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Friday, February 7, 2020

चर्चा प्लस ... कौन जिम्मेदार था देश के विभाजन के लिए?- डाॅ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
चर्चा प्लस ... कौन जिम्मेदार था देश के विभाजन के लिए?  
        - डाॅ. शरद सिंह 
       देश का विभाजन क्यों हुआ? कैसे हुआ? इसके लिए जिम्मेदार कौन था? क्या इसे रोका जा सकता था? ये चारो प्रश्न बार-बार उठते रहते हैं। आज राजनीतिक मंचों और टेलीविजन चैनल्स के डिस्कशन में जिस तरह कटुता भरे आरोप-प्रत्यारोप लगाए जाते हैं उसे देख-सुन कर ऐसा लगता है गोया हम उसी बंटवारे के दौर में जा पहुंचे हैं। जबकि कुछ भी कहने से पहले बेहतर है कि पहले हम समझ लें  तत्कालीन स्थितियों को। इस संदर्भ में मैं यहां अपनी पुस्तक ‘‘राष्ट्रवादी व्यक्तित्व: महात्मा गांधी’’ (सामयिक प्रकाशन नईदिल्ली, वर्ष 2015) के कुछ अंश दे रही हूं जिनसे तत्कालीन परिस्थितियां समझी जा सकती हैं।

अंग्रेजों की ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति रंग लाने लगी थी। भारतीय मुस्लिमों और हिन्दुओं को दो धार्मिक समुदाय में बांटने में अंग्रेजों ने कोई कसर नहीं छोड़ी थी। उनकी अलगाववादी नीतियों का ही प्रभाव था कि भारत का एक बड़ा मुस्लिम समुदाय भारत से अलग होकर मुस्लिम राष्ट्र के रूप में स्थापित होने के लिए व्याकुल हो उठा। आरम्भिक गतिविधियों के रूप में मार्च, 1940 में लाहौर अधिवेशन में मुस्लिम लीग ने मुस्लिमों के लिए एक अलग राज्य की मांग उठाई। मुस्लिम लीग के इस निर्णय के पीछे कुछ कट्टरपन्थी विचारधारा वाले मुस्लिमों का हाथ था। 8 अगस्त, 1942 को कांग्रेस द्वारा पारित ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ प्रस्ताव के कारण भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया तथा कांग्रेस के कई महत्त्वपूर्ण नेताओं को गिरफ्तार कर लिया। कांग्रेस के नेताओं की अनुपस्थिति में मुस्लिम लीग को अपना राजनीतिक उद्देश्य पूर्ण करने के लिए मुस्लिम जनमत को अपने पक्ष में करने एक अच्छा अवसर मिल गया।

20 अक्टूबर, 1943 को जब लार्ड लिनलिथगो के स्थान पर फील्ड मार्शल वावेल को भारत का वायसराय बना कर भेजा गया तो उसका उद्देश्य भारत में उत्पन्न राजनीतिक गतिरोध को समाप्त करना और द्वितीय विश्वयुद्ध में भारतीयों का सहयोग लेना था। फील्ड मार्शल वावेल ने 5 मई, 1944 को महात्मा गांधी तथा अन्य नेताओं को रिहा कर दिया और विश्व युद्ध को समाप्त होता हुआ देखकर वावेल ने कांग्रेस और मुस्लिम लीग के साथ 25 जून से 24 जुलाई, 1945 तक शिमला में बातचीत की। इस बातचीत में कांग्रेस और मुस्लिम लीग भारत के भविष्य पर एकमत नहीं हो सके। विश्वयुद्ध की समाप्ति के एक सप्ताह के भीतर ही वावेल ने केन्द्रीय और प्रान्तीय विधान परिषदों के लिए निर्वाचन की घोषण कर दी। मुस्लिम लीग ने केन्द्रीय विधान परिषद में मुस्लिमों के लिए आरक्षित सभी 30 सीटें जीत लीं। प्रान्तीय विधान परिषद् में मुस्लिम लीग को मुस्लिमों के लिए आरक्षित 560 सीटों में से 427 सीटें प्राप्त हुईं। सन् 1946 में कैबिनेट मिशन भारत आया। कैबिनेट मिशन ने प्रमुख राजनीतिक दलों के साथ लम्बी बातचीत के बाद दो प्रस्ताव रखे। पहला प्रस्ताव एक संयुक्त भारत के निर्माण का सुझाव था। दूसरे प्रस्ताव में पंजाब और बंगाल के हिन्दू बहुसंख्यक क्षेत्रों में समीपवर्ती प्रान्तों को भारत में मिलने की स्वतंत्रता के साथ पाकिस्तान के रूप में एक अलग मुस्लिम राज्य को स्वीकार करने का सुझाव दिया गया था। मुस्लिम लीग ने पहले प्रस्ताव पर अपनी सहमति व्यक्त कर दी। यूं तो कांग्रेस ने भी इस प्रस्ताव पर अपनी सहमति जताई किन्तु वह समूह सम्बन्धी व्यवस्था के पक्ष में नहीं थी तथापि अंतरिम साझा सरकार और संविधान सभा का गठन करने के लिए वायसराय फील्ड मार्शल वावेल ने राजनीतिक कार्यवाही शुरू कर दी।
चर्चा प्लस ... कौन जिम्मेदार था देश के विभाजन के लिए?- डाॅ. शरद सिंह

कांग्रेस के अधिकतर नेता पंथ-निरपेक्ष थे और सम्प्रदाय के आधार पर भारत का विभाजन करने के विरुद्ध थे। महात्मा गांधी का विश्वास था कि हिन्दू और मुसलमान साथ रह सकते हैं और उन्हें साथ रहना चाहिए। उन्होंने विभाजन का घोर विरोध किया, ‘‘मेरी पूरी आत्मा इस विचार के विरुद्ध विद्रोह करती है कि हिन्दू और मुसलमान दो विरोधी मत और संस्कृतियां हैं। ऐसे सिद्धांत का अनुमोदन करना मेरे लिए ईश्वर को नकारने के समान है।’’ 

मुस्लिम लीग और कांग्रेस में विचारधारा के मतभेद उभरने शुरू हो गये थे। 27 जुलाई, 1946 को मुस्लिम लीग ने कैबिनेट मिशन योजना को स्वीकार कर लिया और 16 अगस्त, 1946 को ‘प्रत्यक्ष कार्यवाही दिवस’ के रूप में मनाने के लिए एक प्रस्ताव पारित किया। इससे कलकत्ता में दंगा भड़क उठा, जिसमें लगभग 5000 लोग मारे गये तथा 15000 लोग घायल हुए। इस दंगे में लगभग 1 लाख लोग बेघर हो गये थे। बिहार, उत्तर प्रदेश, पंजाब, नोआखाली और उत्तर-पश्चिम सीमाप्रांत में भी भीषण साम्प्रदायिक दंगे भड़क उठे थे। इस दौरान वाइसराय वावेल ने जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में अंतरिम सरकार के गठन की प्रक्रिया पूर्ण कर ली थी। अंतरिम सरकार का मुस्लिम लीग ने पहले तो बहिष्कार किया लेकिन बाद में फिर वह अपना कोटा मंत्रालयों में भरने के लिए तैयार हो गयी। इस प्रकार देश में साझा अंतरिम सरकार का गठन हो गया। बाद में मुस्लिम लीग ने सरकार की कार्यवाहियों में अनेक बाधाएं खड़ी करनी शुरू कर दीं। मुस्लिम लीग द्वारा लगातार बाधा उत्पन्न करने की स्थितियों से व्यथित होकर जवाहरलाल नेहरू और सरदार वल्लभ भाई पटेल यह सोचने के लिए विवश हो गये कि साझा अंतरिम सरकार से तो बेहतर होता कि विभाजन के लिए ही कार्यवाही की जाती। इस तरह विभाजन को वैकल्पिक रूप से सही मानना तत्कालीन परिस्थितियों को देखते हुए विवशता बन गयी थी। लगातार भारत में अपने विरुद्ध बिगड़ती हुई परिस्थितियों को देखते हुए ब्रिटिश सरकार ने भारत छोड़ने का निर्णय ले लिया। 

जून, 1948 सत्ता हस्तान्तरण की अवधि घोषित की गई थी किन्तु भारत के दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच लगातार गहरे होते जा रहे मतभेदों के कारण अंततः समस्त परिस्थितियों पर विचार करते हुए, 3 जून, 1947 को लार्ड माउंटबेटन ने भारत के विभाजन की घोषणा कर दी। सत्ता हस्तांतरण के लिए 15 अगस्त, 1947 की तिथि घोषित की गई। सत्ता हस्तांतरण की तिथि पूर्व घोषित तिथि जून, 1948 से अगस्त, 1947 कर दिए जाने के कारण देश के सामने गम्भीर चुनौतियां उत्पन्न हो गयीं। क्योंकि भारत और पाकिस्तान के रूप में देश का विभाजन होने के कारण उत्पन्न होने वाली प्रशासनिक और कानून व्यवस्था सम्बन्धी समस्याओं को सुलझाने के लिए कोई पूर्व निश्चित योजना तैयार नहीं की गयी थी। स्वयं रेडक्लिफ ने लिखा, ‘‘जब मैं नक्शे पर विभाजन की लकीर खींच रहा था, तब मुझे पता नहीं था कि मेरी खींची लकीर किसी के घर के बीच से गुज़र रही है, आंगन के बीच से गुज़र रही है अथवा शयनकक्ष के बीच से गुज़र रही है। लकीर खींचते हुए मेरे हाथ कांप रहे थे।’’ भारत का विभाजन हो गया। देश का 30 प्रतिशत भाग कटकर पाकिस्तान नाम से एक अलग देश बन गया। ‘पाकिस्तान मेरी लाश पर बनेगा’- की घोषणा करने वाले महात्मा गांधी असहाय से देखते रहे।

