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Monday, December 26, 2022

समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह पुस्तक लोकार्पण समारोह में

25.12.2022...आदर्श संगीत महाविद्यालय का सभागार... श्यामलम संस्था के द्वारा स्व. शंकरदत्त चतुर्वेदी स्मरण पर्व वा शिक्षक सम्मान समारोह... लेखक आर.के.तिवारी जी की पुस्तक व्यंग्य-संग्रह "कुन्जी दाऊ की शादी की पचासवीं वर्षगाँठ" का विमोचन... मुख्य अतिथि विधायक श्री शैलेन्द्र जैन, कार्यक्रम अध्यक्ष  प्रोफेसर श्री सुरेश आचार्य, समीक्षक  डॉ (सुश्री) शरद सिंह यानी मैं... स्व. चतुर्वेदी की पुत्री डॉ अंजना चतुर्वेदी तिवारी, दामाद एडवोकेट अमित तिवारी, दोनों परिवारों के परिजन, श्यामलम सदस्य तथा नगर के बुद्धिजीवी। 
यादगार पल....🌷
📸 तस्वीरों के लिए हार्दिक धन्यवाद भाई मुकेश तिवारी एवं भाई माधवचंद्र चंदेल 🙏
📖 हार्दिक धन्यवाद श्यामलम एवं प्रिय बहन अंजना 🙏

#bookrelease #DrMissSharadSingh 
#डॉसुश्रीशरदसिंह

Tuesday, December 28, 2021

पुस्तक समीक्षा | बाल कविताओं का बालोपयोगी संग्रह | समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह

