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Wednesday, March 18, 2026

चित्रों के जरिए कलाकारों ने देशभक्ति और संस्कृति को रंगों में उतारा - डॉ (सुश्री) शरद सिंह, कला समीक्षक | दैनिक भास्कर

🙏 हार्दिक आभार एवं धन्यवाद #दैनिकभास्कर  🌹🙏🌹
कला भवन आर्ट क्लासेस की श्रीमती स्वाति हल्वे एवं गुरुकृपा फाइन आर्ट के हेमंत ताम्रकार के संयुक्त प्रयास से आयोजित दो दिवसीय पेंटिंग एग्जीबिशन की मेरे द्वारा की गई समीक्षा एवं विस्तृत रिपोर्ट दैनिक भास्कर में फुल स्पेस के साथ....👍

🌹हार्दिक बधाई प्रिय स्वाति एवं हेमंत 💐
#डॉसुश्रीशरदसिंह #DrMissSharadSingh #प्रदर्शनी #पेंटिंग #पेंटिंगएग्जिबिशन #paintingexhibition #artrewiev

Sunday, March 8, 2026

दैनिक भास्कर द्वारा चुनी गईं सागर शहर की विशिष्ट महिलाओं में वरिष्ठ साहित्यकार डॉ (सुश्री) शरद सिंह

हार्दिक आभार दैनिक भास्कर 🌹🙏🌹
अभीभूत हूं मेरी लेखनी के प्रति इस विश्वास के लिए...
#डॉसुश्रीशरदसिंह #DrMissSharadSingh #अंतर्राष्ट्रीयमहिलादिवस #दैनिकभास्कर #internationalwomensday #DainikBhaskar

Monday, June 9, 2025

चित्रों के जरिए कलाकारों ने देशभक्ति और संस्कृति को रंगों में उतारा - डॉ (सुश्री) शरद सिंह, कला समीक्षक | दैनिक भास्कर

🙏 हार्दिक आभार एवं धन्यवाद #दैनिकभास्कर  🌹🙏🌹
कला भवन आर्ट क्लासेस की श्रीमती स्वाति हल्वे एवं गुरुकृपा फाइन आर्ट के हेमंत ताम्रकार के संयुक्त प्रयास से आयोजित दो दिवसीय पेंटिंग एग्जीबिशन की मेरे द्वारा की गई समीक्षा एवं विस्तृत रिपोर्ट दैनिक भास्कर में फुल स्पेस के साथ....👍

🌹हार्दिक बधाई प्रिय स्वाति एवं हेमंत 💐
#डॉसुश्रीशरदसिंह #DrMissSharadSingh #प्रदर्शनी #पेंटिंग #पेंटिंगएग्जिबिशन #paintingexhibition #artrewiev

Wednesday, December 18, 2024

हार्दिक आभार " दैनिक भास्कर " मेरे बुंदेली ग़ज़ल संग्रह "सांची कै रए सुनो, रामधई" के लोकार्पण के समाचार को प्रमुखता से स्थान देने के लिए

हार्दिक आभार " दैनिक भास्कर " मेरे बुंदेली ग़ज़ल संग्रह  "सांची कै रए सुनो, रामधई" के लोकार्पण के समाचार को प्रमुखता से स्थान देने के लिए 🙏

#डॉसुश्रीशरदसिंह  #DrMissSharadSingh  #पुस्तकलोकार्पण #श्यामलम  #shyamlam  #bookrelease  #बुंदेलीग़ज़लसंग्रह  #bundelighazalsangrah  #sanchikeresunoramdhai
#दैनिकभास्कर #DainikBhaskar

Wednesday, March 8, 2023

होली पर व्यंग्य | लला, सम्हर के आइयो खेलन होरी | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | दैनिक भास्कर

मित्रो,  आज "दैनिक भास्कर" में प्रकाशित  मेरा यह व्यंग्य लेख ...
"लला ! सम्हर के आइयो खेलन होरी !"
🎉हार्दिक धन्यवाद #दैनिकभास्कर 🙏🎉
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व्यंग्य
*लला ! सम्हर के आइयो खेलन होरी !*
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह 

