Showing posts with label बाल साहित्य. Show all posts
Showing posts with label बाल साहित्य. Show all posts

Wednesday, March 11, 2026

चर्चा प्लस | हाशिए में खड़ा बाल साहित्य क्या एआई के साथ कदम मिला सकेगा? | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर


चर्चा प्लस 

हाशिए में खड़ा बाल साहित्य क्या एआई के साथ कदम मिला सकेगा?

- डाॅ (सुश्री) शरद सिंह                                               

         हाल ही में सागर में बाल साहित्य पर एक संगोष्ठी हुई जिसमें स्थानीय एवं अतिथि साहित्यकारों ने अपने विचार रखे। दूसरे सत्र में बाल कविताएं भी पढ़ी गईं। यह सेमिनार कई प्रश्न जगाने में सफल रहा जिनमें सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है कि क्या पर्याप्त बाल साहित्य लिखा जा रहा है? दूसरा प्रश्न था कि क्या एआई का युग में बाल साहित्य को प्रभावित करेगा? अर्थात हाशिए में खड़ा बाल साहित्य क्या एआई के साथ कदम मिला सकेगा? इस दृष्टि से सेमिनार सफल रहा कि वह विचारों को उद्वेलित कर सका, बशर्ते साहित्यकारों के मानस में यह उद्वेलन बना रहे। 

       
बाल साहित्य शोध सृजनपीठ, साहित्य अकादमी मध्यप्रदेश शासन संस्कृति विभाग द्वारा मध्यप्रदेश के संभागीय मुख्यालय सागर में 06 मार्च 2026 को बाल साहित्य पर एक विमर्श एवं काव्यगोष्ठी का आयोजन किया गया। इसमें स्थानीय श्यामलम संस्था का पूर्ण सहयोग रहा। विमर्श का विषय था ‘‘लोक ध्वनि से बाल ध्वनि तक’’। बाल साहित्यकारों ने अपने-अपने विचार रखे। बाल साहित्य शोध सृजनपीठ की अध्यक्ष डाॅ मीनू पांडे ‘नयन’ ने एक बहुत ही महत्वपूर्ण बात कही कि बाल साहित्य लिखने के लिए बाल मनोविज्ञान को जानना और समझना जरूरी है।

सेमिनार के बाद बाल साहित्य की दशा और दिशा को ले कर मेरे मन में भी मंथन चलता रहा। मुझे याद आने लगा वह समय जब मैं अपनी बाल्यावस्था में अपने नानाजी से कहानियां सुना करती थी। इतना ही नहीं मेरे घर खाना पकाने का काम करने वाली जिन्हें हम आदरपूर्वक ‘‘बऊ’’ यानी ‘मां’ कहते थे, वे भी चूल्हें में रोटियां सेंकने के दौरान ढेर सारी कहानियां सुनाया करती थीं। बाल्यावस्था में मैंने दो और लोगों से कहानियां सुनीं, एक अपने कमल सिंह मामाजी से और दूसरी अपनी दीदी वर्षा सिंह जी से। यानी मेरा बचपन कहानियों से सराबोर रहा। चारो के कथानक परस्पर बहुत भिन्न हुआ करते थे। नानाजी जो कहानियां सुनाते थे उनमें रामायण और महाभारत से निकले किस्से हुआ करते थे। उनमें कई क्षेपक कथाएं होती थीं। जैसे उन्होंने सुनाया था कि महाभारत काल के अंत समय में भीम को घमंड हो गया कि यदि उसने दुर्योंधन को नहीं मारा होता तो युद्ध कभी समाप्त नहीं होता। यानी युद्ध की विजय का सारा श्रेय उसी को है। श्रीकृष्ण उसके इस घमंड को ताड़ गए और उन्होंने पांडवों से कहा कि बहुत दिन से वन घूमने नहीं गए हैं, चलो चलते हैं। श्रीकृष्ण के साथ पांडव वन की ओर निकल पड़े। रास्ते में एक वृद्ध वानर अपनी पूंछ फैलाए लेटा हुआ था। यह देख कर भीम ने उस वानर से डपटते हुए कहा कि अपनी पूंछ हटा ले। वानर ने अपनी पूंछ हिलाई भी नहीं। इस पर भीम को क्रोध आ गया। उसने ललकारते हुए कहा कि यदि तू अपनी पूंछ नहीं हटाएगा तो मैं तेरी पूंछ काट दूंगा। तब उस वानर ने अपनी आंखें खोली और मंद स्वर में कहा कि मैं इतना बूढ़ा और अशक्त हो गया हूं कि अपनी पूंछ भी नहीं हिला पा रहा हूं। इसलिए तुम स्वयं मेरी पूंछ उठा कर एक ओर सरका दो और निकल जाओ। यह सुन कर भीम को और क्रोध आया किन्तु श्रीकृष्ण ने उसका कंधा दबा कर इशारा किया कि तुम्हीं पूंछ सरका दो। भीम ने पहले उंगली से पूंछ हटाने का प्रयास किया, वह नहीं हटी। फिर एक हाथ से प्रयास किया, मगर वह रंचमात्र नहीं सरकी। इसके बाद भीम ने अपने दोनों हाथों से अपनी पूरी शक्ति लगा कर पूंछ को सरकाने का प्रयास किया लेकिन पूंछ टस से मस नहीं हुई। तब भीम को लगा कि इसमें अवश्य कोई रहस्य है और उसने उस वानर के सम्मुख हाथ जोड़ कर पूछा की महानुभाव आप कौन हैं? इस पर वह वानर उठ खड़ा हुआ और अपने दिव्य रूप में आ कर उत्तर दिया कि मैं श्रीराम भक्त हनुमान हूं। यह सुनते ही भीम उनके चरणों में गिर गया और उसे अपनी भूल का अहसास हो गया कि वह गलत घमंड कर रहा था। - यह कहानी उपेदशात्मक तो थी ही साथ ही कल्पना शक्ति को बढ़ावा देने वाली भी थी। कहानी सुनते समय मैं कल्पना करती के कैसे भीम को वृद्ध वानर के रूप में हनुमान मिले होंगे? कैसे उसका घमंड चूर-चूर हुआ होगा?

