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Wednesday, February 26, 2025

चर्चा प्लस | शिव के विविध रूपों का अनूठा शिल्प सौंदर्य है खजुराहो में | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर

चर्चा प्लस (सागर दिनकर में प्रकाशित)
शिवरात्रि पर विशेष:
शिव के विविध रूपों का अनूठा शिल्प सौंदर्य है खजुराहो में  
- डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
         शिव और पार्वती का विवाह भी जगत कल्याण के लिए हुआ था। खजुराहो की मंदिर भित्तियों पर शिव-पार्वती की संयुक्त प्रतिमाओं के अतिरिक्त शिव की अनेक ऐसी प्रतिमाएं है जिनमें शिव के कल्याणकारी सौंदर्य को देखा और अनुभव किया जा सकता है। शिव समस्त संसार का कल्याण करने वाले देवता माने गए हैं। समुद्र-मंथन से निकला हुआ गरल यानी विष स्वर्ग में निवास करने वाले देवताओं को भी भस्म कर सकता था यदि शिव उसे अपने गले में धारण नहीं करते। आदि ग्रंथों एवं पुराणों में शिव के विविध रूपों का वर्णन मिलता है। ये रूप खजुराहो की मूर्तियों में मौजूद हैं।
         
      शिवरात्रि शिव और पार्वती के विवाहोत्सव का दिन है। पुराणों के अनुसार इस विवाह की कथा भी रोचक है। शिव का प्रथम विवाह देवी सती से हुआ था। किन्तु अपने पिता राजा दक्ष द्वारा आमंत्रित न किए जाने पर भी सती पिता के धर गईं किन्तु वहां दक्ष ने शिव और सती दोनों के लिए अपमान बोधक शब्द कहे जिससे व्यथित हो कर सती ने यज्ञ कुण्ड में कूद कर आत्मदाह कर लिया। इस घटना से शिव व्यथित हो गए। तब सती ने हिमालय की पुत्री पार्वती के रूप में जन्म लिया। इसके बाद पार्वती को शिव को प्राप्त करने के लिए वर्षों तपस्या करनी पड़ी तब कहीं जा कर शिव और पार्वती के विवाह का मुहूर्त आया। लेकिन जब पार्वती की मातुश्री ने शिव की बारात में गण आदि को देखा तो वे घबरा गईं और उन्होंने विवाह रोकने का अनुरोध किया। उन्हें लगा कि ऐसे वर के साथ अपनी पुत्री का विवाह कैसे कर दें? तब देवताओं ने स्वयं उन्हें समझाया और तब शिव-पार्वती का विवाह निर्विघ्न सम्पन्न हो पाया। 
‘शिवपुराण’ के अनुसार जब देवताओं और असुरों ने समुद्र-मंथन किया तो उसमें हलाहल विष निकला। यह इतना घातक था कि देवताओं को भी भस्म कर सकता था। देवता हलाहल विष की विषाक्तता से भयभीत हो उठे तक शिव ने आगे बढ़ कर उस विष का पान कर लिया। लेकिन वे भी उसे यदि अपने गले से नीचे पेट में उतरने देते तो वह विष शिव को भी क्षति पहुंचा सकता था अतः विष को शिव ने अपने गले में ही रोक लिया जिससे शिव का गला नीला पड़ गया और वे नीलकंठ कहलाए। विष को गले में धारण करने के बावजूद उसका प्रभाव इतना तेज था कि उनके शरीर में जलन होने लगी और उन्हें गरती का अनुभव होने लगा तब वे हिमालय की ओर आकाशमार्ग से चल पड़े। बीच में विंध्य पर्वत के ऊपर से गुज़रते हुए उन्हें शीतलता का अनुभव हुआ और वे कुछ समय के लिए वहीं रुक गए। वह विश्रामस्थल कालंजर था। उस समय कालंजर में निवास कर रही देवी उमा से शिव ने विवाह किया और दोनों साथ-साथ कुछ समय वहां रहे। इसके बाद देवी उमा कामाख्या चली गईं और शिव हिमालय के लिए निकल पड़े। इस पौराणिक कथानक के आधार पर कालंजर में उमा-महेश्वर की अनेक प्रतिमाओं से ले कर विवाहमंडप तक मिलता है। शिल्पकारों ने जिस सुंदरता से कालंजर में नीलंकठ एवं उमा-महेश्वर के विवाह की कथा को पत्थरों में तराशा है ठीक उसी प्रकार खजुराहो में शिव के विवध रूपों की अनेक प्रतिमाएं हैं जो पौराणिक कथाओं पर आधारित हैं। सन् 2000 में डाॅक्टरेट की उपाधि के लिए खजुराहो की मूर्तिकला पर शोध करते समय और उसके बाद ‘खजुराहो की मूर्तिकला के सौंदर्यात्मक तत्व’ पुस्तक लिखते समय मुझे खजुराहो के मंदिरों में मौजूद शिव प्रतिमाओं की सम्पूर्ण विविधता को देखने और जानने का अवसर मिला। मेरी यह पुस्तक सन् 2006 में विश्वविद्यालय प्रकाशन, चौक, वाराणसी, उ.प्र. से प्रकाशित हुई। खजुराहो के मंदिर 950 से 1050 ई. के मध्य निर्मित हुए जिनमें मातंगेश्वर मंदिर प्राचीनतम हैं। विश्वनाथ मंदिर, लक्ष्मण और कंदरिया महादेव मंदिर के बीच की कड़ी है। इस मंदिर के मंडप दीवार पर लगे शिलालेख से पता चलता है, कि धंग द्वारा 1002 ई. में शंभु मरकतेश्वर के मंदिरों का निर्माण कराया गया था जिसमें मरकत तथा पाषाण निर्मित दो लिंगों की स्थापना का उल्लेख है। वर्तमान में पाषाण लिंग ही शेष है। इसी मंदिर के ठीक सामने नंदी मंदिर स्थित है। यह विश्वनाथ मंदिर का समकालीन है। 
त्रिदेव में तीसरे देवता महेश अर्थात शिव हैं। जिनकी विविधता पूर्ण अनेक प्रतिमाएं खजुराहो के मंदिरों में मिलती है। ये एक ऐसे देव है जिनकी आराधना वैदिक काल से पूर्व सैन्धव युग में की जाती थी। वैदिक काल में शिव कारूद्र रूप अधिक प्रसिद्ध रहा।  सांख्यायन तथा कौशितकि उपनिषदों में शिव, रूद्र, महादेव, महेश्वर, ईशान आदि नाम आते हैं। महाभारत में शिव के सहस्त्र नामों का उल्लेख हुआ है। उनके लिये शंकर, ईशान, शर्व, नीलकंठ, त्रयम्बक, धूर्जटि, नंदीश्वर, शिखिन, व्योमकेश, महादेव आदि नाम आये हैं। इन सभी रूपों में आयुध प्रतीकों की भिन्नता पायी जाती है, कभी शिव के हाथ में डमरू, खड्ग, खेटक, पारा तथा त्रिशूल रहता है तो कभी खप्पर, रूद्राक्षमाला, तलवार, धनुष, खट्वांग तथा ढाल आदि आयुध प्रतीक रहते हैं। खजुराहो में निर्मित शिव मूर्तियों में चतुर्भुजी, अष्टभुजी, बारहभुजी, सोलहभुजी रूप मिलते है। जिनमें विविध आयुध प्रदर्शित है।