वस्तुतः देश के विभाजन के लिए कोई एक व्यक्ति नहीं बल्कि के लिए हम तत्कालीन भारतीय ही जिम्मेदार थे जो अंग्रेजों के बहकावे में आ गए और आपस में बैर मान बैठे। चौंकन्ने रहना होगा कि कहीं वही बैर एक बार फिर न जाग उठे।
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(दैनिक ‘सागर दिनकर’, 05.02.2020)
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Wednesday, January 22, 2020

चर्चा प्लस... दया मांगने वालो! तुमसे भी तो मांगी थी निर्भया ने दया की भीख- डॉ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
चर्चा प्लस 
दया मांगने वालो! तुमसे भी तो मांगी थी निर्भया ने दया की भीख
- डॉ. शरद सिंह
      अपराधी और अपराधियों का साथ देने वाले किस तरह कानून से खेलते हैं इसका ताज़ा उदाहरण निर्भया के गुनाहगारों के मामले में साफ़ देखा जा सकता है। आज जो महामहिम राष्ट्रपति के समक्ष दया की याचिका प्रस्तुत कर रहे हैं, उन्हें वो पल याद करने चाहिए जब निर्भया ने गिड़गिड़ाते हुए उनसे रहम की भीख मांगी होगी। उसने तो कोई गुनाह भी नहीं किया था फिर भी इन दरिंदों ने उसे नृशंता की हदें पार करते हुए मौत के मुंह में धकेल दिया। उस पर शर्मनाक बात यह कि आज इस अतिसंवेदनशील मुद्दे को राजनीति का मोहरा बना कर खेला जा रहा है।      

एक ओर जहां निर्भया के माता-पिता और पूरा देश सात साल से उसके गुनहगारों को फांसी पर लटकता देखने की प्रतीक्षा कर रहे हैं, वहीं सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह के एक बयान ने विवाद खड़ा कर दिया। इंदिरा जयसिंह ने निर्भया की मां से अपील कर डाली कि वह दोषियों को माफ कर दें। इंदिरा के इसी बयान से निर्भया की मां आशादेवी के मन को चोट पहुंची और उन्होंने नाराज होते हुए पूछा कि ‘‘क्या आपकी बेटी या आपके साथ ऐसा होता तब भी आप यहीं कहतीं?’’ दरअसल, इंदिरा जयसिंह ने ट्वीट किया था, ‘मैं आशा देवी के दर्द से पूरी तरह से वाकिफ हूं। मैं उनसे अनुरोध करती हूं कि वह सोनिया गांधी के उदाहरण का अनुसरण करें जिन्होंने नलिनी को माफ कर दिया और कहा कि वह उसके लिए मौत की सजा नहीं चाहती हैं। हम आपके साथ हैं लेकिन मौत की सजा के खिलाफ हैं।’ हर व्यक्ति इस ट्वीट पर अचंभित रह गया। दोनों घटनाओं में कोई समानता नहीं, फिर यह आग्रह क्यों? वह भी एक वरिष्ठ वकील, उस पर एक महिला द्वारा? उनका यह ट्वीट ट्रोल किया गया। जहां तक संवेदनाओं की गिरावट का प्रश्न है तो राजनीतिक स्तर पर निर्भया केस को जिस तरह बिसात बना दिया गया है और उस पर गुनहगारों की सज़ा के मुद्दे को मोहरा बना कर चालें चली जा रही हैं, वह अत्यंत शर्मनाक है। दिल्ली के आगामी चुनावों के परिप्रेक्ष्य में जिस तरह से राजनीतिक दल एक-दूसरे को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं, उससे उनकी अमानवीयता ही उजागर हो रही है। निर्भया जो आज रेप-पीड़िताओं को न्याय दिलाने की प्रक्रिया की प्रतीक बन चुकी है, उसके प्रति असंवेदना भर्त्सना योग्य है।

निर्भया केस को 7 साल बीत चुके हैं। अभी भी पूरे देश को गुनहगार मुकेश, विनय और अक्षय और पवन की फांसी की प्रतीक्षा है। 16 दिसंबर की वो काली रात कोई भुला नहीं सकता है, जब दिल्ली के मुनिरका क्षेत्र में निर्भया के साथ नृशंसता बरती गई थी। उस दिन पैरामेडिकल की छात्रा निर्भया अपने एक दोस्त के साथ साकेत स्थित सेलेक्ट सिटी मॉल में ‘‘लाइफ ऑफ पाई’’ फिल्म देख कर लौट रही थी। लौटने के लिए दोनों ऑटो पर सवार हुए। ऑटोवाले ने मुनीरका बसस्टैंड तक उन्हें छोड़ा। उस समय रात्रि के मात्र साढ़े आठ बजे थे। वहां से उन्हें घर हुंचने का दूसरा साधन पकड़ना था। एक सफेद रंग की बस पहले से वहां खड़ी थी। जिसमें एक लड़का  बार-बार कह रहा था चलो कहां जाना है। बस में 6 लोग मौजूद थे और ऐसे दिखावा कर रहे थे जैसे काफी सवारी आने वाली हैं। निर्भया और उसके दोस्त उसे सामान्य बस समझ कर सवार हो गए। तब निर्भया को क्या पता था कि वह मौत की सवारी करने जा रही है।
चर्चा प्लस, डाॅ. शरद सिंह, दैनिक  सागर दिनकर, 

                बस चल पड़ी। फिर कुछ ही देर में उन लड़कों के असली चेहरे सामने आ गए। बस के दरवाज़े बंद कर दिए गए। निर्भया का मोबाईल फोन छीन लिया गया। निर्भया के दोस्त को बुरी तरह पीटा गया और निर्भया के साथ नृशंसता की हदें पार की जाने लगीं। वह रोती, गिड़गिड़ाती, चींखती रही मगर दरिंदों को उसकी दया की गुहार सुनाई नहीं दी। जब उन लड़कों को लगा कि निर्भया और उसके दोस्त मरणासन्न हो चुके हैं तो उन्हें मरने के लिए बस के बाहर फेंक कर रवाना हो गए। दिसंबर की कड़ाके ठंड वाली रात और मरणासन्न निर्भया। निर्भया का दोस्त होश में था। उसने वहां से गुज़रने वालों से मदद मांगी। कई लोगों ने अनदेखा किया किन्तु अंततः एक बाईक सवार ने पुलिस तक सूचना भिजवाई। तब कहीं जा कर निर्भया को अस्पताल पहुंचाया जा सका।
निर्भया की दशा देख कर चिकित्सकों तक की आत्मा कांप उठी। दिल्ली की तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने कहा था कि उनमें इतनी हिम्मत नहीं कि वो पीड़ित लड़की को देखने जा सकें। यद्यपि कांग्रेस की पूर्वअध्यक्ष सोनिया गांधी ने सफदरजंग अस्पताल जाकर पीड़िता का हालचाल जाना था। निर्भया की बिगड़ती दशा देखकर सरकार ने उसे सिंगापुर के माउन्ट एलिजाबेथ अस्पताल भेजा। किन्तु 29 दिसंबर को निर्भया ने रात के करीब सवा दो बजे वहां दम तोड़ दिया।
इस घटना के बाद देश भर में आंदोलन की आग फैल गई। पूरा देश बलात्कारियों के लिए मृत्युदंड की मांग करने लगा। संसद में इसे लेकर जमकर हंगाम हुआ। सड़कों और सोशल मीडिया पर बार-बार आवाज़ें उठाई जा रही थीं। दिल्ली के साथ-साथ देश में जगह-जगह प्रदर्शन हो रहे थे। मामला कोर्ट में चल रहा था। घटना के दो दिन बाद 18 दिसंबर 2012 को दिल्ली पुलिस ने छह में से चार आरोपियों राम सिंह, मुकेश, विनय शर्मा और पवन गुप्ता को गिरफ्तार किया। वहीं 21 दिसंबर 2012 दिल्ली पुलिस ने पांचवां नाबालिग आरोपी को दिल्ली से और छठे आरोपी अक्षय ठाकुर को बिहार से गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने मामले में 80 लोगों को गवाह बनाया था। सुनवाई शुरू हो गई। इसी बीच आरोपी बस चालक राम सिंह ने तिहाड़ जेल में 11 मार्च, 2013 को आत्महत्या कर ली।
इसके बाद सात साल का लम्बा समय जिसमें निर्भया की मां और पिता ने अपनी मृत बेटी को न्याय दिलाने यानी गुनहगारों को सज़ा दिलाने के लिए दिन-रात एक कर दिया। न्यायालय में विधिवत् गुनाह सिद्ध हुए और अपराधियों को फांसी का मृत्युदण्ड सुनाया गया। इसके बाद गुनहगारों को याद आया ‘‘दया’’ शब्द। निर्भया सामूहिक दुष्कर्म केस में दोषी मुकेश की ओर से राष्ट्रपति के समक्ष दया याचिका प्रस्तुत की गई। किन्तु राष्ट्रपति ने मुकेया की दया याचिका खारिज कर दी। इसके साथ ही दोषी मुकेश के सभी कानूनी विकल्प प्रत्यक्षतः खत्म हो गए हैं। लेकिन दया याचिका के इस अधिकार को दांव की तरह चलते हुए अपराधियों ने फांसी की तिथि आगे खिसकवा ली और अभी विधि विशेषज्ञों की मानें तो फांसी तारीख और आगे बढ़ सकती है। जबकि आज देश का हर नागरिक निर्भया के अपराधियों से पूछ रहा है कि खुद के लिए दया याचिका पेश करने वालो, क्या तुम भूल गए कि निर्भया ने भी तुमसे दया की भीख मांगी थी। अतः इस अतिसंवेदनशील मामले पर सजा की कार्यवाही में अब और अधिक विलम्ब कहीं आमजनता के धैर्य का बांध न तोड़ने लगे।
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(दैनिक ‘सागर दिनकर’, 22.01.2020)
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Wednesday, January 15, 2020

