Wednesday, September 2, 2026

चर्चा प्लस | कृति सेनन के ब्रालेट से ज्यादा चिंता करिए प्राकृतिक चेतावनी की | सागर दिनकर

चर्चा प्लस  

कृति सेनन के ब्रालेट से ज्यादा चिंता करिए प्राकृतिक चेतावनी की
- डाॅ (सुश्री) शरद सिंह 


        एक कामर्शियल विज्ञापन में अभिनेत्री कृति सेनन के ब्रालेट पहनने पर पक्ष और विपक्ष में जितनी तलवारें खिंची यदि उसकी आधी भी बहस प्राकृति संकट को ले कर होती तो नेपाल जैसी विभीषिका से बचा जा सकता था। हम इंसानों के द्वारा प्रकृति के असंतुलित दोहन से स्थितियां दिन पर दिन बदतर हो रही हैं। जोशी मठ हासदे से ले कर हाल ही में नेपाल में आई कीचड़ की बाढ़ ने जता दिया कि प्रकृति नाराज़ है और वह बार-बार चेतावनी दे रही है किन्तु हमारी वर्तमान राष्ट््रीय चिंता तो एक विज्ञापन में पहना गया ब्रालेट है। विज्ञापन को नकारने के बजाए उसे पूरी पब्लीसिटी देना गोया राष्ट््रीय कर्तव्य है। क्या 903 लोगों की मौतें और चार हजार से अधिक लोगों का लापता हो जाना मामूली बात है? जबकि अभी संकट की दस्तक मात्र है।         

