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Tuesday, January 6, 2026

पुस्तक समीक्षा | ज़बर्दस्त रोमांचक है मुकेश भारद्वाज के अभिमन्यु सिरीज़ का नया थ्रिलर ‘‘राज़महल’’ | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

पुस्तक समीक्षा | ज़बर्दस्त रोमांचक है मुकेश भारद्वाज के अभिमन्यु सिरीज़ का नया थ्रिलर ‘‘राज़महल’’ | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण
पुस्तक समीक्षा  

ज़बर्दस्त रोमांचक है मुकेश भारद्वाज के अभिमन्यु सिरीज़ का नया थ्रिलर ‘‘राज़महल’’ 

- समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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उपन्यास     - राज़महल 
लेखक       - मुकेश भारद्वाज
प्रकाशक     - वाणी प्रकाशन, 4695, 21-ए, दरियागंज, नई दिल्ली - 110002
मूल्य       - 395/-
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‘‘जनसत्ता’’ के कार्यकारी संपादक मुकेश भारद्वाज अपने काॅलम ‘‘बेबाक बोल’’ के लिए तो चर्चित हैं ही किन्तु जब उन्होंने थ्रिलर उपन्यास लिखना शुरू किया तो अपने पहले उपन्यास ‘‘मेरे बाद’’ ने ही तहलका मचा दिया। हिन्दी जगत में रोमांचक जासूसी उपन्यासों को ले कर एक शून्यता का अनुभव हो रहा था, उस शून्यता को मुकेश भारद्वाज ने अपने उपन्यास ‘‘मेरे बाद’’ से भर दिया। उपन्यास का मुख्य पात्र अभिमन्यु पाठकों के मन-मस्तिष्क पर छा गया। इसका परिणाम यह हुआ कि एक साल बाद ही दूसरा जासूसी उपन्यास ‘‘बेगुनाह’’ और फिर तीसरा उपन्यास ‘‘नक्काश’’ पाठकों के हाथों में आ गया। यदि पाठक पसंद करें तो लेखक भी उत्साहित होता है। जिस तरह कभी विनोद-हमीद, सुनील और मेजर बलवंत के लिए पाठकों में जुनून पाया जाता था, ठीक उसी तरह ‘‘अभिमन्यु’’ के लिए भी पाठकों में जुनून जाग उठा है। वे अभिमन्यु के किरदार से स्वयं को जुड़ा हुआ महसूस करते हैं। वे उसके साथ-साथ चल कर हर मिस्ट्री को सुलझाना चाहते हैं। बल्कि कई बार तो पाठक अपने प्रिय पात्र को भी मात दे कर आगे बढ़ जाना चाहता है और उससे पहले हत्या की गुत्थी सुलझा लेना चाहता है। यह वस्तुतः उस पात्र से जुड़ा यथार्थबोध होता है जो पाठकों को उकसाता है। थ्रिलर के मंजे हुए लेखक अपने पात्र और पाठकों के इस रिश्ते को भली-भांति समझते हैं और इसी सूत्र को पकड़ कर कथानक को आगे बढ़ाते हैं जिससे पाठकों को कभी अपना प्रिय पात्र यानी उपन्यास का हीरो आगे लगे तो कभी वे स्वयं को उससे आगे महसूस करें। यह ताना-बाना उपन्यास को सफलता के शिखर पर पहुंचा देता है। 
अभिमन्यु सिरीज़ का नवीनतम उपन्यास है ‘‘राज़महल’’। जी हां, राजा-रानी वाला कोरा सियासी ‘‘राजमहल’’ नहीं, वरन  ‘‘राज़महल’’ जिसमें राज़ ही राज़ हैं यानी ढेर सारा सस्पेंस। थ्रिलर उपन्यासों की मुख्य विशेषता ही होती है पाठकों के चेतन-अवचेतन में रोमांच, शंका और सतत उद्वेलन को जगाना। रहस्य-रोमांच  उपन्यासों के विपरीत, रोमांचकारी यानी थ्रिलर उपन्यास मात्र पूर्व घटित अपराध को सुलझाने पर केंद्रित नहीं होते हैं, वरन वे समय सीमा के भीतर भविष्य में होने वाले अपराध को रोकने का संघर्ष भी दिखाते हैं। थ्रिलर उपन्यासों की सबसे प्रमुख विशेषता होती है रोमांच और गति। थ्रिल यानी रोमांच तभी पैदा होता है जब पाठकों को आने वाले खतरे और परिणाम के बारे में अनिश्चितता का एहसास हो और उनकी उत्सुकता बनी रहे कि अब क्या होने जा रहा है? इसके साथ ही कथानक की गति भी इसे रोमांचक बनाती है। इसे दूसरे शब्दों में कहा जाए तो भरपूर एक्शन। ताकि पाठक एक बार पढ़ना शुरू करे उसे पूरा पढ़ कर ही थमें। इतना ही नहीं थमने के बाद भी वह अपने मानस में मुख्य पात्र के साथ कई-कई दिन तक घटनाओं का विश्लेषण करता रहे। यही प्रक्रिया उस सिरीज के अगले उपन्यास के लिए पाठक का मानस तैयार कर देती है। एक व्याकुलता जगा देती है कि इस सिरीज का अगला उपन्यास कब आएगा? फिर जब नया उपन्यास आता है तो उसकी उत्सुकता चरम पर पहुंच जाती है। 

