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Wednesday, April 24, 2024

चर्चा प्लस | ‘‘गुलबकावली’’ की कहानी सिखाती है जलसंरक्षण बशर्ते हम सीख सकें | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर


चर्चा प्लस 
‘‘गुलबकावली’’ की कहानी सिखाती है जलसंरक्षण बशर्ते हम सीख सकें
    - डाॅ (सुश्री) शरद  
सिंह                                                                                      
      पूरे ब्रह्मांड में पृथ्वी ही एकमात्र ऐसा ग्रह है जहां आज तक पानी और जीवन मौजूद है। इसलिए, हमें अपने जीवन में पानी के महत्व को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए और सभी संभव तरीकों का उपयोग करके पानी बचाने की पूरी कोशिश करनी चाहिए। जब हमें प्यास लगती है तो हम पानी पीते हैं। हम जानते हैं कि पृथ्वी मुख्य रूप से पानी से ढकी हुई है, लेकिन फिर भी, मानव उपयोग के लिए पर्याप्त पानी नहीं है। इसका कारण यह है कि यह पानी पीने लायक नहीं है. पृथ्वी पर केवल 3 प्रतिशत पानी ही मानव मांग को पूरा करने के लिए उपलब्ध है। इसलिए जल संरक्षण नितांत आवश्यक है। पुरानी कहानियों ने जल संरक्षण के बारे में जागरूकता पैदा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इस संदर्भ में “गुलबकावली” की कहानी भी अपने आप में अनोखी और संदेश देने वाली है। 


मौसम वैज्ञानिकों का मानना है कि पिछले वर्ष के मुकाबले इस वर्ष और अधिक गर्मी पड़ेगी। उनकी भविष्यवाणी का असर दिखने भी लगा है। अधिक गर्मी पड़ने का अर्थ होता है पानी की कमी। अधिक गर्मी पड़ती है तो जलस्तर गिरने लगता है। रेगिस्तान में रहने वालों से पूछने पर पता चलता है पानी का मोल। यह बात अलग है कि हम पानी की उपलब्धता होते हुए भी बोतलबंद पानी का मोल चुकाने में अपनी शान समझते हैं। न जाने कितने पुराने जलस्रोत हमारी लापरवाही से अब तक सूख चुके हैं। जो बचे हैं, वे भी संकट के दौर से गुज़र रहे हैं। हमने हाल ही में इस समाचार पर खूब चर्चा की कि दुबई में कृत्रिम बारिश कराने के प्रयास में बाढ़ आ गई और भारी नुकसान हुआ। क्या उन सारी चर्चाओं के दौरान यह सोचा कि दुबई को कृत्रिम बारिश कराने की ज़रूरत क्यों पड़ी? जहां पानी न हो या पानी की कमी हो, वहां इंसान पानी हासिल करने के सौ उपाय सोचता है। जिनके पास पानी के पर्याप्त स्रोत हैं, वे सौभाग्यशाली हैं। लेकिन वे अपनी लापरवाही से जलसंकट के दुर्भाग्य को न्योता देते रहते हैं। दुनिया का अरेबियन क्षेत्र जहां मीठे पानी का संकट हमेशा रहा, वहां पानी को सम्हाल कर उपयोग में लाने के कई किस्से प्रचलित हैं। उन्हीं में से एक है गुलबकावली का किस्सा। यह कहानी हमें भी बहुत कुछ सिखाती है।
कहानी कहने की प्रथा प्राचीन काल से चली आ रही है। दुनिया भर में अनगिनत कहानियां बताई गई हैं। उनमें से कुछ बहुत प्रसिद्ध और शिक्षाप्रद रहे हैं। जैसे विष्णु शर्मा ने ‘‘पंचतंत्र’’ की कहानियों के माध्यम से राजकुमारों को आवश्यक शिक्षा दी थी। विश्व प्रसिद्ध ‘‘अरेबियन नाइट्स स्टोरीज’’ हमारा मनोरंजन करते हुए हमें सिखाती है कि विपरीत परिस्थितियों से कैसे निपटें और प्रकृति से कैसे प्यार करें। ये कहानियां उस क्षेत्र की हैं जहां हमेशा पानी की कमी रही है। इसलिए ऐसी कई कहानियां हैं जिनमें जल संरक्षण और पानी बचाने का संदेश मौजूद है। ऐसी ही एक कहानी है ‘‘गुल बकावली’’।
गुलबकावली एक पुरानी कहानी है जिसे अलग-अलग देशों में अलग-अलग संस्करणों में बताया गया है, लेकिन हर संस्करण में एक बात समान है, वह है कम पानी से अपनी जरूरतों को पूरा करना। मुझे आज तक गुलबकावली की कहानी याद है जो मेरे दादा, स्वतंत्रता सेनानी ठाकुर श्याम चरण सिंह ने मुझे सुनाई थी। जब मैं बड़ी हुआ और गुलबकावली की कहानी के बारे में गूगल पर खोज की, तो मुझे पता चला कि मुंशी निहाल चंद लाहौर ने इसे उर्दू में लिखा था और इसे 1927 में दारुल इशात पंजाब, प्रकाशन लाहौर द्वारा प्रकाशित किया गया था। हालाँकि ये कहानी अरेबियन नाइट्स की कहानी है। इस कहानी पर 1962 में टी. रामाराव के निर्देशन में एन.एन. त्रिविक्रम राव ने तेलुगु में एक फिल्म बनाई थी। जिसे काफी पसंद किया गया था।