बऊ की कहानियां राजा, रानियों, भूत, प्रेत आदि से भरी होती थीं। लेकिन सब की सब सुखांत और सत्य की विजय स्थापित करने वाली। एक मनुष्य भूत के सामने भी कैसे निडरता से डटा रह सकता है, उनकी कहानियों में यही नुस्खा रहता था। मामाजी की कहानियों में आदिवासी अंचलों की कहानियों की बहुलता होती थी। आदिवासियों के देवी, देवता, उनका जुझारूपन आदि उन कहानियों में रहता था। मेरी वर्षा दीदी की कहानियों में ‘‘अंधेर नगरी चैपट राजा’’ भी शामिल रहती थी, क्योंकि उन्हें कहानियां, नाटक आदि पढ़ने का भी बहुत शौक था। आज अगर मैं कहानियां या उपन्यास लिख पाती हूं तो उसके मूल में बचपन में सुनी वे कहानियां ही हैं जिन्होंने मुझे कल्पना और दृश्यात्मकता का पाठ पढ़ाया। मेरे समकालीन लगभग सभी साहित्यकारों के जीवन में यह दौर आया होगा जब उन्होंने अपने बचपन में जी भर-भर के कहानियां सुनी होंगी। कल्पना शक्ति को बढ़ाने और संस्कारित करने में चंदामामा, नंदन आदि की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता है। वे बाल पत्रिकाएं हमारे लिए उसी प्रकार प्रिय थीं जैसे आज छोटे बच्चों को मोबाईल पसंद है। लेकिन उन पत्रिकाओं और मोबाईल में जमीन-आसमान का अन्तर है। उनमें भटकने की गुंजाइश नहीं थी किन्तु मोबाईल में बालमन को भटकने के अनेक अवसर रहते हैं।

जब से मोबाईल ‘‘लाईफ लाइन’’ की भांति जीवन का अभिन्न हिस्सा बन गया है तब से एक बात मैंने गौर की है कि कई युवा माताएं अपने बच्चे के मन बहलाने तथा उन्हें उलझाए रखने के लिए उनके हाथ में मोबाईल थमा देती हैं। बच्चा अधिकतर मार-काट वाले गेम्स में उलझता चला जाता है और मां को इसका अहसास ही नहीं हो पाता है। आजकल छोटे बच्चों के जिद्दी और क्रोधी स्वभाव बढ़ने का एक कारण यह भी मुझे लगता है। ऐसे में जरूरी हो जाता है कि उनके हाथों से मोबाइल दूर कर के उन्हें चित्रों वाली किताबें, और तनिक बड़े होने पर बाल साहित्य वाली किताबें दी जाएं। क्योंकि जो बच्चे को दिया जाएगा, वह उसी के प्रति आकर्षित होगा और उसे ही पहचानेगा।