चतुर्भुजी नटराज - दूला देव मंदिर में चतुर्भुज नटराज की मूर्ति है जिसमें उनकी प्रथम तीन भुजाओं में क्रमशः त्रिशूल, डमरू, खप्पर (कपाल) है जबकि चौथी भुजा भग्नावस्था में है। कुछ प्रतिमाओं में एक भुजा में अग्नि लिये हुये भी प्रदर्शित किया जाता है।
अष्टभुजी नटराज - खजुराहो संग्रहालय में स्थित अष्टभुजी प्रतिमा में उनकी आठों-भुजाओं में क्रमशः त्रिशूल, खड्ग, डमरू, खेटक, खट्वांग तथा खप्पर हैं। एक अन्य प्रतिमा में त्रिशूल, पाश, डमरू, अभय, कपाल अग्नि तथा घंटा प्रदर्शित है।
बारह भुजी नटराज - दूलादेव मंदिर में बारहभुजी नटराज की एक सुन्दर प्रतिमा है जिसमें बायां पैर नृत्य मुद्रा में उठा हुआ है। भुजाओं में त्रिशूल, पाश, डमरू, खेटक, खट्वांग, खड्ग, खप्पर, दृष्टिगत् है।
कल्याण सुन्दर शिव - शिव का कल्याण सुन्दर रूप शिव पार्वती के विवाह के अवसर का है। खजुराहो संग्रहालय, वामन मंदिर तथा भरत चित्रगुप्त मंदिर में स्थित कल्याण सुन्दर शिव को त्रिशूल के आयुध प्रतीक से युक्त दिखाया गया है।
नीलकंठ - खजुराहो के विभिन्न मंदिरों में नीलकंठ शिव की मूर्तियां हैं। कंदरिया मंदिर में नीलकंठ की भुजाओं में पदम, त्रिशूल, खट्वांग, तथा विषपात्र है। भरत चित्रगुप्त मंदिर  में नीलकंठ को विषपात्र, त्रिशूल खट्वांग कमंडलु, डमरू तथा कमल सहित दिखाया गया है। एक अन्य प्रतिमा में नीलकंठ को खप्पर, डमरू, कमल तथा खट्वांग धारी दिखाया गया है। लक्ष्मण मंदिर तथा कंदरिया मंदिर में उन्हें विषपात्र, डमरू, खट्वांग तथा कमंडलु युक्त प्रदर्शित किया है। पार्श्वनाथ मंदिर में आलिंगनबद्ध नीलकंठ की भुजाओं में खट्वांग एवं कमल नाल दिखाया गया है।
अघोर शिव - जगदंबा मंदिर में अघोर शिव की प्रतिमा है। जिसमें उन्हें शूल, डमरू, पाश, दंड, धारण किये हुये बताया गया है। पार्श्वनाथ मंदिर में खट्वांग, पुस्तक तथा नीलकंठ पक्षी धारी अघोर शिव है। पार्श्वनाथ मंदिर में शिव के हाथ में घंटिका है। कंदरिया महादेव मंदिर में अष्टभुजी अघोर प्रतिमा है। जिसमें खप्पर, त्रिशूल, शक्ति डमरू, घंटिका, सर्प, खट्वांग तथा कमंडलु दिखाया गया है। विश्वनाथ मंदिर में अघोर शिव त्रिशूल डमरू घंटिका गदा और कमंडलुधारी हैं। दूलादेव मंदिर में शिव अघोर की वरद् मुद्रा, सर्प, त्रिशूल, डमरू, खट्वांग और कमंडलु धारी हैं।
गज संहार शिव - खजुराहो में गज संहार शिव की विभिन्न प्रतिमायें हैं। कंदरिया महादेव मंदिर में सोलह भुजी गज संहार शिव है। जबकि कुछ अन्य प्रतिमायें बारहमुखी हैं। शिव के इस रूप में उन्हें त्रिशूल वज्र डमरू तथा हाथी का चमड़ा लिये हुये प्रदर्शित किया गया है।
भैरव - खजुराहो में दो प्रकार की भैरव प्रतिमायें है। प्रथम श्वान वाहन सहित तथा दूसरी नग्न प्रतिमा है। एक अन्य प्रकार भी भैरव प्रतिमा का है जिसमें उन्हें भैरवी के साथ आलिंगन मुद्रा में दिखाया गया है। इस प्रतिमा में भैरव चक्र (छल्ला), कमल तथा घंटिका धारी हैं। कंदरिया महादेव, वामन तथा चतुर्भुज मंदिर में नग्न भैरव को पेय पात्र, डमरू, घंटी, नरमुण्ड, सहित दिखाया गया है। विश्वनाथ मंदिर, जगदम्बा मंदिर, भरत चित्रगुप्त मंदिर तथा लक्ष्मण मंदिर में भैरव पेय, डमरू, घंटी, नरमुण्ड, तथा खड्ग लिये हुये हैं। विश्वनाथ मंदिर में भैरव की एक ऐसी प्रतिमा भी है जिसमें उन्हें कमल, सर्प, खट्वांग तथा नरमुण्ड लिये हुये दिखाया गया है। इसी प्रकार लक्ष्मण मंदिर में खड्ग, घंटिका तथा सर्प सहित वामन मंदिर में खड्ग, करबाल तथा खट्वांग सहित हैं। कंदरिया मंदिर की प्रदक्षिणा में खड्ग, जगदम्बा मंदिर में पाश तथा खड्ग तथा विश्वनाथ मंदिर में खेटक, खड्ग तथा सर्प सहित भैरव हैं। श्वान वाहन युक्त भैरव प्रतिमा में गदा, डमरू, घंटिका, खप्पर, कमल तथा सर्प आयुध प्रतीक हैं। आदिनाथ मंदिर में गदा, सर्प के साथ फल प्रदर्शित हैं जबकि विश्वनाथ मंदिर की प्रदक्षिणा में गदा, खड्ग सर्प तथा नरमुण्ड और दूलादेव मंदिर में स्थित प्रतिमा में खड्ग, ढाल तथा नरमुण्ड है। जगदम्बा मंदिर में भैरव की एक ऐसी प्रतिमा भी है जिसमें उनके एक हाथ में पक्षी तथा शेष दो हाथों में घंटिका तथा खट्वांग है।
त्रिपुरान्तक - खजुराहो में आलिंगन मुद्रा की त्रिपुरान्तक प्रतिमा है। जिसमें उन्हें, घट, धनुष, बाण तथा नरमुण्ड धारण किये हुये बताया गया है।
यदि मुद्राओं के आधार पर देखा जाए तो खजुराहो में मौजूद शिव की चतुर्भज प्रतिमाओं को ही तीन श्रेणियों में बांटा जा सकता है - प्रथम श्रेणी में शिव की वे चतुर्भुजी प्रतिमायें है जिनमें शिव वरद मुद्रा में त्रिशूल, घट तथा सर्प धारण किये है। द्वितीय श्रेणी में वे शैव मूर्तियां हैं जिसमें पहली भुजा वरद अथवा अभय मुद्रा में है। तथा दूसरी भुजा में त्रिशूल है। अन्य भुजाओं में पाश, कमल अथवा पुस्तक है। तृतीय श्रेणी में शिव की वे प्रतिमायें है जिनमें शिव के दूसरी अथवा तीसरी भुजा में सर्प प्रदर्शित है जबकि पहली भुजा वरद, अभय अथवा आलिंगन मुद्रा में है। वरद मुद्रा में दूसरे हाथ में पुस्तक अथवा कमल तीसरे में  सर्प और चौथे में घट प्रदर्शित है। अभय मुद्रा में दूसरे हाथ में पाश तीसरे में सर्प तथा चौथा कटि पर है।
भारतीय शिल्पकला यूं भी अत्यंत समृद्ध है और जब उसमें कथानक का समावेश हो जाता है तो ऐसा लगता है जैसे प्रतिमाएं जीवंत हो कर उन कथाओं को स्टेज पर मंचित कर रही हों। यूं भी भारत में प्रतिमा निर्माण की परम्परा बहुत प्राचीन है। खजुराहो का मूर्तिशिल्प शिव प्रतिमाओं के बिना पूर्ण हो ही नहीं सकता था। शिव जो संहारक हैं तो कल्याणकारी भी हैं। भोले हैं लेकिन दुखहर्ता हैं। संभवतः खजुराहो का शैव-शिल्प भी यही कहना चाहता है कि -‘शिव सबका कल्याण करें!’
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Wednesday, February 23, 2022