मुकेश भरद्वाज ने अभिमन्यु के रूप में पाठकों को एक ऐसा पात्र दिया है जो कभी जेम्सबांड की तरह बिंदास एवं दिलफेंक है तो कभी शारलाक होम्स की तरह गंभीर, कभी सुनील की तरह दिल्ली की छाप लिए हुए तो कभी एक अनूठा अद्वितीय चरित्र जो देश के किसी भी हिस्से के पाठक को अपना-सा लगेगा। ‘‘राज़महल’’ उपन्यास में भी अभिमन्यु अपने पूरे किरदार के साथ उपस्थित है। इसीलिए आर्म डीलर निहाल सिंह की दूकान पर जब बला की खूबसूरत टाटा घोष से उसकी मुलाकात होती है तो वह टाटा से दोस्ती करने में एक पल की देर नहीं करता है। यह कोई रोमांटिक भेंट नहीं थी। टाटा घोष उस दूकान पर रिवाल्वर खरीदने आई थी। वह खरीदती भी है। यहीं से सस्पेंस शुरू हो जाता है कि एक सुंदर स्त्री किस पर गोली चलाने जा रही है? और क्यों? 
दूकानदार निहाल सिंह के रूप में पंजाबी बोली का तड़का आरम्भ से ही गुदगुदाता है। कुछ पन्नों की यात्रा के बाद मधुमालिनी और सुदक्षदीप सिंह की कहानी से गुज़रना होता है। सुदक्षदीप सिंह का कुत्सित कर्म और शिकार बनती है मधुमालिनी। कई बार एक अपनराध दूसरे अपराध की जमीन तैयार कर देता है। न्याय के नाम पर ही सही। ऐसे बिन्दु पर यह तय करना कठिन हो जाता है कि क्या उचित है और क्या अनुचित? पाठक का मानस उस पर एक चित्त हो कर विक्टिम यानी पीड़ित के पक्ष में डट कर खड़ा हो जाता है। सुदक्षदीप सिंह की रहस्यमयी मौत पाठक के मन को राहत तो देती है किन्तु उत्सुकता भी जगाती है कि उसे इस अंजाम तक किसने पहुंचाया? 