चर्चा प्लस ... दो पीढ़ियों की दूरी मिटाती है मकर संक्रांति - डाॅ. शरद सिंह

Dr ( Miss) Sharad Singh
चर्चा प्लस ... 

दो पीढ़ियों की दूरी मिटाती है मकर संक्रांति
- डाॅ. शरद सिंह 


मकर संक्रांति तिल-गुड़, स्नान और पतंग का त्यौहार है। यूं तो सूर्य के धनु से मकर राशि में प्रवेश को उत्तरायण माना जाता है और सूर्य के उत्तरायण में प्रवेश के संक्रांतिकाल को मकर संक्रांति के पर्व के रूप में मनाया जाता है। यह मात्र धार्मिक पर्व नहीं वरन् एक सामाजिक पर्व है और इसमें निहित है संदेश दो पीढ़ियों के बीच निकटता लाने का। यह संदेश आज के परिवेश में बेहद महत्वपूर्ण है जब आज परिवार बिखर रहे हैं, वृद्धाश्रम खुलते जा रहे हैं और बड़ों ओर बच्चों के बीच दूरियां बढ़ती जा रही हैं जेनेरेशन गेप के नाम पर। मकर संक्रांति में पिता-पुत्र के पारस्परिक मेल की रोचक कथा भी मौजूद है जिसे जानना और समझना जरूरी है।

सूर्य पर आधारित मकर संक्रांति का भारतीय संस्कृति में बहुत महत्व माना गया है। वेद और पुराणों में भी इस दिन का विशेष उल्लेख मिलता है। मकर संक्रांति खगोलीय घटना है, जिससे जड़ और चेतन की दशा और दिशा तय होती है। सूर्य के धनु से मकर राशि में प्रवेश को उत्तरायण माना जाता है। वर्ष को दो भागों में बांटा गया है। पहला उत्तरायण और दूसरा दक्षिणायन। उक्त दो अयन को मिलाकर एक वर्ष होता है। मकर संक्रांति के दिन सूर्य पृथ्वी की परिक्रमा करने की दिशा बदलते हुए थोड़ा उत्तर की ओर बढ़ता जाता है, इसलिए इस काल को उत्तरायण कहते हैं। सूर्य है तो जीवन है। इसीलिए, सूर्य का एक राशि से दूसरी राशि में जाना वैदिक ज्योतिष के अनुसार काफी महत्वपूर्ण घटना है। सूर्यदेव जिस दिन धनु से मकर राशि में पहुंचते हैं उसे मकर संक्रांति का दिन कहते हैं। सूर्य के मकर राशि में आते ही मलमास समाप्त हो जाता है। इसी दिन से ही देवताओं का दिन शुरू होता है, जो आषाढ़ मास तक रहता है। दक्षियायन देवताओं के लिए रात्रि का समय होता है। ठीक इसी समय से सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायन हो जाता है। मकर संक्रांति को उत्तरायण भी कहते हैं, क्योंकि इस दिन से सूर्यदेव उत्तर दिशा की ओर बढ़ना शुरू कर देते हैं। इस दिशा परिवर्तन के समय को ही मकर संक्रांति कहते हैं।
Charcha Plus - दो पीढ़ियों की दूरी मिटाती है मकर संक्रांति  -  Charcha Plus Column by Dr Sharad Singh, 15.01.2020
       मकर संक्रांति समूचे भारत में मनाया जाता है, चाहे इसका नाम प्रत्येक प्रांत में अलग-अलग हो और इसे मनाने के तरीके भी भिन्न हों, किंतु यह बहुत ही महत्व का पर्व है। मकर संक्रांति को गुजरात में उत्तरायण, पंजाब में लोहड़ी पर्व, गढ़वाल में खिचड़ी संक्रांति और केरल में पोंगल के नाम से मनाया जाता है। वहीं सिंधी लोग इस त्योहार को तिरमौरी कहते हैं। इस अवसर पर गुजरात समेत कई राज्यों में पतंगें भी उड़ाई जाती है। इस समय से दिन बड़े और रात छोटी होने के साथ ही मौसम ठंडी से गर्मी की तरफ बढ़ने लगता है। मकर संक्रांति की विभिन्न परंपराओं में स्नान, दान का विशेष महत्व है, किन्तु इसके अलावा इसदिन पारंपरिक खिचड़ी और तिल के उपयोग से पकवान बनाने की भी मान्यता है। देश के हर कोने में अलग अलग तरीके से खिचड़ी और तिल के व्यंजन पकाए जाते हैं। इन्हें मकर संक्रांति के दिन बनाया जाता है और भगवान को भोग लगाने के बाद अगले दिन सूर्य उदय के पश्चात ही ग्रहण किया जाता है।
किन्तु मकर संक्रांति के दिन खिचड़ी क्यों बनाई जाती है? इसदिन तिल के प्रयोग से तरह तरह के पकवान क्यों तैयार किए जाते हैं? इसके पीछे का कारण क्या है? आइए इनके पीछे छिपी पौराणिक कहानियों के बारे में जानते हैं। श्रीमद्भागवत एवं देवी पुराण में दर्ज एक कथा के अनुसार शनि देव का हमेशा से ही अपने पिता सूर्य देव से वैर था। एक दिन सूर्य देव ने शनि और उसकी माता छाया को अपनी पहली पत्नी संज्ञा के पुत्र यमराज से भेद भाव करते हुए देख लिया। इससे नाराज होकर उन्होंने अपने जीवन से छाया और शनि को निकालने का कठोर फैसला लिया। इससे नाराज होकर शनि और छाया ने सूर्य को कुष्ठ रोग हो जाने का शाप दिया और वहां से चले गए। पिता को कुष्ठ रोग से परेशान होते देख यमराज ने तपस्या की। आखिरकार सूर्य देव कुष्ठ रोग से मुक्त हुए। किन्तु उनके मन में अभी भी शनी देव को लेकर क्रोध था। क्रोधित अवस्था में ही वे शनि देव के घर (कुंभ राशि में) गए और उसे जलाकर काला कर दिया। इसके बाद शनि और उनकी माता छाया को कष्ट भोगना पड़ा।
अपनी सौतेली मां और शनी देव को दुख में देखकर यमराज ने उनकी मदद की। सूर्य देव को दोबारा उनसे मिलने भेजा। इस बार जब सूर्य देव वहां पहुंचे तो शनि देव ने काले तिल से उनकी पूजा की। चूंकि घर में सब कुछ जल चुका था, इसलिए शनि देव के पास केवल तिल ही थे। शनि की पूजा से प्रसन्न होकर सूर्य देव ने शनि देव को वरदान दिया और कहा कि तुम्हारे दूसरे घर ‘मकर’ में आने पर तुम्हारा घर धन-धान्य से भर जाएगा। इसी कारण से मकर संक्रांति के दिन सूर्य देव की तिल से पूजा की जाती है और अगले दिन तिल का सेवन किया जाता है।
एक अन्य कथा के अनुसार शनिदेव का जन्म महर्षि कश्यप के अभिभावकत्व में कश्यप यज्ञ से हुआ। छाया शिव की भक्तिन थी। जब शनिदेव छाया के गर्भ में थे तो छाया ने भगवान शिव की इतनी कठोर तपस्या कि वे खाने-पीने की सुध तक उन्हें न रही। भूख-प्यास, धूप-गर्मी सहने के कारण उसका प्रभाव छाया के गर्भ में पल रहे शनि पर भी पड़ा और उनका रंग काला हो गया। जब शनिदेव का जन्म हुआ तो रंग को देखकर सूर्यदेव ने छाया पर संदेह किया और उन्हें अपमानित करते हुए कह दिया कि यह मेरा पुत्र नहीं हो सकता। मां के तप की शक्ति शनिदेव में भी आ गई थी उन्होंने क्रोधित होकर अपने पिता सूर्यदेव को देखा तो सूर्यदेव बिल्कुल काले हो गये, उनके घोड़ों की चाल रुक गई। परेशान होकर सूर्यदेव को भगवान शिव की शरण लेनी पड़ी और शिव ने उनको उनकी गलती का अहसास कराया। सूर्यदेव ने अपनी गलती के लिये क्षमा याचना की जिसके बाद उन्हें फिर से अपना असली रूप वापस मिला।
ये दोनों कथाएं इस बात का संदेश देती हैं कि पिता और पुत्र में भूल चाहे जिससे भी हुई हो, उन्हें परस्पर मिल कर, एक दूसरे से बातचीत कर के मसले को सुलझा लेना चाहिए। यह संदेश आज के परिवेश में बेहद महत्वपूर्ण है जब आज परिवार बिखर रहे हैं, वृद्धाश्रम खुलते जा रहे हैं और बड़ों ओर बच्चों के बीच दूरियां बढ़ती जा रही हैं जेनेरेशन गेप के नाम पर। मिल-बैठ कर परस्पर दुख-सुख जानने का चलन परिवारों से खत्म होता जा रहा है, जिसके लिए मकर संक्रांति में पिता-पुत्र के पारस्परिक मेल की रोचक कथाओं को जानना और समझना जरूरी है। बुंदेलखंड में तो यह मान्यता भी है कि मकर संक्रांति पर जब कोई पिता अपने पुत्र से मिलने जाते है, तो उनके बीच के मतभेद दूर हो जाते हैं। -------------------------
(सागर दिनकर, 15.01.2020)