ज़लज़ला आया और आ के हो गया रुख़सत मगर
वक़्त  के रुख़  पे  तबाही की इबारत लिख गया।
     - शायर फ़राज़ हामिदी का यह शेर जोशीमठ से नेपाल तक की आपदा की पीड़ा को बाखूबी बयां करता है।
       मुझे याद आ रही है एक कहानी जो मैंने प्रायमरी स्कूल के दौरान पढ़ी थी। सिलेबस में या सिलेबस के बाहर, यह याद नहीं है। बहुत सोचा लेकिन उस कहानी के लेखक का नाम याद नहीं आ रहा है। सो, यदि किसी को लेखक का नाम पता हो तो मुझे जरूर बताने का कष्ट करे। उस कहानी का कथानक और शिल्प इतना प्रभावी था कि कहानी आज भी मुझे याद है। यह कहानी सन् 1935 में क्वेटा में आए भीषण भूकंप की चर्चा पर आधारित थी। क्वेटा पहले भारत का हिस्सा था लेकिन अब पाकिस्तान में है और बलूचिस्तान प्रांत की राजधानी है। कहानी का सारांश यह था कि कपड़ा बेचने वाला एक दूकानदार अपने दूकान में दूकानदारी कर रहा है। वह ग्राहकों को कपड़ा दिखाता है और उनसे क्वेटा में हुई जान-माल की हानि के बारे में प्रश्न करता जाता है। वह एक प्रश्न करता है कि कैसा कपड़ा चाहिए? तो उसका दूसरा प्रश्न होता है कि क्वेटा में कितने लोग मारे गए? फिर वह कपड़े की खूबियां बताता है और साथ में पूछता है कि वहां तो सब कुछ बर्बाद हो गया होगा? इसी प्रकार पह कपड़ा बेचते हुए वह अपने ग्राहकों से क्वेटा में आए भूकंप की भीषणता की चर्चा करता है, जानकारी लेता है और अपनी चिंता व्यक्त करता है। भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदा और मानवीय जीवन संबंधी विवशताओं के समीकरण पर यह अद्भुत कहानी थी। लेकिन आज स्थिति इससे दुखद हो गई है। आज भूकंप के खतरे बढ़ गए हैं लेकिन हमारे सरोकार प्रकृति को ले कर वर्तमानजीवी हो गए हैं। आज बाढ़ें भयावह रूप लेती जा रही हैं। लेकिन इस बारे में चिंता करने के बजाय कृति सेनन के ब्रालेट की चिंता में समय खपाना जागरूकता की निशानी बन गया है। एक पक्ष इसे भारतीय संस्कृति की तौहीन बता रहा है तो दूसरा पक्ष इसे स्त्री की आजादी से जोड़ कर इसकी पैरवी कर रहा है। सोशल मीडिया कृति सेनन और कंगना रनौत की कम और पूरे कपड़ों के साथ टांके गए पोस्टों से भारा पड़ा है। इक्का-दुक्का पोस्ट नेपाल के हादसे पर भी दिख जाती है गोया कुछ लोग स्वयं को जागरूक दिखाना चाहते हैं। अन्यथा इस तरह की आपदा की जड़ तक पहुंचने में भला किसको दिलचस्पी है? 
6 फरवरी 2023 को जब टर्की में विनाशकारी भूकंप आया था तब मुझे एक आश्चर्यजनक व्यवहार का सामना करना पड़ा था। भूकंप की खबर पढ़ने के बाद जब मैंने अपने परिचित से चर्चा की कि टर्की में कितना विनाशकारी भूकंप आया है तो पहले तो उन्होंने अनभिज्ञता प्रकट की जब कि भूकंप की ख़बरों से टीवी और मोबाईल अपडेट भरे हुए थे। फिर भी उन्हें पता नहीं था। खैर, मैंने उन्हें बताया कि भूकंप की तीव्रता 7.8 रिक्टर स्केल थी। लेकिन उन्होंने मेरी बात को अनसुना करते हुए पूछा कि टर्की तो मुस्लिम देश है न? मैं उनका प्रश्न सुन कर अवाक रह गई थी। भूकंप में मरने वाले मनुष्य थे, हिन्दू या मुस्लिम तो बाद की बात है। इसके बाद मुझे समझ में नहीं आया था कि मैं उस उच्च शिक्षित (?) व्यक्ति से टर्की के भूकंप के बारे में आगे क्या बात करूं? फिर भी मैंने खुद को तसल्ली दी और चर्चा को भूकंप पर केन्द्रित किया। तो इस पर वे लापरवाही से बोले कि हां, अभी महाराष्ट्र में भूकंप आया था लेकिन अपने यहां सागर में कोई ख़तरा नहीं है। मैंने पूछा था कि आप इतने दावे से कैसे कह सकते हैं कि यहां कभी भूकंप नहीं आएगा? तो उन्होंने उत्तर दिया कि यहां न तो कोई बड़ी नदी है और कोई बड़े पहाड़। उनके इस ज्ञान ने मुझे उन्हें याद दिलाने को मजबूर कर दिया कि हम जिस ठोस जमीन पर रह रहे हैं वह टेक्टोनिक प्लेट्स पर टिकी हुई है और ये प्लेट्स भू-केन्द्र के तरल पदार्थ पर तैर रही हैं। फिर मैंने उन्हें याद दिलाया कि जब-जब जबलपुर में भूकंप के झटके आए हैं तब-तब उसकी तरंगे हमारे सागर शहर की भूमि को भी मामूली स्तर पर हिला चुकी हैं।
भूकंप के जिस ज्ञान को हम अपनी छोटी कक्षाओं में अर्जित कर चुके हैं उन्हें बड़े हो कर कैसे भूलते जा रहे हैं? यह सोच कर आश्चर्य होता है। आज हमें सोने (गोल्ड) के भाव के उतार-चढ़ाव की चिंता रहती है लेकिन प्रकृति को अपने द्वारा पहुंचाए जा रहे नुकसान की चिंता नहीं रहती है। जबकि सोना हमें सुख दे सकता है पर जीवन नहीं। राजा मिडास की कहानी ने यही तो समझाया था हमें। जिसने राजा मिडास की कहानी सुनी होगी उसे याद होगा कि राजा मिडास ने भगवान से वरदान मांगा कि वह जिस चीज को छुए वह सोने की हो जाए। मिडास ने अपना महल, सिंहासन, पेड़-पौधे अब को छू-छू कर सोने का बना लिया। यहां तक कि जब उसने अपनी पत्नी, अपनी बेटी को छुआ तो वे भी सोने की मूर्ति में बदल गईं। फिर उसे जब भूख लगी और वह खाने बैठा तो हाथ लगाते ही भोजन सोने में बदल गया। पानी भी सोने में बदल गया। जब भूख-प्यास से प्राण निकलने की नौबत आ गई तब कहीं जा कर राजा मिडास को अपनी भूल का अहसास हुआ। लेकिन तब तक पहुत देर हो चुकी थी। जाने-अनजाने हम भी राजा मिडास की तरह प्रकृति को भूल कर लालच की ओर तेजी से बढ़ते जा रहे हैं। स्थिति यह है कि हम जिस डाल पर बैठे हैं उसी को जड़ से काटते जा रहे हैं। भूकंप की बढ़ती संख्या और बढ़ती तीव्रता उसी का दुष्परिणाम