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Friday, August 28, 2026

बतकाव बिन्ना की | तनक सोचियो के राखी बंधाबे को असल मतलब का आए? | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बतकाव बिन्ना की
तनक सोचियो के राखी बंधाबे को असल मतलब का आए?
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

अपने इते राखी को त्योहार जेई लाने मनाओ जात आए के भैया हरें अपनी बैंनों से राखि बंधवा के उनकी रच्छा को बचन दैवें। भैया हरंे मनों अपनो बचन निभाउत बी आएं। पर का आए के आजकाल बिटियां सुरच्छित ने रै गईं। कछू बुरए आदमियन औ लरकन के मारे। लरका हरों को सोचबो जे चाइए के हरेक मोड़ी कोनऊं ने कोनऊं भैया की बैन होत आए। सो हर मोड़ी की इज्जत करो चाहिए औ ऊकी रच्छा के लाने ठाड़े रैबो चाइए। तनक सोचबे वारी बात आए के जो कोनऊं मोड़ी के साथ कोऊ बदमास गलत काम करे सो बा पूरो परिवार के लाने गलत कहाओ, काए से के बिटियां तो घर की इज्जत मानी जात आएं। सो जबे कोऊ बदमास कोनऊं मोड़ी खों परेसान कर रओ होए तो सो जे सोच के आगे नईं बढ़ने के जे कोन हमाई बैन आए, के जे कोन हमाए परिवार की लुगाई आए? जो ऐसी सोच होए तो राखी को त्योहार मनाए से फायदा काए को? बैन से राखी बंधाई, ऊके पांव परे, नेग के पइसा दए औ हो गओ काम पूरो, मन गओ त्योहार। जे त्योहार ऐसो हल्को नोंई। ईको मनाए को मतलब भूलो नईं चाइए। तनक सोचो के मुगलों को राजा हुमायूं जोन के लाने राखी बंधाए को कोनऊ मतलब ने हतो, ऊने बी राखी को मान राखो औ जोन को बैन मानो, ऊकी रच्छा करबे को दौर परो तो। चलो जोन को जा किसां पतो नईयां उनके लाने बताए दे रई।
जे बात आए सन 1535 की। जे सांची किसां आए काए से ईके बारे में राजस्थान को इतिहास लिखबे वारे कर्नल टाड ने औ इतिहासकार चंद्रशेखर शर्मा जू ने सोई अपनी किताबन में लिखो आए। का भओ के महाराज राणा संागा के मारे जाबे के बाद उनकी महारानी करणावती जू ने राजकाज को भार सम्हारो। गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह ने देखो के रानी सो अकेली पर गई आएं सो ऊने हमला कर दओ। खींब लड़ाई भईं। मनो जबे रानी खों लगो के अब कोनऊं से सहायता मांगने परहे तो उन्ने बादशाह हुमायूं को राखी के संगे चिट्ठी भेजी के आओ औ अपनी ई बैन औ ऊके राज की रच्छा करो। हुमायूं खों जैसी जा चिट्ठी मिली बा निकर परो अपनी बैन करणावती जू की रच्छा के लाने। मनो ऊ टेम पे कोनऊं हवाई जहाज तो हतो नईं, सो सेना संगे मेवाड़ पौंचबे में ऊको देरी हो गई। उते सुल्तान बहादुर शाह मेवाड़ के महलन में घुस परो। रानी करणावती ने देखी के अब लड़े से कछू हात ने लगहे सो उन्ने सैंकड़ां खांड़ राजपूती लुगाइयन के संगे आगी में कूंद के जौहर कर लओ। उन्ने अपनी जान दे दई, मनो आन ने दई। जा खबर जबे हुमायूं लौं पौंची तो ऊको भौतई दुख पौंचो। ऊने मेवाड़ पे कब्जा करे बैठे सुल्तान बहादुर शाह पे चढ़ाई कर दई औ ऊंसे मेवाड़ छीन के बैन रानी करणावती दोई बेटों खों सौंप दओ। आगे चल के हुमायूं को बेटा अकबर सोई राखी को त्योहार मनवाऊत रओ।
जा किसां याद राखबे की जरूरत आए जीसें हमें ग्यान रए के एक मुगल बादशाह ने राखी को मान रखो सो हमाए लरका आजकाल राखी को मान काए नईं राख सकत? औ जो नईं मान राख पा रए उने मान राखबो सिखाओ चाइए। कोनऊं खो हक नोंई के कोऊ की बैन के संगे बदसलूकी कर सके। चाए कोऊ प्रेमिका होए, चाए घरवारी होए, चाए रोड पे जा रई लुगाई होए बे ओरें बी कोनऊं ने कोनऊं की बैन होत आएं। उनकी रच्छा करबो बी सबको धरम आए। फेर बा लुगाई चाए कोनऊं जात धरम की काए ने होए। राखी को त्योहार जोई तो सिखात आए। 
राखी हमाओ कोनऊं नओ त्योहार नोंई। ईके बारे में पुराणों में किसां मिलत आए। पैले राखी रच्छा के लाने बांधी जात रई वा बी खाली लुगाइयन की नोंई देवता हरों की रच्छा के लाने बी। ‘‘भविष्य पुराण’’ में लिखो आए के देवों औ राच्छसों के बीच भौतई जम के लड़ाई भई। इत्ती भैंकर के 12 बरस लौं चली। इन्द्र देव जू राच्छसों से खींबईं टक्कर लेत रए मनो एक समै ऐसो आओ के लगो के अब इन्द्र देव जू हार जाहें। उनकी हार मनों सबई देवों की हार। सो इन्द्रणी ने सोची के कछू उपाय करो चाइए। उन्ने तीनों लोकों की सक्तियों खों याद करो औ एक राखी बनाई। ऊ राखी में तीनों लोकों की सक्तियां डार के इन्द्र देव के हात में बांध दई। ईके बाद इन्द्र देव औ सबरे देवता राच्छसों ने लड़े औ जीत गए। कई जात आए के तभईं से रच्छा के लाने रक्ष्छा को धागा मने राखी बांधी जान लगी। 
‘‘विष्णु पुराण’’ में सोई एक किसां मिलत आए के विष्णु जू ने वामन को रूप धर के राजा बलि से तीन लोक नप्प के ले लए रए। मगर बदले में राजा बलि ने कई रई के आपको जो चाउंने आप ले लेओ, मनो ईके बाद आपको हमाए महल में रैने परहे। भगवान विष्णु ने राजा बलि की कई मान लई हती। पर जबे विष्णु जू छीर सागर ने लौटे तो लक्ष्मी जू परेसान हो उठीं। उन्ने विष्णु जू के पास खबर भिजाई के अब लौट आओ, मनो बचन तो बचन ठैरो, विष्णु भगवान ने लौटबे से मना कर दओ। उनके ने लौटने से शेषनाग सोई दुखी हो गओ। छीरसागर के सबरे पिरानी दुखी हो गए। तब लक्ष्मी जू ने जुगत लगाई औ बे राजा बलि के पास राखी ले के पौंची। राजा बलि जा देख के भौतई खुस भओ। खुद लक्ष्मी जू उनके लिंगे राखी बांधवे खों आई हतीं, ईसे बढ़ के नोंनी का बात हो सकत्ती? ऊने खुसी-खुसी राखी बंधाई औ हीरा-मोती देन लगो। तब लक्ष्मी जू बोलीं के, ‘‘नईं भैया, हमें जे हीरा-मोती नईं चाऊने। जो तुम हमें राखी को नेंग देओ चात आओ तो हमाओ पति हमें नेग में लौटा देओ।’’
राजा बलि बचन को पक्को हतो। ऊने मना ने करी, तुरतईं विष्णु भगवान से कई के आप हमाई बैन के संगे जा सकत हो, अब हम आपको ने रोकबी। सो, ई तरां से लक्ष्मी जू ने राजा बलि खों राखी बांध के ऊके बचन से विष्णु जू खों छुड़ाओ रओ। 
एक औ किसां आए जीके बारे में सबई जानत आएं। जा किसां ‘महाभारत’ की आए। का भओ के एक बेर राजसूय यज्ञ के टेम पे किसन भगवान की उंगरियां उनईं के सुदरसन चक्र से कट गई। मुतको खून बहन लगो। जा देख के उतई ठांड़ीं द्रौपदी ने तुरतईं अपनी चुन्नी फाड़ी औ ऊकी पट्टी बना के किसन भगवान की उंगरिया में बांध दई। खून बहनों बंद हो गओ। जा देख के किसन भगवान ने द्रौपदी से कई के ‘‘तुमने अपनी चुन्नी की पट्टी से हमाओ खून बहनों बंद कर के हमाई जान की रच्छा करी आए सो ईके बदले जो कछू तुमें हमसे मांगने होए सो मांग लेओ।’’
‘‘हमें अबे कछू नईं चाउनें, जबे चाउने हुइए सो मांग लेबी।’’ कै के द्रौपदी ने कछू बी लेबे से मना कर दओ। ईपे किसन भगवान ने कई के ‘‘तुमाई जे रच्छा की पट्टी हम पे करज रई, जबे तुमें कछू बी मांगने होए सो मांग लइयो।’’
भौत दिनां बाद जब द्रौपदी पे संकट आओ। दुस्सासन भरे दरबार में ऊको चीरहरन करन लगो तब द्रौपदी ने किसन भगवान खों पुकारो औ बोई बचन उनको याद दिलाओ के आज हमाई इज्जत की रच्छा करबे की जरूरत आए। आप आओ औ अपनों बचन निभाओ। सबई जानत आएं के किसन भगवान दरबार में ऐसे पौंचे के द्रौपदी खों तो दिखाने मगर औ कोऊ उनें ने देख पा रओ तो। उन्ने द्रौपदी की धुतिया इत्ती बढ़ा दई के दुस्सासन खेंचत-खेंचत थक के गिर परो, मनों धुतिया उतार ने पाओ। जो हतो राखी के बचन को चमत्कार।
सो, राखी के बारे में जबे सोचियो सो ऊकी असली महत्ता समझियो। राखी को मतलब अकेलो जो नईं होत के राखी बंधाई, मिठाई खाई औ बदले में कछू रुपैया, नें तो गिफ्ट दओ औ मन गई राखी। राखी कोनऊं सौदा नोंई। ईमें रच्छा की भावना होनी चाइए। लुगाइन के लाने इज्जत औ सम्मान से बड़ो कोनऊं गिफ्ट नईं होत, जे छुड्डा में बांध के राखबे की बात आए। 
ऐई संगे बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की। मनो सोचियो जरूर ई बारे में के राखी बंधाबे को असल मतलब का आए।   
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बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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Thursday, August 20, 2026

बतकाव बिन्ना की | काकरोच सोई तभईं होत आएं जो घरे गंदगी मच जाए | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बतकाव बिन्ना की
काकरोच सोई तभईं होत आएं जो घरे गंदगी मच जाए 
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह


भैयाजी के इते तो मनो गदर मची हती। भैयाजी हाथ में दवा छिरकवे को स्प्रे लए हते और भौजी अपने हाथ में चप्पल ले के ठाड़ी हतीं।
‘‘जो का हो रओ भैयाजी?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘अरे, घरे मुतके काकरोच हो गए। जिते देखो उतई से मूंड़ निकार के झांकन लगत आएं।’’ भैयाजी दरवाज़ा की दरार में दवा छिरकत भए बोले। इत्तई में बा दरार से एक काकरोच बिलबिलात भओ बायरे निकरो। भौजी पे आव देखी ने ताव औ अपनी हाथ में लई चप्पल से चटाक दीनां ऊं काकरोच खों दे मारो। बा बिचारो उतई चपट गओ। हो गओ ऊको नाम नाम सत्त!
‘‘जो का करो भौजी? ऐसे काए मार दओ ऊको?’’ मैंने भौजी से पूछी।
‘‘काए ने मारो जाए? जे बिमारियन की जड़ आएं।’’ भौजी अपनी सफलता पे मुस्कुरात भईं बोलीं।
‘‘बा तो ठीक आए, पर भैयाजी तो सोई दवा छिरक रए। दवा से ई तो बा मर जातो।’’ मैंने भौजी से कई।
‘‘अरे जा कओ के हमने ऊको झट्टई मुक्ति दोआ दई, ने तो कछू देर तो बा छटपटात रैतो।’’ भौजी मुस्कात भईं बोलीं।
‘‘मनो भौजी आपकी जा हरकत कऊं काकरोच पार्टी वारन खों पता पर गई तो बे भौतई नाराज हुइएं।’’ मैंने भौजी को तनक डराओ।
‘‘बे काए खों नाराज हुइएं? हमने तो असली काकरोच मारो, बे तो नकली वारे ठैरे।’’ भौजी बोलीं।
‘‘अब चाए नकली होंए औ चाए असली, पर नांव तो धरे आएं काकरोच पार्टी। बा बी राजनीति वारी पार्टी। औ जां राजनीति घुसी उते दोंदरा मचत देर नई लगत। कओ कोऊ आपको ट््रोल करन लगे।’’ मैंने कई।
‘‘सो नांव धरे से का हुइए? का बे असली वारे काकरोच हो जैहैं का?’’ भौजी निष्फिकर भाव से बोलीं।
‘‘फेर बी!’’ मैंने कई।
‘‘फेर बी का? जे ठैरे घिनऊं से कीरा औ बा ठैरे आजकाल के ज्वान। उने जो पुसाओ बा उन्ने नांव धर लओ।’’ भौजी बोलीं।
‘‘मनो उनें कोऊ पसंद नई कर रओ।’’ मैंने कई।
‘‘ने करे, ऊसे का हुइए? उने जोन करने सो करहें।’’ भौजी बोलीं।
‘‘उते जंतर-मंतर में नईं देखो रओ का के बा काकरोच वारन ने कैसी दोंदरा मचाई हती?’’ अब के भैयाजी ने मोसे पूछी।
‘‘काए नईं देखी? जोन टीवी वारन ने ने दिखाई बा बी सोसल मीडिया वारन ने दिखा दई रई। औ सई कई जाए तो उन ओरन से जेन जी वारों खों दम मिलत रई।’’ मैंने भैयाजी से कई।
‘‘जे बात! जेई तो हम कए रए के बे ओरें ज्वान ठैरे। औ उन्ने नांव ऊंसई नईं धरो रओ, बा का आए के हमने कऊं पढ़ो रओ के कोऊ सयानपत्ती वारे ने बेरोजगारन खों काकरोच कए दओ रओ। बस, ओई से इन ओरन खों सूझी औ इन्ने काकरोच पार्टी नांव धर लओ।’’ भौजी बोलीं।
मोए भौजी की नालेज पे बड़ो प्राउड फील भओ।
‘‘भौजी, आप तो बड़ी अपडेट होत जा रईं।’’मैंने भौजी की तारीफ करी।
‘‘बा जो कंगना घांईं लुगाइयां भक्ति दिखाने के लाने बात बेबात फुदक रईं तो हम ओरन खों तो अपडेट भओ ई चाइए।’’ भौजी बोलीं।
‘‘उनकी फुदकवे की ने कओ भौजी, बे अपनी माननीय सांसद आएं।’’ मैंने भौजी से कई।
‘‘सो का, ईसे का हो गओ? उने तो एकई जने दिखा रओ। काए से बोई एक ठो खों गरिया-गरिया के अपनी भक्ति दिखाई जा सकत आए।’’ भौजी बोलीं।
‘‘तुम ओरें बी, कां की राजनीति की बतकाव ले बैठीं? अपन ओरन के बतकाव करे से कछू नईं भओ जा रओ।’’ भैयाजी बोले।
‘‘ने होए, का कछू होए जेई के लाने बतकाव करी जात आए?’’ भौजी भैयाजी से बोलीं। उने भैयाजी को ऐसो कैबो ने पुसाओ।
‘‘अब तुम काए काकरोच बनी जा रईं? तनक गम्म खाओ।’’ भैयाजी भौजी से बोले।
‘‘हम काए खों काकरोच बनहें? जो हमें कछू बनने हुइए तो हम जेन-जी बनहें, नें तो अल्फा-जी बनहें।’’ भौजी बोलीं।
‘‘ई उम्मर में जेन-जी?’’ भैयाजी भौजी को मजाक उड़ात भए बोले।
‘‘काए? जेन-जी खों आप उम्मर से जेई लाने जोर रए के बे सबरे पढ़ाई की उमर वारे मोड़ा-मोड़ी आएं। पर आप जे ने भूलो के उनके संगे उनके मताई-बाप सोई उते पौंच गए रए। सो का हम उने सपोर्ट कर के जेन-जी नईं कहा सकत?’’ भौजी बोलीं।
भौजी के जे तेवर देख के मोए भारी अचरज भओ। काए से के जंतर-मंतर को मामलो निपटे तो अब मुतको टेम हो गओ। मनो ऐसो लग रओ हतो के भौजी पे ऊको गहरो असर परो। तभईं तो बे जेन-जी होबे की बात कर रईं।
‘‘भौजी, मोए आप जेन-जी से कछू ज्यादई प्रभावित दिखा रईं। मोए नईं पतो रओ के उनको आप पे इत्तो गहरो असर परहे।’’ मैंने भौजी से कई।
‘‘काए हमाए पे परो असर भर तुम ओरन खों दिखा रओ औ उन ओरन पे परो असर नईं दिखा रओ जोन पैले गरियात फिरे औ फेर जेन-जी के जीततई साथ उने काकरोच से अलग बोल के उनकी जयकारे करत फिर रए।’’ भौजी तुरतईं बोलीं।
‘‘बात तो आप सई कए रईं भौजी! मोए का, खुद जेन-जी वारों को पतो ने रओ हुइए के एक दिनां उनईं खों तरीफ की जयमाल पहनाई जान लगहे।’’ मैंने भौजी से कई।
‘‘जेई तो राजनीति आए बिन्ना! राजनीति की थारी में गोल वारे भटईं-भटा रैत आएं। तनक में इते लुढ़के, तनक में उते लुढ़के। औ जोन लुढ़वो जानत आए बोई सफल रैत आए।’’ अब की भैयाजी मोसे बोले।
‘‘सई में भैयाजी, अपन ओरन खों लुढ़कवो ने आओ।’’ मैंने तनक दुखी होत भए कई।
‘‘अपन पब्लिक आएं बिन्ना! पैले तो अपन लुढ़कवो कभऊं सीख नईं सकत, औ दूसरो के जो सीख बी लें तो कां लुढ़कहें? अपन खों तो कोऊ तरफी जाओ कटनेई परहे।’’ भैयाजी ने बड़ो गंभीर उत्तर दओ।
‘‘ठीक कै रए भैयाजी! पर एक बात तो समझबे वारी आए के जे जो काकरोच वारे आएं उन्ने बड़ो सोच के जे नांव धरो। काए से काकरोच सोई तभई होत आएं जो घरे गंदगी मच जाए। राजनीति में काकरोच के पनपबे से समझ जाओ चाइए के ब्यवस्था में भौतई गंदगी मच गई आए।’’ मैंने कई।
‘‘जेई तो बात आए बिन्ना! ने पेपर लीक होतो औ ने काकरोच वारे मूंड उठाउते। बे तो मनो जताओ चात आएं के जो आप हमें नईं देखो चात हो तो जा ब्यवस्था की गंदगी साफ कर लेओ।’’ भौजी बोलीं। 
‘‘सई कई भौजी! ब्यवस्था में तो कुल्ल गदर मची आए। कऊं फोकट के पइसा बांटे जा रए तो कऊं एकई चीज पे चार दार टैक्स ले के खून चूसो जा रओ। ऊपे बी अपने एमपी में तो चाए डीजल-पेट््रोल होए, चाए चूला की गैस, दूसरे प्रदेसों से ज्यादई रैत आए।’’ मैंने कई।
‘‘जेई लाने तो अपने एमपी के लाने स्लोगन बनाओ गओ रओ के -‘एमपी अजब है,गजब है’। बा स्लोगन बनाबे वारो भौतई बुद्धिमान रओ। भले ऊने पयग्टन के लाने जे लिखो, मनो होत सबरी दसा पे फिट आए।’’ भैयाजी हंसत भए बोले।
इत्ते में एक काकरोच औ दरार से निकर आओ औ भौजी ने ऊको बी अपनी चप्पल से तिया-पांचा कर दओ।
सो, बे ओरे हो गए असली वारे काकरोच मारबे में बिजी औ मैंने अपनी दुकान उते से बढ़ा लई ने तो बा स्प्रे की बदबू से मोरो मूंड़ चकरान लगतो। 
ऐई साथ बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की। मनो सोचियो जरूर ई बारे में के जो ब्यवस्था सुदर जाए तो काकरोच घांईं पार्टी रए पाहें? पर ईके पैले जे साई सोचने परहे के का सच्ची में ब्यवस्था सुदर पाहे?   
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बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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Thursday, August 6, 2026