प्रस्तुत है आज 28.12. 2021 को आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई कवि वृंदावन राय 'सरल' के काव्य संग्रह "मैं भी कभी बच्चा था" की समीक्षा... 
आभार दैनिक "आचरण" 🙏
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पुस्तक समीक्षा
बाल कविताओं का बालोपयोगी संग्रह
 समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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काव्य संग्रह   - मैं भी कभी बच्चा था
कवि         - वृंदावन राय ‘सरल’
प्रकाशक      - मध्यप्रदेश लेखक संघ, इकाई सागर म.प्र.
मूल्य         - 60/-
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बाल साहित्य का अपना एक अलग महत्व है। बड़ों का साहित्य शिक्षाप्रद होने का स्पष्ट आग्रह नहीं रखता है किन्तु बाल साहित्य का मूल आधार ही शिक्षाप्रद होना है। ऐसा साहित्य जो रोचकता के साथ खेल-खेल में बच्चों को जीवन से जुड़ी शिक्षा दे डाले, वही सार्थक बालसाहित्य है। बाल साहित्य की भाषा ऐसी हो जो बच्चों को सुगमता से समझ में आ जाए। दृश्यात्मकता इतनी हो कि बच्चे कल्पनालोक में विचरण करने लगें। जैसे वह कविता है जिसे हम सभी ने अपने बचपन में सुनी है, पढ़ी है और अनेक बार सुनाई है-‘‘मछली जल की रानी है/जीवन उसका पानी है/हाथ लगाओ डर जाएगी/बाहर निकालो मर जाएगी।’’
यह छोटी-सी कविता मछली के अस्तित्व को बालमन में इस तरह बिठा देती है कि व्यक्ति जीवनपर्यंत उसे भूल नहीं पाता है। कुछ समय पहले कोल्डड्रिंक का एक जिंगल चला था जिसमें ‘‘ठंडा’’ शब्द आते ही पूरा जिंगल मस्तिष्क में ताज़ा हो उठता था। कहीं भी ‘‘ठंडा’’ शब्द चर्चा में आता तो आगे के शब्द स्वतः ज़बान पर आ जाते। यह जिंगल था- ‘‘ठंडा यानी कोेकाकोला’’। इस कामर्शियल जिंगल की तरह मछली शब्द बोलते ही ‘‘जल की रानी... जीवन जिसका पानी...’’ शब्द समूह मस्तिष्क में जाग उठते हैं। यही विशेषता होती है एक अच्छे, सटीक बाल साहित्य की। वह किसी कामर्शियल जिंगल की तरह उसे बालमन पर दस्तक देने और पैंठ जाने की क्षमता रखता हो। एक और कविता थी जो बचपन में कोर्स की किताब ‘‘बालभारती’’ में पढ़ी थी, जिसका शीर्षक था ‘‘नागपंचमी’’- 
इधर उधर जहां कहीं, दिखी जगह चले वहीं।
कमीज को उतार कर, पचास दंड मारकर।
अजी अजब ही शान है, अरे ये पहलवान है।
- इस कविता को पढ़ने के बाद पहलवानों की छाप दिमाग में ऐसी बैठी कि आज भी नागपंचमी आने पर अथवा पहलवानों की चर्चा होने पर इस कविता की प्रथम दो पंक्तियां स्वतः कौंध जाती हैं।
हिन्दी साहित्य में बाल कविताओं की दीर्घ परंपरा नहीं मिलती है। आधुनिककाल में अवश्य भरपूर बाल कविताएं लिखी गईं। नंदन, पराग, चंपक आदि बाल पत्रिकाओं के प्रकाशन ने भी इसे बढ़ावा दिया। साथ ही प्रत्येक पारिवारिक पत्रिका तथा समाचारपत्र में बच्चों के लिए पन्ना तथा कोना निर्धारित हो गया जिसने बाल साहित्य को बच्चों तक पहुंचाने की दिशा में सरल मार्ग बना दिया। बालमुकुन्द गुप्त, मैथिलीशरण गुप्त, अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’, महादेवी वर्मा, सुमित्रानंदन पंत, सुभद्राकुमारी चैहान आदि सभी ने बड़ों के लिए साहित्य सृजन करने के साथ ही बच्चों के लिए भी कलम चलाई। ये बाल कविताएं बच्चों के भीतर कोमल भावनाओं का विकास करने में सक्षम थीं। इनका उद्देश्य देश के ऐतिहासिक व सांस्कृतिक गौरव से परिचित कराने के साथ ही देश प्रेम की भावना जगाने तथा नैतिक शिक्षा देने का था। फिर भी ये कविताएं बोझिल नहीं थी वरन रोचक थीं। कवि प्रदीप का वह गीत जो फिल्म के लिए रिकाॅर्ड होने के बाद बच्चे-बच्चे की ज़बान पर चढ़ गया-‘‘आओ बच्चो तुम्हें दिखाएं झांकी हिन्दुस्तान की/ इस मिट्टी से तिलक करो, ये मिट्टी है बलिदान की।’’ यह कविता बच्चों को संबोधित कर के लिखी गई लेकिन यह थी बच्चों के लिए ही। कहने का आशय यह है कि इससे कोई विशेष अंतर नहीं पड़ता है कि कविता बच्चों के लिए लिखी गई अथवा बच्चों को आधार बना कर लिखी गई। ‘‘मैंया मोरी मैं नहीं माखन खायो’ कवि सूरदास ने बच्चों के लिए नहीं लिखा किन्तु बच्चों में इसकी सदा भरपूर लोकप्रियता रही है। क्योंकि यह कविता बालमन का एक ऐसा दर्पण प्रस्तुत करता है, जिसमें हर बच्चा अपना प्रतिबिम्ब देख सकता है। पुस्तक समीक्षा के अंतर्गत इस लम्बी भूमिका का औचित्य यह है कि इस बार जो पुस्तक समीक्ष्य है वह बालकविताओं का संग्रह है। इस पुस्तक का नाम है-‘‘मैं भी कभी बच्चा था’’। जैसा कि नाम से ही स्पष्ट हो रहा है कि इस संग्रह की कविताएं अपने बालपन के अनुभवों एवं संस्मरण के बहाने बच्चों से सीधा काव्यात्मक संवाद करने का प्रयास है। यह संग्रह है कवि वृंदावन राय ‘‘सरल’’ का जिन्होंने आरंभ में ही अपने विचार रखते हुए बताया है कि उन्होंने कवि दीनदयाल बालार्क जी से प्रेरणा ले कर बाल कविताएं लिखना शुरू कीं। कवि दीनदयाल बालार्क सागर नगर के वरिष्ठ कवियों में रहे हैं तथा उनके बालगीत बहुत चर्चित रहे हैं। 
‘‘मैं भी कभी बच्चा था’’ काव्य संग्रह में दो परिचयात्मक भूमिकाएं हैं। प्रथम भूमिका प्रो. सुरेश आचार्य की है जिन्होंने वृंदावन राय ‘‘सरल’’ की सृजनात्मकता पर टिप्पणी करने हुए लिखा है कि ‘‘यदि बालगीतकार के रूप में इनकी अद्भुत प्रतिष्ठा है और देशव्यापी ख्याति है तो इसका मूल कारण उनकी रचनात्मकता है जो बाल जिज्ञासा को समझने के साथ-साथ उसे नए रास्ते सुझाने, नीति युक्त जीवन हेतु तैयार करने और पर्यावरण की रक्षा के लिए प्रेरित करते हुए एक अच्छे मनुष्य के रूप में एक श्रेष्ठ जीवन बिताने की शिक्षा देती है।’’
  दूसरी भूमिका कवि स्व. निर्मल चंद निर्मल की हैं। वृंदावन राय ‘‘सरल’’ की कविताओं की विशेषता को रेखांकित करते हुए उन्होंने लिखा है कि -‘‘ ‘‘आज का बालक प्रगतिशील हैं जो आठ पंक्तियों को कंठस्थ कर सकते हैं। मैं सरल जी के इन बाल गीतों की सराहना करता हूं। बाल रुचि को यह रचनाएं भाएंगी और विश्वास करता हूं कि इस ओर अन्य कवि भी अपने कदम बढ़ाएंगे। बाल बुद्धि के लिए बाल गीतों की आवश्यकता है।’’
वृंदावन राय ‘‘सरल’’ की कविताओं में दृश्यात्मकता भी है, ज्ञान भी है और रोचकता भी है। उनकी यह कविता देखिए-
बारहसिंगा, तेंदुआ, 
है जंगल की जान।
दोनों की अद्भुत गति
जैसे हवा समान।
ख़तरनाक़ है भेड़िया
उस पर है चालाक।
खा जाए ख़रगोश को 
तोड़े उसकी नाक।

