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Thursday, April 19, 2018

चर्चा प्लस ... नोट और वोट के बीच फंसी आमजनता ... डॉ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
चर्चा प्लस
नोट और वोट के बीच फंसी आमजनता
- डॉ. शरद सिंह
नोटबंदी का जख़्म अभी पूरी तरह से भरा नहीं था कि अब 2000 के नोटों का संकट आमजनता को सांसत में डाल रहा है। एक ओर आसन्न चुनाव का शुरू हो चुका घमासान और दूसरी ओर खाली पड़े एटीएम मुंह चिढ़ा रहे हैं। यानी नोट और वोट के बीच फंसे लोग जाएं तो कहां जाएं ? कभी-कभी ऐसा लगता है जैसे आमजनता के धैर्य की परीक्षा का अंतहीन सिलसिला जारी है। 
 
 नोट और वोट के बीच फंसी आमजनता ... डॉ. शरद सिंह ... चर्चा प्लसArticle for Column - Charcha Plus by Dr Sharad Singh in Sagar Dinkar Dainik
वह भी विवाहों के मुहूर्त्त के पूर्व का समय था और लोगों को नोटबंदी का सामना करना पड़ा था। भारत के 500 और 1000 रुपये के नोटों के विमुद्रीकरण, जिसे मीडिया में छोटे रूप में नोटबंदी कहा गया, की घोषणा 8 नवम्बर 2016 को रात आठ बजे भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा अचानक राष्ट्र को किये गए संबोधन के द्वारा की गयी। यह संबोधन टीवी के द्वारा किया गया। इस घोषणा में 8 नवम्बर की आधी रात से देश में 500 और 1000 रुपये के नोटों को खत्म करने का ऐलान किया गया। इसका उद्देश्य केवल काले धन पर नियंत्रण ही नहीं बल्कि जाली नोटों से छुटकारा पाना भी था। इससे पहले भी इसी तरह के उपायों को भारत की स्वतंत्रता के बाद लागू किया गया था ताकि जालसाजी और काले धन पर अंकुश लगाया जा सके। लेकिन यह अदला-बदली की प्रक्रिया थी जिसमें जनता को पर्याप्त समय दिया गया था नोट बदलने के लिए। बल्कि देखा जाए तो इन पूर्व के तमाम विमुद्रीकरण ने सिर्फ़ जमाखोरों को सबक सिखाया था और आमजनता को तो इसका प्रभाव भी महसूस नहीं हुआ था। लेकिन 8 नवम्बर 2016 को बंद किए गए 500 और 1000 रुपए के नोटों ने दिहाड़ी मजदूरों तक की कमर तोड़ दी।
अब अप्रैल 2018 के मध्य में उत्पन्न 2000 रुपयों के नोटों की कमी और एमटीएम में रुपयों की र्प्याप्त उपलब्धता नहीं होने से एक बार फिर अमजनता सशंकित हो उठी है। विवाहों का सबसे बड़ा मुहूर्त्त सिर पर है और लोगों को नोटों की कमी से जूझना पड़ रहा है। हर जगह स्वाईप या डिज़िटल तरीका काम नहीं कर पाता है। छोटे व्यापारियों, मजदूरों और रोजमर्रा की छोटी खरीददारी के लिए फुटकर नोटों से ले कर 2000 तक के नोट की जरूरत पड़ती ही है। बहरहाल, 2000 के नोटों के संकट पर मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के हाल ही में दिए गए बयान से पहले मीनाक्षी लेखी के उस वक्तव्य का उल्लेख करना जरूरी लग रहा है जो उन्होंने नोटबंदी का विरोध करते हुए दिया था- ‘’आम औरत और आदमी, जो लोग अनपढ़ हैं और बैंकिंग सुविधाओं तक जिनकी पहुंच नहीं है ऐसे लोग इस तरह के उपायों से सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे। मुख्य रूप से कुछ समय के अंतराल में स्वयं जनता 2000 के नोट को चलन से बाहर कर देगी, क्योंकि जहां कम मूल्य की वस्तु खरीदनी हो तब दुकानदार आपसे 2000 के नोट नहीं लेगा। परिणाम स्वरूप 2000 के नोट की या तो जमाखोरी होगी अथवा काले धन का ही सृजन करेंगें। सरकार को इस विषय पर प्रारंभिक समय से सचेत रहने की आवश्यकता है।’’
लगता है जैसे मीनाक्षी लेखी का अनुमान सच साबित हो रहा है। इसकी पुष्टि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के वक्तव्य से भी होती है। मध्य प्रदेश के शाजापुर में 16 अप्रैल 2018 को किसानों को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा था, “नोटबंदी से पहले 15 लाख करोड़ रुपए की नकदी चलन में थी। इस प्रक्रिया (नोटबंदी) के बाद यह बढ़कर 16 लाख 50 हजार करोड़ रुपए हो गई, लेकिन बाजार से 2000 का नोट गायब हो रहा है। लेकिन दो-दो हजार के नोट कहां जा रहे हैं, कौन दबाकर रख रहा है, कौन नकदी की कमी पैदा कर रहा है। यह षड्यंत्र है। ऐसा इसलिए किया जा रहा है, ताकि दिक्कतें पैदा हों। सरकार इससे सख्ती से निपटेगी।“ उन्होंने यह भी कहा कि उन्होंने यह मुद्दा केंद्र सरकार के सामने भी उठाया है। उन्होंने इसके पीछे साजिश होने का आरोप लगाया है।
यद्यपि एसबीआई के चेयरमैन का कहना है कि नोटबंदी जैसे हालात नहीं है। उस वक्त पैसा सिस्टम से निकाला गया था, इसलिए परेशानी हुई थी। अभी ऐसी स्थिति नहीं है। एसबीआई के पास पर्याप्त कैश है। यह बात जरूर है कि 2000 के नोट का सर्कुलेशन कम हुआ है। एक वजह यह है कि फसलें आई हैं, किसानों को तेजी से पेमेंट बढ़ा है। जल्दी ही सबकुछ सामान्य हो जाएगा। वैसे पिछले कुछ हफ्ते से गुजरात, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में कैश में कमी बनी हुई थी। 16 अप्रैल 2018 को पूर्वी महाराष्ट्र, बिहार और मध्य प्रदेश से नकदी की कमी की शिकायतें मिलीं। उत्तर प्रदेश, बिहार, तेलंगाना, झारखंड और महाराष्ट्र में नकदी का संकट पैदा हो गया। उधर गुजरात में भी बैंकों में नकदी की किल्लत शुरू हो चुकी है। लगभग 10 दिन पहले यह परेशानी उत्तर गुजरात से शुरू हुई, लेकिन अब पूरे राज्य में इसका असर है। यहां तक कि बैंकों ने नकदी निकालने की सीमा तय कर दी है। ज्यादातर एटीएम में पैसा नहीं है। शादी और किसानों को फसल के भुगतान का वक्त होने की वजह से लोगों को कठिनाई का सामना करना पड़ रहा है। दिल्ली, एनसीआर, भोपाल, पटना, लखनऊ, हैदराबाद और अहमदाबाद समेत देश के कई इलाकों के एटीएम में पैसा नहीं होने की शिकायतें मिलीं। इस बीच, केंद्र सरकार ने स्वीकार किया कि कुछ जगह कैश की कमी है। इसके बाद वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा, “देश में नकदी के हालात की समीक्षा की जा चुकी है। कुल मिलाकर पर्याप्त नकदी चलन में है। बैंकों में पर्याप्त कैश है। कुछ जगहों पर कमी इसलिए हुई, क्योंकि कुछ जगहों पर मांग अचानक बढ़ी। इस पर जल्द ही नियंत्रण पाया जाएगा।“
न्यूज़ ऐजेंसियों के अनुसार रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया ने 2000 रुपए के नोटों की छपाई तीन महीने के लिए बंद कर रखी है। जिससे 500 और 200 से छोटे नोटों को ही प्रचलन में लाया जाए और सभी बैंक अपने ग्राहकों को यही नोट उपलब्ध कराए। सिक्योरिटी प्रिंटिंग एंड मिंटिंग कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड कंपंनी ने भी इस चीज की पुष्टि करते हुए बताया कि आरबीआई ने 2000 नोट को छापने की कोई भी डिमांड नहीं की इसलिए नए 500, 200 और इससे छोटे नोटों को ही छापा जा रहा है। इसका उद्देश्य यह हैं की देशभर में छोटे नोटों का प्रचलन ज्यादा से ज्यादा हो और कालेधन पर लगाम भी लग सके। इस संबंध में यह चर्चा भी जोरो रही है कि रिजर्व बैंक एक बार फिर 2000 रुपये की करेंसी के संचार को धीरे-धीरे कम कर देगी। दूसरी चर्चा यह रही कि 2000 की करेंसी की सुविधा के चलते देश में कालेधन का संचय आसान हो गया है और इसी के चलते बाजार में 2000 की करेंसी का ज्यादा संचार नहीं है।
कारण जो भी हो लेकिन फिलहाल आमजनमा को नोटों की कमी के संकट से एकबार फिर जूझना पड़ रहा है। एक ओर आसन्न चुनावों के लोक-लुभावने वादे हैं तो दूसरी ओर नोटों की कमी का कठोर यथार्थ। ऐसे में आमजनता का अपने भविष्य को ले कर चिंतित होना स्वाभाविक है कि कहीं एक बार फिर किसी प्रकार की बंदी का सामना तो नहीं करना पड़ेगा? यह समय सिर्फ़ विवाह महूर्तों का नहीं है, इस समय किसान अपनी उपज को मंडियों में पहुंचा रहे हैं और उनके खातों में धन पहुंच रहा है लेकिन यदि समय रहते यह धन उनके हाथों में रुपयों के रूप में नहीं आ पाया तो उनके लिए भी संकट खड़ा हो सकता है। स्थानीय छोटे-मोटे कर्जे या मजदूरों को चुकता करने के लिए किसानों को भी नकद राशि की दरकार होती है। एटीएम और बैंक काउंटरों पर नकद की कमी होने की स्थिति में धन होते हुए भी धन की कमी से उनहें जूझना पड़ेगा। यही स्थिति लगभग हर तबके के लोगों की रहेगी।
नोटबंदी का जख़्म अभी पूरी तरह से भरा नहीं है कि अब 2000 के नोटों का संकट आमजनता को उलझन में डाल रहा है। एक ओर आसन्न चुनाव का शुरू हो चुका घमासान और दूसरी ओर खाली पड़े एटीएम यानी नोट और वोट के बीच फंसे लोग जाएं तो कहां जाएं? कभी-कभी ऐसा लगता है जैसे आमजनता के धैर्य की परीक्षा का अंतहीन सिलसिला जारी है। लिहाजा इस परीक्षा का अंत अब सरकार को ही पूरी तत्परता से करना होगा क्योंकि यह उसी के अधिकार क्षेत्र का मामला है। आमजनता सीधे आरबीआई से संवाद नहीं कर सकती है लेकिन सरकार आरबीआई को निर्देश दे सकती है। जहां तक जमाखोरी और कालाबाजारी का प्रश्न है तो इसके लिए भी सरकारी स्तर पर ही कोई ठोस कदम उठाने होंगे, वह भी ऐसे कदम जो जमाखोरों ओर कालाबाजारी करने वालों पर तो अंकुश लगाए किन्तु आमजनता को परेशानी न उठानी पड़े। आखिर कब तक बड़े-बड़े घोटालेबाज अरबों रुपयों का घोटाला कर के देश से बाहर भागते रहेंगे और आमजनता बलि का बकरा बनती रहेगी? इस प्रश्न को ध्यान में रख कर कोई तो ऐसी योजना बनानी ही होगी जिससे बार-बार आमजनता को मुद्रा की कमी और उससे उत्पन्न घबराहट न झेलनी पड़े। यह एक ऐसा मुद्दा है जो चुनावों की दिशा का निर्धारण करने की ताकत रखता है।
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Note Aur Vote Ke Beech Fansi Aamjanta - Charcha Plus by Dr Sharad Singh
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(दैनिक सागर दिनकर, 18.04.2018 )
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Friday, April 13, 2018