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Wednesday, July 3, 2019

चर्चा प्लस … गौरवशाली परम्परा है बुंदेलखंड में रथयात्रा की - डॉ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
चर्चा प्लस …..

गौरवशाली परम्परा है बुंदेलखंड में रथयात्रा की
- डॉ. शरद सिंह 

बुंदेलखंड संस्कृति का धनी है क्योंकि इसने सम्पूर्ण भारत की सांस्कृतिक एवं धार्मिक परम्पराओं को आत्मसात किया है। यहां जिस उत्साह से दुर्गापूजा मनाई जाती है उसी उत्साह से भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा निकाली जाती है। रथयात्रा एक ऐसा पर्व है जिसे समूचा बुंदेलखंड ठीक उसी प्रकार से मानता है जैसाकि ओडीशा के पुरी में में मनाया जाता है। वैसी ही अर्द्धनिर्मित मूर्तियां, वैसे ही रथ और ठीक वैसे ही रथ को अपने हाथों से खींचने का उत्साह। अनेकता में एकता का सुंदर उदाहरण देखा जा सकता है भगवान जगन्नाथ की बुंदेली रथयात्रा में।
Charcha Plus Column by Dr Sharad Singh ... चर्चा प्लस … गौरवशाली परम्परा है बुंदेलखंड में रथयात्रा की - डॉ. शरद सिंह
बुंदेलखंड में विभिन्न प्रदेशों के व्यक्ति सदियों से आते और बसते रहे हैं। विशेषता यह कि यहां कभी प्रादेशिकता के आधार पर कभी किसी से किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं किया गया वरन् उनकी परम्पराओं को इस प्रकार अपना लिया गया जैसे वे परम्पराएं किसी अन्य प्रदेश की नहीं बल्कि बुंदेलखंड की ही हों। इसी तारतम्य में एक गौरवशाली परम्परा है रथयात्रा निकालने की। बुंदेलखंड में परम्परागत रूप से रथयात्रा पर्व मनाया जाता है, ठीक उसी दिन जब ओडीशा के पुरी में जगन्नाथ मंदिर में स्थित भगवान जगन्नाथ, उनकी बहन सुभद्रा और बड़े भाई बलदाऊ को विशाल रथों में आसीन कर रथयात्रा निकाली जाती है। यह आयोजन प्रत्येक वर्ष आषाढ़ शुल्क की द्वितिया को सम्पन्न होता है। भगवान जगन्नाथ, उनकी बहन सुभद्रा और बड़े भाई बलदाऊ की ये मूर्तियां अर्द्धनिर्मित हैं। जन्नाथपुरी की अर्द्धनिर्मित प्रतिमाओं के संबंध में कहा जाता है कि राजा इन्द्रद्युम्न को भगवान जगन्नाथ ने स्वप्न में दर्शन दिए और समुद्र में तैरते वृ़क्ष की शाखा से भाई बलराम एवं बहन सुभद्रा सहित उनकी मूर्ति बनाए जाने का आदेश दिया। भोर होने पर राजा ने समुद्र तट पर पहुंच कर वह शाखा प्राप्त कर ली और कारीगरों को मूर्तियां गढ़ने का आदेश दिया। वह शाखा इतनी अद्भुत थी कि उस पर कोई भी कारीगर छैनी तक नहीं चला सका। अंततः स्वयं विश्वकर्मा एक वृद्ध कारीगर के रूप में राजा के पास पहुंचे और शर्त रखी कि मूर्ति निर्माण के दौरान न तो कोई उन्हें व्यवधान पहुंचाएगा और न ही मंदिर के पट खोलेगा। यदि ऐसा किसी ने किया तो वे मूर्तिनिर्माण कार्य उसी क्षण रोक कर वहां से चले जाएंगे। राजा ने शर्त स्वीकार कर ली। मंदिर से आरी, छैनी, हथौड़ी चलने की आवाजें आती रहीं। राजा इन्द्रद्युम्न की रानी गुंडिचा अपने को रोक नहीं पाई। वह दरवाजे के पास गई तो उसे कोई आवाज सुनाई नहीं दी। वह घबरा गई। उसे लगा वृद्ध कारीगर मर गया है। राजा को भी यही भ्रम हो गया। राजा ने कमरे का दरवाजा खोलने का आदेश दिया। जैसे ही कमरा खोला गया तो वृद्ध वहां नहीं था जबकि तीन अर्द्धनिर्मित मूर्तियां वहां मिलीं। तब से आज तक मूर्तियों के अर्द्धनिर्मित स्वरूप की ही पूजा की जाती है।
पुरी के जगन्नाथ मंदिर के दस दिवसीय महोत्सव की तैयारी का श्रीगणेश अक्षय तृतीया को श्रीकृष्ण, बलराम और सुभद्रा के रथों के निर्माण से हो जाता है। कुछ धार्मिक अनुष्ठान भी किए जाते हैं। रथयात्रा में जगन्नाथ को दशावतारों के रूप में पूजा जाता है। रथ का रूप श्रद्धा के रस से परिपूर्ण होता है। वह चलते समय शब्द करता है। उसमें धूप और अगरबत्ती की सुगंध होती है। इसे भक्तजनों का पवित्र स्पर्श प्राप्त होता है। रथ का निर्माण बुद्धि, चित्त और श्रम से होता है, ऐसे रथ रूपी शरीर में आत्मा रूपी भगवान जगन्नाथ विराजमान होते हैं। इस प्रकार रथयात्रा शरीर और आत्मा के मेल की ओर संकेत करती है और आत्मदृष्टि बनाए रखने की प्रेरणा देती है। रथयात्रा के समय रथ का संचालन आत्मा युक्त शरीर करता है जो जीवन यात्रा का प्रतीक है। यद्यपि शरीर में आत्मा होती है तो भी वह स्वयं संचालित नहीं होती, बल्कि उसे माया संचालित करती है। इसी प्रकार भगवान जगन्नाथ के विराजमान होने पर भी रथ स्वयं नहीं चलता बल्कि उसे खींचने के लिए लोक-शक्ति की आवश्यकता होती है।
जगन्नाथ, बलराम और सुभद्रा के लिए अलग- अलग रथों का निर्माण लकड़ियों से होता है जिनमें किसी भी कील अथवा धातु का प्रयोग नहीं किया जाता है। आषाढ़ की शुक्ल द्वितीय को तीनों रथों को ’सिंहद्वार’ पर लाया जाता है। स्नान व वस्त्र पहनाने के बाद प्रतिमाओं को अपने-अपने रथ में रखा जाता है। इसे ’पहोन्द्रि महोत्सव’ कहते हैं। जब रथ तैयार हो जाते हैं, तब पुरी के राजा एक पालकी में आकर इनकी प्रार्थना करते हैं तथा प्रतीकात्मक रूप से रथ मण्डप को झाडू से साफ़ करते हैं। इसे ’छर पहनरा’ कहते हैं। अब सर्वाधिक प्रतीक्षित व शुभ घड़ी आती है। ढोल, नगाड़ों, तुरही तथा शंखध्वनि के बीच भक्तगण इन रथों को खींचते हैं। प्रतिमाएं अलग-अलग रथों पर सवार होकर अपनी मौसी अर्थात् गुंडिचा देवी के मंदिर की ओर प्रस्थान करती हैं। जगन्नाथ मंदिर से गुंडिचा मंदिर तक का रास्ता ’बड़ दाण्ड’ कहलाता है। इस रथयात्रा में हर वर्ग, उम्र, जाति, सम्प्रदाय के असंख्य लोग शामिल होते हैं। अब तो विदेशी पर्यटक भी बड़ी संख्या में इस अनूठे समागम का आनंद लेने पहुंचने लगे हैं। प्रभु जगन्नाथ का सोलह विशाल पहियों वाला रथ लगभग साढ़े छह सौ क्विंटल का होता है। इसे खींचने वाली मोटी रस्सियां शंखचूड़ कहलाती हैं। शास्त्रों में रथ को देह का प्रतीक माना गया है। देह या शरीर को आत्मा रूपी सारथी अर्थात् रथ का चालक अपनी बुद्धि और दूरदर्शिता से गति देता है। आज के इलेक्ट्रॉनिक एवं तकनीकी युग में भी विशालकाय तीनों रथों को हाथों से ही खींचा जाता है।