चर्चा प्लस | जैवविविधता भी है खजुराहो की मूर्तियों में | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह

चर्चा प्लस  
जैवविविधता भी है खजुराहो की मूर्तियों में 
- डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह                                                                                        
       आज जब हम पर्यावरण और जैव विविधता की बातें करते हैं तो हमें लगता है कि जैव विविधता को लेकर हमारे भीतर ही जागरूकता उत्पन्न हुई है हमसे पहले अर्थात् हमारे पूर्वजों का ध्यान इस ओर गया ही नहीं था यह हमारा भ्रम है क्योंकि वेदों की ऋचाओं से लेकर खजुराहो की मूर्तियों तक जैव विविधता का विशेष उल्लेख एवं प्रदर्शन है। विशेष इस अर्थ में कि हमने प्रकृति और उसके तत्वों को मात्र जैव अथवा अजैव घटकों के रूप में देखा है जबकि हमारे पूर्वजों ने उन्हें जीवन के अभिन्न अंग के रूप में सम्मानित स्थान दिया, उन्हें देवत्व प्रदान किया और देवत्व प्रदान करते हुए संरक्षण का एक मजबूत धरातल दिया। यही कारण है कि हमारे पूर्वजों के समय न तो बेतहाशा जंगल काटे गए और न प्रकृति के प्रति निर्ममता का व्यवहार किया गया।
विश्व प्रसिद्ध कला तीर्थ खजुराहो अपनी मूर्ति कला की सुंदरता कलात्मकता और मानव समूहों की मनोहरी प्रस्तुति के लिए विख्यात है। खजुराहो में चंदेल राजवंश के शासकों के द्वारा मंदिरों का निर्माण कराया गया। खजुराहो का प्राचीन नाम ‘खर्जुरवाहक’ था। खजुराहो की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के संबंध में ह्वेनसांग, अबू रिहान-अली-बरूनी तथा इब्नबतूता के द्वारा दिए गए विवरणों से पता चलता है। अबू रिहान-अल-बरूनी सन् 1021 ई. में महमूद गजनवी के कालंजर अभियान के दौरान उसके साथ बुन्देलखण्ड आया था। उसने अपने यात्रा विवरण में ‘‘जिझोती’’ की राजधानी ‘‘खजुराहा’’ का उल्लेख किया है। चंदेलों का राजनीतिक जीवन गुर्जर-प्रतिहार सम्राटों के सामंत रूप में प्रारम्भ हुआ। चंदेलों ने खजुराहो में लगभग 85 मंदिरों का निर्माण कराया। वर्तमान में उनमें से लगभग 25 मंदिर विद्यमान हैं। सन् 1998-99 में आर्कियोलाॅजिकल सर्वे आॅफ इंडिया द्वारा कराए गए उत्खनन कार्य में एक और भव्य मंदिर के अवशेष मिले। जो कि खजुराहो में ही जटकारा नामक स्थान पर स्थित हैं। इन अवशेषों में मिथुन मूर्तियों की उपलब्धता हिन्दू मंदिर होने का संकेत करती है। खजुराहो के सभी मंदिर पूर्वमध्यकालीन स्थापत्यकला के बेजोड़ नमूने हैं। इन मंदिरों के शिखर नागर शैली के बने हुए हैं। मंदिरों को ऊंचे चबूतरों पर बनाया गया है। शैव और वैष्णव धर्म से संबंधित मंदिर एक स्थान पर बनाए गए हैं तथा जैन मंदिर कुछ दूर अलग स्थान पर स्थित हैं। इन सभी मंदिरों का निर्माण काल 950 से 1050 ईस्वी के मध्य का माना जाता है। दुख की बात है कि हम अपने अतीत को भी अपने दृष्टिकोण के हिसाब से देखते हैं। खजुराहो में मिथुन मूर्तियां अपेक्षाकृत कम हैं किन्तु हमारे व्यापार जगत को पता था कि इस तरह की मूर्तियों का होना पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए लाभप्रद है। इस धारणा के कारण खजुराहो शिल्प में मौजूद अन्य संदेशप्रद प्रतिमाएं उपेक्षित रह गईं। जबकि मंदिर भित्तियों पर बनी प्रतिमाओं में रहन-सहन-वेशभूषा, दैनिक जीवन, पठन-पाठन, क्रीड़ा और जैवविविधता जैसे अनेक विषय प्रदर्शित हैं।  
यह देखकर सुखद अनुभूति होती है कि चंदेल कालीन कलाकारों ने इन मूर्तियों में मानव के रचनात्मक एवं संहारात्मक संवेगों के साथ ही जैवविविधता को भी बड़ी सुंदरता से प्रदर्शित किया है। मंदिर भित्तियों पर जैव विविधता का यह प्रदर्शन इस तथ्य को सत्यापित करता है कि चंदेल काल में पर्यावरण और जैव विविधता के प्रति जागरूकता पाई जाती थी। स्वयं खजुराहो का नामकरण वानस्पतिक आधार पर किया गया था। यद्यपि खजुराहो के नामकरण को लेकर दो तरह के मत प्रचलित है किंतु दोनों मतों में यही माना गया है कि खजुराहो का नाम खर्जूर अर्थात खजूर के पेड़ों के कारण रखा गया। पहले मत के अनुसार खजुराहो ग्राम के द्वार पर खजूर के दो सुनहरे पेड़ थे। इसलिए ग्राम का नाम ‘खर्जूर’ यानी खजूर धारण करने वाला अर्थात् खजुराहो पड़ा। दूसरे मत के अनुसार खजुराहो ग्राम जहां बसाया गया वहां खजूर के पेड़ों की अधिकता होने के कारण यह नाम रखा गया।

