्वितीय विद्वान है लेकिन इस समय मौन व्रत का पालन कर रहा है, इसलिए आप जो कुछ भी पूछना चाहते हैं, वह इशारों से पूछा जाना चाहिए। विद्योत्तमा ने उसकी ओर उंगली उठाई जिसका अर्थ था कि ब्रह्म एक है। वह व्यक्ति समझ गया कि वह मेरी एक आंख तोड़ना चाहती है। उसने दो उंगलियां उठाईं, जिसका मतलब था कि अगर तुम एक आंख तोड़ोगे तो मैं तुम्हारी दोनों आंखें तोड़ दूंगा। लेकिन पंडितों ने इस संकेत की व्याख्या की कि ब्रह्म के दो रूप हैं। एक आदमी और एक प्रकृति। अब विद्योत्तमा ने पांच तत्वों को बताने के लिए पांच अंगुलियां दिखाईं। लेकिन वह व्यक्ति समझ गया कि विद्योत्तमा मुझे थप्पड़ मारना चाहती है। उसने उसे मुक्का दिखाया कि अगर तुम मुझे थप्पड़ मारोगे तो मैं मुक्का मारूंगा। पंडितों ने समझाया है कि पांच तत्व हैं, लेकिन जब वे एक साथ आते हैं, तभी उनका अर्थ होता है। विद्योत्तमा ने उस व्यक्ति को विद्वान माना और दोनों का विवाह हो गया। लेकिन शादी की पहली ही रात को उस व्यक्ति की मूर्खता का राज खुल गया और विद्योत्तमा ने इस धोखे से क्रुद्ध होकर उसे बड़ा मूर्ख कहकर धक्का दे दिया। वह आदमी सीढ़ियों से लुढ़कते हुए नीचे गिर गया। उसी क्षण उस व्यक्ति ने मन ही मन यह प्रण कर लिया कि जब तक ज्ञानी नहीं हो जाता, तब तक वह विद्योत्तमा को अपना मुख नहीं दिखायेगा। उस व्यक्ति ने न केवल ज्ञान अर्जित किया बल्कि ‘‘अभिज्ञान शकुंतलम’’ ‘‘मेघदूतम’’ आदि जैसे महान कविताओं की रचना भी की और कालिदास के नाम से प्रसिद्ध हुए। इस कथा को याद करने का उद्देश्य यह है कि हम जिस धरती पर रहते हैं, कालिदास के मूर्ख रूप को जीते हुए हमने पृथ्वी और उसके पर्यावरण को काफी नुकसान पहुंचाया है। अब जरूरत है बुद्धिमान कालिदास की तरह प्रतिज्ञा लेने की और बुद्धिमान बनकर अपनी धरती की छत को बचाने की। इसके लिए जरूरी है कि हम अधिक से अधिक पेड़ लगाएं, पुराने पेड़ों को काटे जाने से रोकें और जल संरक्षण द्वारा भूमि में जल की मात्रा को कम न होने दें।
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(11.05.2022)
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Wednesday, December 21, 2016

चर्चा प्लस ... अनुपम के प्रयासों के तालाब हमेशा खरे रहेंगे - डॉ.शरद सिंह

A tribute to Environmentalist Anupam Mishra ....
Dr (Miss) Sharad Singh
" अनुपम के प्रयासों के तालाब हमेशा खरे रहेंगे " - मेरे कॉलम #चर्चा_प्लस में "दैनिक सागर दिनकर" में ( 20.12. 2016) .....My Column #Charcha_Plus in "Sagar Dinkar" news paper
 


चर्चा प्लस ..