बुंदेलखंड के पन्ना नगर में भगवान जगन्नाथ स्वामी रथ यात्रा नगर में स्थित प्राचीन एवं ऐतिहासिक जगदीश स्वामी मंदिर जिसे बड़ा दिवाला मंदिर भी कहते हैं, से आरम्भ होती है। रथ यात्रा के शुभारम्भ में भगवान जगन्नाथ स्वामी जी, देवी सुभद्रा और भगवान बलराम को पूजा अर्चना कर अलग-अलग रथ में विराजमान किया जाता है। यह पूजा पुजारी और राजपरिवार के सदस्य द्वारा की जाती है। इस भव्य रथयात्रा में हजारों की संख्या में श्रद्धालु राजपरिवार के सदस्यों सहित बड़ी संख्या में नागरिकगण शामिल होते हैं। जगदीश स्वामी मंदिर से आरम्भ हो कर रथ यात्रा पन्ना जिले में ही स्थित जनकपुर मंदिर पहुंचती है। जहां मंदिर में भगवान का तिलक एवं आरती करके स्वागत किया जाता है और मंदिर में प्रवेश कराया जाता है। भगवान के मंदिर में प्रवेश के बाद जनकपुर में ही भण्डारा का आयोजन किया जाता है। पन्ना में भव्य रथों के साथ निकली शोभायात्रा में शामिल होने आस-पास के जिलों से भी श्रद्धालु पहुंचे। पन्ना में प्राचीन काल से मनाई जा रही जगन्नाथ स्वामी की रथयात्रा बुंदेलखंड का सबसे भव्य रथयात्रा समारोह है। पन्ना नगर में ऐतिहासिक रथयात्रा महोत्सव का आयोजन जगन्नाथपुरी की तर्ज पर होता है।
पन्ना की भांति ही छतरपुर में भी रथयात्रा का भव्य आयोजन किया जाता है। नगर के तमराई मुहल्ला में प्राचीन भगवान जगन्नाथ स्वामी का मंदिर है। इसी मंदिर से श्रीजगन्नाथ की रथयात्रा आरम्भ होती है। यहां सबसे पहले आकर्षक तरीके से सजाए गए रथ में भगवान जगन्नाथ के साथ बहन सुभद्रा और बलदाऊ की प्रतिमाएं स्थापित की जाती हैं। इसके बाद पूजन, आरती और प्रसाद लगाया गया और शंखनाद के साथ रथयात्रा होती है। बैंडबाजे के साथ रथयात्रा तमराई मुहल्ला से गोवर्धन टाकीज के पास से कोतवाली रोड होते हुए महल परिसर में पहुंचती है।
सागर नगर में रथयात्रा की एक अलग ही रौनक रहती है। यहां छोटे-बड़े अनके मंदिरों से रथयात्राएं निकाली जाती हैं। रथयात्रा के अवसर पर विशेषरूप से नगर कें बड़ा बाजार, चमेली चौक स्थित मंदिरों एवं गोपालगंज स्थित वृंदावन बाग से भगवान जगन्नाथ की अलग-अलग रथयात्राएं निकाली जाती हैं। बड़ा बाजार स्थित श्रीरामबाग मंदिर की रथयात्रा आरम्भ होती है जो मोतीनगर, विजय टॉकीज आदि मुख्य मार्गों से होती हुए मंदिर पर समाप्त होती है। मंदिर में भगवान जगन्नाथ स्वामी विराजमान हैं। मंदिर का नाम भी पहले श्री जगन्नाथ रामबाग मंदिर था। इस अवसर पर शुद्ध घी से बने मालपुओं का भोग लगाया जाता है। बड़ा बाजार स्थित श्रीदेव अटल बिहारी मंदिर से निकलने वाली शोभायात्रा की शुरुआत वर्षों पहले महंत दयालदास महाराज ने की थी। श्रीद्वारकाधीश मंदिर में भगवान बाल स्वरूप में विराजमान हैं, इसलिए उन्हें बाहर नहीं निकाला जाता है। भगवान को मंदिर में ही रथ पर बैठाकर भ्रमण कराया जाता है। इसी प्रकार राधावल्लभ मंदिर, बांके बिहारी मंदिर, जगन बल्देव मंदिर चकराघाट में भी मंदिर के अंदर ही भगवान को रथ में घुमाया जाता है। बड़ा बाजार स्थित साहू समाज मंदिर से भी रथयात्रा निकाली जाती है। इसी प्रकार गेंडाजी मंदिर बड़ा बाजार, कुंजीलाल जगन्नाथ स्वामी मंदिर लक्ष्मीपुरा, बांके बिहारी मंदिर चमेली चौक से भी रथ यात्रा निकलती है।
सागर की गढाकोटा तहसील में परंपरागत तरीके से निकाली जाने वाली जगदीश स्वामी की रथ यात्रा जगदीश मंदिर पटेरिया से हर्षोल्लास के साथ निकाली जाती है जो बाजार वार्ड स्थित मालगुजार परिवार के जनकपुरी मंदिर तक पहुंचती है। इस दौरान ढोल, मंजीरा, झांझर आदि के साथ लोग भजनों के स्वर गूंजने लगते हैं। रहली में पहली यात्रा महावीर चौक स्थित जगदीश स्वामी मंदिर से निकाली जाती है और दूसरी रथ यात्रा बजरिया स्थित देवलिया मंदिर से निकलती है। वहीं रहली में गहोई वैश्य समाज द्वारा रथयात्रा का आयोजन किया जाता है जिसमें सभी वर्गों एवं धर्मों के लोग शामिल होते हैं। राहतगढ़ और सिहोरा में भी रथयात्राएं सोल्लास निकाली जाती हैं।
झांसी में रथयात्रा उत्सव समिति द्वारा यात्रा का भव्य आयोजन किया जाता है जिसमें हजारों श्रद्धालु सम्मिलित होते हैं। ललितपुर में लगभग 25-26 साल पहले छोटे से तांगे पर भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा निकाली गई थी। किन्तु अब हजारों लोग इसमें शामिल होते हैं। जैसा कि जगन्नाथपुरी में सोने की झाड़ू से जगन्नाथ रथयात्रा के रास्ते को साफ किया जाता है। उसी तरह ललितपुर में चांदी की झाडू से मार्ग को साफ किया जाता है।
रथयात्रा एक ऐसा पर्व है जिसे समूचा बुंदेलखंड ठीक उसी प्रकार से मानता है जैसाकि ओडीशा के पुरी में में मनाया जाता है। वैसी ही अर्द्धनिर्मित मूर्तियां, वैसे ही रथ और ठीक वैसे ही रथ को अपने हाथों से खींचने का उत्साह। रथयात्रा का यही मर्म है कि सामूहिक रूप से किए गए श्रम से बड़े से बड़े कार्य भी सुगमतापूर्वक सम्पादित किए जा सकते हैं। साथ ही इस रथयात्रा में यह संदेश भी निहित होता है कि अनेक प्रकार की मशीनी ताकतों पर आश्रित रहने के बजाए मानव को अपनी स्वयं की शक्ति पर विश्वास रखना चाहिए। बुंदेलखंड ने रथयात्रा की गौरवशाली परम्परा सदियों से चली आ रही है और यह भविष्य में भी इसी प्रकार सतत जारी रहेगी।
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(दैनिक ‘सागर दिनकर’, 03.07.2019)
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Thursday, May 16, 2019

चर्चा प्लस ... भावनाओं और कर्त्तव्यों की ब्रांडिंग के समय में हम - डॉ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
चर्चा प्लस ... 

भावनाओं और कर्त्तव्यों की ब्रांडिंग के समय में हम 
 - डॉ. शरद सिंह
 

यदि राज्य एक ब्रांड है, बेटी बचाओ एक ब्रांड है, स्वच्छता मिशन एक ब्रांड है, शौचालय का उपयोग एक ब्रांड है, निर्मलजल एक ब्रांड है और अतुल्य भारत अभियान एक ब्रांड है तो हम अपने युवाओं से राष्ट्रप्रेम की आशा रखें अथवा बाज़ारवाद की? हमने अपने सुरक्षा बलों को भी ब्रांड बना दिया और उनके लिए ब्रांड एम्बेसडर भी अनुबंधित कर लिए गए। जैसे- सीआरपीएफ की ब्रांड एम्बेसडर है पी. वी. सिन्धु तो बीएसएफ के ब्रांड एम्बेसडर है विराट कोहली। यदि राष्ट्र और मानवता के प्रति भावनाएं एवं कर्त्तव्य भी ब्रांड बन कर प्रचारित होने का समय हमने ओढ़ लिया है जो भारतीय विचार संस्कृति के मानक पर यह ब्रांडिंग कहां सही बैठती है, यह विचारणीय है। 
 
Charcha Plus Column of Dr (Miss) Sharad Singh in Sagar Dinkar Daily News Paper चर्चा प्लस ... भावनाओं और कर्त्तव्यों की ब्रांडिंग के समय में हम - डॉ. शरद सिंह

