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Wednesday, May 6, 2020

चर्चा प्लस - कोरोनाकाल की ‘रामायण’ - डाॅ शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
चर्चा प्लस   

कोरोनाकाल की ‘रामायण’
  - डाॅ शरद सिंह

           स्व. रामानंद सागर जी ने यह सपने में भी नहीं सोचा होगा कि उनका ‘रामायण’ धारावाहिक एक दिन दर्शकों का बहुत बड़ा सहारा बनेगा। आज सामान्य व्यक्ति से ले कर बुद्धिजीवी वर्ग तक ‘रामायण’ देखकर अपना समय व्यतीत कर रहा है, और विशेष बात तो यह है कि धारावाहिक के आधार पर मूल ‘रामायण’ और तुलसीकृत ‘रामचरित मानस’ की रामकथा की अपने अलग ढंग से व्याख्या कर रहा है गोया वह कोरोनाकाल की नई ‘रामायण लिख देना चाहता हो।
    एक लम्बा समय हो चला है कोरोना से बचाव के लिए लाॅकडाउन में समय व्यतीत करते। कोरोना वायरस के संक्रमण से बचाव व सुरक्षा के लिए पहले लाॅकडाउन-एक, फिर लॉकडाउन-टू और अब लाॅेकडाउन- थ्री की बारी है। कोरोना लाॅकडाउन के दौरान घर में क़ैद रहने वालों के मनोरंजन का पूरा ध्यान रखा सरकार और टीवी चैनल वालों ने। अपने समय के बहुचर्चित और अत्यंत लोकप्रिय धारावाहिकों का पुनःप्रसारण कर मनोरंजन के साथ ही धर्म और विचार की भावना को भी जगा दिया जिससे कोरोना के आतंक से उपजने वाला भय तनिक कम हो जाए। स्व. रामानंद सागर का ‘रामायण’ धारावाहिक ऐसा पहला धारावाहिक था जिसने चलती बसों के पहिए जाम कर दिए थे। इस धारावाहिक के प्रसारण के समय स्वतः स्वघोषित लाॅकडाउन हो जाता था। जो जहां रहता, वहीं ठहर जाता और धारावाहिक देख कर ही आगे बढ़ता। यहां तक कि बसयात्री भी बस वहीं रुकवा लेते जहां उन्हें यह धारावाहिक देखने को मिल सके। धार्मिक कथानक पर आधारित होते हुए भी यह धारावाहिक धर्म से परे धर्मनिरपेक्ष था। हर धर्म के लोग इसे बड़े चाव से देखते। श्रीराम का अभिनय करने वाले अरुण गोविल और सीताजी का अभिनय करने वाली दीपिका चिखलिया हर दर्शक के मन-मस्तिष्क में बस गए थे। बाॅक्स आॅफिस पर धमाका करने वाली मार-धाड़, रोमांस से भरपूर काॅमर्शियल फिल्में बनाने वाले रामानंद सागर भी यह देख कर दंग रह गए थे कि उनका यह धार्मिक संदर्भ का धारावाहिक सफलता के सारे रिकाॅर्ड तोड़ता चला गया। इस संबंध में उन्होंने अपने एक साक्षात्कार में कहा था-‘‘ये सब श्रीराम की कृपा है!’’ संभवतः इसके अतिरिक्त उनका कोई उत्तर हो भी नहीं सकता था।

78 एपीसोड्स के ‘रामायण’ धारावाहिक की पहली कड़ी 25 जनवरी 1987 को प्रसारित की गई थी तथा इसकी अंतिम कड़ी 31 जुलाई 1988 को प्रसारित हुई थी। लगभग डेढ़ साल से अधिक चलने वाले ‘रामायण’ धारावाहिक ने दर्शकों को मानो सम्मोहित किए रखा। एक बार फिर यह सम्मोहन शत प्रतिशत नहीं तो साठ प्रतिशत तक सिर चढ़ कर बोल रहा है। दिलचस्प बात यह है कि आज जो दर्शक उससे जुड़े हैं वे टेलीविजन धारावाहिकों के संबंध में मानसिक परिपकवता को प्राप्त कर चुके हैं। एकता कपूर के रंगारंग, चटकीले, रंगेचुंगे ग्लैमरस धारावाहिकों के सामने फीके रंगों वाला यह ‘रामायण’ धारावाहिक आज भी प्रासंगिक बन गया है। इससे भी अधिक दिलचस्प बात यह है कि सोशल मीडिया पर रामकथा के जानकारों, मीमांसाकारों ओर व्याख्याकारों की भीड़ उमड़ पड़ी है। जिसे सोशल मीडिया की ही भाषा में कहें तो इन दिनों रामकथा पर चर्चा ‘‘ट्रेंड’’ पर है। हर व्यक्ति स्वयं को रामकथा का जानकार साबित करना चाहता है गोया रामकथा की जानकारी इससे उसे थी ही नहीं। वही राम, वही सीता लेकिन ट्रेंडिंग रामकथा के नित नए समीकरणों की। कोई लिख रहा है कि श्रीराम को कटघरे में खड़ा किया जाए क्यों कि उन्हीं के कारण सीता को दुख और परित्याग झेलना पड़ा तो कोई इसके उलट पोस्ट करता है कि सीता का दुख ही प्रमुख क्यों? श्रीराम का दुख प्रमुख क्यों नहीं? यह कमाल है सोशलमीडिया कमेंट बटोरो अभियान का कि बहुपरिचित रामकथा पर अनर्गल टिप्पणियां भी की जा रही हैं। ऐसा लगता है जैसे सब कमर कसे हुए हैं एक ‘‘नई रामायण’’ लिखने के लिए। जिसमें स्त्री विमर्श वाले बुद्धिजीवी श्रीराम के व्यक्तित्व पर आक्रमण करते मिलेंगे तो वहीं दूसरी ओर पुरुष विमर्श वाले कैकयी और सीता को एक ही पलड़े पर बिठा कर दोनों को समान रूप से कोसते हुए, दोषी ठहराते हुए श्रीराम को ‘बेचारा’ और ‘सहानुभूति का पात्र’ बताते नज़र आएंगे। यह ‘टाईमपास’ तक सीमित हो तो कोई बात नहीं लेकिन यदि इसी के आधार पर आगे चल कर ‘कोरोनाकाल की रामायण’ का सृजन कर दिया गया तो रामकथा का भगवान ही मालिक है। 

रामकथा केवल एक आख्यान नहीं है, वह श्रीराम और सीता के माध्यम से मानव-जीवन के उच्च नैतिक आदर्शों को, मर्यादाओं को दुनिया के समक्ष प्रस्तुत करने का माध्यम भी है। श्रीराम को एक आदर्श के रूप में उत्तर से लेकर दक्षिण तक जनमानस ने स्वीकार किया है। उनका चरित्र लोकतंत्र का प्रहरी और निर्माता भी है। वहीं सीता का एक स्त्री के रूप में त्याग और स्वाभिमान का अद्भुत चरित्र सामने आता है जो स्त्री के सम्पूर्ण गुणों को सामने रखता है। श्रीराम और सीता के आदर्शों का जनमानस पर प्रभाव इतना गहरा है, जो युगों-युगों तक रहेगा। भारतीय संस्कृति के व्याख्याकार डाॅ श्रीराम परिहार रामकथा की उपादेयता और प्रासंगिकता की चर्चा करते हुए कहते हैं कि ‘‘विदेश में रहने वाला अप्रवासी भारतीय रामनवमी के दिन अपने देश को याद करता है। अपने परिजनों को याद करता है। एकता का तार देश-विदेश के व्यक्ति को जोड़ता है। रामकथा की सांस्कृतिक यात्रा मंदाकिनी की तरह वेगवती होकर बह रही है। अनवरत बह रही है।’’ अतः रामकथा पर बौद्धिकता की अनावश्यक परत चढ़ाने से पहले गहन अध्ययन किया जाना चाहिए। यह नहीं भूलना चाहिए कि साक्ष्य और सटीक तर्क से कही गई बातें ही मान्यता प्राप्त करती हैं। अतः कोरोनाकाल की रामकथा पर विवेक का अंकुश जरूरी है, कहीं अतिरेक करोड़ों लोगों की भावनाओं को ठेस न पहुंचाने लगे।        
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(दैनिक सागर दिनकर में 06.05.2020 को प्रकाशित)
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Wednesday, April 22, 2020

चर्चा प्लस … प्राणघातक हो सकता है ढीठ बनना - डाॅ शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
चर्चा प्लस … 