चाहे सत्या सुहानी हो, सबीना या सनम हो, उपन्यास के सभी पात्र अपनी-अपनी भूमिका में खरे उतरते हुए कथानक को जिस प्रकार गति देते हैं वह पाठकों को बांधे रखने के लिए पर्याप्त है। थ्रिलर लेखक अकसर कथानक में अप्रत्याशित मोड़ और भ्रामक संकेत दे कर तनाव और आश्चर्य बनाए रखते हैं। पाठक इन टूल्स से कुछ समय के लिए गुमराह हो जाता है और उलझ कर रह जाता है। यूं भी थ्रिलर उपन्यास का नायक प्रथमदृष्ट्या एक साधारण व्यक्ति होता है जिसे खतरे का आंशिक अनुभव तो होता है फिर भी वह स्वयं को असाधारण और जानलेवा स्थिति में फंसने से रोक नहीं पाता है। उसकी यह ‘डेयरिंग’ ही उसे पाठकों का प्रिय बना देती है। जैसे पाठक अभिमन्यु से जुड़ाव महसूस करते हैं और उसकी सुरक्षा और सफलता को ले कर चिंतित होने लगते हैं। भ्रम को सच के बोध में बदल कर लेखक अपने पात्र को पाठकों के मन-मस्तिष्क में उतार देता है, बड़ी चतुराई से उनका सहगामी बना देता है। एक थ्रिलर की मूल विशेषता है कि वह भय और समाधान की इच्छा जैसी मूलभूत मानवीय प्रवृत्तियों को जगा कर वास्तविकता से एक गहन, एड्रेनालाईन- युक्त संसार रचता है जिसमें परम उत्तेजना के पल पाठक को स्वयं एक जासूस बनने को विवश कर देते हैं। इसी बिन्दु पर लेखक की लेखकीय क्षमता की परीक्षा भी होती है। अभिमन्यु के किरदार का पाठको के मन पर छा जाना इस बात का सबूत है कि मुकेश भरद्वाज थ्रिलर लेखन के टूल्स से खेलने में माहिर हैं। वे जानते हैं कि कहां अभिमन्यु को चुस्त-चालाक दिखाना है और कहां उसे एक लापरवाह खिलंदड़ा रखना है।  
 
पाठकों को क्राइम और थ्रिलर फिक्शन पसंद क्यों आता है? क्योंकि यह उन्हें जीवन के घटनाक्रमों के अनजान हिस्सों को अनुभव करने का मौका देता है। वे अपनी जगह बैठे-बैठे जीवन के उन खतरनाक मोड़ों पर पहुंच सकते हैं जहां अपराधी पनपते हैं। वे अपराध के घिनौने रूपों से साक्षात्कार कर सकते हैं। वे स्वयं को अपराध रोकने वाले के पक्ष में खड़ा होते अनुभव कर सकते हैं। थ्रिलर सस्पेंस, एक्साइटमेंट और उत्सुकता पैदा करता है, जो दर्शकों को क्राइम, रहस्य, जासूसी या मनोवैज्ञानिक तनाव वाली हाई-स्टेक कहानियों के साथ मानसिक यात्रा करता है, जिसमें अक्सर तेज गति, अप्रत्याशित मोड़ और नायक समय या खतरे के खिलाफ दौड़ते हैं। इसमें लेखक सस्पेंस और उत्सुकता रूप जानकारी को नियंत्रित करके और अपरिहार्य घटनाओं में देरी करके तनाव पैदा करता है। हाई स्टेक्स रूप अक्सर जानलेवा स्थितियों, खतरे या मनोवैज्ञानिक यातना स्वाभाविक रूप से शामिल होती है। जटिलतम परिस्थितियों में नायक आमतौर पर भारी बाधाओं का सामना करता है, अक्सर अकेला होता है, एक खलनायक या टिक-टिक करती घड़ी के विरुद्ध काम करता है।

थ्रिलर की एक खूबी यह भी होती है कि उनमें से किसी एक को अंतिम रूप से ‘‘सबसे अच्छा’’ ठहराया नहीं जा सकता है लेकिन लेखकीय क्षमता किसी भी थ्रिलर को सर्वाधिक पाठक उपलब्ध करा कर उसे ‘बेस्ट सेलर’ बना देती है। जैसे कुछ प्रसिद्ध आधुनिक वास्तुशिल्प उपन्यासों में द साइलेंट पेशेंट (एलेक्स माइकलाइड्स), द हाउसमेड (फ्रीडा मैकफैडेन), द गर्ल ऑन द ट्रेन (पाउला हॉकिन्स), द ग्रैबेड मिस्टर रिपल (पेट्रीसिया हाईस्मिथ), और डी ऑफ द जैकल (फ्रेडरिक फोर्सिथ) शामिल हैं, जो अपने वैज्ञानिक गहराई, स्ट्रेनल फ्लेक्स और स्ट्रेंथ सैस्पेंस के लिए जाने जाते हैं। इसी क्रम में यदि हिन्दी थ्रिलर उपन्यास को देखें तो ‘‘राज़महल’’ पूरी तरह खरा उतरता है।
‘‘राज़महल" का  कवर पेज ही इस किताब के कंटेंट को पढ़ने के लिए उत्सुकता जगाता है। मध्य में पीठ पीछे पिस्तौल छिपाए खड़ा आदमी, उसके इर्दगिर्द मदिरा, रुपए, एक ओर एक पिस्तौलधारी जो दबे पांव अपने शिकार की ओर बढ़ रहा है, दूसरी ओर मात्र एक पिस्तौल जिसके साथ उंगलियों की मज़बूत पकड़ तो दिख रही है किन्तु उसे थामने वाला गोपन में है, कुछ लैंडमार्क जो घटनाओं के स्थान की ओर संकेत करते हैं। 