अनुपम के प्रयासों के तालाब हमेशा खरे रहेंगे
-डॉ.शरद सिंह
हर शहर, हर कस्बे, हर गांव में पानी के ऐतिहासिक स्रोत यानी तालाब और बावड़ियां जब एक-एक कर के दम तोड़ रही थीं और लोग पेयजल संकट के आसन्न खतरे की ओर डरी हुई दृष्टि से देख रहे थे, उस समय पर्यावरणविद् #अनुपम_मिश्र ने लोगों का ध्यान जलस्रोतों के पुनर्जीवन की ओर खींचा। उन्होंने एक पुस्तक लिखी ‘‘ #आज_भी_खरे_हैं_तालाब ’’। इस पुस्तक ने मानो क्रांति ला दी। सबका ध्यान मरते हुए तालाबों और बावड़ियों की ओर गया और उन्हें बचाने के लिए लोग सक्रिय हो उठे। पर्यावरण के प्रति अनुपम मिश्र का यह जादुई योगदान सदा याद रखा जाएगा।


अनुपम मिश्र जाने माने गांधीवादी पर्यावरणविद् एवं पत्रकार के रूप में जाने जाते रहे हैं। पर्यावरण संरक्षण के लिए उन्होंने उस समय अपने प्रयास आरम्भ कर दिए थे जब देश में पर्यावरण का कोई विभाग नहीं खुला था। बिना किसी ठोस आर्थिक आधार के अनुपम मिश्र ने पर्यावरण के संरक्षण की दिशा में आकलन करते हुए जिस तरह संरक्षण के उपाय सुझाए वह करोड़ों रुपए बजट वाले विभाग और परियोजनाओं द्वारा भी संभव नहीं हो सका था। वे पर्यावरण के प्रति सजगता का विस्तार करना चाहते थे इसीलिए उन्होंने अथक प्रयास के के गांधी शांति प्रतिष्ठान, दिल्ली में पर्यावरण कक्ष की स्थापना की। उल्लेखनीय है कि वे गांधी शांति प्रतिष्ठान की पत्रिका ‘‘गांधी मार्ग’’ के संस्थापक और संपादक भी रहे। उन्होंने बाढ़ के पानी के प्रबंधन और तालाबों द्वारा उसके संरक्षण की युक्ति के विकास का महत्वपूर्ण काम किया। वे 2001 में दिल्ली में स्थापित सेंटर फार एनवायरमेंट एंड फूड सिक्योरिटी के संस्थापक सदस्यों में से एक थे। चंडी प्रसाद भट्ट के साथ काम करते हुए उन्होंने उत्तराखंड के ‘‘चिपको आंदोलन’’ में जंगलों को बचाने के लिये सहयोग किया था। 
Charcha Plus Column of Dr Sharad Singh in "Sagar Dinkar" Daily News Paper

अनुपम मिश्र का जन्म महाराष्ट्र के वर्धा में हुआ था। इनके पिता कवि भवानी प्रसाद मिश्र हिन्दी के सुप्रसिद्ध रहे हैं। अनुपम मिश्र को बाल्यावस्था से ही साहित्य से जुड़ाव था किन्तु साहित्य से अधिक उन्हें प्रकृति लुभाती थी। उनके बचपन की एक घटना जो उन्होंने स्वयं एक बार गांधी शांति प्रतिष्टान में बालते समय सुनाई थी कि जब वे पांच वर्ष की आयु के थे तो एक दिन वे प्रतिदिन की भांति पिता के साथ मंदिर गए। मंदिर के पास चम्पा के एक पेड़ लगा था। पेड़ के नीचे फूल गिरे रहते थे। वे खेल-खेल में फूल उठा लिया करते थे। उस दिन भी उन्होंने फूल उठाया और अपने घर ले आए। उस दिन उनका ध्यान गया कि शाम तक फूल मुरझा गए हैं। उन्होंने अपने पिता से इसका कारण पूछा। पिता ने बालक की आयु के अनुसार सरल शब्दों में समझाया कि इस फूल को खाना-पानी नहीं मिला इसलिए यह मुरझा गया है। पिता की यह बात बालक अनुपम के दिल-दिमाग पर अपना छाप छोड़ गई। उसने सोचा कि जब पानी न मिलने से फूल का यह हाल हो गया तो यदि उसे स्वयं को भी पानी नहीं मिलेगा तो वह मर जाएगा। अनुपम मिश्र की आयु बढ़ी किन्तु यह विचार उनके मन में किसी भित्तिचित्र की भांति छपा रहा। समय और समझ के विकास के साथ-साथ अनुपम मिश्र ने पानी की महत्ता को और अधिक बारीकी से समझा। वे राजेन्द्र सिंह के बनाये तरूण भारत संघ के लंबे समय