आधुनिक मांए आजकल लोरी, गीत या कहानियां कम ही सुनाती हैं, यह काम ‘‘एलेक्सा’’ को सौंप दिया जाता है जिसमें साहित्य तो होता है किन्तु स्पर्श या संवेदनात्मकता नहीं होती है। लिहाज़ा यह एक कठिन दौर है जब बाल साहित्य अपनी पुनस्र्थापना की मांग कर रहा है। साहित्य अकादमी मध्यप्रदेश शासन के अध्यक्ष विकास दवे जी को इसकी चिंता है किन्तु मात्र क्या उनकी चिंता करने से सबकुछ संभव हो सकेगा? साहित्यकारों को भी बाल साहित्य लिखने में ईमानदारी बरतनी होगी। मात्र कथित बाल कविताओं की तुकबंदियां कर स्वयं को बाल साहित्यकार समझ लेने वाले रचनाकार भले ही अपनी पुस्तकों की संख्या बढ़ा लें किन्तु बच्चों के लिए उपयोगी साहित्य कभी नहीं दे सकते हैं।
कई बार संवाद में यह सामने आता है कि एक तो बाल साहित्य को हमेशा हाशिए पर खड़ा रखा गया, उस पर बाल साहित्य के स्वरूप को ही कई साहित्यकार समझ नहीं पाते हैं। जबकि हमारे देश में प्राचीनकाल से बाल साहित्य रचा जा रहा है। विष्णु शर्मा ने चार उद्दंड राजकुमारों को शिक्षित करने तथा जीवन की नीतियों का ज्ञान देने के लिए वे कहानियां सुनाईं जिनके पात्र पशु, पक्षी थे। हम उन कहानियों के संग्रह को ‘‘पंचतंत्र’’ के नाम से जानते हैं। ‘‘सिंहासन बत्तीसी’’ की कहानियां रोचक होती हुई शिक्षाप्रद हैं। ‘‘वेताल कथाओं’ को भला कैसे भुलाया जा सकता है जिसमें विक्रमादित्य वेताल को वृक्ष की शाखा से उतार कर अपने कंधे पर रखता है और वेताल अचानक सचेत हो कर राजा से कहता है कि ‘राजन, मैं तुझे एक कहानी सुना रहा हूं। इसके अंत में एक प्रश्न आएगा जिसका उत्तर यदि तूने नहीं दिया तो तेरे सिर के टुकड़े-टुकड़े हो जाएंगे।’ विडंबना ये कि राजा को पता है कि यदि वह बोलेगा तो वेताल फिर से पेड़ पर जा कर लटक जाएगा। अतः रोज रात को विक्रमादित्य वेताल को शाख से उतारता और उसकी कहानी के अंत के प्रश्न का उत्तर देकर उसे खो देता। इस तरह अनेक कहानियों की श्रृंखला है वह।

प्रश्न उठता है कि क्या आज बाल साहित्य का स्वरूप पहले जैसा बचा है? अथवा उसके कलेवर को समकालीन बनाए रखा जा सकता है? जब हम छोटे तो हमने जो कविताएं सुनी थीं, याद की थीं उनमें एक नन्हीं-सी कविता थी -
चल उठ,
मुंह धो,
जल भर।
आज बच्चे को इस तरह पानी भरना सिखाने की आवश्यकता लगभग नहीं है। फिर अधिकांश बच्चे अंग्रेजी स्कूलों के सुपुर्द कर दिए जाते हैं जहां वे ट्विंकल- ट्विंकल लिटिल स्टार’’ और ‘‘जैक एंड जिल’’ जैसी कविताएं सीखते हैं। यहां भी विडंबना ये कि फ्लैट्स में रहने वाले और अधिकांश समय पंखा, एसी में सोने वाले बच्चे खुले आसमान की तारों वाली रात देख ही नहीं पाते हैं। वे न तो ‘चोरखटिया’ यानी बड़ी सप्तऋषि जानते हैं और न छोटी सप्तऋषि। ध्रुव तारा आकाश में कहा स्थित होता है, उन्हें यह भी पता नहीं। न जानने के क्रम में वह कदंब का पेड़ भी है जिस पर सुभद्रा कुमारी चौहान ने अपनी प्रसिद्ध कविता लिखी थी कि-
वह कदंब का पेड़ अगर मां होता यमुना तीरे
मैं भी उस पर बैठ कन्हैया, बनता धीरे-धीरे।
आज शहरों से कंदब के पेड़ गायब हो चुके हैं, जो बचे हैं वे बच्चों के माता-पिता के भी संज्ञान में भी नहीं रहते हैं।

