Showing posts with label पत्र. Show all posts
Showing posts with label पत्र. Show all posts

Wednesday, July 23, 2025

चर्चा प्लस | डाॅ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने गर्वनर सर जाॅन हरवर्ट को लिखा था करारा पत्र | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर

चर्चा प्लस           
डाॅ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने गर्वनर सर जाॅन हरवर्ट को लिखा था करारा पत्र
 - डाॅ (सुश्री) शरद सिंह                                                                 
     देश स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए संघर्षरत था। अंग्रेजों को भी समझ में आता जा रहा था कि अब उन्हें भारत से जाना होगा किन्तु शासक कभी स्वयं को भयभीत या डरा हुआ प्रकट नहीं करता है। 1947 के पूर्व अंग्रेज सरकार इतनी सक्षम थी कि वह उनका विरोध करने वाले किसी भी व्यक्ति केा बेझिझक दण्डित कर सकती थी। किन्तु उस दौर में भारतीय राजनीति में भी वह नेता थे जो अन्याय अथवा अनुचित के विरुद्ध झुकना नहीं जानते थे। उन्हें अपने परिणाम की चिन्ता नहीं थी। उन्हें चिन्ता थी तो देश और देशवासियों की। इसका सबूत दिया डाॅ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने सर जान हरवर्ट को करारा पत्र लिख कर।
जिस समय श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने प्रजा कृषक पार्टी में सम्मिलित हो कर उन्हें अपना समर्थन दिया उस समय द्वितीय विश्वयुद्ध छिड़ चुका था और बंगाल पर जापानी आक्रमण का खतरा मंडराने लगा था। जबकि ब्रिटिश सरकार बंगाल की सुरक्षा की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठा रही थी। यदि बंगाल जापान के कब्जे में आ जाता तो भारत के अन्य भागों में उसे अधिकार करने में देर नहीं लगती। यदि जापान बंगाल पर अधिकार नहीं कर पाता तब भी अपार जनहानि सुनिश्चित थी। इन दोनों परिस्थितियों से बचने के लिए आवश्यक था कि बंगाल में एक सेना गठित की जाए जो हर परिस्थिति में जापानी सेना को सीमा पर ही रोक दे। 
बंगाल के प्रशासन की ओर से सुरक्षा व्यवस्था की अनदेखी किए जाने पर श्यामा प्रसाद मुखर्जी चिन्तित हो उठे। पहले उन्होंने विभिन्न माध्यमों से इस मुद्दे को उठाया किन्तु अंग्रेज सरकार द्वारा ध्यान नहीं दिए जाने पर उन्होंने बंगाल के गर्वनर सर जाॅन हरवर्ट को एक पत्र लिखा जिसमें उन्होंने बंगाल में सेना का गठन किए जाने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने बिना किसी संकोच के ‘‘नौकरशाही तथा प्रशासन के हानिप्रद स्वरूप’’ का भी अपने पत्र में स्पष्ट उल्लेख किया तथा इस बात का भी संकेत दिया कि अब अंग्रेजी शासन के आधीन भारत की यात्र अपने अंतिम पड़ाव पर है। इतना सब लिखना किसी जोखिम से कम नहीं था। किन्तु डाॅ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी डरना तो जानते ही नहीं थे।
डाॅ. मुखर्जी ने जो पत्र सर जाॅन हरवर्ट को लिखा उसका मुख्य अंश इस प्रकार था -‘‘आप गवर्नर जनरल से कहें कि इतना विलम्ब होने पर भी इंग्लैण्ड और भारत में तत्काल समझौता हो जाना चाहिए जिससे भारतीय यह अनुभव कर सकें कि यह सचमुच जनता का युद्ध है और यदि हमें इस युद्ध में विजय प्राप्त करनी है तो अविलम्ब ही एक प्रतिनिधि राष्ट्रीय सरकार बनानी चाहिए जो भारत के हितों की दृष्टि से भारतीय प्रतिरक्षा की नीतियों का अधिकारपूर्वक संचालन करे। चीनी जनता को अंतिम सांस तक शत्रु से टक्कर लेने की प्रेरणा चीनी सेनानायक च्यांग काई शेक ही दे सकते हैं और आपके देशबंधु चर्चिल संकट की स्थिति में शंखनाद कर आप लोगों का आह्वान कर सकते हैं। किन्तु यहां इसके ठीक विपरीत वास्तविक शक्ति उस लापरवाह शासन के हाथों में है जिसे हम अपने देशहित के लिए हटाना आवश्यक समझते हुए भी हटा नहीं सकते।