चर्चा प्लस ... बुंदेलखंड से गुज़रते राजनीतिक गलियारे - डॉ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
चर्चा प्लस
बुंदेलखंड से गुज़रते राजनीतिक गलियारे
- डॉ. शरद सिंह

बुंदेलखंड देश का एक संघर्षशील और पिछड़ा इलाका है। इसके पिछड़ेपन का एक सबसे बड़ा कारण यह है कि इसने कभी झुक कर समझौते नहीं किए। कभी अपना स्वाभिमान नहीं गंवाया जिसका गवाह इतिहास भी है। आज उसी बुंदेलखंड में नए-नए राजनीतिक गलियारे गढ़े जा रहे हैं। सवाल यह है कि उन गलियारों से गुज़रने वालों को बुंदेलखंड से लगाव है या सत्ता से? इसका आकलन तो बुंदेलखंड के वासियों को ही करना पड़ेगा, वह भी समय रहते। 
बुंदेलखंड से गुज़रते राजनीतिक गलियारे - डॉ. शरद सिंह ... चर्चा प्लस Article for Column - Charcha Plus by Dr Sharad Singh in Sagar Dinkar Dainik

पहले विधानसभा चुनाव और उसके बाद लोकसभा चुनाव। दो समर सामने हैं और योद्धा इस समर को जीतने के लिए अपनी-अपनी योजनाएं बनाने में जुट गए हैं। मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश इन दो राज्यों में बंटा बुंदेलखंड राजनीतिज्ञों के लिए एक ऐसा इलाका है जहां समस्याएं ही समस्याएं हैं और जहां आश्वासन की पोटली आसानी से खोली जा सकती है। पिछले आमसभा चुनाव के दौरान भी अनेक ऐसे राष्ट्रीयस्तर के नेता बुंदेलखंड में पधारे जिन्हें बुंदेलखंड कहां है यह जानने के लिए गूगलसर्च करना पड़ा होगा। बुंदेलखंड में आ कर उन्होंने गरीबों के घर रोटियां खाईं, चाय पी और मुंह पोंछ कर चलते बनें। फिर चुनाव के दिन करीब आए तो फिर बुंदेलखंड याद आया। इस बार और नए राजनीतिक खिलाड़ी बुंदेलखंड के राजनीतिक गलियारे में बिगुल बजाते हुए गुज़र रहे हैं और आमचुनावों तक गुज़रते रहेंगे। बुंदेलखंड के राजनीतिक मंच पर दृश्य वही रहेगा- ढेर सारे मुद्दे और उससे भी अधिक आश्वासन। इस प्रसंग में बार-बार एक छोटी-सी कहानी याद आता है कि एक गांव में एक तालाब था जिसमें साफ़-स्वच्छ पानी था। हर मौसम में तालाब लबालब भरा रहता। एक बार एक शिकारी उस गांव से गुज़रा उसने देखा कि गांव खुशहाल है उन्हें किसी की मदद की कभी कोई जरूरत नहीं पड़ती है। शिकारी के मन में खोट आ गया। उसने यह प्रचारित की कि वह मगरमच्छ पकड़ने में माहिर है। और एक रात चुपके से एक मगरमच्छ का बच्चा तालाब में छोड़ कर वहां से चला गया। कुछ दिन बाद जब मगरमच्छ बड़ा हुआ और लोगों के लिए खतरा बन गया तो गांववालों को उस शिकारी की याद आई। चतुर शिकारी एक आदमी के पास अपना पता भी छोड़ गया था। गांव वालों उस शिकारी को बुलाया और उससे मगरमच्छ पकड़ने की फ़रियाद की। शिकारी ने वादा किया कि वह मगरमच्छ पकड़ेगा। लेकिन उसने मगरमच्छ पकड़ने में इतने अधिक दिन लगाए कि तब तक उस मगरमच्छ की संतानें भी हो गईं। इसके बाद शिकारी ने उस मगरमच्छ को पकड़ा, गांववालों से अपना ईनाम लिया और वहां से चलता बना। कुछ समय बाद गांव वालों को पता चला कि तालाब में तो अभी भी मगरमच्छ है। उन्होंने फिर शिकारी को बुलाया। फिर वहीं किस्सा दोहराया गया। एक बार शिकारी के सहायक ने ही उससे पूछ लिया कि शिकारी साहब आप हर बार मगरमच्छ का एक न एक बच्चा तालाब में क्यों जीवित छोड़ देते हैं? इस पर शिकारी ने मुस्कुरा कर उत्तर दिया कि अगर मैं एक बार में सारे मगरमच्छ मार दूंगा और तालाब को समस्या-मुक्त कर दूंगा तो गांव वाले मुझे फिर क्यों बुलाएंगे? और यदि वे मुझे नहीं बुलाएंगे तो मुझे पैसे ऐंठने को कहां से मिलेंगे। अपने शिकारी साहब का उत्तर सुन कर उनका सहायक गद्गद हो गया। वहीं, गांव वाले आज भी शिकारी के मोहताज़ बने हुए हैं।
चुनावों के समय उठाए जाने वाले मुद्दों के अलावा भी बुंदेलखंड में कई मुद्दे ऐसे हैं जिनका इस कथा से गहरा संबंध है। बुंदेलखंड की कल-कल करती नदियां अब सूख चली हैं, वनपरिक्षेत्र का धनी बुंदेलखंड अंधाधुंध अवैध कटाई को दशकों से झेल रहा है। रसूख वाले बांधों से पानी चुराते हैं और रेतमाफिया नदियों से रेत चुरा रहे हैं। परिणामतः बुंदेलखंड में भी जलवायु परिवर्तन का कालासाया मंडराने लगा है। मौसम का असंतुलन सूखे का समीकरण रचने लगा है। जब पर्याप्त बारिश नहीं होगी तो किसान कैसे फसल उगाएंगे? पर्याप्त फसल नहीं होगी तो किसान कर्ज के बोझ तले दबता जाएगा और कर्ज न चुका पाने की स्थिति में वहीं हो रहा है जो आए दिन अखबारों की सुर्खियों में पढ़ने को मिल रहा है। बुंदेलखंड 2004 से ही सूखे की चपेट में रहा। जब बहुत शोर मचा तो पहली बार इलाके को 2007 में सूखाग्रस्त घोषित किया गया। 2014 में ओलावृष्टि की मार ने किसानों को तोड़ दिया। सूखा और ओलावृष्टि से यहां के किसान अब तक नहीं उबर पाए हैं। खेती घाटे का सौदा बन गई है और किसान तंगहाली में पहुंच चुके हैं। यहां के किसान लगातार कर्ज में डूबते जा रहे हैं। लगभग 80 प्रतिशत किसान साहूकारों और बैंको के कर्जे में डूबे हैं। ओलावृष्टि के दौरान तो सैकड़ों किसानों ने आत्महत्याएं तक कर लीं। इन आत्महत्याओं की वजह से ही बुंदेलखंड देश भर में चर्चा में रहा। अब भी औसतन हर माह एक न एक किसान मौत को गले लगा रहा है। दुनिया भले ही इक्कीसवीं सदी में कदम रखते हुए विकास की नई सीढ़ियां चढ़ रहा है लेकिन बुंदेलखंड आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए जूझ रहा है।
बुंदेलखंड वह इलाका है, जिसमें मध्यप्रदेश के छह जिले छतरपुर, टीकमगढ़, पन्ना, दमोह, सागर व दतिया उत्तर प्रदेश के सात जिलों झांसी, ललितपुर, जालौन, हमीरपुर, बांदा, महोबा, कर्वी (चित्रकूट) आते हैं। कुल मिलाकर 13 जिलों से बुंदेलखंड बनता है। नदियों, तालाबों, कुओं वाले इस क्षेत्र में जल का सही व्यवस्थापन नहीं होने के कारण लोग बूंद-बूद पानी के लिए तरसते रहते हैं। पिछले साल 2016 में बुंदेलखंड में पीने के पानी की ऐसी समस्या हुई कि केंद्र ने वाटर ट्रेन भी भेज दी, जिसपर खूब राजनीति हुई। कई गांव ऐसे हैं जहां 10 किलोमीटर से भी ज्यादा दूर से पीने का पानी लाना पड़ता है। पानी की समस्या दूर करने के लिए प्रदेश सरकारों ने तालाब खुदवाए। सरकारी अधिकारियों ने बताया कि यहां अब पानी की कोई कमी नहीं है, जिसके बाद उत्तरप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने पानी से लबालब भरे तालाबों की फोटो ट्वीट कर दी। उसके बाद देश की एक प्रतिष्ठित समाचार एजेंसी ने इन तालाबों की सच्चाई का पता लगाया तो सच्चाई कुछ और ही निकली। कई तालाब सूखे पड़े थे। पानी जैसी बुनियादी चीज पर भ्रष्टाचार करने वालों की आत्मा भी क्या उनहें नहीं झकझोरती है? या फिर वे अपनी आत्मा को पहले ही बेच चुके हैं? राजनीतिक विश्लेषक सुरेंद्र किशोर का कहना है कि ‘’समय-समय पर बुंदेलखंड के लिए काफी पैसा दिया गया लेकिन बदहाली बताती है कि पैसे का सदुपयोग नहीं हुआ। केंद्र ने पैसा देकर अपनी जिम्मेदारी खत्म कर ली। यह नहीं देखा कि पैसा सही इस्तेमाल हुआ या नहीं। प्रदेश सरकारों ने जो घोषणाएं कीं और पैसा दिया उसे अधिकारियों ने जनता तक पहुंचने नहीं दिया। बस अपनी जेब भरते रहे।’’
जब किसान तंगहाल होता है तो शेष व्यवसाय भी लड़खड़ाने लगते हैं। बुंदेलखंड की भुखमरी भी सुर्खियों में रही है। ‘नवभारत टाईम्स’ में छपे इस समाचार ने पूरे देश को स्तब्ध कर दिया था कि बुंदेलखंड में लोग घास की रोटियां बनाकर खा रहे हैं’। एनबीटी ने इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाया। सरकार ने इसे नकारा लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने संज्ञान लेकर अपनी टीम मौके पर जांच के लिए भेजी। उस टीम को लोगों ने घास की रोटियां दिखाईं और बताया कि इनको ही खाकर वे जिंदा रहते हैं। बुंदेलखंड में खेती खत्म होने, उद्योग न होने और बेरोजगारी-भुखमरी के कारण गांव के लोग पलायन करने को विवश हैं। विभिन्न समाचार ऐजेंसियों के आंकड़ों के अनुसार पिछले 10 साल मे लगभग 50 लाख लोग पलायन कर चुके हैं। किसानों ने खेती छोड़ दी है और दूसरे प्रांतों में मजदूरी कर रहे हैं। यहां की बदहाली और लगातार पड़ रहे सूखे ने बुंदेलखंड के युवाओं को अपनी जड़ों से उखड़ने को विवश कर दिया है। युवा अपना गांव, अपना घर-परिवार छोड़ कर बाहर नौकरी करने जाने को मजबूर हैं। युवाओं के पास बाहर मजदूरी करके खाने-कमाने और परिवार को खिलाने के अलावा दूसरा चारा नहीं है।
प्रदेश सरकारें बढ़-चढ़ कर घोषणाएं करती रहती हैं- कभी सेवानिवृत्ति की आयु बढ़ाने की तो कभी वेतन और भत्ता बढ़ाने की। सवाल उठता है कि क्या प्रदेश सरकारों के खजानों में इतना दम है कि वे लम्बे समय तक इस प्रकार की व्यवस्थाओं को बनाए रख सकेंगी या फिर खुद सरकारी खजाने कर्ज में डूबते चले जाएंगे? दूसरी ओर विचारणीय यह भी है कि मौजूदा सरकारों पर उंगली उठानेवाले अन्य राजनीतिक दल बुंदेलखंड के लिए सचमुच कुछ करेंगे या फिर हमेशा की तरह मुंगेरीलाल के हंसीन सपने दिखाते रहेंगे? याद रहे कि सितम्बर 2016 में राहुल गांधी ने बुंदेलखंड में रोड-शो किया था, सन् 2017 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने महोबा का भ्रमण किया था और अप्रैल 2018 में हार्दिक पटेल ने बुंदेलखंड के राजनीतिक गलियारे में क़दम रखा। अर्थात् यह तो मानना होगा कि बुंदेलखंड ने राजनीतिक नक्शे में अपनी जगह बना ली है लेकिन अभी उसे सीखना है अपने अधिकारों तात्कालिक नहीं वरन हमेशा के लिए हासिल करना। आज उसी बुंदेलखंड में नए-नए राजनीतिक गलियारे गढ़े जा रहे हैं। सवाल यह है कि उन गलियारों से गुज़रने वालों को बुंदेलखंड से लगाव है या सत्ता से? इसका आकलन तो बुंदेलखंड के वासियों को ही करना पड़ेगा, वह भी समय रहते।
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(दैनिक सागर दिनकर, 11.04.2018 )
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Friday, January 19, 2018