बतकाव बिन्ना की | जो बुंदेली की कटक गाथाएं ने पढ़ीं, सो मनो कछू ने पढ़ो | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बतकाव बिन्ना की  
जो बुंदेली की कटक गाथाएं ने पढ़ीं, सो मनो कछू ने पढ़ो
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
      अपने बुंदेलखंड में भौतई पैले से साहित्त रचो जा रओ। इते की कवित्त किसाओं की सो बातई कछू औ ठैरी। इनें सुन के, पढ़ के बांहें फड़कन लगत आएं। इमें बहादुरी की बात जो होत आए। बुंदेला ऊंसई अपनी बहादुरी के लाने जाने जाऊत रहे। बे न मुगलों से डराने औ ने अंग्रेजन से। दोई खों छठी को दूद याद करा दओ रओ। जे ई कोई 12 मीं सताब्दी से 20 मीं सताब्दी लौं खास-खास तीन तरां के बहादुरी के साहित्त रचे गए। जोन में पैलो हतो रासो, दूसरो, कटक औ तीसरो राछरे। बाकी जे तीनोईं मों जबानी गाए जात्ते। बा तो बाद में कछू बिद्वान जनों ने इनखों इकट्ठो के, छपा के इतिहास घांईं पक्को कर दओ। मने लिखे में ले आए। ने तो पैले जे खाली गाए जात्ते। औ जे सोचो के जोन इनको सुनत्तो, ऊको जे याद रै जात्ते औ फेर बा याद रखे वारे गाऊत्ते। जीको साहित्त की भासा में ‘‘वाचिक परम्परा’’ कओ जात आए। माने मों बोले की परम्परा।  
  
बुंदेली की बहादुरी की कवित्त किसां में सबसे फेमस रई जगनिक को लिखों गओ ‘‘आल्हाखंड’’। आज बी ईको बड़े मन से गाओ जात आए। जोन जगनिक ने ‘‘आल्हाखंड’’ लिखो उनईं ने ‘‘विजयपाल रासो’’ सोई लिखो। ‘‘विजयपाल रासो में राजा विजयपाल राठौर के शिकार पे जाबे की किसां आए। होत का आए के राजा विजयपाल राठौर शिकार पे जात आएं औ उते उनें राजा पृथ्वीराज के सैनिक टकरा जात आएं। दोई में भिड़ परत आएं। पृथ्वीराज जा खबर पा के खोखियां जात आए औ कन्नौज पे हमला बोल देत आए। ऊ टेम पे जगनिक जू दोई राजा में सुलह कराबे की कोसिस करत आएं। रासो तो मानों कई ठों लिखी गईं। एक आए ‘वीर सहदेव चरित’। ईको कवि केशवदास ने लिखो रओ। रासो की जेई परंपरा में जोगीदास भांडेरी को ‘दलपत राव रासो’, लाल कवि को ‘छत्र प्रकाश’, कवि सबसुख को ‘‘भगवंत सिंह रासो’’, गुलाब चतुर्वेदी को ‘करहिया का रासो’, श्रीधर को ‘पारीछत रासो’ औ आनंद सिंह कुड़रा को ‘बाघाट रासो’ गिनाएं जा सकत आएं। 
बहादुरी की कबित्त किसां मने कटक गाथाएं सोई रासो एवं राछरे  घांई आएं। इनमें सोई राजा-महाराजा की बहासदुरी की किसां कही गईं। पन्ना के महाराज छत्रसाल के समै पे एक कवि भए जिनको नांव रओ कवि दान। उन्ने जो छत्रसाल जू की बड़वारी में बहादुरी को जो कवित्त रखे आए ऊको नांव आए ‘‘छत्रसाल जू देव कौ कटक बंध’’। ई कटक में महाराज छत्रसाल औ मोहम्मद खान के बीच भए जुद्ध को पूरो विवरन आए। ईमें महाराजा छत्रसाल औ बुंदेली सैनिकों की बहादुरी को बखान करो गओ आए। दतिया के बिद्वान स्व. बाबूलाल गोस्वामी जू ने ‘छत्रसाल जूदेव कटक बंध’ को संपादन करो औ 1992 में भानु प्रिंटर्स दतिया से इको छपाओ।

भग्गी दाऊजू श्याम ने सोई कटक लिखो। साल 1900 में भग्गी दाऊ ने ‘झांसी कौ कटक’ लिखी। ईको 1969 में डॉ. भगवान दास महौर जू ने ‘लक्ष्मी बाई रासो’ के संगे ईको छपाओ। भग्गी दाऊजू श्याम झांसी के जनकवि कहाऊत्ते। उन्ने 1857 की लड़ाई सोई लड़ी रई। जेई से उन्ने ‘झांसी कौ कटक’ में रानी लक्ष्मीबाई की बहादुरी के गुन गाए। बाकी अपने बुंदेलखंड में 1857 से पैले बी अंग्रेजन को तगड़ो विरोध करो गओ रओ। ईको प्रमान ‘‘पारीछत कौ कटक’’ में मिलत आए। ई कटक में जैतपुर के महाराज पारीछत औ अंग्रेजों के बीच भओ जुद्ध को ब्यौरा दऔ गऔ आए। जा जुद्ध 1841 में भओ रओ। बेरमा नदी के किनारे बिलगांव में महाराज पारीछत ने अंग्रेजन खों से जुद्ध कर के उनको मजा चखा दओ रओ। जे बात औ आए के कछू जनों की गद्दारी के मारे राजा पारीछत जीत ने पाए औ पकर के जेल में डार दए गए। उनें बंदी बना के कानपुर की जेल में रखो गओ जां 1853 में उनें फांसी दे दई गई। जो मानो जात आए के ‘पारीछत कौ कटक’ कवि बृजकिशोर ने लिखो रओ। तनक ईकी कछू लकीरें देखो-
कर कूंच जैतपुर से बगौरा में मेले।
चौगान पकर गये मन्त्र अच्छौ खेले।।
बकसीस भई ज्वानन खाँ पगड़ी सेले।
सब राजा दगा दै गये नृप लड़े अकेले।।
कर कुमुक जैतपुर पै चढ़ आऔ फिरंगी।
हुसयार रहो राजा दुनियाँ है दुरंगी।।
जब आन परी सिर पै कोऊ न भऔ संगी।
अर्जन्ट खात जक्का है राजा जौ जंगी।।
एक कोद अर्जन्ट गऔ, एकवोर जन्डैल।
डांग बगोरा की घनी, भागत मिलै न गैल।।

भैरोंलाल को लिखो ‘भिलसांय कौ कटक’ में बघेल राजा ठाकुर रणमत सिंह औ अंग्रेजों के मध्य पुटरा नांव की जांगा 1857 में भए जुद्ध को हाल लिखो गओ आए। ऊ टेम पे, मने 1857 में ठा. रणमत सिंह की रीवा जागीर पन्ना रियासत में आत्ती। रणमत सिंह बघेल क्षत्रिय हते। मनों कोनऊं के लगाई-बुझाई से पन्ना औ रीवा रियासतन में इन गई। सन् 1850 में दोनों रियासतें लड़बे खों ठाड़ी हो गईं मनो अंगरेजन के कारन लड़ाई टल गई। ईके बाद रणमत सिंह जू जागीर छोड़कर अपने कुछ साथियों के संगे सागर आ गए। जां वे अंग्रेजी सेना में भरती हो के लेफ्टिनेंट हो गए। कछू दिनां बाद उने परमोशन पे नौगांव भेज दओ गओ। जां उने केप्टन के बना दओ गओ। तभईं 1857 की लड़ाई छिड़ गई। अंगरेजन ने उने आदेस दओ के बे बुंदेला क्रांतिकारी बख्तबली औ मर्दन सिंह खों पकड़बे को काम करें। मनों रणमत सिंह जू ने ऐसो कछू ने करो औ उन ओरन खों पकरबे के लाने यां-वां भगत फिरबे को ढोंग करत रए। मगर जे बात कां लौं छिपती, सो रणमत सिंह जू औ उनके सिपाइयों को बर्खास्त कर कर दओ गओ। संगे उनकी गिरफ्तारी को आदेश जारी कर दओ गओ। अंग्रेज फौज में रैते भए रणमत सिंह जू ने जेई कोई 300 लोगों की अपनी एक टुकड़ी बना लई रई। सो जब बे ओरे सेना से निकारे गए सो उन सबई ने खुल के बुंदेलन को साथ दओ। मगर अपने इते तो जित्ती बहादुरी की किसां आएं उत्तई धोखा की किसां मिलत आए। मे राणमत सिंह जू खों सोई धोखे से बंदी बना के बांदा जेल भेज दओ गओ। जां उनें 1 अगस्त 1859 को फांसी दे दी गई। जे पूरी किसां ‘‘भिलसांय कौ कटक’ में मिलत आए। 

बुंदेलखंड की कटक खों नओ मंच देबे के लाने 2013 में बॉलीवुड के हीरो औ नाटकों के निरदेशक गोविंद नामदेव जू ने एनएसडी, अथग औ सागर विश्वविद्यालय के संगे मिल के एक वर्कशाप करो। ऊके बाद गोविंद नामदेव जू के डायरेक्सन में, 30 दिसंबर 2013 को लगातार तीन दिनां को मंचन करो। ई कटक में बुंदेला वीर मधुकर शाह बुंदेला की की बीरता को बखान आए। ललितपुर जिला के नाराहट में पैदा भए बुंदेला वीर मधुकर शाह जू ने अंगरेजन के बिरुद्ध बुन्देला विद्रोह छेड़ दओ रओ। बे खूब लड़े। मनों मधुकर शाह खों सोई सोऊत में धोके से पकरवा दओ गओ। उने सागर की बड़ी जेल में रखो गऔ औ ऊतई फांसी दे दी गई। ऊ टेम बे केवल 21 बरस के रए। 

ऐसे बीरन के बारे में लिखो गओ आए कटक। सो इनखों जरूर पढ़ो जाओ चाइए। बाकी बतकाव हती सो बढ़ा गई, हड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हप्ता करबी बतकाव तब तक लौं जेई की जुगाली करो। मनो सोचियो जरूर के अपने बुंदेलखंड को इतिहास कित्तो गजब को आए, बो चाए बहादुरी को होए चाए कटक घांईं साहित्त को होए। सो अपनों जै बुंदेलखंड!!    
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बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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Thursday, July 30, 2026

बतकाव बिन्ना की | प्रेमचंद जू ने सोई लिखी बुंदेलखंड की दो किसां | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बतकाव बिन्ना की  
प्रेमचंद जू ने सोई लिखी बुंदेलखंड की दो किसां
    - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

किसां के ‘‘सम्राट‘‘ कहाबे वारे प्रेमचंद जू को जनम जेई जुलाई मईना में 31 तारीख को 1880 में भओ रओ। उनको असली नांव धनपत राय हतो। उन्ने पैले नवाब राय के नांव से उर्दू में लिखो। काए से के ऊ टेम पे उर्दू ज्यादा चलत्ती। बे ओई नांव से लिखत रैते मनो एक सल्ल बींध गई। भओ का के उन्ने एक किताब लिखी जीको नांव हतो ‘‘सोजे वतन’’। बा 1909 में कानपुर के जमाना प्रेस से छपी रई। कोनऊं ने अंग्रेजन से कै दई के ‘‘सोजे वतन’’ में तो उनके खिलाफ लिखो गओ आए। फेर का हतो, ‘‘सोजे वतन’’ की कापियां जब्त कर ली गईं। जा दसा देख के ‘‘जमाना’’ अखबार के संपादक मुंशी दयानारायण निगम ने धनपतराय खों सलाय दई के उने अब नवाबराय के नांव की जांगा प्रेमचंद के नांव से लिखो चाइए। तभईं से धनपतराय प्रेमचंद के नांव से लिखन लगे। हम सबई जानत आएं के प्रेमचंद जू ने भौतई नोंनो साहित्य रचो। उन्ने किसानों की दसा पे किसां लिखीं। मजदूरन की दसा पे कलम चलाई औ लुगाइयन औ बच्चों पे भी किसांएं लिखीं, जैसे ‘‘बड़े घर की बेटी’’, ‘‘बूढ़ी काकी’’ औ ‘‘ईदगाह’’। प्रेमचंद जू ने फिल्मों के लाने भी लिखो मनो उने ई समाज के कमजोर लोगन पे लिखबो अच्छो लगत्तो। काए से के कमजोर लोगन पे भौतई कम लिखो जा रओ हतो। प्रेमचंद खों लगत्तो के बे चाए धन से कमजोर होंए, चाए जात से, चाए लुगाई होबे के कारन कमजोर होंए, उनके बारे में लिखो जाओ चाइए, जीसें समाज के सोच में तनक बदलाव आए।
खास बात जे सोई आए के प्रेमचंद जू खों बुंदेलखंड को इतिहास औ इते के रीत-रिवाज भौतई नोंने लगत्ते। जेई से उन्ने दो किसां बुंदेलखंड पे लिखीं। ईमें एक रई ‘‘राजा हरदौल’’ औ दूसरी ‘‘रानी सारंध्रा’’।  