जहां कवि ‘‘सरल’’ अपनी कविता के माध्यम से वन्य पशुओं से परिचित कराते हैं, वहीं वृक्षों के महत्व को भी बालमन में स्थापित करने का सुंदर प्रयास करते हैं। यह बालगीत देखिए - 
वृक्ष हमारे देवता
नदियां देवी रूप
आओ इनको रोक लें
हम होने से कुरुप
वृक्षों को हम मान लें 
माता-पिता समान
इनके ही आशीष से 
मिलता जीवनदान।

वृक्ष पर्यावरण चक्र की एक महत्वपूर्ण कड़ी हैं। उनसे हमें आॅक्सीजन मिलती है तथा छाया, फल, फूल, रुई, लकड़ी, औषधि आदि अनेक चीज मिलती हैं। ऐसे महत्वपूर्ण तत्व के प्रति बच्चों को जागरुक करने की दिशा में यह कविता विशेष महत्व रखती है। इसी तारतम्य में एक और छोटी-सी कविता है-
जंगल जीवन का आधार
करना होगा इससे प्यार
इसकी रक्षा बहुत ज़रूरी
खुशियां इससे मिलें अपार
जंगल जीवन का आधार।

वन और वन्य पशु-पक्षियों के प्रति जागरूकता जगाता एक छोटा-सा बालगीत है जिसमें वन्य पक्षियों तथा उनके साथ ग्रामीणजन का व्यवहार का वर्णन किया गया है। चूंकि आज मनुष्यों की रिहायशी बस्तियां फैल रही हैं और जंगल में मनुष्यों कर घुसपैंठ बढ़ गई है अतः वन्यजीवन और मनुष्यों के बीच मुटभेड़ होना तय है। इस प्रकार के टकराव में मनुष्य को ही धैर्य और मनुष्यता का परिचय देना होगा। यह बात इस गीत में स्पष्टरूप से देखा जा सकता है -
जंगल में देखे बहुत
तोता, मैंना  मोर
कानों को भाता बहुत
जिनका अद्भुत शोर
इनका भी अब गांव में
करते लोग शिकार
इनको मिलना चाहिए
जीने का अधिकार

