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Thursday, July 30, 2026

बतकाव बिन्ना की | प्रेमचंद जू ने सोई लिखी बुंदेलखंड की दो किसां | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बतकाव बिन्ना की  
प्रेमचंद जू ने सोई लिखी बुंदेलखंड की दो किसां
    - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

किसां के ‘‘सम्राट‘‘ कहाबे वारे प्रेमचंद जू को जनम जेई जुलाई मईना में 31 तारीख को 1880 में भओ रओ। उनको असली नांव धनपत राय हतो। उन्ने पैले नवाब राय के नांव से उर्दू में लिखो। काए से के ऊ टेम पे उर्दू ज्यादा चलत्ती। बे ओई नांव से लिखत रैते मनो एक सल्ल बींध गई। भओ का के उन्ने एक किताब लिखी जीको नांव हतो ‘‘सोजे वतन’’। बा 1909 में कानपुर के जमाना प्रेस से छपी रई। कोनऊं ने अंग्रेजन से कै दई के ‘‘सोजे वतन’’ में तो उनके खिलाफ लिखो गओ आए। फेर का हतो, ‘‘सोजे वतन’’ की कापियां जब्त कर ली गईं। जा दसा देख के ‘‘जमाना’’ अखबार के संपादक मुंशी दयानारायण निगम ने धनपतराय खों सलाय दई के उने अब नवाबराय के नांव की जांगा प्रेमचंद के नांव से लिखो चाइए। तभईं से धनपतराय प्रेमचंद के नांव से लिखन लगे। हम सबई जानत आएं के प्रेमचंद जू ने भौतई नोंनो साहित्य रचो। उन्ने किसानों की दसा पे किसां लिखीं। मजदूरन की दसा पे कलम चलाई औ लुगाइयन औ बच्चों पे भी किसांएं लिखीं, जैसे ‘‘बड़े घर की बेटी’’, ‘‘बूढ़ी काकी’’ औ ‘‘ईदगाह’’। प्रेमचंद जू ने फिल्मों के लाने भी लिखो मनो उने ई समाज के कमजोर लोगन पे लिखबो अच्छो लगत्तो। काए से के कमजोर लोगन पे भौतई कम लिखो जा रओ हतो। प्रेमचंद खों लगत्तो के बे चाए धन से कमजोर होंए, चाए जात से, चाए लुगाई होबे के कारन कमजोर होंए, उनके बारे में लिखो जाओ चाइए, जीसें समाज के सोच में तनक बदलाव आए।
खास बात जे सोई आए के प्रेमचंद जू खों बुंदेलखंड को इतिहास औ इते के रीत-रिवाज भौतई नोंने लगत्ते। जेई से उन्ने दो किसां बुंदेलखंड पे लिखीं। ईमें एक रई ‘‘राजा हरदौल’’ औ दूसरी ‘‘रानी सारंध्रा’’।  

‘‘राजा हरदौल’’ की किसां बुंदेलखंड में खींबई कई-सुनी जात आए। जा किसां ओरछा के राजा जुझार सिंह की आए। जुझार सिंह राजा भले हते, मनों हते बे पूरे सक्की-झक्की। औ संगे कान के कच्चे। उनके लोहरे भैया हते हरदौल जू। अब दोई से जलबे वारन की का कई जाए? कोनऊं ने एक दार जुझार सिंह खों पट्टी पढ़ा दई के आप तो राजकाज में उरझे रैत आओ औ उते तुमाओ लोहरो भैया हरदौल अपनी भौजी संगे नैन मट्क्का कर रैत आए। अकल को अंधरा राजा ने इत्तो ने सोचो के जोन भैया अपनी भौजी खों मताई घांई पूजत आए बा उनके संगे नैन मटक्का कैसे करहे? मनो संका को बीजा मन में परो नईं के देखत-देखत ऊकी बेल लहलहान लगत आए। जेई भओ राजा जुझार सिंह के संगे। ऐ बेर बे क ऊं लड़बे खों गए। उते से लड़ाई जीत के लौटे के कोनऊं ने फेर के उनके कान भर दए। ऊपर से जे औ पेल दऔ के जो लौं लाला हरदौल रैहें तब लौं जे अत्तें चलत रैहें। जुझार सिंह सो हतोई संका को मारो, सो ऊने अपनी रानी खों बुलाओ औ उनसे कई के अपने हाथन से लाला हरदौल के लाने खीर पकाओ। औ जो तुमाए दिल में खोट ने होए तो ऊ खीर में जहर मिला के अपने हाथन से हरदौल खों खवा देओ। जा सुन के रानी रोन लगी औ कैन लगी के ‘‘आपखों लाज नईं आ रई ऐसो कैए में? अरे, लाला हरदौल हमाओ बेटा घांईं आए। आप एक मताई से कै रए के अपने बेटा खों जहर खवा देओ, कछू होस बी आए आपखों?’’ मनो संका को अंधरो राजा अपनी रानी की कां सुनता? ऊने कई के यां तो तुम हरदौल खों जहर खवाओ ने तो हम तुमें छोड़ रए। फेर तुमाई मुतकी बदनामी हुइए। रानी रोन लगीं। ऊके भीतर मातई को कलेजा दुखन लगो। जा बात हरदौल खों पता परी तो उन्ने रानी खों समझाओ के जे मां-बेटा की मर्जादा को सवाल आए सो आप खुसी-खुसी हमें जहर वारी खीर खवा देओ। फेर जेई भओ के रानी को अपने करेजा पे फथरा रख के अपने बेटा घांई हरदौल खों जहर खवाने परो। जे बी कओ जात आए के हरदौल जू खों पान में जहर मिला के खवाओ गओ रओ। सो प्रेमचंद जू ने जेई किसां लिखी आए के हरदौल जू खों पान में जहर दओ गओ रओ। हरदौल जू तो ने रए, मनो बे मर के बी अमर हो गए। उतई राजा जुझार सिंह खों इज्जत ने मिली। उने संकालू आदमियन में गिनो जात आए। जबके उतई रानी की बी तारीफ करी जात आए।

दूसरी किसां आंए ‘‘रानी सारंध्रा’’। जे सोई अपने बुंदेलखंड पे आए। रानी  सारंध्रा ओरछा के राजा चम्पत राय की रानी औ महाराज छत्रसाल की मताई हतीं। ई किसां में प्रेमचंद जू ने राजा चम्पत राय की खींबईं प्रसन्सा करी आए। उनसे मुगल हरें डरात्ते। बे मुगलों की सेना खों धूरा चटा देत्ते। ऊंसई बीर रईं उनकी रानी सारंध्रा। बे अपने दपति औ बेटों खों युद्ध के लाने भेजत समै अपनी आंखन में अंसुवां ने आन देत्ती। बे उन ओरन को तिलक करतीं औ तलवार देके बिदा करतीं। संगे कैत्तीं के ‘‘अब बुंदेलन की लाज तुम ओरने के हाथन में आए। प्रान जाए मनो लाज ने जाने दइयो।’’ जा बात प्रेमचंद जू ने बी लिखी आए। बे रानी सारंध्रा के चरित्तर से खींबई प्रभावित रए। औ होते काए नईं, आखिर रानी सारंध्रा ने अपने बालक छत्रसाल को ऐसो लालन-पालन करो रओ के आगे चल के छत्रसाल ने केवल राजा बने, बाकी उन्ने बुंदेलखंड राज्य बना डारो। उन्ने सोई मुगलन के दांत खट्टे कर दए रए।

सो प्रेमचंद जू ने बुंदेलखंड के इतिहास से उन लोगन पे किसां लिखी जोन से बुंदेलन को सिर ऊंचो होत आए। मने जां एक तरफी प्रेमचंद जू ने दुखियारे, सोषन के शिकार औ कमजोरन पे किसां लिखीं उतईं बुंदेलखंड के गौरव औ बीरन पे बी किसां लिखी। जे अपन बुंदेलों के लाने गरब की बात आए।
बाकी बतकाव हती सो बढ़ा गई, हड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हप्ता करबी बतकाव तब तक लौं जेई की जुगाली करो। मनो सोचियो जरूर के अपने बुंदेलखंड को इतिहास, ईकी संस्कृति कित्ती नोंनी आए के इत्ते बड़े किसां लिखबे वारे प्रेमचंद जू बी इते की किसां लिखे बिना ने रए सके। मनो उन्ने बी इते की मरजादा खों समझी औ ऊंसई नोंनी किसां लिखीं। सो, आप ओरें सोई जे दोई किसां पढ़ियो जरूर, ईंसे प्रेमचंद जू की लेखनी को औ महत्व समझ में आहे। प्रेमचंद जू के जनमदिन पे उनको याद करत भए सबई खों हमाई जै-जै!!!    
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बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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Wednesday, July 29, 2026

चर्चा प्लस | प्रेमचंद की कहानियों में मौजूद है बुंदेलखंड का इतिहास और संस्कृति - डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर


चर्चा प्लस  

प्रेमचंद की कहानियों में मौजूद है बुंदेलखंड का इतिहास और संस्कृति 

 - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

 

                                      

    प्रेमचंद ने भारतीय समाज की विशेषताओं और अन्तर्विरोधों को एक कुशल समाजशास्त्री की भांति गहराई से समझा। इसलिए उनके साहित्य में भारतीय समाज की वास्तविकता स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है। स्त्रियों, दलितों सहित सभी शोषितों के प्रति प्रेमचंद ने अपनी लेखनी चलाई। प्रेमचंद मात्र एक कथाकार नहीं वरन् एक समाजशास्त्री भी थे। उनकी समाजशास्त्री दृष्टि सैद्धांतिक नहीं बल्कि व्यवहारिक थी। इसीलिए वे उस सच्चाई को भी देख लेते थे जो अकादमिक समाजशास्त्री देख नहीं पाते हैं। उन्होंने जहां एक ओर कर्ज में डूबे किसान की मनोदशा को परखा वहीं समाज के दोहरेपन की शिकार स्त्रियों की दशा का विश्लेषण किया। उन्होंने ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य की कहानियां भी लिखीं और उनके लिए प्रेमचंद ने बुंदेलखंड के कथानकों को चुना।


31 जुलाई 1880 को जन्मे प्रेमचंद को हिन्दी साहित्य का ‘कथा सम्राट’ कहा जाता है। प्रेमचंद ने ‘‘नवाबराय’’ के नाम से उर्दू में साहित्य सृजन किया। यह नवाबराय नाम उन्हें अपने चाचा से मिला था जो उनके बचपन में उन्हें लाड़-प्यार में ‘‘नवाबराय’’ कह कर पुकारा करते थे। किन्तु अंग्रेज सरकार के कारण उन्हें अपना लेखकीय नाम ‘‘नवाबराय’’ से बदलकर ‘‘प्रेमचंद’’ करना पड़ा। हुआ यह कि उनकी ’सोज़े वतन’ (1909, ज़माना प्रेस, कानपुर) कहानी-संग्रह की सभी प्रतियां तत्कालीन अंग्रेजी सरकार ने ज़ब्त कर लीं। उर्दू अखबार “ज़माना“ के संपादक मुंशी दयानरायण निगम ने उन्हें सलाह दी कि वे सरकार के कोपभाजन बनने से बचाने के लिए ‘‘नबावराय’’ के स्थान पर ’प्रेमचंद’ लिखने लगें। इसके बाद वे ‘‘प्रेमचंद’’ के नाम से लेखनकार्य करने लगे। 

प्रेमचंद ने भारतीय समाज की विशेषताओं और अन्तर्विरोधों को एक कुशल समाजशास्त्री की भांति गहराई से समझा। इसलिए उनके साहित्य में भारतीय समाज की वास्तविकता स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है। स्त्रियों, दलितों सहित सभी शोषितों के प्रति प्रेमचंद ने अपनी लेखनी चलाई। प्रेमचंद मात्र एक कथाकार नहीं वरन् एक समाजशास्त्री भी थे। उनकी समाजशास्त्री दृष्टि सैद्धांतिक नहीं बल्कि व्यवहारिक थी। इसीलिए वे उस सच्चाई को भी देख लेते थे जो अकादमिक समाजशास्त्री देख नहीं पाते हैं। उन्होंने जहां एक ओर कर्ज में डूबे किसान की मनोदशा को परखा वहीं समाज के दोहरेपन की शिकार स्त्रियों की दशा का विश्लेषण किया। उन्होंने ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य की कहानियां भी लिखीं और उनके लिए प्रेमचंद ने बुंदेलखंड के कथानकों को चुना। बुंदेलखंड पर आधारित उनकी दो कहानियां हैं- -‘राजा हरदौल’ और ‘रानी सारंधा’।

‘राजा हरदौल’ बुंदेलखंड की लोकप्रिय कथा है। इस बहुचर्चित कथा का बुंदेलखड के सामाजिक जीवन में भी बहुत महत्व है। यह कथा ओरछा के राजा जुझार सिंह की अपने छोटे भाई हरदौल सिंह के प्रति प्रेम और संदेह की कथा है जिसने ओरछा के इतिहास को प्रभावित किया। जुझार सिंह मुगल शासक शाहजहां के समकालीन थे। वे साहसी थे, वीर थे किन्तु उनकी संदेही प्रवृत्ति उनके इन गुणों को लांछित कर गई। इस वास्तविक घटना का सारांश यह है कि जब जुझार सिंह अपने दक्षिण भारत के अभियान पर गए तब उनका छोटा भाई हरदौल अपनी भाभी रानी कुलीना के साथ राज्य सम्हाल रहा था। दोनों का रिश्ता माता-पुत्र जैसा था। किन्तु कुछ ईर्ष्यालुओं ने जुझार सिंह के वापस आते ही रानी और हरदौल के मध्य अनैतिक संबंधों की चर्चा कर के जुझाार सिंह को भ्रमित कर दिया। संदेही जुझार सिंह अपने भाई और अपनी पत्नी की पवित्रता को नहीं देख सका और उसने अपनी पत्नी रानी कुलीना को आदेश दिया कि वह अपनी पवित्रता सिद्ध करने के लिए हरदौर को विष खिला दे। रानी स्तब्ध रह गई। अपने पुत्र समान देवर को जहर देना उसके लिए कठिन था। तब हरदौल ने अपनी भाभी को समझाया की सम्मान से बड़ा जीवन नहीं होता है, वे विष मिला भोजन परोस दें। अंततः रानी के द्वारा विष मिले भोजन को खा कर हरदौल ने अपना बलिदान दे दिया। यह भी कथा है कि जुझार सिंह ने रानी द्वारा भोजन में विष न दे पाने के कारण रानी से ही विष मिला पान का बीड़ा बनवा कर हरदौल को खिला दिया था जिससे हरदौल की मृत्यु हो गई थी। ओरछा में लाला हरदौल की समाधि आज भी मौजूद है और यह परम्परा है कि बुंदेलखंड में विवाह का पहला कार्ड लाला हरदौल का नाम लिख कर उनकी समाधि पर पहुंचाया जाता है। मान्यता है कि ऐसा करने से लाला हरदौल वधूपक्ष के घर वधू के मामा के रूप में आते हैं और विवाह निर्विघ्न सम्पन्न होता है।   

प्रेमचंद ने पान में विष मिला कर देने की कथा को अपनी कहानी में पिरोया है। उन्होंने ‘राजा हरदौल’ कहानी इन पंक्तियों से आरम्भ की है, ‘‘बुंदेलखंड में ओरछा पुराना राज्य है। इसके राजा बुंदेले हैं। इन बुंदेलों ने पहाड़ों की घाटियों में अपना जीवन बिताया है।’’ 

वे बुंदेलों के चरित्र की विशेषताओं को सामने रखते हुए हरदौल की ओर से यह संवाद लिखते हैं कि ‘खबरदार, बुंदेलों की लाज रहे या न रहे; पर उनकी प्रतिष्ठा में बल न पड़ने पाए- यदि किसी ने औरों को यह कहने का अवसर दिया कि ओरछे वाले तलवार से न जीत सके तो धांधली कर बैठे, वह अपने को जाति का शत्रु समझे।’ वहीं जुझार सिंह युद्ध के लिए विदा लेते समय अपनी रानी से कहता है, ‘प्यारी, यह रोने का समय नहीं है। बुंदेलों की स्त्रियां ऐसे अवसर पर रोया नहीं करतीं।’ इसी कहानी में प्रेमचंद ने एक ऐसी स्त्री के मनोभावों को बड़े ही मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया है जो अपने पुत्र, अपने भाई सरीखे देवर को विष देने के लिए विवश की जा रही है- ‘‘ रानी सोचने लगी, क्या हरदौल के प्राण लूं? निर्दोष, सच्चरित्र वीर हरदौल की जान से अपने सतीत्व की परीक्षा दूं? उस हरदौल के खून से अपना हाथ काला करूं जो मुझे बहन समझता है? यह पाप किसके सिर पड़ेगा? क्या एक निर्दोष का खून रंग न लाएगा? आह! अभागी कुलीना! तुझे आज अपने सतीत्व की परीक्षा देने की आवश्यकता पड़ी है और वह ऐसी कठिन? नहीं यह पाप मुझसे नहीं होगा। यदि राजा मुझे कुलटा समझते हैं, तो समझें, उन्हें मुझ पर संदेह है, तो हो। मुझसे यह पाप न होगा। राजा को ऐसा संदेह क्यों हुआ? क्या केवल थालों के बदल जाने से? नहीं, अवश्य कोई और बात है। आज हरदौल उन्हें जंगल में मिल गया। राजा ने उसकी कमर में तलवार देखी होगी। क्या आश्चर्य है, हरदौल से कोई अपमान भी हो गया हो। मेरा अपराध क्या है? मुझ पर इतना बड़ा दोष क्यों लगाया जाता है? केवल थालों के बदल जाने से? हे ईश्वर! मैं किससे अपना दुख कहूं? तू ही मेरा साक्षी है। जो चाहे सो हो, पर मुझसे यह पाप न होगा।’’

