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Wednesday, March 3, 2021

3 मार्च विश्व वन्यजीव दिवस पर विशेष लेख | यह दिवस उत्सव नहीं, मांग करता है ईमानदार प्रयासों की | डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh

3 मार्च विश्व वन्यजीव दिवस    

यह दिवस उत्सव नहीं, मांग करता है ईमानदार प्रयासों की         
  - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह

              पिछले दो सालों में हमने दुनिया के बड़े-बड़े जंगलों को आग के हवाले होते देखा। उनके वन्य जीवन को धू-धू कर जलते देखा। ग्लेशियर्स के पिघलने और टूटने से होने वाली आपदा की धमक अपने देश के उत्तराखंड में भी सुनी। दुख है कि हम अभी भी वन और मानव जीवन के रिश्ते को अनदेखा ही किए जा रहे हैं। जबकि वन और वन्यजीवन पर ही पृथ्वी और मानव का अस्तित्व टिका है। यही तो हर वर्ष याद दिलाता है विश्व वन्यजीव दिवस कि पृथ्वी ही हमारा घर है और आपदाओं से बचाना हमारा कर्त्तव्य।    
          
हमने अपने घर की बैठक का दरवाज़ा सड़क के किनारे तक पहुंचा दिया है। अब घर के सामने बागीचा नहीं होता है। बागीचा न होने से, न तो तो मुलायम घास होती है और न तो सुगंध देने वाली पुष्पवाटिका और न ही छाया देने वाले पेड़। हमने अपने घर की बैठक के दरवाज़े को धूल, धुंआ वाले प्रदूषण की सुरंगों से जोड़ दिया है। उस पर हम एक सफल उपभोक्तावादी की तरह खुश होते हैं कि बाज़ार में एयर प्यूरीफायर तो है, वाटर प्यूरीफायर तो है, ढेर सारी दवाएं तो हैं। दरअसल हम उपभोक्तावादी नहीं हुए हैं बल्कि बाज़ार ने हमारी सोच को प्रकृति और पर्यावरण से दूर करके अपना गुलाम बना लिया है। यह बात कहने, सुनने, पढ़ने में कटु है, मगर सच है शतप्रतिशत। कभी-कभी ऐसा लगता है कि हम में से अधिकांश को पर्यावरण पर चर्चा करना जितना रोचक लगता है, उस पर अमल करना उतना ही ग़ैरजरूरी लगता है।

“तुम बादलों को रोकना
और पूछना-
कहां से आए तुम?
वह कहेगा- समुद्र से।
तुम समुद्र से पूछना-
कहां से मिला तुम्हें जल?
वह कहेगा-
नदियों से।
नदियों से पूछना-
कहां से मिला उन्हें पानी?
वह कहेंगी-
भूमिगत स्रोतों से।
भूमिगत स्रोतों से पूछना-
कैसे संजोकर रखा तुमने जल?
वे कहेंगे-
हमने नहीं, उन पेड़ों और वृक्षों की जड़ों ने
जिन्होंने रोक कर भूमि का क्षरण
हमें आकार दिया 
ताकि हम संजो सकें पानी नदियों के लिए।
अब समझे? 
कि क्यों कहता है समुद्र-
बचाना चाहते हो इस पृथ्वी को
तो पहले बचाओ पेड़ों को,
पेड़ रहेंगे तो रहेगी पृथ्वी भी।”

    - यह कविता मैंने सन् 2016 में लिखी थी विशेषरूप से ‘‘साहित्य, पृथ्वी और पर्यावरण’’ विषय पर आधारित एक कंवेन्शन में व्याख्यान देते समय बोलने के लिए। यह आयोजन लखनऊ (उ.प्र.) में एक एनजियो द्वारा आयोजित किया गया था। स्कूली छात्रों से ले कर पर्यावरणविदों तक ने उसमें भाग लिया था। मैंने प्रथम सत्र में अपने व्याख्यान के साथ अपनी इस कविता को सुनाया था। लोगों ने बेहद पसंद किया था इसे। लेकिन मैं नहीं जानती कि कितने लोगों ने इसके संदेश पर अमल किया।  
  