मैं आपके सम्मुख कई बार यह प्रस्ताव रख चुका हूं कि हमें बंगाल की रक्षा के लिए गृहसेना के निर्माण का अधिकार मिलना चाहिए। संकटपूर्ण परिस्थिति में भी बंगाल में गृहसेना के निर्माण में आपको यह आपत्ति थी कि यह भारतीय सैन्य-नीति के सर्वथा प्रतिकूल है। मेरा उत्तर है कि नीति में भारत का हित ही सबसे ऊपर होना चाहिए। नीति निर्धारण में भारत के हितों को ही प्रमुख आधार बनने दीजिए और भारतवासियों को स्वयं सोचने दीजिए कि जिस संकट में आपने उन्हें झोंक दिया है वे उससे कैसे बचें।
व्यावहारिक दृष्टि से इसमें कई अड़चनें आएगीं, जैसा कि मैं पूर्व में भी निवेदन कर चुका हूं। फिर भी मेरी आपसे और आपके द्वारा वायसराय से यह प्रार्थना है कि इस नौकरशाही तथा प्रशासन के हानिप्रद स्वरूप का मोह त्याग दें। आपसे कई बार निवेदन कर चुका हूं कि ऐसे कई भारतीय हैं जो नहीं चाहते हैं कि यहां ब्रिटिश शासन सदा बना रहे, किन्तु भारत कोई भी सहृदय शुभचिन्तक नहीं चाहेगा कि भारत जापान के अधीनस्थ हो कर विदेशी परतंत्रता का नया इतिहास आरम्भ करे।  इंग्लैण्ड से जहां तक हमारे संबंधों का प्रश्न है, हम यात्र के अंतिम पड़ाव तक पहुंच सके हैं और अब यह समझने की आवश्यकता है कि भारत के सपूत ही उसके भाग्यनिर्मता होंगे। इस तथ्यात्मक वास्तविकता पर आधारित उदार राजनीति अपेक्षित है।’’
श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने अपने इस पत्र के माध्यम से बंगाल के गवर्नर को ही नहीं वरन भारत स्थित ब्रिटिश सरकार को भी इस सच्चाई से अवगत कराने का प्रयास किया कि भारत पर ब्रिटेन का आधिपत्य अपने अंतिम चरण में चल रहा है, वह अधिक समय तक भारत को अपने आधीन नहीं रख सकेगा। अतः भारतीयों को सौहाद्र्य एवं सुरक्षा भरा प्रशासन उपलब्ध कराया जाना चाहिए। अन्यथा जापान के आक्रमण के संकट से निपटना दुरूह हो जाएगा। 
दूसरी ओर श्यामा प्रसाद मुखर्जी यह आकलन कर चुके थे कि भारत पर ब्रिटिश आधिपत्य अधिक दिन तक नहीं रह सकेगा, ऐसे में यदि देश एक नए आक्रमणकारी के आधीन हो जाएगा तो डेढ़ शताब्दी से भी अधिक समय से किए जा रहे स्वतंत्रता प्राप्ति के प्रयासों पर पानी फिर जाएगा।
बंगाल के गर्वनर सर जाॅन हरवर्ट को लिखे अपने इस पत्र में श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने गवर्नर जनरल का ध्यान आकृिष्ट करते हुए लिखा कि -
‘‘विश्व में हो रहे परिवर्तनकारी उथल-पुथल को ध्यान में रखते हुए वे भारतीय स्थिति की वास्तविकता को परखें तथा उचित निर्णय लें।’’ 
अपने इसी पत्र में श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने भारत-इंग्लैण्ड के मध्य समझौते के लिए कुछ आवश्यक सुझाव दिए जो कि इस प्रकार थे -
1. ब्रिटिश सरकार इस बात की घोषणा करे कि भारत की  स्वतंत्रता को औपचारिक रूप से मान्यता दे दी गई है।
2. वाइसराय या ब्रिटिश सरकार के किसी भी अन्य प्रतिनिधि को यह अधिकार दिया जाएगा कि वह भारत के राजनीतिक दलों से भारत की राष्ट्रीय सरकार के निर्माण के विषय में, जिसे सत्ता हस्तांतरित होगी, बातचीत करे।
3. इंडियन नेशनल कांग्रेस पूरी शक्ति से जर्मन एवं जापान गुट से युद्ध करने की घोषणा करेगी। 
4. भारत के प्रतिनिधित्व में भारत की युद्धनीति ‘एलाईड वार कौंसिल’ द्वारा निर्धारित होगी।
5. एलाईड वार कौंसिल द्वारा निर्धारित युद्धनीति का पालन भारत की ओर से कमांडर-इन-चीफ के हाथों में होगा।
6. राष्ट्रीय सरकार का स्वरूप बहुदलीय सरकार का होगा जिसमें देश के सभी प्रमुख राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि होंगे। यही स्वरूप प्रांतों द्वारा भी अपनाया जाएगा।
7. जो लोग देश की नीतियों में प्रभावी रूप से सहायक हो सकते हैं तथा जो युद्धकाल में विशेष सहायक हो सकते हैं, उन्हें भी केन्द्रीय एवं प्रांतीय मंत्रीमंडलों में सदस्यता दी जाएगी।
8. राष्ट्रीय सरकार देश के आर्थिक उत्थान एवं विकास पर विशेष ध्यान देगी जिससे युद्धकाल में आर्थिक सहायता में किसी भी प्रकार की कोई कमी न हो।
9. ‘इंडिया आॅफिस’ को अनुपयोगी मानते हुए बंद कर दिया जाएगा।