"होली है!"
"नारीशक्ति ज़िन्दाबाद !!"
इसे कहते हैं नेचुरल जस्टिस अर्थात प्राकृतिक न्याय। मेरी महिला विंग बड़ी खुश है कि इस बार होली और अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस एक साथ, एक ही दिन मनाया जा रहा है। सो, इस बार कुछ हिसाब-किताब बराबर होने वाले हैं। मुझे तो लगता है कि उस जमाने में भी ऐसा ही चमत्कारी संयोग पड़ा होगा जब एक गोरी को छलिया कृष्ण उर्फ़ गोविंद से हिसाब बराबर करने का मौका मिला था। वह होली की तिथि थी जिसने यह सुनहरा मौका दिया, वरना हमेशा गोपीयों को ही सारी मुसीबतें झेलनी पड़ती थीं। कभी माखन चुराना, कभी गगरी फोड़ना, कभी नहाती हुई गोपियों के कपड़े छुपा देना - इस तरह न जाने कितना परेशान करते रहे श्रीकृष्ण बेचारी गोपियों को। इसीलिए होली के दिन गोपियों ने भी बदला ले ही लिया। यानी एक गोपी ने कृष्ण को मज़ा चखा दिया। यक़ीन न आए तो कवि पद्माकर की यह पंक्तियां पढ़ लीजिए -
फागु के भीर अभीरन तें गहि, गोविंदै लै गई भीतर गोरी ।
भाय करी मन की पदमाकर, ऊपर नाय अबीर की झोरी ॥
छीन पितंबर कंमर तें, सु बिदा दई मोड़ि कपोलन रोरी ।
नैन नचाई, कह्यौ मुसक्याइ, लला ! फिर खेलन आइयो होरी ॥
      अपनी दुर्गति के बाद लला गोविंद को दुबारा होली खेलने जाने की हिम्मत नहीं हुई होगी और अगर गए भी होंगे तो बड़े सलीके से होली खेली होगी। यहां एक राज़ की बात बता दूं मैं कि यह ब्रज की गोपी नहीं बल्कि बुंदेलखंड की गोपी थी। इसीलिए उसने ईट का जवाब पत्थर से दिया और कृष्ण को न केवल रंग लगाया बल्कि उनका पीतांबर भी छीन लिया।
      तो प्यारे भाइयो, जीजाओं, देवरों, अंकलों और मित्रो ! होली के बहाने महिलाओं को परेशान करने का अगर मूड बना रहे हैं तो अपने उस मूड को भेज दीजिए तेल लेने। इस बार होली में हम महिलाएं भी अपने पूरे मूड में हैं। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस ने  हमें जोश से भर रखा है और हमने तय कर रखा है कि होली के बहाने जो 'हमसे टकराएगा, चूर-चूर हो जाएगा!', नहीं, ये थोड़े ओल्ड फैशन की बात हो गई। दरअसल हमने यह तय किया है कि "हमसे जो टकराएगा, फ्रेंडशिप से ब्लॉक कर दिया जाएगा"। ज़रा सोचिए कि ये भला क्या बात हुई कि गुझियां, खुरमा, पपड़ियां हम बनाए और आप सब भंग चढ़ा कर हमारे अच्छे-खासे रंग को भंग करने लगें, इस बार ये नहीं चलेगा! नो! नेवर ! यूं भी जो सोशल मीडिया की फ्रेंडशिप में ब्लॉक कर दिया जाता है उसकी लाइफ अपने आप चूर-चूर हो जाती है। सो, हम महिलाओं की "न" को "न" ही समझिए, यदि हमारी "न" को "हां" समझने की भूल करेंगे तो इस बार बचने वाले नहीं हैं। 
        और हां, एक और वार्निंग है! "बुरा न मानो होली है" के जुमले को अगर ज़बरदस्ती थोपते हुए रबर बैंड की तरह खींचकर अनलिमिटेड करने की कोशिश की तो टॉक टाईम तुरंत समाप्त समझिए!
       अगर कहीं ओवर स्मार्ट हुरियारे बनने की कोशिश की तो महिला पुलिस विंग भी डंडों में रंग-गुलाल वाला तेल लगा कर तैयार है। सो,  लला ! सम्हर के आइयो खेलन होरी ! बाकी मेरी तो यही सलाह है कि-

होली खेलें खूब, पर, रहे हमेशा ध्यान।
हुल्लड़ में होवे नहीं, नारी का अपमान।।
नारी का अपमान करे वह नहीं बचेगा
उसके चेहरे पर, फिर काला रंग रचेगा।।
गांठ बांध लो सीख "शरद" कहती है मानो।
हो जाओगे 'ब्लॉक' यक़ीनन ये तुम जानो।।