प्राणघातक हो सकता है ढीठ बनना
- डाॅ शरद सिंह

         ‘सोशल मीडिया स्कूल’ के छात्र कानून तोड़ना ‘डेयरिंग’ यानी दुस्साहस या रोमांच का काम समझते हैं जबकि हक़ीकत में यह सिर्फ़ और सिर्फ़ अपराध होता है। कोई भी कानून नागरिकों की सुरक्षा के लिए बनाया जाता है और आपदा की स्थिति में यह और अधिक जरूरी हो जाता है कि कानून का गंभीरता से पालन किया जाए।
         कोरोना वायरस के संक्रमण से बचाव व सुरक्षा के लिए लॉकडाउन-टू लागू है। संक्रमित जिलों में कर्फ्यू की स्थिति बनी हुई है, लेकिन अनेक गांव, शहर, तहसीलें ऐसी हैं, जहां लॉकडाउन लागू होने के बाद भी लोगों की चहलकदमी थमी नहीं है। जब भी लाॅकडाउन में रियायात बरती जाती है कुछ लोग अपना आपा खो बैठते हैं और वहीं किराना, फल व अन्य दुकानों में शारीरिक दूरी के नियमों का पालन करना भूल जाते हैं। जब कि यह सभी को पता है कि कोरोना अति संक्रामक वायरस है। इसके चपेट में जो भी आएगा वह स्वयं तो मौत से टकराएगा ही, साथ ही अपने मित्र, रिश्तेदारों और परिचितों के अलावा अपना ईलाज करने वालों के प्राणों के लिए भी खतरा बन बैठेगा। लेकिन ऐसे ढीठ किस्म के लोग स्थिति की गंभीरता को गोया समझना ही नहीं चाहते हैं। गोया उन्हें दो ही बातों की प्रतीक्षा रहती है कि या तो संक्रमण लग जाए या फिर पुलिस का डंडा पड़ जाए।
Charcha Plus Column of Dr (Miss) Sharad Singh Dainik Sagar Dinkar, 22.04.2020
                 सागर नगर का ही उदाहरण लें तो यह शहर 10 अप्रैल के पहले तक कोरोना से मुक्त था लेकिन 10 अप्रैल के बाद पूरा शहर सकते में आ गया जब पहला कोरोना पाॅजिटिव पाया गया। नगर के शनिचरी क्षेत्र से पाया गया पहला कोरोना पाॅजिटिव मरीज दो दिन पहले बुंदेलखंड मेडिकल कॉलेज में भर्ती किया गया था। संदेह के आधार पर उसका जांच सैंपल लिया गया और जांच में वह पाॅजिटिव निकला। कोरोना पाॅजिटिव मिलने की पुष्टि होते ही उसके निवास क्षेत्र के तीन किलोमीटर के दायरे को सील कर दिया गया। उसके परिवार के कुल पांच सदस्यों को भी क्वारंटीन किया गया। उसके आस-पड़ोस के व्यक्तियों की भी जांच की गई। मरीज की काॅन्टेक्ट हिस्ट्री भी खंगाली गई जिससे उसके ऐसे दोस्त का भी पता चला जो संक्रमित था। यह जानते हुए भी कि कोरोना संक्रमण की श्रृंखला से फैलता है, लाॅकडाउन लागू होने पर भी उन युवकों द्वारा लापरवाही बरती गई और अनेक लोगों के जान से खिलवाड़ की गई। ‘सोशल मीडिया स्कूल’ के छात्र कानून तोड़ना ‘डेयरिंग’ यानी दुस्साहस या रोमांच का काम समझते हैं जबकि हकीकत में यह सिर्फ और सिर्फ अपराध होता है। कोई भी कानून नागरिकों की सुरक्षा के लिए बनाया जाता है और आपदा की स्थिति में यह और अधिक जरूरी हो जाता है कि कानून का गंभीरता से पालन किया जाए। सरकार जानती है कि लाॅकडाउन लागू करने से किस-किस तरह के नुकसान हो सकते हैं। मिल, कारखाने, दूकानें सभी बंद हैं। उत्पादन थम-सा गया है। बिक्री के लिए सामानों की उपलब्धता लड़खडाने लगी है। कुटीर उद्योग और लघु उद्योग पूरी तरह बैठ चुके हैं। आपदा खत्म होने के बाद उन्हें उन्हें एक तगड़े स्टार्टअप की जरूरत पड़ेगी। किसान चिंतित हैं, दूकानदार चिंतित हैं, बेघर-बेरोजगार मजदूर चिंतित हैं और इन सब के लिए चिंतित है सरकार। मगर किसी भी आपदा के लिए कभी कोई पूर्व तैयारी नहीं की जा सकती है। आपदा का मतलब ही है कि अचानक कोई बड़ा संकट आ खड़ा होना। हमारा देश समूचे विश्व की भांति आपदा के दौर से गुज़र रहा है। मगर अन्य देशों की तुलना में हमारे देश में स्थिति कई गुना बेहतर है क्योंकि यहां समय रहते आपदा प्रबंधन अधिनियम लागू कर दिया गया। देश के प्रधानमंत्री ने स्वयं लगातार देश की आमजनता से संवाद बनाए रखा। इस सकारात्मकता ने ही हौसला दे रखा है कोरोना वारियर्स को। फिर भी जो ढीठ किस्म के लोग इन सब बातों को अनदेखा करते रहते हैं और लाॅकडाउन के नियमों को धता बताने की ताक में रहते हैं उन्हें आपदा प्रबंधन अधिनियम के बारे में जरूर जान लेना चाहिए यानी जो बातों से नहीं मानेंगे उनके ऊपर डंडे चलाने का अधिकार रखता है प्रत्येक स्थानीय प्रशासन। जीवन की सुरक्षा के लिए कानून के डंडे भी जरूरी होते हैं।  
               इस वर्ष मार्च महीने के आरम्भ में भारत सरकार ने 123 साल पुराने ब्रिटिश सरकार में बनाए गए एपिडेमिक डिजिज एक्ट 1897 लागू किया था। इस कानून को अंग्रेजों ने फरवरी 1897 में तब के मुंबई शहर में फैल रहे प्लेग महामारी को कंट्रोल करने के लिए बनाया था। इसमें ब्रिटिश सरकार के पास शक्ति थी कि वो देश में कहीं भी ज्यादा लोगों के जुटने पर रोक लगा सकती थी। चूंकि ये कानून राज्य सरकारों को महामारी की प्रकृति को देखते हुए नए नियम बनाने की सहूलियत देता है ऐसे में ये फैसला राज्य सरकारों को लेना होता है कि वह अपने राज्य में क्या नए नियम-कायदे महामारी के प्रकोप को रोकने के लिए बनाना चाहती है। यहां एक बात स्पष्ट रहनी चाहिए कि यह कानून किसी भी प्रकार के आपदा के लिए है जबकि इसके साथ ही एक और कानून है जो एपिडेमिक डिजिज एक्ट 1897 कहलाता है लेकिन इन दोनों कानूनों में परस्पर थोड़ा अंतर है।
            आपदा प्रबंधन अधिनियम को दिसंबर, 2005 में लागू किया गया था। ये एक राष्ट्रीय कानून है जिसका इस्तेमाल केंद्र सरकार करती है ताकि किसी आपदा से निपटने के लिए एक देशव्यापी योजना बनाई जा सके। इस एक्ट के दूसरे भाग के तहत राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के गठन का प्रवधान है. जिसका अध्यक्ष प्रधानमंत्री होता है। इसके अलावा इसके अधिकतम नौ सदस्य हो सकते हैं जिसका चुनाव प्रधानमंत्री के सुझाव पर होता हैं। इसके तहत केंद्र सरकार के पास अधिकार होता है कि वह दिए गए निर्देशों का पालन ना करने वाले पर कार्रवाई कर सकती है। इस कानून के तहत राज्य सरकारों को केंद्र की बनायी योजना का पालन करना होता है। इस कानून की सबसे विशेष बात यह है कि इसमें राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण आदेशों का पालन नहीं करने पर किसी भी राज्य के अधिकारी के साथ-साथ प्राइवेट कंपनियों के अधिकारी पर भी कार्रवाई कर सकती है। ये कानून किसी प्राकृतिक आपदा और मानव-जनित आपदा की परिस्थिति पैदा होने पर इस्तेमाल किया जा सकता है।
             लाॅकडाउन के नियमों का पालन करते हुए जिस संकट से बड़ी आसानी से निपटा जा सकता है, उसे नियमों को तोड़ कर बढ़ावा देना स्वयं को हत्यारा बनाने के समान है। धैर्य, सुरक्षा और शांति से ही टल सकता है यह संकट। यह समझना ही होगा कि ढीठ बनना कोई बुद्धिमानी नहीं है।  
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(दैनिक सागर दिनकर में 22.04.2020 को प्रकाशित)
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Thursday, January 30, 2020

चर्चा प्लस ... वसंत पंचमी (निराला जयंती) पर विशेष ... पुनर्पाठ जरूरी है कवि 'निराला’ के मानवतावादी कथा साहित्य का - डॉ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
चर्चा प्लस 
वसंत पंचमी (निराला जयंती) पर विशेष 
पुनर्पाठ जरूरी है कवि  'निराला’ के मानवतावादी कथा साहित्य का
- डॉ. शरद सिंह

आज मानवतावाद ज्वलंत विषय है। इस विषय पर बड़े-बड़े सेमिनार होते हैं, चर्चाएं होती हैं एवं गोष्ठियां आयोजित की जाती हैं। इन सबके द्वारा इस बात को परखने का प्रयास किया जाता है कि मानवदावाद आखिर है क्या? इसे समाज में कैसे स्थापित किया जाए? जबकि हिन्दी साहित्य की मूल चेतना ही मानवतावादी है। इसमें मानवजीवन के प्रत्येक मूल्यों को बारीकी से जांचा-परखा गया है। मानवतावाद के प्रति सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला का अपना एक अलग दृष्टिकोण रहा। वे जब मानव की बात करते थे तो सबसे पहले दुखी-पीड़ित मानवता के प्रति उनकी संवेदनाएं मुखर होती थीं। 

‘निराला’ का मानवतावाद सदा प्रासंगिक है। ‘निराला’ ने सन् 1915 से कविता लिखना आरंभ किया था। सतत् मंथन के बाद उनका पहला काव्य ‘परिमल’ सन् 1929 में प्रकाशित हुआ। ‘निराला’ ने काव्य के छायावादी दृष्टिकोण को अपनाया वहीं प्रयोगवादी मानकों को भी आत्मसात किया। उनके अन्य काव्य हैं- अनामिका, तुलसीदास, कुकुरमुत्ता, अणिमा, बेला, नए पत्ते, अर्चना एवं आराधना। अनामिका में संग्रहीत ‘तोड़ती पत्थर’ कविता मानवीय मूल्यों की उत्कृष्ट धरोहर है। आचार्य नरेन्द्र शर्मा ने ‘निराला’ एवं ‘तोड़ती पत्थर’ के बारे में लिखा है-‘‘वह आधुनिक कवियों में शैलीगत अपनी आधुनिकता के कारण आधुनिकतम, किन्तु वेदान्त, दर्शन और वीरपूजा संबंधी भावना के कारण पुरातन बने रहे। एक ओर वह घोर अहंवादी है तो दूसरी ओर अपनी उदार मनःसंवेदना के कारण वह पददलितों के हिमायती है। ‘तोड़ती पत्थर इलाहाबाद के पथ पर’ ऐसी भी है उनकी कविता। वह कविता एक ओर तो मार्गी है और दूसरी ओर वह पत्थर तोड़-तोड़ कर नए युग का मार्ग बनाती है।’’