10. भारतीय राष्ट्रीय सरकार भविष्य में एक ‘कांस्टीट्यूएंट एसेम्बली’ का गठन करेगी जिसके अंतर्गत भविष्य में संविधान का निर्माण हो सकेगा। इसी तारतम्य में भारत तथा ब्रिटेन के मध्य एक संधि होगी अल्पमत दलों के अधिकारों के संबंध में भी विशेष धाराएं होंगी।किसी भी अल्पमत दल को यह अधिकार होगा कि वह अपने न्यायोचित अधिकारों की रक्षा के लिए भावी संविधान संबंधी अपने विकल्प को वैचारिक मध्यस्थता के लिए पटल पर रख सके। पटल पर रखने के बाद विचार किए जाने पर निए गए निर्णयों को राष्ट्रीय सरकार तथा संबंधित अल्पमत दल को स्वीकार करना होगा।
श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने अपने इन सुझावों के साथ ही पत्र में लिखा कि -
‘‘ब्रिटिश क्राउन के प्रतिनिधि के रूप में आपको यह अधिकार होना चाहिए कि आप भारतीय समस्याओं पर ब्रिटिश सरकार के निश्चित आदेश के अनुसार कार्य कर सकें। इस विषय पर अन्य सुझाव भी रखे जा सकते हैं। मुख्य बात तो यह है कि ब्रिटिश सरकार को इस विषय पर चर्चा करने से पूर्व इस बात को स्वीकार कर लेना चाहिए कि अब उसे सत्ता का हस्तांतरण करना है।
मैं बंगाल के गवर्नर को ब्रिटिश सरकार तथा उसके प्रतिनिधियों द्वारा संकटकाल में अपनाई गई नीतियों के प्रति अपनी असहमति दे चुका हूं। मैं आपसे इस आशा से प्रार्थना कर रहा हूं आप झूठी प्रतिष्ठा के भ्रम में न पड़ते हुए इस गतिरोध को दूर करने हेतु आवश्यक कदम उठाएंगे तथा तत्काल कार्यवाही करेंगे। यदि आपका यह विचार हो कि ब्रिटिश सरकार को इस गतिरोध की सर्वथा उपेक्षा कर निष्क्रिय बने रहना चाहिए तो मुझे खेदपूर्वक अपने गवर्नर से कहना पड़ेगा कि वे मुझे मंत्रीपद के कार्यभार से मुक्त करें जिससे मैं स्वतंत्रतापूर्वक समझौते की मांग के प्रति आम जनता में जागृति ला सकूं।’’  
डाॅ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का उपरोक्त पत्र अंग्रेज सरकार के मुंह पर तमाचा के समान थी किन्तु उस समय नौकरशाही इतनी चरम पर थी कि उनके इस कठोर पत्र पर भी गवर्नर या वायसराय ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। अंग्रेज सरकार न तो उनके पत्र पर अपनी सहमति देने का साहस जुटा पाई और न उन्हें दण्डित करने का। इससे डाॅ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के समक्ष यह खुलेतौर पर स्पष्ट हो गया था कि अब अंग्रेजी शासन की बागडोर सम्हाले जो आका बैठे हैं उन्हें मात्र ‘‘निज चिन्ता’’ है, यही समय है जब बड़े और कड़े कदम उठाए जाएं और अंग्रेजों को वापसी का रास्ता दिखा दिया जाए। डाॅ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी जैसे नेताओं ने ही देश की झोली में स्वतंत्रता का उपहार डालने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस पत्र पर भले ही प्रतिक्रिया नहीं हुई किन्तु इसने साबित कर दिया कि राजनीति भी साहसियों को सलाम करती है, कायरों को नहीं। एक साहसी राजनीतिज्ञ ही युग निर्माता बनता है।
-----------------------
(दैनिक, सागर दिनकर में 23.07.2025 को प्रकाशित)  
------------------------
#DrMissSharadSingh #चर्चाप्लस  #सागरदिनकर #charchaplus  #sagardinkar #डॉसुश्रीशरदसिंह  #श्यामाप्रसादमुखर्जी  #ShyamaPrasadMukherjee

Wednesday, August 28, 2024

चर्चा प्लस | देश-विभाजन के विरोध में जब श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने गांधी जी को पत्र लिखा | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर

चर्चा प्लस  
देश-विभाजन के विरोध में जब श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने गांधी जी को पत्र लिखा 
- डाॅ (सुश्री) शरद सिंह                                                                          
           यह माना जाता है कि महात्मा गांधी देश के विभाजन के पक्ष में थे किन्तु वस्तुतः वे आरंभ में विभाजन के पक्ष में नहीं थे। वहीं श्यामा प्रसाद मुखर्जी आरंभ से अंत तक देश के विभाजन का विरोध करते रहे। विभाजन के विरोध में उन्होंने महात्मा गांधी को एक पत्र भी लिखा था जिसमें उन्होंने विभाजन के विचारों पर रोक लगाने के लिए ठोस तर्क भी दिए थे। इस महत्वपूर्ण पत्र ने महात्मा गांधी को भी विभाजन के विरोध में सहमत कर दिया था। क्या थे वे तर्क?     