‘‘राजा हरदौल’’ की किसां बुंदेलखंड में खींबई कई-सुनी जात आए। जा किसां ओरछा के राजा जुझार सिंह की आए। जुझार सिंह राजा भले हते, मनों हते बे पूरे सक्की-झक्की। औ संगे कान के कच्चे। उनके लोहरे भैया हते हरदौल जू। अब दोई से जलबे वारन की का कई जाए? कोनऊं ने एक दार जुझार सिंह खों पट्टी पढ़ा दई के आप तो राजकाज में उरझे रैत आओ औ उते तुमाओ लोहरो भैया हरदौल अपनी भौजी संगे नैन मट्क्का कर रैत आए। अकल को अंधरा राजा ने इत्तो ने सोचो के जोन भैया अपनी भौजी खों मताई घांई पूजत आए बा उनके संगे नैन मटक्का कैसे करहे? मनो संका को बीजा मन में परो नईं के देखत-देखत ऊकी बेल लहलहान लगत आए। जेई भओ राजा जुझार सिंह के संगे। ऐ बेर बे क ऊं लड़बे खों गए। उते से लड़ाई जीत के लौटे के कोनऊं ने फेर के उनके कान भर दए। ऊपर से जे औ पेल दऔ के जो लौं लाला हरदौल रैहें तब लौं जे अत्तें चलत रैहें। जुझार सिंह सो हतोई संका को मारो, सो ऊने अपनी रानी खों बुलाओ औ उनसे कई के अपने हाथन से लाला हरदौल के लाने खीर पकाओ। औ जो तुमाए दिल में खोट ने होए तो ऊ खीर में जहर मिला के अपने हाथन से हरदौल खों खवा देओ। जा सुन के रानी रोन लगी औ कैन लगी के ‘‘आपखों लाज नईं आ रई ऐसो कैए में? अरे, लाला हरदौल हमाओ बेटा घांईं आए। आप एक मताई से कै रए के अपने बेटा खों जहर खवा देओ, कछू होस बी आए आपखों?’’ मनो संका को अंधरो राजा अपनी रानी की कां सुनता? ऊने कई के यां तो तुम हरदौल खों जहर खवाओ ने तो हम तुमें छोड़ रए। फेर तुमाई मुतकी बदनामी हुइए। रानी रोन लगीं। ऊके भीतर मातई को कलेजा दुखन लगो। जा बात हरदौल खों पता परी तो उन्ने रानी खों समझाओ के जे मां-बेटा की मर्जादा को सवाल आए सो आप खुसी-खुसी हमें जहर वारी खीर खवा देओ। फेर जेई भओ के रानी को अपने करेजा पे फथरा रख के अपने बेटा घांई हरदौल खों जहर खवाने परो। जे बी कओ जात आए के हरदौल जू खों पान में जहर मिला के खवाओ गओ रओ। सो प्रेमचंद जू ने जेई किसां लिखी आए के हरदौल जू खों पान में जहर दओ गओ रओ। हरदौल जू तो ने रए, मनो बे मर के बी अमर हो गए। उतई राजा जुझार सिंह खों इज्जत ने मिली। उने संकालू आदमियन में गिनो जात आए। जबके उतई रानी की बी तारीफ करी जात आए।

दूसरी किसां आंए ‘‘रानी सारंध्रा’’। जे सोई अपने बुंदेलखंड पे आए। रानी  सारंध्रा ओरछा के राजा चम्पत राय की रानी औ महाराज छत्रसाल की मताई हतीं। ई किसां में प्रेमचंद जू ने राजा चम्पत राय की खींबईं प्रसन्सा करी आए। उनसे मुगल हरें डरात्ते। बे मुगलों की सेना खों धूरा चटा देत्ते। ऊंसई बीर रईं उनकी रानी सारंध्रा। बे अपने दपति औ बेटों खों युद्ध के लाने भेजत समै अपनी आंखन में अंसुवां ने आन देत्ती। बे उन ओरन को तिलक करतीं औ तलवार देके बिदा करतीं। संगे कैत्तीं के ‘‘अब बुंदेलन की लाज तुम ओरने के हाथन में आए। प्रान जाए मनो लाज ने जाने दइयो।’’ जा बात प्रेमचंद जू ने बी लिखी आए। बे रानी सारंध्रा के चरित्तर से खींबई प्रभावित रए। औ होते काए नईं, आखिर रानी सारंध्रा ने अपने बालक छत्रसाल को ऐसो लालन-पालन करो रओ के आगे चल के छत्रसाल ने केवल राजा बने, बाकी उन्ने बुंदेलखंड राज्य बना डारो। उन्ने सोई मुगलन के दांत खट्टे कर दए रए।

सो प्रेमचंद जू ने बुंदेलखंड के इतिहास से उन लोगन पे किसां लिखी जोन से बुंदेलन को सिर ऊंचो होत आए। मने जां एक तरफी प्रेमचंद जू ने दुखियारे, सोषन के शिकार औ कमजोरन पे किसां लिखीं उतईं बुंदेलखंड के गौरव औ बीरन पे बी किसां लिखी। जे अपन बुंदेलों के लाने गरब की बात आए।
बाकी बतकाव हती सो बढ़ा गई, हड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हप्ता करबी बतकाव तब तक लौं जेई की जुगाली करो। मनो सोचियो जरूर के अपने बुंदेलखंड को इतिहास, ईकी संस्कृति कित्ती नोंनी आए के इत्ते बड़े किसां लिखबे वारे प्रेमचंद जू बी इते की किसां लिखे बिना ने रए सके। मनो उन्ने बी इते की मरजादा खों समझी औ ऊंसई नोंनी किसां लिखीं। सो, आप ओरें सोई जे दोई किसां पढ़ियो जरूर, ईंसे प्रेमचंद जू की लेखनी को औ महत्व समझ में आहे। प्रेमचंद जू के जनमदिन पे उनको याद करत भए सबई खों हमाई जै-जै!!!    
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Saturday, July 25, 2026

बतकाव बिन्ना की | ऊ टेम पे लाईफ कित्ती नोंनी हती | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बतकाव बिन्ना की  
ऊ टेम पे लाईफ कित्ती नोंनी हती
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
       ऊ टेम पे लाईफ कित्ती नोंनी हती, सई न! अब आप सोचहो के कोन टेम पे? हम कब की कै रए? ऊ टेम की जब हम बालपन में रए। ऊंसई बी बे ओरें सब जने हमाई बात समझ जैहें जोन के बालपन में मोबाईल औ टीवी ने रओ। ऊ टेम पे बच्चा हरों के मन बैलाओ के दोई तरीका हते। एक तो खेलबे को औ दूसरो किसां सुनबे को। सो, आज बतकाव खेलबे की। का होत्तो के स्कूल से लौट के दिन को उजियारा रैत भर तो हम ओरें खेलत रैत्ते, मनों संझा होतई सात हमें डांट-डपट के घर के भीतरे बुला लओ जात्तो। 
‘‘चलो हात-मों धो लेओ। कपड़ा बदल लेओ औ पढ़बे बैठ जाओ।’’ हम ओरें सबई खों अपने-अपने घरे जेई सुनबे को मिलत्तो। 
अब पढ़बे के लाने तो बैठनेई परत्तो। जो ने बैठते तो मताई चार लपाड़े सूंट देतीं। बाकी हमाई मताई ऐसी ने हतीं औ ने हम ऐसे हते के मताई को कओ ने मानें। सो हमें तो डांट ने घलत्ती, पर हमाए संगी साथियन में लड़का हरों खो जरूर घल जात्ती। ऊंसई बी बिटियां ऐंड़ ने देती हती, ऊ टेम पे तनक बिगरे मोड़ा हरें ई ऐंड़ देत्ते औ मताई-बाप से कुटत्ते। हमाओ बालपन तो सरकारी कालोनी में गुजरो, जिते छै मकान हते। सो हम छैओ मकान के मोड़ा-मोड़ी संगे खेलत्ते। ऊ टेम पे हम ओरों में कोऊ खों जे ने सूझत्तो के जे मोड़ा आएं औ जे मोड़ियां आएं। हम सबरे बच्चा एक संगे खेलत्ते। जेई से हम गुल्ली-डंडा, कंचा, काना-दुआ, लुका-छिपी, खिपड़ी गद्दा, कबड्डी, खो-खो, नदी-पहार, पुतरा-पुतरियां बगैरा, मने मोड़ा औ मोड़ियन दोई को खेल खेलत्ते। बा तो बाद में जब मोड़ा हरें तनक बड़े भए तो उनें किरकेट में मन लगन लगो औ हम मोड़ियां खिपड़ी गद्दा खेलत रईं। बाकी हमने किरकेट बी खेलो। पर ज्यादा नोंईं। काए से के मताई को डर हतो के कई हम अपनों मूंड़ ने फुड़वा लें। बाकी तनक बड़े होबे पे हमने सायकिल खूब चलाई।
लेकन हम बात कर रए हते बालपन के खेल की। औ जे हमें ईंसे याद आ रए के जबे पानी बरसत्तो औ हम सबई घर पे होत्ते तो कभऊं काना-दुआ खेलत्ते, तो कभऊं चपेटा खेलत्ते। ऊ टेम पे जा कैरम-फैरम बी सबके घरे ने होत्ते। काना-दुआ घांई एक-दो गेम औ होत्ते। एक में तो गुना को आकार की लकीरें खेंची जात्तीं औ ऊमें आड़ी लकीरें सोई भरी जात्तीं। लकीरन के हर जोड़ पे गोटियां धरी जात्तीं। इमली के बीजा की चइयां से गोटिया चलाई जात्तीं। जो वारो गेम बे ओरें बी खेलत्ते जोन गइयां-बुकरियां चराबे के लाने हारे जात्ते। ई गेम को हम नांव भूल रए। जो कोनऊं खों याद आए सो हमें बताइयो। 
चपेटा खेलबे के लाने लाख के बने रंग-गिरंगा चपेटा उंगरियन से तौल-तौल के लए जात्ते। भारी चपेटा अच्छे माने जात्ते। मनों बे कभऊं जो उल्टे हात पे गिरत्ते तो उंगरियां ठन्ना जात्तीं। सो, मोए हरये चपेटा नोंने लगत्ते। घरे भीतरे बैठ के सांप-सीढ़ी खेलबे में बी खूबई मजो आउत्तो। मनो ऊ टेप पे मूंड़ भिन्ना जात्तो जबे निन्यानबे पे पौचों औ सांप के मों में पौंच के सूदे नीचे दस्सी पे आ गिरो। ऊ टेम पे बा सांप-सीढ़ी को आबिस्कार करबे वारे खों गरियाबे को जी करत्तो। अब इत्ते से गेम में इत्तो लंबो सांप बनाबे की का जरूरत हती? तनक छोटो सो सांप बना देते तो उनको का बिगर जातो? रस्ता में सो ऊंसई मुतके सांप मिलत्ते। खैर, अब हम तो ने बदल सकत्ते ऊकी डिजाइन। बाकी आतो भौत मजो रओ। 
एक और इनडोर गेम रओ जी को नांव हतो लंगड़ी-धप्पा। जे बरांडा औ आंगन , ने तो छतों पे खेलो जात्तो। ई में कम से कम आठ घर, ने तो दस-बारा जित्ते चाओ उत्ते घर बनाए जात्ते औ ऊपे हर घर में एक टांग से उचकत भए बा खिपरिया सरकानी रैत्ती जो खेल सुरू होबे पे फेंक के घरे डारी जात्ती। अब सोचो तो लगत आए के ऊ टेम पे सरीर कित्तो हरय रओ के फुदकत से उचकत रैत्ते जैसे लंगड़ी दुआ-छुअब्बल में होत्तो। अब तो दोई टांग से उत्तो नईं उचक सकत, एक की तो छोरो। औ जो कऊं कोसिस कर के देखी तो कओ घूंटा पिरान लगे।  
कंचा बी बड़े औ छोटे दोई किसम के होत्ते। रामधई! कंचा सो कभऊं दिमाग से निकरई ने पाओ। काए से के जब बी कभऊं कोनऊं के आफिस में कांच को पेपरवेट दिखानो तो हमें बालपन के कंचा याद आने लगत्ते। कंचा खेलबे में भी बड़े नियम-कायदा रैत्ते। कंचा को उंगरिया से चटका के घुच्चू में डारो जात्तो। जोन को कंचा घुच्चू में चलो गओ, बा जीतो कहात्तो औ जोन को कंचा घुच्चू से बायरे रै जात्तो ऊको उंगरिया से ठेल-ठेल के कंचा को घूच्चू में डारबे की कोसिस करने परत्ती। औ कऊं तब बी ने डार पाए तो एक टेम ऐसो आत्तो जबे हात की कोहनी से कंचा धकिया के घूच्चू में डारने परत्तो। ई चक्कर में कोहनी छिल जात्ती। घुच्चू में डारबे से पैले एक कंचा से दूसरो कंचा सोई पीटो जात्तो। औ जो हार गए सो अपनो कंचा जीतबे वारे को देने परत्तो। अब तो कंचा खेलबे वारे गांव-दिहात में ई दिखात आएं। बा बी भौतई कम। काए से के अब तो बच्च हरें बी मोबाईल में जुटे रैत आएं। 
गिल्ली डंडा सोई भौतई मजे को गेम रओ। दोई तरफी से नुक्कीदार गिल्ली औ एक से डेढ़ फुट को डंडा। देखो जाए तो ऊको मजा किरकेट से कम नईं रओ। औ किरकेट घांई ऊमें बी दूसरी टीम के बच्चा हरें घेर के ठाड़े रैत्ते। फेर जैसई गिल्ली उचकाई जात्ती ऊंसई ऊको लोकबे के लाने सबरे दौर परत्ते। सो उचकाबे वारो कोसिस करत्तो के ऊ तरफी गिल्ली उचकाई जाए जी तरफी कोऊ लोकबे वारो ने होए। कोऊ-कोऊ सिक्सर लगाबे वारी स्टाईल में गिल्ली खों सूंटत्ते। ईंसे उनकी गिल्ली तो कोऊं ने लोक पाउत्तो, मनों उनकी गिल्ली उते से गुजरबे वारों के कभऊं मूंड़ में घलत्ती तो कभऊं कोनऊं के घरे की खिरकी के कांच फोड़त्ती। ऊके बाद तो आप समझतई हो के का होत रओ हुइए? गुल्ली डंडा के बदले महाभारत होन लगत्ती। यां तक तो ठीक आए मनो एक-दो बेर तो ऐसो भओ के कोनऊं के आंख में घली औ ने तो मूंड़ फूटो। जेई सब से बाद में हमाई मताई ने हम ओरन खों गुल्ली-डंडा खेलबे की मनाई कर दई रई। दूसरे की आंख फूटे सो सल्ल औ अपनी फूटे सो सल्ल। 
अब का आए के बच्चा हरें मोबाईल औ लेपटाप पे गेम खेलत एक जांगा बैठे दिखात आएं। ने तो रील देखत रैत आएं। औ मताई-बाप सोई मोबाईल में जुटे रैत आएं सो बे बी जा नईं देख पाऊत आएं के उनको बच्चा ठलुआ बनो जा रओ। जोन उमर में कूंद-फांद के सरीर बनाओ चाइए ऊ उमर में एक जांगा पे पसरे रैबे से का हुइए? फेर होत का आए के जब उनई मोड़ा-मोड़ी को हारमोन बदलत आए तो उने समझ में आन लगत आए के हमें तो स्लिम औ सुंदर दिखने, सिक्स पैक बनाने। सो, बे पिल परत आएं जिम जा के। फेर भले चाए कछू हो जाए। उतई दूसरी बात के जब मोबाईल पे सब कछू बनो-बनाओ देख लेओ तो अपने लाने सोचबे को कछू नईं रै जात। मने कल्पना करबे की सक्ती नईं रै जात। पर का करो जाए, समै तो बदलत आए। जो समै को नियम आए। अब समै के संगे कछू नओ, कछू पुरानो ले के चलो तो सब ठीक रैहे। औ सम्हर के ने चलहो सो ने तो हम का उखार लेबी?      
बाकी बतकाव हती सो बढ़ा गई, हड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हप्ता करबी बतकाव तब तक लौं जेई की जुगाली करो। मनो सोचियो जरूर के ऊ टेम पे लाईफ कित्ती नोंनी हती। जे सोई बताइयो के आप ओरन ने अपने बालपन में इनमें से कोनऊ खेल खेलो के नईं? औ हां, जो गेम हमेंयाद ने आए बे सोई याद दिला दइयो। जै-जै!!!    
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Friday, July 17, 2026

बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात

बतकाव बिन्ना की  
मताई के नांव को एक पेड़ लगाओ के नईं
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
    कल हम तिगड्डा लौं गए के उते एक पैचान वारे मिल गए। उन्ने हमसे ने हमाओ हाल पूछो औ ने चाल पूछो, बस, छूटतई जेई पूछो के ‘‘आपने मताई के नांव को पेड़ लगाओ के नईं?’’
‘‘कोन की मताई के नांव को? हमने पूछी।
‘‘अरे अपनी मताई के नांव को।’’ उन्ने कई।
‘‘हमने तो पर की साल लगाओ रओ, आपने लगाओ के नईं?’’ हमने उनसे पूछी।
‘‘हमने पर की साल बी लगाओ रओ औ ई साल बी लगा आए। परों तो लगाओ आए।’’ बे उचकत भए बोले। संगे उन्ने हमसे जे सोई पूछ लई, ‘‘काए आपने हमाओ फेसबुक नईं देखो का? हमने पेड़ लगात की फोटुएं ऊमें डारी रईं। औ स्टेटस में सोई डारी रईं।’’
‘‘बा तो हम नें देख पाए, बाकी आप कै रए तो आपने पेड़ जरूर लगाओ हुइए।’’ हमने कई।
‘‘आपको सोई लगाओ चाइए। ईसे मताई की याद बनी रैहे।’’ बे आगे बोले।
‘‘हऔ, आप सई कै रए। बाकी अपने बाप-मताई, दादा-दादी, नाना-नानी औ उनके बी बाप-मताई, दादा-दादी, नाना-नानी ने पेड़ लगाओ रओ। मने हमाए पुरखा ने बी पेड़ लगाओ रओ जिनें अपन ओंरन ने काट डारो। अब जो जंगल कम पड़न लगे सो एक पेड़ मताई के नांव को लगाबे को डिरामा कर रए।’’ मोसे कै आई।
‘‘हाय रे, आप जो का कै रईं? हमने सो आज लौं एक डगरिया ने कटवाई, औ आप पेड़ कटवाबे को दोस हमपे मढ़ रईं। जे तो गल्त बात आए।’’ बे भिनकत भए बोले।
‘‘हमने अकेली आप की नईं कई। हमने तो सबकी कई जीमें कछू ने कछू जिम्मेवारी हमाई सोई आए।’’ हमने कई।
‘‘का मतलब?’’ उन्ने पूछी।
‘‘मतलब जे के आप ने बा कहनात सुनी हुईए के जो आप कतल करबे वारे खों कतल करते देख के बी हल्ला नईं मचा रए तो मनो आप सोई कतल में सामिल कहाए। सो अपन ओरन ने जगंल कटबे की खूब खबरें पढ़ीं। मनों मों से बोल ने फूटें। कभऊं खुल के बिरोध ने करी।’’ हमने कई।
‘‘सो अपन ओरें का कर सकत आएं? अपन ने तो खबई पढ़ी, अपनी आंखन से तो नईं देखो।’’ बे ढिठाई दिखात भए बोले।
‘‘सई कई के अपन ने अपनी सगी आंखन से तो नईं देखो। मनो अपन गांव, बस्ती, सहर खों तो बढ़त देख रए। जे जंगल की जमीन पे नईं फैल रए तो का चांद पे फैल रए?’’ हमने सोई कई।
‘‘अब जनसंख्या बढ़हे तो मकान तो लगहेंईं।’’ उन्ने कई।
‘‘जनसंख्या उत्ती नईं बढ़ी जित्ते की मकान बढ़ गए। काए से अब कोऊ बाप-मताई के संगे नईं रैत। सबखों अपने लगाने अलग मकान चाऊने। पैले का होत्तो के सबरे संगे रैत्ते। सो उतई पुस्तैनी मकान में चार तल्ला भले बना लए जात्ते मनों अलग रैबे की कोऊ ने सोचत्तो। अब तो सबखों अलग-अलग रैने औ सबखों अपनो अलग मकान चाऊने। काए सई कई के नईं।’’ हमने उनसे पूछी।
‘‘कै तो आप सई रई, पर जे सब तो चलन की बात आए। आजकाल जेई चलन चल रओ। का करो जा सकत आए?’’ बे मासूम बनत भए बोले।
‘‘ध्यान से सुनियो आप औ बुरऔ ने मानियो! का आए के बच्चा ऊंसईं बनत आएं जैसे मताई-बाप होत आएं। आप खों लेओ, आप उते बरिया चौक को अपनो पुरानो मकान छोर के नई बस्ती में रैबे खों चले आए। मताई-बाप खों उतई छोर आए। मने बा मकान बी आपको औ जे नओ मकान बी आपको। अब आप के लरका-बच्चा सोई जेई कर रए कोऊ नोएडा में घरे खरीद रओ तो कोऊ गुरुग्राम में तो कोऊ बैगलुरु में। मनों इते को मकान बी उने नई छोड़ने। उल्टे आजकाल सो जे चलन हो रओ के बे ओरें उते पइसा कमा के इते गांव-जंगल में अपनो फारम हाऊस खरीद के डार रए। जीमें उनको साल-दो साल में कभऊं-कभार आने। मनों एसेट्स के नांव पे जंगलई तो कटवाने उनें।’’ हमने कै डारी।
‘‘आप से तो कछू कैबो फजूल आए। आप से कओ आम, सो आप नींम की सुनान लगत आओ। हम जा रए।’’ बे बमकत भए बोले। काए से के हमें पता हती के उनके लरका औ बिटिया ने इते अपनों-अपनों फारम हाऊस खरीदो आए। अब आपई सोचो के जिनकी जिनगी नोएडा औ बैंगलुरु में कटनी होए, उनें इते जमीन दबा के बैठबे की का जरूरत? मनों नईं बा उनके लाने धरती मां को टुकड़ा नोईं, बा तो एसेट्स आए। भले ईके बदले कई एकड़ को जंगल कट गओ होए चाए खेती मिट गई होए।
‘‘अरे, आप बुरौ काए मान रए? हम तो जग की कै रए। आप हमाए कहे को पर्सनल ने लेओ। आप तो जे बताओ के पर की साल को आपको लगाओ गओ पेड़ कैसो आए?’’ हमने उनसे पूछी।
‘‘अच्छो हुइए।’’ बे बोले।
‘‘का मतलब के अच्छो हुइए? आप ऊको जा के देखत नइयां का?’’ महने पूछी।
‘‘अब लगा दओ रओ पेड़। सो अब बेर-बेर उते जा के को आ देख रओ? का जे नेता हरें अपनों लगाओ पेड़ देखबे खों जात आएं?’’ उन्ने उल्टे हमई से पूछ लई।
‘‘बे काए खों जैहें? का उने औ कोनऊं काम नइयां? औ फेर उनखों मताई के नांव को हर गांव-सहर में एक पेड़ लगाने होत आए, बे कां-कां जा के देखहें? मनों आप तो जा सकत हो।’’ हमने कई।
‘‘जेई तो बात आए के पेड़ लगा दओ। अब ऊको रोजीना को देख रओ।’’ बे बोले।
‘‘सई कई आपने। एक दिनां अपनी मताई खों याद कर लओ, ऊके नांव पे एक पेड़ लगा दओ, जीके लाने उते गड्डा पैले से खुदे मिलत आएं। ऊमें पेड़ लगाओ औ फोटू खेंचाई, फेर पानी डारो औ फोटू खेंचाई। फेर ऊ सबरी फोटुअन खों सोसल मीडिया पे डार दओ। कऊं पौंच लग गई तो अखबार में फोटू छपवा लई। हो गओ एक पेड़ मताई के नांव को। जै राम जी की।’’ हमने कई।
‘‘तो का? जेई से सब कर रए।’’ बे अपनो पल्ला झारत भए बोले।
‘‘फेर तो जे सई रैहे के ई दफा हमने पेड़ नईं लगाओ आए, सो कोऊ दिनां आप संगे चलियो औ पेड़ लगात भए हमाई फोटू खेंच दइयो। हम सोई उन फोटुअन खों सोसल मीडिया पे डार के पेड़न खों श्रद्धांजलि दे लेबी।’’ हमने उनसे कई।
‘‘हऔ जरूर! जब चलने हो हमें फोन कर लइयो। हम संगे चले चलबी। हम सोई एकाध पेड़ औ लगा देबी।’’ बे हुलसत भए बोले। उन्ने हमाई कई ‘श्रद्धांजलि’ पे कान ई ने दओ। बे हमाओ ब्यंग ने समझे।
बे तो ‘राम-राम’ कर के चले गए, मनों हम जेई सोचत रए के अपन ओरें इंसान हो के हाथी घांईं बनत जा रए जीके खाबे के दांत औ, दिखाबे के औ। हम तो बे गइया-बकरी से गए गुजरे होत जा रए जोन घास खों ऊपरे-ऊपरे से खाउत आएं, जड़ें छोरत जात आएं, ताके दूसरे दिनां फेर के उनको घास मिल सके। हम तो सब कछू जड़ई से खा जात आएं। कल के लाने बचाबे की कोन खों परी?
बाकी बतकाव हती सो बढ़ा गई, हड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हप्ता करबी बतकाव तब तक लौं जेई की जुगाली करो। मनो सोचियो जरूर के आप ओरन में से जोन-जोन ने मताई के नांव को पेड़ लगाओ, बे पलट के अपनों लगाओ पेड़ देखबे गए के नईं? औ गए तो कित्ती बेर?    
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बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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Thursday, July 9, 2026

बतकाव बिन्ना की | ई किसां को पुरानो वर्जन सई, के नओ वर्जन? | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बतकाव बिन्ना की 
ई किसां को पुरानो वर्जन सई, के नओ वर्जन?
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
      चलो आज अपन ओरें एक नीतिकथा पे बिचार करें। अब आप ओरें जा गिचड़ ने करन लगियो के कोन की नीति पे? काए से के आजकाल राजनीति में नीति सो दिखात नईंया। बाकी अपन को का करने राजनीति से? अपन तो ठैरे मतदाता। अपन खों तो बस वोट देने रैत आए। आगे से अपन खों का लेबो-देबो के मैंगाई बढ़े, चाए मंदर में चढ़ाबे की चोरी होए, चाए लुगाइन के संगे, बच्चियन के संगे कछू होत रए, अपन खों का करने? जबे वोट देने रओ तो सो दे दओ रओ। ऊंसई बी सोचबे वारी बात आए के अपन कहाऊंत आएं ‘मतदाता’, सो, देबे वारे खों कभऊं देबे के बाद कछू मांगो नईं चाइए। अच्छो नईं मानों जात। ‘मतदान’ में दान कर दओ सो कर दओ। अब जोन खों दान दओ, का ओई से कछू मांगों थोड़ेई जा सकत आए। जे अपने संस्कार नोंईं। औ अपन ठैरे कछू ज्यादई संस्कारी। जेई से जोन खों वोट देके जिताऊत आएं ऊंसे जे लौं नईं पूछ पाऊत आएं के तुमने जो-जो करबे की कई रई बा करी काए नईं? जा पूछबे में सो ऐसई लगहे जैसे भिखारी खों भीख देबे के बाद ऊको ठेन करी जाए के तुमने भीख के बदले आसीसें काए ने दईं? नईं भैया! अपन ठैरे संस्कारी सो अपन ऐसो नईं पूछ सकत। अपन ठैरे संस्कारी।  बाकी छोड़ो जे सब! हम सुनाबे जा हते एक ठो नीतिकथा, सो, बा सुनो औ गुनो!
का भओ के एक जंगल में एक शेर रैत्तो जो उते को राजा रओ। ऊके दरबार में एक कौवा, एक तेंदुआ औ एक लोमड़ी रैत्ती। शेर शिकार करत्तो औ अपनों भरपेट खा के, अफर के बाकी बा तीनों के लाने छोड़ देत्तो। तीनोंई शेर की भौतई चमचोंई करत्ते। काए से के उने पतो रओ के जबलौं शेर रार करत रैहे तबलौं फोकट को खाबे खों मिलत रैहे। उनें आड़ी के काड़ी ने टारने परहे।  
एक दार का भओ के ऊ जंगल में कऊं से एक ऊंट आ गओ। ऊको देख के कौवा, तेंदुआ औ लोमड़ी की बांछें खिल गईं। उन्ने सोची के जो शेर ई ऊंट को शिकार कर ले, तो उन तीनों को बी चार-छै दिनां को इंतजाम हो जैहे। सो, बा तीनों जने ऊंट खों घेर-घार के शेर के पास लेवा गए।
“जो को आ? जो अपने इते को तो ने दिखा रओ?” शेर ने पूछी।
“को जाने कां से आ गओ?” कौवा ने कई।
“हमें तो लगत आए के जो दूसरो जंगल से इते जासूसी करबे खों आओ आए।” तेंदुआ ने कई।
’ईको तो मार के खा लओ चाइए।” चतुरा लोमड़ी ने तुरतईं कई।
बा तीनों की बतकाव सुन के ऊंट कंपन लगो। ऊने शेर के पांव पकर लए।
“महराज, हमाई जान बख्श दई जाए। हम तो आपकी सरण में जे लाने आए के आप हमें अपने इते जियन खान देहो। मालक, हम जो झूठ बोलें तो हमाए मों में कीरा परें। मालक, जो आप अपने सरण में आए भए को जो  आप मार के खा जैहो तो आपकी भौतई बदनामी हुइए। सरण में आए भए खों मारो नईं जात आए, जा आप सोई जानत हो। बाकी आपकी मरजी।” कै के ऊंट शेर के पावन पे लोट गओ।
शेर ने सोची के ऊंट कै तो सई रओ आए। सो शेर ने ऊंट खों अपनी सरण में लेत भए अपनी सेवा में रख लओ। तीनों चमचों खों जा बात बुरई लगी, मनों ऊपर से उन्ने शेर के जैकारे लगाए
कछू दिनां गुजरे। एक दिनां शेर की तबीयत बिगर गई। हप्ता खांड़ लौन ने सुदरी। तीनों चमचे भूके मरन लगे। काए से उने तो शेर के करे शिकार में से खाबे की आदत रई। सो उन्ने शेर से कई के “मालक! आप तो शिकार कर नईं पा रए औ हम तीनों  भूक से मरे जा रए। सो, अब ऊंट खों मार के खा लओ जाए, जेई उपाय बचो आए।”
“अरे, हम तो सोच रए हते के जा ऊंट तो हमाओ सरण वारो ठैरो, सो ऊको तो हम नईं मार सकत, मनों तुम तीनों खों मार के न खा लओ जाए?” शेर ने कई।
शेर की बात सुन के तीनों कंपन लगे। औ उते भाग खड़े भए। ईके बाद शेर उन तीनों चमचों से छुटकारो मिल गओ। फेर शेर औ ऊंट खुसी-खुसी रैन लगे।
सो, जा हती बा नीति कथा जोन में बताओ गओ के एक राजा खों चापलूसन के कए में नईं आओ चाइए। 
अब तनक ज ईं किसां खों आज के हिसाब से सोची जाए तो किसां कैसी हुइए? 
तो सुनियो अब ई किसां को नओ वर्जन......
नओ वर्जन में किसां ऐसी हुइए के शेर हतो राजा औ राजा खों चापलूसन की घनी जरूरत रैत आए। जो चापलूस चौबीस घंटा ऊकी जैकारे ने करें तो ऊको राजा होबे की फीलिंग ने आहे। सो शेर जू खों सोई अपने तीनों चमचा कौवा, तेंदुआ औ लोमड़ी भौतई पोसात्ते। बा उन्हई की सलाय पे चलत्तो। ऊको पतो रओ के ऊकी परजा तो कऊं नईं जा रई, चाए बा ऊको गरो मसकत रए, चार मार के खात रए। परजा सो लात-जूता खात बनीं रैहे औ जैकारे लगात रैहे। सो, बा राजा शेर शिकार करत्तो औ खुद खात्तो, संगें अपने तीनों चमचों खो खिलाउत्तो।
एक दिनां ऊके जंगल में कऊं से ऊंट आ गओ। कौवा बोलो के - “मालक जे दूसरो जंगल को जासूस आए इको मार के खा लओ जाए।”
“नईं मालक, जो जे दूसरो जंगल को मेम्बर आए तो ईको अपने राज में मेम्बरशिप दे दई जाए औ कछू अच्छो सो पद दे दओ जाए, ईंसे उते औ मेम्बर फूट के इते आ जाहें। ईसे आपको राज सबसे बड़ो राज कहा हे।” तेंदुआ बोलो। काए से के ऊके दिल में चल रई हती के जो शेर अपनों राज बड़ो कर लैहे तो कल को ऊके टपकबे पे ऊ जा बड़े राज को मालक बन जैहे।
“हऔ महराज! दोई अपनी-अपनी जांगा सई कै रए। मनो अबे जा ऊंट तनक दूबरो आए। अबे खाबे जोग ईमें कछू खास नइयां, सो, ईको अबे अपने राज में कछू पोर्टफोलियो दे के खान-पियन देओ। फेर जब जे मुटा जाहे, तब सोचबी के कोन दिनां काटने औ कोन दिनां खाने।” लोमड़ी ने सोई अपनो एक्सपर्ट कमेंट दओ। ऊंट ने सोई मोका ताक के अपने जंगलवारों खों खूब गरियाओ औ अपनी पार्टी मने अपनों जंगल बदल लओ।
सो ई तरां ऊंट खों नए जंगल में जांगा मिल गई। फेर चारो परजा के मूंड़ पे तबला बजाऊत भए खत रए, मुटियात रए। अबे लौं ने राजा शेर बिमार परो ने ऊंट के खाए जाबे की नोबत आई। सबरे अपनी सात पीढ़ी के लाने जोग मसकत जा रए।
बाकी बतकाव हती सो बढ़ा गई, हड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हप्ता करबी बतकाव तब तक लौं जेई की जुगाली करो। मनो सोचियो जरूर के आज के टेम पे ई नीतिकथा मने किसां को पुरानो वर्जन सई, के नओ वर्जन?    
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Thursday, July 2, 2026

