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Tuesday, September 1, 2026

पुस्तक समीक्षा | ग़ज़लकार हरेराम समीप के सृजन से परिचित कराता है सृजन-समीक्षा ग्रंथ | समीक्षक - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

पुस्तक समीक्षा
ग़ज़लकार हरेराम समीप के सृजन से परिचित कराता है सृजन- समीक्षा ग्रंथ
- समीक्षक डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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समीक्षा ग्रंथ - ग़ज़लकार हरेराम समीप सृजन-समीक्षा
संपादक - डॉ. वशिष्ठ अनूप
प्रकाशक - श्वेतवर्ण प्रकाशन, 212 ए, एक्सप्रेस व्यू अपार्टमेंट, सुपर एमआईजी, सेक्टर 93, नोएडा-201304
मूल्य - 999/- 
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         किसी भी रचनाकार का वास्तविक परिचय उसके सृजन से ही होता है। विधा, विषय, विचार, प्रस्तुति आदि रचनाकार के रचनात्मक व्यक्तित्व का प्रतिनिधित्व करते हैं। जब रचनाकार की रचनाएं निष्पक्ष समीक्षकों की निष्पक्ष दृष्टि से होकर गुजरती है तो उन रचनाओं का उचित मूल्यांकन होने के साथ ही रचनाकार की साहित्य के प्रति निष्ठा एवं समर्पण का भी पता चलता है। ग़ज़लकार हरिराम समीप ने अपने अब तक के जीवन का एक लंबा समय ग़ज़ल को समर्पित किया है। उन्होंने न केवल गजलों का सृजन किया अपितु गऋजऋलके कलेवर, ग़ज़लके शिल्प, गजल का इतिहास, ग़ज़लके क्षेत्र में रचनाकारों का योगदान आदि विविध दृष्टिकोण से ग़ज़लकी समग्रता का न केवल आकलन किया बल्कि एक विश्वसनीय दस्तावेज की भांति प्रस्तुत भी किया है। उनके द्वारा संपादित ऐसे ग्रंथों को हिंदी साहित्य के ऐतिहासिक ग्रंथों में गिना जा सकता है। जिस प्रकार ग़ज़लकार हरेराम समीप ग़ज़लविधा के लिए समर्पित हैं, इस प्रकार काशी हिंदू विश्वविद्यालय के वरिष्ठ प्रोफेसर एवं अध्यक्ष हिंदी विभाग डॉ वशिष्ठ अनूप निरंतर भारतीय ग़ज़ल को अपनी ग़ज़लों से समृद्ध कर रहे हैं। एक समर्पित व्यक्ति ही दूसरे व्यक्ति के समर्पण को भली भांति समझ सकता है तथा महसूस कर सकता है इसीलिए डॉ वशिष्ठ अनूप ने हरिराम समीप अवदान को न सिर्फ़ महसूस किया बल्कि उनके सृजन पर केंद्रित समीक्षाओं को एक ज़िल्द में समेट कर स्वयं भी एक ऐतिहासिक दस्तावेज़ रच दिया। इस दस्तावेज़ी ग्रंथ का नाम है - ‘‘ग़ज़लकार हरेराम समीप सृजन समीक्षा’’।
501 पृष्ठ के इस ग्रंथ में हरेराम समीप एक व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर 48 आलेख, कुछ महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ और उनका साक्षात्कार संकलित है। डॉ वशिष्ठ अनूप को इस प्रकार के ग्रंथ की आवश्यकता क्यों महसूस हुई इस संबंध में उन्होंने पुस्तक की भूमिका में लिखा है कि ‘‘हरेराम समीप हिंदी के वरिष्ठ और समर्थ रचनाकार हैं। उन्होंने लगभग पाँच दशकों से हिंदी में पर्याप्त और स्तरीय ग़ज़लें लिखी हैं। उनकी रचनात्मकता के इस उत्कर्ष-काल और उनकी उम्र के इस पड़ाव पर यह आवश्यक था कि उनकी ग़ज़लों का मूल्यांकन किया जाए और हिंदी ग़ज़ल के पाठकों के सम्मुख उनके अवदान को प्रस्तुत किया जाए। यह सुखद है कि हिंदी ग़ज़लके अध्येताओं और विशेषज्ञ विद्वानों ने समीप जी की ग़ज़लों पर बड़े मनोयोग से आलेख लिखे हैं और विभिन्न कोणों से उनकी ग़ज़लों की संवेदना और शिल्प को देखा, परखा और मूल्यांकित किया है।’’ 

इस प्रकार का विचार आते ही डॉ वशिष्ठ अनूप ने विभिन्न समीक्षकों एवं हिंदी के विद्वानों से हरिराम समीप से संबंधित आलेख आमंत्रित किए। इस प्रकार के ग्रंथ का संपादन करना भी एक श्रम साथी एवं धैर्य का कार्य होता है। एक संपादक विचार करता है, तत्संबंधी रचनाएं आमंत्रित करता है किंतु यह आवश्यक नहीं है की जिनसे रचनाएं मंगाई जाए वे तत्काल रचना भेजने की स्थिति में हों। व्यक्तिगत विशेषताओं के चलते कई बार रचनाकारों को अनचाहा विलंब हो जाता है और इसके लिए संपादक को धैर्य का परिचय देना पड़ता है। यह धैर्य ही एक अच्छे ग्रंथ को आकार दे पाता है। इस ग्रंथ को पढ़ने के बाद डॉ वशिष्ठ अनूप के धैर्य का स्पष्ट अनुभव किया जा सकता है। उन्होंने ग्रंथ के मूल स्वरूप को हरेराम समीप जी के की समीक्षा पर केंद्रित रखा है किंतु इसके साथ ही केंद्रीय रचनाकार के पक्ष को भी शामिल करते हुए उनके साक्षात्कार को भी स्थान दिया है जिससे यह ग्रंथ समग्रता से संपन्न है। 
‘‘ग़ज़लकार हरेराम समीप सृजन समीक्षा’’ ग्रंथ के मुख्य पृष्ठ पर हरेराम समीप जी का पोटे््रट प्रकाशित है जिससे उनके व्यक्तित्व की झलक मिलती है। ग्रंथ की समस्त सामग्री को दो अध्यायों में विभक्त किया गया है। प्रथम खंड है - ‘‘हरेराम समीप: जीवन और लेखन’’। इस खंड में हरिराम समीप की ग़ज़लों एवं उनके ग़ज़ल संग्रहों पर विभिन्न समीक्षकों के लेख है। कुछ लेख उनके जीवनवृत्त पर भी प्रकाश डालते हैं।

प्रथम खंड में प्रस्तुत किए गए लेख इस प्रकार हैं - हरेराम समीप का ग़ज़ल -संसार रू समग्र अनुशीलन - डॉ. वरुण कुमार तिवारी, हरेराम समीप की ग़ज़ल -यात्रा - सुदेश कुमार मेहर, व्यवस्था का प्रतिपक्ष प्रस्तुत करती ग़ज़लें - प्रो. वशिष्ठ अनूप, हरेराम समीप: एक क्रांतिधर्मी, प्रयोगधर्मी ग़ज़लकार - डॉ. ऋषिपाल धीमान ऋषि, विसंगतियों का मुखर प्रतिवाद - ज्ञानप्रकाश विवेक, भविष्य के लिए एक मानवीय सपना दिखाती ग़ज़लें - गरिमा सक्सेना, समीप की हिन्दी ग़ज़ल -दृष्टि और आलोचना-कर्म - डॉ. जियाउर रहमान जाफ़री, अँधेरे दौर में उजाले की तलब - डॉ. भागीनाथ यादवराव वाकले, हरेराम समीप की हिन्दी ग़ज़ल को देन - दिनेश सिंदल, खौफ़ से मोहब्बत तक की अंतर्यात्रा की ग़ज़लें - डॉ. वेदप्रकाश अमिताभ, जनवादी चेतना के प्रखर ग़ज़लकार: हरेराम समीप - महेन्द्र नेह, जन-आस्था की प्रतिबद्ध ग़ज़लें - उमाशंकर सिंह परमार, हिन्दी ग़ज़लका जनपक्ष- महेश अग्रवाल, सन्नाटे के तिलिस्म को तोड़ती ग़ज़लें - डॉ. शिव ओम अम्बर, गहरे जीवन-बोध के ग़ज़लकार हरेराम समीप - महेश अश्क, ग़ज़लों में उतरा है आज का समाज - डॉ. बालस्वरूप राही, वर्तमान भावबोध को नए धरातल पर चिन्हित करती ग़ज़लें - विजय कुमार स्वर्णकार, ग़ज़लों का विस्तृत कथ्य-संसार -ओमप्रकाश यती, मौन साधना के क्रांतिकारी रचनाकार रू हरेराम समीप - महेश कटारे सुगम, सामजिक चेतना और प्रतिरोध की बेबाक ग़ज़लें - डॉ. डीएम. मिश्र, बाज़ारवाद और बढ़ते साम्राज्यवाद से टकराती ग़ज़लें - राजेन्द्र वर्मा, प्रतिबद्धता और प्रतिरोध की सशक्त ग़ज़लें - डॉ. भावना, ग़ज़लों में जनवादी रुझान - बी. आर. विप्लवी, हरेराम समीप की ग़ज़लगोई-डॉ. महेन्द्र अग्रवाल, हरेराम समीप की ग़ज़लके सरोकार - प्रदीप कान्त, समय की घटनाओं से प्रेरित समीप की ग़ज़लें - अनिरुद्ध सिन्हा, हिन्दी ग़ज़ल में आस्था का स्वर - लक्ष्मीशंकर वाजपेयी, भीतर की उड़ान की ग़ज़लें - स्व. शिवराम, समाज को आईना दिखाती ग़ज़लें - डॉ. रोहिताश्व अस्थाना, लोकोन्मुखी चेतना की ग़ज़ल में अभिव्यक्ति - डॉ. नितिन सेठी, हरेराम समीप की ग़ज़लधर्मिता, सरोकार एवं उपादेयता - डॉ. विनोद प्रकाश गुप्ता शलभ, समय की आग पीती ग़ज़लें - चंद्रभान भारद्वाज, सोच का मौसम समय और समाज का दस्तावेज़ - देवमणि पाण्डेय, हरेराम समीप की ग़ज़लों में फिक्र और फ़न का समन्वय - राहुल शिवाय, हिन्दी ग़ज़लका एक नया उन्मेष - स्व. डॉ. राम दयाल कोष्ठा श्रीकांत, विसंगतियों के जाल से समकाल तक: समीप की ग़ज़लें - डॉ. रामगोपाल भारतीय, ग़ज़लमें संवेदनशीलता के व्याख्याकार हरेराम समीप डॉ. कृष्णकुमार नाज़, समय की विसंगतियों से टकरातीं समीप जी की ग़ज़लें - डॉ. शिवजी श्रीवास्तव, दुष्यंत कुमार की परंपरा को आगे बढ़ातीं ग़ज़लें - डॉ. राकेश जोशी, हरेराम समीप की ग़ज़लों के ये दमदार शेर - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह, हिन्दी ग़ज़ल में आती समकाल की आवाज़ - डॉ. अनिल गौड़, सृजन के विविध आयाम हरीलाल मिलन, जन-सरोकारों से जुड़ी हिन्दी ग़ज़लें - के. पी. अनमोल, यथा-स्थितिवाद के तिलस्म को तोड़ने का आग्रह करती ग़ज़लें - संजीव प्रभाकर, नींद से जगातीं हरेराम समीप की ग़ज़लें - डॉ. रामावतार सागर, हरेराम समीप की ग़ज़लों में समय, समाज और संवेदना - आशा पाण्डेय ओझा आशा, जनपक्षधरता की अगुआई करती ग़ज़लें - विजय, सोच का मौसम: ग़ज़ल का एक मुक़म्मल अदबी दस्तावेज़- डॉ. प्रमोद सागर और इस खंड के अंत में कुछ और महत्वपूर्ण साहित्यकारों की टिप्पणियाँ सहेजी गई हैं।

‘‘व्यवस्था का प्रतिपक्ष प्रस्तुत करती ग़ज़लें’’ में प्रो. वशिष्ठ अनूप ने लिखा है कि ‘‘हरेराम समीप शब्द साधक साहित्यकार हैं। वह जानते हैं कि हर सच्चा साहित्यकार जीवन-जगत के अन्तर्बाह्य सत्य का अनुसन्धान करता है और उस सत्य से सबका साक्षात्कार कराता है। कविता साहित्य का सर्वोत्तम रूप होती है और ग़ज़ल में अन्तर्वस्तु की सर्वाधिक सघन अन्विति होती है। सत्य के पक्ष में खड़ा होना और उसे कहना-लिखना खतरे से खाली नहीं होता। यह जानते हुए भी वह सच कहते आ रहे हैं। उन्हें पता है कि हुक्मरानों की आदत सच्चाई को सुनने की नहीं होती और इसी कारण तमाम लेखकों, बुद्धिजीवियों, संस्कृतिकर्मियों, पत्रकारों और कवियों को यातनाएँ भुगतनी पड़ी हैं, पड़ रही हैं, वह जोखिम उठाकर भी सत्य और शब्द का साथ नहीं छोड़ते। इतना ही नहीं, समीप जी शब्दों की सेना को सबल बनाने के लिए लगातार प्रयत्नशील हैं। वह क़तरे में सैलाब को समेटने की सामथ्र्य रखते हैं-
एक शायर ही बता सकता है आखि़र उसने 
एक सैलाब को कतरे में समेटा कैसे ।

डॉ. वेदप्रकाश अमिताभ ने अपने लेख ‘‘खौफ़ से मोहब्बत तक की अंतर्यात्रा की ग़ज़लें’’ में हरेराम समीप जी के संबंध में लिखा है कि ‘‘उन्होंने सच कहने का साहस जुटाया है। बार-बार डर या खौफ़ का उल्लेख बताता है, कि स्थितियाँ कितनी भयावह और प्रतिकूल हैं। हमको सिर्फ डर ही डर मिला, अब कौन यहाँ खौफ़ की छाया में नहीं है, खौफ़ तारी हो रहा कुछ यूँ दिलों के आसपास, जिन्दगी क्यों खफ़ा से सहमी डरी है आदि उद्गारों में परिवेश की प्रामाणिकता है। ऐसे माहौल में भी रचनाकार लिखने का ही नहीं, प्रतिरोध करने का जोखिम भी उठा रहा है। सियासत, लोकतंत्र, हुक्मरान आदि पर टिका-टिप्पणियाँ इसकी साक्षी हैं। अर्थात राजनीतिक परिदृश्य की सही पहचान इन रचनाओं में है-
साँठ-गाँठ में लगी सियासत 
करे हुकूमत अदल-बदल कर

डॉ. भारतेंदु मिश्र की यह सारगर्भित टिप्पणी गोया सब कुछ कह जाती है-‘‘यूँ तो ग़ज़लगो बहुत से हैं लेकिन हरेराम समीप की बात कुछ और है। समीप का कवि शायरी की धड़कन को पहचानता है. कवि अपने समय को कितनी गहराई से जीता है यह उसकी कविता से ही आंका जा सकता है।’’

ग्रंथ का खण्ड-दो साक्षात्कार का खंड है। इसमें कवि, ग़ज़लकार एवं आलोचक हरेराम समीप से युवा ग़ज़लकार के.पी. अनमोल की एक लम्बी बातचीत है। यह साक्षात्कार हरेराम समीप जी द्वारा स्वयं के जीवन के बारे में दी गई जानकारी से जहां अवगत कराता है वहीं हिंदी ग़ज़ल के स्वरूप में भारतीय ग़ज़ल पर समग्रता से प्रकाश डालता है। एक प्रश्न और उसके उत्तर के अंश की बानगी देखिए-         
प्रश्न - हिन्दी ग़ज़ल की व्याकरण-निबद्धता पर आज तरह-तरह के प्रश्न उठ रहे हैं, इस पर आपके क्या विचार हैं?  
उत्तर - ग़ज़ल चाहे किसी भी भाषा में लिखी जाए, उसका सौंदर्य ग़ज़ल के निर्धारित व्याकरण या शिल्प से जुड़ा होना वांछित है, इसी को ग़ज़ल का अरूज़ में होनाश् भी कहते हैं। अरूज़ के अंतर्गत सिर्फ बहर-वजन के अलावा और भी बहुत सावधानियाँ रखनी होती हैं, जो उसके आतंरिक सौन्दर्य को बढ़ाती हैं। यह ‘बहुत कुछ’ ग़ज़ल में कवि की प्रकृति, श्रम और साधना से आता है। 

डाॅ वशिष्ठ अनूप ने ‘‘ग़ज़लकार हरेराम समीप सृजन समीक्षा’’ को बहुत खूबसूरती से संपादित कर इसे हिन्दी साहित्य में ग़ज़ल के इतिहास का एक मील का पत्थर बना दिया है। इस ग्रंथ को हिन्दी साहित्य के विद्यार्थियों एवं हिन्दी ग़ज़ल में रुचि रखने वालों को अवश्य पढ़ना चाहिए।  
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Tuesday, August 25, 2026