बुंदेलखंड पर आधारित दूसरी कहानी ‘रानी सारंधा’ बुंदेलखंड गौरव कहे जाने वाले महाराज छत्रसाल की मां रानी सारंधा की कथा है। रानी सारंधा ओरछा के राजा चम्पतराय की पत्नी थीं। चम्पतराय के संबंध में प्रेमचंद ने अपनी कहानी में लिखा है कि ‘राजा चम्पतराय बड़े प्रतिभाशाली पुरुष थे। सारी बुन्देला जाति उनके नाम पर जान देती थी और उनके प्रभुत्व को मानती थी। गद्दी पर बैठते ही उन्होंने मुगल बादशाहों को कर देना बन्द कर दिया और वे अपने बाहुबल से राज्य-विस्तार करने लगे। मुसलमानों की सेनाएं बार-बार उन पर हमले करती थीं पर हार कर लौट जाती थीं।’ 

‘रानी सारंधा कहानी के आरम्भ में वे बुंदेलखंड उस रियासत का वर्णन करते हैं जहां रानी सारंधा का जन्म हुआ था। वे लिखते हैं-‘शताब्दियां व्यतीत हो गयीं बुंदेलखंड में कितने ही राज्यों का उदय और अस्त हुआ मुसलमान आए और बुंदेला राजा उठे और गिरे-कोई गांव कोई इलाका ऐसा न था जो इन दुरवस्थाओं से पीड़ित न हो मगर इस दुर्ग पर किसी शत्रु की विजय-पताका न लहरायी और इस गांव में किसी विद्रोह का भी पदार्पण न हुआ। यह उसका सौभाग्य था।’ यह कथा रानी सारंधा के जीवन के साथ ही बंुदेलखंड के परिवेश से परिचित कराती है। कहानी के आरंभ में ही वे लिखते हैं-‘‘ अंधेरी रात के सन्नाटे में धसान नदी चट्टानों से टकराती हुई ऐसी सुहावनी मालूम होती थी जैसे घुमुर-घुमुर करती हुई चक्कियां। नदी के दाहिने तट पर एक टीला है। उस पर एक पुराना दुर्ग बना हुआ है जिसको जंगली वृक्षों ने घेर रखा है। टीले के पूर्व की ओर छोटा-सा गांव है। यह गढ़ी और गाँव दोनों एक बुंदेला सरकार के कीर्ति-चिह्न हैं। शताब्दियां व्यतीत हो गयीं बुंदेलखंड में कितने ही राज्यों का उदय और अस्त हुआ मुसलमान आये और बुंदेला राजा उठे और गिरे-कोई गांव कोई इलाका ऐसा न था जो इन दुरवस्थाओं से पीड़ित न हो मगर इस दुर्ग पर किसी शत्रु की विजय-पताका न लहरायी और इस गाँव में किसी विद्रोह का भी पदार्पण न हुआ। यह उसका सौभाग्य था।’’ प्रेमचंद ने बुंदेलखंड की स्त्री के आत्मसम्मान को बखूबी परखा और फिर उसे इन शब्दों में व्यक्त किया-‘‘ वायुमण्डल में मेघराज की सेनाएँ उमड़ रही थीं। ओरछे के किले से बुन्देलों की एक काली घटा उठी और वेग के साथ चम्बल की तरफ चली। प्रत्येक सिपाही वीर-रस से झूम रहा था। सारंधा ने दोनों राजकुमारों को गले से लगा लिया और राजा को पान का बीड़ा दे कर कहा-बुन्देलों की लाज अब तुम्हारे हाथ है।’’

प्रेमचंद ने रानी सारंधा की श्रेष्ठता को स्थापित करते हुए इस तथ्य को अपनी कहानी में सुंदर ढंग से पिरोया है कि रानी सारंधा ने राजा चम्पतराय के मन में स्वाभिमान को पुनःजाग्रत किया। उन्होंने लिखा है-‘‘ सारंधा-ओरछे में मैं एक राजा की रानी थी। यहां मैं एक जागीरदार की चेरी हूं। ओरछे में वह थी जो अवध में कौशल्या थीं यहां मैं बादशाह के एक सेवक की स्त्री हूँ। जिस बादशाह के सामने आज आप आदर से सिर झुकाते हैं वह कल आपके नाम से कांपता था। रानी से चेरी हो कर भी प्रसन्नचित्त होना मेरे वश में नहीं है। आपने यह पद और ये विलास की सामग्रियां बड़े महंगे दामों मोल ली हैं।’’ चम्पतराय के नेत्रों पर से एक पर्दा-सा हट गया। वे अब तक सारंधा की आत्मिक उच्चता को न जानते थे। जैसे बे-मां-बाप का बालक मां की चर्चा सुन कर रोने लगता है उसी तरह ओरछे की याद से चम्पतराय की आंखें सजल हो गयीं। उन्होंने आदरयुक्त अनुराग के साथ सारंधा को हृदय से लगा लिया।’’

प्रेमचंद ने जहां अपनी कहानियों में दुखी, दलित, शोषित और दुर्बल चरित्रों को महत्व दिया, वहीं बुंदेलखंड के इतिहास के तथ्यों और चरित्रों को भी अपनी कहानियों में स्थान दिया। कथा सम्राट प्रेमचंद के कथा साहित्य में बुंदेलखंड के कथानकों का पाया जाना इस बात का द्योतक है कि वे बुंदेली संस्कृति, परम्पराओं एवं इसके गौरवशाली इतिहास से प्रभावित थे।                 -----------------------

(दैनिक, सागर दिनकर में 29.07.2026 को प्रकाशित)  

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Tuesday, March 3, 2026

पुस्तक समीक्षा | ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक रंगों से रंगे बुंदेलखंड से परिचित कराती पुस्तक | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण


पुस्तक समीक्षा
ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक रंगों से रंगे बुंदेलखंड से परिचित कराती पुस्तक
- समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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पुस्तक - बुन्देलखण्ड: मध्यप्रदेश की अमूल्य विरासत
लेखिका - डाॅ. नीलिमा पिंपलापुरे
प्रकाशक - एन.डी. पब्लिकेशन, बहादुरपुर, साउथ ईस्ट दिल्ली-

110044
मूल्य -350/- (पेपरबैक)
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  बुंदेलखंड आदि काल से इतिहास एवं परंपराओं का धनी है। यह सच है कि इस क्षेत्र का पर्यटन-विकास उतना नहीं हो हुआ, जितना होना चाहिए था किन्तु अब इस ओर मध्यप्रदेश शासन का ध्यान गया है। लेखकों एवं इतिहासकारों ने बुंदेलखंड की विरासत को बचाने के लिए सतत शोधपूर्ण कलम चलाई है तथा विरासत को सहेजा है। इसी क्रम में सागर की लेखिका डाॅ नीलिमा पिंपलापुरे ने एक पुस्तक ‘‘बुंदेलखंड: द हार्टबीट आॅफ मध्यप्रदेश’’ का लेखन किया था जिसमें विश्व प्रसिद्ध छायाकार गणेश पंगारे द्वारा खींचे गए नयनाभिराम छायाचित्र थे। यह पुस्तक अंग्रेजी में थी। आवश्यकता थी ठीक उसी प्रकार की उपयोगी पुस्तक की हिन्दी भाषा में। इस आवश्यकता को महसूस करते हुए लेखिका नीलिमा पिंपलापुरे ने हिन्दी में अपनी नवीनतम पुस्तक प्रस्तुत की है जिसका नाम है- ‘‘बुंदेलखंड: मध्यप्रदेश की अमूल्य विरासत’’। इस पुस्तक में भी छायाकार गणेश पंगारे के छायाचित्र मौजूद हैं जिनके द्वारा बुंदेली विरासत के विविध रंगों को बारीकी से देखा और समझा जा सकता है।

बुंदेलखंड देश का वह क्षेत्र है जिसकी भौगोलिकता अपने आप में अनूठी है। इसके इतिहास में प्राचीनता है और यह कला में बेजोड़ है। इस क्षेत्र के बारे में इतिहासकार राय बहादुर सिंह ने लिखा था कि ‘‘बुंदेलखंड शौर्य एवं जीवटता का धनी है।’’ इसीप्रकार ‘‘बुंदेलखंड का संक्षिप्त इतिहास’’ पुस्तक लिखने वाले इतिहासकार गोरेलाल तिवारी का कथन था कि ‘‘बुंदेलखंड को जानने के बाद इससे प्रेम हो जाना स्वाभाविक है।’’ वहीं, डाॅ नर्मदा प्रसाद गुप्त बुंदेलखंड को प्रगैतिहासिक मनुष्यों से अद्यतन मानवों की विकास यात्रा का सटीक साक्ष्यमय उदाहरण मानते थे।
प्रागैतिहासिक काल से इंसानों ने बुंदेलखंड को अपने निवास के रूप में चुना। यहां स्थित गुफाचित्र इसका साक्ष्य प्रस्तुत करते हैं। मृदभाण्ड तथा तांबे के सिक्के इसकी प्राचीनता की कथा कहते हैं। बुंदेलखंड श्रीराम के वनगमन पथ का अभिन्न हिस्सा रहा है तथा प्राचीन वैश्विक व्यापार के ‘‘सिल्क रूट’’ का एक प्रमुख केन्द्र रहा है। बुंदेलखंड की वर्तमान विशेषता यह है कि यह दो राज्यों मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश में फैला हुआ है। लेखिका ने ‘‘बुंदेलखंड: मध्यप्रदेश की अमूल्य विरासत’’ में मध्यप्रदेश के हिस्से के बुंदेलखंड की विरासत को सहेजस है तथा अपनी यह पुस्तक बुंदेलखंड के निवासियों को समर्पित की है।

पुस्तक में कुल चार अध्याय हैं - बुंदेलखंड क्षेत्र, वन्य जीव पर्यटन, बुंदेलखंड के किले एवे मंदिर तथा कला एवं संस्कृति। इन चारो अध्यायों के उपरांत पांचवें अध्याय के रूप में संदर्भसूची रखी गई है।
प्रथम अध्याय है ‘‘बुंदेलखंड क्षेत्र’’। इस अध्याय में उन्होंने बुंदेलखंड की भौगोलिक स्थिति, बुंदेलखंड का मानचित्र तथा बुंदेलखंड का संक्षिप्त इतिहास दिया है। बुंदेलखंड के इतिहास में लेखिका ने इस क्षेत्र की प्राचीनता को ध्यान में रखते हुए प्रीहिस्टोरिक अर्थात प्रागैतिहासिक काल से आरंभ किया है। फिर रामायण काल, महाभारत काल, छठीं शताब्दी ईसा पूर्व, ईसा उपरांत तीसरी शताब्दी, तीसरी से चौथी शताब्दी, वाकाटकों की चौथी शताब्दी, चैथी से छठीं शताब्दी गुप्ता राजवंश, आठवीं शती गुर्जर-प्रतिहार, नवीं से तेरहवीं शती चंदेल राजवंश, चौदह से सोलहवीं शती बुंदेल साम्राज्य तथा 1720 सं 1760 तक मराठाओं का बुंदेलखंड पर राजनैतिक प्रभाव का परिचय दिया गया है। इसी अध्याय में प्राचीन नगर एरण, खजुराहो के मंदिर, महाराज छत्रसाल, ब्रिटिश साम्राज्य के समय बुंदेलखंड के बारे में जानकारी है। रानी लक्ष्मी बाई के संदर्भ में झांसी का परिचय है। सागर के गोविंद पंत खेर के योगदान का विवरण है। सागर का परिचय देते हुए यहां की लाखा बंजारा झील से जुड़ी रोचक किंवदंती तथा सागर विश्वविद्यालय का परिचय है। अंत में देश की स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद बुंदेलखंड का स्वरूप जो विंध्यप्रदेश तथा मध्यभारत के अंग के रूप में रहा तथा वर्तमान बुंदेलखंड की जानकारी है। 

दूसरे अध्याय ‘‘वन्य जीव पर्यटन ’’ में वन्य जीव पर्यटन अर्थात वाइल्ड लाईफ टूरिज्म की संक्षिप्त जानकारी है। लेखिका ने इसमें पन्ना टाइगर रिजर्व, पाण्डव गुफा एवं झरना पन्ना, किमासन जलप्रपात पन्ना, किलकिला झरना पन्ना, केन घड़ियाल सेंचुरी पन्ना, भीमकुंड तथा नौरादेही रानी दुर्गावती टाईगर सेंचुरी के बारे में जानकारी दी है। ये सभी मनोरम स्थान हैं जो पर्यटकों को आकर्षित करने की क्षमता रखते हैं।
दूसरे अध्याय में ही बुंदेलखंड की वन आधारित आजीविका की जानकारी दी गई है। इस अध्याय में बुंदेलखंड की कृषि संबंधी तथा वनोपज की जानकारी दी गई है। चूंकि बीड़ी व्यवसाय बुंदेलखंड का एक प्रमुख व्यवसाय है अतः तेंदू पत्ता जिसका उपयोग बीड़ी निर्माण में होता है तथा बीड़ी बनाने की चर्चा की गई है। वनोपज पर आधारित दूसरा बड़ा व्यवसाय है महुआ बीनने का। महुआ बीनने तथा इसके विविध उपयोग की संक्षिप्त जानकारी दी गई है। 
तीसरा अध्याय है ‘‘बुंदेलखंड के किले एवं मंदिर’’। इस संबंध में लेखिका ने परिचयात्मक ढंग से अध्याय के आरंभ में ही लिखा है कि -‘‘प्राचीन संस्कृति और परंपराओं की भूमि बुंदेलखंड अपने पुरातात्विक स्मारकों और सभी धर्मों, हिंदू, मुस्लिम, जैन और बौद्धों के लिए तीर्थ स्थानों के लिए प्रसिद्ध है। शानदार किले गौरवशाली अतीत, महान राजवंशों, सम्राटों और योद्धाओं की याद दिलाते हैं।’’ इसमें कोई संदेह नहीं कि बुंदेलखंड स्थपत्य और कला का धनी है। यहां के किलों का पुराणों में उल्लेख मिलता है। डाॅ. पिंपलापुरे ने इस अध्याय में जिन किलों का उल्लेख किया है, वे हैं- कालिंजर, झांसी (यद्यपि यह वर्तमान में उत्तरप्रदेश में स्थित है), ओरछा के किले, मंदिर एवं छतरियां। साथ ही ओरछा की रानी गणेशकुंवरी, लाला हरदौल की कथा का भी उल्लेख है। इसके अतिरिक्त अजयगढ़ का किला, दतिया महल, खजुराहो, धामोनी, गढ़पहरा, सागर, रहली का किला, चंदेरी, तालबेहट, धुबेला संग्रहालय, हृदयशाह का महल तथा पन्ना के प्रसिद्ध मंदिरों का परिचय दिया गया है। वैसे खजुराहो को एक स्वतंत्र अध्याय बनाया जा सकता था तथा ‘खजुराहो और उसके आस-पास’ के रूप में उस पूरे क्षेत्र चंदला, मंड़ला, बसारी आदि को हाईलाईट किया जा सकता था।

दमोह जिले में स्थित जैन तीर्थ कुण्डलपुर, सागर के रानगिर का हरािद्धी माता मंदिर, श्रीदेव पंढरीनाथ मंदिर, रहली का सूर्य मंदिर, विनायका का विष्णु मंदिर तथा सागर के वृंदावन बाग मंदिर का विवरण भी इसी तीसरे अध्याय में है।

     चौथा अध्याय ‘‘कला एवं संस्कृतिक’’ का है। लेखिका डाॅ नीलिमा पिंपलापुरे के शब्दों में-  ‘‘बुंदेलखंड का खूबसूरत इलाका परंपराओं का शाही इतिहास दर्ज करता है। चाहे वह विरासत हो, कला और शिल्प, हथकरघा या संस्कृति, यह अपनी विशिष्टता के लिए जाना जाता है। बुंदेलखंड का पारंपरिक संगीत और नृत्य, त्यौहार और समारोह, साहित्य और ऐतिहासिक स्मारक बुंदेलखंड की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के कई महत्वपूर्ण पहलू हैं।’’ इस अध्याय में बुंदेलखंड में प्रचलित काष्ठ एवं धातु शिल्प, चंदेरी के वस्त्र उद्योग, ताराग्राम ओरछा के हस्त निर्मित कागज उद्योग की जानकारी है। बुंदेली वाॅल पेंटिंग्स के साथ ही नृत्य कलाओं जैसे राई, दिवारी आदि एवं बुंदेली लोग गायन दादरा, फाग, लमटेरा आदि की संक्षिप्त जानकारी है। इसके साथ ही बुंदेली पकवानों के आस्वाद का भी संक्षिप्त परिचय है।