चर्चा प्लस ... धारा 370 की ऐतिहासिक भूल अब सुधरनी ही चाहिए - डॉ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
चर्चा प्लस
धारा 370 की ऐतिहासिक भूल अब सुधरनी ही चाहिए
- डॉ. शरद सिंह
(दैनिक सागर दिनकर, 17.01.2018)


धारा 370 एक ऐसा ज्वलंत मुद्दा है जो कई दशकों से प्रतीक्षा कर रहा है सुलझाए जाने का। मोदी सरकार ने अडिग रहते हुए जिस प्रकार ट्रिपल तलाक और नोटबंदी जटिल मामलों को सुलझाया एवं लागू किया, उसी प्रकार की दृढ़ता की अपेक्षा रखता है धारा 370 का मामला। इस धारा के हटते ही कश्मीर का विधिवत् सम्मिलन हो सकेगा भारत के जनसामान्य से। इस मुद्दे पर मैं यहां चर्चा कर रही हूं कुछ ऐसे तथ्यों और बिन्दुओं की जिन्हें मैंने अपनी पुस्तकों ‘‘राष्ट्रवादी व्यक्तित्व श्यामाप्रसाद मुखर्जी’’ तथा ‘‘राष्ट्रवादी व्यक्तित्व सरदार वल्लभभाई पटेल’’ में सामने रखा है।