पुस्तक समीक्षा | मनस्वी बुद्धिप्रकाश सारावगी के व्यक्तित्व पर समुचित प्रकाश डालता स्मृतिग्रंथ | समीक्षक - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह | आचरण


पुस्तक समीक्षा      
मनस्वी बुद्धिप्रकाश सारावगी के व्यक्तित्व पर समुचित प्रकाश डालता स्मृतिग्रंथ
- समीक्षक डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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स्मृति ग्रंथ - मनस्वी बुद्धिप्रकाश सरावगी विरल व्यक्तित्व की अविराम यात्रा
संपादक   - प्रो. सरोज गुप्ता, सुमति कुमार जैन
प्रकाशक    - प्रलेक प्रकाशन, 702, जे-50, ग्लोबल सिटी, विरार वेस्ट, मुंबई, महाराष्ट्- 401303
मूल्य       - 999/-
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जीवन में संस्कारों का सबसे अधिक महत्व होता है। विशेष रूप से उन संस्कारों का जो हमें अपने माता-पिता से मिलते हैं। यही संस्कार पितृऋण का भी स्मरण कराते हैं। सनातन धर्म और वेदों के अनुसार पितृऋण हमारे माता-पिता और पूर्वजों का वह कर्ज है, जो हमें जीवन, संस्कार और वंश परंपरा देने के कारण हम पर होता है। इस ऋण को मनुष्य का जन्मजात ऋण माना गया है। वेदों में पितृों को इंद्र, दक्ष, मरीचि और सप्तर्षियों के भी मार्गदर्शक कहा गया है-
अर्चितानाममूर्तानां पितृणां दीप्ततेजसाम् ।
नमस्यामि सदा तेषां ध्यानिनां दिव्यचक्षुषाम्।।
इन्द्रादीनां च नेतारो दक्षमारीचयोस्तथा ।
सप्तर्षीणां तथान्येषां तान् नमस्यामि कामदान्।। 
अर्थात, जो पूजनीय हैं, अमूर्त (सूक्ष्म रूप में) हैं, और जिनका तेज प्रदीप्त है, उन ध्यानी और दिव्यदृष्टि संपन्न पितरों को सदा नमस्कार है। जो इंद्र, दक्ष, मरीचि और सप्तर्षियों तथा अन्य महान संतों के भी मार्गदर्शक व प्रणेता हैं, और सभी की मनोकामनाएं पूर्ण करने वाले हैं, उन सभी पितृ देवताओं को सादर नमन है।
इसी भावना के साथ विरल व्यक्तित्व के धनी पितृ पुरुष बुद्धिप्रकाश सरावगी पर एक स्मृति ग्रंथ का प्रकाशन किया गया है जिसका संपादन एवं प्रकाशन उनकी पुत्री प्रो. सरोज गुप्ता ने सुमति कुमार जैन के संपादन सहयोग से किया है। इस स्मृतिग्रंथ का नाम है-‘‘मनस्वी बुद्धिप्रकाश सरावगी विरल व्यक्तित्व की अविराम यात्रा (विरासत का संवाद: डायरी के पन्नों से)।

‘‘मनस्वी बुद्धिप्रकाश सरावगी विरल व्यक्तित्व की अविराम यात्रा’’ - इस स्मृति ग्रंथ में बुद्धि प्रकाश सरावगी जी के जीवन के विभिन्न पक्षों पर समुचित प्रकाश डाला गया है जिससे उनके व्यक्तित्व की विशालता का स्पष्ट दर्शन होता है। इस पुस्तक में डायरी के पन्ने, पत्र, बुद्धि प्रकाश सरावगी जी व्यक्तित्व से संबंधित विभिन्न विद्वानों के विचार संस्मरण तथा उनकी रचनात्मक को साहेजा गया है। 224 पृष्ठ की पुस्तक के कलेवर को 12 अध्यायों में प्रस्तुत किया गया है। पुस्तक के ब्लर्ब पर डॉ रजनी गुप्ता एवं डॉ कुमकुम गुप्ता के विचार हैं। इसके साथ ही पुस्तक के संबंध में शुभकामनाओं सहित आचार्य प्रभु दयाल मिश्रा अध्यक्ष महर्षि अगस्त्य वैदिक संस्थान भोपाल, दीपक पालावत दीपज्योति ग्रुप का पब्लिकेशंस के मनोभाव रखे गए हैं। तदुपरांत संपादक द्वय सुमति कुमार जैन तथा प्रोफेसर सरोज गुप्ता के संपादकीय विचार हैं।

प्रो. सरोज गुप्त ने इस स्मृति ग्रंथ के आकार लेने की पूर्वपीठिका से परिचित कराते हुए अपने संपादकीय में लिखा है कि ‘‘जनवरी 2022 में चिरगाँव से प्रकाशित गहोई गरिमा पत्रिका का जनवरी विशेषांक पिताजी पर केन्द्रित रहा। गहोई गरिमा पत्रिका के विमोचन अवसर पर श्री हरगोविंद कुशवाहा, डॉ. एस आर गुप्ता, डॉ. सुरेन्द्र दुबे, डॉ. प्रदीप तिवारी, श्री रामप्रकाश हथनोरिया सहित गणमान्य विद्वत्जनों, साहित्यकारों की उपस्थिति में सम्पन्न हुआ। सभी ने पिताजी से सम्बंधित संस्मरण सुनाये। इन संस्मरणों को सुनकर मुझे लगा कि पिताजी की हस्तलिखित डायरी के पन्नों को देखा जाये शायद कुछ मोती माणिक्य मिलें। गहोई गरिमा पत्रिका के विमोचन के पश्चात् मैंने पिताजी के लेखन पर गहन अध्ययन व चिंतन किया। चूँकि जगमग दीपज्योति पत्रिका के सम्पादक ने मुझे 2020 में पत्रिका के महिला विशेषांक का अतिथि सम्पादक बनाया तभी से आपसे साहित्यिक चर्चा होती रहती है मैंने आपको पिताजी का स्मृति ग्रन्थ भेजकर पिताजी की पुस्तक पर चर्चा की। आपने पुस्तक को न सिर्फ पढ़ा वरन् अपनी विरासत को संजोने की बात कहकर ‘‘उदारचेता मनस्वी श्री बुद्धि प्रकाश सरावगी जिन्हें शब्दों की शिरोरेखा से नहीं बांधा जा सकता’’ लेख लिखकर मुझे भेजा साथ ही जगमग दीपज्योति के मार्च 2024 के अंक में पहले पृष्ठ पर उसका प्रकाशन भी किया।’’

इस प्रकार इस स्मृति ग्रंथ स्वरूप पर मंथन आरंभ हुआ और विभिन्न लोगों के लेखकीय सहयोग से इस ग्रंथ को आकार मिला। ग्रंथ का नाम ‘‘विरल व्यक्तित्व की अविराम यात्रा’’ जगमग दीपज्योति के सम्पादक सुमतिकुमार जैन ने दिया। इस ग्रंथ में बुद्धि प्रकाश सरावगी के विविध छायाचित्र भी रखे गए हैं जिनसे उनके व्यक्ति की झलक मिलती है। अपने पिताश्री के संबंध में प्रो. सरोज गुप्ता ने लिखा है कि-‘‘उनको मैंने सदैव पारस्परिकता सामंजस्य और सर्वसामान्य सामूहिक विज्ञानमय जीवन जीते रहे हैं। उन्होंने अपने जीवन में सम्पूर्ण सत्ता का अपनी मानसिक, प्राणिक और भौतिक सत्ता का रुपान्तरण किया। एक सर्वथा नवीन चेतना उनके कार्य व्यापार में लोगों ने देखी। पिताजी जहाँ जाते अप्रतिम छाप छोड़ते। असफलता उनसे कोसों दूर थी। दो दो स्कूलों के संस्थापक प्राचार्य होना, सारी व्यवस्था जादुई तरीके से करना। सबको अपनापन देकर कार्य का महत्व बताना। समाज व राष्ट्र का हित चिंतन करना उनके स्वभाव में रहा। इसीलिए समाज के मन-मस्तिष्क में वह आज भी स्मरणीय हैं। यह बात मैं अपने मन से नहीं वरन् वरिष्ठ जनों के मुख से पिताजी की प्रशंसा में सुनी सुनाई बातों के आधार पर कह रही हूँ। इस ग्रन्थ के संस्मरण लेख इसके गवाह हैं।’’

वैसे वस्तुतः किसी गवाह अथवा साक्ष्य की आवश्यकता नहीं है क्यों कि माता-पिता के संस्कार उनकी संतानों में परिलक्षित होते हैं। प्रो. सरोज गुप्ता की धर्मनिष्ठा, कर्मठता एवं जीवन संस्कारों को देख कर ही उनके पिताश्री की श्रेष्ठता का अनुमान लगाया जा सकता है। यह सुसंस्कार ही तो है कि प्रो. सरोज गुप्ता ने पिताश्री के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने के लिए उनकी स्मृति ग्रंथ का संपादन एव. प्रकाशन किया। यह एक सुरुचिपूर्ण ग्रंथ है जो वर्तमान को अतीत से जोड़ने में सक्षम है। इस ग्रंथ के माध्यम से हम उन जीवन मूल्यों से भलीभांति परिचित हो सकते हैं जो हमारे पितृ समय में रहे हैं। इस ग्रंथ में वे कविताएं भी हैं जिन्हें बुद्धिप्रकाश सरावगी के प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हुए लिखा गया है और जो उनके उस विराट व्यक्तित्व से परिचित कराते हैं जिनकी मन-मस्तिष्क पर आज भी छाप विद्यमान है। 

प्रथम अध्याय प्रांशु प्रसंगिका में ये भावोद्गार हैं-योग क्षेमो नः कल्पन्ताम् आचार्य पं. प्रभुदयाल मिश्र, शब्द शब्द झरता कुमकुम दीपक पालावत, हृदयोदगार सुमति कुमार जैन, सम्पादकीय प्रोफेसर सरोज गुप्ता। द्वितीय अध्याय श्रद्धा के पुष्प में जो लेख हैं वे इस प्रकार हैं- विरासत का संवाद -श्री ब्रजेश चन्द्र श्रीवास्तव, निकष - डॉ. आर.डी. मिश्रा, न दैन्यम् न पलायनम् - टीकाराम त्रिपाठी, साधक एक सकल सिधि देनी प्रो. ब्रजेश कुमार श्रीवास्तव, श्रद्धा के दो शब्द - डॉ. शिरोमणि सिंह पथ, बहुमुखी प्रतिभा के धनी सरावगीजी - श्रीमती शशि शर्मा।
प्रशंसा पत्र में ‘‘उदारचेता मनस्वी श्री बुद्धिप्रकाश सरावगी जिन्हें शब्दों की शिरो रेखा से नहीं बाँधा जा सकताष्- श्री सुमतिकुमार जैन, गोविन्द दास रिछारिया, उपाध्यक्ष सचिवालय, बम्बई, बेनी बाई, विधायक, बबीना विधानसभा (उ.प्र.), सुदामा प्रसाद गोस्वानी, विधायक तालबेहट, ललितपुर (उ.प्र.), डॉ. भगवत दयाल, विधायक बबीना झाँसी (उ.प्र.) तथा शुभकामना संदेश के अध्याय में प्रो. सुश्री गार्गी, श्री द्वारिका प्रसाद चैतन्य श्रीमती शिवकली रूसिया, श्रीमती पुष्पा कनकने, डॉ. गंगा प्रसाद बरसैया, श्री हरिशंकर सिजरिया के संदेश हैं।
काव्यांजलि अध्याय के अंतर्गत - बड़े गाँव के लाल - डॉ. के.एल. वर्मा बिन्दु, गुरुवर बुद्धि प्रकाश - डॉ. नारायणदास कमलेश, बुद्धि प्रकाश की ज्योर्तिमय स्मृति में - डॉ. सीताराम गुप्त दिनेश, बुद्धि प्रकाश जी सरावगी अमर हैं - डॉ. आनंदकंद गुप्त, परहित साधक स्व. बुद्धि प्रकाश श्री रघुवीर प्रसाद गुप्त, मिले पिता गुरुदेव समान - डॉ. सरोज गुप्ता की कविताएं हैं।
इसके बाद के अध्यायों में जीवन दर्शन, शैक्षणिक कार्य क्षेत्र तथा डायरी के पन्नों से वे महत्वपूर्ण अध्याय हैं जिनके क्षरा बुद्धिप्रकाश सरावगी के विचार एवं मानवीय मूल्यों को बारीकी से जाना और समझा जा सकता है।
परख संग साथी नामक अध्याय में विभिन्न विद्वानों ने बुद्धिप्रकाश सरावगी जी के व्यक्तिव पर प्रकाश डाला है। जैसे - श्री सरावगी जी चलते फिरते विश्वविद्यालय - पं. गुणसागर सत्यार्थी, जैसा मैंने देखा - शिवकली रूसिया, अभिन्न आत्मीय कीर्तिशेषरू श्री बुद्धिप्रकाश सरावगी - राजाराम तिवारी, श्री गुरु चरण सरोज रज - देवेन्द्र कुमार जैन, स्नेह सागर - श्रद्धेय सरावगी जी डॉ. नारायणदास गुप्त कमलेश, दैदीप्यमान स्मृति - राजाराम वर्मा, स्मृति पुंज: बड़ागाँव के मालवीय श्री सरावगी - कृष्ण बिहारी नायक, स्थित प्रज्ञ मनीषी: श्री बुद्धिप्रकाश सरावगी उदय नारायण कनकने, शिक्षा क्षेत्र के देदीप्यमान प्रकाश पुंज बुद्धिप्रकाश सरावगी लखनलाल कारेखिमऊ, जीवन्त व्यक्तित्व के धनी ब्रजेश चन्द्र श्रीवास्तव, बुन्देलखण्ड की माटी के जुझारू व्यक्तित्व श्री सरावगी जी डॉ. रामकृष्ण गुप्त, एक संस्मरण वर्ष सन् 1955 रमेशचन्द्र शर्मा, परम आदरणीय गुरुवर श्रद्धेय सरावगी जी डॉ. जगदीश शरण खर्द, अक्षय प्रेरणा के स्रोत श्री सरावगी जी रामेश्वरी नायक। इसके बाद का अध्याय भावनाओं का सागर समेटे हुए है जिसका शीर्षक है ‘‘उद्गार अपनों के’’। इसमें  बुद्धिप्रकाश सरावगी जी की अर्द्धंगिनी से नवोदित पीढी के नवांकुरों तक के उद्गार हैं। इन लेखों के शीर्षक ही बहुत कुछ कह देते हैं। जैसे- पति की यादें ही पाथेय - रामप्यारी सरावगी, मेरे प्रेरणा स्रोत पिताजी - अनिल सरावगी, डॉ. विचारशील प्रखर अध्येता- हरिमोहन गुप्ता, मेरे आदर्श पिताजी - डॉ. सरोज गुप्ता, स्नेहिल पिताजी - अखिलेश सरावगी, मेरे पिता जैसा कोई नहीं - डॉ. संगीता सुहाने, वात्सल्य की प्रतिमूर्ति मेरे दादा जी - कु. ऋचा सरावगी, जगमगाते नक्षत्रः मेरे दादा जी - कु. तृप्ति सरावगी,  मेरे नानाजी एक दृष्टि - मा. कार्तिकेय गुप्ता, मेरे प्यारे दादाजी - अमित, अनुज सरावगी।
लेखों के अंतिम अध्याय ‘‘स्मृतियों के झरोखे से’’ में श्री लक्ष्मीनारायण पिपरसानियाँ, श्री प्रेमनारायण गुप्त, डॉ. नारायणदास कमलेश, रणजीत सिंह जू देव, श्री रामकिशोर वीणा,श्री जी.एस. बडैरिया. श्री रामगोपाल लहरिया, श्री छक्कीलाल रावत, श्री अयोध्या प्रसाद गुप्त कुमुद, श्री बनमाली लाल सादेले, श्री रमेश सेठ, श्री उदयनारायण कनकने, डॉ. नर्मदा प्रसाद गुप्त,सुल्तान सिंह चौहान, चैतन्य वाणी, रामनाथ नीखरा,गंगा प्रसाद बरसैंया आदि के संस्मरण हैं।

‘‘मनस्वी बुद्धिप्रकाश सरावगी विरल व्यक्तित्व की अविराम यात्रा’’ स्मृति ग्रंथ एक विशिष्ट व्यक्ति की समग्र विशिष्टताओं को सहेजे हुए है। इस ग्रंथ के माध्यम से एक पुत्री का अपने पिता के प्रति प्रेम और श्रद्धा का अनुभव किया जा सकता है तथा विरासत की उष्मायुक्त गरिमा को आत्मसात किया जा सकता है। प्रो. सरोज गुप्ता प्रशंसा की पात्र हैं कि उन्होंने पितृऋण को समझा और उसके प्रति इस ग्रंथ के रूप में अपनी कृतज्ञता व्यक्त की है। यह ग्रंथ नई पीढ़ी को पुरानी पीढ़ी के मूल्यों से जोड़ने में सक्षम है, संस्कारों के प्रवाह का साक्षी है तथा पठनीय है।     