बुंदेलखंड में स्थित खजुराहो के चारों और सघन वन क्षेत्र होने के कारण चंदेल नागरिकों में पर्यावरण एवं जैव विविधता के प्रति जागरूकता होनी स्वाभाविक थी। चंदेल मूर्तिकारों ने पशु, पक्षी, जलचर, वनस्पतियां, वायु, सूर्य, चंद्र आदि के साथ-साथ दिशाओं को भी मानवकृत रूप देते हुए मानव जीवन के प्रति उनके महत्व एवं उनकी उपादेयता को स्थापित किया है। इसके साथ ही प्रकृति एवं विविध प्राणियों के साथ मानव के पारस्परिक संबंधों का भी सूक्ष्मता से प्रदर्शन किया है।

 जैव विविधता शब्द का प्रयोग पृथ्वी पर जीवन की विशाल विविधता का वर्णन करने के संदर्भ में किया जाता है। इसका उपयोग विशेष रूप से एक क्षेत्र या पारिस्थितिकी तंत्र में सभी प्रजातियों को संदर्भित करने हेतु किया जा सकता है। जैव विविधता पौधों, बैक्टीरिया, जानवरों और मनुष्यों सहित हर जीवित चीज को संदर्भित करती है। और सरल शब्दों में कहा जाए तो जैव विविधता या जीव भिन्नता पृथ्वी पर पाई जाने वाली विविध प्रकार की उन जैवीय प्रजातियों को कहते हैं जो अपने-अपने प्राकृतिक आवास क्षेत्रों में पाई जाती हैं। इसमें पेड़-पौधे, सूक्ष्म जीव, पशु-पक्षी आदि सभी प्राणी सम्मिलित हैं। जैव विविधता का महत्व पृथ्वी पर जीवन को बनाए रखने के लिए इसका रखरखाव करना बहुत महत्वपूर्ण है। जानवरों, पौधों और सूक्ष्मजीवों की एक विस्तृत श्रृंखला के बिना, हम स्वस्थ पारिस्थितिकी प्रणालियों की आशा भी नहीं कर सकते हैं। ये सभी पारिस्थितिकी तंत्र में अहम भूमिका निभाते हैं। ऐसी बहुत सी चीजें हैं जिसके लिए हम जैव विविधता पर निर्भर करते हैं और हमारे लिए इसे संरक्षित करना महत्वपूर्ण है। उदाहरण के लिए कृषि को ही ले लीजिए अकशेरूकीय पर अविश्वसनीय रूप से निर्भर है, वे मिट्टी के स्वास्थ्य को बनाए रखने में मदद करते हैं, जबकि कई फल, नट और सब्जियां कीटों द्वारा परागित होती हैं। दुनिया के एक तिहाई फसल उत्पादन में परागणकर्ता (पोलिनेटर) जैसे पक्षी, मधुमक्खी और अन्य कीड़े अहम भूमिका निभाते हैं। सूक्ष्म जीव मृदा में पोषक तत्वों को मुक्त करने के लिए महत्वपूर्ण हैं। महासागरों में, मछली और समुद्री जीवन के अन्य रूप लगभग एक अरब लोगों के लिए प्रोटीन का मुख्य स्रोत प्रदान करते हैं।