बतकाव बिन्ना की | मंदर में घपला करे से जो उने डर नईं लगो?| डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बतकाव बिन्ना की  
मंदर में घपला करे से जो उने डर नईं लगो?  
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
       हमें एक घटना याद आ रई, बरसो पैले की। का भओ रओ के पन्ना के जुगल किसोर मंदर में में एक दार चोरी भई। किसोर जू के मुकुट, मुरली औ सबरे जेवर ऊ भड़या ने चुरा लए। संकारे मंदर खुलो तो पुजारी जू ने हल्ला मचाओ। भीड़ लग गई। पुलिस आ गई। सबरे ऊ भड़या खों गरयान लगे के जीने बी जुगल किसोर जू के जेवर चुराए ऊकी ठठरी बंधे, ऊको कीरा परें, ऊपे जुगल किसोर जू की गाज गिरे। जांच सुरू करी गई। पब्लिक तो ऊंसई खोंखिया रई हती सो ऊने सोई पुलिस पे दबाव डारो। पुलिस के लाने सोई जे बड़े सरम की बात हती। सो पुलिस वारे ऊ भड़या खों पकरबे के लाने जुट परे। दोई दिनां में जा साबित हो गओ के जो पुलिस चाए तो कोनऊं बदमास बच नईं सकत। ऊ भड़या पकरो गओ औ किसोर जू के सबरे जेवर उतई मंदर के कुंआ में मिले। काए से के ऊ भड़या ने बा जेवर बांध के कुआ में लटका दए रए। ऊकी सेाच से के पुलिस को तो पतो परहे नईं। मनो पुलिस औ ऊके कुत्ता ने सूंघ-सांघ के बा जेवर ढूंढ निकारे। इत्तोई नोंई, पुलिस ने ऊ भड़या खों भी पकर लओ। जबे पब्लिक खों भड़या के बारे में पता परी तो सबरे अकबका के रए गए। काए से के बा भड़या और कोऊ नईं मंदर को पुजारी ई रओ। पब्लिक ने ऊ पुजारी खों औ गरियाओ। ऊ पे केस चलो। मनो सायद बा ऊ टेम पे जमानत पे छूटो रओ। सायद ईसे कहने पर रए के जा भौत पैले की बात आए। हम हते लोहरे ऊ टेम पे, सो जित्ती याद आ रई बता रए। फेर पता परी के ऊ पुजारी खों अपने करम पे इत्तो पछताओ भओ के ऊने ओई कुंआ में कूंद के अपने प्रान दे दए। इत्तई नईं, कछू समै बाद पता परी के ऊके घरे औ दो-तीन मौतें भईं। सो सबई कैत्ते के किसोर जू ने ऊको दंड दओ। बाकी काम बी तो ऊने बुरौ करो रऔ।
एसईं एक घटना औ भई रई। छतरपुर में हरपालपुर की रस्ता पे एक छोटो सो मंदर रओ। अब तो बा बड़ो बन गओ हुइए। मनो ऊ टेम पे बा छोटो सो रओ। ऊकी मानता ऊ टेम पे बी रई। अब हमें जे ध्यान नोंई के बा किसन जू को मंदर रओ के रामजी को, मनो इन्हई दोई में से एक को रओ हुइए। काए से के कोऊ ने मनौती पूरी होबे पे उते चांदी को मुकुट चढ़ाओ रओ। मुकुट चढाए चार दिनां भए नईं के एक दारूखोर भड़या रात को मंदर में घुसो औ बा मुकुट ले भगो। ऊको दारू के लाने पइसा चाउने रए सो ऊने जे न सोची के भगवान को मुकुट आए के कोन को आए? ऊने तो उठाओ औ चलतो बनो। दूसरे दिनां कोऊ ने बताओ के मंदर के लिंगे बा दारूखोर को घूमत देखो रओ। अब सबरे ऊको ढूंढबे में जुटे। ऊको कऊं पतो ने परो। बाद में पता परी के बा रातई खों कोनऊं टिरक में चढ़ के कानपुर भाग गओ रओ। इते पुलिस छतरपुर औ हरलपालपुर में ऊको ढूंढत फिरई हती, मनो बा तो उते कानपुर में दारू सूंट रओ हतो। फेर एक दिनां बड़ो गजब को भओ। बा दारूखोर भड़या गांव लौट आओ। ऊने बा मुकुट बी मंदर खों दे दओ। पुलिस ने ऊंसे पूछी के अब तक कां रए औ अब काए लौटे औ संगे जा मुकुट लौटाबे की तुमें काए सूझी? सो ऊ भड़या ने मजे की किसां सुनाई। ऊने बताई के ऊके लिंगे पइसा ने हते औ ऊको दारू की तलब लग रई हती। सो ऊने बिगैर कछू सोचे-बिचारे मंदर में से मुकुट चुरा लओ औ कानपुर भाग गओ। उते एक चोरी को समान खरीदबे वारे खों मुकुट बेंचो औ पईसा ले के दारू पियन लगो। रात की बेरा जब बा सोओ सो ऊको लगो के कोनऊं सीना पे चढ़ो बैठो। साना पे चढ़ो बा मानुस बिगैर मुकुट के भगवान की मूरत घांई दिखा रओ तो। दो रातें औ जेई भओ। ईंसे बा दारूखोर डरा गओ। ऊके मन में आई के ऊसे गलती हो गई, अब ऊको मुकुट वापस कर दओ चाइए। मनो बा तो ऊको बेंच चुको हतो। ऊने सोची के अब का करो जाए? जो कऊं बा ऊ चोरबजार वारे से मांगबे जैहे सो बा न लौटाहे। सो ऊ दारूखोर ने बा चोरबजार वारे के इते सेंध लगाई औ मुकुट ले भगो। ईके बाद बा वापस गांव वापस पौंचो औ ऊने मुकुट सोई मंदर खों लौटा दओ। चोरी करबे के कारन ऊको सजा तो भई, मनो कर्री ने भई। उते के लोग कैत्ते के जो बा मुकुट ने लौटातो तो भगवान ऊको पटक-पटक के मारते। बाकी बा चोरबजार वारो सोई पकरो गओ। ऊके तो पइसा बी गए औ मुकुट बी गओ। औ पुलिस के डंडा परे सो अलग से। अब बुरए काम को बुरौ अंत तो होतई आए।
सो जे दो किसां सो हमें याद आ रई। अब आप ओरन जानतई आओ के जे किसां हमें याद काए आई? ठीक समझे आप ओरें! अरे रामलला के इते चंदा के पइसा में गड़बड़ी भई सो हमें जे दोईं घटना याद आ गईं। ऊंसई अपने इते जब कछू होत आए तो मुतकी पुरानी बातें याद आन लगत आएं। जैो कोऊं के इते कोनऊं दिल के दौरा से सांत हो गओ होए तो सबरे जने जो उते जुटत आएं बे अपनी-अपनी सुनान लगत आएं के हमाए फूफा के संगे बी ऐसोई भओ रओ, तो हमाई मौसी के संगे बी ऐसई भओ रओ। मनो कोनऊं के इते समै के पैले मोड़ा या मोड़ी पैदा हो जाए सो सबई खों याद आन लगत आए के हमाए इते बी ऐसो भओ रओ। ऐसे समै सबई जनमपतरी खोल के बैठ जात आएं के कोन के इते सतमासी भई औ कोन के इते अठमासा भओ। जो कोऊ एक खों मलेरिया हो जाए सा बाकी सब जनों खों अपनों-अपनों मलेरिया याद आन लगत आए। सो जे तो बड़ी बात आए। इत्ते नोंने रामलला। इत्तो नोंनो मंदर। इत्ते अच्छे से प्रानप्रतिष्ठा भई रई के आज लौं आंखन के आगे दिखात आए। बाकी हम आज लौं रामलला के दरसनों के लाने ने जा पाए। हमने एक भैयाजी से तो यां तक कै रखी आए के जो हमें संगे ने लिवा गए अरै दरसन ने कराई तो आपके लाने पाप परहे। बाकी सांची तो जा आए के जबे रामलला को बुलावो आहे तभई उते जाबे खों मिलहे औ तभईं दरसन हो पाहें। 
बाकी जब से हमने बा खबर सुनी के उते चंदा के पइसा को घपला हो गओ, तभई से हमें जे दोई किसां याद आन लगीं। सो का आए के जोन ने रामलला के चंदा के पइसा डकारे उनें पचहे नईं, जे बात तो तै कहाई। एक तो भड़याई ऊंसई बुरऔ काम आए, ऊपे से मंदर में भड़याई? ईसे बढ़के औ कछू बुरौ काम होई नईं सकत आए। सो हम अपने जी खों जेई तसल्लसी दे रए के एक न एक दिनां सबरे भड़या हरों खों सजा जरूर मिलहे। इते अंधेर बी औ देर बी आए, मनो उते देर भले होए पर अंधेर ने हुइए।         
बाकी बतकाव हती सो बढ़ा गई, हड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हप्ता करबी बतकाव तब तक लौं जेई की जुगाली करो। मनो सोचियो जरूर के बे ओरें कित्ते ढीठ आएं के इत्ते पापुलर मंदर में घपला करे से जो उने डर नईं लगो? रामलला के पइसा चुरात समै उनको जी ने कांपो? अब रामलला उनखों दंड दैहें के नईं?    
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Thursday, June 25, 2026

बतकाव बिन्ना की | सबरे लड़इयों को ब्याओ भओ जा रओ, मनो पानी ने बरस रओ | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बतकाव बिन्ना की  
सबरे लड़इयों को ब्याओ भओ जा रओ, मनो पानी ने बरस रओ 
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
      जब हम लोहरे हते तो हमाए इते खाना पकाने वारी बऊ बड़े मजे-मजे की किसां सुनात्तीं। उनईं से सबसे पैले हमने लड़इयों के ब्याओ की किसां सुनी हती। जा किसां खाली किसां ने हती, ईमें मोसम की खासियत सोई बताई गई हती।
का हतो के पैले 15 जून लौं बरसात को मौसम सुरू हो जात्तो। हप्ता भर में चकौड़ा/चरौंटा हरियान लगत्ते। मनो कोऊ-कोऊ दिनां ऐसो बी होत्तो के सूरज बी दिखात रैत्तो औ पानी की झला आन के कढ़ जात्तो। ऊ टेम पे इन्द्रधुष सोई देखबे खों मिल जात्तो। ऊके बारे में बऊ कैत्तीं के जबे सूरज निकरो होए औ झला परे तो ऊ टेम पे लड़इयन को ब्याओ होत आए। अब ऊ टेम पे हमें तो समझ में ने आत्ती के लड़इयन को ब्याओ कैसो होत आए? हमें ऊ समै पे जेई लगत्तो के जोन टाईप से दूला-दुलैया को ब्याओ होत आए, मंड़वा तरे, ऊंसई लड़इयन को ब्याओ होत हुइए। का उनके इते बी पंगतें बैठत आएं? हम जेई सोचत्ते। बऊ से एक बेर हमने पूछई लई के जे लड़इयन को ब्याओ कैसो होत आए? उनके इते बी ढोलक बजत आए का? गारी सोई गाई जात हुइए, मनो का बे ओरें गारी गा लेत आएं? बऊ ने हमाई बात सुनी तो बे खूब हंसी। फेर उन्ने हमें जे किसां सुनाईं जोन हम आप ओरन खों सुना रए-
का भओ के एक हतो जंगल। ऊ जंगल में एक लड़इया रैत्तो। बा भड़यागिरी सोई करत्तो। जब बा जंगल में शिकार करत-करत बोर हो जात्तो तो कभऊं-कभऊं मुर्गा-मुर्गी चुराबे के लाने गांव में पौंच जात्तो। एक बेर बा गांव पौंचो सो ऊने देखी के गांव में कोनऊं को ब्याओ हो रओ। घासलेट वारी अच्छी लालटेनें जल रईं। पूरो घर, आंगन औ अहातो लौं जगमगा रओ। उत्तई नईं, बा लाईटन से पूरो गांव दमक रओ तो। अब इत्तो उजालो होए तो कोऊ भड़या भला कछू कैसे चुरा सकत? सो बा लड़इया इत्तो तो समझ गओ के आज मुर्गा-मुर्गी कछू नईं मिल पाने। मनो ऊको लगो के जब इते लौं आ ई गए आएं तो तनक ब्याओ देख लओ जाए। बा बाड़ के जरवा की ऊ तरफी छिप के बैठ गओ औ ब्याओ देखन लगो। पूरो ब्याओ देख के ऊको जी बी कुलबुलान लगो के जेई टाईप से अपनों ब्याओ करो जाए। जेई सोचत भओ बा भुनसारे जंगल खों लौट परो।
जंगल पौंच के ऊको लगो के ब्याओ तो तब हुइए जब एक ठइयां लड़इयन मिले। सो बा सब कछू भूल-भाल के एक लड़इयन ढूंढने निकर परो। कछू मेनत के बाद ऊको एक लड़इयन मिल गई। 
‘‘तुम हमसे ब्याओ करहो?’’ लड़इया ने लड़इयन से पूंछी। 
‘‘काए नईं, जरूर करबी!’’ लड़इयन सरमात भई बोली।
मने लड़़इया ने एक दोरो तो पार कर लओ हतो। ऊको ब्याओ के लाने नोंनी सी लड़इयन मिल गई हती।
‘‘कबे करने ब्याओ बोलो?’’ लड़इयन ने लड़इया से पूछी।
‘‘अबे गम्म खाओ! हम तनक रोसनी-मोसनी को इंतजाम तो कर लेवें फेर करबी ब्याओ।’’ लड़इया बोलो।
अब लड़इयन ने तो इंसानों को ब्याओ देखो ने हतो सो ऊको का पतो के लड़इया के दिमाग में का चल रओ? बा बोली, ‘‘ठीक आए, जबे करने हो सो बतइयो।’’
लड़इया ने सोच तो लओ रओ के घासलेट की लाइटें जला के ऊके उजियारे में ब्याओ करहे, मनो ऊके इते कां धरी लालटेनें? तब ऊने सोची के जोन टाईप से बा मुर्गा मसक लात आए ओई टाईप से लालटेनें दबा लाहे। अगली रात खों बो लड़इया गांव पौंचो। मुतकी देर तको रओ। ऊको अबेर होबे की परवा ने हती, बा तो लालटेन चुराबे के लाने मों दताए बैठो हतो।
कुल्ल देर बाद गांव के सब ओरें अपनी-अपनी लालटेंनें बुझा के सो गए। लड़इया दबे पांव उठो औ एक घरे की खिड़की से कूंद के भीतरे पौंचो। उते ऊको लालटेन खूंटा पे टंगी दिखानी। लड़इया उचको औ ऊने लालटेन निकारबे को कोसिस करी। लालटेन ऊके पंजा में ने अटकी औ जमीन पे जा गिरी। आवाज सुन के घर वारे जाग परे। उन्ने लड़या खों देखो तो लट्ठ उठा के ऊको मारबे दौरे। लड़इया बरया-बरके अपनी जान बचा के उते से भागो।
पर बा लड़इया इत्ते पे हार मानबे वारो ने हतो। चार दिनां बाद ऊने फेर गांव को चक्कर मारो। अब के बा एक लालटेन मों में दबाबे में सफल हो गओ। मनो ऊको तुरतईं लालटेन उतई पटकने परी। काए से के लालटेन को कांच ऊ समैं बी भौतई गरम हतो। लड़इया को मों चिहुंक गओ। बा मों झटकत भओ भाग खड़ो भओ।
तीसरी बेरा बा फेर के गांव में घुसो। ई बेर ऊने पैले से बुझी भई लालटेन ताकी औ मौका परतई ऊको मों में दबा के भाग खड़ो भओ। जंगल पौंच के बा भौतई खुस भओ के अब तो लालटेंन की रोसनी में ऊको ब्याओ हुइए। ऊने लड़इन खों बुला लओ। चार लड़या औ बुला लए जोन से बे ओरें देखें के ऊको कित्तो नोंनो ब्याओ हो रओ। सबरी तैयारी हो गई। मुर्गा-मुर्गी सोई भड़याई से ला के धर लए गए। सबने कई के अब ब्याओ सुरू करो जाए। जा सुन के लड़इया ने लालटेन जलाबे की कोसिस करी। पर ऊको जे ने पतो रओ के लालटेन जलाई कैसे जात आए। ऊने भौतई कोसिस करी। इत्ती कोसिस के कोसिस करत-करत भुनसारो हो गओ। तनक देर में भुनसारो सोई ढरक गओ औ दुफारी हो गई। लालटेन ने जलनी ती, ने जली। लड़इया बी थक गओ हतो। मगर करे सो का करे। अब तो ऊकी इज्जत पे बन आई हती। धूप सोई चटक रई हती। इत्ते में कऊं से तनक से बदरा घिर आए, बिजुरिया चमकन लगी औ पानी बरसन लगो। लड़इयन समेत सबरे लड़यों ने कई के ‘‘पानी में भींगबे से अच्छो आए के अब बढ़ लओ जाए। ब्याओ कोनऊं औ दिनां कर लइयो।’’
‘‘तुम ओरें औ फुर्रा आओ! तुमें पतो नइयां के अबई भोलेबाबा ने हमसे कई आए के लड़इयों को ब्याओ इंसानों की लालटेन में नईं होत आए। तुमाए लाने तो हम घाम में बिजली चमकाहें औ पानी बरसाहें। इत्तोई नईं, तुम ओरन के ब्याओ के लाने इंदर भगवान अपनों रंग-बिरंगो धनुष से आसमान सजा देहें। सो जल्दी करो औ ब्याओ कर लेओ।’’ चतुरा लड़इया ने अपनो दिमाग चलाओ औ सबई खों मनगढ़ंत किसां सुना दई। मजे की बात जे के सबरे ऊकी बात में आ बी गए। काए से के ईके पैले उन्ने कभऊं जा सब पे ध्यान ई ने दओ रओ। उनें पतो ई नईं हतो के घाम के संगे बिजुरी बी चमकत आए औ पानी बरसत भए इन्द्रधनुष सोई दिखान लगत आए। काए से के बे ओरे ज्यादातर दिन में सोत रैत्ते और रात के टेम पे शिकार औ भड़याई के लाने निकरत्ते। सो उने बी लगो के जा सांची कै रओ। जरूर भोलेबाबा ने ईको बताओ हुइए। तभई तो घाम में पानी बरस रओ।
फेर का हतो, तुंरतईं लड़या औ लड़इयन को ब्याओ हो गओ। ओई समै से सबरे लड़इयन ने तै करो के अब जब बी घाम के संगे बिजुरी चमक के पानी बरसहे, मनो झला परहे तभईं लड़यां हरें अपनो ब्याओ किया करहें।
सो जे हती किसां लड़यों के ब्याओ के महूरत की। 
लेकन आजकाल का हो रओ के 15 जून तो कब को कढ़ गओ मनो बरसात ने आई। बाकी कभऊं-कभऊं झला आ जात आए। सो लड़यों को ब्याओ हो जात आए। मनो अब बरसात आबे में इत्ती देर होन लगी आए औ घाम के झला इत्ते बार आत-जात आएं के हमें लगत के अब तक तो सबरे लड़यों को ब्याओ हो गओ हुइए। औ बरसात आत-आत सो उनकी मोड़ा-मोड़ी उनके अंगना में खेलन लगहें। जा मौसम की देरी कऊं लड़इयों की जमात ने बढ़ा दे। पता परी के पैले तो लड़इयां गांव में घुसत्ते औ अब सहर में सोई घुसन लगे।
मनो जे बी आए के सहर में जंगल वारे लड़इयों की दाल ने गलहे। काए से के इते राजनीति वारे मुतके लड़या कैमरा की लाइटें चमकवात भए फिरत रैत आएं। औ कऊं कोनऊं लड़या कोऊ टीवी के न्यूज चैनल वारे से टकरा गओ तो समझो के हो गओ ऊको बेड़ो गरक। ऊकी घींच पकर के ऊसे सवाल बी पूंछहें औ ऊको बोलन बी ने दैंहे। खैर, जे सब छोरो, आप ओरे जब देखियो के घाम निकरो औ पानी बरस रओ तो समझ जाइयो के लड़इयों को ब्याओ हो रओ।       
बाकी बतकाव हती सो बढ़ी गई, हड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हप्ता करबी बतकाव तब तक लौं जेई की जुगाली करो। मनो सोचियो जरूर के लड़या बी तभई लौं हैं, जब लौं जंगल बचे हैं। जो जंगल ने बचहें तो लड़इन को का हुइए? बे कां जीहें?    
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बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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Thursday, June 18, 2026