‘निराला’ सम्पूर्ण गद्य के विविध रूपों और विशेषकर कथा साहित्य में आस्थावान रहे। ‘निराला’ का आध्यात्मिक दृष्टिकोण भी मानवतावादी था। इसीलिए मानव मन-मस्तिष्क में संचार करने वाले सुख-दुख, राग-द्वेष ‘निराला’ के गद्य साहित्य में मुखर रूप में विद्यमान हैं। 
Charcha Plus - वसंत पंचमी-निराला जयंती पर विशेष-पुनर्पाठ जरूरी है कवि निराला के मानवतावादी कथा साहित्य का  -  Charcha Plus Column by Dr Sharad Singh
    आज मानवतावाद ज्वलंत विषय है। इस विषय पर बड़े-बड़े सेमिनार होते हैं, चर्चाएं होती हैं एवं गोष्ठियां आयोजित की जाती हैं। इन सबके द्वारा इस बात को परखने का प्रयास किया जाता है कि मानवदावाद आखिर है क्या? इसे समाज में कैसे स्थापित किया जाए? जबकि हिन्दी साहित्य की मूल चेतना ही मानवतावादी है। इसमें मानवजीवन के प्रत्येक मूल्यों को बारीकी से जांचा-परखा गया है। मानवतावाद के प्रति सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला का अपना एक अलग दृष्टिकोण रहा। वे जब मानव की बात करते थे तो सबसे पहले दुखी-पीड़ित मानवता के प्रति उनकी संवेदनाएं मुखर होती थीं।‘निराला’  का मानव देवत्व की तलाश में नहीं, उसकी ऊर्जा देवत्व को गंतव्य मान कर गतिमान नहीं होती किन्तु देवत्व का पर्याय बन कर सामने आती है। ‘निराला’ के गद्य में वेदान्त की अनुप्रेरणा और विवेकानंद की वाणी का प्रभाव ही नहीं बल्कि उनके व्यक्तित्व की विराटता भी विद्यमान है। जब हम ‘निराला’ के काव्य और उनके गद्य में मौजूद मानवचेतना से साक्षात्कार करते हैं तो इस सत्य का अहसास होने लगता है कि पद्य जल नहीं है और गद्य पाषाण नहीं है। वस्तुतः काव्य और गद्य के बीच स्पष्ट धारणात्मक रेखा खींचना कठिन है। हर गद्य में कविता संभव है और हर कविता में गद्य। ‘निराला’ के काव्य और गद्य को एक-दूसरे के समान्तर रख कर देखा जाए तो दोनों ही विधाएं समान रूप से मूल्य-निर्णायक साबित होती हैं। अतः यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि वे कौन से कारण रहे होंगे जिन्होने ‘निराला’ को काव्य के साथ-साथ गद्य सृजन से भी जोड़ा, वह भी समउत्कृष्टता और समर्पण के साथ। इस प्रश्न का उत्तर इस एक तथ्य में निहित है कि ‘निराला’ के भीतर एक संवेगतत्व निरंतर प्रवाहित रहा। जीवन के विविध पक्षों में विचरण के कारण ही ज़मीन से जुड़े ‘निराला’ के भीतर हमेशा एक अंतर्द्वन्द्व चलता रहा। वे उद्वेलित होते रहे। जीवन की विषमताओं को ले कर उनके मन में सदा पीड़ा रही कि एक मानव दूसरे मानव का शोषण क्यों करता है? यह सहज प्रश्न और जिज्ञासा उन्हें आकुल करती रही और अंतर्मन में अनजाने में ही एक चिंतन प्रक्रिया बराबर चलती रही। यह उनके भीतर क्रांतिचेतना की पीठिका एवं प्रेरक बनी। यही क्रांतिचेतना अथवा मानववाद ‘निराला’ से काव्य के साथ-साथ गद्य सृजन भी कराती रही।

‘निराला’ के गद्य में विद्यमान मानववाद का तीन बिन्दुओं में आकलन किया जा सकता है- ‘निराला’ के उपन्यासों में मानववाद, कथासाहित्य में मानववाद और रेखाचित्रों-संस्मरणों में मानववाद। इन तीन बिन्दुओं के अध्ययन के उपरांत ‘निराला’ के मानवतावादी दृष्टिकोण की विराटता, गहनता और विस्तार को समझना आसान हो जाता है। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो ये तीनों बिन्दु ‘निराला’ के मानस के मानवीय पूर्णत्व से परिचित कराते हैं।


‘निराला’ का प्रथम उपन्यास ‘अप्सरा’ सन् 1931 में प्रकाशित हुआ। सन् 1933 में ‘अलका’, 1936 में प्रभावती एवं ‘निरुपमा’, 1946 में ‘चोटी की पकड़’ तथा 1950 में ‘कालेकारनामे’ उपन्यास प्रकाशित हुआ। ‘निराला’ की विचार प्रक्रिया को आधार बना कर यह कहा जा सकता है कि लगभग 25 वर्ष तक ‘निराला’ गद्य साहित्य के माध्यम से मानवमूल्यों एवं संवेदनाओं के आकलन और उद्घाटन में संलग्न रहे। इस सतत् प्रवाहित प्रक्रिया के चलते उन्होंने ‘अप्सरा’ में समर्पण, त्याग और बलिदान की प्रेरणा का आधार बनाया। जीवन को आस्वाद की आश्वस्ति दी, कर्म की मानववादी मनोभूमि पर निर्भीकता और स्वावलम्बन को स्थापित किया। ‘अलका’ में नारी के स्वाभिमान, मानव का अधूरापन, मानवीय विवशता, विडम्बना, अत्याचार, उत्पीड़णन और शोषण के विविध रूपों को प्रस्तुत किया। ‘प्रभावती’ में नारी गौरव के साथ प्रेम की उन्मुक्त चेतना को रेखांकित किया। ‘निरुपमा’ में उन्होंने सामाजिक वैषम्य, नारी गरिमा के साथ मानसिक वृत्तियों का विश्लेषण एवं कर्मचेतना को प्रकट किया। ‘चोटी की पकड़’ और ‘कालेकारनामे’ उपन्यास स्वदेशी आंदोलन और आंदोलन की सामाजिक भूमिका पर आधारित है, जिन्हें मानवीय गरिमा, मानवीय औदात्य के साथ-साथ मानवीय बोध और मनुष्य की साधना को मुखर किया है।

‘निराला’ की कहानियां हैं -चतुरी चमार, देवी, राजा साहिब ने ठेंगा दिखाया, हिरनी, अर्थ, सफलता, क्या देखा, सुकुल की बीवी, श्रीमती गजानन और कला की रूपरेखा। ‘चतुरी चमार’ और ‘सुकुल की बीवी’ दो समांतर धरातल की कहानियां हैं। एक में मानवीय विडम्बना और जीवन का आक्रोश उद्घाटित हुआ है तो दूसरी में नारीजीवन की विडम्बना के प्रति रूढ़ि से मुक्ति का आह्वान किया गया है। ‘निराला’ ने ‘देवी’ में मानवीय पर्तां की अंदरूनी बखिया को सामने रखा है तो ‘राजा साहिब ने ठेंगा दिखाया’ में अभिजात्यवर्ग के बौद्धिक दिवालियापन पर कटाक्ष किया है। ‘हिरनी’ मानवीयबोध का प्रश्न उठाती है और ‘श्रीमती गजानन’ नारी के स्वाभिमान से ओतप्रोत है। ‘क्या देखा’ स्वच्छंद प्रेम की मानववादी अभिव्यक्ति है तो ‘कला की रूपरेखा’ मानवीय दुष्प्रवृत्तियों पर चोट करती है।

‘निराला’ के रेखाचित्र एवं संस्मरणों में ‘कुल्लीभाट’ और ‘बिल्लेसुर बकरिहा’ का सृजन निराला-साहित्य की अनन्यतम घटना मानी जा सकती है। वस्तुतः ‘कुल्लीभाट’ में कुल्ली का स्वरूप विद्रोही चेतना के उद्वेलन से आंदोलित हुआ है वहीं ‘बिल्लेसुर बकरिहा’ को मनुष्य की महत्वाकांक्षा का प्रस्तुतिकरण कहा जा सकता है। ‘निराला’ ने जीवन को समझा, जिया और इसी जीवन को अपने गद्य साहित्य में सम्पूर्णता के साथ उतारा। ‘परिमल’ के छायावादी ‘निराला’, ‘कुकुरमुत्ता’ के प्रयोगवादी ‘निराला’ और ‘बिल्लेसुर बकरिहा’ के चरित्र-अन्वेषी ‘निराला’ -इन तीनों में एक तत्व समान रूप से मौजूद है, वह है मानवतावादी दृष्टिकोण।    
सूर्यकांत त्रिपाठी निराला का कथा साहित्य, कोलाॅज़- डाॅ. शरद सिंह

       इसे दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि ‘निराला’ के कथा साहित्य को या तो केवल खानापूरी के लिए मूल्यांकित कर दिया जाता है अथवा बंधे-बंधाए नियमों और कसौटियों पर उसका परीक्षा कर के अपनी अध्ययन-मूल्यांकन की औपचारिकता की पूर्ति कर दी जाती है। यही कारण है कि ‘निराला’ का कथा साहित्य एक अप्रत्यक्ष उपेक्षा का शिकार रहा और वह प्रेमचंद के कथा साहित्य के प्रभामंडल के पीछे छिपा रह गया। ‘निराला’ के मानवतावाद को भली-भांति समझने के लिए उनके कथा साहित्य सहित समग्र साहित्य का पुनर्पाठ किया जाना जरूरी है।                    ---------------------- 

Wednesday, July 10, 2019

चर्चा प्लस .. जनसंख्या दिवस पर विशेष ... बिगड़ रहा है जनसंख्या और संसाधनों का संतुलन - डॉ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
चर्चा प्लस ... 

विश्व जनसंख्या दिवस पर विशेष :

बिगड़ रहा है जनसंख्या और संसाधनों का संतुलन
- डॉ. शरद सिंह


दुर्भाग्य से हम आज भी जनसंख्या के नियंत्रण के आवश्यक लक्ष्य को नहीं पा सके हैं। यह गनीमत है कि आज के अधिकांश पढ़े-लिखे नागरिक बच्चों की सीमित संख्या का अर्थ समझ चुके हैं और वे जान गए हैं कि माता-पिता दोनों ही धन कमाएं तब भी दो या तीन बच्चों की ही अच्छी परवरिश कर सकते हैं। इस प्रकार के स्वप्रेरित परिवार नियोजन ने स्थिति को कुछ हद तक संतुलित कर रखा है अन्यथा हमारे देश की जनसंख्या की विस्फोटक स्थिति न जाने कब की सोमालिया और सूडान जैसी भयावहता में जा पहुंची होती। फिर भी आज की स्थिति भी कोई बहुत खुश होने वाली नहीं है। जनसंख्या की बढ़त के कारण रिहायशी क्षेत्र निरंतर बढ़ रहा है जिससे जंगल और जलस्रोत नष्ट होते जा रहे हैं। पर्यावरण असंतुलित हो रहा है। यानी संसाधानों पर जनसंख्या का दबाव निरंतर बढ़ रहा है।

Charcha Plus Column by Dr Sharad Singh ... जनसंख्या दिवस  पर विशेष  ...  बिगड़ रहा है जनसंख्या और संसाधनों का संतुलन   