अपनी इस कविता का उल्लेख मैंने इसलिए किया क्योंकि यह मेरे दिल-दिमाग में हमेशा दस्तक देती रहती है और मुझे उलाहना भी देती है। आज 03 मार्च को इस कविता ने मुझे फिर उलाहना दिया। दुनियाभर में जंगलों एवं वन्यजीवों के संरक्षण हेतु 03 मार्च को विश्व वन्यजीव दिवस मनाया जाता है। जिसकी शुरूआत 20 दिसंबर 2013 को संयुक्त राष्ट्र महासभा (यूएनजीए) द्वारा 68वें सत्र में की गई थी। इसका उद्देश्य दुनिया भर में वन और वन्य जीवन के प्रति लोगों में जागरूकता बढ़ाना है। इस दिवस को मनाने के लिए 03 मार्च का दिन इसलिए चुना गया क्योंकि 1973 में इसी दिन वन्य जीवों और वनस्पतियों की लुप्तप्राय प्रजातियों में अंतर्राष्ट्रीय व्यापार पर कन्वेंशन के हस्ताक्षर किए गए थे। विश्व वन्यजीव दिवस मनाया जाना अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर वन्यजीवों, विलुप्त होने वाली प्रजातियों एवं पेड़-पौधों के संरक्षण के बारे में लोगों को सजग करने का एक वैश्विक प्रयास है। पृथ्वी पर जीवन की संभावनाओं को बनाए रखने के लिए और पर्यावरण में जीव-जंतु तथा पेड़-पौधों के महत्व को पहचानते हुए एक ‘‘सभा वन्य जीवों और वनस्पतियों की लुप्तप्राय प्रजातियों में अंतर्राष्ट्रीय व्यापार पर कन्वेंशन’’ यानी ‘‘साइट्स’’ (कंवेंशन ऑन इंटरनेशनल ट्रेड इन इनडेंजर्ड स्पशीज़ ऑफ वाइल्ड फउना एंड फ्लोरा) की स्थापना की गई। 

विश्व वन्यजीव दिवस मनाए जाने के लिए हर वर्ष विषय निर्धारित किए जाते हैं ताकि पृथ्वी पर मनुष्य के अतिरिक्त मौजूद जीवन के किसी एक पक्ष पर ध्यान केन्द्रित कर के उसके संरक्षण एवं संवर्द्धन के लिए वर्ष भर कार्य किया जाए। विश्व वन्यजीव दिवस की वर्ष 2015 की थीम थी ‘‘वन्यजीव अपराध के बारे में अब गंभीर होने का समय’’, 2016 का थीम थी ‘‘वन्यजीवों का भविष्य हमारे हाथ में’’ जिसके अंतर्गत एक उप-थीम भी थी ‘‘हाथियों का भविष्य हमारे हाथों में’’। यह दुनिया भर में हाथियों के संरक्षण और सुरक्षा की दिशा में किए जा रहे कार्यों पर केन्द्रित था। वर्ष 2017 की थीम थी ‘‘युवा आवाज़ सुनो’’। इसका आशय था कि वन और वन्य जीवन के प्रति युवाओं में जागरूकता लाना तथा वन और वन्य जीवन के प्रति चिन्ता व्यक्त करने वाले युवाओं के विचारों को सम्मान देते हुए उस पर अमल करते हुए वन्यजीवन को बचाने के लिए ज़रूरी कदम उठाना। वर्ष 2018 के लिए थीम तय की गई थी ‘‘बड़ी बिल्लियां - शिकारियों के खतरे में’’। बड़ी बिल्लियां अर्थात् शेर, चीता, तेंदुआ की आफ्रिका से ले कर बर्फीले साइबेरिया तक की प्रजातियों को शिकारियों द्वारा अवैध रूप से मारे जाने से बचाना। वर्ष 2019 की थीम थी ‘‘पानी के नीचे जीवन: लोगों और ग्रह के लिए’’। वन और वन्यजीवन के लिए पानी के नीचे मौजूद जीवन किस तरह जरूरी है, इसे अकसर लोग समझ नहीं पाते हैं। हरियाले वन और नदियों या समुद्रों में मछलियों, कोरल आदि के रूप में मौजूद जीवन के पारंपरिक संबंधों को समझने के लिए इकोसिस्टम यानी पर्यावरण की प्राकृतिक व्यवस्था को समझाना जरूरी है। इसका बहुत छोटा-सा उदाहरण है जिसे हम सभी अपने बचपन से सुनते आए हैं कि समुद्र का पानी भाप बन कर ऊपर उठता है और बादल के रूप में जल की वर्षा करता है जिससे थलीय क्षेत्र के वन्यजीवन तथा सामान्य जनजीवन का जीवन चलता है। 