Charcha Plus Column of Dr Sharad Singh in Sagar Dinkar Dainik

जिस प्रकार नोटबंदी और ट्रिपल तलाक जैसे मामलों में केन्द्र सरकार ने तत्परता दिखाई और कड़ाई से कदम उठाए उसके बाद यह सोच बनना स्वाभाविक है कि उस ऐतिहासिक भूल को भी यह सरकार सुधारने की दिशा में कोई न कोई कठोर कदम उठाएगी जिसे ‘धारा 370’ के रूप में जाना जाता है। स्वयं भाजपा और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की ओर से इस तरह की मांगे समय-समय पर उठती रही हैं। विगत वर्ष यानी 2017 के दिसम्बर माह में शिवसेना के अरविंद सावंत ने कहा कि ‘‘तीन तलाक के खिलाफ विधेयक से समान नागरिक संहिता की दिशा में आगे बढ़ने की उम्मीद पैदा होती है। अगर समान नागरिक संहिता लागू हो गई और कश्मीर से धारा 370 हट गई तो बहुत सारी चीजें ठीक हो जाएंगी।’’
इससे पूर्व दिसम्बर 2013 में राजनाथ सिंह ने कहा था -‘‘संसद में इस बात पर बहस हो कि क्या धारा 370 जम्मू कश्मीर के लिए किसी तरह से फायदेमंद है या वहां के लोगों को राजनीतिक रूप से सशक्त करने का काम करती है? अगर ऐसा नहीं है, तो इसे तुरंत निरस्त कर देना चाहिए।’’
सांसद अनुपम खेर ने धारा 370 के विषय में बोलते हुए अगसत 2017 में कहा था-‘‘ “देश के विभिन्न भागों से अगर हम कश्मीर में आधारभूत ढांचा बना सकते हैं, विभिन्न भागों से लोगों को भेज सकते हैं, देश के हर इंसान एवं हर नागरिक को वहां संपत्ति लेने का अधिकार हो सकता है, वहां पर शिक्षा के शैक्षणिक संस्थाएं बनाने का अधिकार हो सकता है, मिल्स बनाने का अधिकार हो सकता है, तो यह समस्या का एक अच्छा समाधान हो सकता है.“ इसी क्रम में हाल ही में यानी 12 जनवरी 2018 को आयोजित युवा दिवस के मौके पर जयपुर में संघ के वरिष्ठ प्रचारक इंद्रेश कुमार ने कहा कि ‘‘धारा 370 को हटाने से भारत की कीर्ति और यश बढे़गा। देश का भविष्य बदलेगा और नई दशा और दिशा की ओर बढ़ेगा। उन्होंने कहा कि यह धारा अस्थाई है और अब इसे हटाने का समय आ गया है।’’
अनुच्छेद 35ए, धारा 370 का ही हिस्सा है। इस धारा के कारण से कोई भी दूसरे राज्य का नागरिक जम्मू-कश्मीर में ना तो संपत्ति खरीद सकता है और ना ही वहां का स्थायी नागरिक बनकर रह सकता है। इसके अलावा जम्मू-कश्मीर की कोई लड़की किसी बाहर के लड़के से शादी कर लेती है तो उसके सारे अधिकार खत्म हो जाते हैं। साथ ही उसके बच्चों के अधिकार भी खत्म हो जाते हैं।
वस्तुतः अनुच्छेद 370 के अंतर्गत प्रमुख प्रावधान हैं कि - (1) यह जम्मू और कश्मीर को एक विशेष स्वायत्ता वाले राज्य का दर्जा देता है। (2) इसका खाका 1947 में शेख अब्दुल्ला ने तैयार किया था, जिन्हें प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और महाराजा हरि सिंह ने जम्मू-कश्मीर का प्रधानमंत्री नियुक्त किया था। (3) इस धारा के अनुसार संसद को जम्मू-कश्मीर के बारे में रक्षा, विदेश मामले और संचार के विषय में कानून बनाने का अधिकार है। लेकिन अन्य विषय से संबंधित कानून को लागू कराने के लिए केंद्र को राज्य का अनुमोदन चाहिए। (4) इसी विशेष दर्जे के कारण जम्मू-कश्मीर पर संविधान का अनुच्छेद 356 लागू नहीं होती है। राष्ट्रपति के पास राज्य के संविधान को बर्खास्त करने का अधिकार नहीं है। (5) भारत के दूसरे राज्यों के लोग जम्मू-कश्मीर में जमीन नहीं खरीद सकते हैं। यहां के नागरिकों के पास दोहरी नागरिकता होती है। एक नागरिकता जम्मू-कश्मीर की और दूसरी भारत की होती है। (6) यहां दूसरे राज्य के नागरिक सरकारी नौकरी नहीं कर सकते हैं। (7) भारतीय संविधान के अनुच्छेद 360 जिसमें देश में वित्तीय आपातकाल लगाने का प्रावधान है, वह भी जम्मू-कश्मीर पर लागू नहीं होता है। (8) अनुच्छेद 370 की वजह से ही जम्मू-कश्मीर का अपना अलग झंडा और प्रतीक चिन्ह भी है।
‘‘जवाहरलाल नेहरू ने बार-बार यह घोषणा की है कि भारत में जम्मू और कश्मीर का विलय शत-प्रतिशत पूरा हो चुका है, फिर भी यह अद्भुत बात है कि कोई भारतीय नागरिक भारत सरकार से अनुमति लिए बिना भारत के राज्य में प्रवेश नहीं कर सकता। यह अनुमति कम्युनिस्टों को भी मिली है जो राज्य में अपना वही विघटनकारी खेल खेल रहे हैं। किन्तु उन लोगों को जाने की अनुमति नहीं है जो भारतीय हैं और राष्ट्रीयता की दृष्टि से सोचते और करते हैं। .... मैं नहीं सोचता कि भारत सरकार को मुझे भारतीय यूनियन के किसी भी हिस्से में जिसमें स्वयं पं. नेहरू के अनुसार जम्मू और कश्मीर भी शामिल है, जाने से रोकने का कोई अधिकार है। वैसे अगर कोई कानून के प्रतिकूल आचरण करता है तो उसे इसके परिणाम अवश्य भुगतने होंगे।’’ 8 मई 1953 को डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने कश्मीरयात्रा के लिए विदा देने आए जनसमूह सहित पत्रकारों से कहा था। उस दिन पं. श्यामा प्रसाद मुखर्जी दिल्ली से अम्बाला जाने के लिए रेलवे स्टेशन पहुंचे। दिल्ली रेलवे स्टेशन पर उन्हें विदाई देने के लिए भारतीय जनसंघ, हिन्दू महासभा, आर्य समाज तथा अन्य संगठनों के हजारों कार्यकर्ता उपस्थित थे। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के साथ अटल बिहारी वाजपेयी, वैद्य गुरूदत्त, प्रो. बलराज मधोक, डॉ. बर्मन तथा टेकचंद शर्मा भी उनके साथ रवाना होने के लिए आ पहुंचे। इस अवसर पर अनेक प्रमुख समाचार पत्रें के प्रतिनिधि वहां उपस्थित थे। उन्होंने यह भी कहा था कि -‘‘ शेख अब्दुल्ला ने पं. नेहरू पर दबाव बना कर राज्य में अलग प्रधान, अलग विधा और अलग निशान का प्रावधान करा लिया है।’’
डॉ. मुखर्जी जम्मू कश्मीर को भारत का पूर्ण अभिन्न अंग बनाना चाहते थे। उस समय जम्मू कश्मीर का अलग झण्डा और अलग संविधान था। वहां का मुख्यमन्त्री (वजीर-ए-आजम) अर्थात् प्रधानमन्त्री कहलाता था। श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने देश की अखण्डता को अक्षुण्ण बनाए रखने का संकल्प लेते हुए घोषणा की - ‘‘स्वतंत्र भारत में सदा एक देश, एक निशान, एक प्रधान ही होगा और हमें अलगाववादी तत्वों को जड़ से उखाड़ फेंकने के लिए कटिबद्ध रहना होगा।’’
श्यामा प्रसाद मुखर्जी इस संवैधानिक प्रावधान के पूरी तरह खि़लाफ़ थे। उन्होंने कहा था कि इससे भारत छोटे-छोटे टुकड़ों में बंट रहा है। यही नहीं, मुखर्जी का ये भी मानना था कि यह धारा शेख अब्दुल्ला के ’तीन राष्ट्रों के सिद्धांत’ को लागू करने की एक योजना है। मुखर्जी 1953 में भारत प्रशासित कश्मीर के दौरे पर गए थे. वहां तब ये क़ानून लागू था कि भारतीय नागरिक जम्मू कश्मीर में नहीं बस सकते और वहां उन्हें अपने साथ पहचान पत्र रखना ज़रूरी था। श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने कानपुर सम्मेलन के अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा कि -‘‘भारतीय स्वतंत्रता को यदि सारपूर्ण बनाना है तो इसे भारतीय संस्कृति के आधारभूत तत्वों और मूल्यों को ठीक-ठीक समझने और उनके प्रचार-प्रसार में सहायक बनना पड़ेगा। कोई भी राष्ट्र जो अपनी अतीत की उपलब्धियों से गर्वान्वित नहीं होता अथवा प्रेरणा नहीं लेता, वह न तो कभी अपने वर्तमान का निर्माण कर सकता है और न ही कभी भविष्य की रूपरेखा बना सकता है। कोई दुर्बल राष्ट्र कभी महानता की ओर नहीं बढ़ सकता।’’
इससे पूर्व पं. नेहरू को लिखे गए अपने चतुर्थ पत्र में श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने उन्होंने जम्मू-कश्मीर की समस्या को सुलझाने के लिए महत्वपूर्ण सुझाव दिए थे जिनमें से कुछ प्रमुख सुझाव थे- ‘‘जम्मू और कश्मीर का संविधान अंतिम रूप से भारतीय संविधान का अंग होगा, जम्मू और लद्दाख को बिना सीमा परिवर्तन के प्रांतीय स्वशासन दिया जाए तथा भारतीय राष्ट्रध्वज को सर्वाधिक प्रतिष्ठा प्राप्त हो।’’ इन सुझावों पर अमल करने के विपरीत पं. जवाहरलाल नेहरू ने गोलमाल रवैया अपनाया। पंडित नेहरू श्यामा प्रसाद मुखर्जी के पत्रों का टालमटोल उत्तर देते रहे और उनसे मिल कर वार्तालाप करने के अवसर को टालते रहे। कई दिन बाद पं. नेहरू ने उत्तर दिया कि ‘‘मैंने आपका पत्र मिलने के बहुत देर बाद पढ़ा था।’’
लौह पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल सारे भारत को पटेल एक करने में सफल हुए किन्तु उनसे कश्मीर की रियासत का मामला जवाहरलाल नेहरू ने अपने लिये रख लिया था, जो आज तक ज्वलंत प्रश्न बना हुआ है। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी आदि राष्ट्रवादी नेता चाहते थे कि जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय के प्रश्न को हल करने का दायित्व सरदार वल्लभ भाई पटेल को सौंपा जाना चाहिए किन्तु जवाहरलाल नेहरू इस पक्ष में नहीं थे। जवाहरलाल नेहरू ने जम्मू-कश्मीर का मामला अपने हाथ में ही रखा। यदि जवाहरलाल नेहरू ने कश्मीर की रियासत को भी वल्लभ भाई के हवाले दिया होता तो कश्मीर की समस्या 21 वीं सदी का मुंह कभी नहीं देख पाती।
यही यही समय है कि एक बड़ी राजनीतिक भूल को सुधारते हुए कश्मीर में शांति स्थापना और वहां के विस्थापित एवं पीड़ित नागरिकों को एक खुशहाल ज़िन्दगी देने के लिए जरूरी है कि कश्मीर को धारा 370 से मुक्त कर के भारत के अन्य राज्यों की भांति आजादी से सांस लेने दिया जाए।
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Wednesday, January 10, 2018

चर्चा प्लस ... हादसों के बीच स्कूली बच्चे और हमारी चेतनाहीनता - डॉ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
मेरा कॉलम : चर्चा प्लस
हादसों के बीच स्कूली बच्चे और हमारी चेतनाहीनता
- डॉ. शरद सिंह