वस्तुतः यह एक ऐसी पुस्तक है जो संक्षेप में पर्यटकों को बुंदेलखंड की विविधरंगी विरासत से परिचित कराती है। इसका मूल उद्देश्य पर्यटकों को बुंदेलखंड की ओर आकर्षित करना है, जिसमें यह पुस्तक खरी उतरती है। पुस्तक का कव्हर, मुद्रण तथा कागज बेहतरीन है। लेखिका ने पुस्तक की प्रस्तावना में लिखा है कि-‘‘यह प्रकाशन बुन्देलखण्ड के प्रति मेरे प्रेम और लगन का परिणाम है। मेरा विचार बुन्देलखण्ड के अनूठे पहलुओं को उजागर करना है और इसे एक सम्मानपूर्ण स्थान दिलाना है, जिसका यह क्षेत्र हकदार है। मैंने मुख्य रूप से मध्यप्रदेश के बुन्देलखंड वाले माग पर ध्यान केन्द्रित किया है, क्योंकि यहीं मैं पिछले पचास वर्षों से निवासरत हूँ और यही वह क्षेत्र है जो मेरे हृदय के करीब है। मुझे पूरा विश्वास है कि यह पुस्तक इस सुन्दर क्षेत्र को अग्रसर करने हेतु उपयोगी सिद्ध होगी। यह पुस्तक, बुन्देलखण्ड का एक विस्तृत या गहन अध्ययन नहीं है, बल्कि यह दुनिया को इस रहस्यमय भूमि और इसकी समृद्ध विरासत से परिचित कराने का एक प्रयास है, जिससे पर्यटन को बढ़ावा मिले और बुन्देलखण्ड के इस सुन्दर क्षेत्र का भ्रमण करने के लिए यहाँ पर्यटक आयें। अपनी यात्रा के दौरान, मैंने बुन्देलखण्ड के प्रत्येक क्षेत्र का विस्तार से अध्ययन, दौरा किया है और मैं अपना पर्यवेक्षण इस पुस्तक के द्वारा साझा करना चाहती हूँ।’’ उन्होंने आगे लिखा है कि ‘‘पिछले पाँच दशकों से सागर जैसे सुन्दर शहर में रहते हुए, मेरे मन में बुन्देलखण्ड के प्रति गहरी आत्मीयता की भावना विकसित हुई है, जो वास्तव में भारत की जीवन रेखा और दिल की धड़कन है। मैं अपने व्यक्तित्व का श्रेय इस मनमोहक भूमि के सौहार्दपूर्ण लोगों व अपने परिवार को देती हूँ, जो मेरी ताकत, मेरा जीवन और मेरी प्रेरणा रहे हैं, जो जीवन की चुनौतियों के माध्यम से लगातार मेरा मार्गदर्शन करते रहे हैं। मैंने पूरे विश्व की यात्रा की है. लेकिन मुझे केवल सागर में ही अपने घर में सुख और सुकून मिलता है।’’
निःसंदेह बुंदेलखंड के इतिहास, सांस्कृतिक परंपराओं एवं नैसर्गिक सौंदर्य में हृदय को मोह लेने की क्षमता है। लेखिका के उत्साह एवं भावनाओं को पुस्तक में अनुभव किया जा सकता है। पुस्तक में कई महत्वपूर्ण स्थान छूट गए है किन्तु इसमें कोई संदेह नहीं कि लेखिका डाॅ. नीलिमा पिंपलापुरे ने इसे लिखने में निश्चित रूप से श्रम किया है क्योंकि जानकारी भले ही संक्षेप में दी जाए किन्तु वह जानकारी जब तक समग्रता से ज्ञात न हो तब तक उसका संक्षेपीकरण भी नहीं किया जा सकता है। इस परिचयात्मक पुस्तक की भाषा सरल एवं सुगम है। छायाचित्रों ने पुस्तक की गुणवत्ता को द्विगुणित कर दिया है। यह पुस्तक हर दृष्टि से पठनीय एवं संग्रहणीय है।         
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Saturday, October 4, 2025

शून्यकाल | फिल्मी दुनिया में बुंदेलखंड की उपस्थिति को प्रतीक्षा है एक बॉक्स ऑफिस की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नयादौर

शून्यकाल | फिल्मी दुनिया में बुंदेलखंड की उपस्थिति को प्रतीक्षा है एक बॉक्स ऑफिस की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नयादौर
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शून्यकाल
फिल्मी दुनिया में बुंदेलखंड की उपस्थिति को प्रतीक्षा है एक बॉक्स ऑफिस की
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
          मनोरंजन जगत में बुंदेली और बुंदेलखंड के कलाकारों का दबदबा धीरे-धीरे बढ़ता जा रहा है। बुंदेलखंड का फिल्मी दुनिया से नाता यूं तो काफी पुराना है, गीतकार विट्ठल भाई पटेल, कलागुरु विष्णु पाठक और निर्माता- निर्देशक शिवकुमार ने बुंदेलखंड को फिल्मी दुनिया में एक खास पहचान दिलाई। आशुतोष राणा, गोविंद नामदेव, मुकेश तिवारी आदि अभिनेताओं ने बुंदेलखंड का परचम बाॅलीवुड में फहराने का काम किया। फिर भी बुंदेली फिल्मों का निर्माण उस तरह से नहीं हुआ जैसे भोजपुरी फिल्मों का होता है। क्षेत्रीयता के हिसाब से भोजपुरी फिल्मों में जिस तरह से अपनी धाक जमाई उसे देख कर लगता है कि उस तक पहुंचाने के लिए बुंदेली को अभी लंबी यात्रा करनी पड़ेगी।

कला की सज़ीदगी और स्पष्टवादिता के लिए प्रसिद्ध गोविंद नामदेव का कहना है कि ‘‘बुंदेली बोली को कई बार ट्राय किया और इंडस्ट्रीज में दिखाया, लेकिन अंत में प्रोड्यूसर की बात मानी जाती है। वो जो कहता है, वह होता है, क्योंकि पैसा वह लगा रहा है। उन्होंने कहा कि अब बुंदेलखंड की बोली को पहचान हप्पू सिंह के किरदार से मिल रही है। इसे हम रिफरेंस में दिखा सकते हैं।’’      
          मनोरंजन जगत में बुंदेली और बुंदेलखंड के कलाकारों का दबदबा धीरे-धीरे बढ़ता जा रहा है। बुंदेलखंड का फिल्मी दुनिया से नाता यूं तो काफी पुराना है, गीतकार विट्ठल भाई पटेल, कलागुरु विष्णु पाठक और निर्माता-निर्देशक शिवकुमार ने बुंदेलखंड को फिल्मी दुनिया में एक खास पहचान दिलाई। आशुतोष राणा, गोविंद नामदेव, मुकेश तिवारी आदि अभिनेताओं ने बुंदेलखंड का परचम बाॅलीवुड में फहराने का काम किया। कला की सज़ीदगी और स्पष्टवादिता के लिए प्रसिद्ध गोविंद नामदेव का कहना है कि ‘‘बुंदेली बोली को कई बार ट्राय किया और इंडस्ट्रीज में दिखाया, लेकिन अंत में प्रोड्यूसर की बात मानी जाती है। वो जो कहता है, वह होता है, क्योंकि पैसा वह लगा रहा है। उन्होंने कहा कि अब बुंदेलखंड की बोली को पहचान हप्पू सिंह के किरदार से मिल रही है। इसे हम रिफरेंस में दिखा सकते हैं।’’ 
      बेशक हप्पू सिंह का पात्र बुंदेली और बुंदेलखंड के परिप्रेक्ष्य में एक मील का पत्थर है जहां से मनोरंजन जगत में बुंदेली के लिए अनेक रास्ते खुलने लगे हैं। उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के लगभग 20 जिलों में बुंदेली भाषा बोली और सुनी जाती है। बुंदेली संस्कृति के विद्वान स्व. नर्मदा प्रसाद गुप्ता ने अपनी किताब बुंदेली संस्कृति और साहित्य में लिखा है कि ‘‘मध्य प्रदेश में बुंदेलखंड, बघेलखंड, मालवा और निमाड़ा, चार जिलों में बुंदेली का प्रवाह ज्यादा है। भारतीय लोक परंपरा के विकास में बुंदेली का अहम योगदान है।’’ अब बुंदेली का प्रभाव टीवी चैनल्स पर छाता जा रहा है। इससे पहले मंचों और सीडी के माध्यम से बुंदेली लोकगीतों एवं नाटकों का बोलबाला रहा किन्तु अपसंस्कृति की छाया ने इसमें फूहड़पन घोल दिया। जिससे बुंदेली एक बार फिर तिरस्कार की ओर बढ़ने लगी थी। लेकिन टीवी चैनल्स ने बुंदेली के प्रसार में एक नई जान फूंक दी। चूंकि टीवी चैनल्स परिवार के साथ देखे जा सकने वाले कार्यक्रम दिखाने के अधिकारी होते हैं अतः इनमें बुंदेली के स्तर को चोट पहुंचने की संभावना नहीं है। कुछ लोग यह मानते हैं कि हप्पू सिंह के किरदार के रूप में बुंदेली को हास्य की भाषा के रूप में प्रोजेक्ट करने से नुकसान हो सकता है किन्तु वस्तुतः यह भय निरापद है। हास्य-व्यंग्य के संवाद किसी भी व्यक्ति के दिल को गुदगुदाते हैं और उसे अपनी ओर आकर्षित करते हैं। इससे संबंधित भाषा को भी निकअता पाने का अवसर मिलता है। लोग आज बुंदेली के संवादों को बहुत पसंद करने लगे हैं। हप्पू सिंह के किरदार में कलाकार योगेश त्रिपाठी जब किसी भी मंच से अपने सीरियल के डाॅयलाॅग ‘‘काए कां गए थे’’ या ‘‘काय का हो रओ’’ बोलते हैं तो बुंदेलीखंड से बाहर के श्रोता ओर दर्शक भी न केवल तालियां बजाते हैं बल्कि उनके डाॅयलाॅग दोहराने लगते हैं। बुंदेली संवादों ने टीवी चैनल्स की टीआरपी पर भी अपनी धाक जमा ली है। एक और टीवी सीरियल ‘‘गुडिया हमारी सब वे भारी’’ में बुंदेली संवाद और बुन्देली पारिवारिक चुहलबाजी को बड़े खूबसूरत ढंग से प्रसतुत किया गया है। इसे भी हिन्दी भाषी क्षेत्रों भरपूर लोकप्रियता मिल रही है। इसमें चुलबुली गुडिया का किरदार सारिका बहरोलिया अपने बुन्देली के शब्दों से खूब वाहवाही पा रही हैं।
सन् 1992 में आए प्रसिद्ध टीवी धरावाहिक ‘‘परिवर्तन’’ से अपनी पहचान बनाने वाले गोविंद नामदेव आज एक लोकप्रिय अभिनेता हैं। उनके अभिनय की विविधता दर्शकों को हमेशा प्रभावित करती है। सन् 1995 में महेश भट्ट द्वारा निर्देशित सीरियल ‘‘स्वाभिमान’’ में आशुतोष राणा एक सादगी भरे ऐसे ग्रामीण युवा जो शहर के तौर-तरीकों से अनभिज्ञ है, के रोल में छोटे पर्दे पर आए तो दर्शकों के दिलों पर ‘‘त्यागी’’ के रूप में अपनी छाप छोड़ गए। महेश भट्ट ने उनकी प्रतिभा को आगे बढ़ाया और आशुतोष राणा को अपनी फिल्म ‘‘दुश्मन’’ में सायको किलर ‘‘गोकुल पंडित’’ के रोल के लिए चुना। सन् 1098 में फिल्म ‘‘चाईना गेट’’ में सागर में जन्में और सागर में ही पले-बढ़े मुकेश तिवारी को ‘‘जगीरा’’ का रोल मिला तो उनका बोला यह संवाद बच्चे-बच्चे की जुबान पर छा गया था-‘‘मेरे मन को भाया, मैं कुत्ता काट के खाया।’’
         अकसर यह हंसी मज़ाक में कहा जाता है कि बुंदेलखंड के अभिनेताओं को हीरो के बदले विलेन का ही रोल मिलता है। जब यही प्रश्न गोविंद नामदेव से पूछा गया तो उन्होंने साफ़ शब्दों में उत्तर दिया कि ‘‘बुंदेलखंड के पानी में ठसक है, इसलिए यहां के विलेन सबसे ज्यादा सामने आ रहे हैं और कोई बड़ा हीरो अभी तक नहीं आया।’’ यह बहुत हद तक सच है कि बुंदेलखंड के किसी भी अभिनेता को हीरो का रोल नहीं मिल पाया है लेकिन यह भी सच है कि ललितपुर में जन्में अभिनेता राजा बुंदेला ने ‘‘विजेता’’ और ‘‘अर्जुन’’ जैसी फिल्मों में सकारात्मक रोल किए। स्वयं गोविंद नामदेव ने अनेक सकारात्मक रोल किए हैं। बेशक़ यह कमी जरूर रही है कि बुंदेलखंड से किसी अभिनेत्री ने अपनी जोरदार उपस्थिति बाॅलीवुड में अभी तक दर्ज़ नहीं कराई है। लेकिन संभावनाएं विपुल हैं। पिछले कुछ वर्षों से बुंदेलखंड में फिल्म फेस्टिवल्स के छोटे-बड़े कई आयोजन हो चुके हैं। खजुराहो इंटरनेशल फिल्म फेस्टिवल में देशी विदेशी फिल्मों के साथ बुंदेलखंड के कलाकारों द्वारा बनाई गई टेली और शार्ट फिल्मों तथा वृत्त चित्रों का भी प्रदर्शन किया जाने लगा है। इससे मंनोरंजन के क्षेत्र में काम करने वाले युवाओं में उत्साह बढ़ा है। खजुराहो, झांसी और ओरछा में भी फिल्म फेस्टिवल आयोजित किए जा चुके हैं। अभिनेता गोविंद नामदेव सागर, दमोह आदि शहरों में अभिनय प्रशिक्षण शिविर लगा कर प्रशिक्षण देते रहते हैं जिससे बुंदेली कलाकारों को अपनी अभिनय क्षमता को निखारने का अवसर मिलता है तथा वे आत्मविश्वास के साथ फिल्म और टेलीविजन की ओर बढ़ने लगे हैं।
खजुराहो इंटरनेशल फिल्म फेस्टिवल में कई बुंदेली शार्ट्स फिल्मों का प्रदर्शन किया गया। इनमें कुछ फिल्में वाकई गंभीर विषयों पर थीं ओर उन्हें पूरी गंभीरता से बनाया गया था। बुंदेलखंड के युवा फिल्म निर्माताओं को यह ध्यान रखना होगा कि वे ‘‘टिकटाॅक’’ की ज़मीन से ऊपर उठ कर फिल्म बनाने पर अपना ध्यान केन्द्रित करें। माना कि बुंदेलखंड में आर्थिक साधनों की कमी है लेकिन यह बात याद रखने की है कि ‘चक्र’, ‘पार’, ‘दामुल’, ‘अंकुर’ जैसी कालजयी फिल्में सीमित साधनों में बनाई गई थीं। यदि अपनी प्रतिबद्धता बनाए रखें तो इसमें तनिक भी संदेह नहीं है कि वरिष्ठ अभिनेताओं, निर्देशकों एवं निर्माताओं से सीखते हुए बुंदेलखंड के युवा मनोरंजन जगत में बुंदेली और बुंदेलखंड का नाम रोशन करेंगे।
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Sunday, August 17, 2025

शून्यकाल | स्वतंत्रता दिवस विशेष | स्वतंत्रता संग्राम में बुंदेलखंड की महिलाओं का योगदान | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नयादौर