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Wednesday, August 19, 2026

पुस्तक समीक्षा | संवेदनाओं से उपजे नवगीत जो बार-बार पढ़े जाने का आग्रह करते हैं | समीक्षक - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

पुस्तक समीक्षा    

संवेदनाओं से उपजे नवगीत जो बार-बार पढ़े जाने का आग्रह करते हैं                              

 - समीक्षक डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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काव्य संग्रह - आवाज़ मौसम की
कवि       - राजेन्द्र गौतम
प्रकाशक    - अनुज्ञा बुक्स, 1/10206, लेन नं. 1ई, वेस्ट गोरख पार्क, शाहदरा, दिल्ली- 110 032
मूल्य       - 400/-
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राजेन्द्र गौतम हिन्दी की नवगीत विधा के एक वरिष्ठ और स्थापित नाम हैं। उनका ताज़ा नवगीत संग्रह ‘‘आवाज़ मौसम की’’ मात्र 61 नवगीतों का संग्रह नहीं है वरन यह अपने-आप में नवगीत की गीतात्मक यात्रा की कथा है। यह यात्रा राजेन्द्र गौतम के लगभग 1972-73 के नवगीतों से आरम्भ होती है। इनसे नवगीत की उस समय की प्रकृति एवं प्रवृत्ति को समझा जा सकता है जब नवगीत विधा अपने स्वर्णकाल में विस्तार पा रही थी। हिन्दी साहित्य में गीत विधा पहले से विद्यमान थी, फिर भी नवगीत के शिल्प की आवश्यकता को अनुभव किया गया और इस विधा को भरपूर लोकप्रियता भी मिली। नवगीत में गीत की अपेक्षा कुछ छूटें ली गई थीं जिससे इसके कथ्य को चहुंमुखी दिशाएं मिलीं। सन् 2012 में नवगीत विधा पर नवगीतकार वीरेन्द्र आस्तिक का एक लंबा लेख प्रकाशित हुआ था जो आज भी ‘‘पूर्वाभास’’ की इन्टरनेट साईट पर पढ़ा जा सकता है। अपने इस महत्वपूर्ण लेख में वीरेन्द्र आस्तिक ने नवगीत की तत्कालीन सृदृढ़ स्थिति एवं संभावनाओं के साथ ही आवश्यकताओं पर भी प्रकाश डाला था। लेख का शीर्षक था-‘‘नवगीत का संक्षिप्त इतिहास और उसकी मौजूदा समस्याएं’’। अपने इस लेख में उन्होंने एक वाक्य लिखा था-‘‘आज नवगीत एक समृद्ध विधा है। बल्कि मुझे तो ऐसा लगता है कि भविष्य में नवगीत का सुनहरा युग आने वाला है।’’
निश्चित रूप से वह सुनहरा युग आया। यूं तो शंभूनाथ सिंह को नवगीत का प्रणेता माना जाता है, वहीं कुछ लोग राजेन्द्र प्रसाद सिंह को नवगीत का प्रवर्तक मानते हैं। बहरहाल, आरंभ जिसने भी किया हो किन्तु इसे सोपान चढ़ाया उन अनेक नवगीतकारों ने जिनमें से कुछ प्रमुख नाम हैं- त्रिलोचन शास्त्री, केदारनाथ सिंह, गोपालदास नीरज, धर्मवीर भारती, रवीन्द्र भ्रमर, रमेश रंजक, कुमार शिव, वीरेन्द्र मिश्र, कुंवर नारायण, देवेन्द्र शर्मा इन्द्र, बालस्वरूप राही, रामदरश मिश्र, नरेश सक्सेना, ओम प्रभाकर, बुद्धिनाथ मिश्र, अनूप अशेष, नईम, राजेन्द्र प्रसाद सिंह, उमाकांत मालवीय आदि। लेकिन फिर कुछ ऐसा हुआ कि नवगीत को नेपथ्य में धकेला जाने लगा। इस संदर्भ में मैं फिर वीरेन्द्र आस्तिक के लेख का एक अंश दे रही हूं जिसमें उन्होंने नवगीत के नेपथ्य मे जाने के भावी कारण की मानो पहले ही घोषणा कर दी थी-‘‘यहां मैं आलोचना पर जोर क्यों दे रहा हूं? विगत में डॉ नामवर सिंह जैसे गद्य कविता के आलोचक यह कहते आए हैं कि ‘गीत आलोचना की वस्तु नहीं है।’ यह कहकर वे एक तीर से दो निशाने साधते रहे हैं। एक- गीत इस लायक नहीं कि उसकी आलोचना हो और दो- शैक्षिक जगत में, गद्य कविता का एकाधिकार बरकरार रहे। मेरा मानना है कि यदि गीत पर विमर्श नहीं होगा तो वह मूल्यांकित भी नहीं होगा और यदि उसका मूल्यांकन नहीं होगा तो पाठ्यक्रमों आदि में प्रवेश का रास्ता भी नहीं बन पाएगा। यहां पर मैं बड़े आदर के साथ उन सभी आलोचकों-समीक्षकों को याद करता हूं जिनकी महती भूमिका से नवगीत समृद्ध हुआ। लेकिन बात वहीं की वहीं है कि नवगीत आज साहित्य की मुख्य धारा में नहीं है जिसका वह हकदार है, क्योंकि उसकी वकालत के लिए हमारे पास बड़े आलोचक नहीं है।’’

एक कारण और भी रहा है जिसका अनुमान लेख लिखने के समय आस्तिक जी को नहीं रहा होगा कि भविष्य में साहित्य सृजन के प्रति श्रम में घोर कमी आने लगेगी। नवगीत भी श्रम की मांग करता है अर्थात् नवगीत सृजन उन कवियों के लिए धैर्य चुका देने वाला कार्य था जो रातों-रात कवि कहलना जाना चाहते हैं। नवगीतकार  माहेश्वर तिवारी ने नवगीत की खूबी बताई थी कि-‘‘नवगीत अपने समय की आधुनिकता बोध से सम्पन्न संपृक्त छांदसिक रचना है।’’
संग्रह में अपने गीतों को राजेन्द्र गौतम ने पांच उपशीर्षकों में विभक्त किया है- लपटों भरा आकाश, मेघदूत आया, शरद की भोर, शीत लहर, नंगी डालें तथा देह थिरकती है मौसम की। सभी नवगीतों में प्रकृति की प्रधानता है। कवि ने प्रकृति को लक्ष्य कर के अपनी तमाम अभिव्यक्ति को शब्दबद्ध किया है। एक नवगीत है ‘‘दहकते छन्द’’। इसमें समसामयिक व्यंजना को स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है-
बचा कर भी
कहां ले जायें
हम ये झुलसती कलियां
सुलगती आग है अब झील-तल में
या कमल-वन में।
हुआ सम्बन्ध गहरा
आंधियों से
और अब इसका
तवे-सी तप रही जो
जेठ की दोपहर पल-पल है
क्षितिज पर
दूर धुंधले में
विवश मंडरा रहीं चीलें
न जाने कब गिरे भू पर भू
थका हर पंख निर्बल है
घटाओं के सपन ढोता फिरे
आकाश बंजारा
रचें पर दग्ध तलवे रेत की छुवनें,
चुभन तन में।

राजेन्द्र गौतम समय की नब्ज़ को पकड़ना बखूबी जानते हैं। वे स्थितियों पर कटाक्ष करते हैं, दुख प्रकट करते हैं, असंतोष जताते हैं। इन सबमें उनके शब्दों का चयन अपनी महत्ता स्वयं प्रकट कर देता है। उदाहरण के लिए संग्रह का नवगीत ‘‘पथरा चुकीं झीलें’’ को ही लें-
कभी मौसम के पड़ें कोड़े
कभी हाकिम जड़े सांटे खाल मेरे गांव की
कब तक दरिन्दों से
यहाँ खिंचती रहेगी!
दूर तक जो
भूख से सहमे हुए
सीवान ठिठके हैं
कान में उनके सुबकतीं
प्यास से पथरा चुकीं झीलें
रेत के विस्तार में
यों ठूंठ दिखते हैं करीलों के
ज्यों ठुकीं गणदेवता की
काल-जर्जर देह में कीलें

नवगीत की यह विशेषता रही है कि उसने जहां यथार्थवाद के गुणों को अपनाया, वहीं छायावाद के प्रकृति के मानवीय करण को भी आत्मसात किया। इससे नवगीत में कठोरता और कोमलता संतुलित रूप में एक साथ बनी रही। आंचलिक भाषा एवं बोलियों को भी नवगीत में पर्याप्त स्थान मिलता रहा है ताकि उनका लोक एवं जनमूल्य बना रहे। राजेन्द्र गौतम के नवगीत ‘‘हिम-सी जमी है’’ के एक बंद से नवगीत की इन खूबियों को भली-भांति समझा जा सकता है-
ओस की
बूंदों सरीखी की
दूब पातों पर उतरती
जा रही है नम उदासी
एक-
अनजानी विकलता
साथ अपने खे रही है
यह नदी क्यों विफलता-सी
ये बुरुसों
की कतारें
दूर तक हिलतीं, डुलातीं-
हों तटों को ज्यों बिजलियां।

‘‘आवाज़ मौसम की’’ संग्रह की भूमिकाएं वेद प्रकाश शर्मा ‘‘वेद’’ तथा डाॅ. कुसुम सिंह ने लिखी हैं। नवगीतकार राजेन्द्र गौतम का यह नवगीत संग्रह नवगीत के भाषिक संस्कार, शिल्प के सौष्ठव एवं प्रवाह लहरियों से ठीक उसी प्रकार परिचित कराता है, मानो नवगीत की सुरम्य घाटियों में भावनाओं की बांसुरी का सप्तक स्वर गूंज रहा हो जिसमें अव्यवस्था के प्रति रोष का भारी मंद सप्तक स्वर भी है और प्रकृति के सौंदर्य का पंचम मधुर सप्क स्वर भी। वस्तुतः नवगीत विधा के शोधार्थियों तथा नवगीत सृजनधर्मियों के लिए यह एक महत्वपूर्ण संग्रह है।      
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Wednesday, August 12, 2026

पुस्तक समीक्षा | ज़िन्दगी के सवालों के खूबसूरती से ज़वाब ढूंढती ग़ज़लें समीक्षक - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

पुस्तक समीक्षा
ज़िन्दगी के सवालों के खूबसूरती से ज़वाब ढूंढती ग़ज़लें
 समीक्षक - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
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ग़ज़ल संग्रह- चलो ढूंढें जवाब अपने 
कवि       - कृष्ण बक्षी 
प्रकाशक  - बोधी प्रकाशन, सी-46, सुदर्शनपुरा इंडस्ट्रियल एरिया एक्सटेंशन, नाला रोड, 22 गोदाम, जयपुर - 302006
मूल्य      - 150/-  
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हिन्दी ग़ज़ल की दुनिया में कृष्ण बक्षी की एक विशेष पहचान है। जीवन से उनके गहरे सरोकार रहे हैं जो उनकी ग़ज़लों में साफ़ देखे जा सकते हैं। यूं भी ग़ज़ल साहित्य की एक ऐसी काव्य विधा है जिसके प्रत्येक शेर अपनी लयात्मकता के साथ स्वतंत्र संवाद करता है। इसलिए एक ग़ज़ल ही अपने आप में जीवन की पूरी कथा कह सकती है बशर्ते कहने वाले ने ग़ज़ल को पूरी तरह साधा हो। कृष्ण बक्षी वे ग़ज़लकार हैं जिन्होंने ग़ज़ल को न केवल साधा बल्कि उस पर अपनी छाप भी छोड़ी। ‘‘चलो ढूंढें जवाब अपने’’ कृष्ण बक्षी का एक ऐसा ग़ज़ल संग्रह है जिसमें उनकी ग़ज़लें जीवन के अनुत्तरित रह जरने वाले सवालों के जवाब ढूंढती दिखाई देती हैं। आधुनिक जीवन में जटिलताओं की कमी नहीं है। रोजी-रोटी की समस्या, सिर पर छत की समस्या, बच्चों के लालन-पालन की समस्या। उस पर भी कुछ समस्याएं इंसान स्वयं पैदा कर लेता है जैसे जाति, धर्म, रंग और समुदाय के भेद की समस्या। ऐसा क्यों होता है? इंसान सुकून पाना चाहता है लेकिन अपनी मुश्क़िलें भी खुद ही बढ़ाता है। ऐसा क्यों होता है? ऐसे ही ‘क्यों’ का जवाब ढूंढती है कृष्ण बक्षी की यह ग़ज़ल-

न दरिया में  रवानी है चलो ढूंढे जवाब अपने 
कहीं ठहरा सा पानी है चलो ढूंढे जवाब अपने 
अलहदा कैसे कर दोगे रगों में सबकी बहता है 
जो खूं हिंदोस्तानी है चलो ढूंढे जवाब अपने
अज़ब हालात में उलझा के रख दी है जवां पीढ़ी 
भटकती-सी जवानी है चलो ढूंढे जवाब अपने
 - ये अशआर हैं शायर कृष्ण बक्षी की गजल ‘‘चलो ढूंढे जवाब अपने’’ से। यह ग़ज़ल उनके जिस ताजा ग़जल संग्रह में संग्रहीत है, उसका नाम भी है ‘‘चलो ढूंढे जवाब अपने’’।
 वर्तमान परिदृश्य देखते हुए कवि कृष्ण बक्षी महसूस करते हैं कि समाज में हर स्तर पर हर ओर प्रश्नों का अंबार लगा हुआ है, जिनका जवाब ढूंढें बिना हल नहीं निकाला जा सकता है। जो प्रश्न अव्यवस्थाओं को देखकर, असंवेदनाओं को देखकर और विसंगतियों को देखकर मन में उमड़ते-घुमड़ते हैं, वही व्याकुलता का कारण बनते हैं। इसलिए भी उनका जवाब ढूंढना ज़रूरी है। यूं भी प्रश्नों से घिरा हुआ समाज कभी सही ढंग से विकास नहीं कर पाता है।
ग़म ही रह जाते हैं अक्सर गुनगुनाने के लिए 
छोड़ देता है कोई जब टूट जाने के लिए
छीन कर के चुलबुल आपन ले गए सारी हंसी
तुमने छोड़ी  तक खुशी न मुस्कुराने के लिए

इसी ग़ज़ल में जो कि आरंभ में इश्क़िया गजल होने का एहसास कराती है, वहीं आगे के शेर ज़िंदगी की पथरीली सच्चाइयों से सामना कराते हैं। जैसे ये शेर हैं-
पी गया है चिमनी यों का उनको जहरीला धुआं 
घर से जो  मजदूर  निकले  कारखाने के लिए 
खूब  इस्तेमाल  तुमने  कर लिया  आवाम का
काम आया है  फ़क़त  जो सर झुकाने के लिए

कवि ने सत्ता के खोखले वादों और दावों पर जहां तंज कसा हैं, वहीं सत्ता के इर्द-गिर्द झूठ के मायाजाल को भी उजागर किया है। एक ऐसा मायाजाल जो आमजन को वोटर संख्या अथवा सभाओं की भीड़ से अधिक कुछ नहीं मानती है। कवि कृष्ण बक्षी की गजलों में भाषाई समृद्धि स्पष्ट दिखाई देती है। प्रचलन में मौजूद शब्दों और मुहावरों को बड़ी सुंदरता से और सटीकता से अपने शेरों में पिरो देते हैं। जैसे यह गजल है ‘‘सभाओं ने हमें’’ -
हर कसौटी पर कसा है विपदाओं ने हमें
खूब जांचा खूब परखा आपदाओं ने हमें
सिर्फ हम मोहरे रहे जलसे, जुलूसों के 
दांव पर रक्खा हमेशा ही सभाओं ने हमें
साजिशों वाली अंधेरी कोठरी में क्यूं
बांध रक्खा है अभी तक बादशाहों ने हमें

इस संग्रह की ग़ज़लें अपने प्रश्नों के जवाब मांगने के साथ ही हमारे आसपास रच-बस गए झूठ को बखूबी रेखांकित करता है। और हमें आगाह करने का प्रयास करता है कि हमें ज़रूरत है अपने स्वार्थ की गहरी नींद से जागने की। यूं तो शायरी का नाता प्यार-मोहब्बत, ग़म, शिक़ायत, दोस्ती, दुश्मनी आदि इन सब से बहुत क़रीब कर रहा है। लेकिन जब कृष्ण बक्षी अपनी शायरी में दोस्ती दुश्मनी की बात करते हैं तो उनका अंदाज निराला होता है बानगी देखिए -
दर्द अक्सर जब  मुझे पहचान लेता है 
बिन सबूतों के ही दुश्मन मान लेता है
बात उठते ही वो मेरे इन सवालों की 
पांव से सर तक वो चादर तान लेता है
यह व्यवस्था ही बहुत है जान लेने को
जहर का तू किसलिए एहसान लेता है

दर्द पर ही एक ग़ज़ल के कुछ और शेर देखिए जिनमें आंतरिक पीड़ा के साथ ऐतिहासिक उद्धरण का सुंदर सामंजस्य है-
ज़ख्म मेरे आज  मुझसे बात करने पर तुले हैं 
और उस पर दर्द तहक़ीक़ात करने पर तुले हैं
सांझ के सूरज बचा कर रख ज़रा सी रोशनी 
वक्त से  पहले सितारे  रात करने पर तुले हैं
वह  हमारे  दौर का  ही  आम सा इंसान है
आप आखिर क्यों उसे सुकरात करने पर तुले हैं