(दैनिक सागर दिनकर, 10.01.2018)

    इन्दौर स्कूल बस हादसा एक ऐसा सबक है जिससे हमारी आंखें खुल जानी चाहिए। साथ ही प्रश्न उठता है कि नौनिहालों की ज़िन्दगी से खिलवाड़ करने वाले कौन हैं? इस प्रश्न के उत्तर में पहली उंगली उठती है लापरवाह बस मालिकों की ओर जो स्कूल बसों के लिए निर्धारित सुरक्षा नियमों का ठीक से पालन नहीं करते हैं। दूसरी उंगली उठती है, उन ड्राईवर्स की ओर जो गाड़ी की फिटनेस की बिना बारीकी से जांच किए, बसों में बच्चों को भर कर चल पड़ते हैं। तीसरी उंगली उठती है, उन माता-पिता एवं अभिभावकों की ओर जो स्कूल बसों पर बच्चों को चढ़ाने से पहले बस की फिटनेस के प्रति कोई जागरूकता नहीं दिखाते हैं। क्या हम इतने चेतनाहीन होते जा रहे हैं कि बच्चों का जीवन बचाने के लिए एक अभिभावक या एक नागरिक के रूप में सजग नहीं हो सकते हैं?
Charcha Plus Column of Dr Sharad Singh in Sagar Dinkar Dainik

एक उत्साही एवं जागरूक फेसबुक मित्र हेमेन्द्र सिंह चंदेल बगौता ने अपनी एक पोस्ट में मध्यप्रदेश के छतरपुर नगर में चल रही कुछ ऐसी स्कूल बसों के बारे में जानकारी शेयर की जो शासन द्वारा निर्धारित किए गए सुरक्षा नियमों का पालन नहीं कर रही हैं। उन्होंने अपनी पोस्ट में लिखा कि ‘‘इंदौर स्कूल बस हादसा से न तो छतरपुर के बच्चों के माता पिता ने न ही स्कूल संचालकों ने कोई सबक नही लिया है और न ही आरटीओ विभाग ने कोई चेकिंग करने की जहमत उठाई है।’’ उन्होंने प्रमाण के तौर पर कुछ कागज़ात भी फेसबुक पर शेयर किए। यूं तो छतरपुर के हेमेन्द्र सिंह चंदेल (जैसा कि उनकी प्रोफाईल में लिखा है) म.प्र. कांग्रेस आई.टी. एवं सोशल मीडिया सेल के प्रदेश सचिव हैं लेकिन यहां मुद्दा राजनीतिक नहीं अपितु उन मासूम बच्चों की ज़िन्दगी है जो हमारा भविष्य हैं। वैसे भी ऐसे संवेदनशील मुद्दों पर राजनीतिक खींचतान के बजाए मानवीय आधार को प्रमुखता मिलनी चाहिए। अच्छा लगा उनकी फेसबुक-पोस्ट को देख कर कि कोई व्यक्ति सुरक्षा-कमियों के प्रति प्रमाण सहित आवाज़ उठा रहा है। यदि कोई स्कूल बस मालिक सुरक्षा नियमों की अनदेखी कर रहा है तो हर व्यक्ति का दायित्व है कि वह ‘व्हिसिल-ब्लोअर’ बन कर ऐसी जानकारी को सामने लाए ताकि कोई बड़ा हादसा होने से पहले स्थिति को सुधारा जा सके। यह देश के हर शहर के नागरिकों एवं प्रत्येक उस माता-पिता का दायित्व है जो अपने बच्चों को स्कूल बसों में भेजते हैं।
इन्दौर स्कूल बस हादसा एक ऐसा सबक है जिससे हमारी आंखें खुल जानी चाहिए। इंदौर के कनाडिया रोड के पास एक सड़क दुर्घटना में 5 बच्चों समेत बस ड्राइवर की मौत हो गई। इस हादसे में डीपीएस (दिल्ली पब्लिक स्कूल) की स्कूली बस के ड्राइवर की लापरवाही का मामला सामने आया। हुआ यूं कि तेजाजी नगर की ओर जा रही एक तेज रफ्तार दिल्ली पब्लिक स्कूल बस कनाडिया क्षेत्र के पास सामने से आ रहे ट्रक से टकरा गई। इस घटना में स्कूली बस में सवार 5 बच्चों और ड्राइवर की मौत हो गई है। कनाडिया थाना प्रभारी के अनुसार, ’‘स्कूली बस गलत साइड से जा रही थी। शायद बस के ब्रेक फेल हो गए या फिर डिवाइडर से टकराने की वजह से ट्रक से सीधी भिड़ंत हो गई।’’ हादसे में स्कूल बस का अगला भाग बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया। स्कूल की छुट्टी के बाद यह बस विद्यार्थियों को उनके घर छोड़ने जा रही थी। कनाडिया थाना प्रभारी ने बताया कि बस तेजाजी नगर की तरफ जा रही थी, जो कि वन-वे है। मतलब साफ है कि स्कूली बस गलत दिशा में जा रही थी। पूरी घटना पर टिप्पणी करते हुए एएसपी इंदौर ने भी कहा, बस ने अपना संतुलन खो दिया और दूसरी लेन में सामने से आ रहे ट्रक से टकरा गई। प्रश्न यह उठता है कि गलती कहां और किससे हुई है?
चिंताजनक बात यह भी है कि विगत दो माह में अर्थात् नवम्बर, दिसम्बर 2017 में भी स्कूल बसों के भीषण हादसां ने दिल दहलाया है। विगत 30 नवम्बर, 2017 को उत्तर प्रदेश के गौतमबुद्ध नगर जनपद के सेक्टर 39 थाना क्षेत्र में गोल्फ कोर्स मेट्रो स्टेशन के पास स्कूली बच्चों से भरी बस पलट गई। सुबह लगभग 7ः30 बजे नौ स्कूली बच्चों और दो अध्यापिकाओं को लेकर जा रही विश्व भारती पब्लिक स्कूल की बस गोल्फ कोर्स मेट्रो स्टेशन के पास शशि चौक पर ऑटो को बचाने की कोशिश में अनियंत्रित होकर पलट गई। बस पलटने से उसमें सवार बच्चे और शिक्षिकाएं फंस गईं। बच्चों की चीख-पुकार सुनकर मौके पर पहुंचे लोगों ने बस का शीशा तोड़कर बच्चों को सकुशल निकाला। गनीमत यह है कि इस हादसे में बस चालक और कुछ बच्चे मामूली रूप से घायल हुए। मौके पर पहुंची पुलिस ने लोगों की मदद से बच्चों और अध्यापिकाओं को सकुशल बाहर निकाला। बस एक प्राइवेट ट्रैवलर की थी। वह स्कूल की बस नहीं थी। बस मालिक ने सुरक्षा के पूरे मानक पूरे नहीं किए थे।
वहीं इससे पहले 03 नवम्बर 2017 को हिमाचल प्रदेश के मंडी से बच्चों को लेकर आगरा आ रही बस एक्सप्रेस-वे पर पलट कर खाई में जा गिरी। इस हादसे में बस ड्राइवर की मौत हो गई जबकि, टीचर व बच्चे मिलाकर 35 लोग घायल हो गए। हादसे में गंभीर रूप से घायल एक छात्र का हाथ काटना पड़ा। हादसा बस का अचानक टायर फटने की वजह से हुआ। बताया जाता है कि बागपत नंबर की टूरिस्ट बस हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले में स्थित आलोक भारती पब्लिक स्कूल के करीब 125 बच्चों को स्टडी टूर पर लेकर निकली थी। गुरुवार को छात्रों ने मथुरा, वृंदावन का भ्रमण किया। शुक्रवार की सुबह बच्चों को आगरा घुमाने के लिये मथुरा से एक्सप्रेस-वे के रास्ते से निकली थी। इसी दौरान जब बस एत्मादपुर के गढ़ी रस्मी गांव के करीब झरना नाले पर पहुंची तभी बस का अगला टायर अचानक तेज आवाज के साथ फट गया। बस की रफ्तार तेज होने की वजह से ड्राइवर बस पर नियंत्रण नहीं कर पाया और बस रोड साइड रेलिंग तोड़ते हुए खाई में जा गिरी।
यूं भी, भारत में हर वर्ष सड़क दुर्घटना में मृत्यु का आंकड़ा बढ़ रहा है। सन् 2015 में 400 लोगों के प्रतिदिन मौतों की तुलना में पिछले साल 2016 में भारत में सड़क दुर्घटनाओं में कम से कम 410 लोगों की प्रतिदिन मौत का आंकड़ा दर्ज किया गया। टाइम्स ऑफ इंडिया के आंकड़ों के अनुसार डेढ़ लाख लोग 2016 में सड़क दुर्घटना में मारे गए जबकि तुलनात्मक रुप से 2015 में ये आंकड़ा एक लाख छियालिस हज़ार था। साल 2016 में उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश और पश्चिम बंगाल सहित छह राज्यों में हुए मौतों के आंकड़े को देखा जाए तो इसमें चिंताजनक वृद्धि हुई है। इन आकड़ों ने 1970 के बाद के सारे रिकार्ड तोड़ दिए हैं।
देश में होने वाली सड़क दुर्घटनाओं के दुखद सच के बीच उन बच्चों की ज़िन्दगी दांव पर लगी रहती है जो लापरवाह बस मालिकों की बसों में अपना भविष्य बनाने घर से निकलते हैं और अपने जीवन से हाथ धो बैठते हैं। स्कूली बच्चों की मृत्यु के ये आंकड़े बताते हैं हमारे देश में स्कूल जाने-आने के दौरान होने वाली सड़क दुर्घटना में बच्चों की मृत्यु दर में प्रति वर्ष बढ़ोत्तरी होती जा रही है। वर्ष 2000 से 2012 तक के आंकड़ों के अनुसार देश में मध्य प्रदेश ‘टॉप फाईव’ सबसे असुरक्षित राज्यों में शामिल है। नंबर एक पर महाराष्ट्र है, जहां वर्ष 2000 से 2012 में लगभग 52,073 स्कूली बच्चों की मौत हुई। वहीं 48,993 के आंकड़े के साथ मध्यप्रदेश दूसरे नंबर पर है। देश में प्रतिदिन लगभग 2 करोड़ 70 लाख स्कूली बच्चे अनुमानतया 5 लाख बसों से स्कूल जाते हैं। इस दौरान कतिपय लापरवाह बस स्कूल मालिकों के कारण उनकी सलामती की कोई गारंटी नहीं रहती है। सन् 2002 से 2012 के बीच एक दशक के आंकड़ों से भी साफ़ पता चलता है कि भारत में सड़क दुघर्टना में होने वाली स्कूली बच्चों की मौतों में बढ़ोत्तरी होती जा रही है।
प्रश्न फिर वही कि नौनिहालों की ज़िन्दगी से खिलवाड़ करने वाले कौन हैं? इस प्रश्न के उत्तर में पहली उंगली उठती है लापरवाह बस मालिकों की ओर जो स्कूल बसों के लिए निर्धारित सुरक्षा नियमों का ठीक से पालन नहीं करते हैं। दूसरी उंगली उठती है, उन ड्राईवर्स की ओर जो गाड़ी की फिटनेस की बिना बारीकी से जांच किए, बसों में बच्चों को भर कर चल पड़ते हैं। तीसरी उंगली उठती है, उन माता-पिता एवं अभिभावकों की ओर जो स्कूल बसों पर बच्चों को चढ़ाने से पहले बस की फिटनेस के प्रति कोई जागरूकती नहीं दिखाते हैं। क्या हम इतने चेतनाहीन होते जा रहे हैं कि बच्चों का जीवन बचाने के लिए एक अभिभावक या एक नागरिक के रूप में सजग नहीं हो सकते हैं? माता-पिता होने का मात्र इतना ही दायित्व नहीं होता है कि मोटी फीस और डोनेशन दे कर बच्चों को अच्छे स्कूल में दाखिला दिलाया और उस स्कूल या उससे संबंधित बस आदि की सुविधाएं उपलब्ध कराने वालों के गुलाम हो गए। आंख मूंद कर बच्चों का बस पर चढ़ाया और उनकी सुरक्षा के प्रति हो गए निश्चिन्त। जिस तरह हम अपने बच्चों के खाने-पीने, ओढ़ने-पहनने के प्रति सर्त्तकता बरतते हैं, ठीक वैसे ही उन्हें स्कूल ले जाने वाली बसों की फिटनेस के प्रति भी सचेत रहना होगा। यदि बस सुरक्षा नियमों के अनुरूप नहीं है तो बस मालिक को टोकना होगा, यदि चालक लापरवाही से बस चलाता है तो उसे परिणामों के प्रति आगाह करना होगा। मासूम बच्चों के जीवन की सुरक्षा की खातिर जगाना होगा अपनी सोई हुई चेतना को और बनना ही होगा ‘व्हिसिल ब्लोअर’।
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Wednesday, January 3, 2018