शून्यकाल : स्वतंत्रता दिवस विशेष   

स्वतंत्रता संग्राम में बुंदेलखंड की महिलाओं का योगदान
- डाॅ (सुश्री) शरद सिंह                                                                          
         "पराधीन सपनेहुँ सुख नाही" गोस्वामी तुलसीदास की यह पंक्ति बिलकुल सही है कि परतंत्रता से बढ़कर कोई अभिशाप नहीं। दुर्भाग्यवश हमारे देश ने एक, दो नहीं बल्कि पूरे 200 साल की परतंत्रता झेली है। इसीलिए समय-समय पर विद्रोह होते रहे गुलामी का जुआ कंधे से उतार फेंकने के लिए अनेक प्रयास किए गए। ऐसे प्रयासों में बच्चे, बूढ़े, स्त्री, पुरुष सभी अपना योगदान दिया। हमारे भारतीय इतिहास में ऐसी अनेक महिलाएं हुई जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में बढ़-चढ़कर भाग लिया। बुंदेलखंड में भी अनेक वीरांगनाएं हुई जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में अपने सुख, सुविधा एवं प्राणों तक का बलिदान कर दिया।  
      पराधीनता मानव का सबसे बड़ा पतन है। गुलाम रहकर कोई भी व्यक्ति सुखी जीवन नहीं बिता सकता। हमारा प्यारा देश भारत सदियों तक परतनता के पाश में जकड़ा रहा। यही कारण है कि कभी सोने की चिड़िया कहा जाने वाला यह देश धीरे -धीरे निर्धन हो गया। स्वतन्त्रता प्राप्त करते ही देश के नागरिक शीघ्रता से प्रगति की ओर बढ़े और अल्पकाल में ही चारों ओर समृद्धि दिखाई देने लगी। किन्तु स्वतंत्रता प्राप्ति के इस सफर में अनेक स्त्री पुरुषों ने कठोर संघर्ष किया यहां तक की अपने प्राणों की आहुति भी दी। स्वतंत्रता संग्राम में बुंदेलखंड का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। 1857 की क्रांति में बुंदेलखंड के वीरों ने अंग्रेजों के खिलाफ जमकर लोहा लिया। रानी लक्ष्मीबाई, तात्या टोपे, और अन्य क्रांतिकारियों ने बुंदेलखंड को स्वतंत्रता आंदोलन का केंद्र बनाया।  यूं भी बुंदेलखंड की भूमि वीरों की भूमि रही है। स्वतंत्रता संग्राम में बुंदेलखंड की महिलाओं का योगदान याद आते ही सबसे पहला नाम मानस में कौंधता है झांसी की रानी लक्ष्मीबाई का। जिन्होंने हाथ में तलवार लेकर घोड़े पर सवार होकर और अपने मातृत्व धर्म को निभाते हुए पीठ पर अपने नन्हें बालक को बांधकर युद्ध के मैदान में अपनी वीरता का परिचय दिया। महाराष्ट्र में जन्मी लक्ष्मी बाई जब बुंदेलखंड में झांसी की रानी बनकर आईं तो उसके बाद उन्होंने बुंदेलखंड को पूरी तरह से अपना लिया और उसके प्रति समर्पित हो गईं। झांसी की रक्षा के लिए उन्होंने न केवल अंग्रेजों से लोहा लिया वरन् अपनी जान की बाजी भी लगा दी। उनका जन्म 19 नवंबर, 1828 को वाराणसी, उत्तर प्रदेश में हुआ था। उनका वास्तविक नाम मणिकर्णिका था।पढ़ाई के दौरान ही उन्होंने मार्शल आर्ट का औपचारिक प्रशिक्षण भी लिया, जिसमें घुड़सवारी, निशानेबाजी और तलवारबाज़ी शामिल थी। मनु के साथियों में नाना साहब (पेशवा के दत्तक पुत्र) और तात्या टोपे शामिल थे।14 साल की उम्र में मनु का विवाह झाँसी के महाराजा गंगाधर राव नेवालकर से हुआ, जिनकी पहली पत्नी का बच्चा होने से पूर्व ही निधन हो गया था जो सिंहासन का उत्तराधिकारी होता। अतः मणिकर्णिका झाँसी की रानी, लक्ष्मीबाई बन गई। रानी लक्ष्मीबाई ने एक पुत्र को जन्म दिया जिसकी जन्म के तीन महीने बाद ही मृत्यु हो गई। बाद में दंपति ने गंगाधर राव के परिवार से एक बेटे दामोदर राव को गोद ले लिया। सन 1853 में जब झाँसी के महाराजा की मृत्यु हो गई, तो लॉर्ड डलहौजी ने गोद लिये गए बच्चे को उत्तराधिकारी के रूप स्वीकार करने से इनकार कर दिया और राज्य पर कब्ज़ा कर लिया। रानी लक्ष्मीबाई ने अंग्रेज़ों के खिलाफ बहादुरी से लड़ाई लड़ी ताकि झाँसी साम्राज्य को विलय से बचाया जा सके। किन्तु 17 जून, 1858 को युद्ध के मैदान में लड़ते हुए वे मृत्यु को प्राप्त हुईं । 

झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की भांति वीरांगना झलकारी बाई का नाम भी स्वतंत्रता संग्राम में स्वर्ण अक्षरों में लिखा हुआ है। वे एक बहुत छोटे से गांव जिसका नाम था लड़िया, में कोरी परिवार में पैदा हुई थीं। झलकारी का बचपन का नाम झलरिया था। उनके माता-पिता की आर्थिक दशा अत्यंत शोचनीय थी किंतु उन्होंने अपनी बेटी झलकारी का लालन-पालन पूरे ममत्व और लगन से किया। समय आने पर झलकारी बाई का विवाह झांसी में निवास करने वाले पूरन कोरी के साथ हुआ। झांसी में रहते हुए झलकारी बाई रानी लक्ष्मी बाई के संपर्क में आईं। वे लक्ष्मी बाई के व्यक्तित्व से बेहद प्रभावित हुईं। रानी ने भी एक सखी के समान झलकारी बाई को अपनाया। झलकारी बाई ने रानी की वफादारी का हलफ उठाया। ण्क बार उन्होंने अपने पति पूरन कोरी से कहा था कि ‘‘हम पर रानी को एहसान है। हमने उनको नमक खाओ है। हम दिखा देहें के झलकारी का है।’’ 
रानी लक्ष्मी बाई ने स्त्रियों के जो विशाल सेना बनाई थी उसमें झलकारी को मुख्य स्थान दिया गया था। झलकारी ने भी लक्ष्मी बाई के हर सैन्य अभियान में उनका साथ दिया। एक बार झलकारी ने सभी जाति की स्त्रियों को इकट्ठा करके इतना जोशीला भाषण दिया था कि महिलाएं इतनी उत्तेजित हो उठी थीं कि उन्होंने स्वयं अपने हाथों में बंदूक उठाकर अंग्रेजों पर निशाना साधना शुरू कर दिया था। झलकारी ने इस बुंदेली कहावत को चरितार्थ कर दिया था कि ‘‘गर्दन कट जाए पर शीश नहीं झुकेगा’’।

जैतपुर बुंदेलखंड की एक छोटी-सी रियासत थी 27 नवंबर 1842 को लार्ड एलेन रोने जैतपुर पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया था। उस समय जैतपुर के राजा परीक्षित थे जो आजादी के दीवाने थे। उन्होंने अंग्रेजों से युद्ध किया किन्तु सैन्यबल की कमी होने से उन्हें पराजय का मुंह देखना पड़ा। अंग्रेज सरकार ने जैतपुर का शासन अपने चाटुकार सामंत को दे दिया। जैतपुर के राजा इस दुख को सहन न कर सके और उनका प्राणांत हो गया। राजा परीक्षित की रानी को अपने पति के राज्य को पुनः प्राप्त करने के लिए अंग्रेज सरकार के विरुद्ध क्रांति का रास्ता अपनाना पड़ा। जैतपुर, सिमरिया को रानी ने अंग्रेजों से छीन लिया। तब स्थानीय मजिस्ट्रेट के आदेश के विरुद्ध रानी ने जैतपुर में एक हथियारबंद सेना रख्ना शुरू कर दिया। जैतपुर की रानी को मजिस्ट्रेट ने दोबारा चेतावनी दी कि वे जैतपुर से अपने हथियारबंद सेना हटा दें। लेकिन रानी मजिस्ट्रेट के दबाव को मानने को तैयार नहीं हुई। अंततः रानी को चेतावनी दी गई। फिर भी वे नहीं झुंकीं।

जालौन उत्तर प्रदेश का एक छोटा सा हिस्सा है। इसी जालौन में वीरांगना ताई बाई ने सन् 1857 की क्रांति में हिस्सा लेकर लगभग 7 माह जालौन जनपद में स्वतंत्र क्रांतिकारी सरकार स्थापित करके उसके प्रमुख के रूप में कार्य किया और अन्य प्रमुख क्रांतिकारियों जैसे राव साहब तात्या टोपे आदि की धन तथा सैन्य बल से सहायता की। अंग्रेज तो उनसे अधिक नाराज थे कि जनपद के जनमानस से उनकी स्मृति को मिटाने के लिए उनके किले को तुड़वा कर जमीन में मिला दिया गया। 

 बांदा नवाब की बेटी राबिया बेगम का नाम भी बुंदेलखंड की स्वतंत्रता संग्राम सेनानी महिलाओं में एक अग्रणी नाम है। अल्पायु में ही उन्हें इस बात का एहसास हो गया था कि जब तक अंग्रेजों को बुंदेलखंड से दूर नहीं किया जाएगा तब तक बुंदेलखंड का विकास नहीं हो सकेगा। बुंदेलखंड के विभिन्न राज्य सुरक्षित नहीं रह सकेंग। इसी बात को ध्यान में रखते हुए उन्होंने अपने हाथों में तलवार ले कर अंग्रेजों का सामना किया और अपने प्राणों की आहुति दे दी।

 सन् 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के बाद देश में स्वतंत्रता आंदोलन क्रमशः चलता रहा। महात्मा गांधी के नेतृत्व में असहयोग आंदोलन चलाया गया। इस असहयोग आंदोलन में भी बुंदेलखंड की महिलाओं ने बढ़-चढ़कर भाग लिया। झांसी की पिस्ता देवी तथा चंद्रमुखी देवी की प्रमुख भूमिका रही। इन दोनों महिलाओं ने नगर के मोतीलाल पुस्तकालय के सामने विदेशी वस्त्रों की होली जलाई थी। झांसी की ही लक्ष्मण कुमारी शर्मा, रानी राजेंद्र कुमारी, काशीबाई आदि महिलाएं भी स्वतंत्रता संग्राम में अपना योगदान देकर अमर हो गई।
हमीरपुर जिले में असहयोग आंदोलन में सहयोग दिया राजेंद्र कुमारी ने। रानी राजेंद्र कुमारी ने खादी को अपनाया तथा स्वतंत्रता संग्राम के पक्ष में पर्चे भी बांटे, जेल गईं। राठ की गंगा देवी, वीरा गांव की गुलाब देवी, बांदा की अनुसूया देवी ने अपने नेतृत्व में महिलाओं को संगठित किया तथा घर-घर जाकर स्वतंत्रता आंदोलन के महत्व को समझाने का बीड़ा उठाया जिसके कारण उन्हें अंग्रेजों का विरोध झेलना पड़ा। 

सुप्रसिद्ध साहित्यकार एवं स्वतंत्रता संग्राम सेनानी वृंदावन लाल वर्मा की पत्नी कांति देवी भी स्वाधीनता आंदोलन की अग्रणी महिलाओं में से एक रहीं। छतरपुर रियासत की सरयू देवी पटेरिया गांधीजी के सविनय अवज्ञा आंदोलन को बुंदेलखंड में प्रसारित करने में अग्रणी रहीं जिसके कारण उन्हें गर्भवती स्थिति में भी जेल में रखा। पन्ना, दमोह और सागर की महिलाएं भी स्वतंत्रता आंदोलन में पीछे नहीं रहीं। सभी ने अपने पारिवारिक कर्तव्यों को निभाते हुए स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया और देश को आजाद कराने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
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Thursday, August 14, 2025

बतकाव बिन्ना की | आजादी की पैली क्रांति अपने बुंदेलखंड में भई रई | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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बतकाव बिन्ना की
आजादी की पैली क्रांति अपने बुंदेलखंड में भई रई
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
      ‘‘काए बिन्ना, सबई जने जेई कैत आएं के सबसे पैले 1857 में क्रांति भई रई, जबके हमने कऊं पढ़ो रओ के ईसे पैले तो अपने बुंदेलखंड में क्रांति भई रई। सो ऊको पैलो काए नईं कओ जात आए?’’ भैयाजी अपनों मूंड़ खुजात भए बोले। बड़े टेंशन में दिखा रए हते बे।
‘‘आप सांची कै रए भैया जी! 1857 से पैले तो 1842 में अपने इते बुंदेलखंड में भौतई बड़ी क्रांति भई रई, जोन को ‘बुंदेला क्रांति’ कओ जात आए।’’ मैंने भैयाजी को बताओ।
‘‘सो बा कोन ने करी हती? मने 1857 वारी तो मंगल पांडे ने सुरू करी, बा वारी कोन से सिपाई ने करी हती?’’ भैयाजी ने पूछी।
‘‘बा क्रांति कोनऊं सिपाई ने सुरू ने करी हती, बा तो राजा मधुकरशाह जू ने करी हती। बाकी पैले आप जो जान लेओ के बुंदेला क्रांति के कारण का हते। वैसे ईको बुंदेला विद्रोह कै-कै के ईको इंप्वार्टेंस कम कर दओ जातो आए। मनो जे कोनऊं ऊंसई बिद्रोह ने रओ, पूरी क्रांति भई रई।’’ मैंने भैयाजी खों बताई।
‘‘तो भओ का रओ?’’ भैयाजी ने पूछी। उने कोन पतो रओ।
‘‘भओ जे के अंग्रेजन ने एक तो लगान बढ़ा दओ औ ऊपे सल्ल जे के जोन लगान ने चुका पात्तो ऊकी जमीन हड़प लई जात्ती। मने सीदे कओ जाए तो जमीन हड़बे के लानेई लगान बढ़ाओ गओ रओ। उने पता रई के इते के किसान गरीब आएं सो बे लगान चुका ने पाहें। फेर इत्तोई नईं, अंग्रेजन ने का करी के जोन जमीदारों खों लगान वसूलबे को अधिकार दओ रओ उने ऊमें से हींसा कम दओ जान लगो। ईसे जमीदारों की दसा दूबरी हो गई। औ जे जो दीवानी मुकदमा की तारीखें बढ़ा-बढ़ा के पेरबे को चलन आए, बा सोई अंग्रेजन के टेम से सुरू भओ। मने कोऊ अपनी जमीन के लाने मुकदमा करे औ दो-चार पीढ़ियन लौं फंदा में लटको रए। सो जे दसा देख के बुंदेला राजा हरें खौलन लगे। उनें दबाने के लाने अंग्रेजन ने नारहट वारे मधुुकरशाह बुंदेला औ जवाहर सिंह बुंदेला के लाने अदालत में डिक्री दे के उनकी जायदाद जब्त करबे की धमकी दई। ईके विरोध में मधुकरशाह बुंदेला औ अंग्रेजन के सिपाइयन में झड़प भई जीमें कछू सिपाई मारे गए। जेई के संगे क्रांति सुरू हो गई। ईमें मधुकर शाह को साथ दओ जैतपुर के राजा परिच्छित, हीरापुर के राजा हिरदेश शाह, चिरगांव के जागीरदार राव बसंत सिंह, झींझन के दीवानराव बसंत सिंह, नरसिंहपुर के डिलनशाह ने। मनो कछु स्वारथ वारे इते बी हते जिने बाद में समझ में आई के बे का गलती कर बैठे। मनो ऊ टेम पे तो राजा मधुकर शाह को साथ न दे के, उल्टे उने धोखे से पकरवा के भारी गलती करी रई।’’ मैं बता रई हती भैयाजी खों के बे बोर परे।
‘‘हैं? कोन ने पकरवा दओ मधुकरशाह जू खों?’’ मनो भैयाजी को झटका सो लगो।
‘‘अरे एक गद्दार रओ, बाकी मधुकरशाह जू को साथ ने दे के अंग्रेजन को साथ देबे वारों में शाहगढ़ के राजा बखतवली, बानपुर के मर्दनसिंह और चरखारी रियासत वारे रए। मनो 1857 लों उने सोई समझ में आ गई रई के बे गलत पाले में जाके ठाड़े हो गए रए। सो, उन ओरन ने 1857 वारी क्रांति के टेम पे रानी लक्षमीबाई को साथ दओ रओ। पर 1842 के टेम पे जो इन ओरन ने मधुकरशाह जू को साथ दओ रैतो तो इते को इतिहास कछू और होतो।  सागर, दमोए, जबलपुर, मंडला, नरसिंहपुर औ बैतूल लौं में अंग्रेज सरकार को विरोध होन लगो रओ। सागर में खुरई, खिमलासा, धामोनी, नरयावली औ सागर सहर में लूटपाट मचीं। नरसिंहपुर के डिलनशाह गौड़ ने देवरी औ नरसिंहपुर के लिंगे अंग्रेजन के नाक में दम कर दओ। हीरापुर से जबलपुर लौं हिरदेशाह जू ने अंग्रेजन की खिंचाई करी। देखत-देखत कछू समै के लाने जो भओ के नरसिंहपुर, सागर औ जबलपुर के भौत बड़े इलाका से अंग्रेजन को कब्जा छूट गओ रओ। ओई समै पे बेलगांव के़ जुुद्ध में जैतपुर के राजा परिच्छित ने अंग्रेजों को हरा दओ रओ। मनो अपने इते को इतिहास तो गद्दारन के मारे बिगड़त रओ। सो जेई भओ के हिरदेशाह जू पकरे गए। बाकी अंग्रेज कर्नल स्लीमैन के कए पे बाद में उने छोड़ दओ गओ रओ। लेकन अंग्रेज तो ई क्रांति के मुखिया मधुकरशाह जू खों पकरो चात्ते। एक गद्दार ने उनकी जा इच्छा पूरी कर दई। जबे मधुकरशाह एक के घरे सुस्ताबे के लाने सो रए हते तो बा गद्दार ने चुप्पे से अंग्रेजन खों खबर कर दई। सो मधुकरशाह जू पकरे गए। उने खुल्लेआम फांसी दे दई गई। आपको पतो के उनकी समाधि सागर की जेल में अबे लों पाई जात आए?’’ मैंने क्रांति की किसां सुनात भए भैयाजी से पूछी।
‘‘नई हमें नई पतो! मनो जे तो गजबई आए के हम इतई रैत आएं औ हमें नई पतो के सागर की जेल में मधुकरशाह जू की समाधि आए। हम तो जाबी दरसन करबे।’’ भैयाजी तनक इमोशनल होते भए बोले।
‘‘मैं सोई संगे चलबी। बाकी जो आपके लाने ई बारे में पतो नईयां सो ईमें आपको कोनऊं दोस नइयां। काए से के जा सब पढाओ जाए, बताओ जाए, तब तो पता परे।’’ मैंने भैयाजी खों समझाई।
‘‘सई कै रईं बिन्ना! बाकी जो जब इत्ती बड़ी क्रांति हती तो ईको बिद्रोह काए कओ गओ? जे बात अब बी हमें समझ में ने आई।’’ भैयाजी सोचत भए बोले।
‘‘कछू नईं भैयाजी, बात इत्ती सी आए के पैले इते को इतिहास अंग्रेजन ने लिखों, फेर अंग्रेजन के पिट्ठुअन ने लिखो सो जेई लाने ईको बिद्रोह कै दओ गओ औ 1857 की क्रांति खों गदर कै दओ गओ। कैबे को तो जा कओ जात रओ के अंग्रेजन के राज में कभऊं सूरज नईं डूबत, सो इते उनको सूरज कछू जांगा, कछू समै के लाने डुबो दओ गओ रओ। जे भौत बड़ी बात रई। जो सबने साथ दओ रैतो औ गद्दारी ने करी गई होती तो सबसे पैले जो अपनो बुंदेलखंड आजाद भओ रैतो।’’ मैंने भैयाजी से कई।
‘‘सई कै रईं बिन्ना, जे सब बातें हमें पता नईं रईं। हमने तो बा 1857 वारी क्रांति भर पढ़ी रई।’’ भैयाजी अफसोस करत भए बोले।
‘‘हऔ, पैले इतिहास में इत्तो ज्यादा नईं पढ़ाओ जात रओ। अब तो स्कूल के सिलेबस लौं में बिद्रोह के नांव से बुंदेला क्रांति सामिल आए। बाकी, ईको क्रांति कओ जाओ चाइए।’’ मैंने कई।
‘‘सई बात। बाकी अब तो हमें मधुकरशाह जू की समाधि पे दरसन करने जाबे की भौतई इच्छा हो रई। कल नईं तो परों, हम जरूर जाबी।’’ भैयाजी बोले।
‘‘वैसे भैयाजी, आप जानत आओ के मोए राजनीति से कछू लेबो-देबो नईं रैत आए, मनो जो काम अच्छो करो जाए ऊकी तारीफ करे में मोए तनकऊं सकोच नई होत आए।’’ मैंने कई।
‘‘मने?’’ भैयाजी ने पूछी। 
‘‘मने जे के ई सरकार ने एक बड़ो अच्छो काम करो के आजादी की लड़ाई में उन ओरन को बी इतिहास लिखबाओ जोन के बारे में कोनऊं खों पतो ने हतो। मने गली-मोहल्ला के तो जानत्ते, बाकी औ बायरे कोऊ ने जानत्तो। ‘‘अनसुंग हीरोज आफ इंडियन फ्रीडम स्ट्रगल’’ योजना के तरे जो काम कराओ गओ। जा सांची में भौतई बड़ो काम कराओ गओ आए।’’ मैंने भैयाजी खों बताओ।
‘‘सई बताएं बिन्ना! जा बुंदेला क्रांति के बारे में जान के हमाओ सीना चैड़ो भओ जा रओ। सो आजादी की बरसगांठ पे तुमाए लाने खूब-खूब बधाई।’’ भैयाजी मगन होत भए बोले। 
बाकी बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लौं जुगाली करो जेई की। मनो सोचियो जरूर ई बारे में के हमाई आप ओरन खों बी आजादी की बरसगांठ पे खूब-खूब बधाई पौंचे! बंदेमातरम!      
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Wednesday, December 18, 2024