 ।।अच्छी होली, सच्ची होली ! हैप्पी होली! ।।
     —-----------------

Sunday, April 17, 2022

कहानी | थोड़ा सा पागलपन | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | दैनिक भास्कर | रसरंग

प्रिय मित्रो, आज दैनिक भास्कर के "रसरंग" 
परिशिष्ट में (यानी सभी संस्करणों में) मेरी कहानी प्रकाशित हुई है- "थोड़ा-सा पागलपन"... 
💁मुझे लगता है कि यह थोड़ा सा पागलपन हम सब में होना चाहिए!.. तो मेरी कहानी पढ़िए और बताइए कि आप इससे सहमत है या नहीं...
🌷मेरी कहानी प्रकाशित करने के लिए हार्दिक धन्यवाद एवं आभार #दैनिकभास्कर  🙏
दैनिक भास्कर के "रसरंग" में प्रकाशित कहानी      
थोड़ा-सा पागलपन
- डॅा. (सुश्री) शरद सिंह
        सब उसे एक ही नाम से पुकारते थे - बूढ़ी माई। बूढ़ी माई की उम्र कितनी थी, यह बताना कठिन है। काले-सफेद खिचड़ी बाल, उसकी उम्र का अनुमान लगाने में बाधा बनते थे।  
बूढी माई सुबह होते ही पता नहीं कहां से हमारी कॅालोनी में आती और रात होते-होते पता नहीं कहां चली जाती। शुरू-शुरू में सबने उसके इस आने-जाने को संदेह की दृष्टि से देखा। कोई कहता कि वह उठाईगीर है। तो कोई कहता कि वह बच्चे उठाने वाले गिरोह से है। मगर इस तरह की अटकलबाजियां धीरे-धीरे समाप्त हो गईं और बूढ़ी माई के प्रति सबके मन में दया उपजने लगी। एक दिन किसी ने बताया कि उसने बूढ़ी माई को रात के समय रेलवे स्टेशन के बाहर गुड़ीमुड़ी हो कर सोते देखा हैं तब से रहा-सहा संदेह भी दूर हो गया।
कॅालोनी की औरतें बूढ़ी माई को बचा हुआ खाना दे दिया करतीं। खाना अच्छा हो या बुरा बूढ़ी माई बड़ी रुचि से खाती। उसे इस तरह खाना खाती देख कर मन भर आता। यही लगता कि अगर बूढ़ी माई का कोई अपना सगा होता तो क्या उसे इस तरह सब के घर के बचे हुए खाने पर निर्भर रहना पड़ता? कभी लगता कि बूढ़ी माई को जरूर उसके घरवालों ने निकाल दिया होगा। छिः! आज के जमाने में रिश्ते-नातों भी स्वार्थी हो चले है।
बूढ़ी माई ने मेरे मन में जाने कब जगह बना ली मुझे पता ही नहीं चला। वह मुझे देखती और उसकी अंाखों में ममता छलकने लगती। जल्दी ही उसने मेरे घर के खुले बरामदे में रात बिताना शुरू कर दिया।
रात भर वह मेरे घर के बरामदे में सोती और सुबह होते ही काॅलोनी परिसर में लगे नीम के पेड़ के नीचे जा बैठती। फिर दिन भर वहीं बैठी रहती। क्या गरमी, क्या जाड़ा, क्या बरसात। वह नीम के पेड़ के नीचे से हिलने का नाम नहीं लेती। वह नीम का पेड़ काफी पुराना था। इस कॅालोनी के बनने के दौरान पता नहीं कैसे वह कटने से बचा रह गया। वरना इस इलाके के सारे पेड़ काट कर कॅालोनी बना दी गई थी। कॅालोनी में रहने वाले किसी को भी इससे कोई अन्तर भी नहीं पड़ता था। फिर गमलों में उगने वाले पौधे या इनडोर प्लांट तो थे ही बागवानी प्रेम के लिए। यह बात अलग है कि वह नीम का पेड़ बूढ़ी माई की भांति सबके जीवन का अनिवार्य अंग बन गया था। कॅालोनी की धर्मप्रिय स्त्रियां नीम को जल चढ़तीं। उसके तने में धागा बंाध कर मन्नतें मंागती। यही नीम का पेड़ बूढ़ी माई की दिन भर की आश्रयस्थली बन गया था।
जब कभी बूढ़ी माई की चर्चा चलती तो लोग यही कहते-‘होगी वहीं, उसी नीम के पेड़ के नीचे।’
जल्दी ही बुढ़ी माई हमारे जीवन का ऐसा हिस्सा बन गई कि हमने उसकी ओर अलग से ध्यान देना ही छोड़ दिया। उसे बचा हुआ खाना देना, पुराने कपड़े देना आदि एक सामान्य-सा व्यवहार बन गया। बूढ़ी माई ने कब मेरे घर के बरामदे छोड़ कर नीम की छांव को पूरी तरह अपना लिया, इस पर मेरा भी ध्यान नहीं गया।