है जो हमने प्रकृति को क्षति पहुंचाई है। हमने पेड़ काटे, जंगल छोटे कर दिए, भूमि से उसकी नमी सोख ली, भूमि पर मिट्टी का ठहराव घटा दिया। बड़े-बड़े बांध बना कर स्थिर और ठोस जमीन को लहरों वाले तरल पानी से भर दिया। गगनचुंबी इमारतों के जंगल खड़े कर दिए, यह ठीक से जांचे बिना कि वहां की भूमिगत चट्टानें उन इमारतों का बोझ उठा सकती हैं या नहीं? नए सरकारी नियम हैं कि भूकंप सुरक्षित भवन बनाए जाएं लेकिन सच्चाई किसी से छिपी नहीं है कि इसका पूरी तरह से पालन बहुत कम होता है। जैसे नियम बनाया गया था कि नए भवनों पर रूफ वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम बनाया जाए लेकिन गोया हम मान कर चलते हैं कि नियम बस्तों में बंधे रहने के लिए होते हैं। टर्की तो एक विकसित देश है। वहां आधुनिक संसाधन अपनाए जाते हैं। फिर भी वहां की मल्टीस्टोरी इमारतें भूकंप की 7.8 की तीव्रता नहीं झेल सकीं थीं। तो हमारा क्या होगा जब हमें इस तीव्रता का भूकंप झेलना पड़ेगा?
तुर्की और सीरिया में आए विनाशकारी भूकंप से दोनों देशों के कई शहरों में भारी तबाही हुई थी। रिक्टर पैमाने पर भूकंप की तीव्रता 7.8 मापी गई और इससे हजारों लोगों के मारे गए थे। तुर्की दुनिया के सबसे सक्रिय भूकंप क्षेत्रों में से एक है। भारत की स्थिति भी उससे अलग नहीं है। चाहे भारत हो या नेपाल हो बड़े बांधों से पैदा होने वाले संकट को अनदेखा करना, ग्लेशियर्स के तेजी से पिघलने को अनदेखा करना ही हमें विनाश का आईना दिखा देगा। नेपाल में आया ‘‘मड फ्लड’’ अर्थात कीचड़ की बाढ़ के पीछे असली कारण ग्लेशियर्स पिघलने से अचानक जलस्तर बढ़ना था। ग्लेशिर्यस क्यों तेजी से पिघल रहे हैं? क्योंकि पृथ्वी का तापमान निरंतर बढ़ रहा है, क्योंकि इससे मौसम के पैटर्न में तेजी से बदलाव हो रहा है। दुख की बात ये है कि यह सब हमारे संज्ञान में है, फिर भी प्रकृति को चोट पहुंचाने से हम बाज नहीं आ रहे हैं। 
मां पहले प्यार से समझाती है। फिर भी बच्चा तोड़-फोड़ करने को उतारू रहता है तो मां विवश हो कर उस पर हाथ उठाती है ताकि वह सुधर जाए। भूकंप के रूप में धरती माता हमें बार-बार चेतावनी दे रही है कि विकास के नाम पर प्रकृति से खिलवाड़ करना बंद करो। लेकिन हम उनकी चेतावनी को लगातार अनसुना कर रहे हैं। अक्टूबर 2021 में उत्तराखंड के जोशीमठ शहर के कुछ घरों में पहली बार दरारें दिखाई दीं। एक साल बाद, 11 जनवरी तक, शहर के सभी नौ वार्डों में 723 घरों के फर्श, छत और दीवारों में बड़ी या छोटी दरारें दिखने लगीं। कई घरों में पोल उखड़ गए। जवाब में, शहर के भीतर कई परिवारों को अस्थायी रूप से सुरक्षित स्थानों पर ले जाया गया है। लेकिन बेहतर होता कि आपदा की आहटें पहले ही सुन ली गई होतीं।
वैज्ञानिकों ने हमेशा इस ओर ध्यान दिलाया और चेतावनी भी दी। प्रसिद्ध स्विस भूविज्ञानी अर्नोल्ड हेम और उनके सहयोगी ऑगस्टो गैस्टर ने 1936 में मध्य हिमालय की भूवैज्ञानिक संरचना पर पहला अभियान चलाया, तो उन्होंने अपना यात्रा वृतांत ‘‘द थ्रोन ऑफ द गॉड्स (1938)’’ और शोध कार्य ‘‘सेंट्रल हिमालय: जियोलॉजिकल द ऑब्जर्वेशन’’ रिकॉर्ड किया। स्विस अभियान 1936 (1939) ने विवर्तनिक दरारों, मुख्य केंद्रीय दोष (एमटीसी) की उपस्थिति की पहचान की, और चमोली गढ़वाल में हेलंग से तपोवन तक के क्षेत्र को भूगर्भीय रूप से संवेदनशील बताया। मध्य हिमालय के भूविज्ञान पर अनुसंधान और अध्ययन आगे बढ़े इसके बाद 1976 में ‘‘मिश्रा समिति’’ ने भी अध्ययन कर जोशीमठ को संवेदनशील घोषित कर इलाज के सुझाव दिए। सन 2022 में उत्तराखंड सरकार के आपदा प्रबंधन विभाग ने भी जोशीमठ पर मंडरा रहे खतरे की ओर सरकार का ध्यान आकर्षित किया था। इन तमाम चेतावनियों के बाद भी जोशीमठ को बचाने की कोशिश नहीं की गई, बल्कि वहां बड़ी-बड़ी इमारतों का जंगल उगता चला गया। बढ़ती जनसंख्या के कारण जोशीमठ के गर्भ में उतरता रहा। आज जोशीमठ उसी दलदल पर असहनीय बोझ तले दबकर अलकनन्दा की ओर सरक रहा है।
6 फरवरी को टर्की में आए भूकंप में भी लगभग यही बात सामने आई थी कि वैज्ञानिकों ने पहले ही चेतावनी दी थी। बल्कि नीदरलैंड के शोधकर्ता वैज्ञानिक फ्रेंक होगरबीट्स ने 3 फरवरी 2023 को एक ट्वीट कर के लिखा था कि निकट भविष्य में, दक्षिण-मध्य तुर्की, जॉर्डन, सीरिया, लेबनान में 7.5 तीव्रता का भूकंप आएगा। अपने ट्वीट के साथ उन्होंने भूकंप का केंद्र दिखाते हुए एक नक्शा भी शेयर किया था। उनकी बात सही निकली। बल्कि उनकी चेतावनी से दशमलव तीन प्रतिशत अधिक का यानी 7.8 तीव्रता का भूकंप आया। 
यदि बात करें भारत की तो सितंबर 2019 में, राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनएमडीए) ने एक भूकंप आपदा जोखिम सूचकांक (एड्री) रिपोर्ट प्रकाशित की थी, जिसमें महानगरों और भूकंपीय क्षेत्र जोन चार और जोन पांच के शहरों सहित 50 शहरों पर विशेष रूप से ध्यान दिया गया था। सर्वेक्षण किए गए शहरों में से 30 शहर (दिल्ली सहित) मध्यम स्तर के जोखिम पर हैं और 13 (शिमला सहित अधिकतर हिमालयी शहर) उच्च जोखिम पर हैं। लेकिन साथ में यह भी कहा गया कि दिल्ली को भी एक बड़े जोखिम का सामना करना पड़ सकता है क्योंकि अधिकांश शहर स्व-निर्मित है। बिना तकनीकी इनपुट के जो इसे उच्च तीव्रता वाले भूकंपों के प्रति संवेदनशील बनाता है।