मैंने जो कहानी सुनी थी उसका कथानक यह था कि एक बादशाह की आँखों की रोशनी चली गयी। शाही हकीमों को बुलाया गया। हकीमों ने बहुत कोशिश की लेकिन वे बादशाह की ओखों में रोशनी लाने में सफल नहीं हुए। बादशाह निराश हो गया। मगर तभी एक बुजुर्ग हकीम ने एक इलाज बताया कि यदि गुलबकावली का फूल लाया जाए और उसका अर्क आंखों में डाला जाए तो आंखों की रोशनी वापस आ सकती है। तब बादशाह पुनः देख सकेंगें। हकीम ने यह भी बताया कि वह फूल सात समुद्र और सात पर्वतों से परे एक सुदूर स्थान पर पाया जाता है। बादशाह ने घोषणा की कि जो कोई गुलबकावली का फूल लाएगा उसे बड़ा इनाम दिया जाएगा। जान जाने के डर से लोग सामने नहीं आते, तभी यासीन नाम का एक गरीब युवक बादशाह के पास पहुंचा। उसने बादशाह को आश्वासन दिया कि वह किसी भी कीमत पर गुलबकावली के फूल लेकर आएगा।
यासीन गुलबकावली लेने निकला। रास्ते के समय उसे काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। वह बिना डरे आगे बढ़ता रहता है। सात समुद्र और सात पर्वत पार करने के बाद उसे पता चलता है कि एक राजकुमारी के बगीचे में गुलबकावली के फूल हैं। लेकिन उस राजकुमारी के महल तक पहुंचना कठिन था। राजकुमारी के महल के चारों ओर कीचड़ से भरी एक खाई थी। उस पर शर्त यह थी कि जो कोई भी राजकुमारी के महल तक पहुंचना चाहेगा उसे कीचड़ से होकर गुजरना होगा। लेकिन जब वह राजकुमारी के पास पहुंचे तो उसके पैरों पर कीचड़ नहीं होना चाहिए। कीचड़ साफ करने के लिए पानी का एक बहुत छोटा कटोरा ही रखा गया था। राजकुमारी की सुंदरता की चर्चा सुनकर कई युवक वहां पहुंचे लेकिन पानी के एक बहुत छोटे कटोरे से अपने पैरों के कीचड़ को साफ नहीं कर सके और उन्हें गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया।
जब यासीन उस कीचड़ भरी खाई के पास पहुंचा तो उसे पता चला कि उसे पार करने के बाद उसे पैर धोने के लिए पानी का एक बहुत छोटा कटोरा ही मिलेगा। यासीन एक बुद्धिमान युवक था। उसने पास की झाड़ी से दो-तीन पतली-पतली लकड़ियाँ तोड़ लीं, उन्हें छीलकर जीभी (टंग क्लीनर) की तरह बना लिया और अपनी जेब में रख लिया। फिर यासीन ने कीचड़ से भरी खाई को पार किया। उसके पैर घुटनों से लेकर पंजों तक कीचड़ से सने हुए थे। यासीन ने अपनी जेब से लकड़ी की जीभी (टंग क्लीनर) निकाली और अपने पैरों से कीचड़ साफ किया। फिर दूसरी जीभी से बची हुई मिट्टी भी साफ कर दी। जब उसके पैरों से कीचड़ साफ हो गया तो उसने अपने पैरों को अपने रुमाल से अच्छी तरह से पोंछा और फिर दिए गए कटोरी भर पानी को अपने पैरों पर तेल की तरह लगाकर दोबारा रुमाल से पोंछ लिया। अब उसके पैर इतने साफ थे मानो उन पर कभी कीचड़ लगा ही न हो।
जब दासियों ने देखा कि यासीन के पैर बिल्कुल साफ हैं तो वे उसे अपनी शहजादी के पास ले गईं। शहजादी यासीन की चतुराई से बहुत प्रभावित हुई। जब उसने यासीन से उसके आने का कारण पूछा तो यासीन ने उसे बताया कि वह राजकुमारी की सुंदरता देखने नहीं बल्कि उसके बगीचे से गुलबकावली फूल लेने आया है। वह चाहता है कि उसके बादशाह का अंधापन दूर हो जाये। यह जानकर राजकुमारी और भी खुश हो गई। उसे लगा कि यासीन न केवल चतुर है, बल्कि दयालु भी है, अन्यथा दूसरों के लिए अपनी जान जोखिम में कौन डालता? फिर भी शहजादी ने यासीन की कुछ और परीक्षाएँ लीं, जिनमें यासीन सफल रहा। शहजादी ने यासीन को गुलबकावली के फूल दिये। यासीन ने शहजादी से विदा लेते समय पूछा, ‘‘तुमने पैर धोने के लिए पानी का एक बहुत छोटा कटोरा ही क्यों रखा?’’