ज़िन्दगी यूं ही चलती रहती अगर उस दिन शोर न मचता। सुबह के यही कोई नौ-साढ़े नौ का समय था। लगभग हर घर में आपाधापी मची हुई थी। दफ़्तर जाने वालों के तैयार होने का समय। स्कूल-बस आने का समय। कामवाली बाई के लेट करने से बेहाल महिलाओं के बड़बड़ाने का समय। लेकिन एक शोर ने सबके कामों पर ब्रेक लगा दिया। ऐसा लगा कि जैसे कोई आत्र्तनाद कर रहा है, चींख रहा है, झगड़ रहा है। मैं हड़बड़ा कर दरवाजे की ओर लपकी। बाहर दरवाजे पर ही इला मिल गई।
‘क्या हुआ इला? ये शोर कैसा?’ मैंने इला से पूछा।
‘सुना है, बूढ़ी माई पागल हो गई है। लोगों को पत्थर मार रही है।’ इला ने बताया।
‘‘कहां है बूढ़ी माई?’’
‘‘वहीं नीम के नीचे।’’
‘चलो, चल कर देखते हैं।’ मैंने इला से कहा।
वहां भीड़ एकत्र थी। नीम के पेड़ के नीचे खड़ी बूढ़ी माई चिल्ला रही थी और बुलडोजर जैसी डिगिंग मशीन पर पत्थर मार रही थी। वहां खड़े लोगों से पूछने पर पता चला कि वह जगह बिक गई है और उसे खरीदने वाला पेड़ हटा कर वहां अपनी दूकान बनवाना चाहता है। इसीलिए वह पेड़ उखाड़ने के लिए मशीन ले कर आया है। हमेशा गुमसुम रहने वाली बूढ़ी माई मशीन देखते ही भड़क गई। मशीन चालक ने जितनी बार नीम के पेड़ की ओर बढ़ने का प्रयास किया उतनी बार बूढ़ी माई ने न केवल उस पर पत्थर बरसाए बल्कि मशीन के इतने करीब आ खड़ी हुई कि मशीन चालक ने घबरा कर मशीन बंद कर दी। उसने मशीन चलाने से साफ़ इनकार कर दिया।
नीम के पेड़ के चारो ओर अच्छी-खासी भीड़ जमा हो गई थी। मगर सबके सब तमाशाबीन थे। वे मानो किसी खेल को टकटकी लगाए देख रहे थे। सभी को यही लग रहा था कि अभी पुलिस आएगी और बूढ़ी माई को पकड़ ले जाएगी। हो सकता है उसे पागलखाने भेज दिया जाए।  
मगर हुआ कुछ ऐसा जो किसी ने सोचा ही नहीं था। बूढ़ी माई के इस हंगामे की ख़बर किसी ने मीडियावालों को दे दी। देखते ही देखते वहां रिपोर्टर्स की भीड़ लग गई। एक रिपोर्टर आंखों देखा हाल सुनाते हुए कैमरे पर कहने लगा,‘‘यहंा इतनी भीड़ के बावजूद कोई भी इंसान नीम के पेड़ को बचाने के लिए आगे नहीं आ रहा है। मगर एक पागल औरत जिसे लोग बूढ़ी माई कहते हैं, पेड़ से लिपटी हुई है अब आप ही बताएं कि पागल कौन है, बूढी माई या यहंा मौजूद भीड़?’’
रिपोर्टर की बात सूनते ही माहौल बदल गया। भीड़ ‘बूढ़ी माई ज़िन्दाबाद’ के नारे लगाने लगी। अब भीड़ आगे बढ़ कर नीम के पेड़ और मशीन के बीच अपनी दीवार की भांति खड़ी हो गई। अंततः जमीन मालिक ने हार मान ली और मामला यूं तय हुआ कि वह अपनी दूकान तो बनवाएगा लेकिन नीम के पेड़ को कटवाए बिना।
धीरे-धीरे भीड़ छंट गई। लोग अपने-अपने घरों को चले गए। मशीन लौट गई। लेकिन बूढ़ी माई उसी तरह पेड़ से लिपट कर खड़ी रही। मैं बूढ़ी माई के निकट पहुंची। उसने आहट पा कर पलट कर मेरी ओर देखा। उसकी अंाखें अभी भी क्रोध से जल रही थीं, लेकिन अपने सामने मुझे पा कर उन अंाखों में शीतलता छा गई। अचानक बूढ़ी माई ने मुझे अपने गले से लगा लिया। शायद वह अपनी खुशी जाहिर करना चाहती थी। मेरी भी आंखों से खुशी के आंसू छलक पड़े। हम दोनों के सिर के ऊपर नीम का पेड़ अपनी नन्हीं हरी प¬ित्तयों को हिला-हिला कर अपनी ठंडक बिखेर रहा था। उस समय बूढ़ी माई क्या सोच रही थी ये तो मुझे पता नहीं लेकिन मैं यही सोच रही थी कि काश ! बूढ़ी माई जैसा थोड़ा-सा पागलपन हर इंसान में होता तो ऐसे न जाने कितने नीम के पेड़ कटने से बच गए होते।  
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Thursday, March 24, 2022