नेपाल की ओर से बह कर आने वाली नदियां हों या चीन से उतरने वालीं, भारत के लिए संकट पैदा करने में सक्षम है। नेपाल आपदा के बाद यह आशंका जताई भी गई थी कि कहीं चीने को अपने दो बंाधों ये यदि बंधान खोले तो और अधिक भयावह स्थिति का सामना करना पड़ेगा। इस गंभीर समाचार पर कितने लोगों ने ध्यान दिया? शायद गिनती के लोगों ने। अधिकांश का सरोकार तो ब्रालेट पहनी अभिनेत्री के विज्ञापन से था। उन्हें संस्कृति की चिंता थी जिसे उस विज्ञापन को अनदेखा कर के, उसे अप्रभावकारी साबित कर के भी संस्कृति के पक्ष में खड़ा हुआ जा सकता था। जबकि कोई भी संस्कृति तभी तक है जब तक उस संस्कृति के लोग सुरक्षित हैं और जीवित हैं। अतः पहली और प्रखर चिंता होनी चाहिए थी प्राकृतिक आपदा की, बालेट की नहीं। 
दरअसल हमने प्रकृति को निरंतर नुकसान पहुंचा कर उसे अशांत कर दिया है। हम भूगर्भीय हलचलों को रोक नहीं सकते, लेकिन ग्लेशिर्य के पिघलने की गति को कम कर सकते हैं। इस तरह प्रकृति को संरक्षित कर के नुकसान की तीव्रता को कम कर सकते हैं। बशर्तें हम समय रहते सचेत हो जाएं और प्रकृति द्वारा दी जा रही चेतावनियों पर ध्यान देना शुरू कर दें। यदि हमें किसी बड़ी प्राकृतिक आपदा से बचना है तो हमें प्रकृति-मित्र बनना होगा। प्रकृति की चिंता करनी होगी।                                                        -----------------------
(दैनिक, सागर दिनकर में 02.09.2026 को प्रकाशित) 
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Tuesday, September 1, 2026