इस पर राजकुमारी ने कहा, ‘‘मैंने ऐसा इसलिए किया क्योंकि जो व्यक्ति पानी के महत्व को समझता है और कम पानी में अपनी जरूरतें पूरी कर सकता है, वही मुझसे मिलने के योग्य साबित होगा।’’
यानी गुलबकावली की इस कहानी में जहां जड़ी-बूटी के रूप में गुलबकावली फूल की औषधि का वर्णन है, वहीं पानी की मितव्ययता की सीख भी है। आज दुनिया भर में बढ़ते जल संकट को देखते हुए हमें गुलबकावली की राजकुमारी की सीख याद रखने की जरूरत है।
पानी इतना कीमती है कि पृथ्वी पर उपलब्ध कुल पानी का केवल एक प्रतिशत ही पीने योग्य है। एक औसत इंसान को प्रतिदिन लगभग 250- 400 लीटर पानी की आवश्यकता होती है। इसके अतिरिक्त, हमारा शरीर 70 प्रतिशत पानी से बना है, इसलिए प्रतिदिन 2-3 लीटर ताजे पानी की आवश्यकता होती है। एक सदी पहले, मानव मांगों को पूरा करने के लिए पर्याप्त पानी था। भविष्य में जल की कमी की समस्या के समाधान के लिए जल संरक्षण ही जल की बचत है। भारत और दुनिया के अन्य देशों में पानी की भारी कमी है जिसके कारण आम लोगों को पीने और खाना पकाने के साथ-साथ दैनिक कार्यों को पूरा करने के लिए आवश्यक पानी पाने के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। दूसरी ओर, पर्याप्त पानी वाले इलाकों में लोग अपनी दैनिक जरूरतों से ज्यादा पानी बर्बाद कर रहे हैं। हम सभी को पानी के महत्व और भविष्य में पानी की कमी से होने वाली समस्याओं को समझना चाहिए। हमें अपने जीवन में उपयोगी जल को बर्बाद एवं प्रदूषित नहीं करना चाहिए तथा लोगों के बीच जल संरक्षण एवं बचत को बढ़ावा देना चाहिए। गुलबकावली जैसी कहानियाँ जल संरक्षण का महत्वपूर्ण संदेश देती हैं। 
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Monday, June 3, 2019

चर्चा प्लस ... सूखती नदियां, बदरंग तालाब और हमारा जलसंरक्षण - डॉ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
चर्चा प्लस ... सूखती नदियां, बदरंग तालाब और हमारा जलसंरक्षण
- डॉ. शरद सिंह
 

‘मन की बात’ के 19वें कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सूखे के संकट पर अपने विचार रखे थे और कहा था कि जल संकट से निपटने के लिए सामूहिक प्रयत्नों की जरूरत है। बेशक सामूहिक प्रयत्न से सब कुछ संभव है लेकिन जब नदियां सूखती हुईं और तालाब जलकुंभी या काई से बदरंग होते हुए दिखाई देते हैं तो यह सिद्ध होने लगता है कि हमने न तो अपने प्रधानमंत्री के मन की बात को स्मरण रखा और न अपनी इच्छाशक्ति को कायम रखा। इतना तो समझना ही चाहिए कि जलसंरक्षण के मात्र दिखावे से जल संरक्षित नहीं रहेगा। 
चर्चा प्लस ... सूखती नदियां, बदरंग तालाब और हमारा जलसंरक्षण
- डॉ. शरद सिंह  Charcha Plus - Sukhati Nadiyan, Badarang Talab Aur Hamara Jal Sanrakshan   -  Charcha Plus Column by Dr Sharad Singh