चर्चा प्लस ... वर्ष 2018 : आशाएं भी, चुनौतियां भी - डॉ शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
मेरा कॉलम - चर्चा प्लस  
वर्ष 2018 : आशाएं भी, चुनौतियां भी
- डॉ. शरद सिंह
   (दैनिक सागर दिनकर, 03.01.2018)     
                                                                     
दुनिया के हर देश, हर शहर और हर नागरिक को स्वयं तय करना है कि वर्ष 2018 में उसकी प्राथमिकताएं क्या रहेंगी? जहां तक हमारे अपने देश का प्रश्न है तो विगत दो वर्ष में न सिर्फ़ राजनीतिक दल वरन आमजनता भी आग के दरिया से हो कर गुज़री है। विधानसभाओं एवं महत्वपूर्ण नगरपालिक निगमों के चुनाव हुए, नोटबंदी हुई और डिजिटिलाईजेशन की बाढ़ आ गई। गोया देश का सम्पूर्ण आर्थिक जगत् एप्पस् में ढल गया। देश की अशिक्षित या कम पढ़ी-लिखी जनता के लिए यह क्रांति किसी पाहाड़ लांघने से कम नहीं रही। फिर भी वर्ष 2016 और 2017 को पार करते हुए 2018 में आ ही पहुंचे जहां आशाएं तो असीमित है लेकिन चुनौतियां भी कम नहीं हैं। 
Charcha Plus Column of Dr Sharad Singh in Sagar Dinkar Dainik
मैंने अपने फेसबुक पेज़ ‘पिछले पन्ने की औरतें’ में नववर्ष की शुभकामनाएं लिखते हुए लिखा कि ‘‘वर्ष वह पन्ना है जिसे समय पढ़ता और पलटता जाता है।’ मेरे इस कथन पर एक मित्र ने 01 जनवरी को टिप्पणी की कि ‘‘लीजिए नया पन्ना अब सामने आ गया है।’’ सच लिखा उसने। हमारे समाने सन् 2018 के रूप में वह पन्ना खुल गया है जिस पर समय के साथ-साथ हमें भी कुछ लिखना है और उसमें से कुछ पढ़ना है। समय जो सबक देता है वह उम्र भर नहीं भूलता है। वर्ष 2018 हमें क्या सबक देगा, इसका तो हम अभी से अनुमान भी नहीं लगा सकते हैं लेकिन हमें इस वर्ष क्या-क्या करना है, इसकी प्राथमिकताएं तो हमें ही तय करनी होंगी जबकि ढेर सारी चुनौतियां हमारे सामने मुंहबाए खड़ी हैं। 

○दूर न जाते हुए मैं उस ज़मीनी चुनौती से आरम्भ करती हूं जिसका अनुभव मुझे वर्ष के पहले दिन, पहली सुबह को हुआ। एक संगठन है ‘ #प्रजामंडल ’ जिसमें नगर के समाजसेवी और बुद्धिजीवी जुड़े हुए हैं। प्रदेश के एक प्रतिष्ठित दैनिक समाचार पत्र की परिकल्पना पर यह गठित किया गया था। तो, ‘#प्रजामंडल ’ के हम सभी सदस्यों ने यह तय किया कि नववर्ष का आरम्भ किसी सार्थक कार्य से किया जाए। ऐसा कार्य जो समाजहित में हो और लोगों में जागरूकता लानेवाला हो। तय हुआ कि हम सभी नए साल की पहली सुबह शहर की एक गंदी बस्ती में जाएंगे और वहां लोगों से शौचालय के महत्व तथा बस्ती में स्वच्छता बनाए रखने के बारे में चर्चा करेंगे। पहली जनवरी की सुबह समाज के प्रत्येक क्षेत्र के बुद्धिजीवी एवं समाजसेवी जैसे उमाकांत मिश्र, शिवरतन यादव, मैं स्वयं डॉ #शरदसिंह, डॉ शीतांशु राजौरिया,       संतोष स्टील, अनुराग ब्रजपुरिया,     राजा रिछारिया, बाबूलाल रोहित,      बलवंत सिंह ठाकुर, नरेन्द्र ठाकुर आदि निश्चित स्थान पर एकत्र हो गए। इसके बाद हमने बस्ती में प्रवेश किया। महिलाओं से चर्चा का दायित्व मुझे सौंपा गया। बस्ती की महिलाएं पहले झिझकीं फिर आहिस्ते से खुल कर बोलने लगीं। एक महिला ने जिस सरलता से मुझे अपनी सच्चाई बताई, उस पर मुझे समझ में नहीं आया कि मैं उसकी साफ़गोई के लिए उसे बधाई दूं या उसकी ‘लाईफ स्टाईल’ के लिए उसे फटकार लगाऊं। हुआ यूं कि जब मैंने उस महिला से पूछा कि क्या तुम्हारे घर में शौचालय है? उसने बड़े इतरा कर, मुस्कुरा कर उत्तर दिया -‘‘हऔ, है। हमाये इते शौचालय है।’’ लेकिन ग्रामीण इलाके के मेरे पूर्वअनुभवों ने मेरे भीतर घंटी बजा दी और मैंने दूसरे ही पल उससे पूछ लिया, ‘‘लेकिन तुम शौचालय में जाती हो या लोटा ले कर बाहर?’’ वह जरा झेप कर, हंस कर बोली,‘‘हमें तो बाहर अच्छो लगत है। हम तो बाहर ई जात आएं।’’ मेरी शंका सही निकली। वहां उपस्थित अन्य लोग उसका उत्तर सुन कर चकित रह गए थे। उस समय मुझे याद आया कि जब हम इस पहली सुबह की योजना बना रहे थे तो यही बात बार-बार सामने आ रही थी कि सुविधाएं उपलब्ध होने से भी कहीं बड़ी आवश्यकता है व्यवहार परिवर्तन की। 