कवि ‘‘सरल’’ ने भालू पर एक बहुत सुंदर कविता लिखी है जो इस संग्रह में मौज़ूद है। इस कविता में उन्होंने भालू की दिनचर्या और बंदर से उसकी दोस्ती का वर्णन किया है। इस कविता का महत्व यह है कि यदि बच्चे अपनी बालावस्था से ही वन्यप्राणियों स्नेह और अपनत्व रखेंगे तो बड़े होने पर वन्य पशुओं के संरक्षण पर पूरा ध्यान दे सकेंगे। कविता इस प्रकार है-
शहद ढूंढता वन में भालू
मगर नाम है उसका कालू
जंगल में बंदर भी लालू
दोनों अक्सर खाएं आलू
शहद ढूंढता वन में भालू
मगर नाम है उसका कालू

इस संग्रह में आपसी भाईचारे और कौमी एकता पर भी कविता है जिसमें बच्चों को सभी प्रकार के भेद-भाव से ऊपर उठ कर, मिलजुल कर रहने का संदेश दिया गया है-
प्रेम भाव से मिल कर रहना
लेकिन कोई जुल्म न सहना
हिन्दू मुस्लिम सिख इसाई
सबको अपना भाई कहना
सत्य और ईमान की दौलत
यही हमारा असली गहना
अपने घर को महल बनाने
निर्धन के घर कभी न ढहना
भारत के कल्याण की ख़ातिर
हिन्दू मुस्लिम मिल कर रहना

कवि वृंदावन राय ‘‘सरल’’ की बाल कविताओं का यह संग्रह इस दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है कि आज बच्चों के लिए साहित्य कम रचा जा रहा है। गुरु रवीन्द्रनाथ टैगोर का यह कथन आज एक कसौटी की तरह है कि -‘‘बच्चों के कोमल, निर्मल और साफ मस्तिष्क को वैसे ही सहज तथा स्वाभाविक बाल साहित्य की आवश्यकता होती है।’’ कवि टैगोर द्वारा दी गई इस कसौटी पर वृंदावन राय ‘‘सरल’’ बालकविताएं एवं गीत खरे उतरते हैं।
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#पुस्तकसमीक्षा #डॉशरदसिंह #डॉसुश्रीशरदसिंह #BookReview #DrSharadSingh #miss_sharad #आचरण

Tuesday, December 21, 2021

पुस्तक समीक्षा | स्त्री स्वर को मुखर करता एक उम्दा काव्य संग्रह | समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह

प्रस्तुत है आज 21.12. 2021 को #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई संपादक अनुभूति गुप्ता द्वारा संपादित काव्य संग्रह "स्त्री स्वर" की समीक्षा...
आभार दैनिक "आचरण" 🙏
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पुस्तक समीक्षा
स्त्री स्वर को मुखर करता एक उम्दा काव्य संग्रह
समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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काव्य संग्रह   - स्त्री स्वर
संपादक      - अनुभूति गुप्ता
प्रकाशक     - उदीप्त प्रकाशन, लखीमपुर खीरी, (उ.प्र.)
मूल्य        - 100/-
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‘‘स्त्री स्वर’’ यह एक साझा काव्य संकलन है। इसका संपादन अनुभूति गुप्ता ने किया है। इस संकलन में पंद्रह कवि एवं कवयित्रियों की वे काव्य रचनाएं सम्मिलित की गई हैं जिनमें स्त्री स्वर मुखर हुआ है। इस सम्वेत संकलन में डॉ भारती वर्मा बौड़ाई, अजय कुमार मिश्र ‘‘अजयश्री’’ वीणा मावर, डॉ सुरेंद्र निशब्द, आनंद वर्धन शर्मा, डॉ शम्मी श्रीवास्तव, रामेश्वर प्रसाद गुप्त, शिवमंगल सिंह, त्रिवेणी मिश्रा, वीरेंद्र प्रधान, प्रभु दयाल खट्टर, गिरीश चावला, संजय सनातन, जितेंद्र कुमार वैष्णव और विनोद कुमार की कविताएं संग्रहित की गई है। इन सभी कविताओं में स्त्री जीवन के संघर्ष दशाओं और क्षमताओं की चर्चा की गई है।
वर्तमान समाज में भी स्त्री पूर्णतया सुरक्षित नहीं है, न तो घर में और न ही बाहर। वह अपने अस्तित्व को साबित करने के लिए निरंतर संघर्ष करती रहती है। इसके बावजूद उसे प्रताड़ना भी सहना पड़ता है लेकिन उसके भीतर की शक्ति उसे सशक्त बनाए रखती है और वह बिना डरे बिना थके जूती रहती है। कवयित्री डॉ भारती वर्मा बौड़ाई ने अपनी कविता ‘‘मैं नव विहान हूं’’ में स्त्री के सशक्त पक्ष को सामने रखा है। पंक्तियां देखिए-
मेरी ओर /बढ़ते हुए ये
असंख्य राक्षसी हाथ
पर नहीं कोई /हाथ ऐसा
जो रक्षा के लिए /उठता दिखे
पर नहीं /किंचित भी
भयभीत मैं /मेरे दोनों हाथ
समर्थ है पूर्णतया /मेरे लिए,
अब कितने भी /उठें वहशी हाथ मेरी ओर
तोड़ डालूंगी उन्हें स्वयं
करूंगी अब न्याय स्वयं
क्योंकि मैं समर्थ और शक्तिवान हूं
मैं नव विहान हूं।