पियूष मिश्रा लिखित नाटक 'गगन दमामा बाज्यो' का नाट्यमंचन एवं नाट्यलेखिका डॉ (सुश्री) शरद सिंह द्वारा दैनिक भास्कर में समीक्षा

"गगन दमामा बाज्यो" पियूष मिश्रा लिखित इस नाटक का आदित्य निर्मलकर द्वारा निर्देशित तथा स्टूडियो अनश्ते एवं थर्ड आई परफॉर्म्स द्वारा मंचन की  मेरी इस समीक्षा को प्रकाशित करने के लिए हार्दिक धन्यवाद #दैनिकभास्कर 🌷🙏🌷 

#thankyou #DainikBhaskar 
#thankyouDainikBhaskar 😊
#डॉसुश्रीशरदसिंह #DrMissSharadSingh
#नाट्यमंचन #drama
#गगनदमामाबाज्यो
 #GAGANDAMAMABAJYO

Wednesday, October 14, 2020

साहित्य का महासागर बनता जा रहा सागर - डॉ शरद सिंह, दैनिक भास्कर में प्रकाशित

दैनिक भास्कर की 14वीं वर्षगांठ पर 60 पृष्ठीय विशेषांक मास्ट हेड 'बुंदेलखंड भास्कर' के अंतर्गत मेरा लेख " साहित्य का महासागर बनता जा रहा सागर" आज दि. 14.10.2020 को प्रकाशित हुआ है।
हार्दिक आभार दैनिक भास्कर 🙏
लेख : 
साहित्य का महासागर बनता जा रहा है सागर
- डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह

      किसी भी क्षेत्र की सांस्कृतिक एवं जातीय पहचान उस क्षेत्र के साहित्य एवं साहित्यिक गतिविधियों से होती है। साहित्य में क्षेत्रविशेष के संस्कार, परम्परा एवं नवाचार का प्रतिबिम्ब दृष्टिगोचर होता है। अतीत, वर्तमान और भविष्य को एक साथ जोड़ कर चलना साहित्य में ही संभव है। सागर साहित्य एवं संस्कृति जगत् में अपनी साहित्यिक उपलब्धियों के लिए देश में ही नहीं वरन् विदेशों में भी विख्यात है। यहां के साहित्यकारों की रचनाएं विश्व के विभिन्न विश्वविद्यालयों में शोधसंदर्भ के रूप में पढ़ी जाती हैं तथा उन पर शोध कार्य भी किया जाता है। वस्तुतः सागर की भूमि साहित्य सृजन के लिए सदा से उर्वरा रही है। यदि अतीत के पन्ने पलटे जाएं तो एक से बढ़ कर एक कालजयी कवि और उनकी रचनाएं दिखाई देती हैं। जिनमें सर्वप्रथम कवि पद्माकर (सन् 1753-1833) का नाम लिया जाना उचित होगा। सागर झील के तट पर स्थित चकराघाट पर स्थापित कवि पद्माकर की प्रतिमा आज भी सागर के साहित्यकारों के लिए प्रेरणास्त्रोत का कार्य कर रही है। पद्माकर रचित ग्रंथों में पद्माभरण, जगद्विनोद, गंगालहरी, प्रबोध पचासा, ईश्वर पचीसी, यमुनालहरी आदि प्रमुख हैं। प्रतिवर्ष होली पर सागर का साहित्यवृंद सुबह-सवेरे सबसे पहले चकराघाट पहुंच कर कवि पद्माकर की प्रतिमा को नमन करता है, उन्हें गुलाल लगाता है और इसके बाद ही होली खेलने तथा होली पर केन्द्रित रचनापाठ का क्रम शुरू होता है। कवि पद्माकर के अनुप्रास अलंकार की बहुलता वाले कवित्त छंद हिन्दी साहित्य की अमूल्य निधि हैं। उनका यह लोकप्रिय कवित्त देखें -
फागु के भीर अभीरन तें गहि, गोविंदै लै गई  भीतर गोरी 
भाय करी मन की पदमाकर,  ऊपर  नाय अबीर की झोरी 
छीन पितंबर कंमर तें,  सु बिदा  दई  मोड़ि कपोलन रोरी 
नैन नचाई, कह्यौ मुसकाई, लला! फिर खेलन आइयो होरी

सागर के साहित्य कोे समय के साथ चलना बखूबी आता है। यहां के साहित्यकारों ने उत्सव के समय उत्सवधर्मिता को अंगीकार किया तो वे स्वतंत्रता संग्राम के समय स्वतंत्रता के पक्ष में स्वर बुलंद करने में आगे रहे। 14 मार्च 1908 को नरसिंहपुर जिले के करेली में जन्मे पं. ज्वालाप्रसाद ज्योतिषी अपनी बाल्यावस्था से ही सागर आ गए थे और जीवनपर्यन्त सागर में रहते हुए उन्होंने साहित्य सृजन किया। उनकी प्रसिद्ध पंक्तियां हैं- 
जनम जनम के हैं हम बागी, 
लिखी बगावत भाग्य हमारे
जेलों मे है कटी जवानी, 
ऐसे ही कुछ पड़े सितारे

पं. ज्वालाप्रसाद ज्योतिषी के समय रामसिंह चैहान बेधड़क, शंकरलाल तिवारी ‘बेढब सागरी’, पं. लक्ष्मी प्रसाद मिश्र ‘कवि हृदय’ साहित्य सृजन कर रहे थे। हिन्दी, उर्दू और बुंदेली में साहित्य सृजन करते हुए इस यात्रा को आगे बढ़ाया इकराम सागरी, लक्ष्मण सिंह निर्मम, जहूर बख़्श, दीनदयाल बालार्क, जयनारायण दुबे, पं. लोकनाथ सिलाकारी, नेमिचन्द ‘विनम्र’, विठ्ठल भाई पटेल, रमेशदत्त दुबे, माधव शुक्ल मनोज, शिवकुमार श्रीवास्तव, अखलाक सागरी आदि ने। साथ ही पन्नालाल साहित्याचार्य ने दार्शनिकतापूर्ण साहित्य का सृजन किया।
 