यह माना जाता है कि बड़े बहर की ग़ज़लें कहने से अधिक कठिन होता है छोटी बहर की ग़ज़लें कहना। सच भी है कि कम से कम शब्दों में सब कुछ कह देना एक साहित्यिक कला ही तो है। जो इस कला में पारंगत हो जाता है, वह आसानी से छोटे बहर की सटीक ग़ज़लें भी कह लेता है। इस संग्रह में बड़े बहर के साथ छोटे बहर की भी कई खूबसूरत गजलें हैं। जैसे यह एक गजल है ‘‘रोज़ मरते हैं’’ -
    हम जिसे  बहुत  प्यार करते हैं 
    उसकी  नाराज़गी  से डरते हैं 
    जिनको होता है खौफ लहरों का 
    सिर्फ  पानी  में  वो उतरते हैं 
    चल मोहब्बत से पूछ कर देखो 
    हम ही करते हैं कि वो भी करते हैं

छोटी बहर की ही एक और ग़ज़ल है जो आजकल के अव्यवस्था भरे माहौल पर तीखा कटाक्ष करती है। शेर देखें -
नए-नए रास्ते निकाल के 
ढूंढ रहे हैं हल सवाल के 
ग्रामसभा से  लौटे हैं वो 
कुछ ताजा मुद्दे उछाल के 
आपके घर के बदलो बंधु 
बूढ़े  कैलेंडर  दीवाल के

कवि कृष्ण बक्षी का गीत गजल की दुनिया में एक लंबा अनुभव रहा है। वे अपनी गजल में जो कुछ कहना चाहा उसे बखूबी कहने की महारत रखी। भाषा भी सरल है, आमबोलचाल की भाषा। इसीलिए कृष्ण बक्षी की गजलें, उसे पढ़ने या सुनने वाले से सीधा संवाद करने की ताकत रखती है। ‘‘चलो ढूंढे जवाब अपने’’ संग्रह की तमाम ग़ज़लें शिल्प के लिहाज़ से मुक़म्मल हैं, विचारों को उद्वेलित करती हैं और पठनीय हैं।
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Tuesday, August 4, 2026

पुस्तक समीक्षा | पाठकों से गहन संवाद करती कहानियों का रोचक संग्रह | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण


पुस्तक समीक्षा

पाठकों से गहन संवाद करती कहानियों का रोचक संग्रह 

समीक्षक - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

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कहानी संग्रह - पिछली घास

लेखिका      - दीपक शर्मा

प्रकाशक     - रश्मि प्रकाशन, महाराज पुरम, कृष्णा नगर, लखनऊ-226023 (उप्र)

मूल्य        - 200/-

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‘‘पिछली घास’’ लेखिका दीपक शर्मा की सोलह कहानियों का संग्रह है। हिन्दी कथाजगत में दीपक शर्मा एक जाना-पहचाना नाम है। 30 नवम्बर 1946 में अविभाजित भारत के लाहौर में जन्मीं दीपक भुल्लर जो विवाह के बाद दीपक शर्मा के नाम से चर्चित हुईं लखनऊ क्रिश्चियन कॉलेज के स्नातकोत्तर अंग्रेजी विभाग में लम्बे समय तक अध्यक्ष एवं रीडर के पद पर रहीं। अब तक उनके बीस से अधिक कहानी संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं।  दीपक शर्मा ने अपने कहानी लेखन की शुरुआत पंजाबी में की। सन् 1979 में इनकी पहली हिन्दी कहानी ‘‘कोलम्बस अलविदा’’ पत्रिका ‘‘धर्मयुग’’ में प्रकाशित हुई। इसके बाद दीपक शर्मा ने हिन्दी कहानी का जो दामन पकड़ा आज भी उसे मज़बूती से थामे रहीं।  

इस कहानी संग्रह में गगन गिल की संक्षिप्त तथा मधु बी. जोशी की विस्तृत भूमिका पढ़ने के बाद इसमें संग्रहीत कहानियों के प्रति जिज्ञासा का विस्फोट होना स्वाभाविक है। एक आतुरता जाग उठती है इन सोलह कहानियों की सोलह दुनियाओं से गुज़रने की। संग्रह में मौजूद सोलह कहानियों में पहली कहानी है-‘‘चमड़े का अहाता’’। यह एक मानवीय विमर्श की कहानी है। इसमें एक ऐसा अहाता है जो हमारे आस-पास उपस्थित है एक ‘अंडरवर्ल्ड’ की तरह। लेकिन यह किसी माफिया अंडरवर्ल्ड नहीं है बल्कि हमारे कथित सम्य समाज के राजमार्ग के ठीक बीचो-बीच बने सीवेज़ के मेनहोल के ठीक नीचे है। एक सुगबुगाती, बजबजाती हुई दुनिया। चमड़े के शोधन कार्य की दुर्गन्धयुक्त दुनिया। जहां जानवरों की खालें खरीदी जाती हैं और उन्हें ‘चमड़ा’ बना कर बेचा जाता है। इस दुनिया में चर्मशोधन से भी अधिक दुर्गन्ध उस अपराध की है जो कि घृणित सामाजिक अपराध है, कन्या-वध का। चर्मशोधन की रासायनिक द्रव से भरी टंकियां चमड़ा शोधने के चुनौती भरे काम की गवाही होने के साथ ही उस अपराध की भी गवाह हैं जो कभी नहीं होना चाहिए था। एक चुभता हुआ पारस्परिक संवाद ही इस अपराध को एक झटके में बेनक़ाब कर देता है -

‘‘मैं सब जानता हूं’’ भाई फिर हंसा, ‘‘मैं किसी से नहीं डरता। मैंने एक बाघिनी का दूध पिया है, किसी चमगीदड़ी का नहीं।’’

‘‘तुमने चमगीदड़ी किसे कहा?’’ सौतेली मां फिर भड़कीं।

‘‘चमगीदड़ी को चमगीदड़ी कहा है।’’ भाई ने सौतेली मां की दिशा में थूका,‘‘तुम्हारी एक नहीं दो बेटियां टंकी में फेंकी गईं, पर तुम्हारी रंगत एक बार नहीं बदली। मेरी बाघिनी मां ने जान दे दी, मगर जीते जी किसी को अपनी बेटी का गला घोंटने नहीं दिया।’’ 

दीपक शर्मा की कहानियों को पढ़ते समय हिन्दी कहानी के उस इतिहास पर भी संक्षिप्त दृष्टिपात कर लेना चाहिए जहां से हिन्दी कहानी ने नई कहानी का स्वरूप ग्रहण किया। वह नई कहानी विधा जिसकी छाप दीपक शर्मा की कहानियों में स्पष्ट दिखाई देती है। उन्नीसवीं शताब्दी के अंत और बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ की कड़ी में हिन्दी भाषा के उन्नयन और गद्य-विधाओं के सूत्रपात ने जिस भाषाई जनतांत्रिक का निर्वाह करते हुए साहित्य रचना की नींव रखी, उसका स्वर आज की रचनाओं में भी सुनाई देता है। 

सन् 1954 के ‘कहानी विशेषांक’ ने नई कहानी की वैचारिक भूमि पहले ही स्थापित कर दी थी। अमरकांत की कहानी ‘डिप्टी कलक्टरी’ और कमलेश्वर की कहानी ‘राजा निरबंसिया’ लिखी जा चुकी थीं। इसी क्रम में मोहन राकेश का कहानी संग्रह ‘नए बादल’ सन् 1956 में आया। इसी दौर में निर्मल वर्मा की कहानी ‘परिंदे’ और भुवनेश्वर की कहानी ‘भेड़िये’ और उषा प्रियंवदा की कहानी ‘वापसी’ पर चर्चाएं शुरू हो चुकी थीं। इन्हीं कहानियों को नई कहानी की प्रारंभिक कहानियों में गिना जाता है। इनके अलावा ‘कहानी’ और ‘नई कहानियां’ पत्रिकाओं ने इस आंदोलन की अधिकारिक रूप से घोषित पत्रिका थी। 

नई कहानी के मूल बिन्दुओं को अपने अवचेतन में ग्रहण करते हुए दीपक शर्मा ने अपना कथा संसार रचा उसमें सच के उद्घाटन का तीव्र आग्रह दिखाई देता है। उदाहरण के लिए इसी संग्रह की दूसरी कहानी ‘‘प्रेत छाया’’ अतीत में सन् 1928 में ले जाती है जब देश में साईमन कमीशन का लागू किए जाने का जम कर विरोध हो रहा था। लोग खुली सड़कों पर भीड़ की शक़्ल में निकल कर अपनी शक्ति का प्रदर्शन कर रहे थे। मगर भीड़ हमेशा अनेक चेहरे लिए होती है। ‘‘गो साईमन गो’’ की नारे लगाती भीड में एक लड़के ने अपनी जाई और बहन को खो दिया था। अब जब वह लड़का चेचक की बीमारी से ग्रस्त हो कर आईसोलेशन के दिन काट रहा होता है तो उसे महसूस होता है कि उसकी जाई उससे मिलने आई है, एक प्रेतछाया की भांति। अपनों को खोने की पीड़ा और एक उद्देश्यपूर्ण देशव्यापी विरोध के बीच की अंतर्कथा। यह कहानी अपने छोटे से आकार में बड़ी-सी कथा समेटे हुए है, गोया यह कहानी नहीं अपितु एक ‘मेमोरी चिप’ हो। 

संग्रह में एक कहानी है ‘‘मां का दमा’’। यह सूत और सूती कपड़ा डाई करने वाले कारखाने में काम करने वाली स्त्रियों में से एक मंा की कहानी है। अस्वस्थकर वातावरण में काम करती महिलाएं चौतरफा मुसीबतें झेलती हैं। बेटे की ओर से कही गई इस कहानी में बेटा बताता है कि उसकी मां को दमा हो गया था जिस पर उसके पिता मां को ‘‘घोंघी’’ कह कर पुकारते थे। मां की पीड़ा का अपमान करता सम्बोधन। जबकि इसमें भला मां का क्या दोष था? लड़के ने स्वयं अपनी आंखों से कारखाने की दशा देखी थी-‘‘मां के कारखाने में काम चालू है। गेट पर मां का पता पूछने पर मुझे बताया जाता है, वे दूसरे हॉल में मिलेंगी, जहां केवल स्त्रियां काम करती हैं। जिज्ञासावश मैं पहले हॉल में जा टपकता हूं। यह दो भागों में बंटा है। एक भाग में गट्ठों में कस कर लिपटाई गई ओटी हुई कपास मशीनों में चढ़ कर तेजी से सूत में बदल रही है, तो दूसरे भाग में बंधे सूत के गट्ठर करघों में सवार हो कर सूती कपड़ों का रूप धारण कर रहे हैं। यहां सभी कारीगर पुरुष हैं। ...दूसरे हॉल का दरवाज़ा पार करते ही क्लोरीन की तीखी बू मुझसे आन टकराती है। भाप की कई-कई ताप तरंगों के संग मेरी नाक और आंखें बहने लगती हैं। थोड़ा प्रकृतिस्थ हो कर देखता हूं, भाप एक चौकोर हौज से मेरी ओर लपक रही है। हौज में बल्लों के सहारे सूती कपड़े की अट्टियां नीचे भेजी जा रही हैं। हॉल में स्त्रियां ही स्त्रियां हैं। उन्हीं में से कुछ ने अपने चेहरों पर मास्क पहन रखे हैं, ऑपरेशन करते समय डॉक्टरों और नर्सों जैसे।’’

स्वास्थ्य के लिए ऐसे घातक वातावरण में काम करने वाली स्त्रियों की पीड़ा को उनके निकट जा कर महसूस करने के बाद लिखी गई कहानी स्त्रीविमर्श का एक अलग ककहरा रचती है। 

दीपक शर्मा की संवेदनशीलता अपनी हर कहानी की भांति इस कहानी में भी बखूबी उभर की सामने आई है। कहानी ‘‘बापवाली’’ स्त्री के प्रति होने वाले घरेलू अत्याचारों का लेखा-जोखा सामने रखती है तो कहानी ‘‘ऊंट की पीठ’’ दहेज-लोलुपता और इस कुप्रथा को सवीकार करने वाले एक आम से पिता की मन को आलोड़ित करने वाली कहानी है।

कहानी ‘‘पुरानी फांक’’ संबंधों के जटिल समीकरण की अनूठी कहानी है। इस कहानी का एक संवाद देखिए जो अपने-आप में बहुत कुछ उद्घाटित करने में सक्षम है-

‘‘तुम्हें अपने वर्तमान को अनुभवों से भर लेना चाहिए।‘‘ सुहास मेरी ओर देख कर मुस्कुराता है,‘‘चूंकि तुम्हारे पास नए अनुभवों की कमी है, इसलिए तुम आने वाले अनुभवों को मनगढ़ंतपूर्वक धरण करती हो या फिर बीत चुके अनुभवों का पुनर्धारण। तुम्हें केवल अपने वर्तमान को भरना चाहिए।’’

‘‘वर्तमान?’’ घबराकर मैं अपनी आंखें मंजू दीदी के चेहरे पर गड़ा लेती हूं। मेरा वर्तमान? खिड़की के उस तरफ का एक भीषण रणक्षेत्र? और इस तरफ एक तलाक़शुदा छब्बीस वर्षीय रईसज़ादे के साथ एक कच्चा रिश्ता? दोनों तरफ एक ठीठ अंधेरा।’’

लेखिका ने मानवीय संबंधों के ज्यामितीय समीकरणों को ‘‘माना कि’’ की कल्पना से परे हट कर यथार्थ के पैमाने से नापते हुए प्रस्तुत किया है। कहानी ‘‘पिछली घास’’ इसका एक बेहतरीन उदाहरण है। पांच संतानों वाला परिवार। जिसमें पिता की देहलोलुपता एक विध्वंस रचती है। पिता एक रिश्तेदार लड़की से बलात संबंध बनाता है जिसके परिणामस्वरूप छठीं संतान का जन्म होता है। उस लड़की और छठी संतान को पिता अपनी पत्नी और बेटी के रूप में अपना लेता है किन्तु बेटे के लिए यह सब सहज नहीं है। वह विद्रोही हो उठता है। पिता की धौंस से त्रस्त हो कर पिता को पुलिस की धमकी देता है, लिहाज़ा पिता अपनी वास्तविक पत्नी और पांचों बच्चों को छोड़ कर अपनी अवैध पत्नी और छठी संतान को ले कर फरार हो जाता है। इसके बाद वह परिवार संकटों के किस मुहाने पर जा खड़ा होता है और कैसे उनके सपनों की पर्तें उधड़ती चली जाती हैं, इसे कहानी को पढ़ कर ही अनुभव किया जा सकता है। 

संग्रह की कहानियों में लेखिका का एक काल्पनिक स्थान है-कस्बापुर। यह स्थान गांव है, कस्बा, है शहर है और यहां तक कि देश का प्रतिबिम्ब भी है। कस्बापुर एक ऐसा गह्वर है जिसमें समाज की सारी समस्याएं और विडम्बनाएं समाई हुई हैं। एक जाना-पहचाना संसार रचता है कस्बापुर, जो संग्रह की कई कहानियों में मौजूद है। दीपक शर्मा भाषाई मायाजाल नहीं रचती हैं, वे सरल, बोलचाल के शब्दों में अपनी कहानियां लिखती हैं। हिन्दी, उर्दू, अंग्रेजी, अवधी, पंजाबी के शब्द बिना किसी विशेष आग्रह के स्वाभाविक रूप से अपनी जगह लेते जाते हैं। यही उनकी कहानियों का भाषाई सौंदर्य है जो कहानियों को एक प्रवाह में पठनीय बना देता है। कुल मिला कर ‘‘पिछली घास’’ को एक मूल्यावत्तापूर्ण कहानी संग्रह कहा जा सकता है।            

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Tuesday, July 28, 2026

पुस्तक समीक्षा | बुंदेली की समृद्धि का परिचायक है समय के पन्नों में दबा ‘मंगा’ | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