खजुराहो की मूर्तियों में प्रदर्शित जैव विविधता को मुख्य रूप से दो श्रेणियों में बांटा जा सकता है - 1.मौलिक रूप एवं 2. प्रतीक रूप।
मंदिर की बाहरी दीवारों पर उकेरी गई मूर्तियों में जैव विविधता के मौलिक रूप का सर्वत्र चित्रण है। मंदिरों के प्रवेश द्वारों पर वृक्ष की शाखाएं उकेरी गई हैं। यह शाखाएं भी तीन प्रकार की है त्रिशाखा, पंच शाखा और सप्त शाखा। इन शाखाओं में लताएं, पुष्प एवं बेलबूटों का अंकन है। इसी के साथ कल्पवृक्ष भी उकेरे गए हैं। कंदरिया महादेव मंदिर के गर्भगृह द्वार पर सप्त शाखाएं हैं। जबकि अधिकांश मंदिरों में पंच शाखाएं हैं। इन द्वारशाखाओं पर फूल, पत्तियां, मिथुन मूर्तियां तथा साधना में लीन तपस्वी बनाए गए हैं। इन द्वारशाखाओं के निचले सिरे पर एक और मकर वाहिनी गंगा तथा दूसरी ओर कूर्मवाहिनी यमुना की प्रतिमाएं हैं।

खजुराहो की मूर्तियों में फूलों का भी भरपूर प्रदर्शन है। लक्ष्मण मंदिर तथा दूल्हा देव मंदिर में चार पंखुड़ियों वाला फूल बनाया गया है तो चैसठ योगिनी मंदिर में पूर्ण विकसित त्रिचक्रीय शतदल पुष्प प्रदर्शित है। इसी मंदिर में चार और छह पंखुड़ियों वाले फूल भी बनाए गए हैं।
फूल, पत्तियों, लता, पेड़ों के अतिरिक्त वृक्षों को भी स्थान दिया गया है। लक्ष्मण मंदिर में एक स्त्री को आम्र वृक्ष की छाया में खड़े हुए दिखाया गया है। यह मानव और वनस्पति के पारस्परिक संबंध का द्योतक है। वामन मंदिर में चित्रकारी करती हुई स्त्री के पास में वृक्ष की शाखाएं अंकित हैं जो यह दर्शाती हंै कि वह स्त्री अपने कैनवास पर पेड़-पौधों और वृक्षों को चित्रित कर रही है।

खजुराहो की मूर्तियों में वनस्पतियों के साथ ही पशु, पक्षियों को भी स्थान दिया गया है। खजुराहो संग्रहालय में संग्रहीत नारी मूर्ति में र्दाइं हथेली पर एक पक्षी को दिखाया गया है। विश्वनाथ मंदिर में दो नारी मूर्तियां हैं जिनमें से एक में पक्षी को कलाई पर बैठे हुए तथा दूसरे में दाना चुगाते हुए दिखाया गया है। जगदंबा मंदिर में सारिका पक्षी, कंदरिया महादेव में तोता, वामन मंदिर में मैना तथा लक्ष्मण मंदिर में उलूक पालतू पक्षी के रूप में उकेरा गया है। मोर, हंस, और उल्लू आदि पक्षी वाहन प्रतीक के रूप में भी दर्शाए गए हैं।

पालतू पशु के रूप में गाय, बैल, वानर, घोड़ा, हाथी, कुत्ता, मेष आदि का प्रदर्शन किया गया है। वन्य पशुओं में शेर, हिरण, भालू, भेड़िया, वनशूकर को उत्कीर्ण किया गया है। इनके अतिरिक्त छोटे जानवर जैसे मूषक और नेवला को भी अंकित किया गया है। जलचर प्राणियों में मत्स्य, शंख, कूर्म और मकर को वाहन प्रतीक के रूप में उकेरा आ गया है।
पृथ्वी पर निवास करने वाले समस्त जीवधारी समस्त प्रकार के जीवित एवं अजैविक घटकों अर्थात प्राकृतिक संसाधनों पर आश्रित होते हैं। पर्यावरण ही प्राकृतिक संसाधनों जैसे ऊर्जा, वायु, जल, मृदा, खनिज तत्व आदि का स्रोत है। खजुराहो की मूर्ति शिल्प की एक विशेषता यह भी है कि जीवन और प्रकृति को मानव आकार प्रस्तुत किया गया है। जैसे नदी देवियां और जल देवता। ब्रह्मा मंदिर, जगदंबा मंदिर, कंदरिया महादेव मंदिर, विश्वनाथ मंदिर के प्रवेश द्वार पर गंगा और यमुना की मानव आकृति मूर्तियां बनाई गई हैं। यह मूर्तियां चंदेल कालीन जीवन में नदियों के महत्व की परिचायक है। वाराह मंदिर में वाराह प्रतिमा के विशालकाय शरीर पर गंगा तथा यमुना को मानवीय रूप में बनाया गया है। नदी देवियों के समान ही जल देवता को भी स्थान दिया गया है। वैदिक एवं पौराणिक कल्पना के अनुसार जल देवता वरुण की मूर्तियां वाराह के विशाल शरीर के अतिरिक्त लक्ष्मण मंदिर, जगदंबा मंदिर, चित्रगुप्त मंदिर, दूल्हा देव मंदिर, चतुर्भुज मंदिर, वामन मंदिर ,पार्श्वनाथ मंदिर तथा खजुराहो संग्रहालय में मौजूद हैं।

खजुराहो की मूर्ति कला में जैव विविधता को जिस विशिष्टता के साथ प्रस्तुत किया गया है वह अद्भुत है। इन मूर्तियों में विषैले जीव जंतुओं को भी स्थान दिया गया है। विभिन्न प्रकार के सर्प तथा बिच्छू का अंकन इस बात को प्रमाणित करता है कि चंदेल समाज जीवों के सभी रूपों को समान रूप से महत्व देता था। जैवविविधता के प्रत्येक रूप को पाषाण शिल्प में ढालकर प्रस्तुत किया गया है, फिर चाहे जैव जगत हो अथवा अजैव जगत।
खजुराहो के मूर्ति शिल्प में अंकित जैव विविधता यह भी संदेश देती है कि यदि खजुराहो के शिल्प की तरह है वर्तमान जीवन को भी कालजयी बनाना है तो जीवन के लिए आवश्यक समस्त तत्वों का संरक्षण करना होगा और उन्हें समाप्त होने से बचाना होगा, चाहे वह वन हो या वन्य जीवन अथवा हर प्रकार के पशुपक्षी और वनस्पतियां, सभी को संरक्षित करना होगा। लुप्त होने से बचाना होगा। जैवविधता के महत्व को समझते हुए खजुराहो के शिल्प की भांति हमें अपने वर्तमान तथा भविष्य को बचाना  होगा और इस दिशा में खजुराहो की मूर्तियों में मौजूद जैव विविधता का शिल्पांकन हमारे लिए प्रेरणा स्रोत है।
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(23.02.2022)
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Thursday, March 11, 2021