        श्यामा प्रसाद मुखर्जी तत्कालीन राजनीतिक वातावरण से बहुत चिन्तित थे। अंग्रेज ‘फूट डालो और राज करो’ की अपनी कुत्सित नीति को अपना कर हिन्दुओं और मुस्लिमों के बीच मतभेद बढ़ाती जा रही थी। यह ऐसा समय था जब दोनों पक्षों को धैर्य वं विवेक से काम लेना चाहिए था किन्तु मुस्लिम लीग मुस्लिम राष्ट्र की संकल्पना को ले कर अपनी गतिविधियां बढ़ाता जा रहा था। जिससे वातावरण में कटुता बढ़ती जा रही थी। श्यामा प्रसाद मुखर्जी स्वयं हिन्दू समर्थक थे किन्तु वे वैचारिक दृष्टि से अतिवादी नहीं थे। वे शांति एवं एकता के पक्षधर थे। 
सन् 1940 में लाहौर में हिन्दू महासभा का अधिवेशन होना था। इस सम्मेलन में सभा के अध्यक्ष वीर सावरकर को आना था किन्तु अस्वस्थता के कारण वे सम्मेलन में नहीं आ सके। तब श्यामा प्रसाद मुखर्जी को सभा का कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया तथा सम्मेलन की सफलता का दायित्व भी सौंपा गया जिसे उन्होंने भली-भांति निभाया। आर्य समाज की ओर से 20 से 22 फरवरी सन् 1944 को दिल्ली में आॅल इंडिया आर्यन कांग्रेस का अधिवेशन आयोजित किया गया। इस अधिवेशन का मुख्य उद्देश्य देश के संभावित बंटवारे के विरूद्ध जनमत तैयार करना था। क्योंकि मुस्लिम लीग की हिन्दू विरोधी गतिविधियां बढ़ती जा रही थीं। सिंध प्रांत में मुस्लिम लीग के प्रशासन ने स्वामी दयानन्द सरस्वती की पुस्तक ‘सत्यार्थ प्रकाश’ पर प्रतिबंध लगा दिया था। अधिवेशन की अध्यक्षता के लिए श्यामा प्रसाद मुखर्जी को आमंत्रित किया गया। अपने अध्यक्षीय भाषण में बोलते हुए श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने कहा कि -             ‘‘मनुष्य को कायर बना देने वाली विषाक्त और हीन भावना का मूलोच्छेदन कर लोगों में व्यक्तिगत आत्मसम्मान, देश के प्रति अक्षुण्ण गौरव, दृढ़ वैचारिकता एवं देश की संस्कृति तथा सभ्यता के प्रति अनुराग को जगा कर आर्य समाज ने देश की बड़ी सेवा की है। कोई भी व्यक्ति जो भारत की एकता का विध्वंस करना चाहता है या विभाजन का सक्रिय समर्थन करता है, वह देश द्रोह के सबसे बड़े जुर्म का अपराधी है और उसका किसी भी मूल्य पर सामना करना चाहिए।’’
श्यामा प्रसाद मुखर्जी द्वारा आॅल इंडिया आर्यन कांग्रेस के अधिवेशन के मंच से दिए गए संदेश ने लोगों के मन में उत्साह का संचार किया और लोगों ने देश के बंटवारे के विरुद्ध अपना स्वर तेज कर दिया। क्रिप्स मिशन और देश के बंटवारे के विरोध के कारण मुस्लिम लीग तथा मोहम्मद अली जिन्ना ने भारत को बंाट कर पाकिस्तान बनाए जाने की मांग को धीमा कर दिया। किन्तु तभी श्यामा प्रसाद मुखर्जी को एक बड़ा झटका यह जान कर लगा कि कुछ ही दिन पहले जेल से छूट कर आए महात्मा गंाधी ब्रिटिश सरकार द्वारा सुझाए गए तथा मुस्लिम लीग के हित में तैयार किए गए ‘सी. आर. फार्मूले’ के आधार पर मोहम्मद अली जिन्ना से मिलने का समय तय कर रहे हैं।  श्यामा प्रसाद मुखर्जी को लगा था कि कम से कम महात्मा गांधी ‘सी. आर. फार्मूले’ की सिफारिश नहीं करेंगे। किन्तु अब वे देख रहे थे कि महात्मा गांधी सी. आर. फार्मूले पर मोहम्मद अली जिन्ना से चर्चा करने को तैयार हैं और इससे देश के बंटवारे की दिशा में एक कदम और उठ जाएगा। गंभीरता से सोचने-विचारने के बाद श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने महात्मागांधी को एक पत्र लिखा -
   77, आशुतोष मुखर्जी रोड,
   कलकत्ता,
   19 जुलाई, 1944
   प्रिय महात्मा जी,
पत्रवाहक श्री मनोरंजन चैधरी आपके पास बंगाल की स्थिति के संबंध में कुछ नोट और पर्चे ले कर आ रहे हैं। अगस्त 1942 से राजनीति और खाद्यान्न के प्रश्नों पर बंगाल में जो घटनाएं हुई हैं, ये उन पर प्रकाश डालेंगे। आपके विचारार्थ सभी प्राप्तव्य सामग्री इनके हाथ भेजी जा रही है।