बतकाव बिन्ना की | कओ कोऊ खजुराओ की मूर्तियन खों जम्फर ने पैन्हान लगे | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बतकाव बिन्ना की  | कओ कोऊ खजुराओ की मूर्तियन खों जम्फर ने पैन्हान लगे
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

    रामधई! जबसे हमने बा खबर पढ़ी तभईं से हमें बेजा टेंसन हो रओ। अब आप कैहो के ईरान औ अमेरिका को मेल भओ जा रओ, ईमें टेंसन की का बात? सो बात ऊ नइयां। अब आप कैहो के अपने परधानमंत्री जू जी-7 शिखर सम्मेलन में गए, ऊको टेंसन आएं? सो हमें ऊको काए खों टेंसन हुइए? बा तो अच्छो काम आए। औ रई मैंगाई के बढ़बे की बात आए, सो ऊको टेंसन के लाने तो अपन टेंसन प्रूफ हो गए आएं। काए से के अपने इते तो मैंगाई जब चाए तब बढ़त रैत आए। बा तो पूरी आवारा लुगाई आए। चाएं जबें मों उठाए निकर परत आए। कोऊ से रोके से नईं रुकत। सो ऊकी तो छोड़ो। हमें टेंसन हो रई ऊ खबर पढ़े से जोन में बताओ गओ के एनसीईआरटी वारन ने मोहनजोदड़ो के टेम की नचनियां की मूरत खों कपड़ा पैन्हा के फोटू छाप दई। अब जो का आए? अरे तुमें नईं पुसा रई तो बिलकुलई ने छापो, ऊको कपड़ा पैन्हाबे की का जरूरत हती? अब आई ओरें सोचो के जोन जमाना की बा मूरत आए, ऊ जमाना में नचनियां ऊंसई रैत रई हुइंए। जा सो देखबे वारे की नजर को दोस कहाओ के बा ऊमें कला औ इतिहास ने देख पा रए, बाकी बा उनको नंगी दिखा रई। औ छापो बी कोन सी किताब में? बा कला वारी किताब में। याने उनें कला तो तनकऊं ने दिखानी। तभई तो कई गई आए के ‘‘जाकी रई भावना जैसी...’’। 

एनसीईआरटी वरान ने जे बी ने सोची के उनकी किताबें पढ़बे वारन खों जा कैसे पतो परहे के ऊ टेम पे कैसो रओ जात्तो? ऊ टेम पे नाचने वारियां कैसो गैहना पैन्हत्तीं? और कैसे हुन्ना-लत्ता ओढ़त्ती? सोचबे की बात सो जे आए के ऊ टेम पे सोच इत्ती छोटी ने हती। ऊ टेम के लोगों के लाने नचनियों की बा सजावट कोनऊं खास बात ने हती, तभईं तो ऊ टेम के मूरत बनानबे वारे ने ऐसी मूर्ती बनाई। अब इनखों सरम आ रई। तनक औ पाछूं चलो तो एक टेम तो बा बी रओ जब अपने पुरखा रहें कपड़ा पहनबों लौं नई जानत्ते। बो का कहाउत आए के होमोसंपियंस वारे जमाना के इंसानों की फोटू छापत समै जे ओरें ऊ टेम के इसानों को सोई कओ धुतिया पैन्हा दें। 

मोहनजोदड़ो की बा मूर्ती 4500 साल पुरानी आए, आज की नोंई। ऊको कपड़ा पैन्हा के का दिखाबो चात आएं? अपन ओरें ऊ संस्कृति के आएं जीमें अजंता की गुफाओं में भगवान बुद्ध के जमाने की किसां के चित्र बनाए में लुगाइयन खों सरीर के ऊपरी भाग में कछू नईं पैन्हाओ गओ आए। काए से के ऊ टेम पे बे ऊंसई रैती रईं हुंइए। बा चित्रन से ऊ टेम के रैबो-खाबो को पता परत आए। अब का जे ओरें बे चित्रन खों बी मिटवा दैहें?
तभई से तो हमें तो अपने खजुराओ की फिकर होन लगी आए। उते तो मुतकी मूर्तियां एसी आएं जोन में पुतरियों ने आर-पार दिखात भए कपड़ा पैन्हें आएं। का बे उने बी कम्पूटर से कपड़ा पैन्हा दैहें? 
ऐ हते मुगल हरें जोन ने इते आ के सुंदर-सुंदर मूर्तियां तोड़ डारीं औ एक हैं जे एनसीआईआरटी वारे जो कला खों कला रैन देबे मे इज्जत जा रई। तनक सोचो के खजुराओ की मूर्तियन खों जो कपड़ा पैन्हा दए जाएं तो कैसो लगहे? जा सोच केई अपने सर के बार पटाबे को जी करओ।  
जे एनसीईआरटी वारे पैले बी ऐसई मुतकी बेर दोंदरा दे चुके आएं। औ हर दार मों की खा के बी नईं मानत आएं। एक तरफी तो मोहनजोदड़ो की ‘डांसगिंगर्ल’ खों कपड़ा पहनाबे को काम कर डारो औ अभई कछू मईना पैले 8 मीं कक्षा की सामाजिक विज्ञान की किताब में एक पाठ जोड दओ रओ जोन को टाईटल हतो ‘‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’’। अब आपई सोचो के ऐसो पाठ पढ़ के तो बच्चा हरों को कानून से भरोसोई उठ जाहे। अरे भ्रष्टाचार को पाठ पढ़ानेई हतो तो दबंगई से पाठ जोड़ते के ‘‘एनसीईआरटी में भ्रष्टाचार’’। मनो इत्ती दम कां? जैई पे सुप्रीम कोर्ट ने उने बत्ती दई औ फटकारो सो बा पाठ हटाओ गओ।    
ऐसई तब भओ रओ जबे एनसीईआरटी वारन दने इतिहास के सिलेबस से ‘‘मुगल काल’’ खों हटा दओ। अरे भैया! मुगल हरें अच्छे हते या बुरे हते पर हते तो। उने इतिहास से हटा के  का जोर दैहो? या के जे कैहो के ऊ टेम को इतिहास पढे जाने जोग नइयां। जो घट गओ ऊको बदरो नईं जा सकत। बाकी ऊसे सीख लई जा सकत आए। बाकी ऊ टेम को इतिहास हटाए जाने पे भारी बवाल मचो रओ। अब तुमें नईं पुसा रओ तो ईको मतलब जे तो नईं के तुम कओ के बे ओरें तो हते ई नईं। जो का आए? कऊं ऐसे होत आएं सिलेबस बनाए वारे? 
चलो मुगल की तो छोरो, एक बेर तो एनसीआईआरटी वारन ने डार्विन खों काट-पीट दओ। भओ का के कक्षा 9,10 की डार्विन के विकासवाद औ अन्य वैज्ञानिक सिद्धांत वारी विज्ञान की किताबन से डार्विन के ‘‘विकासवाद के सिद्धांत’’ खों गायब कर दओ। इत्तोई नईं डार्विन की दई गई ‘‘आवर्त सारणी’’ के कछू हिस्सां हटा दए गए। ईपे बी बड़ी गदर मची रईं सबरे वैज्ञानिक औ शिक्षा के विद्वान हरों ने डंडे बजाए तब कऊं जा के मामला सुदरा। 

ऐंसई कक्षा 12 की राजनीति विज्ञान की किताब में 2002 के गुजरात दंगे, बाबरी मस्जिद वारी घटना औ अयोध्या के झगरे वारे कछू पाठ हटा दए गए तो कछू काट-पीट के छोटे कर दए गए। ईपे बी बड़ो दोंदरा मचो। अरे भैया, जो कछू घट चुको आ तो घट चुको, ऊको छिपाबे से कछू ने बदलहे। 

हमें तो जे समझ में नईं आत आए के एनसीईआरटी में कोन टाईप के बिद्वान हरें बैठे आएं? कोन खों जे सूझो के मोहनजोदड़ो की 4500 साल पुरानी नाचबे वारी मूर्ती की फोटू खों कपड़ा पैन्हा के छाप दओ जाए? का बे जे डर रए हते के बच्चा हरें बा मूर्ती खों असली रूप में उेखहें तो बिगड़ जाहें? मगर का जोन ने मोहनजोदड़ो को पाठ बनाओ औ बा मूर्ती की फोटू छांटी, का उन्ने अपने टेम पे इतिहास नई पढ़ो रआ? हमने सोई छठीं, सामतीं कक्षा में ऊ टेम को इतिहास पढ़ो रओ औ बा मूर्ती की फोटू अपनी किताब में देखी रई, का हम बिगरे? के हमाए टेम के औ मोड़ा-मोड़ी बिगरे? जब कोऊ पढ़त आए तो ऊ टेम पे बा पढ़ाई सोच के पढ़त आए। ऊ टेम में ऊके दिमाग में औ कछू उटपटांग नईं चलत आए। फेर ऐसो सोचो जाए तो डाक्दरी की पढ़ाई में तो औरई मुस्किल दिखाहे। 

वैसे देखो जाए तो एनसीईआरटी को मकसद आए स्कूल की पढाई के स्तर खों ऊचो उठाओ जाए। नई अच्छी किताबे तैयार कराई जाएं। पढ़ाई में नईं चीजें जोड़ी जाएं। मनो नई चीजें जोड़बे को मतलब जो नईं आए के मोहनजोदड़ो की नाचबे वारी खों हुन्ना पैन्हा दए जाएं। 
जेई से तो हमें टेंसन हो रई के कऊं कोनऊं खों सूझ गओ तो बा खजुराओ की मूर्तियन खों जम्फर पैन्हान लगहे। बाकी मोए जा बी समझ नई परत के अपन ओरों में से कछू इत्ती छोटी सोच वारे काए हो गए? जे अपनोई देस आए औ अपनई संस्कृति आए जीमें ‘‘कामसूत्र’’ घांई किताब लिखी गई। अब कछू लोग ऊके बारे में बी सोचत आएं के बा किताब अच्छी नोंई तो जा उनको समझ को फेर आए। सोचो तो जे चाइए के अपने ओरें पैले बड़ी बुद्धि के रए। अपने पुरखा हरों की सोच बड़ी हती। बा तो मुगल हरें आए तो इते उनसे बचाबे के लाने अपनी लुगाइयन खों परदे में बेंड़ दओ गओ। ओई टेम से अपन ओरन की सोच सिकुरन लगी। ऊ टेम पे बी जे नई सोचो गओ के लुगाइन खों हथ्यिार चलाबो ऐसो सिखा दओ जाए के बेई ओरें दुस्मन के मूंड़ काट लें। ऊ टेम पे बी लुगाइयां भौतई बहादुर हतीं। ने तो का कोनऊं मरद की दम हती के बा ‘‘जौहर’’ कर लेतो? जबके जबे लुगाइन खों तलबार उठाबे को मौका मिलो तो उन्ने दिखा दओ के बे लडाई के मैदान में मार बी सकत आएं और मर बी सकत आएं। सो सवाल सोच को आए। आज के जमाना में इत्ती छोटी सोच देख के अपनो मूंड पटकबे को जी करत आए।

हमाई समझ से तो जो एनसीईआरटी वारे अपनो काम सई से नईं करपा रए औ उनकी सोच इत्ती छोटी आए तो एनसीईआरटी खों बंदई कर देओ जाइए। बाकी पंचो की राय। हमें तो बस, अपने खजुराओ की मर्तियन की फिकर हो रई, औ कछू नईं।   

बाकी बतकाव हती सो बढ़ी गई, हड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हप्ता करबी बतकाव तब तक लौं जेई की जुगाली करो। मनो सोचियो जरूर के एनसीईआरटी की करतूत बुरई हती के नईं?  
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बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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Thursday, June 4, 2026