चर्चा प्लस | शिवरात्रि पर्व पर विशेष | खजुराहो में हैं शिव के सभी रूप | डॉ. शरद सिंह

🚩शिवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएं 🚩
चर्चा प्लस 
शिवरात्रि पर्व पर विशेष :
खजुराहो में हैं शिव के सभी रूप
- डॉ. शरद सिंह 
         शिव समस्त संसार का कल्याण करने वाले देवता माने गए हैं। समुद्र-मंथन से निकला हुआ गरल यानी विष स्वर्ग में निवास करने वाले देवताओं को भी भस्म कर सकता था यदि शिव उसे अपने गले में धारण नहीं करते। आदि ग्रंथों एवं पुराणों में शिव के विविध रूपों का वर्णन मिलता है। यहां मैं अपनी पुस्तक ‘खजुराहो की मूर्तिकला के सौंदर्यात्मक तत्व’ का वह अंश दे रही हूं जिसमें खजुराहो की शिव प्रतिमाओं की पूर्ण विविधता का विवरण है।
‘शिवपुराण’ के अनुसार जब देवताओं और असुरों ने समुद्र-मंथन किया तो उसमें हलाहल विष निकला। यह इतना घातक था कि देवताओं को भी भस्म कर सकता था। देवता हलाहल विष की विषाक्तता से भयभीत हो उठे तक शिव ने आगे बढ़ कर उस विष का पान कर लिया। लेकिन वे भी उसे यदि अपने गले से नीचे पेट में उतरने देते तो वह विष शिव को भी क्षति पहुंचा सकता था अतः विष को शिव ने अपने गले में ही रोक लिया जिससे शिव का गला नीला पड़ गया और वे नीलकंठ कहलाए। विष को गले में धारण करने के बावजूद उसका प्रभाव इतना तेज था कि उनके शरीर में जलन होने लगी और उन्हें गरती का अनुभव होने लगा तब वे हिमालय की ओर आकाशमार्ग से चल पड़े। बीच में विंध्य पर्वत के ऊपर से गुज़रते हुए उन्हें शीतलता का अनुभव हुआ और वे कुछ समय के लिए वहीं रुक गए। वह विश्रामस्थल कालंजर था। उस समय कालंजर में निवास कर रही देवी उमा से शिव ने विवाह किया और दोनों साथ-साथ कुछ समय वहां रहे। इसके बाद देवी उमा कामाख्या चली गईं और शिव हिमालय के लिए निकल पड़े। इस पौराणिक कथानक के आधार पर कालंजर में उमा-महेश्वर की अनेक प्रतिमाओं से ले कर विवाहमंडप तक मिलता है। शिल्पकारों ने जिस सुंदरता से कालंजर में नीलंकठ एवं उमा-महेश्वर के विवाह की कथा को पत्थरों में तराशा है ठीक उसी प्रकार खजुराहो में शिव के विवध रूपों की अनेक प्रतिमाएं हैं जो पौराणिक कथाओं पर आधारित हैं। सन् 2000 में डॉक्टरेट की उपाधि के लिए खजुराहो की मूर्तिकला पर शोध करते समय और उसके बाद ‘खजुराहो की मूर्तिकला के सौंदर्यात्मक तत्व’ पुस्तक लिखते समय मुझे खजुराहो के मंदिरों में मौजूद शिव प्रतिमाओं की सम्पूर्ण विविधता को देखने और जानने का अवसर मिला। मेरी यह पुस्तक सन् 2006 में विश्वविद्यालय प्रकाशन, चौक, वाराणसी, उ.प्र. से प्रकाशित हुई। खजुराहो के मंदिर 950 से 1050 ई. के मध्य निर्मित हुए जिनमें मातंगेश्वर मंदिर प्राचीनतम हैं। विश्वनाथ मंदिर, लक्ष्मण और कंदरिया महादेव मंदिर के बीच की कड़ी है। इस मंदिर के मंडप दीवार पर लगे शिलालेख से पता चलता है, कि धंग द्वारा 1002 ई. में शंभु मरकतेश्वर के मंदिरों का निर्माण कराया गया था जिसमें मरकत तथा पाषाण निर्मित दो लिंगों की स्थापना का उल्लेख है। वर्तमान में पाषाण लिंग ही शेष है। इसी मंदिर के ठीक सामने नंदी मंदिर स्थित है। यह विश्वनाथ मंदिर का समकालीन है।