       भविष्य का सबसे डरावना सच अगर आज कोई है तो वह है जल का अभाव। शहरी क्षेत्रों में दम तोड़ते जलस्तरों वाले जल स्रोतों के पास लम्बी कतारें और पानी के लिए आपस में झगड़ते लोगों को देखा जा सकता है। ग्रामीण क्षेत्रों में दृश्य और अधिक भयावह होते हैं। वहां मिट्टी और रेत में गढ़े बना कर और गहरी खाइयों में उतर कर जान जोखिम में डाल कर जिन्दा रहने लायक पानी मिल पाता है। दुख तो यह है कि पानी और सूखे के जिस पारस्परिक संबंध के बारे में हम अपने बचपन से पढ़ते, सुनते और समझते आ रहे हैं, उसे ही भुला बैठे हैं। पानी नहीं रहेगा तो सूखा पड़ेगा और सूखा पड़ेगा तो पानी उपलब्ध होने का प्रश्न ही नहीं उठता। स्थिति भयावह है। मौसम विज्ञानी भविष्यवाणी कर रहे हैं कि आगामी मानसून बहुत अच्छा रहेगा और अच्छी बारिश होगी लेकिन यदि हमने जल प्रबंधन पर समय रहते ध्यान नहीं दिया तो अच्छी बारिश का लाभ भी हम नहीं ले सकेंगे। ‘मन की बात’ के 19वें कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सूखे के संकट पर अपने विचार रखे थे और कहा था कि जल संकट से निपटने के लिए सामूहिक प्रयत्नों की जरूरत है।
आज भारत ही नहीं, तीसरी दुनिया के अनेक देश सूखा और जल संकट की पीड़ा से त्रस्त हैं। भारत सहित अनेक विकासशील देशों के अनेक गांवों में आज भी पीने योग्य शुद्ध जल उपलब्ध नहीं है। आर्थिक विकास, औद्योगीकरण और जनसंख्या विस्फोट से जल का प्रदूषण और जल की खपत बढ़ने के कारण सब कुछ गड़बड़ा गया है। पर्यावरण की क्षति तथा जल प्रबंधन के प्रति लापरवाही के कारण देश के महाराष्ट्र, तेलंगाना और मध्यप्रदेश जैसे कई राज्य जल संकट की त्रासदी से गुज़र रहे हैं। उचित जल प्रबंधन न होने के कारण बारिश के जल को हम इस तरह नहीं सहेज पाए हैं कि वह आज हमारे काम आ पाता। हैण्डपंप, कुओं और बावड़ियों का रख-रखाव सही ढंग से न होने के कारण या तो वे सूख गई हैं या फिर उनका पानी इतना दूषित हो गया है कि हम उसे काम में ही नहीं ला पा रहे हैं।
वर्ष 2018 के लिए जल दिवस की थीम रखी गई है -‘नेचर फॉर वाटर’’ यानी ‘‘जल के लिए प्रकृति’’। यदि प्रकृति सुरक्षित रहेगी और प्राकृतिक तत्वों में संतुलन बना रहेगा तो जल भी बचा रहेगा। हमें याद रखना होगा कि दक्षिण अफ्रीका के केपटाउन शहर में आगामी अप्रैल माह से 4 लाख लोगों को नल बंद करने की योजना बना रहा है। और वह दिन होगा -‘जीरो डे’। मेरी पीढ़ी तक के वे लोग जिन्होंने हिन्दी माध्यम सरकारी स्कूलों में प्राथमिक शिक्षा पाई होगी उन्होंने ककहरा के अभ्यास में यह पाठ अवश्य पढ़ा होगा-‘घर चल, जल भर‘। हमें जल का महत्व हर कदम पर सिखाया और समझाया गया लेकिन मानो हमने अपने तमाम पाठ बहुत जल्दी भुला दिए। हमारी लापरवाहियों के कारण जल का संकट आज एक वैश्विक संकट का रूप लेता जा रहा है। इस संकट को महसूस करते ही संयुक्त राष्ट्र संघ ने जल संरक्षण की ओर सारी दुनिया का ध्यान आकृष्ट करने का निश्चय किया और वर्ष 1993 में संयुक्त राष्ट्र की सामान्य सभा के द्वारा प्रत्येक वर्ष 22 मार्च को विश्व जल संरक्षण दिवस मनाने का निर्णय लिया गया। जल का महत्व, आवश्यकता और संरक्षण के बारे में जागरुकता बढ़ाने के लिये इसे पहली बार वर्ष 1992 में ब्राजील के रियो डी जेनेरियो में “पर्यावरण और विकास पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन” की अनुसूची 21 में आधिकारिक रुप से जोड़ा गया था और वर्ष 1993 से इस उत्सव को मनाना शुरु किया। वर्ष 2017 के लिए थीम थी “अपशिष्ट जल प्रबंधन“। जिसे हम आत्मसात नहीं कर सके। सच तो यह है कि हमारी योजनाओं और उन योजनाओं के अमल होने में दो ध्रुवों जितनी दूरी होती है। केन्द्र, राज्य, निकाय आदि हर स्तर पर बड़ी-बड़ी बातें करते हुए हमने अपशिष्ट जल के प्रबंधन की योजनाओं पर हवाई मंथन किया। क्रियान्वयन के मामले में हमेशा की तरह फिसड्डी रहे। जबकि देश के लगभग हर शहर और हर गांव में पेयजल का संकट गहराता जा रहा है। किसान नहरों और बांधों से, यहां तक कि पेयजल की सप्लाई लाईनों को तोड़ कर, पंक्चर कर के पानी चुराने को विवश हैं। जो पानी पीने के लिए काम में लाया जाना चाहिए उससे खेत सिंचते हैं या फिर उसका अपव्यय कर के उसे नालियों में बहा दिया जाता है। यह सारी अव्यवस्थाएं और अपव्यय इसलिए है कि हम जल प्रबंधन की बातें करना भर जानते हैं, जल प्रबंधन करना नहीं।

हमारे पूर्वजों ने हमारे लिए जल के अनेक स्रोत कुओं, बावड़ियों और तालाबों के रूप में हमारे लिए छोड़े लेकिन हम इतने लापरवाह निकले कि उन्हें ढंग से सहेज भी नहीं पा रहे हैं। देश भर में हज़ारों कुए, तालाब और बावड़ियां सूख गईं सिर्फ़ हमारी लापरवाही के कारण। आज भी अनेक कुए ऐसे हैं जो तिल-तिल कर मर रहे हैं। उनका पानी प्रदूषित हो चुका है। हम उस पानी का प्रदूषण दूर कर उसे उपयोगी बना सकें इसके बदले मानो प्रतीक्षा करते हैं कि कब वह कुआ मर जाए और उस ज़मीन पर कोई रिहाइशी बिल्डिंग या शॅापिंग काम्प्लेक्स बना सकें। दुख की बात है कि हम अपनी भावी पीढी के लिए कितने और कैसे जलस्रोत छोड़ जाएंगे, यह भी नहीं सोच रहे हैं। मुझे आज के इस हालात पर राजा मिडास की कहानी याद आती है। यूनानी राजा मिडास को धन-संपत्ति की इतनी अधिक भूख थी कि उसने देवताओं से यह वरदान मांग लिया कि वह जो भी छुए वह सोने में बदल जाए। मिडास वरदान पा कर बेहद खुश हुआ। उसका महल, उसका बिस्तर, उसकी सारी वस्तुएं उसके छूते ही सोने की बन गईं। लेकिन जल्दी ही उसे परेशानियों का सामना करना पड़ा। क्यों कि उसका भोजन-पानी भी उसके छूते ही सोने में बदल गया। यहां तक कि जब उसने अपनी बेटी को दुआ तो वह भी सोने की गुड़िया में बदल गई। तब उसे अपनी गलती का अहसास हुआ और वह रो-रो कर देवताओं से माफी मांगने लगा। काल्पनिक कथाओं में देवता प्रसन्न हो कर माफ कर देते हैं लेकिन यदि हम जलस्रोतों को सुखा कर पर्यावरण से खिलवाड़ करते रहेंगे तो हम स्वयं को माफ करने के योग्य भी नहीं रहेंगे। आखिर प्रत्येक प्राणी के लिए जल का होना जरूरी है। पानी के बिना कोई भी प्राणी अधिक समय तक जीवित नहीं रह सकता है। अब तो इस बात की भी संभावना व्यक्त की जाने लगी है कि यदि तृतीय विश्वयुद्ध हुआ तो वह पानी के लिए ही होगा। दरअसल, पानी किसी भी प्राणधारी की बुनियादी आवयकता होती है।