○व्यवहार परिवर्तन की आवश्यकता पर एक मुहर उस समय और लग गई जब वार्ड राजनीति से प्रेरित एक महिला और उसके सहयोगी गंदगी के प्रति स्वयं के दायित्वों को नकारते हुए यह कहते हुए तैश में आ गई कि ‘‘सरकार कहती भर रहती है, करती कुछ नहीं है।’’ जबकि सच यह है कि उस क्षेत्र में कचरा उठाने वाली गाड़ी हर घर के दरवाज़े से गुज़रती है। लेकिन यदि यह सोचा जाए कि आपके घर का कचरा घर से निकाल कर गाड़ी तक सरकार पहुंचाएगी तो फिर दुनिया का कोई स्वच्छता मिशन कामयाब नहीं हो सकता है। यदि कुछ सकारात्मक है तो उसे मात्र राजनीति से प्रेरित हो कर बिगाड़ना या नकारना तो किसी भी मायने में नागरिक कर्त्तव्य नहीं है। यदि नागरिक कर्त्तव्य की बात भी छोड़ दी जाए तो स्वयं के और अपने परिवार के स्वास्थ्य और सुरक्षा के प्रति जो दायित्व बनता है, यह उसकी भी अवहेलना ही कहलाएगा। मुझे वहां महिलाओं को यह याद दिलाना और समझाना पड़ा कि अपनी बेटियों को, बहनों को खुले में शौच के लिए मत भेजो और स्वयं भी मत जाओ। आजकल आए दिन बलात्कार की इतनी घटनाएं सुनने को मिलती हैं, किसी दिन तुम्हारे साथ या तुम्हारे परिवार की किसी बेटी के साथ ऐसी कोई घटना घट गई तो तुम क्या करोगी? नुकसान तो तुम्हारा ही होगा न! सच कहूं तो यह समझाते हुए मुझे यह सोच कर दुख रहा था कि ये सब भी महिलाएं हैं तो ये इस ख़तरनाक सच्चाई को देख कर अनदेखा क्यों करती हैं? जो मैं इनके कह रही हूं, वह सब ये अपने परिवार के पुरुषों को क्यों नहीं कहती हैं? मुझे लगा कि यहां भी मुद्दा वही व्यवहार परिवर्तन का है। उन्हें अपनी आदत बदलनी होगी, स्वयं के लिए नही ंतो कम से कम अपने बच्चों के लिए और यही तो एक बड़ी चुनौती है जिसे इस वर्ष हमें गंभीरता से लेना चाहिए।

यूं भी इस वर्ष अब तक संयुक्त राष्ट्र संघ ने वर्ष 2018 के लिए कोई एक विशेष एजेंडा घोषित नहीं किया है। यानी संयुक्त राष्ट्र संघ भी चाहता है कि प्रत्येक देश अपनी ज़मीनी समस्याओं से निपटने की प्राथमिकताएं स्वयं तय करे। 

वर्ष 2017 मुस्लिम महिलाओं को एक बड़ी सौगात दे गया है जो है ‘तीन तलाक’ के शब्दों से मुक्ति। लेकिन यह सौगात उन्हें यूं ही मुफ़्त में नहीं मिली है। इसे पाने के लिए उन महिलाओं ने आगे आकर लम्बी लड़ाई लड़ी जिन्होंने कभी घर से बाहर निकल कर खुली हवा में सांस भी नहीं ली थी। अब एक लड़ाई लड़नी है पूरे समाज को, और वह भी जाति, धर्म या वर्ग से ऊपर उठ कर। वह लड़ाई है उन अपराधियों से जो स्त्री-अस्मिता और स्त्री-जीवन को तार-तार कर रहे हैं। विगत कुछ वर्षों में बलात्कार की घटनाओं की बाढ़ सी आ गई है। अब उम्र और लिंग का भेद भी बलात्कारियों के लिए बेमानी हो चला है। दो साल की बच्ची से ले कर नब्बे साल की उम्र दराज़ महिला भी बलात्कारियों की कुदृष्टि का शिकार हो रही है और वहीं कम उम्र बच्चे भी ऐसी घटनाओं की चपेट में आ रहे हैं। लिहाजा हमें निपटना ही होगा ऐसी दूषित प्रवृत्ति से जो दिन दूनी और रात-चौगुनी बढ़ रही है। ऐसी घटनाओं के बढ़ने के पीछे कहीं यह कारण तो नहीं कि आज लगभग हर हाथ में मोबाईल के माध्यम से इन्टरनेट आ गया है जिसमें यौनहिंसा भड़काने वाली सामग्रियां भी प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं जबकि इसके उलट हमारे पास साईबर अपराध रोकने के साधन सीमित हैं। शायद यही कारण है कि बलात्कार जैसे अपराध नाबालिग आयु के युवा भी कर रहे हैं। 

एक ओर ग्लोबलाईजेशन की चकाचौंध और दूसरी ओर ग़रीबी और बेरोजगारी का अंधेरा। युवाओं के लिए इसे फ्रस्टेशन का दौर कहा जा सकता है।  
राज्यों के चुनाव भी निकट आ रहे हैं। जिससे जनता की आशाएं बढ़ती जा रही हैं और राजनीतिक चुनौतियां जटिल होती जा रही हैं। दिक्कत यह है कि तात्कालिक राजनीतिक चुनौती से निपटने के लिए जो तरीके अपना लिए जाते हैं उनके परिणाम आगे चल कर घातक होते हैं। ग़रीब जनता से मुफ़्तखोरी के वायदे एक ओर आमजनता को सुनहरे ख़्वाब दिखाती है वहीं दूसरी ओर राज्यों की आर्थिक कमर तोड़ कर रख देती है। भला कर्जों के बोझ तले दबा कोई राज्य कभी तरक्की कर सकता है? इस सच को भी समझना होगा सभी राजनीतिक दलों को और तय करन होगा कि वे सचमुच जनहित चाहते हैं या महज़ भुलावे की राजनीति खेलना चाहते हैं। 

अच्छा यही होगा कि समूचा देश ही नहीं वरन् देश का हर शहर और हर नागरिक स्वयं तय करे कि वर्ष 2018 में उसकी प्राथमिकताएं क्या रहेंगी? विगत दो वर्ष में न सिर्फ़ राजनीतिक दल वरन आमजनता भी आग के दरिया से हो कर गुज़री है। विधानसभाओं एवं महत्वपूर्ण नगरपालिक निगमों के चुनाव हुए, नोटबंदी हुई और डिजिटिलाईजेशन की बाढ़ आ गई। गोया देश का सम्पूर्ण आर्थिक जगत् एप्पस् में ढल गया। देश की अशिक्षित या कम पढ़ी-लिखी जनता के लिए यह क्रांति किसी पाहाड़ लांघने से कम नहीं रही। फिर भी वर्ष 2016 और 2017 को पार करते हुए 2018 में आ ही पहुंचे जहां आशाएं तो असीमित है लेकिन चुनौतियां भी कम नहीं हैं।
जीवन की तमाम विषमताओं के होते हुए भी अच्छे दिनों की आशाएं रखनी ही चाहिए।
 अंत में ‘सागर दिनकर’ के सभी पाठकों के प्रति ये पंक्तियां -
नूतन सपनों को  ले आया, आने वाला साल
नई सफलता पर हो फिर इतराने वाला साल
पूरी हों  इच्छाएं  सबकी, सबको खुशी मिले
साबित हो सच्चे दिल से अपनाने वाला साल  
              ----------------------  
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Wednesday, March 30, 2016

चर्चा प्लस ... भारतीय मुस्लिम महिलाओं का भविष्य .... डॉ. शरद सिंह

Charcha Plus - Column of Dr Sharad Singh
My Column “ Charcha Plus” published in  "Dainik Sagar Dinkar" , 30. 03. 2016
मेरा कॉलम 'चर्चा प्लस’ दिनांक 30. 03. 2016 के  "दैनिक सागर दिनकर"(सागर, मध्य प्रदेश)
में प्रकाशित ....

           
Charcha Plus Column of Dr Sharad Singh in "Sagar Dinkar" Daily News Paper

 चर्चा प्लस
         भारतीय मुस्लिम महिलाओं का भविष्य
                           - डॉ. शरद सिंह