पुस्तक समीक्षा | ग़ज़लकार हरेराम समीप के सृजन से परिचित कराता है सृजन-समीक्षा ग्रंथ | समीक्षक - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

पुस्तक समीक्षा
ग़ज़लकार हरेराम समीप के सृजन से परिचित कराता है सृजन- समीक्षा ग्रंथ
- समीक्षक डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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समीक्षा ग्रंथ - ग़ज़लकार हरेराम समीप सृजन-समीक्षा
संपादक - डॉ. वशिष्ठ अनूप
प्रकाशक - श्वेतवर्ण प्रकाशन, 212 ए, एक्सप्रेस व्यू अपार्टमेंट, सुपर एमआईजी, सेक्टर 93, नोएडा-201304
मूल्य - 999/- 
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         किसी भी रचनाकार का वास्तविक परिचय उसके सृजन से ही होता है। विधा, विषय, विचार, प्रस्तुति आदि रचनाकार के रचनात्मक व्यक्तित्व का प्रतिनिधित्व करते हैं। जब रचनाकार की रचनाएं निष्पक्ष समीक्षकों की निष्पक्ष दृष्टि से होकर गुजरती है तो उन रचनाओं का उचित मूल्यांकन होने के साथ ही रचनाकार की साहित्य के प्रति निष्ठा एवं समर्पण का भी पता चलता है। ग़ज़लकार हरिराम समीप ने अपने अब तक के जीवन का एक लंबा समय ग़ज़ल को समर्पित किया है। उन्होंने न केवल गजलों का सृजन किया अपितु गऋजऋलके कलेवर, ग़ज़लके शिल्प, गजल का इतिहास, ग़ज़लके क्षेत्र में रचनाकारों का योगदान आदि विविध दृष्टिकोण से ग़ज़लकी समग्रता का न केवल आकलन किया बल्कि एक विश्वसनीय दस्तावेज की भांति प्रस्तुत भी किया है। उनके द्वारा संपादित ऐसे ग्रंथों को हिंदी साहित्य के ऐतिहासिक ग्रंथों में गिना जा सकता है। जिस प्रकार ग़ज़लकार हरेराम समीप ग़ज़लविधा के लिए समर्पित हैं, इस प्रकार काशी हिंदू विश्वविद्यालय के वरिष्ठ प्रोफेसर एवं अध्यक्ष हिंदी विभाग डॉ वशिष्ठ अनूप निरंतर भारतीय ग़ज़ल को अपनी ग़ज़लों से समृद्ध कर रहे हैं। एक समर्पित व्यक्ति ही दूसरे व्यक्ति के समर्पण को भली भांति समझ सकता है तथा महसूस कर सकता है इसीलिए डॉ वशिष्ठ अनूप ने हरिराम समीप अवदान को न सिर्फ़ महसूस किया बल्कि उनके सृजन पर केंद्रित समीक्षाओं को एक ज़िल्द में समेट कर स्वयं भी एक ऐतिहासिक दस्तावेज़ रच दिया। इस दस्तावेज़ी ग्रंथ का नाम है - ‘‘ग़ज़लकार हरेराम समीप सृजन समीक्षा’’।
501 पृष्ठ के इस ग्रंथ में हरेराम समीप एक व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर 48 आलेख, कुछ महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ और उनका साक्षात्कार संकलित है। डॉ वशिष्ठ अनूप को इस प्रकार के ग्रंथ की आवश्यकता क्यों महसूस हुई इस संबंध में उन्होंने पुस्तक की भूमिका में लिखा है कि ‘‘हरेराम समीप हिंदी के वरिष्ठ और समर्थ रचनाकार हैं। उन्होंने लगभग पाँच दशकों से हिंदी में पर्याप्त और स्तरीय ग़ज़लें लिखी हैं। उनकी रचनात्मकता के इस उत्कर्ष-काल और उनकी उम्र के इस पड़ाव पर यह आवश्यक था कि उनकी ग़ज़लों का मूल्यांकन किया जाए और हिंदी ग़ज़ल के पाठकों के सम्मुख उनके अवदान को प्रस्तुत किया जाए। यह सुखद है कि हिंदी ग़ज़लके अध्येताओं और विशेषज्ञ विद्वानों ने समीप जी की ग़ज़लों पर बड़े मनोयोग से आलेख लिखे हैं और विभिन्न कोणों से उनकी ग़ज़लों की संवेदना और शिल्प को देखा, परखा और मूल्यांकित किया है।’’ 