अब प्रश्न आता है सबसे नवीनतम टैक्नोलाजिकल स्थिति का, जिसे हम ‘‘एआई’’ यानी आर्टीफीशियल इंटेलीजेंस के नाम से जान रहे हैं। उसने तूफान की तरह बड़ी तरंगे उठानी शुरू कर दी हैं। कहा तो ये जाता है कि इन दिनों कई किताबें भी एआई के द्वारा लिखी जा रही हैं। क्या यह छल बाल साहित्य के मर्म को समझ सकेगा? जबकि बाल साहित्य से अपेक्षा की जाती है कि वह टेक्नाॅलाजी के साथ परिवर्तित होते युग में बच्चों के लिए मानवीय मूल्यों, राष्ट्रीय मूल्यों और आदर्श पूर्ण मूल्यों को बनाए रखे। यह एक चुनौती है। शासकीय इकाइयां मात्र सहायता कर सकती हैं, अन्यथा इस चुनौती से स्वयं साहित्यकारों को निपटना होगा। इसके लिए आवश्यक है कि वे साहित्य सृजन करने में एआई के छल का सहारा न लें, वर्तमान बाल मनोविज्ञान को समझें और पारंपरिक मूल्यों व संस्कारों को आधुनिक प्रवृतियों के साथ इस प्रकार समायोजित करें कि वह बच्चों को मनोरंजन और शिक्षा एक साथ मिल सके तथा उनमें पुस्तक पढ़ने के प्रति रुचि जाग सके। यहां मैं वे दो बातें कहना चाहूंगी जो मेरी मां मुझसे कहा करती थीं कि कोई भी चुनौती स्थाई नहीं होती और कोई भी चुनौती ऐसी नहीं होती जिसका कोई हल न निकाला जा सके, यदि चुनौती का सामना करने की ईमानदार मंशा हो।               
-----------------------
(दैनिक, सागर दिनकर में 11.03.2026 को प्रकाशित) 
------------------------
#DrMissSharadSingh #चर्चाप्लस  #सागरदिनकर #charchaplus  #sagardinkar #डॉसुश्रीशरदसिंह

Tuesday, July 11, 2023

पुस्तक समीक्षा | बाल साहित्य को समृद्ध करतीं बाल कविताएं | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

प्रस्तुत है आज 11.07.2023 को  #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई  कवि बृंदावन राय के काव्य संग्रह "बाल कविताओं का उपवन" की समीक्षा... 
-------------------
पुस्तक समीक्षा
बाल साहित्य को समृद्ध करतीं बाल कविताएं
- समीक्षक डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
-------------------
काव्य संग्रह - बाल कविताओं का उपवन
कवि       - बृंदावन राय सरल
प्रकाशक  - शाॅपीज़ेन, 201, अश्वमेघ एलीजेंस-2, अम्बावडी मुख्य बाज़ार, कल्याण ज्वेलर्स के समीप, अम्बावडी, अहमदाबाद, गुजरात -380006
मूल्य       - 227/-
-------------------
    कवि बृंदावन राय सरल एक अरसे से साहित्य सृजन के क्षेत्र में हैं। उन्होंने बड़ों के लिए दोहा, चौपाई ग़ज़ल आदि लिखे हैं। साथ ही उन्होंने बच्चों लिए भी साहित्य सृजन किया है। बच्चों के लिए लिखना आसान नहीं होता है। एक बाल साहित्यकार के लिए प्राथमिक शर्त यही होती है कि वह बाल मनोविज्ञान को समझता हो और बच्चों के अनुरुप लिखने की क्षमता रखता हो। कवि सरल ने बालसृजन को बखूबी साधा है।