अतिदोहन के कारण भूजल स्तर जो वर्ष 1984 में 9 मीटर था, अब 17 मीटर हो चुका है। वहीं वर्ष 1984 में भूजल के मात्र 17 प्रतिशत दोहन की तुलना में आज हम 138 प्रतिशत दोहन कर रहे हैं। यदि यही स्थिति रही तो वर्ष 2020 तक भूजल भंडार रीत जाएंगे। इस स्थिति को उचित भूजल प्रबंधन के द्वारा नियंत्रित किया जा सकता है। ये प्रबंधन घरेलू, कृषि, औद्योगिक और सामुदायिक स्तर पर किया जा सकता है। घरेलू क्षेत्र में वर्षा जल संचयन संरचना बनाकर, पेयजल के उचित प्रयोग एवं निष्कासित जल का अन्य कार्यों में प्रयोग कर, कृषि में बूंद बूंद सिंचाई, कम जल में होने वाली फसलें एवं उचित मात्रा में खाद और कीटनाशकों का प्रयोग कर, उद्योगों में जल को रिसाइकिल कर तथा भूजल पुनर्भरण संरचनाएं बनाकर एवं सामुदायिक स्तर पर जल संरक्षण के प्राचीन स्रोतों का जीर्णोद्धार कर इस गंभीर खतरे को टाला जा सकता है। इसके साथ ही कुछ आवश्यक कदम भी उठाने होंगे। जैसे- जल की शिक्षा अनिवार्य विषय के रूप में स्कूली पाठ्यक्रम में जोड़ी जाए, जल संवर्धन एवं संरक्षण कार्य को सामाजिक तथा धार्मिक संस्कारों से जोड़ा जाए, भूजल दोहन अनियंत्रित एवं असंतुलित ढंग से न हो, इसे सुनिश्चित किया जाए, तालाबों और अन्य जल संसाधनों पर समाज का सामूहिक अधिकार हो, जलस्रोतों को प्रदूषण से बचाने का हरसंभव प्रयास किया जाए तथा नदियों और नालों पर चौक डैम बना वर्षा जल को संग्रहीत किया जाए। इन सबके साथ जन संरक्षण एवं संवर्द्धन के लिए जन जागरूकता अभियान को नागरिक मुहिम के रूप में चलाया जाए, जिसमें प्रत्येक नागरिक की किसी न किसी स्तर पर सहभागिता हो। इससे नागरिकों में जन संरक्षण के प्रति अपने दायित्वों का बोध होगा तथा वे भविष्य के भयावह जल संकट के यथार्थ को भली-भांति समझ सकेंगे।
आज शहरी क्षेत्र और ग्रामीण क्षेत्र दोनों ही जलस्रोतों की कमी से जूझना रहे है। जो आर्थिक रूप से समर्थ होते हैं, वे टैंकरों से पानी प्राप्त कर लेते हैं। और अधिक समर्थ मिनरल वाटर की बोतलों से प्यास बुझाते हैं। यह कोई स्थायी विकल्प नहीं है। जब तक जलस्रोतों में पानी है तभ्ी तक टैंकर और मिनरल वाटर की बोतले हैं। इसके साथ ही उन लोगों की पीड़ा को भी समझना जरूरी है जिन्हें एक घड़ा या एक बाल्टी पानी के लिए लम्बी कतारों में खड़े रह कर घंटों प्रतीक्षा करनी पड़ती है या फिर जिन्हें पानी के लिए मीलों की दूरी तय करनी पड़ती है। समाचारपत्रों में आए दिन यह समाचार पढ़ने को मिल जाता है कि फलां जगह पानी भरने के लिए मार-पीट हुई। यह संघर्ष केवल पानी का संषर्घ नहीं बल्कि ज़िन्दा रहने का संषर्घ है। भला पानी के बिना कोई जीवित रह सकता है? आज जब इस संघर्ष की चिंगारियां भड़कने लगी हैं तो अब हमारा चेतना जरूरी है। यह स्वीकार करना ही होगा कि तसला या तगाड़ी हाथों में ले कर तस्वीर खिंचवाने अथवा साल में एक बार जलसंरक्षण का एक नाटक की भांति मंचन करने से जलसंकट हमारे भावी जीवन को पूरी तरह बदरंग कर देगा।
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(दैनिक ‘सागर दिनकर’, 30.05.2019)
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