चर्चा प्लस | बुंदेलखंड की लाईफ लाइन है दशार्ण उर्फ़ धसान नदी | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर


चर्चा प्लस
बुंदेलखंड की लाईफ लाइन है दशार्ण उर्फ़ धसान नदी
- डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
      नदीजल में कारखानों का विषाक्त पानी और शहरों की तमाम गंदगी मिलते रहने से, वह न केवल प्रदूषित हो रहा है वरन जलजन्तुओं के लिए भी घातक हो चला है। गंगा, शिप्रा आदि की सफाई पर ध्यान दिया जाता रहा है किन्तु दशार्ण उर्फ़ धसान नदी अपनी प्राचीनता के गौरव को सहेजती हुई अपने वर्तमान के अस्त्वि के लिए जूझ रही है। दशार्ण आज भी बुन्देखण्ड की लाईफ लाइन है। यह वही नदी है जिसके तट पर प्रागैतिहासिक कालीन मनुष्यों ने अपनी बस्तियां बसाईं और अपना राजनैतिक, सांस्कृतिक एवं धार्मिक विकास किया।


‘‘धसान’’ शब्द ‘‘दशार्ण’’ का ही अपभ्रंश है। यह उस क्षेत्र का भी नाम रहा है जो दशार्ण नदी के तट पर स्थित था। इस क्षेत्र में प्रागैतिहासिक काल से मनुष्य ने अपना निवास बनाया। इससे पता चलता है कि उस समय दशार्ण नदी बहुत विस्तृत रही होगी जिससे उन मनुष्यों के सभी कार्यों के लिए पर्याप्त जलापूर्ति होती रही होगी। इस नदी की प्राचीनता का उल्लेख पुराणों से भी ज्ञात होता है। मार्कण्डेय पुराण (57/20) में मंदाकिनी और नर्मदा की भांति दशार्ण को श्रेष्ठ बताया गया है-
शोणो महानदश्चात्र नर्मदा सुरसरि क्रिया
मंदाकिनी दशार्णा च चित्रकूटस्त थैव च।

‘‘महाभारत’’ के विराट पर्व में नकुल की विजय के संदर्भ में दशार्ण नदी का भी उल्लेख है।
शान्ति रम्याः जनपदा बहन्नाः पारितः कुरून।
पांचालश्चेदिमत्स्याश्च शूरसेनाः पटचराः।
दशार्ण नवराष्ट्रं च मल्लाः शाल्वा युगंधरा।
‘‘महाभारत’’ काल में दशार्ण के शासक हिरण्य वर्मा की पुत्री हिरण्यमयी का विवाह द्रुपद के कथित पुत्र शिखण्डी से हुआ था। इस तरह महाभारत काल में दशार्ण का राजनीतिक महत्व बहुत अधिक था।
कालिदास ने अपने मेघदूत (पूर्वमेघ, 24-25) में विदिशा शहर को दशार्ण की राजधानी के रूप में उल्लेख किया है। कालिदास ने ‘‘मेघदूत’’ में दशार्ण का उल्लेख इस प्रकार किया है-
त्वयासन्ने परिणत फल जम्बू बनान्ताः,
संपन्स्यन्ते कतिपय दिनं स्थायि हंसा दशार्णाः।
बुन्देलखण्ड का दशार्ण नाम तेरहवीं शताब्दी तक रहा। चंदेल शासक परमर्दि देव (1165-1203 ई.) को ‘दशार्णाधिपति’, नाम से जाना जाता रहा है। दशार्ण जनपद को अकारा के नाम से भी जाना जाता था और रुद्रदामन प्रथम ने अपने जूनागढ़ शिलालेख में इस क्षेत्र को इसी नाम से संदर्भित किया है। महाभारत के अनुसार, चेदि राज्य के राजा वीरबाहु या सुबाहु की रानी और विदर्भ के राजा भीम की रानी (दमयंती की माँ) दशार्ण के राजा की बेटियां थीं। एरिच से प्राप्त एक ईंट का शिलालेख से दशार्ण के राजा, आशादमित्र और उसके पूर्वजों के बारे में जानकारी मिलती है। इस शिलालेख में, आशादमित्र, जिसने खुद को सेनापति बताया था, को सेनापति मूलमित्र (जो दशार्ण के राजा भी थे) का पुत्र, सेनापति आदिमित्र का पोता और सेनापति शतानीक का परपोता बताया गया है। इसी क्षेत्र में आशादमित्र का एक सिक्का भी मिला है जिसमें उसने खुद को अमात्य और दशार्ण का राजा बताया है।
वर्तमान भौगोलिक मानचित्र के अनुसार रायसेन जिला के जसरथ पर्वत से निकलकर धसान नदी सिलवानी तहसील की सिरमऊ, बेगमगंज तहसील की पिपलिया जागीर, बील खेड़ा, रतनहारी, सुल्तानागंज, उदका, टेकापार कलो, बिछुआ, सनेही, पडरया, राजधर, सोदतपुर ग्रामों के समीप से प्रवाहित होकर सागर जिले के नारियावली के उस पार तक बहती है। सागर जिले में यह सिहोरा, नरियावली, उल्दन, धामौनी, मैंहर, ललितपुर की (महारोनी तहसील) वनगुवा के तीन किलोमीटर पूर्व प्रवेश करती हुई यह टीकमगढ़ के दतना और छतरपुर की 70 किलोमीटर की सीमा बनाती हुई झांसी हमीरपुर और जालौन के संधि स्थल के नीचे बेतवा में मिल जाती है।
सिरमऊ पहला स्थान है जो धसान के किनारे बसा हुआ है। धसान नदी उत्तर में बहुत दूर तक सागर और ललितपुर जिलों के मध्य की सीमा की विभाजन रेखा है। टीकमगढ़ जिले में धसान नदी के किनारे पर स्थित या आस-पास स्थित लगभग ग्यारह गाँव हैं, जिनके नाम हैं- ककरवाहा, भैंसवारी, बड़ागाँव, धसान, मौखरा, सुजारा, पटौरी, चंदपुरा, पचेर, कोटरा और आलमपुर। छतरपुर से टीकमगढ़ या प्राचीन बिजावर राज्य से ओरछा राज्य तक धसान 70 किलोमीटर की सीमा बनाती है। धसान का पूर्वी किनारा नैसर्गिक रूप से छतरपुर जिले की बिजावर तहसील की सीमा रेखांकित करता है। इसके तटवर्ती ग्राम सोरखी, खरदूती और देवरान हैं। देवरान में इसकी सहायक नदी बीला (काठन) दशार्ण में विसर्जित हो जाती है। यह नदी बुंदेलखण्ड में लगभग 352 किलोमीटर तक प्रवाहमान रहती है।
धसान नदी की घाटियों एवं तट के आसपास पाषाण काल से लेकर मौर्य युग तक के पुरातत्व प्रमाण मिले है। पुरातात्विक खोजों के आधार पर दशार्ण नदी के आसपास घाट कोपरा, विरगुवां, देवरी, इमलौटा आदि ग्रामीण इलाकों में प्राचीन बस्तियों और ग्रामीण अंचल मारकुआं, इमलौटा, खेड़ों आदि घाटी वाले इलाकों में मनुष्यों के खेती करने के प्रारंभिक दौर का पता चलता है। प्रतिहार, चंदेल काल के मंदिर, मूर्तियां भी इस क्षेत्र से प्राप्त होती हैं जिससे अनुसार धसान का ऐतिहासिक महत्व ज्ञात होता है।
धसान के संबंध में धार्मिक मान्यनाएं भी हैं। इस नदी का जल गंगा एवं नर्मदा की भांति पवित्र माना जाता है। मान्यता है कि इस नदी के तट में तर्पण करने से मनुष्य दस ऋणों से मुक्त होता है। यह कहा जाता है कि पूर्वजों को तर्पण, श्राद्ध आदि का कार्य नदी के तट पर होना चाहिए इससे पूर्वजों को माक्ष मिलता है।
सागर जिले के मुख्यालय से 25 किलोमीटर दूर सिहौरा के पास दशार्ण नदी के निकट ‘पाषाण युगीन’ एक उद्योगशाला प्राप्त हो चुकी है। इसी नदी के किनारे सागर से 29 किलोमीटर की दूरी पर धामौनी दुर्ग स्थित है। जहाँ धसान दो गहरी खाइयों के बीच से दो धाराओं में बहती है। उल्दन नामक गाँव में भाण्डेर नदी इसी नदी में मिल जाती है। यह स्थान बण्डा से 16 किलोमीटर दूरी पर स्थित है। भाण्डेर के धसान के संगम पर मकर संक्रांति के पर चार दिवसीय परंपरागत मेले का आयोजन किया जाता है। धसान के ही किनारे सागर-ललितपुर मार्म पर मेहर गाँव में हिंगलाज देवी का मंदिर है। दशार्ण और बीला काठन के संगम पर मठ, मंदिर और प्रतिमाओं के भग्नावशेष, बछरानी गाँव के पूर्वी तट पर गुप्तकालीन दो मंदिर, ईसानगर, कुर्रा रामपुर, गर्रौली और आलीपुरा के किले दशार्ण और कुकड़ेश्वर नदियों के संगम पर, अचट्ट में खजुराहो के समान चंदेलकालीन मूर्तियाँ एवं पुरावशेषों की धसान सदियों से साक्षी रही है। यह सभी स्थान छतरपुर जिले के अन्तर्गत आते हैं। इतना ही नहीं इसी जिले में धसान के ही समीप देवरा गाँव में दो स्थान प्राचीन भित्तिचित्रों के पाये जाते हैं। जिन्हें ‘पौर का दाता’ और ‘पुतली की दाता’ के नाम से जाना जाता है
टीकमगढ़ जिले में दशार्ण के तट पर मौखरा गाँव में गुप्तकालीन शिखर विहीन मंदिर, दूबदेई देवी का मंदिर, पचेर का किला, ककरवाहा और बड़ागाँव धसान के बीच गुर्जर प्रतिहार कालीन ऊमरी का प्रसिद्ध सूर्य मंदिर, शिव मठ, जैन मंदिर, छौटा सा दुर्ग और हनुमान जी का विग्रह आदि स्थल स्थित हैं। दशार्ण के नजदीक लघु दुर्ग स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की शरणस्थली रहा है।
उत्तरप्रदेश में हमीरपुर और झाँसी जिलों के मिलन बिन्दु पर लहचूरा बाँध और गाँव के समीप लगभग 2 किलोमीटर क्षेत्र में पाषाणयुगीन औजार प्राप्त हुए हैं। झाँसी से ही 18 किलोमीटर दशार्ण के बाँयें किनारे गरौठा गाँव से 10 किलोमीटर दक्षिण-पूर्व में दो पुराने महादेव मंदिर, चंदेला बैठक, दशार्ण नदी में आकंठ डूबी विश्वमित्र की प्राचीन पाषाण प्रतिमा आदि दर्शनीय स्थान है। इस स्थान पर प्रतिवर्ष कार्तिक पूर्णिमा एवं मकर संक्रान्ति को मेला भरता है।
धसान के तट पर मानव सभ्यता ने विकास किया। सांस्कृतिक विकास के साथ तत्कालीन मनुष्यों ने मंदिर, महन तथा अन्य स्मारक बनाए। उत्तर प्रदेश के ललितपुर की महरौनी तहसील के गिरार गाँव के किनारे कुछ खूबसूरत मंदिरों के अवशेष हैं। जिनमें राम और शिव के मंदिर प्रमुख हैं। यहाँ एक पहाड़ी की गुफा में भी शिव मंदिर है। ऐसा कहा जाता है कि यह गोंडों ने बनवाये थे। यहाँ मार्च में प्रतिवर्ष एक मेला भी लगता है। झाँसी जिले में धसान पर लहचूरा बाँध बना है। इस नदी पर देवरी में भी एक बाँध बनाया गया है-राठ-उरई सड़क मार्ग से 18 किलोमीटर दूर मुहाना घाट से 2 किलोमीटर बायीं ओर धसान नदी के गहरे स्थाई दोहों में मगरों का आश्रस्थल देखा जा सकता है। हो सकता है कि मगरों के कारण ही इस गाँव का नाम मगरौठ पड़ा है। मगरौठ को विनोबा भावे के भू-दान अभियान के अन्तर्गत ‘प्रथम ग्राम दान गाँव’ का सम्मान मिला था।
आज जब देश की विभिन्न नदियों की भांति बुंदेलखंड की नदियां भी संकट के दौर से गुजर रही हैं तथा मानवजनित प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को झेल रही हैं, धसान नदी भी इसी दौर से गुजर रही है। ये नदी जो सदैव बुंदेलखंड की लाईफ लाइन मानी जाती रही है, उसे आज स्थान-स्थान पर स्वयं के अस्तित्व के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। इसके तटों पर मौजूद वन संपदा और ग्रामीण जीवन को ध्यान में रखते हुए धसान नदी का संरक्षण भी उतना ही जरूरी है जितना गंगा या यमुना का।
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Friday, November 22, 2024

शून्यकाल | बुंदेलखंड की कुरैया सिखाती है अन्न का सम्मान और सामाजिकता | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नयादौर