सच तो यह है कि श्री राजगोपालाचारी द्वारा श्री जिन्ना को दिए गए प्रस्ताव से हमें बहुत क्षोभ हुआ हैं हम उचित हिन्दू-मुस्लिम समझौते के लिए बहुत उत्सुक हैं, किन्तु श्री राजगोपालाचारी जो रास्ता अपना रहे हैं उससे लक्ष्य प्राप्ति होगी, हमें विश्वास नहीं। अपने अनुभवों के आधार पर आप भी जानते ही होंगे कि श्री जिन्ना कोई खेल खेलने के इच्छुक नहीं हैं। वे स्वयं को भारतीय नहीं मानते और समग्र भारत की स्वतंत्रता से, जिसके लिए भारतियों की कई पीढ़ियों ने अपना जीवन समर्पित कर दिया है, उनका कोई संबंध नहीं है। हमारे लिए बंगाल और भारत का संभावित बंटवारा घृणास्पद है।
अतः हमें बहुत दुख हुआ है कि बिना विभिन्न दृष्टिकोण को परखे आप भी उक्त प्रस्ताव से सहमत दिखाई पड़ रहे हैं। हम आपको कांग्रेस से महान मानते हैं और इस स्थिति में आपकी कोई भी स्वीकृति हम सबके लिए उद्वेगजनक हो सकती है। 
बंगाल की विभिन्न राजनीतिक संस्थाओं के बहुत से लोगों की इस विषय पर जो विचारधारा है, मनोरंजन बाबू आपको अवगत कराएंगे।
हमें भय है कि श्री जिन्ना इस प्रस्ताव का अनुचित लाभ उठाते हुए हिन्दुस्तान और तथाकथित पाकिस्तान के क्षेत्रों में और लाभ पाने का प्रयास करेंगे। उत्पीड़न और उलझन की जिसका परिणाम होगा। ब्रिटिश सरकार आपके कथनानुसार इसमें हस्तक्षेप नहीं करेगी, क्योंकि उसे अपनी सत्ता का मोह है। श्री जिन्ना भी सक्रिय नहीं होंगे, क्यों कि वे नहीं चाहते हें कि गतिरोध समाप्त हो, किन्तु आपका विभाजन का सिद्धांत मान लेने का प्रस्ताव रहेगा, जिससे हमारी भावी कठिनाइयां और बढे़ंगी। 
मेरा आपसे अनुरोध है कि आप अपने निर्णय पर पुनर्विचार कीजिए। यदि श्री जिन्ना और मुस्लिम लीग को आपकी शर्तें मान्य नहीं हैं तो आप उनका अनुमोदन छोड़ कर अखण्ड भारत का समर्थन कीजिए। भारत विभाजन की किसी भी योजना के विरुद्ध केवल सन् 1942 के ‘हरिजन’ में आपने अपने विचार स्पष्टतम रूप में रखे थे। आपने ठीक ही लिखा था कि ऐसे किसी प्रस्ताव से हम लोगों में नए झगड़े उत्पन्न होने की आशंका रहेगी।
मेरा विचार है कि आपको भारत की स्वाधीनता के लिए  सभी दलों और जातियों के सहयोगब से अपनी योजना प्रस्तुत करनी चाहिए। जो लोग अल्पमतों के हितों की पूर्ण सुरक्षा के साथ पूरे भारत की स्वाधीनता के समर्थक हैं, उन्हें इस योजना को लोकप्रिय बनाने का आह्वान करना चाहिए। अनेक मुसलमान आज यह समझ रहे हैं कि पाकिस्तान बनना असंभव और एक छल है। ब्रिटिश सरकार भी मात्र अपनी सुविधानुसार श्री जिन्ना को समर्थन देती है। ऐसे नाजुक समय में आप श्री जिन्ना को, जो केवल मुस्लिम दृष्टिकोण से ही सोचते हैं, प्रोत्साहित कर रहे हैं। इससे लीग के इतने मुसलमानों को, जो राष्ट्रीय भावना से प्रेरित हो कर भारतीय स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करते रहे हैं, उन्हें बड़ा आघात पहुंचा है।
मुझे आशा है कि जिन प्रांतों में हिन्दू अल्पसंख्यक हैं, आप वहां उनकी शोचनीय परिस्थिति से अवगत होंगे ही। आपका कथन है कि उन शर्तों की स्वीकृति देते समय आपने अपने को एक हिन्दू नहीं अपितु भारतीय माना है। यदि आप एक भारतीय होने के नाते मुसलमानों की मांग का विशेष ध्यान रख कर श्री जिन्ना को प्रसन्न करने के लिए तैयार हैं, तब मैं एक हिन्दू होने के नाते हिन्दुओं के न्यायोचित और वैध अधिकारों की रक्षा करने के लिए आपसे क्यों न निवेदन करूं? यदि आप एक भारतीय हैं और आपका हिन्दू या मुसलमानों की किसी भी समस्या से संबंध नहीं है तो आपको अनिवार्य रूप से मुस्लिम लीग की अवहेलना कर देनी चाहिए और उन लोगों को सहयोग देना चाहिए जो केवल भारतीय हैं, और कुछ नहीं।
मैं तिलक जयंती के संबंध में एक अगस्त को पूना आ रहा हूं, वहां तीन दिन ठहरूंगा। इसके पूर्व मनोरंजन बाबू आपके  दर्शन करेंगे और यदि आपने उन्हें मेरे लिए कोई संदेश देने की कृपा की तो मुझे बतलाएंगे।
आशा है आप प्रसन्न होंगे!