अपने मौलिक सृजन से साहित्यजगत को उल्लेखनीय रचनाएं एवं कृतियां देने वाले सागर के साहित्यकारों में से कुछ प्रमुख नाम हैं- महेन्द्र फुसकेले, डाॅ. विद्यावती ‘मालविका’, डाॅ. राधावल्लभ त्रिपाठी, डाॅ. गोविंद द्विवेदी, प्रो कांति कुमार जैन, लक्ष्मी नारायण चैरसिया, डाॅ. सुरेश आचार्य, कपूरचंद बैसाखिया, दिनकर राव दिनकर, यार मोहम्मद यार, निर्मलचंद ‘निर्मल’, हरगोविंद विश्व, डाॅ. गजाधर सागर, मणिकांत चैबे ‘बेलिहाज़’, डाॅ. वर्षा सिंह, डाॅ. श्याम मनोहर सीरोठिया, डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह, वृंदावन राय ‘सरल’, अशोक मिजाज़ बद्र, टीकाराम त्रिपाठी ‘रुद्र’, डाॅ. महेश तिवारी, डाॅ. लक्ष्मी पाण्डेय, डाॅ. सरोज गुप्ता, डाॅ. आनन्द प्रकाश त्रिपाठी, वीरेन्द्र प्रधान, डाॅ. वंदना गुप्ता, सतीश पांडे आदि। इनमें से प्रो कांति कुमार जैन, डाॅ. राधावल्लभ त्रिपाठी, डाॅ. सुरेश आचार्य, डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह, अशोक मिजाज़ बद्र का सागर का नाम देश ही नहीं बल्कि विदेशों तक पहुंचाने में उल्लेखनीय योगदान है। 

प्रादेशिक स्तर की साहित्यिक संस्थाओं की सागर इकाईयां भी वर्तमान में डिज़िटल माध्यमों को अपनाते हुए आॅनलाईन आयोजनों में संलग्न हैं। अध्यक्ष आशीष ज्योतिषी एवं सचिव पुष्पेन्द्र दुबे मध्यप्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन की सागर इकाई के तत्वावधान में साप्ताहिक गोष्ठियों का आयोजन करते रहते हैं। इसी प्रकार अध्यक्षद्वय टीकाराम त्रिपाठी रुद्र एवं सतीश पांडे द्वारा मध्यप्रदेश प्रगतिशील लेखक संघ की सागर एवं मकरोनिया इकाईयों के अंतर्गत् आॅनलाईन काव्यपाठ एवं परिचर्चा का आयोजन कराया जाता है। मध्यप्रदेश हिन्दी लेखिका संघ की सागर इकाई की अध्यक्ष सुनीला सराफ द्वारा काव्य गोष्ठी, परिचर्चा आदि का आयोजन किया जाता है। इस वर्ष कोरोना आपदा के कारण सागर इकाई की स्मारिका ‘अन्वेषिका’ का वितरण संभव नहीं हो से ई-पत्रिका  प्रकाशित की। 

 नवाचार को अपनाकर अडिग रहना साहित्यकारों एवं साहित्यसेवियों की विशेषता होती है। इस विशेषता को चरितार्थ करते हुए सागर का साहित्यकार समाज, साहित्य की मशाल को अपनी लेखनी के जरिए उठाए हुए निरंतर आगे बढ़ रहा है और अपने साहित्य के प्रकाश से समाज का पथ-प्रदर्शक बना हुआ है। इसमें दो मत नहीं कि सागर सही अर्थों में साहित्य का महासागर बनता जा रहा है। 
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Tuesday, May 19, 2020