पुस्तक समीक्षा 
बुंदेली की समृद्धि का परिचायक है समय के पन्नों में दबा ‘मंगा’
- समीक्षक डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
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खंडकाव्य    - मंगा (बुंदेली बोली का हास्य प्रधान प्रथम खण्ड काव्य)
लेखक      - श्री बाबू लाल खरे
प्रकाशक    - स्क्राईब पब्लिकेशन्स 303, कुबेर हाउस 162, कंचनबाग, इन्दौर (म.प्र.)
मूल्य       - 150/-
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बुंदेली में वर्षों से प्रचुर मात्रा में साहित्य लिखा जा रहा है विशेष रूप से पद्य साहित्य। किंतु बहुत सा साहित्य ऐसा रहा जो प्रकाश में नहीं आ सका। डॉ बहादुर सिंह परमार जैसे मनीषी जो बुंदेली संस्कृति और भाषा के उत्थान में निरंतर लगे हुए हैं, उन्होंने बहुत से ऐसी  पांडुलिपियां ढूंढ निकालीं जो अप्रकाशित अवस्था में साहित्यकारों के वंशजों के पास मौजूद थीं। उनके वंशज नहीं जानते थे कि उस कृति को किस तरह से प्रकाशित किया जाए अथवा कई वंशजों को इस बात की जानकारी नहीं थी कि वह साहित्य कितना महत्वपूर्ण है। इसी प्रकार बुंदेली में लिखी गई कई पुस्तक ऐसी हैं जो प्रकाशित तो हुई किंतु जिन पर पर्याप्त चर्चा होनी चाहिए थी अथवा वे पाठकों के हाथ में पहुंचनी चाहिए थी किंतु नहीं पहुंच सकीं। ऐसी ही एक पुस्तक की जानकारी मुझे पिछले दिनों प्राप्त हुई। अनायास शशी खरे जी जोकि रायपुर में निवासरत हैं और  स्वयं साहित्यकार हैं, उनसे मेरा संपर्क हुआ। चर्चा के दौरान उन्होंने मुझे बताया कि उनके पिताश्री ने बुंदेली में प्रथम हास्य खंडकाव्य लिखा था जो प्रकाशित भी हुआ। उसके कुछ अंश आकाशवाणी भोपाल से प्रसारित हुए। डॉ हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय सागर के प्राध्यापक डॉ बलभद्र तिवारी ने अपने ग्रंथ में उसका उल्लेख भी किया। फिर भी यह खंडकाव्य उतना चर्चित नहीं हो सका कितना कि उसे होना चाहिए था। दुर्भाग्य से पुस्तक प्रकाशित होने से पूर्व उसके रचनाकार दिवंगत हो गए, किंतु सुधि परिजन ने उस खंड काव्य को सुरुचि पूर्वक प्रकाशित कराया। खंडकाव्य का नाम है “मंगा”। 
 इस खंडकाव्य की विशेष बात यह भी है कि इसमें सागर की बुंदेली बोली का प्रयोग हुआ है क्योंकि रचयिता डॉ खरे सागर जिले के निवासी थे। श्री बाबू लाल खरे का जन्म मध्यप्रदेश के सागर जिले की रहली तहसील में स्थित चरगुवां नामक एक छोटे से ग्राम में 11 नवम्बर 1917 को हुआ। पिता का नाम श्री भगवानदास तथा माता श्रीमती लक्ष्मीबाई था। धनाभाव तथा उस समय आसपास कोई उच्च शिक्षा की सुविधा वाले शिक्षालय के अभाव के कारण इन्हे ग्राम से दो मील दूर स्थित गौरझामर के मिडिल स्कूल में केवल सातवीं (हिन्दी) तक ही शिक्षा प्राप्त करने का सुयोग प्राप्त हो सका। शिक्षाकाल में ये प्रायमरी से लेकर अन्त तक अपनी कक्षा में सदा प्रथम स्थान और प्रथम श्रेणी प्राप्त करते रहे। सन् 1933 ई. में नार्मल स्कूल बिलासपुर की प्रवेश परीक्षा में सागर जिले से केवल दो छात्र चुने गए, जिनमें से एक बाबू लाल थे। प्रायमरी टीचर्स ट्रेनिंग परीक्षा में पूरे मध्यप्रदेश व बरार में प्रथम श्रेणी में प्रथम स्थान प्राप्त कर उन्होंने ‘‘स्पेन्स मैडल’’ प्राप्त किया। जून 1935 में थोड़े दिनों तक  मिडिल स्कूल तखतपूर (बिलासपुर) में, अगस्त 1936 से म्युनिसिपल प्राथमिक शाला देवालानाका सागर में और दिसम्बर 1936 में गवर्नमेन्ट केन्टोन्मेन्ट स्कूल नं. 1, सदर बाजार सागर में अध्यापक रहने के पश्चात् ये सन् 1948 में नार्मल स्कूल सागर के प्रेक्टिसिंग स्कूल में अधिपाठक के रूप में स्थानान्तरित हुए। सन् 1940 में पिता के स्वर्गवासी होने से एक बड़े परिवार के पालन और शिक्षण का भार इन पर आ जाने के कारण इन्हें अत्यधिक अर्थाभाव रूग्णता और चिन्ताओं से अत्यधिक कष्ट झेलना पड़े। तीन छोटे भाईयों और दो बहनों की शिक्षा तथा विवाह के उत्तरदायित्व से निवृत हो कर बाबू लाल खरे ने सन् 1949 से स्वध्यायी छात्र के रूप में विशारद तथा मैट्रिक परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। फलतः नार्मल स्कूल में अध्यापक के पद पर पदोन्नति मिली। इसके पश्चात् उन्होंने साहित्य रत्न तथा सागर विश्वविद्यालय से इन्टर, बी.ए. तथा एम.ए. की परीक्षाएं प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। इन्टर तथा एम.ए. में इन्होंने विश्वविद्यालय में प्रथम तथा बी.ए. में चतुर्थ स्थान प्राप्त किया। सन् 1956 में एम.ए. करने के पश्चात् इन्होंने पी.जी.बी.टी. कालेज जबलपुर से वी.टी. (बेसिक) परीक्षा (सन् 1957) में सिद्धान्त तथा प्रयोग दोनों में प्रथम श्रेणी तथा विश्वविद्यालय में प्रथम स्थान प्राप्त करते हुए उत्तीर्ण की तथा विश्वविद्यालय स्वर्ण पदक प्राप्त किया। अगस्त 1957 में म.प्र. लोक सेवा आयोग द्वारा चयन के उपरांत शासकीय महाविद्यालय में व्याख्याता के पद पर चयन हुआ। इसके उपरांत विभिन्न शासकीय महाविद्यालयों में असि. प्रोफेसर एवं अध्यक्ष हिन्दी विभाग के पद पर कार्य किया। कुछ अवधि के लिए शासकीय महाविद्यालय में प्रभारी प्राचार्य के रूप में कार्य भी किया। बाबू लाल खरे ने ‘‘रस सिद्धान्त की परम्परा तथा शुक्लोत्तर हिन्दी समीक्षा’’ विषय पर विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन के तत्कालीन उप-कुलपति डॉ. शिव मंगल सिंह सुमन के मार्ग-दर्शन में शोध कार्य प्रारंभ किया। दुर्भाग्यवश जिसके पूर्ण होने के पूर्व ही बाबू लाल खरे का निधन हो गया।  बाबू लाल खरे  का खंड काव्य “मंगा”  हास्यरस का होते हुए भी सामाजिक यथार्थ  कुछ चुटीले अंदाज में सामने रखता है।  इस खंडकाव्य में मुहावरेदार भाषा का स्वरूप और सहज भावभिव्यंजना  अपना गहरा प्रभाव छोड़ती है। सन् 1946 में आरम्भ हुआ खंडकाव्य ‘‘मंगा’’ में 1972 तक कई और अध्याय जुड़ने के बाद पूर्ण हुआ। करीब साठ दशक पहले रचा गया यह हास्य खण्ड काव्य आज भी समसामयिक व सटीक लगता है। इसमें खांटी व्यंजनात्मकता है, शिष्ट हास्य है तथा बुंदेली रीति-रिवाज की आकर्षक झलक है। 
‘‘मंगा’’ कथा है, बुंदेलखंड के सीधे-साधे, ग्रामीण परिवेश में पले बढ़े, आलसी, अनपढ़ इंसान मंगा की। मंगा मेहनत नहीं करना चाहता है लेकिन ज़िन्दगी आराम से गुजारना चाहता है। इसीलिए दो स्त्रियों का पति बन कर उनकी मेहनत व कमाई के बूते चैन की जिंदगी गुजारने की उसकी इच्छा उस पर भारी पड़ती है। अपनी दुर्दशा से उबर कर, सही राह पर, मंगा किस तरह आता है, यही इस काव्य का मूल कथानक है। इस काव्य में संवाद भी हैं जो हास्य रस उत्पन्न करने में सक्षम हैं। व्यंग भी है और छिपा संदेश भी। कई स्थानों पर तो पढ़ कर हंसी रोके नहीं रुकती है। बानगी देखिए -
काट कूट कें गऔ सपरबे 
नरवा में जब बौ बूड़ौ, 
हाँत पाँव गये ठिठुर
काए कै पानी तौ बिकटई जूड़ौं।
सपरखोर कें मंगा नें, 
चाही कै बजाएँ हम बाजौ,
ठिठुरे हाँ ता बजी नें चुटकी,
अरे राम, हो गऔ का जौ!
पानी में गिर गऔ-जान कें 
झार चुटैया सें छूटी, 
इत्ती महँगी चीज हिरानी 
अरे बाप! किस्मत फूटी।
(पृ 9)
अनाज समाप्त हो जाने पर आलसी मंगा से उसकी पत्नी मुलिया अनाज लाने को कहती है लेकिन मंगा उसकी अनसुनी कर देता है तब मुलिया उसे खरी-खोटी सुनाती है। इस दृश्य में एक स्त्री के सहज भाव हैं जो अलसी पति से तंग आ चुकी है-
मुलिया बोली, का कएं तुमसें, कैसें हम जे दिन काटें।
कौन करम के है, तुमखों का हम बैठे-बैठे चाटें।
पुरुष प्रधान समाज की इस विडम्बना को कवि ने बड़ी बारीकी से प्रस्तुत कर दिया है कि पुरुष चाहे काम करे या न करे, दोष स्त्री के सिर पर ही मढ़ा जाता है। इसीलिए मुलिया की बात सुन कर मंगा अकड़ दिखाते हुए कहता है-
मंगा बोलौ - इतै पेट में कूँदत खूब बिलैयें हैं।
तें बैठी है सास्तर पड़बे कैसीं बरै लुगैयें हैं!
पहर भरे सें चल रइ तोरे थूथर की पैनी कैंची।
भाजी सी पौलबे खंगी है सोचत नइँ ऊँची-नैंची ।।
मुलिया की गुस्साँ बड़ बैठी जो मंगा नें दै डाँटौ ।
रोउन लगी, कही मंगा नें-पटा डार तें तौ भाटौं ।।
गोरा नोंनें भलाँ लुगाईं उनकीं रोउत तौ नइयाँ ।
जब देखौ घूमत बजार में डारें बइँयाँ में बइँयाँ ।।
चुवन लगत हैं तोरे नैनाँ तनक-तनक सी बातों में।
अब जानी कै लातों की देवी नें मान है बातों में।।
(पृ 34)
यानी चित भी मेरी, पट भी मेरी। जब मुलिया के पास दाल नहीं गलती है तो मंगा गंगिया के आगे हाथ फैलाता लेकिन सीधे-सीधे नहीं, वरन प्रेम जताने का नाटक करते हुए-
अरे, प्रेम के भूके हैं हम तौ, सुन ले मोरी गंगा!
छोड़ौ बातें, खाबे दे जो हो बै सो, - बोलौ मंगा ।।
पानी-पानी भई गंगिया सुन कें बातें भोरी-सीं ।
खुवा खूब पकवान, मिठाई बचत हती जो थोरी सी ।।
रहे कछू दिन इतै मजे में फ़िर आ गई फाँके-मस्ती ।
मंगा नें सोची कै- जा तौ जुगत मिली अच्छी सस्ती ।।
थोरौ-भौत कछू तौ मुलिया नें जोरौ हुइऐ अब लौं ।
उतै कछू दिन रहौ, गंगिया लैहै जोर कछू जब लौं ।।
सो गंगा सें लड़े और मुलिया के घर फिर कें आये।
ऐंसई पारी-पारी सें दोई के खूब प्रान खाये ।।
(पृ 60)
‘‘मंगा’’ एक ऐसा खंडकाव्य है जो प्रकाशित हो कर भी पर्याप्त चर्चा में नहीं आ पाया। किन्तु अच्छी कृति पानी की भांति देर-सबेर अपना रास्ता ढूंढ ही लेती है। प्रकाशन के बाद नेपथ्य में अर्थात समय के पन्नों में दब जाने के बाद एक बार फिर ‘‘मंगा’’ ने पाठकों के घर के दरवाजे पर दस्तक दी है। बुंदेली को समृद्ध करने वाली यह कृति बुंदेली के हर पाठक के लिए रोचक एवं हास्य से भरपूर है। इसमें बुंदेली की सोधी महक है और मिठास के साथ मिलनसारिता भी है। इस खंड काव्य की सबसे बड़ी विशेषता यह भी है कि इसमें हर पन्ने पर फुटनोट्स में बुंदेली के हिन्दी शब्दार्थ दिए गए हैं। बुंदेली साहित्य की समृद्धि को जानने के लिए स्व. बाबू लाल खरे की इस कृति को अवश्य पढ़ा जाना चाहिए। 
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आचरण,  28.07.2026
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Tuesday, July 21, 2026

पुस्तक समीक्षा | छोटी बड़ी इबारतें : साहित्य की इबारतें भी इतिहास रचती हैं | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

