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Friday, March 7, 2025

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर आकाशवाणी सागर की कविगोष्ठी में डॉ (सुश्री) शरद सिंह

आज एक लंबे अंतराल के बाद कार्यक्रम अधिकारी श्री दीपक निषाद जी के सौजन्य से आकाशवाणी सागर के स्टूडियो में हम चार कवत्रियां एकत्र हुई- डॉ चंचला दवे जी, डॉ निरंजन जैन जी, डॉ नमृता फुसकेले जी तथा में डॉ शरद सिंह। अवसर था अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर काव्य गोष्ठी की रिकॉर्डिंग का। इस कवयित्री गोष्ठी का संचालन मैंने ही किया। 🚩
       रिकॉर्डिंग के उपरांत दीपक निषाद जी को मैंने अपना बुंदेली ग़ज़ल संग्रह "सांची कै रए सुनो, रामधई" सादर भेंट किया।🙏
       सहज स्वभाव के श्री दीपक निषाद जी से मिलकर सदैव प्रसन्नता का अनुभव होता है। 😊
    वैसे हम  कवत्रियां तो काव्यकर्म के अलावा ठहाके लगाने में एक्सपर्ट हैं ही। 😄
     कल शाम महिला दिवस को संध्या 5:30 बजे इस कवयित्री गोष्ठी का आकाशवाणी सागर से प्रसारण किया जाएगा। प्रसार भारती मोबाईल एप्प के जरिए देश के किसी भी शहर में सुना जा सकता है। तो यदि आपको समय मिले तो अवश्य सुनिए...
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Monday, April 3, 2023

डॉ (सुश्री) शरद सिंह का प्रलेस की काव्यगोष्ठी में काव्य पाठ

कल शाम 02.04.2023 प्रगतिशील लेखक संघ की काव्य गोष्ठी हुई जिसमें मैंने अपनी दो प्रेम कविताएं पढ़ीं... यानी जलसेवा के बाद साहित्य सेवा...🤗 ग़ज़लें, कविताएं, दोहे, चौकड़िया, छंद...काव्य की हर विधा का आनंद...🌹
देखिए तस्वीरें ...
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Sunday, November 6, 2022

काव्य हमारे जीवन को संस्कारित करता है - डॉ (सुश्री) शरद सिंह


"कविता या काव्य का हमारे जीवन में हमेशा बहुत अधिक महत्व रहा है। यह सभी जानते और मानते हैं कि काव्य का संबंध हृदय से होता है और हृदय का संबंध संवेदना से। इसीलिए आदिकाल से काव्य हमारे जीवन पर विभिन्न प्रकार से प्रभाव डालता रहा है। विशेष रूप से काव्य में वाचिक परंपरा का बहुत अधिक महत्व है जिसे हम पाठ और गीतों की गेयता के रूप में ग्रहण करते हैं, व्यक्त करते हैं। लोकगीत इसके सबसे अच्छे उदाहरण हैं। वैसे, आदिकाल में राजा युद्ध भूमि पर जाते थे तो उनके साथ उनके चरण कवि भी जाते थे। जो उनके शौर्य की गाथा गाते हुए सेना में उत्साह का संचार करते थे। ज़रा सोचिए कि युद्ध भूमि के कोलाहल में एक कवि का स्वर किस तरह से ऊर्जा का संचार करता रहा होगा, जबकि उस समय आज की तरह न तो लाउडस्पीकर होते थे और न एमप्लीफायर्स होते थे। यह कवि का ओजपूर्ण स्वर ही होता था जो उस कोलाहल को भेदता हुआ सैनिकों के कानों तक पहुंचता था।  उन कविताओं में  वह शक्ति होती थी जो  सैनिकों में ऊर्जा का संचार कर देती थी, उनमें उत्साह भर देती थी। जो काव्य वीररस में ढलकर युद्ध भूमि में उत्साह भरता है, वही काव्य शांतरस में उतर कर शांति का संचार करता है। श्रृंगाररस श्रृंगारभावना को उद्दीप्त करता है और करुणरस में ढल कर काव्य हृदय को व्यथित करने की क्षमता रखता है। ये सारी बातें आप सभी जानते हैं। सभी सुविज्ञ हैं। काव्य की इस महत्ता का स्मरण कराने के पीछे मेरा उद्देश्य मात्र यही है कि आज खुले काव्य मंचों पर जिस तरह काव्य का अवमूल्यन हो रहा है उसे रोकने और मंच पर वास्तविक काव्य की पुनर्स्थापना करने की आवश्यकता है। यह बात हमेशा याद रखने योग्य है कि काव्य हमारे जीवन को संस्कारित करता है। और हम अपने काव्य-संस्कारों को दूषित नहीं होने दे सकते हैं। बुंदेलखंड हिंदी साहित्य संस्कृति विकास मंच में कई ऐसे कवि जुड़े हैं जो खुले मंचों पर भी संस्कारित कविताओं का पाठ करते हैं, वे नमन योग्य हैं, अभिनंदन योग्य हैं! ऐसे ही कविगण खुले मंचों पर वास्तविक काव्य की पुनर्स्थापना कर सकते हैं।" अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में मैंने (यानी डॉ शरद सिंह ने) अपने ये विचार रखे। अवसर था बुंदेलखंड हिंदी साहित्य संस्कृति विकास मंच सागर की 1491 गोष्ठी तथा 129 वी ऑनलाइन गोष्ठी का। गोष्ठी में मैंने अपनी एक ग़ज़ल भी पढ़ी।
        💢 संयोजक श्री मणिकांत चौबे बेलिहाज़ तथा संरक्षक श्री कृष्णकांत बक्शी के कुशल निर्देशन एवं श्री नलिन जैन नलिन के संचालन में यह गोष्ठी 05.11.2022 को आयोजित की गई, जिसमें स्थानीय साहित्य मनीषियों के साथ ही देश के विभिन्न राज्यों एवं शहरों से कवियों ने अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराते हुए अपनी रचनाओं का पाठ किया। विभिन्न समाचार पत्रों में प्रकाशित इसके समाचार आपसे साझा कर रही हूं।


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