लॉकडाउन और मेरा साहित्य सृजन - डॉ शरद सिंह, दैनिक भास्कर में प्रकाशित


Dr (Miss) Sharad Singh
दैनिक भास्कर में "लॉकडाउन और मेरा साहित्य सृजन" के रूप में मेरी रचनात्मकता के बारे में मुझसे की गई चर्चा प्रकाशित हुई है, जो मेरे उस लेखन पर केंद्रित है जिसे मैं विगत चार-पांच वर्षों से पूरा करना चाह रही थी लेकिन समयाभाव में कर नहीं पा रही थी अब लॉकडाउन की इस अवधि में मिले पर्याप्त समय में मैंने जिनमें सबसे महत्वपूर्ण जिसे कहा जा सकता है वह है.. संस्मरण लेखन कार्य। इसे मैंने पूरा कर लिया है। ... मैं धन्यवाद देती हूं दैनिक भास्कर को, जिसने लॉकडाउन के दौरान की मेरी इस उपलब्धि को अपने पाठकों के साथ साझा करने का मुझे अवसर प्रदान किया।
हार्दिक धन्यवाद #दैनिकभास्कर 🙏
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"जी हां, कोरोना लॉकडाउन की स्थिति को मैंने विराम नहीं बल्कि जीवन के एक नये आयाम की भांति स्वीकार किया है। लॉकडाउन के इस लम्बी अवधि में मैंने वो बहुत सारे काम पूरे कर लिए हैं, जिन्हें मैं साहित्यिक, सामाजिक आदि व्यस्तताओं के कारण पूरा नहीं कर पा रही थी। जिनमें सबसे महत्वपूर्ण जिसे कहा जा सकता है वह है.. संस्मरण लेखन कार्य। जो पिछले 5-6 वर्षों से अत्यंत धीमी गति से आगे बढ़ने के कारण पूरा नहीं हो पा रहा था, उसे मैंने पूरा कर लिया है। इसमें मैंने बचपन से कॉलेज लाईफ तक की उन यादों को सहेजा है जिनके बारे में मुझे लगता है कि इसे पढ़ कर मेरी और आने वाली पीढ़ी के लोग समझ सकेंगे कि हमने पर्यावरण शुद्धता, सोशल बाऊंडिंग में बहुत कुछ खो दिया है फिर भी अगर कोशिश करें तो उनमें से बहुत कुछ वापस पाया जा सकता है। जीवन से जुड़े जो मुहावरे आज सिर्फ़ शाब्दिक और बेजान है वे पहले जीवित थे और मैंने उनके साथ अपने आरम्भिक जीवन का एक हिस्सा बिताया है। ...और इसीलिए मैंने अपने संस्मरणों के संकलन को नाम दिया है - "ज़िन्दा मुहावरों का समय"। 
              दैनिक भास्कर के सुधी पाठकों के लिए प्रस्तुत है, मेरी ताज़ा संस्मरणात्मक पुस्तक 'ज़िंदा मुहावरों का समय' की पांडुलिपि से एक अंश....
       *यह पीढ़ी तो 'कोल्हू के बैल' जैसे मुहावरों को भी नहीं जानती है। 'रंगरेज़' के मौलिक संस्करण से कोसों दूर है। इस तमाम चिन्तन-मनन ने अचानक मुझे मेरे बचपन की ओर धकेल दिया। उस बचपन की ओर जो मध्यप्रदेश के एक बहुत ही छोटे से क़स्बेनुमा ज़िला मुख्यालय में व्यतीत हुआ था। उस क़स्बेनुमा शहर का नाम था पन्ना। मैं जानती हूं कि ऐसा शहर जो अभी भी मौज़ूद हो उसके नाम के साथ ‘‘था’’ का प्रयोग करना सरासर ग़लत है, लेकिन क्या करूं ... पन्ना शहर आज मेरा वाला पन्ना तो रहा नहीं, वह तो अतीत के पन्नों में सिमट कर रह गया है। मेरे वाले पन्ना शहर में बहुत सी ऐसी चीजें थीं जो आज नहीं है। मेरा जन्म पन्ना में हुआ। मैंने दुनिया को जाना तो सरकारी आवास के उस छोटे से घर से जो मेरी शिक्षिका मां डॉ. विद्यावती के नाम अलॉट था। लेकिन मेरा वह घर जिस परिसर में था वह हिरणबाग कहलाता था। राजाओं के जमाने का था वह। कभी वहां हिरण पाले जाते थे। फिर जब शासकीय मनहर कन्या उच्चतर माध्यमिक विद्यालय स्थापित हुआ तो स्थानांतरण पर बाहर से पन्ना आने वाली शिक्षिकाओं के लिए सुरक्षित आवास की समस्या को दूर करने के लिए हिरणबाग की चारदीवारी के भीतर छः क्वार्टर बनाए गए। एक-दूसरे से सटे हुए। परस्पर इतने नज़दीक कि कोई एक आवाज़ दे तो बाकी पांचों घरों से मदद दौड़ पड़े। वैसे सुरक्षा के लिए मुख्य प्रवेश द्वार पर एक बड़ा-सा फाटक तो था ही। हिरणबाग के उस परिसर में खेलने की जगह ही जगह थी। वह परिसर अपने-आप में किसी शहर से कम नहीं लगता था। वह हम बच्चों की अपनी ही एक दुनिया थी। हम दो बहनें मैं और मेरी दीदी वर्षा सिंह और हमारे घर से चार घर छोड़ कर रहने वाली शेवड़े आंटी के दो बेटे राजू और अज्जू  हम चारों कांच के कंचों से ले कर ‘‘अंधेर नगरी चौपट राजा’’ नाटक तक खेलते। शेवड़े आंटी भी मेरी मां के साथ शिक्षिका थीं। इसी निश्चिंत बचपन में मैंने देखा था कोल्हू का बैल। "
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दिनांक 19.05.2020