त्रिदेव में तीसरे देवता महेश अर्थात शिव हैं। जिनकी विविधता पूर्ण अनेक प्रतिमाएं खजुराहो के मंदिरों में मिलती है। ये एक ऐसे देव है जिनकी आराधना वैदिक काल से पूर्व सैन्धव युग में की जाती थी। वैदिक काल में शिव कारूद्र रूप अधिक प्रसिद्ध रहा। सांख्यायन तथा कौशितकि उपनिषदों में शिव, रूद्र, महादेव, महेश्वर, ईशान आदि नाम आते हैं। महाभारत में शिव के सहस्त्र नामों का उल्लेख हुआ है। उनके लिये शंकर, ईशान, शर्व, नीलकंठ, त्रयम्बक, धूर्जटि, नंदीश्वर, शिखिन, व्योमकेश, महादेव आदि नाम आये हैं। इन सभी रूपों में आयुध प्रतीकों की भिन्नता पायी जाती है, कभी शिव के हाथ में डमरू, खड्ग, खेटक, पारा तथा त्रिशूल रहता है तो कभी खप्पर, रूद्राक्षमाला, तलवार, धनुष, खट्वांग तथा ढाल आदि आयुध प्रतीक रहते हैं। खजुराहो में निर्मित शिव मूर्तियों में चतुर्भुजी, अष्टभुजी, बारहभुजी, सोलहभुजी रूप मिलते है। जिनमें विविध आयुध प्रदर्शित है।
चतुर्भुजी नटराज - दूला देव मंदिर में चतुर्भुज नटराज की मूर्ति है जिसमें उनकी प्रथम तीन भुजाओं में क्रमशः त्रिशूल, डमरू, खप्पर (कपाल) है जबकि चौथी भुजा भग्नावस्था में है। कुछ प्रतिमाओं में एक भुजा में अग्नि लिये हुये भी प्रदर्शित किया जाता है।
अष्टभुजी नटराज - खजुराहो संग्रहालय में स्थित अष्टभुजी प्रतिमा में उनकी आठों-भुजाओं में क्रमशः त्रिशूल, खड्ग, डमरू, खेटक, खट्वांग तथा खप्पर हैं। एक अन्य प्रतिमा में त्रिशूल, पाश, डमरू, अभय, कपाल अग्नि तथा घंटा प्रदर्शित है।
बारह भुजी नटराज - दूलादेव मंदिर में बारहभुजी नटराज की एक सुन्दर प्रतिमा है जिसमें बायां पैर नृत्य मुद्रा में उठा हुआ है। भुजाओं में त्रिशूल, पाश, डमरू, खेटक, खट्वांग, खड्ग, खप्पर, दृष्टिगत् है।
कल्याण सुन्दर शिव - शिव का कल्याण सुन्दर रूप शिव पार्वती के विवाह के अवसर का है। खजुराहो संग्रहालय, वामन मंदिर तथा भरत चित्रगुप्त मंदिर में स्थित कल्याण सुन्दर शिव को त्रिशूल के आयुध प्रतीक से युक्त दिखाया गया है।
नीलकंठ - खजुराहो के विभिन्न मंदिरों में नीलकंठ शिव की मूर्तियां हैं। कंदरिया मंदिर में नीलकंठ की भुजाओं में पदम, त्रिशूल, खट्वांग, तथा विषपात्र है। भरत चित्रगुप्त मंदिर में नीलकंठ को विषपात्र, त्रिशूल खट्वांग कमंडलु, डमरू तथा कमल सहित दिखाया गया है। एक अन्य प्रतिमा में नीलकंठ को खप्पर, डमरू, कमल तथा खट्वांग धारी दिखाया गया है। लक्ष्मण मंदिर तथा कंदरिया मंदिर में उन्हें विषपात्र, डमरू, खट्वांग तथा कमंडलु युक्त प्रदर्शित किया है। पार्श्वनाथ मंदिर में आलिंगनबद्ध नीलकंठ की भुजाओं में खट्वांग एवं कमल नाल दिखाया गया है।

अघोर शिव - जगदंबा मंदिर में अघोर शिव की प्रतिमा है। जिसमें उन्हें शूल, डमरू, पाश, दंड, धारण किये हुये बताया गया है। पार्श्वनाथ मंदिर में खट्वांग, पुस्तक तथा नीलकंठ पक्षी धारी अघोर शिव है। पार्श्वनाथ मंदिर में शिव के हाथ में घंटिका है। कंदरिया महादेव मंदिर में अष्टभुजी अघोर प्रतिमा है। जिसमें खप्पर, त्रिशूल, शक्ति डमरू, घंटिका, सर्प, खट्वांग तथा कमंडलु दिखाया गया है। विश्वनाथ मंदिर में अघोर शिव त्रिशूल डमरू घंटिका गदा और कमंडलुधारी हैं। दूलादेव मंदिर में शिव अघोर की वरद् मुद्रा, सर्प, त्रिशूल, डमरू, खट्वांग और कमंडलु धारी हैं।
गज संहार शिव - खजुराहो में गज संहार शिव की विभिन्न प्रतिमायें हैं। कंदरिया महादेव मंदिर में सोलह भुजी गज संहार शिव है। जबकि कुछ अन्य प्रतिमायें बारहमुखी हैं। शिव के इस रूप में उन्हें त्रिशूल वज्र डमरू तथा हाथी का चमड़ा लिये हुये प्रदर्शित किया गया है।

भैरव - खजुराहो में दो प्रकार की भैरव प्रतिमायें है। प्रथम श्वान वाहन सहित तथा दूसरी नग्न प्रतिमा है। एक अन्य प्रकार भी भैरव प्रतिमा का है जिसमें उन्हें भैरवी के साथ आलिंगन मुद्रा में दिखाया गया है। इस प्रतिमा में भैरव चक्र (छल्ला), कमल तथा घंटिका धारी हैं। कंदरिया महादेव, वामन तथा चतुर्भुज मंदिर में नग्न भैरव को पेय पात्र, डमरू, घंटी, नरमुण्ड, सहित दिखाया गया है। विश्वनाथ मंदिर, जगदम्बा मंदिर, भरत चित्रगुप्त मंदिर तथा लक्ष्मण मंदिर में भैरव पेय, डमरू, घंटी, नरमुण्ड, तथा खड्ग लिये हुये हैं। विश्वनाथ मंदिर में भैरव की एक ऐसी प्रतिमा भी है जिसमें उन्हें कमल, सर्प, खट्वांग तथा नरमुण्ड लिये हुये दिखाया गया है। इसी प्रकार लक्ष्मण मंदिर में खड्ग, घंटिका तथा सर्प सहित वामन मंदिर में खड्ग, करबाल तथा खट्वांग सहित हैं। कंदरिया मंदिर की प्रदक्षिणा में खड्ग, जगदम्बा मंदिर में पाश तथा खड्ग तथा विश्वनाथ मंदिर में खेटक, खड्ग तथा सर्प सहित भैरव हैं। श्वान वाहन युक्त भैरव प्रतिमा में गदा, डमरू, घंटिका, खप्पर, कमल तथा सर्प आयुध प्रतीक हैं। आदिनाथ मंदिर में गदा, सर्प के साथ फल प्रदर्शित हैं जबकि विश्वनाथ मंदिर की प्रदक्षिणा में गदा, खड्ग सर्प तथा नरमुण्ड और दूलादेव मंदिर में स्थित प्रतिमा में खड्ग, ढाल तथा नरमुण्ड है। जगदम्बा मंदिर में भैरव की एक ऐसी प्रतिमा भी है जिसमें उनके एक हाथ में पक्षी तथा शेष दो हाथों में घंटिका तथा खट्वांग है।