  किसी भी थ्रिलर उपन्यास के बारे में समीक्षात्मक लिखना कठिन होता है क्योंकि आप उसके कथानक को छू भी नहीं सकते हैं क्योंकि किसी भी तरह से भेद खोल कर लेखक की मेहनत पर पानी नहीं फेर सकते हैं। लेकिन बतौर समीक्षक यह दावा किया जा सकता है कि इसे पढ़ा जाए अथवा नहीं? या फिर लेखक ने कथानक के साथ न्याय किया है या नहीं? तो बेझिझक यह दावा किया जा सकता है कि मुकेश भारद्वाज का नवीनतम थ्रिलर ‘‘राज़महल’’ उन सभी पाठको को अवश्य पढ़ना चाहिए जिनकी रहस्य और रोमांच में गहरी रुचि है। लेखक ने अपनी पूरी लेखकीय क्षमता को काम लाते हुए इतने प्रभावी ढंग से उपन्यास का ताना-बाना बुना है कि इसके मुख्य पात्र अभिमन्यु के साथ पाठक भी स्वयं को एक जासूस की भांति महसूस करेगा। महल से निकला राज़ किस तरह एक पूरा राज़महल खड़ा कर सकता है, यह भी अनुभव होगा पाठकों को। इसमें कोई आश्चर्य नहीं होगा यदि पाठक इसे पढ़ने के बाद अभिमन्यु सिरीज के अगले उपन्यास के लिए लेखक पर दबाव डालने लगें। यही इस उपन्यास की लोकप्रियता एवं सफलता का मानक है।
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Tuesday, November 7, 2023

पुस्तक समीक्षा | फिर सामने है ‘अभिमन्यु’ एक सनसनीखेज़ वारदात पर से पर्दा उठाने | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

प्रस्तुत है आज 07.11.2023 को  #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई उपन्यासकार मुकेश भारद्वाज के उपन्यास "बेगुनाह" की समीक्षा।
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पुस्तक समीक्षा      
फिर सामने है ‘अभिमन्यु’ एक सनसनीखेज़ वारदात पर से पर्दा उठाने    
- समीक्षक डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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उपन्यास     - बेगुनाह
लेखक       - मुकेश भारद्वाज
प्रकाशक     - यश पब्लिकेशंस, 1/10753, सुभाष पार्क, नवीन शहदरा, नई दिल्ली-110032
मूल्य        - 495/-
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लेखक एवं पत्रकार मुकेश भारद्वाज का नवीनतम जासूसी उपन्यास ‘‘बेगुनाह’’ उनके लोकप्रिय पात्र जासूस ‘अभिमन्यु’ की सिरीज़ का दूसरा उपन्यास है। अभिमन्यु वह जासूस नायक है जिसने पहले उपन्यास ‘‘मेरे बाद’’ से ही पाठकों के दिल-दिमाग में अपनी जगह बना ली थी। कुछ-कुछ जेम्सबांड जैसा चरित्र। शराब और शबाब का शौकीन लेकिन उतना ही चुस्त, चालाक और खोजी। यूं भी सिरीज़ वाले उपन्यास पाठकों को रोचक लगते हैं। आर्थरकानन डायल का ‘शारलाक होम्स’ हो या अगाथा क्रिस्टी का ‘हरक्यूल पोईराॅट’, या फिर इयान फ्लेमिंग का ‘जेम्स बाॅण्ड’, ये सभी पात्र आज भी सभी के दिलों पर राज कर रहे हैं। हिन्दी में ही देख लें तो सुरेन्द्र मोहन पाठक के जासूस ‘सुनील’ ने पाठकों को प्रतीक्षा की लाईन में खड़ा करा दिया था। अब इसी क्रम में मुकेश भारद्वाज का जासूस ‘अभिमन्यु’ अपने पाठकों को प्रतीक्षा की उस पंक्ति में खड़ा करने लगा है जहां पाठकवर्ग सोचता है कि अब अभिमन्यु  सिरीज का अगला उपन्यास कब आएगा। अपने पहले ही उपन्यास से इस सिरीज को इस तरह की सफलता मिलना लेखकीय कौशल का कमाल है। इसीलिए अभिमन्यु सिरीज का दूसरा उपन्यास ‘‘बेगुनाह’’ आते ही पाठकों ने इसका स्वागत किया।  