प्रति वर्ष 11 जुलाई को पूरी दुनिया में ‘विश्व जनसंख्या दिवस’ मनाया जाता है। ‘विश्व जनसंख्या दिवस’ - पूरे समूचा विश्व इस दिन चिन्तन करता है पृथ्वी पर निरंतर बढ़ती जनसंख्या पर। संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम की संचालक परिषद के द्वारा वर्ष 1989 में पहली बार यह दिवस मनाया गया था। उस समय इसकी आवश्यकता इसलिए महसूस हुई क्योंकि उस समय विश्व जनसंख्या का आंकड़ा चौंकाने वाला था। संयुक्त राष्ट्र संघ ने अनुभव किया कि इस प्रकार दिवस मना कर दुनिया के सभी देशों का ध्यान दुनिया की बढ़ती हुई जनसंख्या के प्रति आकृष्ट किया जा सकता है। इसके बाद इसे प्रति वर्ष वैश्विक स्तर पर मनाने का निर्णय लिया गया। इस विशेष जागरुकता उत्सव के द्वारा, परिवार नियोजन के महत्व जैसे जनसंख्या मुद्दे के बारे में जानने के लिये कार्यक्रम में भाग लेने के लिये लोगों को बढ़ावा देना, लैंगिक समानता, माता और बच्चे का स्वास्थ्य, गरीबी, मानव अधिकार, स्वास्थ्य का अधिकार, लैंगिकता शिक्षा, गर्भनिरोधक दवाओं का इस्तेमाल और सुरक्षात्मक उपाय जैसे कंडोम, जननीय स्वास्थ्य, नवयुवती गर्भावस्था, बालिका शिक्षा, बाल विवाह, यौन संबंधी फैलने वाले इंफेक्शन आदि गंभीर विषयों पर विचार रखे जाते हैं।
दूषित सामाजिक व्यवस्था और आर्थिक विपन्नता - ये सबसे बड़े कारण हैं भारत में जनसंख्या वृद्धि के। समाज में बेटियों की अपेक्षा बेटों की ललक ने जनसंख्या के समीकरण को बिगाड़ने में सबसे बड़ी भूमिका निभाई है। एक बेटे की पैदाईश की चाह में आज भी मध्यम वर्ग एवं निम्नमध्यम वर्ग में बेटियों के रूप में जनसंख्या बढ़ती जा रही है। भले ही उन बेटियों का उचित लालन-पालन नहीं हो पाता है और वे जीवन भर उपेक्षित रहती हैं किंतु जनसंख्या में वृद्धि की भागीदार बना दी जाती हैं। समाज ऐसे परिवार को दोषी भी नहीं ठहराता है। यदि दोषी ठहराई ही जाती है तो केवल वह मां जो बेटियों को जन्म देती है जबकि अब यह विज्ञान भी सिद्ध कर चुका है कि गर्भस्थ शिशु के लिंग निर्धारण के लिए केवल मां जिम्मेदार नहीं होती है। कई बार यह प्रस्ताव सामने आया कि राजनीतिक पदों पर योग्यता निर्धारण के अंतर्गत दो या-तीन बच्चों के माता-पिता होने की सीमा रखी जाए किंतु बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू यादव एवं राबड़ी देवी का पदासीन होना ऐसे प्रस्तावों की धज्जियां उड़ाता रहा है। उत्तर प्रदेश और बिहार प्राकृतिक संसाधनों एवं जलापूर्ति की दृष्टि से सुसम्पन्न प्रदेश हैं लेकिन इन्हीं राज्यों में सबसे अधिक आर्थिक विपन्नता भी है। इस संदर्भ में मैं अपना एक अनुभव साझा करना चाहूंगी कि जब मैं पहली बार सड़क मार्ग से उत्तर प्रदेश गई तो मुझे कानपुर से कुशीनगर तक गन्ने के खेत, आलू के खेत और लगभग हर घर की छतों पर फैली हुई रेरुआ (गिल्की या नेनुआ) की बेलें दिखाई दीं। आम के बागों की तो बात ही अलग थी। मैंने अपने उत्तरप्रदेशीय परिचित सहयात्री से पूछा कि जब यहां इतनी अच्छी उपज होती है तो फिर ग़रीबी क्यों हैं? लोग पैसे कमाने अपना प्रदेश छोड़ कर दूसरे प्रदेशों में क्यों जाते हैं? उन्होंने एक वाक्य में उत्तर दिया-‘‘यहां संसाधन से अधिक जनसंख्या है।’’ ठीक यही स्थिति मुझे कुशीनगर के बाद बिहार में गोपालगंज से समस्तीपुर तक देखने को मिली। बिना पूछे ही उत्तर मेरे दिमाग में कौंध गया कि यहां भी संसाधन से अधिक जनसंख्या है।’’ मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ की स्थिति भी इससे अलग नहीं रह गई है। दक्षिण भारत के केरल जैसे राज्य तो पहले ही इस विडम्बना के शिकार हो चुके हैं।
जब जनसंख्या इतनी बढ़ जाए कि संसाधन कम पड़ने लगें तो पलायन की स्थिति मजबूरी बन जाती है। जनसंख्या बढ़ने के दो कारणों का मैंने शुरु में जिक्र किया था। जिसमें पहला कारण एक बेटे की चाहत में बेटियों की लाईन लगा देना हिन्दी पट्टी की सामाजिक व्यवस्था का सबसे बड़ा झोल है। दूसरा कारण जो मैंने याद दिलाया था वह है आर्थिक विपन्नता। आर्थिक दृष्टि से कमजोर तबके में अकसर यह भ्रम रहता है कि जितने हाथ होंगे उतनी कमाई होगी। इस मानसिकता के चलते विशेषरुप से झुग्गी बस्तियों में तीन से अधिक बच्चों की पैदाईश देखी जा सकती है। एक पैडलरिक्शा वाला अथवा रेहड़ी-खोमचा लगाने वाला व्यक्ति यदि एक या दो बच्चों को जन्म दे तो वह अपनी सीमित आय में भी उनका ढंग से लालन-पालन कर सकता है। जबकि अधिक बच्चे पैदा करने पर अपनी बाल्यावस्था से ही उन बच्चों को अपना और अपने माता-पिता के परिवार का पेट भरने के लिए मेहनत-मजदूरी में जुट जाना पड़ता है। असफल होने पर ऐसे बच्चे ही अपराध का रास्ता पकड़ लेते हैं। दूसरी ओर इन निर्दोष बच्चों के कारण संसाधनों पर पड़ने वाला दबाव इसनके साथ ही शेष आर्थिक व्यवस्था को भी तोड़ने लगता है।
दुर्भाग्य से हम आज भी जनसंख्या के नियंत्रण के आवश्यक लक्ष्य को नहीं पा सके हैं। यह गनीमत है कि आज के अधिकांश पढ़े-लिखे नागरिक बच्चों की सीमित संख्या का अर्थ समझ चुके हैं और वे जान गए हैं कि माता-पिता दोनों ही धन कमाएं फिर भी दो या तीन बच्चों की ही अच्छी परवरिश कर सकते हैं। इस प्रकार की स्वप्रेरित परिवार नियोजन ने स्थिति को कुछ हद तक संतुलित कर रखा है अन्यथा हमारे देश की जनसंख्या की विस्फोटक स्थिति न जाने कब की सोमालिया और सूडान जैसी भयावहता में जा पहुंची होती। फिर भी आज की स्थिति भी कोई बहुत खुश होने वाली नहीं है। भारत की जनसंख्या बीते एक दशक में 18.1 करोड़ बढ़कर अब 1.21 अरब से भी अधिक हो गई है। जनगणना के पिछले आंकड़ों के अनुसार, देश में पुरुषों की संख्या 62.37 करोड़ और महिलाओं की संख्या 58.64 करोड़ है। चिंताजनक तथ्य यह है कि छह वर्ष तक की उम्र के बच्चों में लिंगानुपात में आजादी के बाद से सर्वाधिक बढ़त हुई है। पिछली गणना में यह प्रति हजार लिंगानुपात 927 था जो अब घटकर 914 हो गया है। यह भी तनिक पिछले आंकड़े हैं। जनसंख्या में वृद्धि के कारण पर्यावरण, आवास, रोजगार की समस्या के साथ-साथ अन्य सामाजिक समस्याएं भी उत्पन्न हो रही हैं। बढ़ती आबादी पर अगर नियन्त्रण नहीं किया गया तो आने वाले समय में स्थिति और भयावह हो जायेगी। प्राकृतिक संसाधन सीमित हैं और इनका अंधाधुंध दोहन समूची मानव सभ्यता को विनाश के कगार पर लाकर खड़ा कर सकता है। अनियन्त्रित आबादी से न सिर्फ आर्थिक संकट पैदा हो रहा है बल्कि भ्रष्टाचार में भी वृद्धि हो रही है। अनियन्त्रित आबादी के कारण जल, वायु, खनिज तथा ऊर्जा के परम्परागत स्रोतों का अनियोजित दोहन हमें मानव जीवन के पतन की ओर ले जा रहा है। वनों की अंधाधुंध कटाई तथा कृषि योग्य भूमि की लगातार घटती उर्वराशक्ति गम्भीर चुनौतियां हैं जिन्हें हल्के से नहीं लिया जा सकता है।
उदारीकरण की मौजूदा व्यवस्था में उद्योगों की स्थापना के लिये कृषि योग्य भूमि का अधिग्रहण करके उसे औद्योगिक क्षेत्र में बदलने का कार्य जारी है। औद्योगीकरण के विस्तार से भारत अनेक वस्तुओं के उत्पादन में आत्मनिर्भर तो हुआ है किन्तु इससे कृषि योग्य भूमि को हानि भी हुई है। भारत में काम-काज के अन्य विकल्पों की उपलब्धता के अवसर सीमित हैं। इसलिये जनसंख्या वृद्धि का समूचा बोझ कृषि पर है। सीमान्त और छोटी जोतों का प्रतिशत लगातार बढ़ रहा है। सन 2020 तक कृषि जोतों का आकार 0.11 हेक्टेयर रह जाने का अनुमान लगाया जा रहा है, जिसमें अब एक वर्ष भी नहीं बचे हैं। इसका कृषि उत्पादन पर प्रतिकूल असर पड़ेगा। जो विस्फोटक हो चली जनसंख्या का पेट नहीं भर सकेगी और हमें दुनिया के दूसरे देशों के आगे हाथ फैलाना पड़ेगा। जनसंख्या की बढ़त के कारण रिहायशी क्षेत्र निरंतर बढ़ रहा है जिससे जंगल और जलस्रोत नष्ट होते जा रहे हैं। पर्यावरण असंतुलित हो रहा है। न तो पीने को शुद्ध जल है, न सांस लेने को शुद्ध हवा। हर तरफ प्रदूषण के बढ़ते साम्राज्य के बीच हम स्वस्थ पीढ़ी की कल्पना भला कैसे कर सकते हैं?
देश का प्रत्येक राज्य विश्व जनसंख्या दिवस को सरकारी स्तर पर उत्सवी हो कर मनाता है किन्तु यह उत्सव तभी सार्थक साबित हो सकेगा जब लैंगिक असमानता को समाप्त कर के जनसंख्या पर नियंत्रण पा लेंगे। तभी प्रकृतिक संसाधन बचेंगे, देश की अर्थव्यवस्था बचेगी और हम सुनहरे भविष्य की सच्ची आशा कर सकेंगे। जिस मध्यप्रदेश और मध्यप्रदेश के बुंदेलखंड में अन्य प्रदेशों से आ कर लोग आजीविका पाते थे उसी बुंदेलखंड से आज लोगों को अपनी खेती-किसानी छोड़ कर पलायन करना पड़ रहा है। संसाधनों का उचित वितरण न होना तथा अनेक स्थानों पर आवश्यकता से अधिक दोहन कर लिया जाना जनसंख्या के अनुपात में संसाधनों को तेजी से घटा रहा है। अतः जहां एक ओर आर्थिक व्यवस्थाओं को दुरुस्त करने की जरूरत है, वहीं जनसंख्या पर नियंत्रण की भी महती आवश्यकता है। पूर्व प्रधानमंत्री स्व. इंदिरा गांधी के समय परिवार नियोजन अभियान चलाया गया किन्तु आंकड़ों का खेल खेलने वालों ने नसबंदी अभियान को ऐसी विद्रूपता तक पहुंचा दिया कि कांग्रेस सरकार को ही सत्ता से हाथ धोना पड़ा। कहने का आशय ये है कि इसके लिए ईमानदारी से जनजागरुकता अभियान चलाया जाना की जरूरी है। आंकड़ों का खेल खेलते हुए हम जनसंख्या को नियंत्रित नहीं कर सकते हैं और न ही एक दिन ‘जनसंख्या दिवस’ पर लेक्चर दे कर, फेरियां लगा कर अथवा बच्चों की प्रतियोगिताएं करा कर जनसंख्या की बढ़ती दर की गंभीरता के प्रति प्रभावी कदम उठा पाएंगे। सिर्फ एक दिन नहीं, बल्कि 365 दिन इस बात की जरूरत है कि हम उन लोगों में जनसंख्या-नियंत्रण की जागरूकता लाएं जो आज भी लिंगभेद और जितने हाथ उतनी कमाई के सिद्धांत पर जी रहे हैं। हमारी सरकार जिस बड़े दृष्टिकोण और योजनाओं को ले कर चल रही है वह भी तभी फलीभूत हो सकेगा जब संसाधनों और जनसंख्या में संतुलन बना रहेगा।
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(दैनिक ‘सागर दिनकर’, 10.07.2019)
 