बतकाव बिन्ना की | जे छुटकुल नेता हरें औ अर्जुन के तीर | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बतकाव बिन्ना की  
जे छुटकुल नेता हरें औ अर्जुन के तीर 
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
       जा राजनीति बी गजबई की चीज आए। जोन की लाग लग गई बा सातमें आसमान पे औ जोन की ने लगी बा कऊं को नईं। चार दिनां से भैया औ भौजी बायरे गए सो उनसे बतकाव ने हो पा रई, बाकी असल तो आप ओरें हो जोन से जी भर के बतकाव करी जा सकत आए। का आए के जब कोऊ बड़ो चुनाव जीत जात आए तो ऊके गुट के छुटभैया हरें ऐसे उचकत फिरत आएं मनो सगरे तीर उनईं ने चलाए नए होंए। बे इतरान लगत आएं। कछू के कछू बकन लगत आएं। जे बरहमेस चलत आ रओ। जेई टाईप की दो किसां आएं महाभारत वारे अर्जुन औ भीम की। सो, पैले सुनों आ ओरें अर्जुन की किसां।
का भओ के जबे महाभारत की लड़ाई खतम भई तो पांडव हरन खों राज मिल गओ। एक दिनां अर्जुन ने दरबार में कई के ‘‘हम सबसे बड़े तीरंदाज आएं। जो हमने अपने तीर से कर्ण खों ने मारो होतो तो आज कओ दुर्योधन हरें इते बैठे राज करत दिखाते। बा हमई हते जोन ने भीष्मपितामह जू के लाने अपने तीरन से बिछौना सो बना दओ रओ। औ हमई हते जोन ने अपने तीर से धरती खों फाड़ के भीष्मपितामह जू को पानी पिलाओ रओ।’’
उते जोन चमचा टाईप के दरबारी हते बे अर्जुन की जा बात सुन के उनके जैकारे लगाऊंन लगे। जा देख के किसन भगवान खों अच्छो नई लगो। उन्ने अर्जुन से कई के ‘‘बा सब तो ठीक आए, मनो तुमें ऐसो बखान नईं करो चाइए। सब कछू तुमाओ करो भओ नइयां।’’
जा सुन के अर्जुन खों लगो के किसन भगवान हमाए सारथी बने रए, जेई से अपनी तारीफ ने सुन के इने बुरौ लग रओ आए। सो बा बोलो के ‘‘आप सबई जान लेओ के हमाए रथ को हांकबे वारे जे किसन जू रए जेई से हम सई-सई तीर चला पाए।’’
ऊकी बात सुन के किसन भगवान समझ गए के जा अर्जुन ऐसे ने मानहे, ईकी आंखें खोलनई परहें।
कछू नईं! किसन भगवान ने घूमबे को प्रोगराम बनाओ। बे पाचों पांडो हरों खों ले के चल परे। एक जांगा पे पतरी सी नदी परी। ऊमें पानी बी कमई रओ। अर्जुन ने अपनों रथ बा नदी में उतार दओ के नदी पार करी जा सके। सबरे भैयन को रथ नदी पार पौंच गए मनो अर्जुन को रथ बीच नदी में पौंच के धसन लगो। अर्जंन ने भौतई कोसिस करी पर रथ को धंसबो ने थमो। अब अर्जुन तनक घबड़ानों। बा रथ से उतर के रथ को चका उठाबे की कोसिस करन लगो। पर कछू फरक ने परो। तब ऊने किसन भगवान से कई के ‘‘आप रथ पे बैठे आओ, जेई से जो धंसत जा रओ आए। अब तनक उतर आओ।’’
किसन भगवान अर्जंन के कए पे रथ से उतर गए। उनके उतरतई सात रथ के चका औ तेजी से धंसन लगे। अर्जंुन रथ के चका निकारबे के लाने जित्तो जोर लगातो, उत्तई बे धंसन लगते। अर्जंन थक गओ। तब ऊने किसन भगवान से पूछी के ‘‘जो सब का हो रओ? सबके रथ कढ़ गए, मनो मोरो रथ बीता भर पानी बारी नदी में बूड़त जा रओ। हमें तो कछू समझ में नईं आ रओ। हम उतर गए, आप उतर गए रथ पे कोनऊं ने बचो फेर बी रथ फंसो डरो। मनो चुल्लू भर पानी में डूब के मरो चात होए। कछू समझ नईे आ रई के जे का लीला आए?’’
‘‘बात जे आए अर्जुन के तुमा जे रथ खों ने तो हमने सम्हारो रओ और ने तो तुमने। ईको सम्हारबे वारो भौतई वजनदारी वारो आए। औ अबे उन्हई की वजनदारी के कारन तुमाओ रथ धंसो जा रओ।’’ किसन भगवान ने समझाई।
‘‘सो को आ बे? जिनके कारन हमाए रथ की जे दसा भई जा रई।’’ अर्जुन ने पूछा।
‘‘तनक इते आओ औ देखो को आ तुमाए रथ पे?’’ किसन भगवान बोले।
‘‘को आ?’’ कैत भए अर्जुन ने ऊ तरफी देखी जी तरफी किसन भगवान देख रए हते।
‘‘उते का दिखा रओ? उते तो पतरो सो झंडा लगो आए। उते तो एक ठंइयां बंदरा लौं नइयां।’’ अर्जुन बमकत भओ बोलो।
जेसई अर्जुन ने इत्तो बोलो के बा पतरो सो झंडा जोर से हलो औ ऊमें से हनुमान जू निकरे औ अर्जुन से बोले के ऐसो कै के तुमने ठीक नईं करो।’’
फेर बे गायब हो गए। जा देख-सुन के अर्जुन घबड़ानों।
‘‘जे हनुमान जू इते का कर रए हते? औ अब कां चले गए? अरे, जे हमाओ रथ तो ऊपरे निकर आओ।’’ कैत भओ अर्जुन थर-थर कांपन लगो।
‘‘अर्जुन भैया, तुम आओ मूरख। अरे हनुमान जू तो पूरे जुद्ध के टेम पे अपन दोई के संगे रए। तुमाए रथ खों बेई तो दाबे रए ने तो कर्ण के तीरन की आंधी में तुमाओ रथ उड़ गओ होतो औ तुम धूरा चाट रए होते। हनुमान जू तुमाए रथ के झंडा पे सवार रए आए जेई से तुमाओ रथ सई-सई चलत रओ। जेई से तुम जीत पाए।’’ किसन भगवान ने असल बात बताई। फेर बोले के तुमने बंदरा वारी बात बोल के उने नाराज कर दओ आए। सो लौट के चलबी तो उनसे माफी मंगा लइयो।’’
जा सुन के अर्जुन रोन लगो औ बोलो के ‘‘हमाओ दिमाग चल गओ रओ। हमें घमंड आ गओ रओ। हम आप से माफी मांगत आएं औ संगे हनुमान जू के सोई पांस पकर लेबी।’’ अर्जुन बोलो।
‘‘तुमें कछू करबे की जरूरत नइयां, बस इत्तई करो के जुद्ध जीतबे पे घमंड ने करियो। घमंड को फल करओ होत आए।’’ किसन भगवान बोले।
अर्जुन खो अपनी गलती समझ में आ गई औ ऊने घमंड करबो छोड़ दओ। मनो आजकाल के छुटकुल नेता हरो के समझ के लाने कोनऊं ने तो किसन भगवान आएं औ ने तो हनुमान जू। सो बे तो इतरातई रैंहें। संगे कछू बी बकत रैंहे।
रई दूसरी किसां की बात, बोई भीम वारी तो सो बा अगली बेर सुनाबी। ने तो दोई गड्मड् हो जाहे।
बाकी बतकाव हती सो बढ़ी गई, हड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हप्ता करबी बतकाव तब तक लौं जेई की जुगाली करो। मनो सोचियो जरूर के कोनऊं बी राजनीतिक पार्टी के छुटुकुल नेता हरें बकर-बकर कर के अपनी पार्टी खों कित्तों नुकसान पौंचात आएं? सो इनपे लगाम कैसे लग सकत आए?      
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Thursday, May 21, 2026

बतकाव बिन्ना की | जा मैंगाई सो अबई से लूघरा छुबान लगी | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बतकाव बिन्ना की  
जा मैंगाई सो अबई से लूघरा छुबान लगी
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
‘‘सुनियों तनक ठंडो पानी पिलइयोे!’’ भैयाजी कऊं बायरे से आए। पसीना में भींजे भए दिखा रए हते। बेर-बेर अपनो माथा गमछा से पोंछत जा रए हते।
‘‘कां से आ रए भैयाजी?’’ मैंने पूछी।
‘‘अरे का बताएं, बजार गए रए। बेजा गरमी पर रई। रामधई, भुंटा से भुन गए।’’ भैया जी अकुलाने से बोले।
‘‘हऔ गरमी सो खीब जम के पर रई। कल अपने करीब 46 डिग्री रओ औ उते खजुराहो में 47 लौं पोंच गओ। आगी से बर रई बायरे तो।’’ मैंने कई।
‘‘जेई से तो हमने कई रई के अबे ने जाओ संझा खों ले आइयो। ऐसो कोनऊं जरूरी को सामान ने हतो।’’ भौजी भैयाजी खों पानी को गिलास पकरात भईं बोलीं। फेर मोंसे पूंछी,‘‘तुमें पीने?’’
‘‘नईं, अबई तो पियो रओ।’’ मैंने कई।
‘‘इत्ती देर घाम में फिरत रए औ जे का ले आए इत्तो सो?’’ भौजी ने थैलिया उठात भए पूंछी।
‘‘अब तुमई देख लेओ।’’ भैयाजी बोले। ठंडो पानी पी के उने तनक सहूरी सी लगी हती।
‘‘जे का? जे इत्ती सी भिंडी, दो ठइयां करेला? बस? औ धना तो ले न पाओ हुइए आपने। जबके बे ओरें कोनऊं मूफत-वूफत में नईं देत आएं। बे तो सब्जी में पैले से धना के पइसा जोछ़े रैत आएं।’’ भौजी ने भैयाजी से कई।
‘‘अरे अब कोनऊं नहीं दे रओ धना-मना। हमने तो ऊसे कई रई, मनो बा बोलो के धना सोई मैंगी हो गई सा अब हम ने दे पाबी। खरीदने होए सो खरीद लेओ।’’ भैयाजी ने बताई।
‘‘हऔ खरीद लेओ।’’ भौजीे मों बनात भईं बोली,‘‘ हम तो होते तो ऊसे कैते के हऔ हम धना खरीद लेत आएं मनो तुम सबई सब्जियन पांच-पांच रुपइया कम करो। औ जे इत्ती सी सब्जी को का हुइए? जे दोई सब्जियां बनात में पुचक जात आएं। चटनी घांई खाने परहे।’’ भौजी बोलीे।
‘‘अब चटनी खाबे के दिन आ गए समझो।’’ भैयाजी बोले।
‘‘का मतलब?’’भौजी ने करेला खों उलट-पटल के देखत भईं पूंछी।
‘‘मतलब जे के अब तो थैलिया भर के पइसा ले जाओ औ मुठिया भर के सब्जी लाओ। जे हो रओ। सबई सब्जियन के दाम बढ़ गए।’’ भैयाजी बोले।
‘‘सई कै रै भैयाजी!’’ काल मैंने र्सोअ फतकुली के दाम पूछे औ पलट के मोए कैने परो के नईं भैया रैन देओ। तुम तो जोन कछू कम की होए सो बताओ।’’ मैंने भैयाजी से कई।
‘‘उते सब्जी वारे के इते हमाओ एक दोस्त मिलो रओ बा बता रओ तो के अब तो होअलन में भी सब्जी रोटी के दाम बढ़ गए। बा अबे बी मोबाईल से पइसा नईं देत। ऊसे बनत नइयां। सो बा जित्ते नोट ले के परों अपनी फैमिली को होटल में खबावे खों ले गओ रओ, उत्ते नोट कम पर गए। बा तो ऊको मोड़ा मोबाईल से पइसा देबो जानत आए औ ऊके मोबाईल में पइसा हते सो ऊने बाकी पइसा मोबाइल से दे दए ने तो उन ओरन की बड़ी फजीयत होती।’’भैयाजी ने बताई।
‘‘तेल तो ऊंसई कम खा रए। तलो-फुलो बनाबो छोड़ दओ, का अब साग-भाजी खाबो बी छोड़ने परहे?’’ भौजी बोलीं।
‘‘हऔ, बे चाए हवाई जाहज में उड़े, बे चाए दावतें करें, बे चाए दौरा में फूंके, मनो पब्लिक खों ने तो तेल खाने, ने तो गाड़ी पे चलने औ ने सोनो खरीदने। अब औ का-का छोरने परहे बा औ बता देते संगे। तुमें पतो के जे दो ठइया करेला कितेक में आए?’’ भैयाजी बोले।
‘‘आए हुइएं बीस रुपइया में।’’ भौजी अटकल लगात भईं बोलीं।
‘‘हऔ, का धरे बीस रुपइया में? जे दो ठइया करेला साठ रुपइया के आएं।’’ भैयाजी ने बताई।
‘‘हे माई! इत्ते मैंगे? सो काए खों ले आए? कछू दूसरो ले आउते।’’ भौजी बोलीं।
‘‘का ले आते? सबई तो मैंगी हो गईं। मनो बे ओरें बी का करें? उने बी तो मंडी से बजरिया लौं लाबे में गाड़ी को खर्चा लगत आए। औ गाड़ी को किराया सोई बढ़ गओ आए। गरीब खा खाए, का पैने औ का ओढ़े?’’भैयाजी बोले।
‘‘काए गरीबन के लाने बा मुतकी योजनाएं सो चल रईं। जे लच्छमी बा लच्छमी। मुफत को तो बंाट रई सरकार। बा नईं दिखा रओ?’’ भौजी बोलीं।
‘‘सो का? उने का सामान ने खरीने परहे? जोन मिलत आए, बा बी पूरो ने परहे।’’ भैयाजी बोले।
‘‘एक बेर कोरोना में मुतके निपट गए औ अब जे मैंगाई लील जैहे। कोनऊं से जुट्ट बना के जे नईं दबाव डारत बन रओ के लड़ाई खतम करी जाए। बे लड़-मर रए औ संगे अपन सोई निपटाए जा रए।’’ भैयाजी फिर के भड़कत भए बोले।
भैया खों भड़कबो सई हतो, काए से के जोन को तीस रुपइया में एक ठो करेला खरीदने परहे बा तो भड़कहे ई। मोए सोई लगत आए के जे जो मैंगाई ऐसई बढ़त रई तो का हुइए?
‘‘भैयाजी, मोए जे बताओ के डीजल औ पेट््रोल बचाबे के लाने सायकिल पे चलबे की फोटुएं छप रईं। जबके सई तो जा आए के पब्लिक के पास अब सायकिल रैती कां आए? गांव दो किलोमीटर से बारा किलोमीटर लौं पसर गए। सहर बीस-तीस किलोमीटर लौं फैलत चले गए। औ पांछू कछू दिनां से तो जेई चलन बन परी के कालोनी इते बनाओ तो बसस्टेंड उते सहर से बायरे बनाओ। अब सायकिल ने तो पैदल कोऊ कैसे जा पा रओ। ऊपे से आदत लौं नई रई। फेर तुमके घर ऐसे आंए जीमें बच्चा सबरे बायरे दूसरे सहर, ने तो दूसरे देस चले गए कमाबे के लाने औ घरे बुड्ढा-बुड्ढी रै रए। बे का करहें?’’ मैंने भैयाजी से कई।
‘‘तुम तो उन ओरन की सोंस रईं, अब तो जे कए रै के इत्ते करै घाम में सायकिल चलाबो ने तो पैदत चलबो का आसान आए? पेड़ सो पैलई सबरे कटा दए गए। मूंड़ पे छायरी लौं ने बची।’’ भैयाजी बोले।
‘‘मनो जे बी तो कै कए रए के गाड़ी में एक-दूसरे के संगे चलो।’’ मैंने याद कराई।
‘‘कोऊ कोनऊं खों संगे नईं ले जा रओ। फेर अपने इते के लोग इत्ते साजे बी नोंई के एक दिनां एक पेट््रल भरा ले औ दूसरे दिन दूसरो। बे कैने लगहंे के हमाई सो कड़की चल रई। औ दोई दिनो में जा अपनी गैल, बा अपनी गैल।  
‘‘रामधई बिन्ना, जे मैंगाई तो लूघरा छुबान लगी। आगे का हुइए? मोरो तो सोचई के जी घबरान लगो।’’ भौजी बोलीं।
‘‘ने घबड़ाओ भौजी। एक तो ऊंसई गरमी पर रई, ऊमें तुम ने अपनी तबीयत बिगार लई तो बड़ी सल्ल बींध जैहे।’’ मैंने भौजी खों समझाई।        
बाकी बतकाव हती सो बढ़ी गई, हड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हप्ता करबी बतकाव तब तक लौं जेई की जुगाली करो। मनो सोचियो जरूर के जे मैंगाई चुनाव से पैले काए ने बढ़ी जबके लड़ाई तो पैले से चल रई हती?    
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बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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Thursday, May 14, 2026