कवि अजय श्री ने अपनी कविता में साहित्य के उस पक्ष को सामने रखा है जिसमें एक विज्ञापन के समान स्त्री का वर्णन करके वाहवाही लूटने का प्रयास किया जाता है। कतिपय साहित्यकारों का प्रिय विषय गांव का वर्णन और स्त्री की देह मात्र इसलिए होता हैकि उसके द्वारा उन्हें पाठकवर्ग अथवा श्रोताओं की प्रशंसा मिल जाती है। ऐसे कवियों पर कटाक्ष करते हुए अजयश्री ने अपनी कविता ‘‘लेखन का प्रिय विषय’’ के अंतर्गत लिखा है-
गांव की माटी/और औरत की देह !
खूब दोहन करते हैं
जिनका नहीं है सरोकार ।
शहर के किचन में
पकती है गांव की रसोई
गर्भाधान से लेकर श्मशान तक
अनुसंधान करते हैं/परत दर परत।
शहर की रौनक/जब उतरती है
खेतों में बुवाई के लिए
जोड़ती है कछोटामार/खेतीहरनों से,
एक एक शब्द उगता है/किसी आलीशान बंगले में
करीने से सजाएं स्टडी टेबल पर
रखे लैपटॉप पर।

भारतीय संस्कृति यूं तो दुनिया में सदा गौरव का विषय रही है किंतु कुछ ऐसे हादसे हुए हैं जिन्होंने संस्कृति और समाज दोनों को लज्जित किया है। ऐसी ही एक घटना रही है निर्भया कांड। जब भी उस नृशंस घटना की स्मृति जागती है तो समाज में बेटियां असुरक्षित दिखाई देने लगती हैं और समाज को उसकी भीरुता के लिए ललकारने का मन करने लगता है। इसी भावभूमि पर है कवयित्री वीणा मावर की कविता ‘‘निर्भया’’। अंश देखिए-
कहां गए वो समाज सुधारक
गए कहां राममोहन और विद्यासागर जुल्मों के खिलाफ
भुजा जिनकी थी फड़की
करी खिलाफत फिर पूरे समाज की
हुई सुरक्षित जिससे फिर हर अबला
तुमसे तो अच्छा बैटिंग ही निकला
था फिरंगी पर अपना निकला
सती प्रथा को खत्म जो कर गया
था हुमायूं भी एक विदेशी
लगी देर पर पहुंचा वह भी
रखी लाज उसने भी राखी की
राह तक रहे तुम किस पल की?