जासूसी उपन्यासों का एक बड़ा पाठक वर्ग हमेशा ही रहा है। जिन उपन्यासकारों ने एक ही जासूस नायक को ले कर कथाएं लिखीं, वे पाठकों को अधिक लुभाती रही हैं क्योंकि वह जासूस पात्र उन्हें बहुत जल्दी अपना मित्र सरीखा लगने लगता था। जासूस से लगाव का यह क्रम हमेशा रहा है और आज भी यथावत है। वस्तुतः जासूस के कारनामे पढ़ते समय पाठक उसके साथ-साथ चलता है और उसके साथ चलते हुए अपराध की गुत्थी को सुलझाने में स्वयं को भी मानसिक रूप से लिप्त पाता है। इसीलिए जब अंत में गुत्थी सुलझती है तो एक पाठक भी स्वयं को विजयी और प्रफुल्लित अनुभव करता है। यूं भी आपराधिकता क्यों, कैसे, कहां, कब, किसने आदि इतने सारे प्रश्नों को ले कर सामने आती है कि हर व्यक्ति उसकी तह तक जाने को जिज्ञासु हो उठता है। देखा जाए तो जासूसी उपन्यासों की सफलता का सबसे बड़ा राज़ भी यही है। ऐसे उपन्यास सबसे पहले पाठक की जिज्ञासा पर दस्तक देते हैं।

‘‘बेगुनाह’’ आज के माहौल में घटित सनसनीखेज़ वारदात के कथानक पर आधारित है। उपन्यास का आरम्भ एक लोमहर्षक घटना से होता है। जब अपराध की घटना घटेगी तो वहां पुलिस और जासूस का पहुंचना स्वाभाविक है। सिया वह स्त्री पात्र है जो कथानक का केन्द्र बिन्दु है। चित्रा, माया, नंदा, रुक्मणी आदि अन्य स्त्री पात्र भी हैं, जिनमें चित्रा, माया, रुक्मणी में चकित कर देने वाली बोल्डनेस है। लेखक मुकेश भारद्वाज जो वर्तमान में ‘‘जनसत्ता’’ के संपादन का दायित्व सम्हाल रहे हैं, स्वयं कभी एक क्राईम रिपोर्टर रह चुके हैं, इसलिए उन्होंने अपराध की बारीकियों पर सिद्धहस्तता से कलम चलाई है। अपराध घटित होने के बाद उस अपराध के कारणों की तह तक पहुंचने से शुरू होता है जासूसी का सफ़र। उस पर यदि अपराध का शिकार अर्थात् विक्टिम जासूस का परिचित रहा हो तो पेंचीदगी और बढ़ जाती है। ‘बेगुनाह’ में ठीक यही स्थिति है। जिसे उसके ही घर में, उसके ही बेडरूम में, उसके ही बिस्तर पर जीवित जला कर मार दिया गया, वह जासूस अभिमन्यु का परिचित था। अभिमन्यु  उसके गुणों और दुर्गुणों से परिचित था। वह एक नंबर का अय्याश था। अपनी पत्नी पर अत्याचार करता था तथा विवाहेत्तर संबंध उसके लिए मामूली बात थी। पैसों की उसके पास कोई कमी नहीं थी। दिल्ली के गुलमोहर इलाके में स्थित उसका घर उसकी सम्पन्नता की कहानी कहता था। फिर भी क्या ऐसी वीभत्स मौत का हकदार का वह? इस प्रश्न के भीतर अनेक प्रश्न सामने आते जाते हैं, जिनके उत्तर पाने में अभिमन्यु को कई बार असंभावित सच का सामना करना पड़ता है।