वयस्क जब अपने जीवन में उलझ जाते हैं तो उनसे जाने-अनजाने बच्चों की उपेक्षा होने लगती है। ठीक यही स्थिति साहित्य के क्षेत्र में है। हिन्दी साहित्य में बाल साहित्य का अपना विशेष स्थान रहा है। लेकिन जब यथार्थवादी लेखन का दौर आया तो पराग, चंपक, चंदामामा जैसी कुछ पत्रिकाएं थीं जिन्होंने बाल साहित्य को उसके मौलिक स्वरूप में बचाए रखा तथा कई प्रसिद्ध रचनाकारों को बाल साहित्य सृजन करने के लिए प्रेरित किया। फिर भी साहित्य की मूलधारा में बाल साहित्य गौण होता चला गया। एक स्थिति तो यह भी आई कि बाल साहित्य के रचनाकारों को साहित्यकारों की श्रेणी में गिने जाने से भी परहेज किया जाने लगा। जबकि बाल साहित्य वयस्क साहित्य की नींव है। यहां वयस्क साहित्य का अर्थ ‘‘ए-क्लास’’ अथवा ‘‘मात्र वयस्कों के लिए’’ लिखे जाने वाले कामुक अथवा थ्रिलर साहित्य से नहीं है। यहां वयस्क साहित्य का अर्थ है वह साहित्य जो बालमनो श्रेणी से से ऊपर की आयु के व्यक्तियों को ध्यान में रख कर लिखा गया हो। वहीं बाल साहित्य 12-14 वर्ष तक की आयु के बच्चों के लिए लिखा जाता है। बालसाहित्य का उद्देश्य होता है कि किस्से, कहानियों, कविताओं, नाटकों आदि के माध्यम से बच्चों को शिक्षाप्रद बातें बताई जाएं। ठीक वैसे ही जैसे खेल-खेल में शिक्षा देना। इसीलिए गद्य में छोटे-छोटे सरल संवाद और कविताओं में तुकबंदी प्रधान छोटी-छोटी पंक्तियों को अपनाया जाता है। इससे बच्चे उन्हें आसानी से समझ सकते हैं, गुनगुना सकते हैं, याद रख सकते हैं। इसका सबसे श्रेष्ठ और बहुप्रचलित उदाहरण है-‘‘मछली जल की रानी है/ जीवन जिसका पानी है/हाथ लगाओ डर जाएगी/ बाहर निकालो मर जाएगी।’’ इन चार पंक्तियों में मछली के बारे में पूरी जानकारी दे दी गई है। यही सहजता, सरलता एवं उपादेयता बच्चों के लिए आवश्यक होती है।

कवि बृंदावन राय सरल के काव्यसंग्रह ‘‘बाल कविताओं का उपवन’’ बालपाठकों को ध्यान में रख कर ही लिखा गया है। इस संग्रह की भूमिका डॉ. विकास दवे ने लिखी है जो कि निदेशक, साहित्य अकादमी, मध्यप्रदेश शासन, भोपाल हैं। डाॅ. दवे ने संग्रह की कविताओं पर टिप्पणी करते हुए लिखा है कि ‘‘सभी रचनाएं एक ओर बच्चों को सृष्टि से जोड़ने का काम करेंगी वही राष्ट्रीय चेतना से जुड़े विषय बच्चों को अपने देश के सरोकारों से जोड़ने का काम करेंगे।’’
इस संग्रह की कविताओं की सबसे बड़ी विशेषता ये है कि उन्होंने उन विषयों को भी अपनी कविताओं में पिरोया है जो प्रायः छूट जाती हैं। संग्रह में भाषाई सरलता और सहजता के साथ विभिन्न विषयों को काव्य के रूप में प्रस्तुत किया हैै। जैसे ‘‘घड़ी’’ शीर्षक कविता में घड़ी की महत्ता को बताया है-
टिक टिक करती घड़ी हमारी।
अब भी हमको लगती प्यारी।
पल-पल का ये समय बताती।
मर्म समय का हमें सिखाती।
भिन्न-भिन्न आकार है इसके।
भिन्न भिन्न श्रृंगार हैं इसके।
इसमें तीन मिलेंगे कांटे।
अपने-अपने काम जो बांटे।
छोटा मुख्य समय बतलाए ।
बड़ा मिनट का पता दिखाए।
इसमें एक और है कांटा।
जो सैकिंड से हमें मिलाएं।

इसी तारतम्य में एक महत्वपूर्ण कविता है-‘‘मजदूर’’। आमतौर पर बालसाहित्य में मजदूरों पर बहुत कम लिखा जाता है। मजदूरों का जीवन वर्णन बड़ों के लिए पठनीय साम्रगी माना जाता है। किन्तु कवि सरल ने मजदूरों की दशा-दिशा पर ज्ञानवर्द्धक कविता लिखी है-
गांवों में जो सड़क बनाते।
नहरों से जो खेत सजाते।
खेतों से जो फसल काटते।
गड्ढे पथ के रोज पाटते ।
रोज पार्क में पानी देते।
पत्थर पर भी जो सो लेते।
एक बार जो दिन में खाते ।
फिर भी दिन भर जो मुस्काते।
ये सब ही मजदूर कहाते।
शहर गांव को स्वच्छ बनाते।
इनसे है शहरों में रौनक ।
इनसे है कस्बों में रौनक ।
इन पर निर्भर शहरी जीवन।
इनपर निर्भर शहरी साधन।
आओ इनको गले लगाएं।
इनको अपना मित्र बनाएं