दैनिक 'नयादौर' में मेरा कॉलम - 

शून्यकाल  
बुंदेलखंड की कुरैया सिखाती है अन्न का सम्मान और सामाजिकता
- डाॅ (सुश्री) शरद सिंह                                                                                   
  बुंदेलखंड की संस्कृति अनूठी है। यहां कदम-कदम पर जीवन की शिक्षा रची-बसी है। बस, आवश्यकता है तो उसे ध्यान से जानने और समझने की। क्या कोई सोच सकता है कि एक निर्जीव बरतन भी कोई शिक्षा दे सकता है? तो यह सोचना भी अजीब  लगेगा। लेकिन बुंदेलखंड में सबकुछ संभव है। यहां जीवन से जुड़ी निर्जीव वस्तुएं भी समाज शिक्षा के बड़े-बड़े पाठ पढ़ाने की क्षमता रखती हैं। जी हां, ऐसा ही एक बरतन है कुरैया!
      आधुनिकता के इस दौर में पारम्परिक बरतनों का चलन धीरे-धीरे समाप्त होता जा रहा है। गड़ई अर्थात लोटा का स्थान जग और बोतल ने ले लिया है। परिवारों के विखंडन ने आटा गूंथने के पीतल के बड़े-बड़े कोपरों के बदले छोटे आटा-नीडर ने ले लिया है। जो बिजली से चलते हैं और महज दस फुलको का आटा गूंथ देते हैं। लेकिन ग्रामीण अंचल में अभी भी पारम्परिक बरतनों का चलन बचा हुआ है। वहां खेत हैं, खलिहान हैं संयुक्त परिवार हैं और पारंपराओं का खांटी सच्चा रूप अभी बचा हुआ है। यह कब तक बचा रहेगा, यह कहना कठिन है क्योंकि खेती का सिमटना और रोजगार की समस्या ग्रामीण परिवारों को भी तोड़ने लगी है। मोबाईल, टीवी, इंटरनेट ने आधुनिकता के सातिए गांवों के आंगन में भी काढ़ने शुरू कर दिए हैं। आधुनिक होना कोई बुरी बात नहीं है, यह तो विकास की सतत प्रक्रिया का अभिन्न हिस्सा है। गांव के लोगों को भी विकास करने और आधुनिक होने का पूरा अधिकार है। लेकिन इन सबमें परंपराओं का गुम होते जाना दुखद प्रसंग होता है। यदि आधुनिकता और परंपराएं साझा हो कर चलें तो जीवन अधिक रोचक हो जाता है। वस्तुतः स्वस्थ परंपराएं सही ढंग से जीवन जीना सिखाती हैं और बुंदेलखंड में तो निर्जीव बरतन भी जीवन का सलीका सिखा देते हैं। 

बुन्देलखण्ड में प्रचलित कुरैया, कहने को तो महज एक बरतन है। यह पीतल की बनाई जाती है जो कि पारम्परिक बरतन विक्रेताओं की दूकानों पर उपलब्ध रहती है। दरअसल यह एक मापक बरतन है। कुरैया से छोटा भी एक माप होता है जिसे चैथिया कहते हैं जो एक किलो माप का होता है। यह पीतल के अलावा लकड़ी का भी बनाया जाता है। किन्तु कुरैया सिर्फ पीतल का ही बनाई जाती है। कुरैया का आकार-प्रकार विशिष्ट होता है। अर्द्धगोलाकार आकृति के ऊपरी भाग में चैड़ा पाट बिठा कर इसे आकार दिया जाता है। यह चैड़ा पाट दोहरे पट्टे का होता है जिससे पकड़ते समय असुविधा न हो। यह एक ऐसा बरतन है जो प्रत्येक किसान के जीवन से जुड़ा रहता है। कुरैया अनाज मापने का एक बरतन होता है जिसके द्वारा अनाज को माप कर यह पता लगाया जाता है कि खेत में कुल कितनी फसल हुई। कुरैया से मापे जाने के बाद ही अनाज के बोरों को तराजू पर तौला जाता है। इस तरह माप का पहला विश्वास भी कुरैया ही होता है।

 कुरैया को प्रयोग में लाने के भी कुछ नियम होते हैं। आमतौर पर खेत पर पुरुष ही इसका उपयोग करते हैं। यह अथक श्रम से जुड़ा हुआ बरतन है। कुरैया को कभी भी जूता या चप्पल पहन कर उपयोग में नहीं लाया जाता है। इसका प्रमुख कारण यह भी है कि जिस स्थान पर इसे काम में लाते हैं वहां अनाज का ढेर अर्थात् अन्नदेव उपस्थित रहते हैं। जूते और चप्पल को उस स्थान से दूर उतार दिया जाता है। कुरैया से माप करने वाला व्यक्ति कभी नंगे सिर इससे माप नहीं करता है। सिर पर गमछा, साफा या किसी भी प्रकार का कपड़ा बांध कर ही कुरैया को उपयोग में लाया जाता है। इसके पीछे यह विचार निहित रहता है कि कुरैया पवित्रा बरतन है जो अन्नदेव की सेवा में संलग्न है। कुरैया को अनाज मापने के अतिरिक्त किसी अन्य काम में नहीं लाया जाता है। कुरैया की मापक क्षमता पांच किलो अर्थात् एक पसेरी रहती है। अन्न का माप करते समय कुरैया को ऊपर तक पूरी तरह भरा जाता है। अन्न की यह ऊपर तक भरी हुई मात्रा पांच किलो मानी जाती है। कुरैया द्वारा मापा हुआ अन्न तराजू द्वारा तौल करने पर पांच किलो ही निकलता है। बीस कुरैया का एक बोरा होता है अर्थात् सौ किलो माप का। अनाज को कुरैया से मापते समय अन्न के खेप की गिनती भी विशेष प्रकार से की जाती है। पहली माप को ‘एक’ न कह कर ‘राम’ कहा जाता है। दूसरी माप करते समय, जब तक कुरैया ऊपर तक भर नहीं जाती तब तक ‘राम-राम-राम’ का ही उच्चारण किया जाता है। कुरैया ऊपर तक भरने के पश्चात दूसरी माप से ‘दो-दो-दो’ का उच्चारण किया जाता है। इसके बाद इसी क्रम में तीन-तीन-तीन, चार-चार-चार, पांच-पांच-पांच आदि सामान्यतौर पर माप की जाने वाली गिनती बोली जाती है। इस प्रकार अनाज की पहली माप ‘राम’ नाम से आरम्भ होती है जो शुभ-लाभ का पर्याय है।

कुरैया के प्रति जुड़ा हुआ यह सम्मान भाव उस लोक विश्वास का परिचायक है जो अन्न की महत्ता को स्थापित करता है। कुरैया अनाज का सम्मान करना सिखता है। इस सम्मान की भावना को बलवती बनाने के लिए उन सभी वस्तुओं को सम्मान दिया जाता है जो अन्नदेव से जुड़ी होती हैं। कुरैया भी उनमें प्रमुख वस्तु है। कुरैया का एक दूसरा पक्ष भी है जो पारस्परिक सौहार्य को सुदृढ़ता प्रदान करता है। यह आवश्यक नहीं है कि प्रत्येक फसल उत्पादक के पास अपना कुरैया हो। यदि उसके पास कुरैया नहीं है तो वह दूसरे व्यक्ति से कुरैया मांग लेता है। एक कुरैया को एक से अधिक किसान उपयोग में लाते हैं। कई बार एक गांव के लोग दूसरे गांव से कुरैया मांग कर लाते हैं। माप का काम हो जाने के बाद पूरी ईमानदारी के साथ कुरैया उसके वास्तविक स्वामी के पास पहुंचा दिया जाता है। कई बार कुरैया को लौटाए जाने में देर होने पर उसके स्वामी के घर की महिलाएं इस प्रकार उसका स्मरण करती हैं जैसे उनकी छोटी बहन या बेटी ससुराल गई हो और बहुत अरसे से मायके न आई हो। इसी भाव को व्यक्ति करता यह लोकगीत कुरैया के प्रति आत्मीयता को दर्शाता है-
मोरी बिन्ना सी कुरैया अबे लों ने आई
कोऊ जाओ तो ले आओ, लेवउआ बन के
मोरी बिन्ना सी कुरैया अबे लों ने आई....
गहूं के लाने गई ती,
चना के लाने गई ती
कोऊ जाओ तो ले आओ, लेवउआ बन के
मोरी बिन्ना सी कुरैया अबे लों ने आई....
चच्चा के इते गई ती
मम्मा के इते गई ती
कोऊ जाओ तो ले आओ, लेवउआ बन के
मोरी बिन्ना सी कुरैया अबे लों ने आई....
कुरैया मानो परिवार का सदस्य हो, कुरैया मानो अन्नदेव तक संदेश पहुंचाने वाला देवदूत हो। किसान कुरैया से अनुनय-विनय करता है कि उसका संदेश अन्नदेव तक पहुंचा दे-
कहियो, कहियो कुरैया! जा के नाजदेव से
अगले बरस सोई भर-भर आइयो
हमरी खबर मालिक ना बिसरइयो
कुइयां न सूकें, सूकें न नदियां
कहियो, कहियो कुरैया! जा के नाजदेव से.....
इस तरह धातु से बना मूक बरतन किसी सजीव व्यक्ति की भांति संदेशवाहक बन जाता है। यही तो जीवन्त विश्वास और मान्यता है जो प्रत्येक जड़-चेतन के महत्व को स्थापित करती है। कुरैया आपसी सौहार्य एवं भाईचारे का माध्यम बनता ही है किन्तु इससे से भी बढ़ कर महत्वपूर्ण तथ्य है कि प्रायः ग्राम्य अंचलों में जातीय भेद-भाव प्रभावी रहता है किन्तु कुरैया का उपयोग इसका अपवाद है। यह प्रत्येक जाति-धर्म के लोगों के बीच परस्पर आदान-प्रदान के रूप में काम में लाया जाता है। कुरैया मानव विश्वास और सामाजिकता का प्रतीक है। 
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Tuesday, October 15, 2024

पुस्तक समीक्षा | वह पुस्तक जिससे बुंदेलखंड के परिचय को वैश्विक विस्तार मिलेगा | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

आज 15.10.2024 को  #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई डॉ. नीलिमा पिंपलापुरे द्वारा लिखित पुस्तक "बुंदेलखंड : द हार्टबीट ऑफ मध्यप्रदेश" की समीक्षा।
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पुस्तक समीक्षा 
वह पुस्तक जिससे बुंदेलखंड के परिचय को वैश्विक विस्तार मिलेगा
- समीक्षक डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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पुस्तक        - बुंदेलखंड : द हार्टबीट ऑफ मध्यप्रदेश
लेखिका      - डाॅ. नालिमा पिंपलापुरे
प्रकाशक     - बी बज़ मीडिया, इंडिया
मूल्य        - 1000/- (पेपर बैक)
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      बुंदेलखंड देश का वह क्षेत्र है जिसकी भौगोलिकता अपने आप में अनूठी है। इसके इतिहास में प्राचीनता है और यह कला में बेजोड़ है। प्रागैतिहासिक काल से इंसानों ने बुंदेलखंड को अपने निवास के रूप में चुना। यहां स्थित गुफाचित्र इसका साक्ष्य प्रस्तुत करते हैं। मृदभाण्ड तथा तांबे के सिक्के इसकी प्राचीनता की कथा कहते हैं। बुंदेलखंड श्रीराम के वनगमन पथ का अभिन्न हिस्सा रहा है तथा प्राचीन वैश्विक व्यापार के ‘‘सिल्क रूट’’ का एक प्रमुख केन्द्र रहा है। बुंदेलखंड की वर्तमान विशेषता यह है कि यह दो राज्यों मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश में फैला हुआ है। बुंदेलखंड के इतिहास, पुरातत्व एवं संस्कृति पर अकादमिक रूप से बहुत लिखा जा चुका है और लिखा जा रहा है क्योकि शोध का कोई अंत नहीं होता है। फिर बुंदेलखंड में आज भी अनेक ऐसे तथ्य हैं जिनका उजागर होना अथवा जिन्हें नवीनदृष्टि से देखा जाना शेष है। इस दिशा में सागर विश्वविद्यालय के प्रो. कृष्णदत्त वाजपेयी, प्रो. एस.के. वाजपेयी, प्रो नागेश दुबे, प्रो. बी.के. श्रीवास्तव, डाॅ. मोहनलाल आदि ने महत्वपूर्ण शोध एवं लेखन का काम किया है। किन्तु अकादमिक कार्य एवं पर्यटन में प्रायः दूरी बनी रहती है। पर्यटक विस्तृत जानकारी से कतराते हैं। वे संक्षेप में जानना चाहते हैं कि यदि वे बुंदेलखंड पहुंचे तो वहां उन्हें क्या-क्या देखना चाहिए। वे सुंदर आकर्षक चित्रों के रूप में पहले ही उसका परिचय पाना चाहते हैं। अतः यह पूर्ति एक पर्यटन पुस्तक ही कर सकती है। सागर निवासी डाॅ. नीलिमा पिंपलापुरे ने इस कमी को अनुभव किया। जो उन्होंने चर्चा के दौरान अपने अनुभव साझा किए उसके अनुसार,‘‘जब वे विदेश में अथवा देश के दूसरे प्रदेशों में बसे लोगों से मिलती हैं तो लोग उनसे पूछते हैं कि वे कहां रहती हैं? जब वे बताती हैं कि सागर में, तो लोग पूछते हैं यह कहां है? वे बताती हैं कि मध्यप्रदेश के बुंदेलखंड में। तो लोग बुंदेलखंड का नाम सुन कर उलझन में पड़ जाते हैं क्योंकि उन्हें बुंदेलखंड के बारे में जानकारी नहीं है। ऐसे ही अनुभवों से उन्हें विचार आया कि एक ऐसी पुस्तक तैयार की जाए जो लोगों को बुंदेलखंड का संक्षिप्त परिचय भी दे और उन्हें यहां पर्यटन के लिए आने को प्रेरित भी करे।’’

डाॅ. नीलिमा पिंपलापुरे ने अपने इस विचार को विदेशी धरती तक पहुंचाने के लिए अंग्रेजी भाषा के माध्यम को चुना। यद्यपि वे मराठी और हिन्दी की भी जानकार हैं। लेकिन उनका उद्देश्य था बुंदेलखंड की खूबियों को ग्लोबल (वैश्विक) करना। इस दिशा में उनकी पहली पुस्तक प्रकाशित हुई ‘‘बुंदेलखंड द हार्टबीट ऑफ इंडिया’’। यह काॅफी टेबुल बुक थी। आकार-प्रकार में बेहद आकर्षक। इसमें विश्व विख्यात फोटोग्राफर गणेश पंगारे द्वारा खींचे गए फोटोग्राफ थे। यह पुस्तक चर्चा में रही। किन्तु इस पुस्तक में कई जानकारियां छूट गई थीं और काफी टेबुल बुक के रूप में यह स्वदेशी पाठकों के लिए अपेक्षाकृत मंहगी भी थी। अतः उन्होंने अपने पहली पुस्तक के कलेवर को संशोधित एवं परिवर्द्धित किया और पेपरबैक पुस्तक के रूप में तैयार किया। इसमें भी गणेश पंगारे के नयनाभिराम छायाचित्र हैं। जो पुस्तक पढ़ने वालों को आमंत्रण देते प्रतीत होते हैं कि ‘‘आइए और बुंदेलखंड के सौंदर्य को निकट से निहारिए!’’ इस पेपरबैक पुस्तक का नाम भी वही है ‘‘बुंदेलखंड: द हार्टबीट आफॅ इंडिया’’। यह मध्यप्रदेश के बुंदेलखंड पर केन्द्रित है और इसमें वे तथ्य भी समाहित किए गए हैं जो काॅफीटेबुल बुक में छूट गए थे। दोनों पुस्तकों का नाम एक ही है किन्तु कव्हर और कलेवर में दोनों पुस्तकों में भिन्नता है।

लेखिका ने अपनी यह पुस्तक बुंदेलखंड के निवासियों को समर्पित की है। इस पुस्तक में जो मुख्य विषय लिए गए हैं, वे हैं- बुंदेलखंड द रीजन, एम्प्लायमेंट एंड लिवलीहुड, फोर्ट एंड टेम्पल्स तथा कल्चरल हेरीटेज। अंत में संदर्भ प्रस्तुत किए गए हैं।