पुस्तक समीक्षा 
छोटी बड़ी इबारतें : साहित्य की इबारतें भी इतिहास रचती हैं
- समीक्षक डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
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पुस्तक      - छोटी बड़ी इबारतें
लेखक      - हरजिंदर सिंह सेठी
प्रकाशक  - न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन, सी-515, बुद्ध नगर, इंद्रपुरी, नई दिल्ली -110012
मूल्य        - 399/-
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साहित्य की इबारतें भी इतिहास रचती हैं, समय का इतिहास, संवेदनाओं का इतिहास, भावनाओं का इतिहास। शैली कोई भी हो सकती है गद्य या पद्य, या दोनों। जो साहित्यिक कृति मन को छू लेती है विचारों को आंदोलन कर देती है, वही इतिहास की तरह मानस के दस्तावेज में ढल जाती है। ‘‘इबारत’’ का शाब्दिक अर्थ है लिखावट, लेख, या गद्यांश। यह अरबी मूल का शब्द है जिसका प्रयोग अक्सर किसी दस्तावेज़, पुस्तक, या आलेख में लिखे गए शब्दों या वाक्यों की संरचना को दर्शाने के लिए किया जाता है। चर्चित वरिष्ठ लेखक हरजिंदर सिंह सेठी ने ऐसी ही इतिहास रचने वाली कृतियों एवं मुंबई की साहित्यिक उपलब्धियों पर अपने विचारों को संग्रह का रूप दे कर अपने आप में एक दस्तावेज रच दिया है। इसमें उनके द्वारा की गई समीक्षाएं, लेख एवं अनुशीलन भी है। साथ उन महत्वपूर्ण बिन्दुओं का विवरण है जिन्होंने मुंबई को निरंतर साहित्यिक वातावरण दिया। हरजिंदर सिंह सेठी की इस पुस्तक का नाम है- ‘‘छोटी बड़ी इबारतें’’। 
      इस पुस्तक में विचारों का एक सुरुचि पूर्ण संवाद है जो साहित्य के विविध व्यक्तित्व एवं उनकी सृजनधर्मिता से परिचित कराने के साथ ही तत्संबंधी वातावरण तैयार करने वाले कारकों की ओर भी ध्यान आकर्षित करता है। इस दृष्टि से ‘‘छोटी बड़ी इबारतें’’ मायानगरी मुंबई और आर्थिक केन्द्र मुंबई के साहित्यिक पक्ष से गहराई से परिचित कराती है।
      22 जुलाई 1947 को गाजियाबाद (उ.प्र.) में जन्मे हरजिंदर सिंह सेठी की शिक्षा मुंबई में हुई और उनका कार्यक्षेत्र भी मुम्बई रहा। उनकी पहचान एक प्रगतिशील चेतना के लेखक एवं कवि के रूप में है। उनके लेखन में विषय की बहुत विविधता है। उनकी प्रकाशित पुस्तकें हैं- गुरु तेग बहादुर एक युग व्यक्तित्व (जीवनी) 1995, यह चुप रहने का समय नहीं (कविता संग्रह) 2000, सौ सवाल सौ जवाब (इतिहास) 2003, कुछ किताबें कुछ लोग (समीक्षा संस्मरण) 2011, नामदेव वाणी: व्याख्या विवेचन (अध्ययन) 2015, बादशाह दरवेश (जीवन गाथा) 2017, मेरी धरती के लोग (कविता संग्रह) 2025। कुछ रचनाओं का प्रकाशन पंजाबी एवं गुजराती में भी। इनमें से गुरु तेग बहादुर एक युग व्यक्तित्व (जीवनी) तथा मेरी धरती के लोग (कविता संग्रह) मैंने पढ़ा है तथा कविताओं की समीक्षा भी की है। उनका लेखन प्रभावी है। लेखन के साथ ही कुछ महत्वपूर्ण सम्पादन भी किए हैं जिनमें हैं- ‘‘पानी के ताप में’’ भगवत लाल उत्पल की कविताओं का सम्पादन (1996), ‘‘मेरे मन सांझ हुई’’ डॉ. रविनाथ सिंह की कविताओं का सम्पादन (2007) एवं ‘‘एन.बी. सिंह नादान की चुनिंदा गजलें’’ (2025)। हरजिंदर सिंह सेठी को संपादन एवं साहित्य सृजन के लिए अनेक सम्मान एवं पुरस्कार मिले हैं जिनमें महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी द्वारा काका कालेलकर पुरस्कार-1997 तथा महाराष्ट्र राज्य हिंदी अकादमी द्वारा आचार्य नंद दुलारे बाजपेयी पुरस्कार-
2013 शामिल हैं।
     ‘‘आ से आरम्भ’’ शीर्षक से पुस्तक की भूमिका में उन्होंने लिखा है कि ‘‘सन् 2011 में मेरी पुस्तक ‘‘कुछ किताबें कुछ लोग’’ प्रकाशित हुई थी जिसमें विभिन्न विधाओं की 28 पुस्तकें एवं साहित्य के क्षेत्र से जुड़े पांच व्यक्तियों पर लिखे गये आलेख शामिल थे, जिसे पाठकों और समीक्षकों से भरपूर सराहना मिली थी। उस किताब की चर्चा-गोष्ठी में कवि-समीक्षक विजय बहादुर सिंह, उपन्यासकार-कवि विनोद कुमार श्रीवास्तव, कवि-आलोचक विजय कुमार, कहानीकार हरियश राय, कवि-समीक्षक हृदयेश मयंक, राधेश्याम उपाध्याय, शैलेश सिंह, रमेश राजहंस जैसे दिग्गज साहित्यकारों एवं विद्वतजनों ने अपना सकारात्मक मत व्यक्त कर मुझे संबल प्रदान किया। ‘‘छोटी बड़ी इबारतें’’ उसी क्रम की अगली कड़ी है। मुम्बई के साहित्यिक जगत में उठते-बैठते जो प्राप्त हुआ, उसे ही किताब के रूप में प्रस्तुत करने का उपक्रम है यह। कुछ कृतियों और कुछ स्मृतियों के बहाने समीक्षा, संस्मरण, निबंध, आलेख, टिप्पणियों के अतिरिक्त बीते समय की कुछ महत्वपूर्ण संस्थाओं, पत्रिकाओं और व्यक्तियों की चर्चा के साथ मुम्बई में लिखी जा रही कविता के इतिहास को सहेजने की कोशिश की गई है इसमें।’’
     पुस्तक में कुल 37 लेख हैं-आ से आरम्भ, ललद्यदःगाथा अद्भुत प्रेम की विश्वसनीय कवितायें, अंधेरे में रोशन चिराग, मुस्तहसन अज्.म की ग़ज़लें: एक नई उम्मीद की आहट, डॉ. बंसीधर पंडा - समय, समाज और परिवेश, विजय कुमार की कवितायें: प्रकृति, प्रेम और सौंदर्य का नियोजन स्वर्ग को जमीन पर उतार लाने की चाहत जीवन और समय को देखने की दृष्टि, ‘‘निर्वासिनी’’: नारी अस्मिता का आख्यान, पत्तों पर लिखी कवितायें: विजुअल पोएट्री का सर्जक, वैचारिक व्यंग्य की खुली किताब, अतीत के कुछ यादगार पन्ने, खामोशी की जुबां, ख्वाब ही बस देखते रह जायें क्या?, अक्षय जैन: सतत सक्रिय साहित्यिक सफर, आदमी को चाहिए एक मुट्ठी आसमान, अंधेरे में उजाले की उम्मीद भरी आश्वस्ति, नवगीत के उन्नायक: वीरेंद्र मिश्र, हृदयेश मयंक की कहानियां: स्मृतियों का आख्यान, गाथा एक निरासक्त कर्मयोगी की, पहाड़ की चिंता - चिंता का पहाड़, अपने समय का लेखा-जोखा, सपने, स्मृतियां, संघर्ष और प्रेम से रची कवितायें, दोहों में सिमटा कालखंड, इंसान और इंसानियत की पैरवी करती ग़ज़लें, डॉ. धर्मवीर भारती के साथ कुछ पल, तबले पर उंगलियों की जादुई थाप, एक यादगार शाम, मेघबिंदु, साहित्य सहकार, तथापि, मुम्बई की पंजाबी साहित्यिक संस्थायें, कविता मुम्बई: एक पुनरावलोकन, दो कदम हम भी चले एवं मुम्बई की लघु साहित्यिक पत्रिकायें।
पुस्तक के सभी लेखों पर यदि बारीकी से दृष्टिपात किया जाए तो उनके विषय की विविधा, जानकारी की सम्पन्नता और समय की लिपिबद्धता को स्पष्ट रूप से महसूस किया जा सकता है। जैसे पहला ही लेख ‘‘ललद्यद: गाथा अद्भुत प्रेम की’’ कश्मीरी कवयित्री कवयित्री ललद्यद के व्यक्तित्व और कृतित्व से परिचित कराता है। इस लेख में हरजिंदर सिंह सेठी लिखते हैं कि -‘‘कश्मीर में लगभग मिथक बन चुकी, सात सौ वर्ष पूर्व जन्मी, कश्मीरी भाषा की आद्य संत कवयित्री ललद्यद को कुछ लोग कवयित्री कहते हैं, कुछ विदुषी एवं ज्ञानवती, कुछ दैवी शक्ति, कुछ योगिनी, कुछ तपस्विनी, कुछ सूफी फकीर, तो कुछ लोग उसे शिव भक्त मानते हैं। पर यह तो स्वयं सिद्ध है कि उसके द्वारा रचित ‘‘वाख’’ (पद) कश्मीरी भाषा की प्रारंभिक रचनायें हैं, एवं वर्तमान कश्मीरी साहित्य की महत्वपूर्ण धरोहर। आध्यात्मिक स्वर से मुखरित ये गीत जीवन, योग, सहजोपासना, ईश्वर, धर्म, दर्शन एवं आत्मा के संदर्भ में कहे गये हैं। इनमें भक्ति और ज्ञान से अखंड-अव्यक्त स्वरूप का साक्षात्कार किया गया है। लल अद्वैतवादी और पूर्ण रूप से एक ब्रह्म में विश्वास रखने वाली कवयित्री रही है। वर्षों से उनके वाख लोगों की जुबान पर चढ़े हैं, अपितु उनके जीवन में, उनके दिलों में रच-बस गये हैं। आम कश्मीरी नागरिक की मानसिकता पर उनका गहरा प्रभाव है। वस्तुतः यह एक समीक्षा लेख है जिसमें वेदराही के उपन्यास ‘‘ललद्यद’’ की समीक्षा की गई है। लेखक ने उपन्यास के बारे में लिखा है कि ‘‘हिंदी में उनके बारे में कोई विशेष जानकारी उपलब्ध नहीं है। इस कमी को पूरा करता है वेद राही का उपन्यास ‘‘ललद्यद’’ जो उसके जीवन, रहन-सहन, उसके समय, सामाजिक दशा, राजनीतिक परिस्थितियों एवं उसकी कविताओं को आधार बना कर बड़ी शोध, मेहनत, निष्ठा और ईमानदारी से लिखा गया है। अपनी अनूठी लेखन शैली, रवानी एवं पठनीयता के कारण यह उपन्यास बड़ा अद्भुत बन पड़ा है।’’
      एक समीक्षात्मक लेख हृदयेश मयंक की कविताओं पर है। इसमें हजजिंदर सिंह लिखते हैं कि ‘‘लगभग आधी शताब्दी बीत गई, हृदयेश मयंक को कविता के साथ विचरण करते हुए। जनधर्मी प्रतिबद्धता और जन जीवन से गहरा सरोकार रखने वाले कवि मयंक की काव्य यात्रा मैं शहर और सूरज, सायरन से सन्नाटे तक, युद्ध में शामिल नहीं थीं चिड़ियां, ठहराव के विरुद्ध, अभी भी बचा हुआ है बहुत कुछ, हम ये जो मिट्टी के बने हैं, अपने हिस्से की धूप, दिल से निकली दिल की बात, एक महक सोंधी माटी की के पड़ाव पार करती हुई अनवरत जारी है। इधर उनकी ‘‘चयनित कविताओं’’ का संकलन प्रकाशित होकर आया है, जो उनकी पूरी यात्रा के विकास क्रम को दर्शाता है। ’’
कविताओं के साथ ही ग़ज़ल संग्रह पर भी हरजिंदर सिंह सेठी ने अपनी समीक्षात्मक कलम चलाई है। ‘‘मुस्तहसन अज़्म की ग़ज़लेंः एक नई उम्मीद की आहट’’ शीर्षक लेख में मुस्तहसन अज़्म की ग़ज़लों के बारे में वे लिखते हैं कि ‘‘मुस्तहसन अज़्म अपने रचनाकर्म के लिए निजी मुहावरे की तलाश करते हुए ग़ज़ल की परम्परा को आगे बढ़ाते हुए नजर आते हैं और ‘हमवार नहीं है कुछ भी’ नाम से अपना ग़ज़ल संग्रह लेकर आते हैं। आज के माहौल में यह शीर्षक बड़ा उचित जान पड़ता है। वर्तमान के पूरे परिदृश्य पर दृष्टि डालें, तो देखेंगे कि कुछ भी ठीक ठाक नहीं है।’’ वे आगे लिखते हैं-‘‘ऐसी स्थिति में मुस्तहसन अज़्म अपनी ग़ज़लों के माध्यम से बिगड़े वातावरण को संवारने की ख्वाहिश रखते हैं और सभी समस्याओं से निपटने के लिए जमीनी कार्यवाही की जरूरत पर बल देते हैं। शायर का हौसला इतना कि वह अकेला ही इस स्थिति से टकराने की जुर्रत करता है -
कदम जो बढ़ गये आगे तो रुक नहीं सकते 
सफर में साथ मेरे काफिला रहे न रहे।

     एक अन्य लेख में हरजिंदर सिंह सेठी ‘‘जीवन और समय को देखने की दृष्टि: डॉ. दलजीत सिंह की कवितायें’’ शीर्षक से उस कवि की कविताओं को प्रकाश में लाते हैं जो ‘‘डॉ. दलजीत सिंह नेत्र रोग विशेषज्ञ के रूप में संसार भर में विख्यात रहे हैं। सफेद मोतियाबिंद के आपरेशन के पश्चात आंखों में इंट्राओकुलर लेंस का प्रत्यारोपण करने वाले पहले भारतीय थे। उन्होंने मोतिया बिंद के एक लाख से अधिक आपरेशन कर और उनमें लेंस बिठा कर विश्व रिकार्ड बनाया। वे भारत के राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह के मानद सर्जन रहे।’’ ऐसे चिकित्सक के मन में सामाजिक विषमताओं, अभाव और अन्याय को लेकर कवि के भीतर एक गहरा असंतोष रहा है। -
बहुत जी करता है, 
सभी सोयों को जगा जाऊं, 
मकड़ी के जो जाले, पूरे देश को लगे हैं, 
एक तेज आंधी के साथ, 
जड़ों से उखाड़ ले जाऊं।

एक लेख संगीत मनीषी पर भी है। ‘‘तबले पर उंगलियों की जादुई थाप’’ में वे लिखते हैं कि सन् 1989 में अन्नु कपूर के ‘‘अंत्याक्षरी’’ कार्यक्रम के साथ टीवी पर शुरुवात करने के पश्चात उन्होंने ‘‘मेरी आवाज सुनो’’ में तबला वादन किया, पर उन्हें पहचान मिली शेखर सुमन के शो ‘शेकर एंड मूवर्स’ से। उसके बाद तो वे ग्रेट इंडियन लाफ्टर चौलेंज, नानसेंस अनलिमिटेड, कामेडी सर्कस, कपिल शर्मा शो आदि दर्जनों सीरियल्स में अपनी कला का जौहर दखाते हुए लगभग पैंतीस वर्षों से तबले की थाप के साथ लोगों के दिलों पर अपनी छाप छोड़ रहे हैं।’’

‘‘कविता मुम्बई: एक पुनरावलोकन’’ और ‘‘मुंबई की लघु साहित्यिक पत्रिकाएं’’ मुंबई के साहित्यिक इतिहास को सहेजते लेख हैं। दरअसल हरजिंदर सिंह सेठी की यह पुस्तक इस तथ्य को गाढ़ी स्याही से रेखांकित करती है कि साहित्य की इबारतें भी इतिहास रचती हैं। इसलिए इस पुस्तक की उपादेयता निर्विवाद है। यह कहना गलत नहीं होगा कि यदि मुंबई की साहित्यिक धारा को जानना और समझना है तो यह पुस्तक अपनी पूरी रोचकता के साथ नितांत उपयोगी ठहरती है।
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आचरण,  21.07.2026
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Tuesday, July 7, 2026

पुस्तक समीक्षा | लोक मिथक के मूल्य और सौंदर्य पर एक रोचक मीमांसा | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण


पुस्तक समीक्षा     
लोक मिथक के मूल्य और सौंदर्य पर एक रोचक मीमांसा
- समीक्षक डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
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पुस्तक  - लोक मिथक : मूल्य और सौंदर्य दृष्टि
लेखक    - श्यामसुंदर दुबे
प्रकाशक - विजया बुक्स, 1/10753 सुभाष पार्क, गली नं. 3, नवीन शाहदरा, दिल्ली-110032
मूल्य        - 450/-
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आज लोक संस्कृति संग्रहालयों की वस्तु बनती जा रही है। वर्तमान भौतिकवाद के लिए लोक संस्कृति भी एक बाज़ार की एक वस्तु है। वस्तुतः बाजार की संस्कृति ने लोक संस्कृति को भी बाजार की वस्तु बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। घर की बैठक में वर्ली आर्ट या मधुबनी कलम की पेंटिग लगा लेना ही संस्कृति को सहेजना नहीं होता है। लोक संस्कृति को सहेजने के लिए सबसे पहले जरूरी है लोक संस्कृति के स्वरूप को समझना। यह समझना आवश्यक है कि लोक संस्कृति मात्र एक शब्द नहीं है, यह एक समृद्ध परम्परा है जो विचार, शिल्प कथा, आस्था आदि विविध रूपों में उस समय से प्रवाहित है जब दुनिया में संस्कृतियों का विधिवत उद्भव ही नहीं हुआ था। लोक संस्कृति वस्तुतः मौलिक चेष्टाएं हैं जो कभी अभिव्यक्ति के माध्यम से तो कभी कला, कल्पना और आस्था के माध्यम से व्यक्त होती रही हैं। लोक संस्कृति पर एक बहुत महत्वपूर्ण पुस्तक है ‘‘लोक मिथक - मूल्य और सौंदर्य दृष्टि’’। इसके लेखक है प्रतिष्ठित संस्कृतिविद डॉ. श्यामसुंदर दुबे।


लोक संस्कृति में मिथक की उपस्थिति के संबंध में डॉ. श्यामसुंदर दुबे ने लिखा है कि ‘‘लोक-संस्कृति, मानवीय सौंदर्य चेतना का अक्षय स्रोत है। निःसर्ग और मनुष्य के सह समायोजन से अभिव्यक्त होने वाली लोक संस्कृति अपनी सामाजिकता में उदार आशयों वाली है। उसकी नैतिकता वैश्विक परिदृश्य में सृष्टि के समुचित संरक्षण से आविर्भूत है। लोक संस्कृति जितना मनुष्य को संरक्षणीय मानती है, उतना ही संरक्षणीय वह प्रकृति के प्रत्येक अंग को संरक्षणीय मानती है उसकी अभेद दृष्टि सर्वत्र सभी संदर्भों में एक ही चैतन्य को तलाशती है। यही वजह है कि उसमें मानवीय अंतर्दृष्टि के आलोक को हम प्रत्येक रचना-विधान में प्राप्त करते हैं।’’


लोक संस्कृति की अपनी अलग पहचान एवं विशेषता होती है इसका संबंध किसी देश व क्षेत्र विशेष के सामान्य जन समुदाय से होता है समाज में प्रचलित विभिन्न क्रियाकलाप परंपराएं अचार-विचार, संस्कार, प्रथाएं कर्मकांड, आस्था एवं विश्वास - लोक संस्कृति के आधारभूत तत्व हैं। संस्कृति व्यक्ति एवं समाज के विकास का परिचायक होती है। लोक जीवन इसी संस्कृति का अक्षय भंडार है। लोक संस्कृति समाज के सांस्कृतिक मूल्यों को आकार देती है। लोक संस्कृति विविधरूपों में आकार लेती रहती है। जैसे- लोक भाषा, लोक परंपरा, लोकनाट्य, लोकगीत, लोककला आदि। लोक परंपराओं के अंतर्गत विभिन्न प्रकार के व्रत, त्यौहार, प्रथाएं, मेले, रूढ़िया एवं संस्कार आते हैं, जिनके द्वारा समाज में उत्साह एवं विश्वास बना रहता है। लोक साहित्य लोक मानस की सहज एवं स्वाभाविक अभिव्यक्ति है यह प्राय अलिखित रहता है तथा वाचक परंपरा के द्वारा एक पीढ़ी से दूसरे पीढ़ी तक प्रवाहित होता है। लोक साहित्य परिभाषित भाषा शास्त्रीय रचना पद्धति एवं व्याकरणिक नियमों से रहित होता है, इसकी भाषा लोक भाषा होती है लोक साहित्य के अंतर्गत लोक गाथा, लोकगीत, लोक कथाएं, सुभाषित, पहेलियां, लोकोक्तियां, लोकनाट्य आदि आते हैं।