तक अध्यक्ष रहे। चंडी प्रसाद भट्ट के साथ काम करते हुए उन्होंने उत्तराखंड के चिपको आंदोलन में जंगलों को बचाने के लिये सहयोग किया था। सन् 1996 में उन्हें देश के सर्वोच्च ‘इंदिरा गांधी पर्यावरण पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया। सन् 2007-2008 में उन्हें मध्यप्रदेश सरकार के चंद्रशेखर आज़ाद राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उन्हें 2009 में उन्होंने टेड (टेक्नोलॉजी एंटरटेनमेंट एंड डिजाइन) द्वारा आयोजित सम्मेलन को संबोधित किया। 2011 में उन्हें देश के प्रतिष्ठित जमनालाल बजाज पुरस्कार से सम्मानित किया गया। विकास की अंधी दौड़ में दौड़ते समाज को प्रकृति की क़ीमत समझाने वाले अनुपम ने देश भर के गांवों का दौरा कर रेन वाटर हारवेस्टिंग के गुर सिखाए।
अनुपम मिश्र ने पर्यावरण पर महत्वपूर्ण पुस्तकें लिखीं-‘‘राजस्थान की रजत बूंदें’’, ‘‘हमारा पर्यावरण’’ ‘साफ माथे का समाज’ और आज भी खरे हैं तालाब। इनमें से ‘‘आज भी खारे हैं तालाब’’ सबसे अधिक चर्चित एवं प्रभावकारी रही।
देश के जल स्रोतों के मर्म को दर्शाती इस पुस्तक ने भी देश को हज़ारों कर्मठ कार्यकर्ता दिए। अनुपम मिश्र द्वारा लिखित तथा गांधी शांति प्रतिष्ठान, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित पुस्तक का पहला संस्करण 1993 में छपा था। सन् 2004 में प्रकाशित पांचवे संस्करण की कुल 23000 प्रतियां प्रकाशित हुई थीं। इस पुस्तक की ब्रेल सहित 13 भाषाओं में प्रकाशित हुई जिसकी अब तक लगभग दो लाख से अधिक प्रतियां बिक चुकी हैं। पुस्तक के पहले संस्करण के बाद देशभर में पहली बार अपने प्राचीन जल स्रोतों को बचाने की बहस चली, लोगों ने जगह-जगह स्थित तालाबों की सुध लेनी शुरू की। मैगासेसे पुरस्कार से सम्मानित राणा राजेंद्र सिंह बताते हैं कि राजस्थान की उनकी संस्था तरुण भारत संघ के पानी बचाने के बड़े काम को सफल बनाने में इस पुस्तक का बहुत बड़ा हाथ है। मध्यप्रदेश के सागर जिले के कलेक्टर बी. आर. नायडू इस पुस्तक पढ़ने के बाद इतना प्रभावित हुए कि जगह-जगह लोगों का आह्वान किया कि ’अपने तालाब बचाओ, तालाब बचाओ, प्रशासन आज नहीं तो कल अवश्य चेतेगा।’ उन पर इस पुस्तक का अत्यंत प्रभाव पड़ा जबकि वे अहिन्दी भाषी थे। कलेक्टर नायडू की ये मामूली अलख मध्यप्रदेश के सागर जिले के 1000 तालाबों का उद्धार कर गई। ऐसी ही एक और अलख के कारण शिवपुरी जिले के लगभग 340 तालाबों की सुध ली गई। मध्यप्रदेश के ही सीधी और दमोह के कलेक्टरों ने भी अपने-अपने क्षेत्रों में इस पुस्तक की सौ-सौ प्रतियां बांटी।
पानी के लिए तरसते गुजरात के भुज के हीरा व्यापारियों ने इस पुस्तक से प्रभावित होकर अपने पूरे क्षेत्र में जल-संरक्षण की मुहिम चलाई। पुस्तक से प्रेरणा पाकर पूरे सौराष्ट्र में ऐसी अनेक यात्राएं निकाली गईं। पानी बचाने के लिए सबसे दक्ष माने गए राजस्थान के समाज को भी इस पुस्तक ने नवजीवन दिया। राजस्थान के प्रत्येक कोने में पुस्तक के प्रभाव के कारण सैकड़ों जल-यात्राओं के साथ-साथ हज़ारों पुरातन जल-स्रोत पुनर्जीवित किए गए।