एक गैरसरकारी संस्था भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन ने मुस्लिम पारिवारिक कानून पर क्या सोचती हैं मुस्लिम महिलाएं’ विषय पर महाराष्ट्र, गुजरात, पश्चिम बंगाल, कर्नाटक, बिहार, तमिलनाडु, मध्यप्रदेश, राजस्थान, झारखंड और ओडिशा की लगभग 4710 मुस्लिम महिलाओं की राय जानी। इस सर्वे में चौंका देने वाले तथ्य सामने आए। शादी, तलाक, एक से ज्यादा शादि, घरेलू हिंसा और शरिया अदालतों पर महिलाओं ने खुलकर अपनी राय रखी। राय रखने वाली 73 फीसदी महिलाएं गरीब तबके से थीं, जिनकी सालाना आय 50 हजार रुपये से भी कम है। सर्वें में शामिल 55 फीसदी औरतों की शादी 18 साल से कम उम्र में हुई और 44 फीसदी महिलाओं के पास अपना निकाहनामा तक नहीं है। सर्वे के अनुसार 53.2 फीसदी मुस्लिम महिलाएं घरेलू हिंसा का शिकार हैं। लगभग 75 फीसदी औरतें चाहती थीं कि लड़की की शादी की उम्र 18 से ऊपर हो और लड़के की 21 साल से ऊपर। सर्वे में शामिल 40 फीसदी औरतों को 1000 से भी कम मेहर मिली, जबकि 44 फीसदी को तो मेहर की रकम मिली ही नहीं। सर्वे में शामिल 525 तलाकशुदा महिलाओं में से 65.9 फीसदी का जुबानी तलाक हुआ। 78 फीसदी का एकतरफा तरीके से तलाक हुआ लगभग 83.3 फीसदी औरतों को लगता है कि मुस्लिम कानून लागू हो तो उनकी पारिवारिक समस्याएं हल हो सकती हैं और सरकार को इसके लिए कदम उठाना चाहिए।
भारतीय मुस्लिम महिला आन्दोलन मुस्लिम महिलाओं के नेतृत्व में एक राष्ट्रीय मोर्चा है, जो पूरे समुदाय और विशेषरुप से मुस्लिम महिलाओं के नागरिक अधिकारों के लिए संघर्षरत है। यह ‘पाक ֯‘कुरआन’ और भारतीय संविधान से मिले अधिकारों और निहित कर्तव्यों के लिए काम करता है। यह भारतीय संविधान में निहित न्याय, लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत को मानता है और ‘֯‘कुरआन’ के द्वारा मुस्लिम महिलाओं को मिले अधिकारों के लिए संघर्ष करता है। 13 राज्यों की 70 हजार मुस्लिम महिलाएं सदस्यों वाले राष्ट्रीय गठबंधन भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन ने मुस्लिम पर्सनल लॉ में सुधार किए जाने की जरूरत जताते हुए नवम्बर 2015 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी समेत कई नेताओं को पत्र लिखा था तथा बराबरी के हक और लैंगिक न्याय की मांग की थी।
यह मांग पत्र मुस्लिम महिलाओं की अपेक्षाओं और मांगों को लेकर तैयार किया गया था। भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन की सह संस्थापक जकिया सुमन उस समय कहा था कि इसे स्वीकार कर लेने से मुस्लिम महिलाओं को गरिमामय जीवन जीने में मदद मिल सकेगी। उनकी मांग है कि सम्पत्ति में भी मुस्लिम महिलाओं को बराबरी का हिस्सा मिले। उन्होंने सुझाव दिया था कि शरियत एप्लीकेशन एक्ट- 1937 और डिजोल्यूशन ऑफ मुस्लिम मैरिज एक्ट- 1939 में संशोधन कर उन्हें न्याय दिलाया जाए।
इसके बाद सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस अनिल दवे और जस्टिस आदर्श कुमार गोयल की बेंच ने नेशनल लीगल सर्विसेस अथॉरिटी से इस बारे में जवाब मांगा था कि क्या भारत में मुस्लिम महिलाओं के साथ होने वाले लैंगिक भेदभाव को उनके मूल अधिकारों का हनन नहीं माना जाना चाहिए, ये वे मूल अधिकार हैं जो कि उन्हें संविधान की 14, 15 और 21 धाराओं के तहत मिले हैं।
भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन की सह संस्थापक जकिया सुमन ने जानकारी दी थी कि ‘लैंगिक न्याय हमारे संविधान का सिद्धांत है। प्रधानमंत्री को हमारे मांगपत्र के जरिए हम मुस्लिम महिलाओं की चिंता सरकार तक पहुंचाना चाहते हैं। हमने मुस्लिम महिलाओं की अपेक्षाओं और मांगों पर आधारित ड्राफ्ट तैयार किया है।
‘कितना कठिन होता है अपने-आप से लड़ते हुए जीवन बिताना। औरतों की जि़न्दगी में मूक-बधिर की तरह हुकुम का पालन करना, रेवड़ के साथ चलते जाना क्यों होता है.... मुस्लिम महिलाओं के जीवन पर आधारित नमिता सिंह के उपन्यास ‘लेडीज़ क्लब’ का यह वाक्य विवश करता है कि भारत में मुस्लिम महिलाओं के वर्तमान और भविष्य के बारे में चिन्तन किया जाए। मार्च 2010 में नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर मुस्लिम महिलाओं ने प्रदर्शन किया था। प्रदर्शन का विषय था महिला आरक्षण बिल। प्रदर्शनकारी महिलाओं का समर्थन करते हुए गीतकार और राज्य सभा में मनोनीत सदस्य जावेद अख्तर ने कहा था कि ‘महिला आरक्षण बिल को अब कोई भी नहीं रोक सकता है। यह ठीक इसी तरह है जैसे सुबह को होने से कोई रोक नहीं सकता, वक़्त को गुजरने से कोई रोक नही सकता या मौसम को बदलने से रोका नही जा सकता। दुनिया के बावन मुस्लिम मुल्कों में से पचास मुल्कों में तलाक़-तलाक़ कहने पर तलाक नहीं हो जाता। यह भारत ही है जहां यह प्रथा जारी है जिसे मौलवी-मुल्लाओं की सरपरस्ती हासिल है।’
भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन की दिल्ली इकाई की ओर से आयोजित प्रदर्शन में जावेद अख़्तर ने ज़ोर दे कर कहा था कि ‘जो लोग मुस्लिम महिलाओं की बदहाली के जिम्मेदार हैं, आज वही संसद में मुस्लिम महिलाओं के लिए आरक्षण मांग रहे हैं। मतलब साफ है-विधेयक के पारित होने में वे रुकावट डालना चाहते हैं। ये वही लोग हैं जो चाहते हैं कि मुस्लिम महिलाएं घर से न निकलें और पर्दे में रहें। दरअसल उनकी इस मांग से खुद उनके चेहरे का नकाब उठ गया है।’
इसीं महिला आरक्षण विधेयक पारित होने के बाद मुस्लिम पसर्नल लॉ बोर्ड और शियाओं की ओर से कल्बे जव्वाद ने विरोध किया था। कल्बे जव्वाद ने तो यहां तक कह दिया था कि ‘मुस्लिम महिला का काम घर से निकलना नहीं, बल्कि घर में रहकर अच्छी नस्ल के बच्चे पैदा करना है।’
लेकिन क्या सभी मुस्लिम पुरुष अपने धर्म की महिलाओं के विरोधी हैं, इसका उत्तर जून 2012 में बड़े सटीक ढंग से मिला। देश की प्रमुख इस्लामी शिक्षण संस्था बरेली मरकज ने जब घोषणा की कि पति के जुल्म और घरेलू हिंसा की शिकार महिलाओं को तलाक (खुला) लेकर अलग होने का पूरा अधिकार है। बरेली मरकज ने यह बात एक फतवे में कही। यह फतवा घरेलू हिंसा से जुड़े एक सवाल के संदर्भ में दिया गया। एक युवती ने बरेली मरकज से सवाल किया था कि अगर किसी महिला के साथ उसका पति जुल्म करता है तो उससे वह कैसे अलग हो सकती है शरिया में पत्नी की ओर से तलाक की पहल करने की इजाजत है या नहीं? इस सवाल पर आए फतवे में कहा गया है कि इस्लाम में पूरी आजादी है कि महिला अपने शौहर से तलाक लेकर अपनी जिंदगी का फैसला कर सकती है। इस्लाम में पति के सम्मान की बात की गई है, लेकिन उसका जुल्म सहना किसी भी सूरत में जायज नहीं है। संस्था से जुड़े दारूल इफ्ता के प्रमुख मुफ्ती कफील अहमद ने फतवे में कहा कि इस्लाम में महिलाओं को सताना अथवा उनके साथ जुल्म करना बहुत बड़ा गुनाह है। अगर कोई महिला इस तरह के जुल्म का शिकार हो रही है तो उसे शौहर से तलाक लेने का पूरा हक़ है। यह अधिकार उसे इस्लाम ने दे रखा है। इस्लाम में विवाह को खत्म करने के लिए पति और पत्नी दोनों को अधिकार है। पति को यह अधिकार तलाक और पत्नी को खुला के रूप में दिया गया है।
फतवे पर ऑल इंडिया मुस्लिम महिला पर्सनल लॉ बोर्ड की प्रमुख शाइस्ता अंबर ने कहा था कि ‘इस्लाम में महिलाओं को पूरा अधिकार दिया गया है कि वह अपनी जिंदगी का फैसला खुद कर सकती हैं। इतनी बड़ी संस्था ने इस्लामी नजरिए से यह फतवा दिया है और हम इससे पूरा इत्तेफ़ाक रखते हैं।’
सरकार एवं समाज चिन्तित है मुस्लिम महिलाओं के बहुमुखी विकास को ले कर किन्तु क्या मात्रा इससे कोई हल निकल सकता है कि महिलाओं को कानूनी अधिकार दे दिए जाएं? यह भी तो उतना ही जरूरी है कि महिलाएं अपने अधिकारों को जान सकें और उन्हें पाने का साहस कर सकें। पढ़ी-लिखी महिला ही अपना कानूनी अधिकार सुगमता से प्राप्त कर पाती है। सन् 2001 के आंकड़ों के आधार पर सच्चर कमेटी की रिपोर्ट थी कि समाज के अन्य धर्मों की महिलाओं की तुलना में मुस्लिम महिलाओं में शिक्षा का प्रतिशत बहुत कम है। मुस्लिम महिलाओं में केवल 41 प्रतिशत महिलाएं साक्षर थी जबकि गैर मुस्लिम महिलाओं में 46 प्रतिशत महिलाएं साक्षर थी। स्कूलों में मुसलमान लड़कियों की संख्या अनुसूचित जाति एवं जनजातियों की तुलना में तीन प्रतिशत कम थी। 101 मुस्लिम महिलाओं में से केवल एक मुस्लिम महिला स्नातक कर सकी जबकि 37 गैरमुस्लिमों में से एक महिला ने स्नातक उपाधि पाई। यही वो बुनियाद है जहां से मुस्लिम महिलाओं के बहुमुखी विकास के रास्ते खुल सकते हैं। मुस्लिम महिलाओं के मध्य शिक्षा को अधिक से अधिक बढ़ावा दिए जाने पर परिदृश्य बदल सकता है। इसके लिए आवश्यक हो जाता है कि मुस्लिम महिलाओं पर केन्द्रित जागरुकता एवं साक्षरता शिविर का आयोजन किया जाए। आखिर मुस्लिम महिलाओं के विकास का भविष्य देश के विकास के भविष्य से अलग नहीं है। पढ़ी-लिखी मुस्लिम महिलाएं देश के विकास में उतनी ही महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं जितनी कि गैरमुस्लिम महिलाएं।
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