प्रथम अध्याय है ‘‘बुंदेलखंड द रीजन’’ अर्थात बुंदेलखंड की भौगोलिकता का। इसका परिचय देते हुए अध्याय के आरंभ में ही लेखिका ने काव्यात्मक शब्दों में लिखा है कि -‘‘हवाओं के मंत्रमुग्ध कर देने वाले संगीत के साथ झूमते हरे-भरे खेत, नम काली मिट्टी की मीठी सुगंध, घने जंगल, वनस्पतियों और जीव-जंतुओं की विविधता, क्रिस्टल जैसी स्वच्छ नदियों का शुद्ध बहता पानी, शानदार पहाड़ी इलाके, हजारों वर्षों की समृद्ध विरासत और संस्कृति - यह सब और भी बहुत कुछ, यह बेहद खूबसूरत बुंदेलखंड है, जो भारत की धड़कती धड़कन है!’’ इस अध्याय में उन्होंने बुंदेलखंड की भौगोलिक स्थिति, बुंदेलखंड का मानचित्र तथा बुंदेलखंड का संक्षिप्त इतिहास दिया है। बुंदेलखंड के इतिहास में लेखिका ने इस क्षेत्र की प्राचीनता को ध्यान में रखते हुए प्रीहिस्टोरिक अर्थात प्रागैतिहासिक काल से आरंभ किया है। फिर रामायण काल, महाभारत काल, छठीं शताब्दी ईसा पूर्व, ईसा उपरांत तीसरी शताब्दी, तीसरी से चौथी शताब्दी, वाकाटकों की चैथी शताब्दी, चैथी से छठीं शताब्दी गुप्ता राजवंश, आठवीं शती गुर्जर-प्रतिहार, नवीं से तेरहवीं शती चंदेल राजवंश, चौदहवीं से सोलहवीं शती बुंदेला साम्राज्य तथा 1720 सं 1760 तक मराठाओं का बुंदेलखंड पर राजनैतिक प्रभाव का परिचय दिया गया है। इसी अध्याय में प्राचीन नगर एरण, खजुराहो के मंदिर, महाराज छत्रसाल, ब्रिटिश साम्राज्य के समय बुंदेलखंड के बारे में जानकारी है। रानी लक्ष्मी बाई के संदर्भ में झांसी का परिचय है। सागर का परिचय देते हुए यहां की लाखा बंजारा झील से जुड़ी रोचक किंवदंती तथा सागर विश्वविद्यालय का परिचय है। अंत में देश की स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद बुंदेलखंड का स्वरूप जो विंध्यप्रदेश तथा मध्यभारत के अंग के रूप में रहा तथा वर्तमान बुंदेलखंड की जानकारी है।  

दूसरे अध्याय ‘‘एम्प्लायमेंट एंड लिवलीहुड’’ में बुंदेलखंड के आर्थिक पक्ष को लिया है। यहां का आर्थिक परिचय देते हुए आरम्भ में ही डाॅ नीलिमा पिंपलापुरे ने लिखा है कि -‘‘कृषि विकास इस क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को गति देता है, जबकि तेंदू पत्ता संग्रहण और महुआ आज भी वन-आश्रित समुदायों के लिए आय के महत्वपूर्ण स्रोत हैं।’’ इस अध्याय में बुंदेलखंड की कृषि संबंधी तथा वनोपज की जानकारी दी गई है। चूंकि बीड़ी व्यवसाय बुंदेलखंड का एक प्रमुख व्यवसाय है अतः तेंदू पत्ता जिसका उपयोग बीड़ी निर्माण में होता है तथा बीड़ी बनाने की चर्चा की गई है। वनोपज पर आधारित दूसरा बड़ा व्यवसाय है महुआ का। महुआ बीनने तथा इसके विविध उपयोग की संक्षिप्त जानकारी दी गई है।

इसी दूसरे अध्याय में ही वाइल्ड टूरिज्म अर्थात वन्य पर्यटन की अति संक्षिप्त जानकारी है। यहां मैं कहना चाहूंगी कि यदि लेखिका ने वन्य पर्यटन को एक अलग अध्याय के रूप में रखा होता तो उसकी ओर अधिक ध्यानाकर्षण होता तथा पन्ना नेशनल पार्क और नौरादेही अम्यारण्य की विस्तृत जानकारी वे दे पातीं। यूं भी आजकल प्रकृति-पर्यटन अधिक लोकप्रिय है।  

तीसरा अध्याय है ‘‘फोर्ट एंड टेम्पल्स’’ यानी किलों और मंदिरों का। इस संबंध में लेखिका ने परिचयात्मक ढंग से अध्याय के आरंभ में ही लिखा है कि -‘‘प्राचीन संस्कृति और परंपराओं की भूमि बुंदेलखंड अपने पुरातात्विक स्मारकों और सभी धर्मों, हिंदू, मुस्लिम, जैन और बौद्धों के लिए तीर्थ स्थानों के लिए प्रसिद्ध है। शानदार किले गौरवशाली अतीत, महान राजवंशों, सम्राटों और योद्धाओं की याद दिलाते हैं।’’ इसमें कोई संदेह नहीं कि बुंदेलखंड स्थापत्य और कला का धनी है। यहां के किलों का पुराणों में उल्लेख मिलता है। डाॅ. पिंपलापुरे ने इस अध्याय में जिन किलों का उल्लेख किया है, वे हैं- कालिंजर, झांसी (यद्यपि यह वर्तमान में उत्तरप्रदेश में स्थित है), ओरछा के किले, मंदिर एवं छतरियां। साथ ही ओरछा की रानी गणेशकुंवरी, लाला हरदौल की कथा का भी उल्लेख है। इसके अतिरिक्त अजयगढ़ का किला, दतिया महल, खजुराहो, धामोनी, चंदेरी, तालबेहट, धुबेला संग्रहालय, हृदयशाह का महल तथा पन्ना के प्रसिद्ध मंदिरों का परिचय दिया गया है। वैसे खजुराहो को एक स्वतंत्र अध्याय बनाया जा सकता था तथा ‘खजुराहो और उसके आस-पास’ के रूप में उस पूरे क्षेत्र चंदला, मंड़ला, बसारी आदि को हाईलाईट किया जा सकता था।
चौथा अध्याय ‘‘कल्चरल हेरीटेज’’ अर्थात सांस्कृतिक धरोहर का है। लेखिका डाॅ नीलिमा पिंपलापुरे के शब्दों में-  ‘‘बुंदेलखंड का खूबसूरत इलाका परंपराओं का शाही इतिहास दर्ज करता है। चाहे वह विरासत हो, कला और शिल्प, हथकरघा या संस्कृति, यह अपनी विशिष्टता के लिए जाना जाता है। बुंदेलखंड का पारंपरिक संगीत और नृत्य, त्यौहार और समारोह, साहित्य और ऐतिहासिक स्मारक बुंदेलखंड की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के कई पहलुओं में से कुछ हैं।’’ इस अध्याय में बुंदेलखंड में प्रचलित काष्ठ एवं धातु शिल्प, चंदेरी के वस्त्र उद्योग, ताराग्राम ओरछा के हस्त निर्मित कागज उद्योग की जानकारी है। इसके साथ ही बुंदेली चित्रकला एवं बुंदली लोकनृत्यों, बुंदेली पकवानों तथा बुंदेली भाषा का संक्षिप्त परिचय है।

वस्तुतः यह एक ऐसी हैण्डबुक है जो बुंदेलखंड के बारे में जानकारी नहीं रखने वालों को बुंदेलखंड के बारे में संक्षिप्त किन्तु समग्रता से जानकारी उपलब्ध कराती है। इसका मूल उद्देश्य पर्यटकों को बुंदेलखंड की ओर आकर्षित करना है, जिसमें यह पुस्तक खरी उतरती है। पुस्तक का कव्हर, मुद्रण तथा कागज बेहतरीन है। लेखिका डाॅ. नीलिमा पिंपलापुरे ने इसे लिखने में निश्चित रूप से श्रम किया है क्योंकि जानकारी भले ही संक्षेप में दी जाए किन्तु वह जानकारी जब तक समग्रता से ज्ञात न हो सब तक उसका संक्षेपीकरण भी नहीं किया जा सकता है। बुंदेलखंड की कला एवं संस्कृति के प्रति लेखिका का प्रेम प्रशंसनीय है। इस पुस्तक से बुंदेलखंड के परिचय को वैश्विक विस्तार मिलेगा। इसकी भाषा सरल अंग्रेजी है जिससे अंग्रेजी भाषा की कम जानकारी रखने वाले भी इसे सुगमता से पढ़ सकते हैं तथा छायाचित्रों की सहायता से समझ सकते हैं। निःसंदेह यह पुस्तक पठनीय एवं संग्रहणीय है।    ----------------------------
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Friday, June 21, 2024

शून्यकाल | च्यवन ऋषि बुंदेलखंड की वनस्पतियों से बनाते थे औषधि | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नयादौर

दैनिक नयादौर में मेरा कॉलम  "शून्यकाल"
च्यवन ऋषि बुंदेलखंड की वनस्पतियों से बनाते थे औषधि
 - डाॅ (सुश्री) शरद सिंह           
                  
      बुंदेलखंड प्राचीन काल से से अनेक विशिष्टिताओं का केन्द्र रहा है। आज च्यवन ऋषि और च्यवनप्राश का नाम सभी जानते हैं किन्तु यह कम ही लोगों को पता होगा कि च्यवन ऋषि ने बुंदेलखंड को अपना कर्मक्षेत्र बनाया था तथा यहां के औषधीय पौधों से कालजयी औषधियां तैयार की। बुंदेलखंड के निवासियों को गर्व होना चाहिए कि स्वस्थ जीवन के लिए अनेक आयुर्वेदिक औषधियों को तैयार करने के लिए च्यवन ऋषि ने बुंदेलखंड के वनक्षेत्र से वनस्पतियां चुनी थीं और औषधियां बनाई थीं। दुख है कि वे अनमोल, ऐतिहासिक जंगल आज खतरे में हैं।  

अपनी संस्कृति के लिए विख्यात बुंदेलखंड अपने वनसंपदा के लिए भी जाना जाता रहा है। बुंदेलखंड आदि काल से ही वनस्पतियों का धनी रहा है। बुंदेलखंड में बहुतायत में जड़ी- बूटियां पाई जाती हैं। बुन्देलखण्ड का भौगोलिक क्षेत्र लगभग 70000 वर्ग किलोमीटर है। इसमें उत्तर प्रदेश एवं मध्य प्रदेश के 13 जनपद तथा समीपवर्ती भू-भाग हैं। बुंदेलखंड के वन परिक्षेत्र में उच्च कोटि का सागौन होता है जिसकी गृह निर्माण और फर्नीचर के क्षेत्र में बहुत मांग रहती है। वहीं तेन्दू की पत्तों का बीड़ी उद्योग में उपयोग होने के कारण बुंदेलखंड के हजारों परिवारों का भरण-पोषण होता है। यद्यपि यह उद्योग बीड़ी के चलन में कमी के साथ  धीरे-धीरे सिमटता जा रहा है।  बुंदेलखंड के वनों में पाए जाने वाले खैर के वृक्षों पर कत्था उद्योग आधारित है। औषधि निर्माण के लिए कच्चे माल की कमी नहीं है। बबूल, महुआ, शीशम, सहजन, ढाक, तेंदू, खैर, हल्दु, बांस, साल, बेल, पलाश, अर्जुन और औषधीय वनस्पतियों का प्रचुर भंडार हुआ करता था बुंदेलखंड में। महुआ मदिरा बनाने, खाने तथा तेल निकालने के काम आता है। बेल, आंवला, बहेरा, अमलतास, अरुसा, सर्पगंधा, गिलोय, गोखरु आदि प्रचुर मात्रा में मिलते हैं। बुंदेलखंड का ललितपुर जिला वर्षों से औषधीय वनस्पतियों के लिए विख्यात रहा है। यही कारण है कि च्यवन ऋषि ने यहां पर अपना आश्रम बनाकर औषधियों को विश्वभर में प्रचलित किया। च्यवन ऋषि की धरती तहसील पाली से सात किलोमीटर दूर है। 
         माना जाता है कि च्यवन ऋषि जड़ी-बुटियों से ‘‘च्यवनप्राश’’ नामक एक औषधि बनाकर उसका सेवन करके वृद्धावस्था से पुनः युवा बन गए थे। महाभारत के अनुसार, उनमें इतनी शक्ति थी कि वे इन्द्र के वज्र को भी पीछे धकेल सकते थे। च्यवन ऋषि महान् भृगु ऋषि के पुत्र थे। इनकी माता का नाम पुलोमा था। महर्षि भृगु के भी दो विवाह हुए। इनकी पहली पत्नी दैत्यराज हिरण्यकश्यप की पुत्री दिव्या थी। दूसरी पत्नी दानवराज पुलोम की पुत्री पौलमी थी। पौलमी असुरों के पुलोम वंश की कन्या थी। पुलोम की कन्या की सगाई पहले अपने ही वंश के एक पुरुष से, जिसका नाम महाभारत शांतिपर्व अध्याय 13 के अनुसार दंस था, से हुई थी। परंतु उसके पिता ने यह संबंध छोड़कर उसका विवाह महर्षि भृगु से कर दिया। पहली पत्नी दैत्यराज हिरण्यकश्यप की पुत्री दिव्या देवी से भृगु मुनि के दो पुत्र हुए जिनके नाम शुक्र और त्वष्टा रखे गए। शुक्र आचार्य बन कर शुक्राचार्य के नाम से विख्यात हुए और त्वष्टा को शिल्पकार बनकर विश्वकर्मा के नाम से ख्यातिनाम हुए। 
     जब महर्षि च्यवन पौलमी के गर्भ में थे, तब भृगु की अनुपस्थिति में एक दिन अवसर पाकर दंस  अर्थात पुलोमासर पौलमी का हरण करके ले गया। शोक और दुख के कारण पौलमी का गर्भपात हो गया और शिशु पृथ्वी पर गिर पड़ा, इस कारण यह गिरा हुआ अर्थात च्यवन कहलाया। बाद में पौलमी के पांच पुत्र और हुए। 
च्यवन का विवाह गुजरात के भड़ौंच के राजा शर्याति की पुत्री सुकन्या से हुआ था। इस विवाह की भी एक रोचक कथा है। एक दिन राजा शर्याति अपनी रानी और पुत्री सुकन्या के साथ वन विहार के लिए निकले। राजा-रानी तो एक सरोवर के निकट विश्राम के लिए बैठ गए लेकिन सुकन्या घूमती हुई मिट्टी के एक टीले के पास पहुंच गई। टीले में दो चमकदार मणिया चमकती हुई उसे दिखाई। सुकन्या ने सूखी लकड़ी की सहायता से दोनों चमकदार मणियों को निकालने का प्रयास किया। तब मणियों से रक्त की धार बहने लगी। सुकन्या यह देख कर घबरा गई। उसने तत्काल यह बात अपने पिता राजा शर्याति को बताई। राजा ने जब निकट पहुंच कर देखा तो वह सन्न रह गया। उसने सुकन्या से कहा कि ‘‘बेटी अज्ञानता में तुमने अनर्थ कर दिया। ये मणियां नहीं तपस्यारत ऋषि च्यवन की आंखें हैं। वे वर्षों से यहां तपस्यारत हैं इसीलिए उनके शरीर पर मिट्टी का टीला बन गया है। तुम यह बात समझ नहीं सकीं।’’ पिता की बात सुन कर सुकन्या को बहुत पछतावा हुआ। और उसने अपने पिता से कहा कि वह अपनी इस भूल का प्रायश्ति करने के लिए ऋषि च्यवन से विवाह कर के उनकी आंखें बनेगी। ़षि उस समय वृद्धावस्था में पहुंच चुके थे जबकि सुकन्या नवयौवना थी। राजा ने उसे समझाना चाहा किन्तु वह अपने निर्णय पर अडिग रही। राजा ने सुकन्या का विवाह ऋषि च्यवन के साथ कर दिया। सुकन्या ऋ़षि का सहारा बनी। च्यवन ने उसका नाम सुकन्या से मंगला रख दिया। सुकन्या उर्फ मंगला की यह निष्ठा देख कर देवताओं ने च्यवन ऋषि को एक ऐसी औषधि की विधि बताई जिसका सेवन कर के ऋषि फिर से युवा हो गए। यही औषधि च्यवनप्राश थी।       
ग्राम बंट के जंगली क्षेत्र में च्यवन ऋषि का आश्रम था। आज भी यह क्षेत्र घने जंगल के रूप में है। यहां पर अनेक प्रकार की जड़ी-बूटियां पाई जाती हैं। यह पूरा वनक्षेत्र जड़ी-बूटियों से भरा पड़ा है। खासकर गौना वन रेंज और मड़ावरा के जंगल में बहुतायत में जड़ी बूटियां पाई जाती हैं। ऐसा माना जाता है कि च्यवन ऋषि ने बुंदेलखंड में ही च्यवनप्राश बनाया था। च्यवनप्राश का उपयोग करोड़ों लोग स्फूर्ति प्रदान करने वाले टॉनिक के रूप में करते हैं। किन्तु आज इन औषधीय पौधों एवं जड़ी-बूअियों का उत्पादन कम होने से आयुर्वेदिक औषधियों का लाभदायक उद्योग संकट से जूझ रहा है। 
औषधीय महत्व के वनोपज में बबूल का भी महत्वपूर्ण स्थान है। बुंदेलखंड के कई स्थानों पर बबूल की गोंद बड़ी मात्रा में एकत्रित की जाती है। शहद एवं लाख आदि का भी उत्पादन होता है। शंखपुष्पी, अश्वगंधा, ब्राह्मी, सफेद मूसली, पलाश, भूमि आंवला, खैर के बीज, गाद, कसीटा, धावड़ा, कमरकस जड़ी- बूटी प्रमुख हैं। विगत वर्ष 2000 में केंद्र सरकार ने औषधीय पौधों जिनमें सफेद मूसली, लेमन, मेंथा, पाल्मारोजा, अश्वगंधा आदि को संरक्षित करने के लिए केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री की अध्यक्षता में राष्ट्रीय औषधीय वनस्पति समिति का गठन किया था। इसके बाद समिति ने 32 औषधियों के विकास के लिए चिन्हित किया था। इसमें आंवला, अशोक, अश्वगंधा, अतीस, बेल, भूमि अम्लाकी, ब्राह्मी, चंदन, गुग्गल, पत्थरचुर, पिप्पली, दारुहल्दी, इसबगोल, जटामांसी, चिरायता, कालमेघ, कोकुम, कथ, कुटकी, मुलेठी, सफेद मूसली, केसर, सर्पगंधा, शतावरी, तुलसी, वत्सनाम, मकोय प्रजाति को संरक्षित करने की योजना तैयार की थी। इनके उत्पादन को बढ़ावा दिए जाने की बात भी सामने आई थी किन्तु आशातीत कार्य नहीं हुआ।
आज से लगभग पन्द्रह-बीस साल पहले औषधि में काम आने वाली सफेद मूसली वनों में भरपूर मात्रा में उत्पन्न होती थी। उल्लेखनीय है कि बुंदेलखंड में बसने वाले जनजाति के सहरिया परिवारों की गुजर-बसर इस औषधि के सहारे चलती। लेकिन, अब जंगलों की अवैध कटाई ने इस औषधि की उपलब्धा को भी बुरी तरह प्रभावित किया है। एक ओर इसकी उपलब्धता घटी है और दूसरी ओर इसके दाम भी बहुत कम मिल पाते हैं। प्राप्त जानकारी के अनुसार सफेद मूसली लगभग 100 रुपये प्रति किलोग्राम के हिसाब से बिकती है जिससे मुसली एकत्र करने वालों को पर्याप्त मुनाफा नहीं मिल पाता है।
वैसे विगत वर्षों में बुंदेलखंड में वानस्पतिक दृष्टि से नई संभावनाओं पर भी गौर किया जा रहा है। जिनमें फूलों की खेती और मशरूम का उत्पादन भी शामिल है। विशेषज्ञों के अनुसार बुंदेलखंड में फूलों की खेती की काफी संभावनाएं हैं। वहीं आयस्टर मशरूम के उत्पादन को भी बढ़ावा दिया जाने लगा है। यह माना जाता है कि आयस्टर मशरूम में औषधीय एवं पौष्टिक गुण पाए जाते हैं। यह वनस्पति जगत के तहत आने वाले खोने योग्य फफूंद है। जिसको गेहूं के भूसे पर उगाया जा सकता है। आयस्टर मशरूम में प्रोटीन खनिज पदार्थ, आयरन फोलिक अम्ल आदि पाए जाते हैं। यह मधु मेह रोगियों, उच्च रक्तचाप को कम करने में मददगार होता है।
विडम्बना यह है कि पहले वनवासी वन संपदा पर अपना अधिकार समझकर खैर, गोंद, शहद, आंवला, आचार, तेंदूफल व सीताफल का संग्रह कर उसे शहर व कस्बों में बेच कर अपने परिवार की भूख मिटाते थे, लेकिन अब इधर वन विभाग वन संपदा पर अपना अधिकार जता कर इन उत्पादों की नीलामी करने लगा है। अब तो वनवासी जंगल में वनोपज पाने के लिए बिना अनुमति के घुस भी नहीं सकते हैं। यदि कहीं बिना अनुमति के जाने पर पकड़े गए तो सजा और जुर्माना भुगतना पड़ता है। 
विचारणीय है कि जिस भू-भाग को च्यवन ऋषि ने औषधीय बनोपज की उपलब्धता के कारण अपना कर्मक्षेत्र बनाया, उसी भू-भाग को आज अपनी वनसंपदा को तेजी से नष्ट होते देखना पड़ रहा है। शहर गांवों को निगल रहे हैं और गांव जंगलों में प्रवेश करते जा रहे हैं। अवैध कटाई के चलते औषधि और गैर औषधि वाली वनस्पतियां असमय काल का ग्रास बनती जा रही हैं। एक सघन जागरुकता ही च्यवन ऋषि के औषधीय बुंदेलखंड को बचा सकती है।      
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Tuesday, May 14, 2024