     हम आज ब्रांडिग के समय में जी रहे हैं। हमारे शौच की व्यवस्था से ले कर राज्य, कर्त्तव्य और संवेदनाओं की भी ब्रांंडग होने लगी है। ब्रांड क्या है? ब्रांड उत्पाद वस्तु की बाजार में एक विशेष पहचान होती है जो उत्पाद की क्वालिटी को सुनिश्चित करती है, उसके प्रति उपभोक्ताओं में विश्वास पैदा करती है। क्यों कि उत्पाद की बिक्री की दशा ही उत्पादक कंपनी के नफे-नुकसान की निर्णायक बनती है। कंपनियां अपने ब्रांड को बेचने के लिए और अपने ब्रांड के प्रति ध्यान आकर्षित करने के लिए ‘ब्रांड एम्बेसडर’ अनुबंधित करती हैं। यह एक पूर्णरुपेण बाज़ारवादी आर्थिक प्रक्रिया है। कमाल की बात यह है कि ब्रांडिग हमारे जीवन में गहराई तक जड़ें जमाता जा रहा है। इसी लिए नागरिक कर्त्तव्यों, संवेदनाओं एवं दायित्वों की भी ब्रांडिंग की जाने लगी है, गोया ये सब भी उत्पाद वस्तु हों।
आजकल राज्यों के भी ब्रांड एम्बेसडर होते हैं। जबकि राज्य एक ऐसा भू भाग होता है जहां भाषा एवं संस्कृति के आधार पर नागरिकों का समूह निवास करता है। - यह एक अत्यंत सीधी-सादी परिभाषा है। यूं तो राजनीतिशास्त्रियों ने एवं समाजवेत्ताओं ने राज्य की अपने-अपने ढंग से अलग-अलग परिभाषाएं दी है। ये परिभाषाएं विभिन्न सिद्धांतों पर आधारित हैं। राज्य उस संगठित इकाई को कहते हैं जो एक शासन के अधीन हो। राज्य संप्रभुतासम्पन्न हो सकते हैं। जैसे भारत के प्रदेशों को ’राज्य’ कहते हैं। इस सिद्धांत के अनुसार राज्य की उत्पत्ति का एकमात्र कारण शक्ति है। इसके अलावा युद्ध को राज्य की उत्पत्ति का कारण यह सिद्धांत मानता है जैसा कि वाल्टेयर ने कहा है प्रथम राजा एक भाग्यशाली योद्धा था। इस सिद्धांत के अनुसार शक्ति राज्य की उत्पत्ति का एकमात्र आधार है शक्ति का आशय भौतिक और सैनिक शक्ति से है। प्रभुत्व की लालसा और आक्रमकता मानव स्वभाव का अनिवार्य घटक है। प्रत्येक राज्य में अल्पसंख्यक शक्तिशाली शासन करते हैं और बहुसंख्यक शक्तिहीन अनुकरण करते हैं। वर्तमान राज्यों का अस्तित्व शक्ति पर ही केंद्रित है।
राज्य को परिभाषित करते सामाजिक समझौता सिद्धांत को मानने वालों में थॉमस हाब्स, जॉन लॉक, जीन जैक, रूसो आदि का प्रमुख योगदान रहा। इन विचारकों के अनुसार आदिम अवस्था को छोड़कर नागरिकों ने विभिन्न समझौते किए और समझौतों के परिणाम स्वरुप राज्य की उत्पत्ति हुई। वहीं विकासवादी सिद्धांत मनोवैज्ञानिक, ऐतिहासिक और समाजशास्त्रीय प्रमाणों पर आधारित है। इसके अनुसार राज्य न कृत्रिम संस्था है, न ही देवीय संस्था है। यह सामाजिक जीवन का धीरे-धीरे किया गया विकास है इसके अनुसार राज्य के विकास में कई तत्व जैसे कि रक्त संबंध धर्म शक्ति राजनीतिक चेतना आर्थिक आधार का योगदान है पर आज सबके हित साधन के रूप में विकसित हुआ। ऐसा राज्य क्या कोई उत्पाद वस्तु हो सकता है? जिसके विकास के लिए ब्रांडिंग की जाए?

शौचालय, और स्वच्छता की ब्राडिंग किया जाना और इसके लिए ब्रांड एम्बेसडर्स को अनुबंधित किया जाना बाजारवाद का ही एक नया रूप है। बाज़ारवाद वह मत या विचारधारा है जिसमें जीवन से संबंधित हर वस्तु का मूल्यांकन केवल व्यक्तिगत लाभ या मुनाफ़े की दृष्टि से ही किया जाता है, मुनाफ़ा केंद्रित तंत्र को स्थापित करने वाली विचारधारा, हर वस्तु या विचार को उत्पाद समझकर बिकाऊ बना देने की विचारधारा। बाजारवाद में व्यक्ति उपभोक्ता बनकर रह जाता है, पैसे के लिए पागल बन बैठता है, बाजारवाद समाज को भी नियंत्रण में कर लेता है, सामाजिक मूल्य टूट जाते हैं। बाजारवाद एक सांस्कृतिक पैकेज होता है। जो उपभोक्ता टॉयलेट पेपर इस्तेमाल करता है, वह एयर कंडीशनर में ही सोना पसन्द करता है, एसी कोच में यात्रा करता है और बोतलबंद पानी साथ लेकर चलता है। इस संस्कृति के चलते लौह उत्खनन से लेकर बिजली, कांच और ट्रांसपोर्ट की जरूरत पड़ती है। यूरोप और अमेरिका में लाखों लोग केवल टॉयलेट पेपर के उद्योग में रोजगार पाते हैं। यह सच है कि बाजारवाद परंपरागत सामाजिक मूल्यों को भी तोड़ता है।


जीवनस्तर में परिवर्तन एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। प्रत्येक व्यक्ति भौतिक सुखों के पीछे भागता है। उसकी इसी प्रवृत्ति को बाज़ार अपना हथियार बनाता है। यदि बाजार का स्वच्छता से नुकसान हो रहा है तो वह स्वच्छता को क्यों बढ़ने देगा? पीने का पानी गंदा मिलेगा तो इंसान वाटर प्यूरी फायर लेगा, हवा प्रदूषित मिलेगी तो वह एयर प्यूरी फायर लेगा। इस तरह प्यूरी फायर्स का बाज़ार फलेगा-फूलेगा। इस बाजार में बेशक नौकरियां भी मिलेंगी लेकिन बदले में प्रदूषित वातावरण बना रहेगा और सेहत पर निरंतर चोट करता रहेगा तो इसका खामियाजा भी तो हमें ही भुगतना होगा।

स्वच्छता बनाए रखना एक नागरिक कर्त्तव्य है और एक इंसानी पहचान है। यदि इसके लिए भी ब्रांडिंग की जरूरत पड़े तो वह कर्त्तव्य या पहचान कहां रह जाता है? वह तो एक उत्पाद वस्तु है और जिसके पास धन है वह उसे प्राप्त कर सकता है, जिसके पास धन की कमी है वह स्वच्छता मिशन के बड़े-बड़े होर्डिंग्स के नीचे भी सोने-बैठने की जगह हासिल नहीं कर पाता है। 

भ्रूण हत्या एवं बेटी बचाओ का सीधा संबंध हमारी मानवीयता एवं संवेदनशीलता से है। यह भावना हमारे भीतर स्वतः जागनी चाहिए अथवा सरकार जो इन अभियानों की दिशा में प्रोत्साहनकारी कार्य करती है उन्हें संचालित होते रहना चाहिए। जब बात आती है इन विषयों के ब्रांड एम्बेसडर्स की तो फिर प्रश्न उठता है कि क्या बेटियां उपभोक्ता उत्पाद वस्तु हैं या फिर भ्रूण की सुरक्षा के प्रति हमारी संवेदनाएं महज विज्ञापन हैं। आज जो देश में आए दिन आपराधिक घटनाएं बढ़ रही हैं तथा संवेदना का स्तर निरंतर गिरता जा रहा है, उसका सबसे बड़ा कारण यही है कि जाने-अनजाने हमारी तमाम कोमल संवेदनाएं बाजार के हाथों गिरवी होती जा रही हैं।
बात उत्पादन की बिक्री की हो तो उचित है किन्तु बाजार से हो कर गुजरने वाले कर्त्तव्यों में दिखावा अधिक होगा और सच्चाई कम। ब्रांड एम्बेसडर अनुबंधित करने के पीछे यही धारणा काम करती है कि जितना बड़ा अभिनेता या लोकप्रिय ब्रांड एम्बेसडर होगा उतना ही कम्पनी को आय कमाने में मदद मिलती है क्योंकि लोग वो सामान खरीदते है। अमूमन जितना बड़ा ब्रांड होता है उतना ही महंगा या उतना ही लोकप्रिय व्यक्ति ब्रांड एम्बेसडर बनाया जाता है क्योंकि बड़ा ब्रांड अधिक पैसे दे सकता है जबकि छोटा ब्रांड कम और ऐसा इसलिए क्योंकि कोई भी व्यक्ति जो ब्रांड का प्रतिनिधित्व करता है, उसकी फीस करोड़ों में होती है। एक तो अगर जनता उस व्यक्ति को अगर रोल मॉडल मानती है तो ऐसे में लोगो के दिलों में जगह बनाना आसान हो जाता है। 