इस प्रकार की कविताएं बालमन को जहां जीवन की विविधता से जोड़ती हैं, वहीं समाज में उपेक्षित वर्ग के प्रति सहानुभूति एवं सम्मान का बीज बोने का काम करती हैं। कवि सरल ने दैनिक जीवन में स्वच्छता के महत्व को बताने के लिए ‘‘बाथरूम’’ शीर्षक से बाथरूम एवं शौचालय पर भी कविता लिखी है जो आम बालकविताओं से हट कर नूतनता की परिचायक है-
बाथरूम हो घर का सुंदर।
साफ स्वच्छ हो जिसका परिसर ।
नल बिजली की सुविधाएं हों।
शौचालय की सुविधाएं हों।
पानी की मत हों बाधाएं।
फब्बारे की हों सुविधाएं ।
बदबू हरगिज तनक न आए।
ऐसी सभी व्यवस्था पाएं।
बाथरूम हो घर का सुंदर ।
साथ स्वच्छ हो जिसका परिसर ।
खिड़की शुद्ध हवा को हो इक।
गर्म पानी का भी हो नल इक।
बाथरूम हो इतना सुंदर ।
साफ स्वच्छ हो जिसका परिसर ।

बच्चों को उनकी बाल्यावस्था से ही यातायात के नियमों से परिचित कराना, यातायात सिग्नल्स की लाल एवं हरी लाईट्स का अर्थ समझाना आवश्यक होता है, जिससे वे स्कूल के लिए अकेले जाते समय तथा बड़े हो कर यातायात नियमों का पालन करें और स्वयं को सुरक्षित रखें। ‘‘बत्ती...सिग्नल....’’ कविता यातायात के बुनियादी नियम को सरल एवं रोचक शब्दों में समझाती है-
चौराहों पर बत्ती जलती।
जिससे कारें रुकती बढ़ती।
जो इनके नियमों को तोड़े।
पुलिस से अपना नाता जोड़े।
हरी का मतलब है बढ़ जाना।
लाल का अर्थ यहां रुक जाना।
इनसे नहीं हादसा होते ।
दुख से नहीं सामना होते ।
जनहानि से हम बच जाते।
यह सब नियम अगर अपनाते ।

कवि बृंदावनराय सरल पर्यावरण और जीव-जन्तुओं के प्रति बच्चों में जागरूकता लाना चाहते हैं। उनकी कविता ‘‘सांप’’ इसी बात की द्योतक है कि सांप भी प्रकृति का अभिन्न अंग है। प्राणिजगत में उनका भी विशेष स्थान है। इस कविता में कवि ने सांपों के प्रकार तथा उनके पाए जाने वाले स्थानों को भी लक्षित किया है। इस कविता की कुछ पंक्तियां देखें-
अद्भुत अद्भुत सांप धरा पर ।
खेतों वन में रहते अक्सर।
जहरीले भी सभी न होते।
ये भी हँसते ये भी रोते।
आपस में ही इनमें अंतर ।
खेत वनों में रहते अक्सर ।
सांप कोबरा अति जहरीला ।
जिसको डसता होता नीला।
सबसे बढ़कर होता अजगर ।
ये जंगल में रहते अक्सर ।
घर में कभी कभी आ जाते।
पानी में भी इनको पाते।

  इस तरह देखा जाए तो कवि बृंदावन राय सरल की कविताओं में विषय की विविधता के साथ ही विषय के चयन में अनूठापन भी है जो उनके इस संग्रह को महत्वपूर्ण बनाती है। ऐसे समय में जब बच्चों के लिए मौलिक साहित्य कम लिखा जा रहा है,‘‘बाल कविताओं का उपवन’’ का प्रकाशित होना स्वागत योग्य है। बालोपयोगी पुस्तक के अनुरुप मुद्रण एवं साज-सज्जा आकर्षक है। कुल इक्यावन बाल कविताओं का यह संग्रह कवि के बालसृजन के प्रति आश्वस्त करता है।
  ----------------------------               
#पुस्तकसमीक्षा #डॉसुश्रीशरदसिंह  #bookreview  #bookreviewer  #DrMissSharadSingh