जयपुर जिले के ही सालों से अकालग्रस्त लापोड़िया गांव ने इस पुस्तक से प्रेरणा ली और अपने जलस्रोतों के साथ ही चारागाहों को भी बचाया। लापोड़िया के सामूहिक प्रयासों का नतीजा यह रहा कि आज लगभग 300 घरों का लापोड़िया, जयपुर डेयरी को लगभग चालीस लाख वार्षिक का दूध दे रहा है। पुस्तक का प्रभाव उत्तरांचल में भी हुआ। यहां पौड़ी-गढ़वाल के उफरेखाल क्षेत्र के दूधातोली लोक विकास संस्थान के श्री सच्चिदानंद भारती ने पुस्तक से प्रेरणा पाकर पहाड़ी क्षेत्रों की विस्तृत चालों (पानी बचाने के लिए पहाड़ी तलाई) को पुनर्जीवित करने का काम शुरू किया। इस दौरान पिछले 13 सालों में उन्होंने 13 हज़ार चालों को जीवन प्रदान किया। गैर हिंदी भाषी राज्य कर्नाटक में इस पुस्तक का सीधा प्रभाव राज्य सरकार पर पड़ा। कर्नाटक सरकार ने तालाब बचाने का काम सीधे अपने ही हाथ में ले लिया और वहाँ एक जलसंवर्धन योजना संघ’ बनाया गया तथा विश्व बैंक की मदद से पूरे राज्य के तालाब बचाने की योजना तैयार की गई है। इसी राज्य की ही इंफोसिस कंपनी के मालिक श्री नारायणमूर्ति की पत्नी सुधा मूर्ति ने इस पुस्तक का कन्नड़ में अनुवाद किया और 50 हज़ार प्रतियां छपवाकर कर्नाटक की प्रत्येक पंचायत में भिजवाईं।
पंजाबी में इस पुस्तक का अनुवाद मालेरकोटला से प्रकाशित ’तरकश’ नामक पत्रिका में शुरू हुआ। फिर इसका एक संक्षिप्त पंजाबी संस्करण छपा जो मुफ्त में बांटा गया। कुछ वर्षों बाद इसके अनुवाद के साथ पंजाब के सुख-दुख जोड़कर एक पुस्तक बनाई गई। इस नए अनुवाद का व्यापक प्रभाव रहा। पंजाब के साहित्यकारों, आलोचकों, लोकगायकों, सामाजिक-धार्मिक संस्थाओं के साथ-साथ प्रमुख संतों, यहां तक कि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के सदस्यों पर भी इसका खासा प्रभाव पड़ा। पंजाब के लोकगायकों ने इस पुस्तक को पढ़ने के बाद अपने तरीके से जलस्रोतों को बचाने की मुहिम शुरू की है।
जाने-माने गांधीवादी, पत्रकार, पर्यावरणविद् और जल संरक्षण की अलख जगाने वाले 68 वर्षीय अनुपम मिश्र ने नई दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में 19 दिसम्बर 2016 को अंतिम सांस ली। वे कई वर्ष से प्रोटेस्ट कैंसर से जूझ रहे थे फिर भी पर्यावरण संरक्षण के प्रति उनके प्रयासों में कोई कमी नहीं आई थी। अनुपम मिश्र के व्यक्तित्व को वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी के इन शब्दों के द्वारा बेहतर समझा जा सकता है कि “हमारे समय का अनुपम आदमी। ये शब्द प्रभाष जोशीजी ने कभी अनुपम मिश्र के लिए लिखे थे। सच्चे, सरल, सादे, विनम्र, हंसमुख, कोर-कोर मानवीय। इस ज़माने में भी बग़ैर मोबाइल, बग़ैर टीवी, बग़ैर वाहन वाले नागरिक। दो जोड़ी कुर्ते-पायजामे और झोले वाले इंसान। गांधी मार्ग के पथिक. ’गांधी मार्ग’ के सम्पादक। पर्यावरण के चिंतक। ’राजस्थान की रजत बूंदें’ और ’आज भी खरे हैं तालाब’ जैसी बेजोड़ कृतियों के लेखक।“
हर शहर, हर कस्बे, हर गांव में पानी के ऐतिहासिक स्रोत यानी तालाब और बावड़ियां जब एक-एक कर के दम तोड़ रही थीं और लोग पेयजल संकट के आसन्न खतरे की ओर डरी हुई दृष्टि से देख रहे थे, उस समय पर्यावरणविद् अनुपम मिश्र ने लोगों का ध्यान जलस्रोतों के पुनर्जीवन की ओर खींचा, उन्हें उनकी गलतियों के प्रति सचेत किया, उन्हें रास्ता भी सुझाया। पर्यावरण के प्रति अनुपम मिश्र का यह जादुई योगदान सदा याद रखा जाएगा। निःसंदेह अनुपम के प्रयासों के तालाब हमेशा खरे रहेंगे।
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