सड़क सुरक्षा अभियान के ब्रांड एम्बेसडर है अक्षय कुमार, फिट इंडिया अभियान के ब्रांड एम्बेसडर है सोनू सूद, पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास के ब्रांड एम्बेसडर है एम, सी, मैरीकॉम, असम राज्य के ब्रांड एम्बेसडर है हिमा दास, अरुणाचल प्रदेश राज्य के ब्रांड एम्बेसडर है जॉन अब्राहम, हरियाणा (योग और आयुर्वेद) के ब्रांड एम्बेसडर है, बाबा रामदेव, तेलंगाना राज्य के ब्रांड एम्बेसडर है सानिया मिर्जा और महेश बाबू। इसी प्रकार सिक्किम राज्य के ब्रांड एम्बेसडर है ए. आर. रहमान, गुड्स एण्ड सर्विस टैक्स (जीएसटी) के ब्रांड एम्बेसडर है अमिताभ बच्चन, हरियाणा के स्वास्थ्य कार्यक्रम के ब्रांड एम्बेसडर है गौरी शोरान, स्वच्छ आदत, स्वच्छ भारत के ब्रांड एम्बेसडर है काजोल, स्वच्छ आंध्र मिशन के ब्रांड एम्बेसडर है पी. वी. सिंधु, स्वच्छ भारत मिशन की ब्रांड एम्बेसडर है शिल्पा शेट्टी, स्वच्छ भारत मिशन उत्तर प्रदेश एवं उत्तराखंड के ब्रांड एम्बेसडर है अक्षय कुमार, भारतीय वन्यजीव ट्रस्ट (वाइल्ड लाइफ ट्रस्ट) की ब्रांड एम्बेसडर है दीया मिर्जा, असम राज्य पर्यटन की ब्रांड एम्बेसडर है प्रियंका चोपड़ा, स्किल इंडिया अभियान की भी ब्रांड एम्बेसडर है प्रियंका चोपड़ा, ‘माँ’ अभियान की ब्रांड एम्बेसडर है माधुरी दीक्षित, हेपेटाइटिस-बी उन्मूलन के ब्रांड एम्बेसडर है अमिताभ बच्चन, अतुल्य भारत अभियान के ब्रांड एम्बेसडर है प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, भारत के पशुपालन बोर्ड के ब्रांड एम्बेसडर है अभिनेता रजनीकांत, किसान चैनल के ब्रांड एम्बेसडर है अमिताभ बच्चन, स्वच्छ साथी कार्यक्रम की ब्रांड एम्बेसडर है दीया मिर्जा, निर्मल भारत अभियान की ब्रांड एम्बेसडर है विद्या बालन, डिजिटल भारत की ब्रांड एम्बेसडर है कृति तिवारी, उत्तर प्रदेश के समाजवादी किसान बीमा योजना के ब्रांड एम्बेसडर है अभिनेता नवाजुद्दीन सिद्दकी।

ब्रांडिग का क्रम यही थम जाता तो भी गनीमत था। गोया हमने अपने सुरक्षा बलों को भी ब्रांड बना दिया और उनके लिए ब्रांड एम्बेसडर भी अनुबंधित कर लिए गए। जैसे- सीआरपीएफ की ब्रांड एम्बेसडर है पी. वी. सिन्धु और बीएसएफ के ब्रांड एम्बेसडर है विराट कोहली। यदि हमने सुरक्षा बलों के लिए सिर्फ एम्बेसडर यानी राजदूत रखा होता तो बात थी लेकिन हमने तो ब्रांड एम्बेसडर रखा।

यदि राज्य एक ब्रांड है, बेटी बचाओ एक ब्रांड है, स्वच्छता मिशन एक ब्रांड है, शौचालय का उपयोग एक ब्रांड है, निर्मलजल एक ब्रांड है और अतुल्य भारत अभियान एक ब्रांड है तो हम अपने युवाओं से राष्ट्रप्रेम की आशा रखें अथवा बाज़ारवाद की? यदि राष्ट्र और मानवता के प्रति भावनाएं एवं कर्त्तव्य भी ब्रांड बन कर प्रचारित होने का समय हमने ओढ़ लिया है जो भारतीय विचार संस्कृति के मानक पर यह ब्रांडिंग कहां सही बैठती है, यह विचारणीय है।
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(दैनिक ‘सागर दिनकर’, 15.05.2019)
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Wednesday, April 17, 2019

चर्चा प्लस ... महावीर जयंती (17 अप्रैल) पर विशेष : सदा प्रासंगिक हैं भगवान महावीर के विचार - डॉ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
चर्चा प्लस ...
महावीर जयंती (17 अप्रैल) पर विशेष :                
सदा प्रासंगिक हैं भगवान महावीर के विचार     