त्रिपुरान्तक - खजुराहो में आलिंगन मुद्रा की त्रिपुरान्तक प्रतिमा है। जिसमें उन्हें, घट, धनुष, बाण तथा नरमुण्ड धारण किये हुये बताया गया है।
यदि मुद्राओं के आधार पर देखा जाए तो खजुराहो में मौजूद शिव की चतुर्भज प्रतिमाओं को ही तीन श्रेणियों में बांटा जा सकता है - प्रथम श्रेणी में शिव की वे चतुर्भुजी प्रतिमायें है जिनमें शिव वरद मुद्रा में त्रिशूल, घट तथा सर्प धारण किये है। द्वितीय श्रेणी में वे शैव मूर्तियां हैं जिसमें पहली भुजा वरद अथवा अभय मुद्रा में है। तथा दूसरी भुजा में त्रिशूल है। अन्य भुजाओं में पाश, कमल अथवा पुस्तक है। तृतीय श्रेणी में शिव की वे प्रतिमायें है जिनमें शिव के दूसरी अथवा तीसरी भुजा में सर्प प्रदर्शित है जबकि पहली भुजा वरद, अभय अथवा आलिंगन मुद्रा में है। वरद मुद्रा में दूसरे हाथ में पुस्तक अथवा कमल तीसरे में सर्प और चौथे में घट प्रदर्शित है। अभय मुद्रा में दूसरे हाथ में पाश तीसरे में सर्प तथा चौथा कटि पर है।

भारतीय शिल्पकला यूं भी अत्यंत समृद्ध है और जब उसमें कथानक का समावेश हो जाता है तो ऐसा लगता है जैसे प्रतिमाएं जीवंत हो कर उन कथाओं को स्टेज पर मंचित कर रही हों। यूं भी भारत में प्रतिमा निर्माण की परम्परा बहुत प्राचीन है। खजुराहो का मूर्तिशिल्प शिव प्रतिमाओं के बिना पूर्ण हो ही नहीं सकता था। शिव जो संहारक हैं तो कल्याणकर्त्ता भी हैं। भोले हैं लेकिन दुखहर्त्ता हैं। संभवतः खजुराहो का शैव-शिल्प भी यही कहना चाहता है कि -‘शिव सबका कल्याण करें!’
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(दैनिक सागर दिनकर 11.03.2021 को प्रकाशित)
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Tuesday, January 8, 2019

राष्ट्रीय सेमिनार में डॉ शरद सिंह द्वारा ‘‘स्त्री जीवन के स्वर्णिमकाल से परिचित कराती खजुराहो की मूर्तिकला’’ विषय पर अपना व्याख्यान

Dr Sharad Singh With Dr Rahman Ali in  National Seminar at Ancient Indian History Department, Dr Hari Singh Gour Central University Sagar 2018
प्रख्यात इतिहासविद एवं भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद, दिल्ली के सदस्य डॉ. रहमान अली से मेरी मुलाकात हुई। अवसर था प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग डॉ हरीसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय सागर द्वारा आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया विषय था भारतीय संस्कृति को मध्य प्रदेश का योगदान"। यह विभाग का हीरक जयंती वर्ष है। इसी विभाग से मैंने एम.ए.(गोल्ड मेडल) एवं पीएचडी किया था। आयोजन में मैं और मेरी दीदी डॉ वर्षा सिंह आमंत्रित अतिथि के रुप में सम्मिलित हुए सुखद अनुभूति रही। इस अवसर पर मैंने ‘‘स्त्री जीवन के स्वर्णिमकाल से परिचित कराती खजुराहो की मूर्तिकला’’ विषय पर अपना व्याख्यान प्रस्तुत किया।   (18.12.2018)

विभागाध्यक्ष प्रो. नागेश दुबे एवं विभाग के सभी सदस्यों का हार्दिक आभार!
Dr Sharad Singh With Dr Rahman Ali and Dr Nagesh Dubey in  National Seminar at Ancient Indian History Department, Dr Hari Singh Gour Central University Sagar 2018

Dr Sharad Singh With Dr Rahman Ali in  National Seminar at Ancient Indian History Department, Dr Hari Singh Gour Central University Sagar 2018

Dr Sharad Singh With Dr Rahman Ali in  National Seminar at Ancient Indian History Department, Dr Hari Singh Gour Central University Sagar 2018
Dr Sharad Singh With Dr Rahman Ali in  National Seminar at Ancient Indian History Department, Dr Hari Singh Gour Central University Sagar 2018

Dr Sharad Singh With Dr Rahman Ali in  National Seminar at Ancient Indian History Department, Dr Hari Singh Gour Central University Sagar 2018

Dr Sharad Singh With Dr Rahman Ali in  National Seminar at Ancient Indian History Department, Dr Hari Singh Gour Central University Sagar 2018

Dr Sharad Singh With Dr Rahman Ali in  National Seminar at Ancient Indian History Department, Dr Hari Singh Gour Central University Sagar 2018

Dr Sharad Singh With Dr Rahman Ali in  National Seminar at Ancient Indian History Department, Dr Hari Singh Gour Central University Sagar 2018

Dr Sharad Singh  in  National Seminar at Ancient Indian History Department, Dr Hari Singh Gour Central University Sagar 2018

Dr Sharad Singh  in  National Seminar at Ancient Indian History Department, Dr Hari Singh Gour Central University Sagar 2018

Dr Sharad Singh  in  National Seminar at Ancient Indian History Department, Dr Hari Singh Gour Central University Sagar 2018

Dr Varsha Singh with Dr K K Tripathi in  National Seminar at Ancient Indian History Department, Dr Hari Singh Gour Central University Sagar 2018

Dr Sharad Singh and Dr Varsha Singh in  National Seminar at Ancient Indian History Department, Dr Hari Singh Gour Central University Sagar 2018

Dr Sharad Singh and Dr Varsha Singh in  National Seminar at Ancient Indian History Department, Dr Hari Singh Gour Central University Sagar 2018

Vice Chancellor Pro. R P Tiwari in  National Seminar at Ancient Indian History Department, Dr Hari Singh Gour Central University Sagar 2018


Dr Sharad Singh  in  National Seminar at Ancient Indian History Department, Dr Hari Singh Gour Central University Sagar 2018
 
Dr Sharad Singh  in  National Seminar at Ancient Indian History Department, Dr Hari Singh Gour Central University Sagar 2018