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Friday, January 18, 2019

चर्चा प्लस ... संक्रांति के राजनीतिक लड्डुओं में चार्जशीट का कंकड़ - डॉ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
चर्चा प्लस ...
संक्रांति के राजनीतिक लड्डुओं में चार्जशीट का कंकड़
- डॉ. शरद सिंह


मुद्दा राष्ट्र के मान और अपमान का करार दिया जाए और फिर भी चार्जशीट दायर करने में देरी हो तो सवाल उठेंगे ही। इधर संक्रांति के लड्डुओं की मिठास मुंह में घुल ही रही थी कि जेएनयू छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष कन्हैया कुमार समेत 10 आरोपियों पर राजद्रोह के आरोप में मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट के समक्ष चार्जशीट दाखिल कर दी गई। चार्जशीट दाखिले में तीन साल लग गए और दाखिल किया गया तो लोकसभा चुनाव से ठीक पहले। लिहाजा, इस बार लोकसभा चुनाव के पहले बांधे जा रहे राजनीतिक लड्डुआें में ‘जेएनयू राजद्रोह’ मामले की चार्जशीट दाखिल किया जाना मेवे का काम करेगा या कंकड़ का यह तो आने वाला समय ही बताएगा।

चर्चा प्लस ... संक्रांति के राजनीतिक लड्डुओं में चार्जशीट का कंकड़ - डॉ. शरद सिंह  Charcha Plus - Sankranti Ke Rajnitik Ladduon Me Charge Sheet Ka Kankar  -  Charcha Plus Column by Dr Sharad Singh
 तीन साल पहले का वह दृश्य जो टेलीविजन के पर्दे पर दिखा था, आज भी भूलता नहीं है। संसद पर हमले के दोषी अफजल गुरू को फांसी पर लटकाए जाने के विरोध में वर्ष 2016 में जेएनयू कैंपस में एक कार्यक्रम आयोजित किया गया था। कार्यक्रम के दौरान कथित रूप से देश विरोधी नारे लगाए गए थे। इसके बाद बीजेपी सांसद महेश गिरी और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) की शिकायत पर वसंत कुंज (उत्तर) पुलिस थाने में 11 फरवरी 2016 को अज्ञात व्यक्तियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 124ए तथा 120बी के तहत एक मामला दर्ज किया गया था। राजद्रोह एक गंभीर अपराध है और इसके लिए अधिकतम आजीवन कारावास की सजा का प्रावधान है।
जब सभी मकर संक्रांति मनाने में मग्न थे उसी दौर में जेएनयू राजद्रोह केस का जिन्न उठ खड़ा हुआ। वैसे मकर संक्रांति देश के प्रमुख पर्वो में से एक है। अलग-अलग राज्यों में स्थानीय परंपराओं के अनुसार इसे मनाया जाता है। इसी दिन से गंगा नदी के किनारे माघ मेला या गंगा स्नान का आयोजन किया जाता है। कुंभ के पहले स्नान की शुरुआत भी इसी दिन से होती है। मकर संक्रांति त्योहार विभिन्न राज्यों में अलग-अलग नाम से मनाया जाता है। उत्तर प्रदेश में मकर संक्रांति को खिचड़ी पर्व कहा जाता है. सूर्य की पूजा की जाती है। चावल और दाल की खिचड़ी खाई और दान की जाती है। गुजरात और राजस्थान में उत्तरायण पर्व के रूप में मनाया जाता है। पतंग उत्सव का आयोजन किया जाता है। आंध्रप्रदेश में संक्रांति के नाम से तीन दिन का पर्व मनाया जाता है। तमिलनाडु में किसानों का ये प्रमुख पर्व पोंगल के नाम से मनाया जाता है। महाराष्ट्र में लोग गजक और तिल के लड्डू खाते हैं और एक दूसरे को भेंट देकर शुभकामनाएं देते हैं। पश्चिम बंगाल में हुगली नदी पर गंगा सागर मेले का आयोजन किया जाता है। असम में भोगली बिहू के नाम से इस पर्व को मनाया जाता है। पंजाब में एक दिन पूर्व लोहड़ी पर्व के रूप में मनाया जाता है। सूर्य के एक राशि से दूसरी राशि में जाने को ही संक्रांति कहते हैं। संक्रांति में दाल-चावल की खिचड़ी पकाई और खिलाई जाती है। इस बार लोकसभा चुनाव के पहले बांधे जा रहे राजनीतिक लड्डुआें में ‘जेएनयू राजद्रोह’ मामले की चार्जशीट दाखिल किया जाना मेवे का काम करेगा या कंकड़ का यह तो आने वाला समय ही बताएगा।
यह किसी से छिपा नहीं है। छोटे-छोटे विवादों और मामूली अपराधों के मामलों की सुनवाई में अरसा लग जाता है। देश में निचली अदालतों का कमोबेश यही हाल है, जहां मुकदमे बरसों-बरस घिसटते रहते हैं। दीवानी मुकदमे तो पीढ़ियों तक भी खिंच जाते हैं। न्याय में देरी के मामले न्याय प्रणाली में मौजूद विसंगतियों और गंभीर खामियों की तरफ ही इशारा करते हैं। अदालतों की कार्यप्रणाली कछुआ चाल वाली है। पर केवल अदालतों को दोष क्यों दें, कार्यपालिका भी कम दोषी नहीं है, क्योंकि न्यायिक ढांचे के पर्याप्त विस्तार के लिए संसाधन मुहैया कराना उसी की जिम्मेवारी है। पर सरकारें इस तरफ से उदासीन ही रही हैं। निचली अदालतों से लेकर सर्वोच्च अदालत तक, कुल मिलाकर तीन करोड़ से ज्यादा मुकदमे लंबित हैं। लेकिन राजद्रोह के मामले में चार्जशीट दाखिल करने में तीन साल का समय लग जाना शायद किसी और देश में संभव नहीं है।

तीन साल बाद दाखिल की गई चार्जशीट में कन्हैया कुमार, उमर खालिद और अनिर्बन समेत 10 आरोपियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 124ए (राजद्रोह), 323 (किसी को चोट पहुंचाने के लिए सजा), 465 (जालसाजी के लिए सजा), 471 (फर्जी दस्तावेज या इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड को वास्तविक के तौर पर इस्तेमाल करना), 143 (गैरकानूनी तरीके से एकत्र समूह का सदस्य होने के लिए सजा), 149 (गैरकानूनी तरीके से एकत्र समूह का सदस्य होना), 147 (दंगा फैलाने के लिए सजा) और 120बी (आपराधिक षडयंत्र) के तहत आरोप लगाए गए हैं। पुलिस ने दावा किया कि उसके पास अपराध को साबित करने के लिये वीडियो क्लिप है, जिसकी गवाहों के बयानों से पुष्टि हुई है। पुलिस का कहना है कि कन्हैया कुमार जुलूस की अगुवाई कर रहे थे और उन्होंने जेएनयू परिसर में फरवरी 2016 में देश विरोधी नारे लगाए जाने का कथित तौर पर समर्थन किया था। पुलिस ने यह भी बताया कि आरोपपत्र में भाकपा नेता डी राजा की पुत्री अपराजिता, जेएनयूएसयू की तत्कालीन उपाध्यक्ष शहला राशिद, राम नागा, आशुतोष कुमार और बनोज्योत्सना लाहिरी सहित 36 अन्य लोगों के नाम हैं क्योंकि इन लोगों के खिलाफ सबूत अपर्याप्त हैं।
घटना के दौरान कन्हैया कुमार अखिल भारतीय छात्र परिषद को नेता था। यह अखिल भारतीय छात्र परिषद भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की स्टूडैंट विंग है। कन्हैया कुमार को सन् 2015 में जेएनयू (जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय) छात्रसंघ के अध्यक्ष पद के लिए चुना गया था। फरवरी 2016 में जेएनयू में एक कश्मीरी अलगाववादी, 2001 में भारतीय संसद पर हमले के दोषी, मोहम्मद अफजल गुरु को फांसी दिए जाने के खिलाफ एक छात्र रैली में राष्ट्रविरोधी नारे लगाने के आरोप में देशद्रोह का मामला दर्ज किया गया था। कन्हैया कुमार को तब दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार भी किया था। फिर 2 मार्च 2016 में अंतरिम जमानत पर रिहा कर दिया गया था, क्योंकि राष्ट्र विरोधी नारों में भाग लेने का पुलिस द्वारा कन्हैया कुमार का कोई सबूत प्रस्तुत नहीं किया गया। उल्लेखनीय है कि जेएनयू के कुलपति द्वारा गठित एक अनुशासन समिति ने भी विवादास्पद घटना की जांच की। वहीं, प्रारंभिक जांच रिपोर्ट के आधार पर, कन्हैया कुमार और सात अन्य छात्रों को अकादमिक तौर पर वंचित कर दिया गया। कन्हैया कुमार पर राजद्रोह का मुकादमा चलाया गया। इस बीच कन्हैया कुमार की आटोबायोग्राफिक किताब भी छपी जिसका नाम है- ‘बिहार टू तिहार’।