नारी शक्ति की ही बात करती कविता है डॉ शम्मी श्रीवास्तव की, जिसका शीर्षक ही है ‘‘नारी शक्ति’’। अपनी इस कविता में कवयित्री ने स्त्री की उस क्षमता का स्मरण कराया है जब वह अन्याय के विरुद्ध हथियार उठा लेती है और प्रताड़ना का प्रतिरोध करती है। कवयित्री ने देश के स्वतंत्रता संग्राम में झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के योगदान का भी स्मरण कराया है -
जब-जब अधर्म पड़ा है अन्याय ने मचाई तबाही है
नारी शक्ति ने आगे बढ सदैव धूम मचाई है
उठो ! आज फिर जगाओ अपनी शक्ति का एहसास
भूल गई? तुमने ही बदला भारत का इतिहास
अगर न तुमने चिंगारी भड़काई होतीं
देश ने कैसे इस साल 73 वीं वर्षगांठ मनाई होती
मत भूलो नारी ने किया है बार-बार चमत्कार
शक्ति शौर्य की है यह देवी जाने कुल संसार।

कवि शिवमंगल सिंह ने अपनी कविता ‘‘पेड़ जैसी होती है स्त्रियां’’ में स्त्री जीवन के विविध पक्षों को अपनी कविता में निबद्ध किया है। जिस प्रकार एक पेड़ सभी तरह के झंझावात  सहन करके भी अपने फल, फूल, पत्तों की रक्षा करता है, उसी प्रकार एक स्त्री सारे दुख कष्ट सहती हुई अपने परिवार के प्रति समर्पित रहती है। स्त्री जीवन की पेड़ से तुलना करती हुए यह कविता उल्लेखनीय है-
पेड़ जो /तेज आंधियों में भी
झुक झुक कर /चुपचाप
उसके थपेड़ों को सह लेता है
ग्रीष्म के तपन में भी
धरती पर शीतल छांव देता है
बरसात में भीग कर/मुस्कुराहट बिखेर देता है
शरद ऋतु में रात रात भर ठिठुर कर
शांत रहता है /मौसम के तमाम
झंझावात को चुपचाप सहन कर लेता
स्त्रियों भी /पेड़ की तरह
अपने जीवन की तमाम वेदना को /सह लेती हैं
विपरीत परिस्थितियों में भी /मुस्कुराती हैं
खिलखिलाती हैं /धरती पर स्वर्ग बिखेर देती हैं ।

कवि वीरेंद्र प्रधान मैं समाज में नारी के महत्व को स्थापित करते हुए उसकी उपस्थिति की महत्ता को रेखांकित किया है। उनकी कविता ‘‘नारी’’ स्त्री शक्ति का आह्वान करने में सक्षम है। कविता देखिए-
पुत्री भगिनी जननी तो पत्नी किसी की
तू नारी तू ही तो है संचालक परिवार की
तेरे बिना घर सूना, जग सूना, सब सूना
फिर भी तुझे समस्या है अपने अधिकार की
इनके भी दिल है, दिमाग है, दो हाथ हैं
नहीं किसी मायने में नर से कम नारियां
नारी की कीमत को कमतर आंकता है नर
उस पे थोपता अपने ऐब और मक्कारियां
अपना अधिकार तुझे लेकर ही रहना है
‘‘मेरी आवाज सुनो’’ नर से यह कहना है
पथ से विचलित न हो जाये कभी तेरा नर
उसको मर्यादित कर सीता स्वयं बनना है

यूं तो इस संग्रह की प्रत्येक कविता में स्त्री स्वर मुखरित हुआ है किंतु एक और कविता है इस संग्रह में जिसका उल्लेख किया जाना जरूरी है। कविता का शीर्षक है ‘‘बस स्टॉप पर खड़ी अकेली लड़की’’। यह कविता कवि संजय सनातन की है जिसमें उन्होंने दैनिक जीवन में एक लड़की के आत्मसम्मान को चोट पहुंचाने वाली कुचेष्टाओं की ओर ध्यान आकर्षित किया है। कविता देखिए -
वह तन्हा लड़की और सिमटती जाती है
उसे पीठ पीछे भी /निगाहों की कटारें चुभने लगती हैं
तभी अचानक उसकी बस आ जाती है
और वह अपने गंतव्य की ओर चली जाती है
लेकिन हवा में टंगी रह जाती है
अश्लील हंसी की ध्वनियां /और वो असभ्य इशारे
बस स्टॉप पर /आने वाली किसी दूसरी लड़की के लिए।

अनुभूति गुप्ता ने स्त्री के पक्ष में लिखी गई कविताओं को एक संग्रह के रूप में प्रकाशित कर प्रशंसनीय कार्य किया है। यह पुस्तक पठनीय है तथा एक सार्थक स्त्री विमर्श रचती है।
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