सद्भावना सहित
भवदीय -
श्यामा प्रसाद मुखर्जी’’
अगस्त माह में तिलक जयंती पर श्यामा प्रसाद मुखर्जी पूना गए। वहां से लौटते समय उन्होंने महात्मा गंाधी से भेंट की। उन्होंने गंाधी जी से विभाजन के मुद्दे पर चर्चा की तथा इस पर उनके विचार जानने चाहे। 
इस पर महात्मा गंाधी ने श्यामा प्रसाद मुखर्जी को आश्वस्त किया कि -‘‘मेरे जीते जी भारत का विभाजन नहीं होगा।’’
महात्मा गंाधी के आश्वस्त करने के बाद भी श्यामा प्रसाद मुखर्जी पूर्ण आश्वस्त नहीं हुए। उन्हें इस बात का अनुमान था कि यदि जिन्ना ‘सी. आर. फार्मूले’ पर सहमत हो गए तो महात्मा गंाधी भी उन्हें समर्थन देने से पीछे नहीं हटेंगे। इसके आगे की घटनाएं इस बात को सिद्ध करती हैं कि कई बार परिस्थितियां व्यक्ति से अनचाहा इतिहास लिखवा देती हैं। यही हुआ महात्मा गांधी के आश्वासन और श्यामा प्रसाद मुखर्जी की आशाओं के साथ। देश का विभाजन हुआ जिसकी पीड़ा आज तक हर भारतीय के हृदय को चीरती रहती है।
(विस्तृत जानकारी के लिए आप पढ़ सकते हैं सामायिक प्रकाशन, नईदिल्ली से ‘‘राष्ट्रवादी व्यक्तित्व’’ श्रृंखला के अंतर्गत प्रकाशित मेरी पुस्तक ‘‘श्यामा प्रसाद मुखर्जी’’।) 
------------------------               
#DrMissSharadSingh #चर्चाप्लस  #सागरदिनकर #charchaplus  #sagardinkar #डॉसुश्रीशरदसिंह 

Friday, November 3, 2023

शून्यकाल | डाॅ श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मां का पत्र पं. नेहरू के नाम | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

"दैनिक नयादौर" में मेरा कॉलम ...