    अभिमन्यु की मित्र माया आमतौर पर उसके साथ घटनास्थल पर नहीं जाया करती है। लेकिन इस बार वह ‘‘रास्ते में मुझे ड्राप कर देना’’ कहती हुई भी अभिमन्यु के साथ घटनास्थल तक पहुंच जाती है। वह आगे चल कर कदम-कदम पर उसका साथ देती है। फिर अचानक एक चौंका देने वाला सच सामने आता है कि वह जो करती दिखाई दे रही थी, वह सच नहीं था। सच कुछ और ही था। कहते हैं न कि जहां विश्वास होता है, वहीं विश्वासघात होता है। लेकिन क्या यह अभिमन्यु के प्रति माया का यह सचमुच विश्वासघात था, या फिर इसमें कोई और अंतर्कथा थी? कोई ऐसा रहस्य जिसका उजागर होना बाकी था, ऐसी गुत्थी जिसका खुलना शेष था।

अभिमन्यु एक स्वतंत्र जासूस है अतः पुलिस का अनापेक्षित रवैया सदा उसका स्वागत करता है। लेकिन यह उसके लिए कोई नई बात नहीं है। नई बात तो यह सामने आती है कि पुलिस अपराधी से सांठगांठ करती हुई मिलती है। यहां यह कहावत भी चरितार्थ होती दिखती है कि झूठ तो झट से कूद कर आपके सामने आ खड़ा होता है लेकिन सच को आपके सामने आने के लिए अनेक टेढ़े-मेढ़े कठिन रास्तों से हो कर पहुंचना पड़ता है। अपराधी का पता लगाने के लिए अभिमन्यु को भी कई टेढ़े रास्तों से हो कर गुज़रना पड़ता है। जब भी अभिमन्यु को लगता है कि वह हत्यारे के करीब पहुंच गया है, ठीक उसी समय कुछ ऐसा घटित हो जाता है कि हत्यारा उसकी पहुंच से बहुत दूर जा निकलता है।

  नंदा जो अभिमन्यु की मित्र ही नहीं, वकील भी है, मृतक की पत्नी, पूर्व पत्नी से न केवल पूछताछ करती है बल्कि उनकी जांच-पड़ताल भी करती है। नंदा की जांच और संदेह का घेरा उसकी प्रेमिका के गिर्द भी पहुंच जाता है लेकिन जांच खाली हाथ ही रहती है। हर संदिग्ध ‘क्लीनचिट’ का फ्लैग उठाए घूम रहा हो तो अभिमन्यु के लिए चुनौतियां कठिन से कठिनतर तो होनी ही थी। कुल मिला कर स्थिति यह कि एक अपराध, जिसके पीछे अपराधियों की मिलीभगत और उस पर पुलिस की संदिग्ध कार्यप्रणाली। उस पर कानूनी ‘लूपहोल्स’। हर कदम पर यह प्रश्न उभरता है कि क्या एक अकेला जासूस अपने दमखम पर मामले की तह तक पहुंच सकेगा या फिर इस बार उसे नाकामी का चेहरा देखना पड़ेगा? इस उपन्यास की यही विशेषता है कि वह हर चार पन्ने बाद चौंकाता है, एक नया परिदृश्य सामने रखता है, अनेक ऐसे प्रश्न जोड़ता जाता है जो रहस्य को और गहराते जाते हैं। ‘‘ओपन एण्ड शट’’ जैसा लगने वाला केस एक थ्रिलर बनता चला जाता है जिसमें आपराधिक मनोवृत्तियों के विविध पक्ष जुड़ते जाते हैं। जब रहस्य खुलने लगते हैं तो जो जैसा था, वैसा नहीं रह जाता है। अपराध का एक ऐसा चक्रव्यूह जिसे भेदना अभिमन्यु को आता है लेकिन आपराधिक महारथी उसके रास्ते पर बाधाएं खड़ी करने से एक पल को भी नहीं चूकते हैं।