बतकाव बिन्ना की | जबरा मारे रोन न दे, अंसुवा बी लौं बोन न दे | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बतकाव बिन्ना की  
जबरा मारे रोन न दे, अंसुवा बी लौं बोन न दे 
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
‘‘आज मोए जे कहनात खींबई याद आ रई के- जबरा मारे रोन न दे, अंसुवा बी लौं बोन न दे।’’ मैंने भैयाजी से कई।
मोरी बात सुन के भैयाजी हंसन लगे। जा देख के मोए अचरज बी भओ औ गुस्सा बी आओ। भला ईमें हंसबे वारी बात का आए?
‘‘आप काए हंस रए?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘बुरौ ने मानियो मगर मोए हंसी जा बात पे आई के जे कहनात तुमें कछू ज्यादई पुसात आए। जब देखो जेई कहनात कैत रैत हो।’’ भैयाजी ऊंसई हंसत भए बोले।
‘‘अब का करो जाए भैयाजी! जब दसई नईं बदलत तो कहनात कां से बदल जैहे?’’ मैंने कई।
‘‘का मतलब? कोन सी दसा? का कैबो चा रईं?’’ भैयाजी ने पूछी।
‘‘देख नईं रै के कैसो दोंदरा मचो आए।’’ मैंने कई।
‘‘का हो गओ?’’ भैयाजी ने तनक गंभीर होत भए पूछी।
‘‘होने का आए? मोए कछू नई भओ।’’ मैंने कई।
‘‘तुमें नईं कछू भओ, सो कोन की कै रईं?’’ भैयाजी ने पूछी।
‘‘आप अखबार नईं पढ़त का?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘काए नईं पढ़त? संकारे से सबसे पैले अखबारई बांचत आएं।’’ भैयाजी बोले।
‘‘सो ऊमें पढ़ो नईं के जनगणना वारों में से कछू को फटकारो गओ के काम धीमो काय चल रओ।’’ मैंने कई।
‘‘सो, ईमें का खास आए?’’भैयाजी बोले।
‘‘ईमें आपके लाने कछू खास नई दिखा रओ?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘तुमई बता देओ के ईमें का खास आए? अरे, बे ओरें समै पे काम पूरो नईं कर पाए हुइएं सो उने फटकारो गओ। कओ चिट्ठी पकरा दी गई होए। जे तो चलत रैत आए।’’ भैयाजी तनक लापरवाई से बोले।
‘‘भैयाजी आप मोए एक बात बताओ।’’ मैंने कई।
‘‘हऔ पूछो।’’ भैयाजी बोले।
‘‘हमें जे बताओ आप के जो कऊं अपनी भौजी कऊं टीचर होतीं औ उनकी ड्यूटी ई काम में लग जाती तो आप का करते?’’ मैंने पूछी।
‘‘करते का? सूदे कलक्टर आफिस जाते औ तुमाई भौजी की ड्यूटी कटवा के आते।’’ भैयाजी तुरतईं बोले।
‘‘काए? उने ड्यूटी काए नईं करन देते?’’ मैंने पूछी।
‘‘अरे, इत्ती घाम में बे कां फिरतीं? चाए कछू हो जातो, हम तो जान नईं देते।’’ भैयाजी ने कई।
‘‘जे का बात भई भैयाजी? अपनी भौजी, भौजी औ दूसरी लुगाई कछू नईं? औ लुगाई की तो छोड़ो लुगवा हरों की बी कछू नईं?’’ मैंने भैयाजी खों आड़े हाथो लओ।
‘‘तुम मनो कैबो का चा रईं?’’ भैयाजी तनक झेंपत भए बोले।
‘‘मैं जे कै रई भैयाजी के इत्ती गरमी पर रई, घाम चटक रओ औ सरकार को गिनती कराबे की परी। अरे करा लइयो तनक साजे मोसम में। मनो नईं उने तो ई गरमी में ई कराने।’’ मोए बोलत-बोलत गुस्सा सी आन लगी।
‘‘तुम काए खिजियां रई? अब राजकाज में जा सब तो चलत रैत आए।’’ भैयाजी ने मोए समझाबे की कोसिस करी।
‘‘खिजियाबे वारी बातई आए भैयाजी! अब आपई सोचो के अपन ओरें जो घरै रैत आएं तो  दुफारी को दोरे बंद कर के, कूलर चला के पर जात आएं। फेर कोनऊं दोरे की घंटी टनटनाए उठ के दोरे खोलबे को जी नईं करत। फेर ई गरमी में गली-मोहल्ला इत्तो सूनो हो जात आए के कोनऊं अनजाने के लाने दोरे खोलबे में डर लगत आए। उनके मों पे थोड़े लिखो रैत आए के बे गिनती करबे वारे आएं के कोनऊं औ। अबई चार दिनां पैले की घटना मैंने आपके लाने सुनाई हती के दो जने एक फटफटिया पे चढ़ के आए रए। उन्ने मोरे घर के दोरे की घंटिया बजाई। मैंने खिरकी से तनक झांक के देखो सो मोए लगो के यां तो पोस्टमेन, ने तो कूरिया वारो हुइए। मैंने बैठक को दोरो खोलो औ बरांडे में पौंची तो मोए तनक डाउट भओ। मैंने उन ओरन से पूछी के का काम आए? सो उनमें से एक बोलो जोन फटफटिया से उतर के ठाड़ो हतो, ‘‘नमस्ते! आप कैसी हो? जब आपकी जिज्जी हतीं तो हम आपके इते आत रए।’ इत्तो बोल के बा सोचो के हम ऊकी बातन में आ जाहें औ बरांडे को गेट खोल दैहें। लेकन मैंने ऊसे साफ-साफ कई के भैया, हमने आपको पैचानों नईं। तो बा बोलो के अरे, आपकी जिज्जी हमें पैचानत्तीं, आप सोई पैचानत्तीं। फेर बा पलट के अपने संगवारे से कछू बोलो औ फेर मोरी तरफी देखन लगो। सो मैंने कई के भैया, हमने आपको खों पैचानो नईयां। आप जो जिज्जी के समै पे आत रए तो जिज्जी के गए पे काए नईं आए रए? जा सुन के बा बोलो के हम काम के लाने बायरे चले गए रए। बाकी हमने जिज्जी के बारे में सुनी रई। औ आज इते से निकरे तो सोची के आपसे मिलत चलें। मैंने कई के मगर मैंने आप ओरन खों नईं चीन्हों आए सो आप ओरें फेर आइयो। इत्तो कै के मैंने दोरे बंद कर लए। मैंने खींब देर सोची मनो मोए तनक बी याद ने आई के बे ओरें कौन हते? मैंने ई बारे में जोन के बी बताओ बे सबई बोले के अच्छो करो के दोरे नईं खोले, को जाने को हते बे ओरें। बा बी दुफारी के सन्नाटा में। अब ऐसे में को आ चीन्ह पा रओ के बे गिनती करबे वारे आएं के कोनऊं ऊंसई चोर-उचक्का आएं। सो, अब आपई बताओ के ऐसे में बा गिनती करबे वारों के लाने घरों के दोरे नईं खुल रए तो ईमें उन ओरन को का दोस? औ ने ना खोलबे वारन को कोनऊं दोस। काए से दुफारी में घरे लुगाइयां, बच्चा औ बुड्ढा हरें रैत आएं। अरे अच्छो मोसम रए तो मोहल्ला में मुतके जने घूमत रैत आएं, ऐसे घाम में को आ मूंड चटकात फिरहे? पूरो सूनो डरो रैत आए।’’ मैंने भैयाजी से कई।
‘‘सई कै रईं बिन्ना! ऐसे में उनको काम धीमो सो चलहेई।’’ भैयाजी बोले।
‘‘जेई तो मैं कै रई के एक तो ऐसे बुरए मोसम में जो काम करा रए औ जो काम ठीक से हो नई पा रओ तो खटिया खड़ी कर रए। अब जे दसा देख के जेई कहनात सो याद आहे के जबरा मारे रोन न दे, अंसुवा बी लौं बोन न दे।’’ मैंने कई।
‘‘हम समझ गए के तुम सोई एक जमाना में टीचर रईं, जेई से तुमें उनके लाने दुख हो रओ।’’ भैयाजी मुस्कात भए बोले।
‘‘मैं तो कच्ची वारी टीचर रई औ मोरी कभऊं ऐसी ड्यूटी नई लगी। मनों, जे इंसानियत की बात आए।’’ मैंने कई। 
‘‘बा तो ठीक आए बिन्ना, मनो नौकरी मने नौकर घांई जिनगी।’’ भैयाजी बोले।
‘‘सो, नौकर बनाओ, जे तो गुलामी घांईं कहानो।’’ मैंने चिढ़ के कई।
‘‘अच्छा चलो, ने तिन्नाओ। हमाए-तुमाए सोचे से कछू ने हुइए, बोलने तो उनई को परहे। भैयाजी बोले।
‘‘सई कै रए आप।’’ मैंने भैयाजी से कई।        
बाकी बतकाव हती सो बढ़ी गई, हड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हप्ता करबी बतकाव तब तक लौं जेई की जुगाली करो। मनो सोचियो जरूर के पक्को करबे, पईसा बढ़ाबे के लाने तो सबई कट्ठे ठाड़ें हो जात आएं, सो ईके लाने काए नईं बोलत कोऊ?  
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Thursday, May 7, 2026

बतकाव बिन्ना की | चाए कछू हो जाए हम दाम ने देबी | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम


बतकाव बिन्ना की  
चाए कछू हो जाए हम दाम ने देबी
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
‘‘तुम बड़े रोंटियाई वारे ठैरे। चाए कछू हो जाए हम दाम ने देबी।’’ जैसी मैं भैयाजी के इते पौंची सो भौजी के बोल सुनाई परे।
‘‘का हो रओ भौजी? भैयाजी बेईमानी कर रए का?’’मैंने भौजी से पूछी।
‘‘तुमाए भैयाजी? कोन से बेईमानी? हमें नईं पतो।’’ भौजी अचरज करत भईं बोलीं।
‘‘आप ओरें काना-दुआ नईं खेल रए?’’ मैंने देखी के उते काना-दुआ की ने तो चौकड़िया हती औ ने गोटी, ने चईंयां।
‘‘नईं हम ओरें नईं खेल रए काना-दुआ। औ तुम इनकी बेईमानी की का कै रईं?’’ भौैजी ने मोसे पूछी।
‘‘अरे, आपई तो कै रई हतीं भैयाजी से के तुम बड़े रोंटियाई वारे ठैरे औ चाए कछू हो जाए हम दाम ने देबी। सो मैंने सोची के आप ओरें काना-दुआ खेल रए।’’ मैंने कई।
‘‘अरे, बा तो हम कै रए हते उते बंगाल के चुनाव के बाद की। उते देखो तो जिज्जी कैसी अड़ी दे रईं के हम कुर्सी ने छोड़बी। अरे, जो पब्लिक ने बता दई के हमें आपके बदले कछू नओ चाउने तो तो ऊको तनक मान राखो। जो का बच्चों घाईं कर रईं? हम जेई तुमाए भैयाजी से कै रए हते के जिज्जी खों सदमा बैठ गओ जेई से बे लरकोरा पना दिखा रईं। जैसे पैले अपन ओरें लरकपन में खिपड़ी गद्दा, छुआ-छुआउव्वल खेलत्ते औ जो कोनऊं हार जात्तो तो ऊको दाम देने परत्तो। तब कोऊ-कोऊ हारबे वारो अड़न लगत्तो के तुम ओरन ने रोंटियाई करी आए। चाए कछू हो जाए हम दाम ने देबी। ऊंसई सो जिज्जी बाई उते कर रईं।’’ भौजी ने कई।
‘‘बिलकुल सई कै रईं आप। अब हार गईं सो हार गईं। अपनी हार मान के देखो चाइए के उनसे चूक कां भई ताके अगली चुनाव में जीत सकें। उने समझो चाइए के आजकाल सोसल मीडिया पे ट्रोल करबे वारों की कमी नोंई। बे ऊंसई चीथत रैत आएं औ जे ऐसे करे से तो बे धजी बना दैहें। सो उने तनक सहूरी रखो चाइए।’’ मैंने भौजी की बात को समर्थन करो।
‘‘हमें तो ऊ टेम याद आ गओ जबे इंदिरा गांधी चुनाव हारी हतीं। बे ई टाईप से ने रोई हतीं। उने तो पकर के जेल ले जाओ गओ रओ। फेर बी उन्ने बिरोध ने करो हतो। ईको असर जे परो के अगली चुनाव में फेर के कुर्सी पे लौट आई रईं। औ बे अपने अटल बिहारी बाजपेयी हरें तो मुतके बेर हारे मनो बे बी कभऊं ऐसे ने रोए। जे काए अपनी भद्द उड़वा रईं?’’ भैयाजी बोले।
‘‘कछू कओ पब्लिक जिज्जी से खफा तो रई हुइए तभईं तो ऊने कुर्सी से नैंचे पटक दओ।’’ भौजी बोलीं।
‘‘काए नईं रई? खूब रई। ने तो बटन चटका के उनके लाने वोट ने दे देती?’’ मैंने कई।
‘‘का होत आए बिन्ना के जब कोनऊं एक ई कुर्सी पे कुल्ल टेम से जमो रैत आए तो ऊको जे गल्तफेमी होन लगत आए के ऊको कोनऊं हरा नई सकत। बो चाए तो कछू बी कर सकत आए। पब्लिक की अटकी रई सो ऊने जिताओ, जो जीत गए सो काए की पब्लिक औ कां की पब्लिक।’’ भैयाजी बोले।
‘‘मनो आप कछू कओ भैयाजी पर जे तो मानने परहे के जे अपने मोटा भाई, छोटा भाई दोई बेजा चतुरा आएं। ऐसो चक्रब्यूह रचत आएं के ऊमें उरझ के बड़े-बड़े महारथी धूरा चाटन लगत आएं। उन ओरन को दांव कोऊ भांप नई सकत। अब आगे देखियो के का-का होत आए।’’ मैंने भैयाजी से कई।
‘‘का आए बिन्ना के हमें एक किसां याद आ रई जेई पे से।’’ भौजी बोलीं।
‘‘कोन सी किसां?’’ मैंने भौजी से पूछीं।
‘‘किसां जे आए के भौत समै पैले की बात आए। एक देस में एक राजा रओे। जब बा राजा ने बनो रओ हतो सो ऊको दिन रात जेई लगत्तो के मोए राजगद्दी कबे मिलहे। ऊकी उमर सोई हो चली ती राजगद्दी सम्हारने जोग। सो एक दिनां तंग आ के ऊने अपने बापराम से सूधई कै दई के अब तुम गद्दी छोरो, ऊपे हमें बैठने। बापराम जो ऊ देस को महाराजा हतो, बोलो के हम काए गद्दी छोड़ें? हम ने छोड़बी, तुमसे जो दिखाए सो कर लेओ। जा सुन के ऊके बेटा खों आ गओ गुस्सा। ऊने तुरतईं एक फौज जोरी औ महल पे धावा बोल दओ। बाप औ बेटा में खींबई घमासान भई। अखीर में बाप हार गओ औ बेटा जीत गओ। फेर का रओ, ऊने बापराम खों गद्दी से उतार फेंकों औ खुद जा बैठो। ऊ राजा बन गओ। सुरू-सुरू में तो ऊने अपनी परजा को बरो खयाल राखो। मनो फेर ऊके राज में ढिलाई आन लगी। दसा जे भई के मुतकी परजा के पास ने तो खाबे खों नाज औ ने पहनबे खों हुन्ना। परजा देखत्ती के पड़ोस के देस में भौत कछू नोनों हो रओ औ उनके देस में खाली बतकाव होत रैत आए। सो परजा सोई अकुलान लगी। बा सोचन लगी के ईसे तो साजो आए के पड़ोसी राजा इते आए औ इते को भी राज सम्हार ले। कम से कम कछू तो अच्छो हुइए। अब का आए के परजा तो ऊंसई मंदर के घंटा घांई होत आए। जोन चाए ऊको बजात रए। ऊपे ऊको जेई भरम रैत आए के हम तो भगवान के काम आ रए। हमाई आवाज सो भगवान सुन रए। सो, बा तो ठुकत-पिटत रैत आए। सो, फेर भओ जे के एक दार पड़ोस के राजा ने चढ़ाई कर दई। दोई राजाओं में घमासान भई। मनो परजा तो जेई ताक में बैठी हती सो ऊने पड़ोसी राजा को साथ दओ औ अपने राजा खों हरा दओ। हारबे वारो राजा खों भरोसो ने हो पा राओ तो के ऊकी परजा दूसरे को साथ दे सकत आए, सो ऊने परजा से पूछी के तुम ओरन ने ऐसी काए करी? तो परजा ने अपने हारे भए राजा के आंगू एक दरपन धर दओ औ बोली के ईमें अपनी सकल देखो औ बताओ के आप पैले कैसे दिखत्ते औ अब कैसे दिखात आओ। औ जो अबे ने बता सको तो सोच के बताइयो। जो तुम अपनी परजा के लाने ने बदले होते तो तुमाई परजा बी तुमें ने बदरती। सो बिन्ना, जे किसां हमें याद आ रई हती।’’ भौजी पूरी किसां सुनात भई अखीर में बोलीे।
‘‘बिलकुल सांची किसां आए जा तो। जे तो उते भओ आए। सो अब रोए, चिचियाए से का हुइए?’’ मैंने कई। 
‘‘हऔ बिन्ना! उते पच्छिम बंगाल में ऊंसई भौत गरीबी आए। औ भीर तो इत्ती के ने पूछो। हम तो एक बेर कोलकत्ता गए रए सेा हमें पसीनों छूट गओ रओ। दो दिनां में जैसे-तैसे अपनो काम निपटाओ औ भाग आए रए।’’ भैयाजी बोले।
‘‘मैंने नईं देखो कोलकाता, मनो जाबे को जी भी नईं करत। मोए ऊंसई भीर से घबराट होत आए। मनो उते के साहित्य में उते के बारे में खूब पढ़ो। देसी-बिदेसी सबई ने कोलकाता के बारे में खूब लिखो। एक किताब मैंने पढ़ी रई डोमनिक लैपियर की। ऊको नांव आए ‘‘सिटी ऑफ ज्वाय’’। ऊमें ऊने कोलकाता के बारे में खूबई खोल के लिखो आए। बाकी मोए तो जेई लगत आए के जां पे इत्ते बरस जिज्जी को मने एक लुगाई को राज रओ उते सोनागाछी की रेड लाईट बुझ ने सकी। मैंने कऊं पढ़ी रई के जैसे एशिया की सबसे बड़ी झोपड़पट्टी मुंबई की धारावी आए ऊंसई सोनागाछी एशिया की सबसे बड़ी लुगाइयन की मंडी आए।’’ मैंने कई।
‘‘ऐसो का? मनो कल को जे ने बोलियो के एशिया में सबसे ज्यादा दारू को अहाता अपने प्रदेस में आए।’’ भौजी ने मोसे कई।
‘‘अरे, जो का कै रईं आप? ऐसो ने कओ। ने तो बे अहाता वारे मारहें औ रेबेन्यू वारे अलग मारहें। आप तो अपनी दार-रोटी चलन देओ।’’ मैंने भौजी खों हंस के समझाओ। 
‘‘जिज्जी खों इतई ने बुला लेवें? इते बे दारू चढ़ा के अपनो गम भुला लैहें।’’ भैयाजी ने सोई हंस के चुटकी लई। उनकी बात सुन के मोए औ भौजी खों खींबई हंसी आई।        
बाकी बतकाव हती सो बढ़ी गई, हड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हप्ता करबी बतकाव तब तक लौं जेई की जुगाली करो। मनो सोचियो जरूर के ई के बाद अब आगे का हुइए? मैं मैंगाई की नईं राजनीति की कै रई।  
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