इस प्रकार का विचार आते ही डॉ वशिष्ठ अनूप ने विभिन्न समीक्षकों एवं हिंदी के विद्वानों से हरिराम समीप से संबंधित आलेख आमंत्रित किए। इस प्रकार के ग्रंथ का संपादन करना भी एक श्रम साथी एवं धैर्य का कार्य होता है। एक संपादक विचार करता है, तत्संबंधी रचनाएं आमंत्रित करता है किंतु यह आवश्यक नहीं है की जिनसे रचनाएं मंगाई जाए वे तत्काल रचना भेजने की स्थिति में हों। व्यक्तिगत विशेषताओं के चलते कई बार रचनाकारों को अनचाहा विलंब हो जाता है और इसके लिए संपादक को धैर्य का परिचय देना पड़ता है। यह धैर्य ही एक अच्छे ग्रंथ को आकार दे पाता है। इस ग्रंथ को पढ़ने के बाद डॉ वशिष्ठ अनूप के धैर्य का स्पष्ट अनुभव किया जा सकता है। उन्होंने ग्रंथ के मूल स्वरूप को हरेराम समीप जी के की समीक्षा पर केंद्रित रखा है किंतु इसके साथ ही केंद्रीय रचनाकार के पक्ष को भी शामिल करते हुए उनके साक्षात्कार को भी स्थान दिया है जिससे यह ग्रंथ समग्रता से संपन्न है। 
‘‘ग़ज़लकार हरेराम समीप सृजन समीक्षा’’ ग्रंथ के मुख्य पृष्ठ पर हरेराम समीप जी का पोटे््रट प्रकाशित है जिससे उनके व्यक्तित्व की झलक मिलती है। ग्रंथ की समस्त सामग्री को दो अध्यायों में विभक्त किया गया है। प्रथम खंड है - ‘‘हरेराम समीप: जीवन और लेखन’’। इस खंड में हरिराम समीप की ग़ज़लों एवं उनके ग़ज़ल संग्रहों पर विभिन्न समीक्षकों के लेख है। कुछ लेख उनके जीवनवृत्त पर भी प्रकाश डालते हैं।