जहां एक ओर राजनीति में अपराध की घुटपैंठ को रोकने की बात की जाती है वहीं संदिग्ध आरोपी को राजनीतिक प्रचार करने की छूट दी जाती है। या तो पहले क्लीनचिट दी जाती फिर चुनाव प्रचार से रोका जाना चाहिए था। क्योंकि मामला मामूली नहीं देश के मान-सम्मान का था। दूसरी ओर यदि कन्हैया कुमार राजनीति करने की आजादी थी तो शेष आजादी से उसे क्यों वंचित रखा गया? स्वाभाविक है कि इस तरह के प्रश्न प्रकरण को कमजोर बना सकते हैं। चार्जशीट दाखिल किए जाने के बाद कन्हैया कुमार ने आरोप पत्र को ’राजनीति से प्रेरित’ बताते हुए लोकसभा चुनाव से कुछ महीने पहले इसे दायर किए जाने पर इसके समय को लेकर सवाल उठाया। कन्हैया कुमार ने मीडिया से यह भी कहा, ’मुझे कोई समन या अदालत से कोई सूचना नहीं मिली है। लेकिन अगर यह सही है तो हम पुलिस और प्रधानमंत्री मोदी के शुक्रगुजार हैं कि आखिरकार तीन साल बाद जब उनके और उनकी सरकार के जाने का वक्त आ गया है तो आरोपपत्र दायर किया गया है। लेकिन लोकसभा चुनाव से ठीक पहले आरोपपत्र का दायर किया जाना प्रासंगिक है।’’ कन्हैया कुमार ने यह भी कहा कि ‘‘इस मामले में सनी देओल की फिल्म की तरह तारीख पर तारीख न दी जाए। उन्होंने कहा कि कोर्ट में स्पीडी ट्रायल चलाया जाए और फैसला सुनाया जाए। उन्होंने कहा कि मैं निर्दोष हूं, मुझे देश की न्याय व्यवस्था पर पूरा विश्वास है। कन्हैया ने बेगूसराय में कहा कि सरकार के पास कोई मुद्दा ही नहीं बचा है इसलिए वो ऐसे मामले को तूल दे रही है। केंद्र सरकार सिर्फ पाकिस्तान, मंदिर और हिंदू-मुसलमान की बात कर रही है। उन्होंने कहा कि सरकार पूरी तरह डिप्रेशन के दौर में आ गई है और दोबारा सत्ता पाने के लिए वह किसी भी हद से गुजरने को तैयार है।’’
वहीं, उमर खालिद ने बेंगलुरू में सेंट जोसेफ कॉलेज में छात्रों के एक समूह को ‘संविधान की रक्षा में युवकों की भूमिका’ विषय पर संबोधित किया। खालिद ने कहा कि हम आरोपों को खारिज करते हैं। कथित घटना के तीन साल बाद आरोपपत्र दाखिल करने का कदम चुनावों के ठीक पहले ध्यान भटकाने का एक प्रयास है। शहला राशिद ने कहा कि यह पूरी तरह से एक फर्जी मामला है जिसमें अंततः हर कोई बरी हो जाएगा। चुनावों के ठीक पहले आरोपपत्र दाखिल किया जाना दर्शाता है कि किस प्रकार भाजपा इससे चुनावी फायदा उठानी चाहती है। मैं घटना के दिन परिसर में भी नहीं थी। वहीं, भाकपा नेता डी राजा ने कहा कि यह राजनीति से प्रेरित है। तीन साल बाद दिल्ली पुलिस इस मामले में आरोपपत्र दाखिल कर रही है। हम इसे अदालत में और अदालत के बाहर राजनीतिक रूप से लड़ेंगे।

राजनीति में स्वार्थ साधने की कला में सभी माहिर होते हैं। हर दल अपने-अपने ढंग से मामले का व्याख्याकार बन बैठता है। कन्हैया के समर्थन में तेजस्वी भी आ गए। उन्होंने यह भी कहा कि बीजेपी के खिलाफ मुंह खोलने वालों को सीबीआई, इडी, इनकम टैक्स जैसी एजेंसियों से डराया जाता है। इसके अलावा उन्होंने यूपी की राजनीति पर कहा कि हम चाहते हैं कि बीजेपी के खिलाफ पूरे देश में गठबंधन बने। कुल मिला कर राजद्रोह मामले की रेलगाड़ी को एक बार फिर राजनीति की पटरी पर चलाने की जोड़-तोड़ गरमाने लगी है। बहरहाल, जेएनयू राजद्रोह मामले में आरोपपत्र का संज्ञान लेना या नहीं लेना मुख्य मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट पर निर्भर करेगा। लेकिन संक्रांति के लड्डुओं के बीच चार्जशीट का कंकड़ तो आ ही गया है।
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(दैनिक ‘सागर दिनकर’, 17.01.2019)
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Thursday, November 22, 2018

चर्चा प्लस .. बुंदेलखण्ड में राजनीति, चुनाव और महिलाएं - डॉ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
चर्चा प्लस ... 