शून्यकाल
डाॅ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मां का पत्र पं. नेहरू के नाम   
 - डाॅ (सुश्री) शरद सिंह                                                                                            
   एक वृद्धा मां का पुत्र यदि संदेहास्पद स्थितियों में दिवंगत हो जाए, वह भी नज़रबंदी में तो उस मां पर क्या गुज़रेगी, इसका अनुमान लगाना भी कठिन है। वह व्यथित मां एक सर्वोच्च पदासीन व्यक्ति से न्याय की गुहार करेगी ही। डाॅ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के निधन के बाद उनकी मां योगमाया ने अपने पुत्र की संदेहास्पद मृत्यु की जांच किए जाने की मांग तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. जवाहार लाल नेहरू को पत्र लिख कर की थी। यह पत्राचार कई पत्रों तक चला। मां योगमाया का प्रथम पत्र यहां प्रस्तुत है ताकि भारतीय राजनीतिक परिदृश्य के अतीत को महसूस किया जा सके। लगभग पूरा पत्राचार सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशित ‘‘राष्ट्रवादी व्यक्तित्व’’ श्रृंखला की मेरी छः पुस्तकों में से पुस्तक ‘‘श्यामा प्रसाद मुखर्जी’’ में मौजूद है।  
डाॅ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी एक ऐसे ही राष्ट्रवादी नेता थे जो जीवनपर्यन्त राष्ट्र के लिए समर्पित रहे। वे महान शिक्षाविद, चिन्तक तथा प्रखर देशभक्त थे। 6 जुलाई, 1901 को कोलकाता के अत्यन्त प्रतिष्ठित परिवार में डाॅ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का जन्म हुआ। उनके पिता श्री आशुतोष मुखर्जी बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे एवं शिक्षाविद् के रूप में विख्यात थे। किन्तु डाॅ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी अपनी मां योगमाया के सबसे अधिक निकट थे। अपनी बाल्यावस्था से उन्होंने सत्यनिष्ठा, जनसेवा एवं देशभक्ति की भावना उन्हें अपनी मां से मिली। डाॅ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी सदैव न्याय के पक्ष में खड़े रहे। इसीलिए जब ढाका में दंगे भड़के तो वे ढाका गए और उन्होंने निर्भीकता पूर्वक दंगाप्रभावित क्षेत्रों का दौरा किया। मां को पुत्र का ढाका जाना भयभीत अवश्य किया किन्तु उन्होंने रोका नहीं। मां योगमाया को श्यामा प्रसाद जी के कश्मीर रवाना होने का भी समाचार मिला था किन्तु तब उन्होंने नहीं सोचा था कि यह उनके पुत्र की अंतिम यात्रा सिद्ध होने वाली है। 
मां योगमाया देवी को जब अपने पुत्र श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मृत्यु (23 जून 1953) हो जाने का समाचार मिला तो वे स्तब्ध रह गईं। उन्हें इस समाचार पर विश्वास ही नहीं हुआ। फिर जब मां योगमाया को पुत्र की मृत्यु की संदेहास्पद परिस्थितियों के बारे में पता चला तो वे शेख अब्दुल्ला सरकार की भूमिका से क्रोधित और व्यथित हो उठीं। उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू को एक पत्र लिखा, जिसका प्रमुख अंश इस प्रकार हैं -

‘‘प्रिय श्री नेहरू,
आपका दिनांक 30 जून का पत्र डाॅ. विधानचन्द्र राय ने 2 जुलाई को मेरे पास भेजा। संवेदना एवं सहानुभूति के संदेश के लिए मैं आपको धन्यवाद देती हूं। राष्ट्र मेरे प्रिय पुत्र के निधन का शोक मना रहा है। उन्हें एक शहीद की मृत्यु प्राप्त हुई है। उनकी मां होने के नाते मुझे जो शोक है, वह इतना गहरा और अनन्य है कि शब्दों में उसे व्यक्त नहीं किया जा सकता।
मैं आपसे सांत्वना प्राप्त करने के लिए आपको यह पत्र नहीं लिख रही हूं। किन्तु मैं आपसे न्याय की मांग करती हूं। मेरे पुत्र की मृत्यु नजरबन्दी में - बिना मुकदमा चलाए नजरबन्दी में हुई। आपने अपने पत्र में यह समझाने की कोशिश की है कि कश्मीर सरकार ने वह सब कुछ किया जो किया जाना चाहिए था। आपकी धारणा उन आश्वासनों और सूचनाओं पर आधारित है, जो आपको प्राप्त हुई हैं। मैं पूछती हूं कि ऐसी सूचना का क्या मूल्य है जब यह ऐसे व्यक्तियों द्वारा दी गई हो जिन पर खुद मुकदमा चलना चाहिए। आपका कहना है कि आप मेरे पुत्र की नजरबन्दी के दौरान कश्मीर गए थे। परन्तु मुझे हैरानी है कि उनसे व्यक्तिगत रूप से वहां मिलने और उनके स्वास्थ्य तथा प्रबन्ध के बारे में अपने आपको संतुष्ट कर लेने से आपको किसने रोका था?
उनकी मृत्यु रहस्यमय परिस्थितियों में हुई है। क्या यह अत्यधिक आश्चर्यजनक एवं स्तब्धकारी नहीं है कि जब से उन्हें वहां नजरबन्द किया गया, उसके बाद मुझे, जो मैं उनकी मां हूं, सबसे पहली सूचना जो कश्मीर सरकार से मिली वह यह थी कि आपके पुत्र अब इस संसार में नहीं रहे और वह भी उनकी मृत्यु के कम से कम दो घंटे के उपरान्त? और यह संदेश कितने निर्दयतापूर्ण संक्षिप्त तरीके से भेजा गया था। उन्होंने लिखा था कि उन्हें अस्पताल ले जाया गया है, उनकी मृत्यु के दुखद समाचार के बाद हमारे पास पहुंचा। मेरे पास इस बात की पक्की जानकारी है कि मेरा पुत्र अपनी नजरबन्दी के दौरान लगभग आरंभ से ही अस्वस्थ था। कश्मीर की सरकार अथवा आपकी सरकार को भी मेरे पास अथवा मेरे परिवार के पास वह सभी जानकारी भेजने के लिए क्यों नहीं कहा गया, जो कुछ भी आपके या उनके पास थी?