बढ़ते हुए औद्योगिक दबाव ने विषैली गैसों के उत्सर्जन को इतना अधिक बढ़ा दिया है कि इससे धरती की सुरक्षा छतरी यानी ओज़ोन परत में छेद हो चले हैं। ओज़ोन परत सूर्य से आने वाली विकिरणयुक्त पराबैंगनी किरणों से पृथ्वी को बचाए रखता है। लेकिन हमने अपनी भौतिक लिप्सा के कारण जहां एक ओर जंगलों को बेतहाशा काटा है वहीं, दूसरी ओर हवा, पानी और मिट्टी तक को ज़हरीला बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। इसीलिए वर्ष 2020 की थीम रखी गई थी ‘‘पृथ्वी पर जीवन कायम रखना’’। दुर्भाग्यवश, वर्ष 2020 में कोरोना आपदा ने ज़मीनी प्रयासों के रास्ते में बड़ी बाधा पहुंचाई फिर भी दुनिया भर के वैज्ञानिक, पर्यावरणविद् और पर्यावरण वालेंटियर्स कोरोना आपदा से डरे बिना अपने उद्देश्य पर डटे रहे। 

प्रकृति मानव जीवन का आधार है। मनुष्य सभ्यता के विकास से ही प्रकृति पर निर्भर है और प्राकृतिक संसाधनों का  प्रयोग करता है। हाल ही के दशकों में मानव सभ्यता ने प्राकृतिक संसाधनों का बहुत अधिक दोहन शुरू कर दिया गया। बड़े-बड़े जंगलों को खत्म कर दिया गया। ऐसे ही कितने ही जीव-जंतुओं का शिकार इस हद तक किया गया कि वह विलुप्त होने की कगार में हैं और कुछ तो विलुप्त भी हो गए। प्रदूषण लगातार बढ़ता जा रहा है जिससे प्रकृति में नकारात्मक बदलाव हो रहा है और ग्लोवर वार्मिंग जैसे भयावह परिणाम देखने को मिल रहे हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार समुद्री जीवों पर सबसे ज्यादा असर पड़ा है। सबसे ज्यादा दोहन समुद्री जीवों का  किया जाता है साथ ही समुद्र में ही सबसे अधिक प्रदूषण भी है। जिसका परिणाम यह है कि तटीय क्षेत्र की सैकड़ों प्रजातियां आज लुप्त होने की कगार में हैं। इसीलिए इस साल, 2021 में विश्व वन्यजीव दिवस की थीम रखी गई है-‘‘ वन और आजीविका: लोगों और ग्रह को बनाए रखना’’ (फारेस्ट एंड लीवलीहुड्स: संस्टेनिंग प्यूपिल एंड प्लेनेट)। यह थीम हमारे ग्रह के वन और वानिकी की स्थिति और इन पर निर्भर रहने वाले लाखों लोगों की आजीविका के संरक्षण पर आधारित है। सरल शब्दों में कहें तो जंगल और रोज़गार इस पृथ्वी के निवासियों के लिए जिससे पृथ्वी पर जीवन बचा रहे। पृथ्वी और पृथ्वी पर जीवन की रक्षा के लिए हर प्रयास किया जाना जरूरी है आखिर हर व्यक्ति मंगल या किसी और ग्रह पर तो नहीं जा सकेगा। इसीलिए विश्व वन्यजीव दिवस हर व्यक्ति से पृथ्वी को बचाने के लिए उत्सव नहीं ईमानदार प्रयासों की मांग करता है।
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प्रिय ब्लॉग साथियों, मेरा यह लेख आज वेब मैग्जीन "युवाप्रवर्तक" में भी प्रकाशित हुआ है। अवलोकनार्थ लिंक दे रही हूं -

हार्दिक आभार युवाप्रवर्तक 🙏

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#विश्व_वन्यजीव_दिवस 

Friday, February 19, 2021

नमामि देवी नर्मदे | विशेष लेख | नर्मदा जयंती | डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh

प्रिय ब्लॉग पाठकों, नर्मदा जयंती की हार्दिक शुभकामनाएं 🙏

   नर्मदा जयंती पर प्रस्तुत है मेरा यह विशेष लेख, जिसे जनसंपर्क विभाग, मध्यप्रदेश शासन, सागर द्वारा अपने फेसबुक पेजों पर भी अपलोड किया गया है। 



नर्मदा जयंती पर विशेष लेख

    नमामि देवी नर्मदे !