लेखक श्यामसुंदर दुबे ने अपनी पुस्तक ‘‘लोक मिथक - मूल्य और सौंदर्य दृष्टि’’ में लोक मिथक के मूल्य और सौंदर्य दृष्टि को व्याख्यायित करते हुए विस्तार से लोक के स्वरूप को सामने रखा है। उन्होंने अपनी पुस्तक के कलेवर को मुख्य तीन शीर्षकों एवं 25 लेखों में विभक्त किया है। ‘‘लोक-संस्कृति: विमर्श के नए आयाम’’ शीर्षक से दी गई भूमिका के उपरांत तीन मुख्य शीर्षक हैं- मिथकीय संरचना का संसार, जीवन-मूल्यों के आधार तथा कला-दृष्टियों का समाहार। इन तीन मुख्य शीर्षकों अथवा खंडों के अंतर्गत जो पच्चीस लेख हैं उनके मिथकीय संरचना का संसार के अंतर्गत हैं- लोक आख्यान और मिथक के अंतर्संबंध, भाषिक संरचना और लोक आख्यान, लोक आख्यान और आज का लेखन-कर्म, मिथक संरचना के आधारभूत बिंदु, लोक चित्र परंपरा के मिथकीय आधार, लोक-संस्कृति की भूमि पर लोक-विश्वासों की हरी दूब, लोक-प्रतीकों की अवधारणा, लोक-परंपरा और लोक-संस्कार, आदिम चित्रकला अभिप्रायों का संसार।
जीवन-मूल्यों के आधार के अंतर्गत हैं- लोक संस्कृति: मानव संसाधन का आधार, मानवीय मूल्य और लोक-साहित्य, लोक-साहित्य की मूल्य-चेतना, लोक-साहित्य: जीवन-मूल्य और भारतीयता,  लोक-संस्कृति में माधुर्य-बोध, लोक की सौंदर्यशास्त्रीय भूमिका।
कला-दृष्टियों का समाहार के अंर्तगत हैं- बोलियों और लोकगीतों का अंतर्संवादी स्वर, प्रदर्शनकारी लोक-कलाएं और जन-संचार माध्यम, लोक-लय के प्रयोग, लोक गायिकी: रंगतों का वर्णपट, लोक नृत्य ‘राई’, आल्हा परंपरा की उखड़ती सांसें, मिट्टी तेरे रूप अनेक: मृदा कला, लोक में बाजार और बाजार में लोक, हिंदी साहित्य की लोकधर्मिता, लोक-गाथा में निहित समकालीनता।


लोक आख्यान और मिथक के अंतर्संबंध की विवेचना करते हुए लेखक ने लिखा है कि -‘‘ प्रारंभिक मिथक रचनाओं में आदिम मनुष्य का भय उसकी प्रसन्नता, उसकी घृणा, उसका बैर आदि मनोभावों के प्रबल प्रवेग ने मानवीय और अतिमानवीय चरित्रों के साथ मानवेतर प्राणियों और वस्तु संदर्भों के बीच संबंधों का चक्र निर्मित किया।यह चक्र आख्यान के सूत्रों के रेशों की सघन बुनावट से बना था। इन रेशों की चमक से जो झकर-मकर करता स्पेस निर्मित हो रहा था उसकी उर्वर क्षमता को इस रूप में अनुभव किया जा सकता है कि हमारे निकट अतीत के अनेक घटना प्रसंग जब आख्यान बनने हेतु समुद्यत होते हैं, तब मिथक के आदिम अनुभव से वे उद्रेकित होने लगते हैं। मिथक रहस्य भावना की उपज भी माने जा सकते हैं।’’
भाषिक संरचना और लोक आख्यान के अंतर्संबंध के बारे में लेखक श्यामसुंदर दुबे का कहना है कि- ‘‘भाषिक संप्राप्ति के तत्काल बाद ही मनुष्य आख्यानपरकता की ओर उन्मुख हुआ होगा। भाषा की वृत्ति अपने-आपको अभिव्यक्त करने की चेष्टाओं का भले ही ध्वन्यात्मक परिणाम हो, किंतु भाषिक संरचना की लंबी जद्दोजहद में मनुष्य की आख्यान व्याकुलता ही क्रियाशील रही है। मनुष्य केवल इच्छित विषय की संकेतधर्मी परंपरा से संबंधित ध्वनि-पर्यायों से संतुष्ट नहीं रहा- ये पर्याय वस्तु-बिंब और उससे जुड़े तमाम क्रिया- व्यापारों की आख्यान केंद्रित इकाई की तरह निर्मित हुए हैं। इसलिए प्रत्येक शब्द एक आख्यायिका को अपने भीतर छिपाए हुए है।’’ इसी लेख में लोकबोलियों के संबंध में लेखक ने सोदाहरण लिखा है कि- ‘‘कम-से-कम संस्कृत भाषा की शब्द- संरचनाओं में धातु आधार तो हमारे अभिज्ञान में है ही। इसी क्रम में लोक-बोलियों का विकास हुआ और इन बोलियों के शब्दों का मूल, क्रिया-जन्य ही है। क्रिया मात्र ध्वनि नहीं है वह एक पूरा दृश्याख्यान है। मैं यहाँ एक शब्द ‘पत्र’ लेता हूँ- यह शब्द प्रारंभ में वृक्ष के पत्ते के पर्याय को व्यक्त करने वाला रहा है-फिर चिट्ठी, पन्ना आदि का अर्थ देने वाला बना। लोक बोली के पत्ते को आधार बनाकर एक रूपक रचा ‘पत्ता टूटा डाल से-उड़कर गया अकास’ डाल से पत्ता टूटा और हवा के झोंके के साथ उड़कर आकाशचारी बना। पत्र के मूल में पत् क्रिया है। डाल से पत्र टूटा और पृथ्वी की सतह पर गिरा गिरने से पत् की आवाज आई। इस क्रिया के पूर्व पत्ता-पत्ता नहीं था-एक क्रिया ने उसका नामकरण किया। क्रिया संपूर्ण इंद्रिय-संवेदी व्यापार है, टूटते हुए पत्ते के शेड्स की झलमलाहट, पत् ध्वनि का परिस्पंदन, पत्ते के ताजे डंठल से निर्गत गंध, पत्ते की कोमलता को छूने का भाव, पत्ते की ओक बनाकर तरल पदार्थ पीने का अनुभव - ये संपूर्ण संवेदनाएँ एक ध्वनि-बिंब’ में सिमट आईं।’’


लोक-परंपरा और लोक-संस्कार के पारस्परिक संबंध को स्पष्ट करते हुए लेखक ने लिखा है कि -‘‘लोक एक परंपरा है। परंपरा सतत विकसित मूल्य-बोध है। इसके सातत्य में सृजनमूलक समस्त अनुष्ठान अगली पीढ़ी के लिए हस्तांतरित होते रहते हैं और पीढ़ी-दर-पीढ़ी इसमें कुछ नया जुड़ता रहता है। परंपरा का विकास लगभग एक रैखिक होता है। चूँकि यह विकास है, इसलिए यह ऊर्ध्वगामी भी होता है। लोक में परंपरा का विकास एक तरह से सांस्कृतिक समुन्नयन भी है, इसलिए यह एक क्रियाशील जीवित प्रणाली है, जो सामाजिक प्रकार्यों को गति देती है। परंपरा का नाभिकेंद्र लोक है, अतः लोक के परिवृत्तों में जो परिवर्तन की ऊर्जा समाहित है, वह लोक की अभ्युदयमूलक सिसृक्षा है।’’


यह पुस्तक लोक मिथक को बीरीकी से समझाती है। डॉ. श्यामसुंदर दुबे स्वयं एक लोक संस्कृतिविद हैं अतः बुंदेली लोक संस्कृति के साथ ही उन्होंने देश की विभिन्न लोक संस्कृतियों का अध्ययन तथा उन पर लेखन किया है। सबसे अच्छी बात है कि जब वे लोक संस्कृति की चर्चा करते हैं अथवा उस पर कुछ लिखते हैं तो तथ्यात्मकरूप से लिखते हैं। अपनी इस पुस्तक में भी उन्होंने वैचारिक तर्कों के साथ लोकगीतों, लोककथाओं, लोकोक्तियों आदि के उदाहरण देकर विषय की व्याख्या की है। पुस्तक के प्रथम दो मुख्य शीर्षकों के अंतर्गत प्रस्तुत लेख समग्रता लिए हुए हैं। तीसरे कला-दृष्टियों का समाहार के अंर्तगत हैं रखे गए लेखों में मृदा कला,  हिंदी साहित्य की लोकधर्मिता आदि पर।
श्यामसुंदर दुबे के पास भाषाई समृद्धि है। संस्कृतनिष्ठ शब्दों से सुसम्पन्न उनकी भाषा उन लोगों को पर्याप्त भाषिक आनन्द देती है जो हिन्दी के श्रेष्ठ स्वरूप का रसास्वादन करना चाहते हैं किन्तु लोक एक ऐसा विषय है जिसमें हर तरह के पाठक वर्ग की रुचि हो सकती है। अतः पुस्तक की संस्कृतनिष्ठ भाषा उन पाठकों के लिए तनिक असुविधा पैदा कर सकती है जो संस्कृतनिष्ठ हिन्दी से दूर हैं। चूंकि यह पुस्तक लोक संस्कृति के लोक मिथक पर है अतः इसकी भाषा थोड़ी सरलीकृत होती तो और अधिक पाठकों के लिए सुविधाजनक होती। किन्तु इसमें कोई संदेह नहीं है कि यह पुस्तक सुधि पाठकों को लोक मिथक के सौंदर्य एवं स्वरूप से गहराई से भली-भांति परिचित कराने में सक्षम है। लोक संस्कृति अथवा संस्कृति में रुचि रखने वालों तथा उत्तम भाषा का रसास्वादन करने की इच्छा रखने वालों को इस पुस्तक को अवश्य ही पढ़ना चाहिए।   
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Tuesday, June 30, 2026

पुस्तक समीक्षा | स्त्री का असली घर तलाशती कहानियां | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण


पुस्तक समीक्षा
स्त्री का असली घर तलाशती कहानियां
समीक्षक - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
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कहानी संग्रह  - बीते लम्हे
लेखिका - श्रीमती संगीता चौबे
प्रकाशक - श्री नर्मदा प्रकाशन, शॉप नं. 16, आधारशिला कॉम्पलेस, अवधपुरी, भोपाल (म.प्र.) 462022
मूल्य   - 200/-
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   हिंदी कहानी का इतिहास बहुत लंबा नहीं है लेकिन जितना भी है वह बहुत परिपक्व और सधा हुआ है। बात आती है कहानी को लिखे जाने की कि एक कहानीकार कहानी क्यों लिखता है? क्या ज़रूरत है उसे कहानी लिखने की? तो इसका उत्तर यही है की एक कहानीकार अपने अनुभव, अपने आसपास के वातावरण- सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, धार्मिक आदि परिदृश्यों में से उन घटनाओं को चुनता है जो उसके मन को  किसी न किसी कारण छू जाती हैं। फिर वह उन्हें रोचक ढंग से अपनी कहानी में इस तरह से पिरोता है कि एक जिज्ञासा से कहानी आरंभ हो और क्लाइमेक्स पर जाकर समाप्त हो। यही तो मूल कहानी कला है।

      श्रीमती संगीता चौबे की कहानी संग्रह "बीते लम्हें" में उनकी 12 कहानियां  हैं। वे एक नवोदित कथाकार हैं। फिर भी संग्रह की पहली कहानी ही एक बहुत बड़ा प्रश्न उछालती है, एक ऐसा शाश्वत प्रश्न जो हर स्त्री अपने आप से पूछती है और साथ ही समाज से पूछना चाहती है कि एक बेटी का घर कौन-सा होता है मायका या ससुराल या दोनों नहीं? कहां होता है एक स्त्री का असली घर? मायके में निरंतर उसे स्मरण कराया जाता है कि वह पराए घर जाने वाली इंसान है, मायके में उसका कुछ भी नहीं है, जो कुछ है वह ससुराल में मिलेगा। फिर वही लड़की जब ससुराल पहुंचती है तो वहां उसे एहसास होता है कि वहां जो कुछ है वह सास, ससुर, ननद, देवर आदि का है। और तो और, उसके पति का भी है किंतु उसका अपना कुछ भी नहीं है। अपनी ससुराल में अपनी जगह तलाश करते-करते उम्र निकल जाती है और जब वह स्वयं सास बनने की उम्र में आती है तब कहीं जाकर उसे लगता है कि यह घर तो उसका अपना है जिसे छीनने उसकी बहू आ गई है। द्वंद यही से शुरू होता है किंतु संगीता चौबे ने अपनी कहानी में नायिका को सास की उम्र तक पहुंचने से पहले ही अपना घर ढूंढ लेने में सफलता दिला दी है। अर्थात यह कहानी एक रास्ता सुझाती है। कठिन ही सही लेकिन रास्ता तो है जो एक स्त्री को  अपने अस्तित्व को पहचानने में मदद करता है और उसे उसके वास्तविक घर तक पहुंचता है।

पुस्तक की प्रस्तावना में लेखिका संगीता चौबे ने अपनी कहानियों में स्त्री की उपस्थिति पर अपने विचार कुछ इस प्रकार रखे हैं - “नारी केवल सृष्टि की आधारशिला ही नहीं बल्कि संस्कार, शक्ति और संवेदना की जीवंत प्रतिमूर्ति है। जब एक महिला शिक्षित, आत्मवियश्वासी और आत्मनिर्भर बनती है, तब वह केवल स्वयं का ही नहीं परिवार, समाज और राष्ट्र का भी भविष्य संवारती है। ये कहानियां स्त्री के केवल संघर्ष को नहीं दर्शातीं, उसके आत्मबोध को भी जाग्रत करती हैं। जहां वह अपनी आत्म शक्ति को पहचान कर स्वयं अपना मार्ग प्रशस्त करती है।”

वही नर्मदा प्रकाशन के प्रकाशक सत्यम सिंह बघेल ने संगीता चौबे की कहानियों पर भूमिका के रूप में टिप्पणी की है कि “लेखिका ने इन कहानियों में न तो नाटकीय अतिरंजना की है, न ही उपदेशात्मकता का सहारा लिया। उन्होंने सरल, सहज और हृदयस्पर्शी भाषा में उन क्षणों को जीवंत किया है, जहाँ एक लड़की अपनी माँ से पूछती है, 'मेरा घर कहाँ है?', जहाँ एक शिक्षिका अपने अतीत के पेड़ के नीचे खड़ी होकर भविष्य की राह तलाशती है, और जहाँ स्वाभिमान की छोटी-छोटी चोटें स्त्री को नई ऊँचाई देते हैं। ये कहानियाँ "बीते लम्हे" हैं, परंतु इनमें भविष्य की दिशा भी छिपी है।”

दूसरी कहानी है “वह पलाश का पेड़”। यह एक प्रेम कथा है जो अपूर्ण होकर भी एक पूर्णता तक पहुंचती है। यह सुंदर कोमल कथा है।
       संग्रह की तीसरी कहानी है “स्वाभिमान” । इस कहानी में भी लेखिका ने स्त्री के अस्तित्व और उसका असली घर तलाशने में उसकी मदद की है। एक स्त्री अपने पारिवारिक दायित्वों में इस तरह डूब जाती है कि उसका अस्तित्व ही विलीन हो जाता है। फलां की मां, फलां की पत्नी, फलां की सास आदि-आदि संबोधन ही उसकी पहचान बन कर रह जाता है। ऐसी ही एक स्त्री की कथा है “स्वाभिमान” जो पूरी दृढ़ता के साथ अपने स्वाभिमान की ओर बढ़ती है।

चौथी कहानी है “हजारों में एक”। मैट्रिमोनियल कॉलम में अक्सर यह फरमाइश रहती है कि वधू चाहिए सुंदर, सुशील, गौरवर्ण, गृह कार्य में दक्ष। नौकरी पेशा भी चलेगी। यानी एक कंपलीट पैकेज बहू। लोग क्या सोचते हैं कि आज की महंगाई में पति-पत्नी दोनों कमाए तो घर अच्छे से चलता है लेकिन पत्नी के कमाने को महत्व के रूप में नहीं लिया जाता है। गोया वह कमा रही है तो अपनी मर्जी से और उसे कमाने दिया जा रहा है तो यह उसके ससुराल पक्ष की दयानयदारी है। सांवली या गहरे रंग की त्वचा वाली वधू किसी को नहीं चाहिए। यदि कोई गहरी रंगत वाली लड़की को अपने घर की बहू बनने के लिए राजी हो भी जाता है तो साथ में वह मोटा दहेज चाहता है। लेकिन हजारों में कोई एक ऐसा भी होता है जो त्वचा की रंगत नहीं बल्कि लड़की का मन और उसकी प्रतिभा देखता है।  यदि दहेज लोभियों के चक्कर में न पड़ा जाए और  प्रतीक्षा की जाए तो एक न एक दिन वह हज़ारों में एक मिल ही जाता है। यह एक आशावादी कहानी है।