पुस्तक समीक्षा | बुंदेलखंड में पर्यटन के लिए आमंत्रण देती एक बेहतरीन पुस्तक | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

प्रस्तुत है आज 14.05.2024 को  #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई डॉ नीलिमा पिंपलापुरे जी की काफी टेबल बुक "बुंदेलखंड द हार्टबीट ऑफ़ मध्य प्रदेश" की समीक्षा।
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पुस्तक समीक्षा     
बुंदेलखंड में पर्यटन के लिए आमंत्रण देती एक बेहतरीन पुस्तक
- समीक्षक डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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पुस्तक       - बुंदेलखंड द हार्टबीट ऑफ मध्यप्रदेश
लेखिका एवं छायाकार  - डाॅ. नालिमा पिंपलापुरे एवं गणेश पंगारे
प्रकाशक     - बी बज़ मीडिया, इंडिया
मूल्य        - 2000/-
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बुंदेलखंड की प्राचीनता निर्विवाद है। प्रागैतिहासिक काल में मानव ने इस क्षेत्र को अपने निवास स्थान के रूप में चुना, जिसका साक्ष्य हैं इस क्षेत्र में मिलने वाली राॅक एवं केव पेंटिंग्स। प्रागैतिहासिक काल के औजार भी बुंदेलखंड के अनेक स्थानों से प्राप्त हुए हैं। पौराणिक ग्रंथों तथा महाकाव्यों में बुंदेलखंड का उल्लेख दशार्ण के नाम से मिलता है। ‘‘शिवपुराण’’ में कहा गया है कि विषपान के बाद भगवान शिव ने कालंजर में विश्राम किया था तथा देवी काली से विवाह कर के कुछ समय यहीं व्यतीत किया था। इसके बाद शिव हिमालय की ओर तथा देवी काली कामाख्या की ओर चली गई थीं। ‘‘महाभारत’’ काल में शिखण्डी का विवाह जिस कन्या से कराया गया था, वह दशार्ण के राजा की पुत्री हिरण्यमयी थी। बुंदेलखंड का जितना प्रागैतिहासिक एवं पौराणिक महत्व है उतना ही धर्म, राजनीति, संस्कृति एवं प्रकृति को ले कर भी महत्व है। इस महत्व की जानकारी समय के साथ बढ़ने के बजाय सिमटती जा रही है। जबकि बुंदेलखंड में पर्यटन की असीम संभावनाएं हैं। यह सुखद है कि पर्यटन की संभावनाओं को दिशा प्रदान करती एक पुस्तक प्रकाशित हुई है जिसका मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डाॅ. मोहन यादव ने खजुराहो के नृत्योत्सव के दौरान लोकार्पण किया था। इस पुस्तक का नाम है-‘‘बुंदेलखंड द हार्टबीट आफ मध्यप्रदेश’’।
‘‘बुंदेलखंड द हार्टबीट ऑफ  मध्यप्रदेश’’ एक सुंदर काॅफी टेबल बुक है। काॅफी टेबल बुक आमतौर पर किसी भी विषय पर परिचयात्मक पुस्तक होती है। यह पुस्तक भी परिचयात्मक है तथा इसमें बुंदेलखंड के विविध आयामों का नयानाभिराम छायाचित्रों के साथ संक्षिप्त परिचय दिया गया है। इस पुस्तक की सामग्री-शोधकर्ता एवं लेखिका डाॅ नीलिमा पिंपलापुरे हैं। पुस्तक में दिए गए सभी छायाचित्रों के छायाकार हैं गणेश पंगारे। डाॅ नीलिमा पिंपलापुरे का जन्म यूं तो पूना में हुआ किन्तु विगत 50 वर्ष से वे सागर में निवासरत हैं। यही कारण है कि अंग्रेजी साहित्य में एम.ए., पीएचडी डाॅ. नीलिमा पिंपलापुरे को बुंदेलखंड से अगाध प्रेम हो गया। उनका यह प्रेम ही इस पुस्तक का मूलआधार बना। जैसा कि उन्होंने पुस्तक की प्रस्तावना में स्वयं लिखा है-‘‘यह प्रकाशन बुंदेलखंड के प्रति मेरे प्रेम और जुनून का परिणाम है। मेरा उद्देश्य बुंदेलखंड के अनूठे पहलुओं को उजागर करना और इसे वह सम्मान दिलाना है जिसका यह क्षेत्र हकदार है। मैंने बुंदेलखंड के मध्य प्रदेश भाग पर मुख्य रूप से ध्यान केंद्रित किया है क्योंकि मैं पिछले पचास वर्षों से यहीं रह रही हूं और यह वह क्षेत्र है जो मेरे दिल के बहुत करीब है। मुझे पूरा विश्वास है कि यह पुस्तक इस शानदार भूमि को सुर्खियों में लाने और इसके अमूल्य स्मारकों के संरक्षण को बढ़ावा देने के लिए एक उपयोगी योगदान और एक महान अवसर साबित होगी। यह बुंदेलखंड का विस्तृत या गहन चित्रण नहीं है, बल्कि यह दुनिया को इस रहस्यमयी भूमि और इसकी समृद्ध विरासत से परिचित कराने का एक छोटा सा प्रयास है, ताकि पर्यटन को बढ़ावा देने और मध्य प्रदेश के इस खूबसूरत क्षेत्र का अध्ययन करने की पहल की जा सके। अपनी जीवन यात्रा के दौरान मैंने बुंदेलखंड के हर कोने का विश्लेषण, व्याख्या और भ्रमण किया है और मैं अपने अवलोकन साझा करना चाहूँगी।’’
गणेश पंगारे एक अंतर्राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त छायाकार हैं। जल, पारिस्थितिकी तंत्र और जैव विविधता पर उनकी 20 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। ‘‘टाईम’’ पत्रिका में उनका उल्लेख किया गया था। आईएफपीआरआई, एफएओ, यूनेस्को, विश्व बैंक, एडीबी और अन्य अंतरराष्ट्रीय संगठनों के साथ उन्होंने काम किया हैं। वे अंटार्कटिका, आर्कटिक, अमेजन वन, अफ्रीका और एशिया के राष्ट्रीय उद्यानों, हिमालय के पार और एवरेस्ट बेस कैंप तक के अभियानों का हिस्सा रहे हैं। उनके छायांकन की विशिष्टिता इस पुस्तक के प्रत्येक छायाचित्र में देखी जा सकती है।
यह पुस्तक मध्यप्रदेश शासन पर्यटन विभाग के ‘‘द हार्ट ऑफ इंक्रेडिबल इंडिया’’ के अंतर्गत प्रकाशित है तथा इसमें शिव शेखर शुक्ला, प्रमुख सचिव, पर्यटन एवं संस्कृति विभाग, मध्य प्रदेश शासन, भोपाल का सहयोग है।
इस काॅफी टेबल बुक का नाम एकदम सटीक है-‘‘बुंदेलखंड द हार्टबीट ऑफ  मध्यप्रदेश’’। मध्यप्रदेश देश का हृदयस्थल है और बुंदेलखंड मध्यप्रदेश की धड़कन है। धड़कन जीवन का प्रतीक होती है। बुंदलेखंड में प्रकृति से लेकर कला और जीवनशैली से ले कर जीवनसंघर्ष तक सभी कुछ जीवंत है। पुस्तक की सामग्री पांच अध्यायों में है - पहला अध्याय बुंदेलखंड क्षेत्र, दूसरा अध्याय किले और मंदिर, तीसरा अध्याय वन और वन्य जीवन, चैथा अध्याय कृषि तथा आजीविका, पांचवा अध्याय है सांस्कृतिक विरासत।
पहले अध्याय बुंदेलखंड क्षेत्र में है- एरण एक प्राचीन शहर, महाराज छत्रसाल बुंदेला, मस्तानी महल तथा सागर का संक्षिप्त विवरण। दूसरे अध्याय में किले और मंदिर के अंतर्गत- 1.ओरछा के मंदिर, बुंदेली वाॅल पेंटिंग्स जो बुंदेली कलम के नाम से जानी जाती हैं, ओरछा का महल, सुप्रसिद्ध रामराजा मंदिर 2. विश्व विख्यात खजुराहो के मंदिर तथा मूर्तियां 3. धामोनी का किला 4. तालबेहट का किला 5. धुबेला महल 6. हृदयशाह का महल 7. कालंजर का किला एवं प्रतिमाएं 8. पन्ना के मंदिर - प्राणनाथ जी मंदिर, बलदेव जी मंदिर, जगन्नाथ मंदिर, जुगल किशोर जी मंदिर।
तीसरा अध्याय वन और वन्य जीवन का है। इसमें पन्ना नेशनल पार्क, केन घड़ियाल अभ्यारण्य, नौरादेही वाइल्डलाइफ अभ्यारण्य, ओरछा पक्षी अभ्यारण का सचित्र संक्षिप्त विवरण है।
चैथा अध्याय है कृषि और आजीविका। इसमें कृषि-विकास के आयाम, तेंदूपत्ता और बीड़ी, महुआ बीनने के व्यवसाय की झलक है।
पांचवा अध्याय है सांस्कृतिक विरासत का। सांस्कृतिक दृष्टि से बुंदेलखंड में प्रचुर विविधता है। इस अध्याय में लेखिका ने चित्रकूट, ट्रेडिशनल आर्ट्स एंड क्राफ्ट्स, चंदेरी साड़ी, धातुकला, हाथ से कागज बनाना, लोकगीत, लोक नृत्य, पारंपरिक स्वाद, ग्राम में जीवन की झलक प्रस्तुत की है।
अंत में एरण, चित्रकूट, खजुराहो, कालंजर, नौरादेही, ओरछा, पन्ना तथा सागर तक पहुंचाने के मार्ग बताए गए हैं। साथ ही मध्य प्रदेश का टूरिस्ट मैप दिया गया है।   
यह पुस्तक मूलतः अंग्रेजी में है किन्तु छायाचित्रों की बहुलता के कारण भाषा बाधा नहीं बनती है। अंग्रेजी कम जानने वाला अथवा लगभग न जानने वाला व्यक्ति भी छायाचित्रों के द्वारा बुंदेलखंड के वैभव से परिचित हो सकता है। पुस्तक में दिए गए नयनाभिराम दृश्य किसी भी पर्यटक को बुंदेलखंड के भू-भाग की ओर खींचने में सक्षम हैं। यह इस पुस्तक की खूबी है कि विवरण एवं छायाचित्रों में सुंदर सामंजस्य है। चूंकि यह पुस्तक मध्यप्रदेश शासन के सहयोग से है अतः इसमें मध्यप्रदेश के अंतर्गत आने वाले  बुंदेलखंड   के पर्यटन क्षेत्रों को प्रमुखता से दिया गया है। जिससे यह पुस्तक समूचे बुंदेलखंड को कव्हर नहीं करती है किन्तु इस बात से आश्वस्त कराती है कि यदि प्रस्तुत भू-भाग में इतने महत्वपूर्ण स्थान हैं तो पूरा बुंदेलखंड तो देखने योग्य होगा ही। यह जरूर है कि प्रागैतिहासिक काल की आबचंद की केव पेंटिंग्स, अजयगढ़ का किला, पन्ना का चैमुखनाथ मंदिर, कुंडलपुर का मंदिर आदि अनेक स्थान छूट गए हैं। इनमें आबचंद की केव पेंटिंग्स भी दी जाती तो इस भू-भाग की प्राचीनता के प्रति आकर्षण बढ़ जाता। वैसे हर पुस्तक की अपनी सीमा होती है और काॅफी टेबल बुक का अपना अलग मानक होता है। इस प्रकार की पुस्तकें मूलरूप से परिचयात्मक होने के कारण इनमें विवरण विस्तार से नहीं आ पाता है, बल्कि उसके बदले छायाचित्रों से तथ्य प्रस्तुत किए जाते हैं। इस दृष्टि से पुस्तक में विषय के अनुरुप समग्र कलेवर न होते हुए भी यह एक बेहतरीन काॅफी टेबल बुक है। लेखिका डाॅ. नीलिमा पिंपलापुरे ने प्रत्येक विवरण को बड़ी गहनता से प्रस्तुत किया है। इस पुस्तक का उद्देश्य पर्यटन से जुड़ा हुआ है अतः यह कहा जा सकता है कि अपने उद्देश्य में यह पुस्तक पूर्ण सफल है। पुस्तक के आवरण में ही प्रथम पृष्ठ पर ओरछा की तस्वीर तथा अंतिम पृष्ठ पर एरण के विशालकाय वाराह की तस्वीर है जो मानो आमंत्रण देती है कि पुस्तक को खोल कर देखा जाए, पढ़ा जाए। इस पुस्तक से गुज़रने के बाद हर व्यक्ति बुंदेलखंड में पर्यटन के लिए उत्सुक हो उठेगा।
बड़े आकार एवं ग्लेज़ड कागज पर जीवंत रंगीन छायाचित्रों से भरपूर इस पुस्तक का मूल्य अपेक्षाकृत कम ही है क्योंकि इस आकार-प्रकार की अन्य पुस्तकें इससे दूनी अथवा तिगुनी मूल्य की होती हैं। पुस्तक की उपादेयता को देखते हुए इसे हिन्दी तथा अन्य भारतीय एवं वैश्विक भाषाओं में लाने पर भी विचार किया जाना चाहिए। यह पुस्तक हर उस व्यक्ति के लिए उपयोगी है जो बुंदेलखंड के वैभव से परिचित होना चाहता है और बुंदेलखंड में पर्यटन करना चाहता है। एक अच्छी काॅफी टेबल बुक के लिए लेखिका डाॅ नीलिमा पिंपलापुरे एवं छायाकार गणेश पंगारे बधाई के पात्र हैं।                
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