बुंदेलखण्ड में राजनीति, चुनाव और महिलाएं
- डॉ. शरद सिंह 

बात आती है महिला वोट उगाहने की तो महिलाओं के हित में बड़ी-बड़ी घोषणाएं होने लगती हैं और बड़ी तत्परता से अलग महिला बूथ भी बनाए जाने लगते हैं। वहीं दूसरी ओर राजनीति में महिला आरक्षण को दरकिनार कर दिया जाता है। ऐसी दशा में बुंदेलखण्ड जैसा क्षेत्र जहां महिलाएं अपने बहुमुखी विकास के लिए अभी भी अनुकूल वातावरण की बाट जोह रही ह
ैं, राजनीतिक दलों द्वारा अविश्वास की शिकार हो रही हैं। बड़ी विचित्र स्थिति है। इस स्थिति से उबरने के लिए स्वयं महिलाओं को अभी लम्बा संघर्ष करना होगा और इसके लिए जरूरी है कि वे इस बार के चुनाव में बिना किसी प्रलोभन में आए सही उम्मीवार को चुन कर अपने भविष्य की रूपरेखा तय करें। यह आशा कठिन है लेकिन असंभव नहीं।
चर्चा प्लस .. बुंदेलखण्ड में राजनीति, चुनाव और महिलाएं - डॉ. शरद सिंह Charcha Plus a column of Dr (Miss) Sharad Singh in Sagar Dinkar, Daily, Sagar M.P.
चुनावों की टिकट वितरण के पूर्व मैंने अपने इसी कॉलम में विगत 08 अगस्त 2018 को लिखा था -‘‘चुनावों के निकट आते ही सबसे पहले प्रश्न उठते हैं, किसको टिकट मिलेगी और किसको नहीं? कौन-सा राजनीतिक दल अपने उम्मीदवारों में महिलाओं का प्रतिशत बढ़ाएगा? लेकिन क्या महिला उम्मीदवारों के आंकड़े बढ़ने से ही राजनीति में महिलाओं की पकड़ बढ़ जाएगी? सच तो यह है कि चुनाव निकट आते ही महिलाओं की तरफ़दारी करने वाले बयानों की बाढ़ आ जाती है किन्तु चुनाव होते ही किए गए वादे ठंडे बस्तों में बंधने लगते हैं, विशेषरूप से राजनीति में महिलाओं के प्रतिशत को ले कर। बुंदेलखंड के संदर्भ में देखा जाए तो बहुत ही विचित्र स्थिति दिखाई देती है। बुंदेलखंड जो दो राज्यों मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश में फैला हुआ है, दोनों की एक साथ बात की जाए तो आंकड़ों के अनुसार राजनीति में महिलाओं की स्थिति काफी बेहतर दिखाई देती है। लेकिन ज़मीनी सच्चाई आंकड़ों के परिदृश्य से अलग ही तस्वीर दिखाती है। .... इस बार आमसभा चुनावों में कौन-सा राजनीतिक दल अपने उम्मीदवारों की सूची में महिलाओं का प्रतिशत बढ़ाएगा? यह एक अहम प्रश्न है जिसका उत्तर सूची जारी होने पर ही मिलेगा।’’
जब टिकटों की घोषणा हुई तो यह देख कर अत्यंत निराशा हुई कि किसी भी राजनीतिक दल ने महिला उम्मींदवारों पर विश्वास नहीं किया। उनकी संख्या आश्चर्यजनक आंकड़ों तक सीमित है। अतीत में झांक कर देखें तो 1957 से लेकर 2012 तक हुए पन्द्रह विधान सभा चुनावों में बुंदेलखण्ड के उत्तरप्रदेश वाले भाग में से लगभग 15 महिलाएं विधायक रही हैं। इनमें भी 11 दलित वर्ग से, 3 पिछड़े वर्ग से और एक सामान्य वर्ग से। यह आंकड़ा उस प्रदेश के बुंदेली भू-भाग का है जहां की मायावती के रूप में एक महिला मुख्यमंत्री के पद पर रह चुकी है और साबित कर चुकी है कि महिलाएं राजनीति में अपना सिकका जमा सकती हैं। सन् 1957 में हुए विधानसभा चुनाव में पहली बार कांग्रेस की बेनीबाई झांसी जिले की मऊरानीपुर (अनुसूचित जाति के लिए सुरक्षित) सीट से चुनाव जीतकर विधानसभा में अपनी आमद दर्ज कराई थी। इसके बाद 1962 में इसी दल की सियादुलारी ने बांदा जिले की मऊ-मानिकपुर (अब चित्रकूट जिला) सीट से और बेनीबाई दोबारा मऊरानीपुर से विधायक बनी थीं। सन् 1967 में बेनीबाई तीसरी बार चुनी गईं और 1969 के चुनाव में कांग्रेस की ही सियादुलारी दोबारा अपनी सीट से विधायक चुनी गईं.। 1974 के चुनाव में जहां बेनीबाई चौथी बार चुनाव जीतीं। वहीं जेपी आंदोलन के चलते उन्हें 1977 में हार का सामना भी करना पड़ा। वर्ष 1980 के चुनाव में बेनीबाई झांसी की बबीना सीट से जीत दर्ज की और छठीं बार वह इसी सीट से 1985 के चुनाव में विधायक बनीं। इस प्रकार कांग्रेस के टिकट पर वह छह बार विधायक बनीं। वर्ष 1989 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की सियादुलारी मऊ-मानिकपुर सीट से तीसरी बार विधायक चुनी गईं। साल 2002 के चुनाव में अंब्रेस कुमारी समाजवादी पार्टी के टिकट पर महोबा जिले की चरखारी सुरक्षित सीट से विधायक चुनी गईं थी और 2012 के चुनाव में झांसी के मऊरानीपुर (अनुसूचित जाति सुरक्षित) सीट से सपा की डॉ. रश्मि आर्या चुनी गईं थी। वर्ष 1977 में जेएनपी के टिकट पर सूर्यमुखी शर्मा झांसी सीट से चुनाव जीता था और 2012 के चुनाव में भाजपा की उमा भारती चरखारी सीट और हमीरपुर सीट से भाजपा की ही साध्वी निरंजन ज्योति ने चुनाव जीता था। वर्ष 2015 में चरखारी सीट में हुए उप चुनाव में सपा की उर्मिला राजपूत ने जीत हासिल कर के अपने राजनीतिक दखल को साबित किया था। ये आंकड़े और इतिहास था बुंदेलखण्ड के उत्तर प्रदेश के भू-भाग का। मध्यप्रदेश के बुंदेली भू-भाग की दशा इससे अलग नहीं है।
बुंदेलखंड के संदर्भ में कहा जाता है कि मंच पर महिलाओं को लुभाने की बातें करना, योजनाएं बनाना अलग बात है और चुनाव जीतकर सत्ता पाना अलग। महिलाओं को पर्याप्त संख्या में चुनाव में उम्मीदवार न बनाया जाना अपने आप में राजनीतिक दलों के महिला हितों के दावों पर प्रश्नचिन्ह लगाने लगता है। मध्यप्रदेश में भी टीकमगढ़ ऐसा क्षेत्र है जहां से उमा भारती के रूप में महिला मुख्यमंत्री प्रदेश को मिली। उनका अल्पकालिक कार्यकाल भी इस मायने में महत्वपूर्ण है कि उनके कार्यकाल में ‘पंचज’ योजना (जल, जंगल, जमीन, जन और जानवर) पर ध्यान दिया गया। इसके बावजूद किसी भी राजनीतिक दल ने राजनीति में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए विधानसभा चुनावों में महिला उम्मींदवार नहीं बढ़ाए। वर्तमान में मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में सागर, छतरपुर, टीकमगढ़, पन्ना और चंबल संभाग में दतिया एवं शिवपुरी की 30 विधानसभा सीटों में से भाजपा के पास 22 और कांग्रेस के पास आठ सीटें हैं।
पिछले चुनाव में पन्ना से कुसुम सिंह मेहदेले चुनाव जीतीं और मंत्री पद भी उन्हें प्रदान किया गया। जहां तक बुंदेलखण्ड के मध्यप्रदेशीय सम्भागीय मुख्यालय सागर का प्रश्न है तो यहां का इतिहास महिलाओं की दृष्टि से गौरवपूर्ण रहा है। केंद्र में बनीं अंतरिम सरकार में सागर की विदुषी कलावती दीक्षित को सदस्य मनोनीत किया गया था। केंद्र की अंतरिम सरकार में सागर सपूत डा. हरीसिंह गौर सदस्य थे। 25 दिसंबर 1948 को उनके आकस्मिक निधन के बाद कलावती दीक्षित को संविद सरकार में सदस्य बनाया गया था। इस तरह सागर से सांसद बनने वाली वे पहली महिला थीं। इसके बाद गोवा क्रांति में गोली खाकर भी तिरंगा थामने वाली सहोद्राबाई राय सागर से 1957 में पहली बार सांसद बनीं। वे सागर से तीन बार सांसद चुनी गईं। बुंदेलखंड से उमा भारती ने 2003 में मुख्यमंत्री का पद संभाला। वे इस क्षेत्र से मुख्यमंत्री पद पर पहुंचने वाली पहली महिला थीं। 1993 में सागर से सुधा जैन विधायक निर्वाचित हुईं। वे भी 1998 और 2003 में लगातार सागर से विधायक चुनी गईं।
विगत चुनाव में भाजपा टिकट से पारुल साहू ने सुरखी विधान सभा से चुनाव जीता था किन्तु इस बार उन्होंने स्वयं ही चुनाव न लड़ने का फैसला किया। सवाल इस बात का नहीं है वे किस पार्टी से संबंद्ध हैं, सवाल यह है कि एक तो महिलाओं को राजनीति में यूं भी कम स्थान दिया जाता है उस पर एक सुशिक्षित, कर्मठ महिला का चुनाव से पीछे हटना दुर्भाग्यपूर्ण ही कहा जाएगा। पिछले चुनाव में पृथ्वीपुर विधान सभा की अनितानायक चुनाव जीत कर विधायक बनीं। छतरपुर की ललिता यादव को इस बार उनका पिछला क्षेत्र बदल कर बड़ामलहरा क्षेत्र दे दिया गया। ज़मीनी तौर पर देखा जाए तो अकेले सागर में कई ऐसी महिलाएं हैं जो विभिन्न दलों में रहती हुई निरंतर सक्रिय रहती हैं फिर भी टिकट के समय उन्हें समीकरण से बाहर ही रखा गया। रेखा चौधरी, इन्दु चौधरी, लता वानखेड़े, शारदा खटीक, कुसुम सुरभि, रंजीता राणा आदि ऐसी कई महिलाएं हैं जिनकी राजनीतिक सक्रियता अख़बारों की सुर्खियों में रहती है और इनमें से कुछ तो राजनीतिक परिवारों से भी हैं। राजनीतिकदल चाहते तो इन महिलाओं को ले कर भी चुनावी समर लड़ सकते थे, क्यों कि जीत का शत प्रतिशत दावा तो कोई भी उम्मीदवार नहीं कर सकता है। यही तो लोकतंत्र की विशेषता है।
चुनाव आते ही स्टारप्रचारक और राष्ट्रीय स्तर के नेता बड़ी-बड़ी बातें ले कर हाजिर होने लगते हैं। फिर बात आती है महिला वोट उगाहने की तो महिलाओं के हित में बड़ी-बड़ी घोषणाएं होने लगती हैं और बड़ी तत्परता से अलग महिला बूथ भी बनाए जाने लगते हैं। वहीं दूसरी ओर राजनीति में महिला आरक्षण को दरकिनार कर दिया जाता है। ऐसी दशा में बुंदेलखण्ड जैसा क्षेत्र जहां महिलाएं अपने बहुमुखी विकास के लिए अभी भी अनुकूल वातावरण की बाट जोह रही हैं, राजनीतिक दलों द्वारा अविश्वास की शिकार हो रही हैं। बड़ी विचित्र स्थिति है। इस स्थिति से उबरने के लिए स्वयं महिलाओं को अभी लम्बा संघर्ष करना होगा और इसके लिए जरूरी है कि वे इस बार के चुनाव में बिना किसी प्रलोभन में आए सही उम्मीवार को चुन कर अपने भविष्य की रूपरेखा तय करें। यह आशा कठिन है लेकिन असंभव नहीं।
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(दैनिक ‘सागर दिनकर’, 21.11.2018)

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Thursday, February 15, 2018

चर्चा प्लस ... शिवरात्रि पर्व पर विशेष : खजुराहो के शिव का शिल्पसौंदर्य ... डॉ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
चर्चा प्लस - 
शिवरात्रि पर्व पर विशेष :
खजुराहो के शिव का शिल्पसौंदर्य
- डॉ. शरद सिंह 


शिव समस्त संसार का कल्याण करने वाले देवता माने गए हैं। समुद्र-मंथन से निकला हुआ गरल यानी विष स्वर्ग में निवास करने वाले देवताओं को भी भस्म कर सकता था यदि शिव उसे अपने गले में धारण नहीं करते। आदि ग्रंथों एवं पुराणों में शिव के विविध रूपों का वर्णन मिलता है। यहां मैं अपनी पुस्तक ‘खजुराहो की मूर्तिकला के सौंदर्यात्मक तत्व’ का वह अंश दे रही हूं जिसमें खजुराहो की शिव प्रतिमाओं की पूर्ण विविधता का विवरण है।

Shivratri Pr Vishesh - Khajuraho Ke Shiv Ka Shilp Saundarya - Charcha Plus Column of Dr Sharad Singh in Sagar Dinkar Dainik