प्रथम खंड में प्रस्तुत किए गए लेख इस प्रकार हैं - हरेराम समीप का ग़ज़ल -संसार रू समग्र अनुशीलन - डॉ. वरुण कुमार तिवारी, हरेराम समीप की ग़ज़ल -यात्रा - सुदेश कुमार मेहर, व्यवस्था का प्रतिपक्ष प्रस्तुत करती ग़ज़लें - प्रो. वशिष्ठ अनूप, हरेराम समीप: एक क्रांतिधर्मी, प्रयोगधर्मी ग़ज़लकार - डॉ. ऋषिपाल धीमान ऋषि, विसंगतियों का मुखर प्रतिवाद - ज्ञानप्रकाश विवेक, भविष्य के लिए एक मानवीय सपना दिखाती ग़ज़लें - गरिमा सक्सेना, समीप की हिन्दी ग़ज़ल -दृष्टि और आलोचना-कर्म - डॉ. जियाउर रहमान जाफ़री, अँधेरे दौर में उजाले की तलब - डॉ. भागीनाथ यादवराव वाकले, हरेराम समीप की हिन्दी ग़ज़ल को देन - दिनेश सिंदल, खौफ़ से मोहब्बत तक की अंतर्यात्रा की ग़ज़लें - डॉ. वेदप्रकाश अमिताभ, जनवादी चेतना के प्रखर ग़ज़लकार: हरेराम समीप - महेन्द्र नेह, जन-आस्था की प्रतिबद्ध ग़ज़लें - उमाशंकर सिंह परमार, हिन्दी ग़ज़लका जनपक्ष- महेश अग्रवाल, सन्नाटे के तिलिस्म को तोड़ती ग़ज़लें - डॉ. शिव ओम अम्बर, गहरे जीवन-बोध के ग़ज़लकार हरेराम समीप - महेश अश्क, ग़ज़लों में उतरा है आज का समाज - डॉ. बालस्वरूप राही, वर्तमान भावबोध को नए धरातल पर चिन्हित करती ग़ज़लें - विजय कुमार स्वर्णकार, ग़ज़लों का विस्तृत कथ्य-संसार -ओमप्रकाश यती, मौन साधना के क्रांतिकारी रचनाकार रू हरेराम समीप - महेश कटारे सुगम, सामजिक चेतना और प्रतिरोध की बेबाक ग़ज़लें - डॉ. डीएम. मिश्र, बाज़ारवाद और बढ़ते साम्राज्यवाद से टकराती ग़ज़लें - राजेन्द्र वर्मा, प्रतिबद्धता और प्रतिरोध की सशक्त ग़ज़लें - डॉ. भावना, ग़ज़लों में जनवादी रुझान - बी. आर. विप्लवी, हरेराम समीप की ग़ज़लगोई-डॉ. महेन्द्र अग्रवाल, हरेराम समीप की ग़ज़लके सरोकार - प्रदीप कान्त, समय की घटनाओं से प्रेरित समीप की ग़ज़लें - अनिरुद्ध सिन्हा, हिन्दी ग़ज़ल में आस्था का स्वर - लक्ष्मीशंकर वाजपेयी, भीतर की उड़ान की ग़ज़लें - स्व. शिवराम, समाज को आईना दिखाती ग़ज़लें - डॉ. रोहिताश्व अस्थाना, लोकोन्मुखी चेतना की ग़ज़ल में अभिव्यक्ति - डॉ. नितिन सेठी, हरेराम समीप की ग़ज़लधर्मिता, सरोकार एवं उपादेयता - डॉ. विनोद प्रकाश गुप्ता शलभ, समय की आग पीती ग़ज़लें - चंद्रभान भारद्वाज, सोच का मौसम समय और समाज का दस्तावेज़ - देवमणि पाण्डेय, हरेराम समीप की ग़ज़लों में फिक्र और फ़न का समन्वय - राहुल शिवाय, हिन्दी ग़ज़लका एक नया उन्मेष - स्व. डॉ. राम दयाल कोष्ठा श्रीकांत, विसंगतियों के जाल से समकाल तक: समीप की ग़ज़लें - डॉ. रामगोपाल भारतीय, ग़ज़लमें संवेदनशीलता के व्याख्याकार हरेराम समीप डॉ. कृष्णकुमार नाज़, समय की विसंगतियों से टकरातीं समीप जी की ग़ज़लें - डॉ. शिवजी श्रीवास्तव, दुष्यंत कुमार की परंपरा को आगे बढ़ातीं ग़ज़लें - डॉ. राकेश जोशी, हरेराम समीप की ग़ज़लों के ये दमदार शेर - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह, हिन्दी ग़ज़ल में आती समकाल की आवाज़ - डॉ. अनिल गौड़, सृजन के विविध आयाम हरीलाल मिलन, जन-सरोकारों से जुड़ी हिन्दी ग़ज़लें - के. पी. अनमोल, यथा-स्थितिवाद के तिलस्म को तोड़ने का आग्रह करती ग़ज़लें - संजीव प्रभाकर, नींद से जगातीं हरेराम समीप की ग़ज़लें - डॉ. रामावतार सागर, हरेराम समीप की ग़ज़लों में समय, समाज और संवेदना - आशा पाण्डेय ओझा आशा, जनपक्षधरता की अगुआई करती ग़ज़लें - विजय, सोच का मौसम: ग़ज़ल का एक मुक़म्मल अदबी दस्तावेज़- डॉ. प्रमोद सागर और इस खंड के अंत में कुछ और महत्वपूर्ण साहित्यकारों की टिप्पणियाँ सहेजी गई हैं।