                  - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

आज 19 फरवरी 2021 को नर्मदा जयंती है। सागर जिले सहित समूचे बुंदेलखंड, समूचे मध्यप्रदेश में नर्मदा जयंती धूम-धाम से मनाई जाती है। यूं भी नर्मदा का उद्गम स्थल अमरकंटक मध्यप्रदेश में स्थित होने के कारण यह पर्व मध्यप्रदेशवासियों के लिए विशेष महत्त्व रखता है। नर्मदातट पर बसे शहरों व स्थानों  जैसे होशंगाबाद (नर्मदापुर), महेश्वर, अमरकण्टक, ओंकारेश्वर आदि सहित नर्मदा तट से दूर बसे शहरों व स्थानों में भी नर्मदा जयंती विधि-विधान से मनाई जाती है। इस दिन प्रातःकाल मां नर्मदा का पूजन-अर्चन व अभिषेक प्रारंभ हो जाता है। सायंकाल नर्मदा तट पर दीपदान कर दीपमालिकाएं सजाई जाती हैं। ग्रामीण अंचलों में भंडारे व भजन-कीर्तन का आयोजन किया जाता है। नर्मदा के प्रति अटूट श्रद्धा के एक नहीं अनेक कारण हैं। पूरे विश्व में मां नर्मदा ही एकमात्र ऐसी नदी हैं जिनकी परिक्रमा की जाती है। मां नर्मदा सात पवित्रतम नदियों में से एक हैं-
गंगे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वती, 
नर्मदा सिन्धु कावेरी जलेस्मित सन्निधिकुरुः।। 

शास्त्रों के अनुसार मां नर्मदा के दर्शन मात्र से पुण्यफल प्राप्त होता है -

त्रिभिः सारस्वतं पुण्यं सप्ताहेन तु यामुनम।
सद्यः पुनाति गांग्गेय दर्शनादेव नर्मदा।।

अर्थात् सरस्वती का जल तीन दिन में, यमुना का जल एक सप्ताह में, गंगाजल स्नान करते ही पवित्र करता है किन्तु मां नर्मदा के जल का दर्शन मात्र ही पवित्र करने वाला होता है। कलियुग में मां नर्मदा के दर्शन मात्र से तीन जन्म के और नर्मदा स्नान से हजार जन्मों के पापों की निवृत्ति होती है।

नमामि देवी नर्मदे

नर्मदा मात्र एक नदी नहीं अपितु संस्कृति का उद्गम है, आस्था का प्रतीक है और इसके तट पर बसने वाले मनुष्यों की जीवन रेखा है। नर्मदा मैकल पर्वत के अमरकण्टक शिखर से निकल कर मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र तथा गुजरात राज्यों को सिंचित करती हुई भरुच में पहुंच कर खम्बात की खाड़ी में सागर से जा मिलती है। नर्मदा के तट पर प्रागैतिहासिक मानवों ने आश्रय पाया था। नर्मदा के प्रति अपनत्व और श्रद्धा रखने वाले आज भी इसे अपनी मां-पिता के समान मानते हैं। नर्मदा-स्नान के लिए पहुंचने वाले श्रद्धालु जब इसके घाटों पर पहुंचते हें तो जो उनकी भावुक मनोदशा होती है उसका वर्णन इस बुंदेली ‘बम्बुलिया’ लोकगीत में बखूबी मिलता है-
नरबदा मैया ऐसे तो मिली रे
ऐसे तो मिलीं के जैसे मिले
मताई औ बाप, रे
नरबदा मैया हो....

नर्मदा की जलधाराएं आध्यात्मिक ऊर्जा से भर देती हैं, ये तन-मन को तरोताज़ा कर देती हैं। कालिदास के मेघदूत ने भी अपनी थकान मिटाने के लिए नर्मदा के उद्गम क्षेत्र अमरकंटक को ही अपना पड़ाव बनाया था। नर्मदा भारत की वह इकलौती नदी है, जो पूर्व से पश्चिम की ओर बहती है। इसका जन्म किसी ग्लैशियर से नहीं हुआ है बल्कि यह वनाच्छादित पर्वत से निकली है। इसीलिए इसकी जलधाराएं गंगा आदि अन्य नदियों की जलधाराओं की अपेक्षा शांत हैं। यही कारण है कि मन को एकाग्रता देने के इच्छुक नर्मदा के तट को ध्यान-योग के अधिक उपयुक्त मानते हैं। इसकी जलधाराओं को देख कर मिलने वाली शांति मन को अलौकिक-सी अद्भुत अनुभूति प्रदान करती है।