‘शिवपुराण’ के अनुसार जब देवताओं और असुरों ने समुद्र-मंथन किया तो उसमें हलाहल विष निकला। यह इतना घातक था कि देवताओं को भी भस्म कर सकता था। देवता हलाहल विष की विषाक्तता से भयभीत हो उठे तक शिव ने आगे बढ़ कर उस विष का पान कर लिया। लेकिन वे भी उसे यदि अपने गले से नीचे पेट में उतरने देते तो वह विष शिव को भी क्षति पहुंचा सकता था अतः विष को शिव ने अपने गले में ही रोक लिया जिससे शिव का गला नीला पड़ गया और वे नीलकंठ कहलाए। विष को गले में धारण करने के बावजूद उसका प्रभाव इतना तेज था कि उनके शरीर में जलन होने लगी और उन्हें गरती का अनुभव होने लगा तब वे हिमालय की ओर आकाशमार्ग से चल पड़े। बीच में विंध्य पर्वत के ऊपर से गुज़रते हुए उन्हें शीतलता का अनुभव हुआ और वे कुछ समय के लिए वहीं रुक गए। वह विश्रामस्थल कालंजर था। उस समय कालंजर में निवास कर रही देवी उमा से शिव ने विवाह किया और दोनों साथ-साथ कुछ समय वहां रहे। इसके बाद देवी उमा कामाख्या चली गईं और शिव हिमालय के लिए निकल पड़े। इस पौराणिक कथानक के आधार पर कालंजर में उमा-महेश्वर की अनेक प्रतिमाओं से ले कर विवाहमंडप तक मिलता है। शिल्पकारों ने जिस सुंदरता से कालंजर में नीलंकठ एवं उमा-महेश्वर के विवाह की कथा को पत्थरों में तराशा है ठीक उसी प्रकार खजुराहो में शिव के विवध रूपों की अनेक प्रतिमाएं हैं जो पौराणिक कथाओं पर आधारित हैं। सन् 2000 में डॉक्टरेट की उपाधि के लिए खजुराहो की मूर्तिकला पर शोध करते समय और उसके बाद ‘खजुराहो की मूर्तिकला के सौंदर्यात्मक तत्व’ पुस्तक लिखते समय मुझे खजुराहो के मंदिरों में मौजूद शिव प्रतिमाओं की सम्पूर्ण विविधता को देखने और जानने का अवसर मिला। मेरी यह पुस्तक सन् 2006 में विश्वविद्यालय प्रकाशन, चौक, वाराणसी, उ.प्र. से प्रकाशित हुई। खजुराहो के मंदिर 950 से 1050 ई. के मध्य निर्मित हुए जिनमें मातंगेश्वर मंदिर प्राचीनतम हैं। विश्वनाथ मंदिर, लक्ष्मण और कंदरिया महादेव मंदिर के बीच की कड़ी है। इस मंदिर के मंडप दीवार पर लगे शिलालेख से पता चलता है, कि धंग द्वारा 1002 ई. में शंभु मरकतेश्वर के मंदिरों का निर्माण कराया गया था जिसमें मरकत तथा पाषाण निर्मित दो लिंगों की स्थापना का उल्लेख है। वर्तमान में पाषाण लिंग ही शेष है। इसी मंदिर के ठीक सामने नंदी मंदिर स्थित है। यह विश्वनाथ मंदिर का समकालीन है।
त्रिदेव में तीसरे देवता महेश अर्थात शिव हैं। जिनकी विविधता पूर्ण अनेक प्रतिमाएं खजुराहो के मंदिरों में मिलती है। ये एक ऐसे देव है जिनकी आराधना वैदिक काल से पूर्व सैन्धव युग में की जाती थी। वैदिक काल में शिव कारूद्र रूप अधिक प्रसिद्ध रहा। सांख्यायन तथा कौशितकि उपनिषदों में शिव, रूद्र, महादेव, महेश्वर, ईशान आदि नाम आते हैं। महाभारत में शिव के सहस्त्र नामों का उल्लेख हुआ है। उनके लिये शंकर, ईशान, शर्व, नीलकंठ, त्रयम्बक, धूर्जटि, नंदीश्वर, शिखिन, व्योमकेश, महादेव आदि नाम आये हैं। इन सभी रूपों में आयुध प्रतीकों की भिन्नता पायी जाती है, कभी शिव के हाथ में डमरू, खड्ग, खेटक, पारा तथा त्रिशूल रहता है तो कभी खप्पर, रूद्राक्षमाला, तलवार, धनुष, खट्वांग तथा ढाल आदि आयुध प्रतीक रहते हैं। खजुराहो में निर्मित शिव मूर्तियों में चतुर्भुजी, अष्टभुजी, बारहभुजी, सोलहभुजी रूप मिलते है। जिनमें विविध आयुध प्रदर्शित है।
चतुर्भुजी नटराज - दूला देव मंदिर में चतुर्भुज नटराज की मूर्ति है जिसमें उनकी प्रथम तीन भुजाओं में क्रमशः त्रिशूल, डमरू, खप्पर (कपाल) है जबकि चौथी भुजा भग्नावस्था में है। कुछ प्रतिमाओं में एक भुजा में अग्नि लिये हुये भी प्रदर्शित किया जाता है।
अष्टभुजी नटराज - खजुराहो संग्रहालय में स्थित अष्टभुजी प्रतिमा में उनकी आठों-भुजाओं में क्रमशः त्रिशूल, खड्ग, डमरू, खेटक, खट्वांग तथा खप्पर हैं। एक अन्य प्रतिमा में त्रिशूल, पाश, डमरू, अभय, कपाल अग्नि तथा घंटा प्रदर्शित है।
बारह भुजी नटराज - दूलादेव मंदिर में बारहभुजी नटराज की एक सुन्दर प्रतिमा है जिसमें बायां पैर नृत्य मुद्रा में उठा हुआ है। भुजाओं में त्रिशूल, पाश, डमरू, खेटक, खट्वांग, खड्ग, खप्पर, दृष्टिगत् है।
कल्याण सुन्दर शिव - शिव का कल्याण सुन्दर रूप शिव पार्वती के विवाह के अवसर का है। खजुराहो संग्रहालय, वामन मंदिर तथा भरत चित्रगुप्त मंदिर में स्थित कल्याण सुन्दर शिव को त्रिशूल के आयुध प्रतीक से युक्त दिखाया गया है।
नीलकंठ - खजुराहो के विभिन्न मंदिरों में नीलकंठ शिव की मूर्तियां हैं। कंदरिया मंदिर में नीलकंठ की भुजाओं में पदम, त्रिशूल, खट्वांग, तथा विषपात्र है। भरत चित्रगुप्त मंदिर में नीलकंठ को विषपात्र, त्रिशूल खट्वांग कमंडलु, डमरू तथा कमल सहित दिखाया गया है। एक अन्य प्रतिमा में नीलकंठ को खप्पर, डमरू, कमल तथा खट्वांग धारी दिखाया गया है। लक्ष्मण मंदिर तथा कंदरिया मंदिर में उन्हें विषपात्र, डमरू, खट्वांग तथा कमंडलु युक्त प्रदर्शित किया है। पार्श्वनाथ मंदिर में आलिंगनबद्ध नीलकंठ की भुजाओं में खट्वांग एवं कमल नाल दिखाया गया है।
अघोर शिव - जगदंबा मंदिर में अघोर शिव की प्रतिमा है। जिसमें उन्हें शूल, डमरू, पाश, दंड, धारण किये हुये बताया गया है। पार्श्वनाथ मंदिर में खट्वांग, पुस्तक तथा नीलकंठ पक्षी धारी अघोर शिव है। पार्श्वनाथ मंदिर में शिव के हाथ में घंटिका है। कंदरिया महादेव मंदिर में अष्टभुजी अघोर प्रतिमा है। जिसमें खप्पर, त्रिशूल, शक्ति डमरू, घंटिका, सर्प, खट्वांग तथा कमंडलु दिखाया गया है। विश्वनाथ मंदिर में अघोर शिव त्रिशूल डमरू घंटिका गदा और कमंडलुधारी हैं। दूलादेव मंदिर में शिव अघोर की वरद् मुद्रा, सर्प, त्रिशूल, डमरू, खट्वांग और कमंडलु धारी हैं।
गज संहार शिव - खजुराहो में गज संहार शिव की विभिन्न प्रतिमायें हैं। कंदरिया महादेव मंदिर में सोलह भुजी गज संहार शिव है। जबकि कुछ अन्य प्रतिमायें बारहमुखी हैं। शिव के इस रूप में उन्हें त्रिशूल वज्र डमरू तथा हाथी का चमड़ा लिये हुये प्रदर्शित किया गया है।
भैरव - खजुराहो में दो प्रकार की भैरव प्रतिमायें है। प्रथम श्वान वाहन सहित तथा दूसरी नग्न प्रतिमा है। एक अन्य प्रकार भी भैरव प्रतिमा का है जिसमें उन्हें भैरवी के साथ आलिंगन मुद्रा में दिखाया गया है। इस प्रतिमा में भैरव चक्र (छल्ला), कमल तथा घंटिका धारी हैं। कंदरिया महादेव, वामन तथा चतुर्भुज मंदिर में नग्न भैरव को पेय पात्र, डमरू, घंटी, नरमुण्ड, सहित दिखाया गया है। विश्वनाथ मंदिर, जगदम्बा मंदिर, भरत चित्रगुप्त मंदिर तथा लक्ष्मण मंदिर में भैरव पेय, डमरू, घंटी, नरमुण्ड, तथा खड्ग लिये हुये हैं। विश्वनाथ मंदिर में भैरव की एक ऐसी प्रतिमा भी है जिसमें उन्हें कमल, सर्प, खट्वांग तथा नरमुण्ड लिये हुये दिखाया गया है। इसी प्रकार लक्ष्मण मंदिर में खड्ग, घंटिका तथा सर्प सहित वामन मंदिर में खड्ग, करबाल तथा खट्वांग सहित हैं। कंदरिया मंदिर की प्रदक्षिणा में खड्ग, जगदम्बा मंदिर में पाश तथा खड्ग तथा विश्वनाथ मंदिर में खेटक, खड्ग तथा सर्प सहित भैरव हैं। श्वान वाहन युक्त भैरव प्रतिमा में गदा, डमरू, घंटिका, खप्पर, कमल तथा सर्प आयुध प्रतीक हैं। आदिनाथ मंदिर में गदा, सर्प के साथ फल प्रदर्शित हैं जबकि विश्वनाथ मंदिर की प्रदक्षिणा में गदा, खड्ग सर्प तथा नरमुण्ड और दूलादेव मंदिर में स्थित प्रतिमा में खड्ग, ढाल तथा नरमुण्ड है। जगदम्बा मंदिर में भैरव की एक ऐसी प्रतिमा भी है जिसमें उनके एक हाथ में पक्षी तथा शेष दो हाथों में घंटिका तथा खट्वांग है।
त्रिपुरान्तक - खजुराहो में आलिंगन मुद्रा की त्रिपुरान्तक प्रतिमा है। जिसमें उन्हें, घट, धनुष, बाण तथा नरमुण्ड धारण किये हुये बताया गया है।
यदि मुद्राओं के आधार पर देखा जाए तो खजुराहो में मौजूद शिव की चतुर्भज प्रतिमाओं को ही तीन श्रेणियों में बांटा जा सकता है - प्रथम श्रेणी में शिव की वे चतुर्भुजी प्रतिमायें है जिनमें शिव वरद मुद्रा में त्रिशूल, घट तथा सर्प धारण किये है। द्वितीय श्रेणी में वे शैव मूर्तियां हैं जिसमें पहली भुजा वरद अथवा अभय मुद्रा में है। तथा दूसरी भुजा में त्रिशूल है। अन्य भुजाओं में पाश, कमल अथवा पुस्तक है। तृतीय श्रेणी में शिव की वे प्रतिमायें है जिनमें शिव के दूसरी अथवा तीसरी भुजा में सर्प प्रदर्शित है जबकि पहली भुजा वरद, अभय अथवा आलिंगन मुद्रा में है। वरद मुद्रा में दूसरे हाथ में पुस्तक अथवा कमल तीसरे में सर्प और चौथे में घट प्रदर्शित है। अभय मुद्रा में दूसरे हाथ में पाश तीसरे में सर्प तथा चौथा कटि पर है।
भारतीय शिल्पकला यूं भी अत्यंत समृद्ध है और जब उसमें कथानक का समावेश हो जाता है तो ऐसा लगता है जैसे प्रतिमाएं जीवंत हो कर उन कथाओं को स्टेज पर मंचित कर रही हों। यूं भी भारत में प्रतिमा निर्माण की परम्परा बहुत प्राचीन है। खजुराहो का मूर्तिशिल्प शिव प्रतिमाओं के बिना पूर्ण हो ही नहीं सकता था। शिव जो संहारक हैं तो कल्याणकर्त्ता भी हैं। भोले हैं लेकिन दुखहर्त्ता हैं। संभवतः खजुराहो का शैव-शिल्प भी यही कहना चाहता है कि -‘शिव सबका कल्याण करें!’
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(दैनिक सागर दिनकर, 14.02.2018 )
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