‘‘व्यवस्था का प्रतिपक्ष प्रस्तुत करती ग़ज़लें’’ में प्रो. वशिष्ठ अनूप ने लिखा है कि ‘‘हरेराम समीप शब्द साधक साहित्यकार हैं। वह जानते हैं कि हर सच्चा साहित्यकार जीवन-जगत के अन्तर्बाह्य सत्य का अनुसन्धान करता है और उस सत्य से सबका साक्षात्कार कराता है। कविता साहित्य का सर्वोत्तम रूप होती है और ग़ज़ल में अन्तर्वस्तु की सर्वाधिक सघन अन्विति होती है। सत्य के पक्ष में खड़ा होना और उसे कहना-लिखना खतरे से खाली नहीं होता। यह जानते हुए भी वह सच कहते आ रहे हैं। उन्हें पता है कि हुक्मरानों की आदत सच्चाई को सुनने की नहीं होती और इसी कारण तमाम लेखकों, बुद्धिजीवियों, संस्कृतिकर्मियों, पत्रकारों और कवियों को यातनाएँ भुगतनी पड़ी हैं, पड़ रही हैं, वह जोखिम उठाकर भी सत्य और शब्द का साथ नहीं छोड़ते। इतना ही नहीं, समीप जी शब्दों की सेना को सबल बनाने के लिए लगातार प्रयत्नशील हैं। वह क़तरे में सैलाब को समेटने की सामथ्र्य रखते हैं-
एक शायर ही बता सकता है आखि़र उसने 
एक सैलाब को कतरे में समेटा कैसे ।

डॉ. वेदप्रकाश अमिताभ ने अपने लेख ‘‘खौफ़ से मोहब्बत तक की अंतर्यात्रा की ग़ज़लें’’ में हरेराम समीप जी के संबंध में लिखा है कि ‘‘उन्होंने सच कहने का साहस जुटाया है। बार-बार डर या खौफ़ का उल्लेख बताता है, कि स्थितियाँ कितनी भयावह और प्रतिकूल हैं। हमको सिर्फ डर ही डर मिला, अब कौन यहाँ खौफ़ की छाया में नहीं है, खौफ़ तारी हो रहा कुछ यूँ दिलों के आसपास, जिन्दगी क्यों खफ़ा से सहमी डरी है आदि उद्गारों में परिवेश की प्रामाणिकता है। ऐसे माहौल में भी रचनाकार लिखने का ही नहीं, प्रतिरोध करने का जोखिम भी उठा रहा है। सियासत, लोकतंत्र, हुक्मरान आदि पर टिका-टिप्पणियाँ इसकी साक्षी हैं। अर्थात राजनीतिक परिदृश्य की सही पहचान इन रचनाओं में है-
साँठ-गाँठ में लगी सियासत 
करे हुकूमत अदल-बदल कर

डॉ. भारतेंदु मिश्र की यह सारगर्भित टिप्पणी गोया सब कुछ कह जाती है-‘‘यूँ तो ग़ज़लगो बहुत से हैं लेकिन हरेराम समीप की बात कुछ और है। समीप का कवि शायरी की धड़कन को पहचानता है. कवि अपने समय को कितनी गहराई से जीता है यह उसकी कविता से ही आंका जा सकता है।’’

ग्रंथ का खण्ड-दो साक्षात्कार का खंड है। इसमें कवि, ग़ज़लकार एवं आलोचक हरेराम समीप से युवा ग़ज़लकार के.पी. अनमोल की एक लम्बी बातचीत है। यह साक्षात्कार हरेराम समीप जी द्वारा स्वयं के जीवन के बारे में दी गई जानकारी से जहां अवगत कराता है वहीं हिंदी ग़ज़ल के स्वरूप में भारतीय ग़ज़ल पर समग्रता से प्रकाश डालता है। एक प्रश्न और उसके उत्तर के अंश की बानगी देखिए-         
प्रश्न - हिन्दी ग़ज़ल की व्याकरण-निबद्धता पर आज तरह-तरह के प्रश्न उठ रहे हैं, इस पर आपके क्या विचार हैं?  
उत्तर - ग़ज़ल चाहे किसी भी भाषा में लिखी जाए, उसका सौंदर्य ग़ज़ल के निर्धारित व्याकरण या शिल्प से जुड़ा होना वांछित है, इसी को ग़ज़ल का अरूज़ में होनाश् भी कहते हैं। अरूज़ के अंतर्गत सिर्फ बहर-वजन के अलावा और भी बहुत सावधानियाँ रखनी होती हैं, जो उसके आतंरिक सौन्दर्य को बढ़ाती हैं। यह ‘बहुत कुछ’ ग़ज़ल में कवि की प्रकृति, श्रम और साधना से आता है। 

डाॅ वशिष्ठ अनूप ने ‘‘ग़ज़लकार हरेराम समीप सृजन समीक्षा’’ को बहुत खूबसूरती से संपादित कर इसे हिन्दी साहित्य में ग़ज़ल के इतिहास का एक मील का पत्थर बना दिया है। इस ग्रंथ को हिन्दी साहित्य के विद्यार्थियों एवं हिन्दी ग़ज़ल में रुचि रखने वालों को अवश्य पढ़ना चाहिए।  
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