संग्रह की पांचवी कहानी है “कैरी का अचार”। यदि स्वाद की भाषा में कहा जाए तो यह एक स्वादिष्ट कहानी है जिसमें खट्टा मीठा तीखा हर स्वाद मौजूद है। बिल्कुल कैरी के अचार की तरह।
छठीं कहानी है “अजनबी मित्र”। हम मनुष्य परस्पर एक दूसरे से बहुत कुछ सीखते रहते हैं। कुछ जानबूझकर, कुछ अनजाने में हम उनके विचारों के अनुरूप सोचने लगते हैं और उनके विचारों को आत्मसात कर लेते हैं। यह जरूरी नहीं है कि वे हमारे परिचित ही हों। कई बार हम अजनबियों से भी बहुत कुछ सीख लेते हैं। अक्सर ऐसा होता है यात्राओं के दौरान। जब हम किसी के साथ यात्रा कर रहे होते हैं जो नितांत अपरिचित है, बातचीत शुरू होती है। उसके विचारों का पता चलता है हम अपने विचार उसे साझा करते हैं फिर जाने अनजाने एक दूसरे के विचारों को हम प्रभावित कर बैठते हैं कुछ ऐसी ही कहानी है “अजनबी मित्र”।

सातवीं कहानी “संपूर्ण व्यक्तित्व” व्यक्ति की पूर्णता और अपूर्णता को रेखांकित करती है। यह कहा भी जाता है कि इंसान की सूरत इतनी मायने नहीं रखती जितनी सीरत मायने रखती है। साधारण सा दिखने वाला एक इंसान बहुत अच्छा व्यक्ति साबित हो सकता है जबकि वहीं एक बहुत सजधज के साथ रहने वाला हीरो जैसा इंसान वास्तविक चरित्र और व्यवहार में जीरो निकल सकता है। इस कहानी की नायिका का विवाह जिस व्यक्ति से तय किया जा रहा था और जिसने अपने आप को नायिका से श्रेष्ठ समझते हुए उसे लगभग ठुकरा दिया था कालांतर में वही व्यक्ति निम्न कोटि का साबित होता है। तब नायिका को लगता है की माता-पिता ने जिसे उसके लिए चुनकर उसका विवाह कराया वह देखने में भले ही साधारण है किंतु विशाल व्यक्तित्व का बल्कि संपूर्ण व्यक्तित्व का मालिक है क्योंकि उसके अंदर मानवता मौजूद है। यूं भी, यदि किसी मानव के भीतर मानवता नहीं है तो वह किसी भी कौन से मानवीय व्यक्तित्व का धनी हो ही नहीं सकता है यह कहानी यही संदेश देती है।

संग्रह की आठवीं कहानी है “फैसला”। एक गलत फैसला अगर जिंदगी बर्बाद कर सकता है तो एक सही फैसला जिंदगी को अर्थ प्रदान कर सकता है। सार्थक बन सकता है। यूं भी शादी का फैसला बहुत महत्वपूर्ण होता है और हमारे भारतीय समाज में अधिकतर यह फैसला माता-पिता के हाथों में ही होता है। कई बार माता पिता परिस्थितियों से प्रभावित होकर गलत फैसला ले लेते हैं और तब ऐसे में घर की बड़ी बेटी अगर वह कमाऊ है तो विवाह के मामले में सबसे अधिक अवहेलना का शिकार बनती है।  जो दायित्व माता-पिता को उठाना चाहिए वह बड़ी बेटी के कंधों पर लाद दिया जाता है और उस बड़ी बेटी को अपनी शादी की बारी आने की तब तक प्रतीक्षा करनी पड़ती है जब तक कि वह अपने छोटे भाई बहनों के विवाह के दायित्व से निवृत्ति न हो जाए भले ही इस विलंब में विवाह के प्रति उसकी रुचि ही क्यों न खत्म हो जाए। इसके बाद भी माता-पिता यदि उसे अपनी इच्छा के अनुरूप डालने का प्रयास करें और अपने स्वार्थ के लिए विवाह करने को विवश करें तो वह घड़ी आ जाती है, जब उस बड़ी बेटी को स्वयं आगे बढ़कर फैसला ले लेना चाहिए कि उसे क्या करना है और कौन सा रास्ता चुनना है।  यह एक आम कथानक है जिस पर कई कहानियां लिखी जा चुकी है, फिल्मी भी बनी हैं, फिर भी संगीता चौबे ने अपनी कहानी में नवीनता लाने का प्रयास किया है तथा रोचकता बनाए रखी है।
इसी प्रकार नवीं कहानी “इंतज़ार” और दसवीं कहानी “सफ़र”। यह दोनों कहानियां स्त्री के अंतरद्वंद और जीवन के कठोर उतार-चढ़ाव की कहानी हैं। इन दोनों कहानियों के कथानक में भी नयापन नहीं है किंतु लेखिका ने नायिकाओं के निर्णय को उचित स्थापना देते हुए कहानी को विशिष्ट बना दिया है।

11वीं कहानी “उपहार” और 12वीं कहानी “पश्चाताप” है। यह दोनों कहानी पारिवारिक रिश्तों की कहानियां हैं। मां बेटों के रिश्ते की मां और बेटी के रिश्ते की और सबसे बढ़कर संवेदनात्मक रिश्ते की कहानियां हैं।

कहानी संग्रह “बीते लम्हें” की बारहों कहानियां रोचक हैं, पठनीय हैं। कहानीकार श्रीमती संगीता चौबे ने अपनी हर कहानी के साथ न्याय करने का पूरा-पूरा प्रयास किया है। संगीता चौबे में कहानी लिखने की भरपूर प्रतिभा है बस उन्हें शिल्प में कसाव और परिवेश में विविधता लानी होगी तो उनकी अगली कहानियां और भी अधिक रोचक बन सकेंगी। यानी उन्हें कथा लेखन की चुनौतियों को स्वीकार करते हुए अपने कंफर्ट जोन से बाहर निकलना होगा। इसमें कोई संदेह नहीं की उनके लेखन में संवाद क्षमता और विषय की पकड़ बहुत गहरी है जिसके कारण ये सभी 12 कहानियां उनके लेखन के प्रति आश्वस्त करती हैं और गहरी संभावनाएं जागती हैं ।
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Tuesday, June 23, 2026

पुस्तक समीक्षा | आदि-अनादि प्रश्नों को उठाती संवेदनशील कविताएं | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण


पुस्तक समीक्षा
आदि-अनादि प्रश्नों को उठाती संवेदनशील कविताएं
समीक्षक - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
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काव्य संग्रह  - तुम से शुरू तुम तक
कवयित्री - श्रीमती विमल बुंदेला
प्रकाशक - जे.टी.एस. प्रकाशन, वी-508, गली नं. 17, विजय पार्क, दिल्ली-110053
मूल्य  - 500/-
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कविता वह माध्यम है जो संवेदनाओं को विचारों के साथ जोड़कर एक ऐसी अभिव्यक्ति प्रदान करती है जो मन को गहरे तक छू जाती है। कई बार जब व्यक्ति अपने मन के प्रश्नों को गद्यात्मक सामने नहीं रखना चाहता है तब काव्यात्मक रूप में उन्हें पिरोकर सहजता से सामने रख देता है, यही काव्य कला की बुनियादी विशेषता होती है। श्रीमती विमल बुंदेला का यह काव्य संग्रह “तुम से शुरू तुम तक” जितना मन की कोमल भावनाओं से गहन सरोकार रखता है उतना ही वैचारिक उद्वेलन भी रखता है। श्रीमती विमल बुंदेला प्रखर विचारों की कवयित्री हैं। वे ऐसे आदि-अनादि प्रश्न अपनी कविताओं के माध्यम से उठाती हैं जिन्हें पढ़ने के बाद प्रत्येक व्यक्ति उन पर विचार करने के लिए विवश हो जाता है और पढ़ने वाले को यह भी अनुभव होता है कि यह सारे प्रश्न तो उसके अंतःस्थल में भी कहीं न कहीं मौज़ूद थे।

भारतीय संस्कृति कि यह विशेषता है कि वह संस्कारों के रूप में प्रत्येक व्यक्ति की आत्मा में बसी है। इसीलिए जब कोई रचनाकार अपना कविता संग्रह तैयार करता है तो उसका आरंभ सरस्वती वंदना से ही होता है। देवी सरस्वती विद्या की देवी हैं। प्रत्येक रचनाकार यह मानता है कि यदि वह कोई सृजन कर पा रहा है तो देवी सरस्वती की कृपा से संभव ही है। विमल बुंदेला भी अपनी प्रथम कविता “मां वाणी का प्रसाद” में यह पंक्तियां लिखती हैं कि-
अहं नहीं शब्दों में मेरे,
जो सच है वह लिखती हूँ,
ये प्रसाद माँ वाणी का है,
जो विनय भाव जगाते हैं।
श्रद्धा से नतमस्तक हूँ मैं,
दिया बहुत, माँगा कम था,
एक बूँद को तृषित हृदय था,
भरे कलश मिल जाते हैं।
संग्रह की दूसरी कविता मां शारदा को अर्पित है। वहीं तीसरी और चौथी  कविताएं “जन्मभूमि मां भारती” तथा “भारत देश”अपने देश के प्रति समर्पित है। कवयित्री विमल बुंदेला ने भी इसी प्रकार जन्मभूमि भारत को नमन किया है-
ननी-जन्मभूमि हमारी,
सुंदर और मनोहारी,
जन्म दिया प्रभु इस धरती पर,
करूँ नमन, हूँ आभारी।
देखा जाए तो ये आरंभिक कविताएं पुस्तक का मंगलाचरण हैं। उसके बाद पांचवी कविता में ही वे अपने मूल प्रश्नों पर आती हैं। पांचवी कविता का शीर्षक ही है “सीधा प्रश्न”। यहां से नौंवी कविता तक वे शाश्वत प्रश्न उठाए गए हैं जो राम कथा से उपजे हैं और प्रत्येक व्यक्ति के मानस में यदाकदा उमड़ते-घुमड़ते रहते हैं। ये कविताएं कवयित्री के सामाजिक एवं स्त्री स्वाभिमान से सरोकारों को भी प्रतिबिंबित करती हैं।
“सीधा प्रश्न” कविता में कवयित्री ने मर्यादा पुरुषोत्तम राम से प्रश्न किया है-
हे मर्यादापुरुषोत्तम राम आपको,
अब उत्तर देना होगा,
क्या गलती थी माँ सीता की,
यह विश्लेषण करना होगा।
यह प्रश्न उठाया है इस बात पर की गर्भवती सीता माता को श्रीराम ने वन में कैसे भेज दिया और उनका कैसे त्याग कर दिया जबकि वे स्वयं सीता माता की अग्नि परीक्षा ले चुके थे। इसीलिए कवयित्री कहती हैं कि-
हर नारी के मन के अंदर का,
यह दबा हुआ अंगारा है,
चुपचाप क्यों त्यागा सीता को,
यह सीधा प्रश्न हमारा है।

यह प्रश्न उस समय से मानव मन में अपनी जगह बनाए हुए हैं जब से राम कथा आरंभ हुई। स्त्री पर लांछन लगाना और उस लांछन को सही मान लेना क्या इतना सरल है? क्या यह स्त्री की प्रतिष्ठा, गरिमा एवं अस्मिता के अनुरूप है? यही प्रश्न उठाया है विमल बुंदेला जी ने। कविता “कर्तव्य सबसे बड़ा” में कैकई प्रसंग के तारतम्य में प्रश्नों को खंगाला गया है। कैकई ने पुत्र मोह में पड़कर श्री राम को 14 वर्ष का वनवास दिला दिया। जबकि इसी कारण उसका पुत्र भरत उससे रुष्ट हो गया। समूची अयोध्या धिक्कार कर उठी। एक स्त्री दूसरी स्त्री की बातों में आकर गलत कदम उठा ले तो उसके हिस्से में धिक्कार ही आता है। इस बात को विमल बुंदेला जी ने बहुत सुंदर सहज ढंग से रेखांकित किया है-
तब कैकई-सी रानी दो,
जब आई उसकी बातों में,
स्याही-सा काला नाम हुआ,
ममता की सरल किताबों में।

यह कविता स्पष्ट करती है कि विमल बुंदेला जी सही को सही और गलत को गलत कहने का साहस रखती हैं। रामकथा के संदर्भ में ही एक और अनादि प्रश्न उठाती कविता है “उर्मिला का मौन त्याग” । इस कविता में उन्होंने लिखा है कि किस तरह उत्साह पूर्वक लक्ष्मण की अर्धांगिनी बनकर उर्मिला राज भवन में आई थी लेकिन श्री राम के साथ लक्ष्मण के वनवास गमन करने पर उर्मिला  ने भी राजभवन में रहते हुए वनवास सामान जीवन व्यतीत किया, जो आसान नहीं था -
चौदह वर्ष जो तुमने बिताए,
और रिश्ते सभी निभाए थे,
हमको कुछ भी ज्ञात नहीं,
कैसे सब आँसू छुपाए थे।
स्त्री मन यूं भी अधिक संवेदनशील होता है और जब कोई स्त्री दूसरी स्त्री की दशा एवं स्थिति पर विचार करती है तो वह विचार बिंदु सटीक होता है।

“अपमान की अग्नि” कविता वह अनादि प्रश्न उठाती है जिसमें लक्ष्मण के द्वारा शूर्पणखा की नाक काट दी जाती है, क्या यह दंड उचित था? शूर्पणखा भले ही राक्षस समुदाय की थी किंतु थी तो स्त्री ही, उस पर शस्त्र उठाना क्या उचित था? एक स्त्री को सदा के लिए उसके नैसर्गिक सौंदर्य से वंचित कर देना क्या उचित था? इससे भी पहले क्या मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम का सूर्पणखा को विवाह प्रस्ताव हेतु अनुज लक्ष्मण के पास भेजना क्या उचित था? इन प्रश्नों को उठाने का साहस किया है कवयित्री विमल बुंदेला ने-
लक्ष्मण के सम्मुख सुंदरी आई,
किया प्रणय निवेदन मुस्काई,
लक्ष्मण ने हँसी उड़ाई थी,
शूर्पणखा नाक कटवाई थी।
इस प्रकार के शाश्वत प्रश्न हमारे अतीत से उठकर वर्तमान तक हमें विचलित करते रहते हैं।कविता “प्रतीक्षा का फल” में शबरी की कठोर तपस्या समान प्रतीक्षा का हृदयस्पर्शी वर्णन है। संग्रह की अन्य कविताएं जैसे “अनंत स्पर्श” “हम सब एक हैं”, “बिन बाती का दीपक”, “अंतर्मन की तलाश” आदि विविध भाव भूमि की कविताएं हैं। एक और कविता है जिसका उल्लेख करना आवश्यक है। यह कविता है “उसकी ख़ामोशी”। इस कविता में कवयित्री ने कामवाली बाई की पीड़ा को शब्दांकित किया है-
गहराती शाम-सी आँखें,
उनकी नमी वह छुपाए थी,
और कोई नहीं, वह मेरी
कामवाली कम उम्र बाई थी।
संग्रह की प्रस्तावना डॉ. बहादुर सिंह परमार ने, भूमिका डॉ. शरद सिंह ने, आशिर्वचन मालती श्रीवास्तव, छतरपुर ने लिखा है। इसके साथ ही पद्मश्री डॉ अवध किशोर जड़िया का विशेष संदेश एवं डॉक्टर गायत्री जी का विशेष संदेश एवं शब्दों की कविताओं एवं कवयित्री के व्यक्तित्व पर दो शब्द आभा श्रीवास्तव के हैं।  विमल बुन्देला ने अपने आत्मकथ्य में अपनी सृजनात्मक मनोदशा का संक्षेप में उल्लेख किया है।

कवयित्री विमल बुंदेला की कविताओं की भाव भूमि बहुत गहरी है। उन्होंने अपनी हर बात को सीधे, सरल और स्पष्ट शब्दों में पिरोया है। यह कविताएं अलंकारिकता एवं छंदबद्धता की सभी शर्तों को पूरा भले ही न करती हों किंतु इनमें एक सहज प्राकृतिक लयबद्धता है जो इन कविताओं को न केवल पठनीय बनाती है, अपितु स्मरणीय भी बनाती है। इस कविता संग्रह के पेपर बैक संस्करण की कीमत रु.500/-  साहित्य प्रेमियों की बटुआ फ्रेंडली नहीं है। वैसे संग्रह की सभी कविताएं पाठक के हृदय से संवाद करने में सक्षम हैं। कविताओं का भाव सौंदर्य ही नहीं अभी तो भाषा सौंदर्य भी प्रभावित करने वाला है। लिहाज़ा कवयित्री श्रीमती विमल बुंदेला का यह संग्रह सभी को बहुत पसंद आएगा तथा विशेष रूप से वे कविताएं जिनमें उन्होंने आदि-अनादि प्रश्न उठाए हैं, वैचारिक भाव भूमि पर लंबे समय तक अपनी उपस्थिति दर्ज कराएंगी।
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