यह बात भी साफ है कि कश्मीर सरकार ने श्यामा प्रसाद के स्वास्थ्य के बारे में उसके पिछले इतिहास को जानने की कभी परवाह नहीं की और आवश्यकता पघ्ने पर ‘नर्सिंगहोम’ की व्यवस्था करने तथा आपातकालीन चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराने की चिंता नहीं की। यहां तक कि उनके बार-बार बीमार होने को भी एक चेतावनी के रूप में नहीं लिया गया। किसी प्रकार की भी चिकित्सकीय सहायता उपलब्ध कराने में अनावश्यक विलम्ब, अत्यधिक नासमझ तरीके से उन्हें अस्पताल ले जाया जाना, यहां तक कि अस्पताल में उनके साथ उनके दो नजरबन्द सहयोगियों को उपस्थित रहने की अनुमति देने से इनकार करना, सम्बंधित अधिकारियों के क्रूर व्यवहार के कुछ जीते-जागते उदाहरण हैं।
मेरा उन (कश्मीर सरकार) पर यह आरोप है कि उन्होंने अपने इस नियत कर्तव्य का पालन करने में घोर उपेक्षा की और वे इसके निर्वहन में विफल रहे। यह एक ऐसा विषय है, जिसकी जांच होनी चाहिए। आपको यह जानकर हैरानी होगी कि उन्होंने जो पत्र दिनांक 15 जून को लिखा था वह हमें कश्मीर सरकार द्वारा 24 जून को अर्थात् उनका शव भेजने के एक दिन बाद एक पैकेट में डालकर भेजा गया, और यह पैकेट गत 27 जून को हमें मिला? मुझे आपसे यह सुनकर आश्चर्य और शर्म महसूस होती है कि उन्हें किसी कारागार में नहीं, अपितु श्रीनगर की सुप्रसिद्ध डल झील के किनारे एक निजी बंगले में ठहराया गया था। क्या कोई सोच सकता है कि एक सोने के पिंजरे में कैदी खुश रहता है? स्वतंत्र भारत का एक निर्भीक सपूत बिना मुकदमा चलाए, नजरबंदी में अत्यधिक दुखान्त एवं रहस्यमय परिस्थितियों में मृत्यु को प्राप्त हुआ है। 
मैं, उस महान दिवंगत आत्मा की मां, यह मांग करती हूं कि इसकी एक स्वतंत्र एवं सक्षम व्यक्तियों द्वारा अविलम्ब एक पूर्णतया निष्पक्ष एवं खुली जांच होनी चाहिए। मैं यह जरूर चाहती हूं कि एक स्वतंत्र देश में घटित इस महान दुखान्त घटना के बारे में भारत की जनता स्वयं निर्णय करे कि इसके असली कारण क्या थे और आपकी सरकार ने इसमें क्या भूमिका अदा की? यदि किसी व्यक्ति द्वारा, चाहे वह कितना ही बड़ा क्यों न हो, कहीं कोई गलती की गई है तो न्याय अपना काम करे और जनता सावधान हो जाए ताकि स्वतंत्र भारत में फिर कभी किसी मां को उसी पीड़ा और शोक के साथ आंसू न बहाने पड़ें।
आपने मुझे अपने योग्य सेवा से बिना किसी हिचकिचाहट के सूचित करने की महती कृपा की है। मेरी ओर से, भारत की माताओं की ओर से हमारी यही मांग है। भगवान आपको साहस दे कि आप सत्य को प्रकाश में आने दें।
मेरे आशीर्वाद सहित, शोकाकुल, भवदीया,
हस्ताक्षर:- योगमाया देवी’’

पं. जवाहर लाल नेहरू ने उनके पत्र का उत्तर दिया जिससे मां योगमाया संतुष्ट नहीं हुईं और वे लगातार पं. नेहरू से पत्राचार करती रहीं। एक वृद्धा मां जिसने अपने 52 वर्षीय पुत्र को संदेहास्पद स्थितियों में मृत्यु के हाथों खोया हो, तथा उसकी जांच की मांग बार-बार ठुकराई जाती रही हो, ऐसी मां के हृदय की पीड़ा को शब्दों में व्यक्त कर पाना संभव नहीं है। वस्तुतः इतिहास में कई ऐसे प्रश्न हैं जो आज तक अनुत्तरित हैं। बस, इसमें कोई संदेह नहीं कि किसी भी राष्ट्र के निर्माण में राष्ट्रवादी व्यक्तित्वों के प्रयासों एवं बलिदान की सबसे अहम भूमिका रही है।          
            --------------------------
#DrMissSharadSingh  #columnist  #डॉसुश्रीशरदसिंह  #स्तम्भकार  #शून्यकाल  #कॉलम #shoonyakaal #column  #दैनिक #नयादौर  #श्यामाप्रसादमुखर्जी  #मांयोगमाया  #जवाहरलालनेहरू