‘‘बेगुनाह’’ एक गुनाहगार की वह कहानी है जिसे भावनात्मक स्तर पर बेगुनाह ही माना जाएगा। यह बात अलग है कि अदालत भावनाओं से नहीं वरन पुख़्ता सबूतों पर चलती है। यह तथ्य इस बात के प्रति सचेत करता है कि स्वयं को इंसाफ दिलाने के इरादे से किया गया अपराध भी अपराध ही होता है। अपराध के रास्ते से किसी को न्याय नहीं मिल सकता है। साथ ही यह उपन्यास स्त्रियों के प्रति अत्याचारी रवैये तथा घरेलू हिंसा की ओर भी ध्यान आकृष्ट करता है। पत्नी होने का अर्थ यह नहीं होता कि वह अपने पति की खरीदी गई दासी है, कि जिसके साथ मनचाहा बुरे से बुरा व्यवहार किया जा सकता हो। पत्नी को मात्र उपभोग की वस्तु एवं गुलाम समझने वालों को एक सबक देता है यह उपन्यास।

पिछले दो-तीन दशक से, विशेषरूप से जब से टेलीविजन और उसके बाद इंटरनेट का दौर आया, ठीक इसी दौर में जासूसी उपन्यास के क्षेत्र में एक ऐसी नीरवता छा गई थी, जो खटकती थी। दिलचस्प बात यह है कि इस नीरवता को भंग किया पत्रकारिता जगत से जुड़े लेखकों ने। जैसे संजीव पालीवाल का रहस्य-अपराध पर आधारित ‘पिशाच’ और ‘नैना’, विभूतिनारायण राय का उपन्यास ‘रामगढ़ में हत्या’ आदि कुछेक जासूसी उपन्यासों के नाम लिए जा सकते हैं। लेकिन वेद प्रकाश शर्मा और सुरेंद्र मोहन पाठक के बाद एक नायक की सिरीज वाले उपन्यास की कमी फिर भी रही, इस कमी को दूर किया मुकेश भारद्वाज ने अपने अभिमन्यु सिरीज के रूप में। चर्चा है कि इसी श्रृंखला का उनका तीसरा उपन्यास भी आने की तैयारी में है। यह श्रृंखलाबद्ध क्रम एक बार फिर जासूसी उपन्यासों से पाठकों को तेजी से जोड़ रहा है। अभिमन्यु सिरीज की लोकप्रियता का श्रेय है लेखक मुकेश भारद्वाज के पत्रकारिता के अनुभव, विशिष्ट लेखन शैली और प्रस्तुति की बारीकियों को। भाषा को ले कर लेखक ने सहजता को स्वीकार किया है। यूं भी जासूसी उपन्यास में आम बोलचाल की भाषा ही सटीक बैठती है। समूचे उपन्यास में घटनाक्रमों का एक स्वाभाविक प्रवाह है जो पाठकों को सम्मोहनावस्था तक बांधे रखता है। जितने समय में पाठक इस उपन्यास को पढ़ेगा, उतने समय वह स्वयं को घटनाक्रम के साथ चलता हुआ पाएगा।

बाजार में आते ही ‘‘बेगुनाह’’ ने लोकप्रियता हासिल कर ली, किन्तु इसकी पाठक संख्या और बढ़ सकती थी बशर्ते इसकी कीमत कुछ कम रहती। एक उपन्यास पर पांच सौ (495/-) का एक नोट बटुए से निकाल कर खर्च करते समय उंगलियां हिचकती हैं। प्रकाशकों को इस हिचक को दूर करने के लिए अपनी ओर से प्रयास करने होंगे जिससे ‘‘बेगुनाह’’ जैसे बेहतरीन जासूसी उपन्यास बटुआ-फ्रेंडली हो सकें और बहुत से पाठकों को मनमसोस के न रह जाना पड़े। फिर भी इसमें कोई संदेह नहीं कि इस उपन्यास की रोचकता इसके दाम पर भारी है।       
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