 - डॉ. शरद सिंह                                                 .ईसापूर्व छठीं शताब्दी विश्व के इतिहास में बौद्धिक एवं आध्यात्मिक उथल-पुथल का समय माना जाता है। भारत के इतिहास में भी यह बौद्धिक एवं दार्शनिक क्रांति का युग था। इस काल में हमारे देश में भी भगवान महावीर जैसे तत्वज्ञाता हुए। ईश्वर के नाम पर होने वाले अनाचार पर रोक लगाते हुए भगवान महावीर ने आत्म संयम, नैतिकता और सद्कर्म को प्रमुखता दी। भगवान महावीर का कहना था कि ‘मनुष्य की आत्मा में जो कुछ महान है और जो शक्ति और नैतिकता है, वही ईश्वर है।’  
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भगवान महावीर ने कारण और परिणाम दोनों के परस्पर एकात्मता को प्रतिपादित किया। यही एकात्मता है जिसके कारण मूल द्वारा खाद-पानी मिलने पर पौधे का अग्र भाग फूलता-फलता है। इसी प्रकार मूल प्रवृत्तियों एवं मूल कर्म में ‘सद्’ का समावेश जीवन को श्रेष्ठ बनाता है। जैनाचार में कर्म संबंधी पंच-व्रतों के पालन के लिए दो स्तर निर्धारित किए गए हैं-साधु धर्म एवं श्रावक धर्म। साधु धर्म निवृत्ति मूलक है। यह हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील और परिग्रह के सम्पूर्ण त्याग से आरम्भ होता है। श्रावक धर्म गृहस्थ धर्म है। इसमें पांचों पापों का अधिक से अधिक त्याग करने का आग्रह किया जाता है। वस्तुतः गृहस्थ धर्म त्याग और भोग के बीच संतुलित जीवन जीने की पद्धति है। जिसको वर्तमान समय में और भी अधिक अपनाए जाने की आवश्यकता है।
किसी भी धर्म के मूल सिद्धांतों को जानने, समझने और उसके व्यावहारिक रूप को परखने का सबसे अच्छा माध्यम होती हैं, उस धर्म के आधारभूत विचारों एवं सिद्धांतों की जीवन में उपादेयता को दर्शाने वाली कथाएं। व्यक्ति अपनी बाल्यावस्था में जीवन संबंधी जो भी नैतिक शिक्षा ग्रहण करता है उसमें अधिकांश कथाओं के माध्यम से दी जाती हैं। अपने शेष जीवन में भी व्यक्ति अन्य व्यक्तियों के जीवन-अनुभवों की कथाओं से शिक्षा लेता रहता है। अतः जीवन में कथाओं की उपयोगिता निर्विवाद है। वाचिक परम्परा में विशेष रूप से नैतिक तथा जीवनोपयोगी सिद्धांतों की शिक्षा कथाओं द्वारा जितने सहज ढंग से कही और सुनी जाती रही है। इसीलिए मैंने ‘‘श्रेष्ठ जैन कथाएं’’ पुस्तक लिखी जो सन् 2008 में सामयिक प्रकाशन नई दिल्ली से प्रकाशित हुई जिससे मैं जैन धर्म के सिद्धांतों को सरल एवं रोचक स्वरूप में सर्वधर्म पाठकों तक पहुंचा सकूं।
यह मेरा सौभाग्य है कि मुझे अपने अब तक के जीवन में वर्तमानयुग के श्रेष्ठ जैनाचार्यों - श्वेताम्बर सम्प्रदाय के आचार्य तुलसी एवं आचार्य महाप्रज्ञ, दिगम्बर सम्प्रदाय के आचार्य विद्यासागर, मुनि क्षमा सागर, आचार्य देवनन्दी से धर्म-चर्चा करने तथा तत्संबंधी अपनी जिज्ञासाओं को शांत करने का सुअवसर प्राप्त हुआ है। मैंने जैन धर्म के सिद्धांतों को दोनों पंथों के ग्रंथों एवं आचार्यों के उपदेशों द्वारा जितना भी जाना और समझा है उसके  आधार पर मेरा यह दृढ़ विश्वास है कि दिगम्बर और श्वेताम्बर दोनों सम्प्रदायों में कोई सैद्धांतिक अन्तर नहीं है मात्रा व्यावहारिक रूप में ही तनिक भिन्नता है। प्रस्तुत पुस्तक में मैंने जिन कथानकों को प्रस्तुत किया है (जहां तक मुझे ज्ञान है) वे मूलतः जैन सिद्धांतों पर आधारित हैं, किसी सम्प्रदाय विशेष पर नहीं। ईसापूर्व छठीं शताब्दी विश्व के इतिहास में बौद्धिक एवं आध्यात्मिक उथल-पुथल का समय माना जाता है। भारत के इतिहास में भी यह बौद्धिक एवं दार्शनिक क्रांति का युग था। इस काल में हमारे देश में भी भगवान महावीर जैसे तत्वज्ञाता हुए। ईश्वर के नाम पर होने वाले अनाचार पर रोक लगाते हुए भगवान महावीर ने आत्म संयम, नैतिकता और सद्कर्म को प्रमुखता दी। भगवान महावीर का कहना था कि ‘मनुष्य की आत्मा में जो कुछ महान है और जो शक्ति और नैतिकता है, वही ईश्वर है।’
व्यक्तिगत रूप से मुझे जैन धर्म के कर्म सिद्धांत ने सबसे अधिक प्रभावित किया है। धार्मिक ग्रंथों में विद्वानों द्वारा इस सिद्धांत के  अंतर्गत कर्म की विस्तृत व्याख्या की गई है जिसका सार यही है कि मनुष्य अपने जीवन में जो भी दुख अथवा सुख प्राप्त करता है, वह उसके पूर्व में किए गए कर्मों का परिणाम होता है। जिसे हम आम बोलचाल की कहावत में भी कहते हैं कि ‘जो जैसा बोएगा-वैसा काटेगा’। इस पुस्तक में जो कथाएं हैं उनमें इसी तथ्य को रेखांकित करने का प्रयास किया गया है कि मनुष्य के अपने कर्म उसे दुख-सुख का परिणाम देते हैं। सामान्य व्यक्ति इसे ‘भाग्य’ अथवा ‘दुर्भाग्य’ की संज्ञा दे कर संतोष कर लेता है अथवा कुछ व्यक्ति ‘हमारे साथ ही ऐसा क्यों होता है?’ जैसे प्रश्न के भंवर में डूबते-उतराते रहते हैं। जबकि निमित्त-ज्ञानी व्यक्ति अपने निमित्त-ज्ञान से यह जान लेते हैं कि यह किस ‘पाप’ का फल है अथवा किस ‘पुण्य’ का फल है।
जैन सिद्धांतों में कर्म को प्रधान माना गया है। जिसके अनुसार पूर्व भव (जन्म) के कर्म ही इस बात का निर्णय करते हैं कि किस वंश में हमारा जन्म होगा और कैसा हमारा शरीर होगा। कर्म अनेक प्रकार के होते हैं और उनके फल भी विभिन्न प्रकार के होते हैं। कर्मफल के प्रभाव से ही धनी अथवा निर्धन के घर जन्म होता है। जो इस तथ्य को भली-भांति समझ लेता है वह इस जन्म में अच्छे कर्म कर के अपना भविष्य संवार लेता है। क्रोध, माया, मोह, लोभ आदि कषायों के कारण ही आत्मा बंधनों में पड़ती है। मोक्ष के द्वारा ही इन बंधनों से मुक्ति मिलती है अन्यथा बारम्बार जनम ले कर अपने कर्मों के परिणाम भुगतने होते हैं। जैन दर्शन में कर्म को पुद्गल परमाणुओं का पिण्ड माना गया है। जिसके अनुसार यह लोक तेईस प्रकार की पुद्गल वर्गणाओं से परिपूर्ण है। प्रत्येक जीव अपने मन, वचन और काय की प्रवृत्तियों के अनुरूप इन्हें ग्रहण करता है। यह भी तक संभव होता है जब वह कर्म करता है। इस प्रकार कर्म से प्रवृत्ति और प्रवृत्ति से कर्म की परम्परा अनादिकाल से चली आ रही है। कर्म भी दो प्रकार की श्रेणियों के होते हैं-द्रव्य कर्म और भाव कर्म। इनमें राग-द्वेष आदि भाव-कर्म के रूप हैं जो कर्म और उसके परिणाम को प्रभावित करते हैं। जैन कर्म सिद्धांत के अनुसार कर्म की आठ मूल प्रवृत्तियां बताई गई हैं जो मनुष्य के कर्म और उसके परिणामों को अच्छे अथवा बुरे की श्रेणी में निर्धारित करती हैं- ‘ज्ञानावरण, दर्शनावरण, वेदनीय, मोहनीय, आयु, नाम, गोत्र एवं अन्तराय।’ (गोम्मटसार कर्मकाण्ड-1) इनमें ज्ञानावरण, दर्शनावरण,मोहनीय और अन्तराय से आत्मा के गुणों का घात होता है अतः इन्हें घातिया माना गया है। जबकि शेष चार मोहनीय, आयु, नाम तथा गोत्रा से आत्मा को घात नहीं होता है अतः इन्हें अघातिया माने गए हैं। सभी मूल कर्म अपने-अपने स्वाभाव के अनुसार ही फल देते हैं। उनमें परस्पर कोई परिवर्तन नहीं होता है। जैसे ज्ञानावरणी कर्म का फल ज्ञान को कुण्ठित व अवरुद्ध करने का ही मिलेगा किन्तु अन्य शक्तियों के फल को प्रभावित करने का कार्य वह नहीं करता है।
जैन परम्परा में आचार और विचार को समान स्थान दिया गया है। अहिंसा मूलक आचार और अनेकान्त मूलक विचार जैन परम्परा की प्रमुख विशेषता है। अहिंसा जैनाचार का प्राण तत्व है। इसे परब्रह्म और परमधर्म कहा गया है। जैन धर्म में अहिंसा का जितना सूक्ष्म विवेचन और आचरण जैन-परम्परा में मिलता है, उतना किसी अन्य परम्परा में नहीं। प्रत्येक आत्मा चाहे वह सूक्ष्म हो या स्थूल, स्थावर हो या त्रास, तात्वि दृष्टि से समान है। सभी जीवों में एक-सी आत्मा का वास होता है। दुखः,सुख का अनुभव प्रत्येक प्राणी को होता है। जैनाचार में अहिंसा का पालन करने के लिए अहिंसा सहित पंचसूत्रीय आचार निर्धारित किए गए हैं-सत्य, अहिंसा, अचौर्य, ब्रह्मचर्य एवं अपरिग्रह। तद्नुसार हिंसा नहीं करनी चाहिए, झूठ नहीं बोलना चाहिए, चोरी नहीं करनी चाहिए, कुशील नहीं करना चाहिए तथा परिग्रह का संचय नहीं करना चाहिए। जैनाचार के अनुसार मनुष्य के आचरण का परिष्कार निषेधात्मक नियमों से ही किया जा सकता है। पंचसूत्रीय आचार में निषेध किए गए कार्य वस्तुतः सामाजिक-पाप माने जा सकते हैं। जो व्यक्ति इनका परित्याग करता है वह समाज का हितैषी एवं सभ्य माना जाता है।
वर्तमान में आतंकवाद, जातिवाद, लिंगभेद, रंगभेद आदि जो कलुष मनुष्यों के बीच व्याप्त है वह संयम और सद्भाव से ही दूर हो सकते हैं। आज के युग में, मनुष्य को सबसे अधिक आवश्यकता है, महावीरजी के अपरिग्रह के सिद्वान्त को समझने की। संग्रह अशांति का अग्रदूत है, विनाश, विषमता तथा अनेक समस्याओं को जन्म देता है। महावीरजी का अपरिगृह का विचार ही, इसकी संजीवनी है जो अमीर गरीब की दूरी कम कर सामाजिक समता स्थापित कर सकती है। भगवान महावीर के उपदेशों में, यदि अचैर्य के सिद्वान्त का अनुकरण किया जाय तो, आज विश्व में व्याप्त भ्रष्ट्राचार व कालेधन पर अंकुश लगाया जा सकता है। भगवान महावीर ने स्त्री वर्ग के लिए भी उदारता के विचार व्यक्त किए जिसमें उन्होंने स्त्रियों को पूर्णतः स्वतंत्र और स्वावलम्बी बताया। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में स्त्रियों के समान अधिकार एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता हेतु भगवान महावीर के विचार आज भी सार्थक हैं। भगवान महावीर ने तन-मन की शुद्धि तथा आत्म बल बढ़ाने हेतु, साधना एवं तपश्चर्या पर बल दिया। आज के भौतिकवादी युग में जहां खानपान की अशुद्धता एवं अनियमितता है, और जीवन तनावयुक्त है, ऐसे में भगवान महावीर द्वारा बताई तप, त्याग एवं साधनामय जीवन-शैली ही समस्याओं का समाधान है।
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(दैनिक ‘सागर दिनकर’, 10.04.2018)
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Sunday, January 6, 2019

डॉ शरद सिंह की नई किताब "थर्ड जेंडर विमर्श" पर दैनिक "सागर दिनकर" में ...

About 'Third Gender Vimarsh' - Book of Dr Sharad Singh in 'Sagar Dinkar' Daily News Paper, Sagar Edition, 06.01.2019
बहुत अच्छा लगता है जब अपनी नई किताब को ढेर सारा अपनत्व मिले और लोग उसके प्रति जिज्ञासु हों ... आज 'सागर दिनकर' में प्रकाशित है मेरी नई किताब "थर्ड जेंडर विमर्श" पर एक समाचार...( 06.01.2019)