नर्मदा से जुड़ी आस्था और श्रद्धा इसे विशेष नदी का स्थान दिलाती है। माघ मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी को मनाई जाती है- नर्मदा जयंती। नर्मदा के जन्म के संबंध में अनेक रोचक कथाएं प्रचलित हैं। एक कथा के अनुसार अंधकासुर का वध करने के बाद शिव मैकल पर्वत पर समाधिस्थ थे। तभी ब्रह्मा, विष्णु सहित सभी देवता उनसे मिलने आए। देवताओं ने शिव से पूछा कि-‘हे भगवन! हम देवता भोगों में रत रहने से, बहुत-से राक्षसों का वध करने के कारण हमने अनेक पाप किए हैं, उनका निवारण कैसे होगा आप ही कुछ उपाय बताइए, तब शिवजी की भृकुटि से एक तेजोमय पसीने की बूंद पृथ्वी पर गिरी और कुछ ही देर बाद एक कन्या के रूप में परिवर्तित हो गई। उस कन्या का नाम नर्मदा रखा गया। सभी देवताओं ने उसे आशीर्वाद दिया। वह दिन था माघ शुक्ल सप्तमी का। उस दिन नर्मदा ने नदी के रूप में धरती पर बहना आरंभ किया। इसीलिए इस तिथि को नर्मदा अवतरण दिवस के रूप में मनाया जाता है।

नमामि देवी नर्मदे

एक अन्य कथा के अनुसार तपस्या में बैठे शिव के पसीने से नर्मदा प्रकट हुई। नर्मदा ने प्रकट होते ही अपने अलौकिक सौंदर्य से ऐसी चमत्कारी लीलाएं प्रस्तुत कीं, जिन्हें देख कर स्वयं शिव-पार्वती चकित रह गए। उन लीलाओं को देख कर उनके मन में सुख का संचार हुआ। इसलिए उन्होंने नामकरण किया ‘नर्म’ अर्थात् सुख और ‘दा’ अर्थात् देने वाली -‘नर्मदा’।

नर्मदा के अवतरण के संबंध में ‘स्कंद’ पुराण में भी एक रोचक कथा मिलती है। इस कथा में कहा गया है कि राजा हिरण्यतेजा ने चौदह हजार वर्ष तक भगवान शिव की कठिन तपस्या की। तपस्या से  शिव प्रसन्न हो गए। तब राजा ने शिव से प्रार्थना की कि वे एक ऐसी नदी पृथ्वी पर प्रवाहित करें जो भूमि को सिंचित करे, पापों का प्रक्षालन करे और सभी प्रकार के सुख प्रदान करे। तब शिव ने नर्मदा को धरती पर अवतरित किया। वे मगरमच्छ पर सवार हो कर उदयाचल पर्वत पर उतरीं और पश्चिम दिशा की ओर प्रवाहित हुईं। उसी समय विष्णु ने नर्मदा को आशीर्वाद दिया कि -
नर्मदे त्वें माहभागा सर्व पापहरि भव। 
त्वदत्सु याः शिलाः सर्वा शिव कल्पा भवन्तु ताः।
   अर्थात् तुम सभी पापों का हरण करने वाली होगी तथा तुम्हारे जल के पत्थर शिव-तुल्य पूजे जाएंगे। तब नर्मदा ने शिवजी से वर मांगा कि जैसे उत्तर में गंगा स्वर्ग से आकर प्रसिद्ध हुई है, उसी प्रकार से मैं भी दक्षिण गंगा के नाम से प्रसिद्ध होऊं। शिवजी ने नर्मदाजी को अजर-अमर होने तथा प्रलयकाल तक इस धरती पर रह कर आदर, सम्मान पाने का वरदान दिया।
नर्मदा की कथाएं जनमानस के लिए उन अनमोल विचारों की तरह हैं जो उन्हें प्रकृति का सम्मान और संरक्षण करने के लिए प्रेरित करती हैं। इसीलिए तो जनमानस स्तुति कर उठता है-
त्वदीय पाद पंकजम नमामि देवी नर्मदे
नमामि देवी नर्मदे,   नमामि देवी नर्मदे

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Saturday, August 15, 2020

स्वतंत्रता : मात्र एक शब्द नहीं - डाॅ शरद सिंह, सागर दिनकर में प्रकाशित विशेष लेख

 

 स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं
🌷इस अवसर पर पढ़िए मेरा विशेष लेख...


        स्वतंत्रता: मात्र एक शब्द नहीं
            - डाॅ शरद सिंह


    स्वतंत्रता, आज़ादी, इंडेपेंडेंस - हर भाषा में अलग शब्द लेकिन भावना एक ही है जिसका अर्थ है बोलने, लिखने, पढ़ने और अपने ढंग से जीने की स्वतंत्रता। जी हां, स्वतंत्रता मात्र एक शब्द नहीं है, यह तो मानव जीवन की मूल भावना है। इसीलिए जब कोई इस मूल भावना का दुरुपयोग करने की कोशिश करता है तो वह अपने जीवन का दुरुपयोग कर रहा होता है। इसीलिए स्वतंत्रता शब्द के मूलभाव को आज समझने की बहुत ज़रूरत है। 

आज यदि किसी से पूछा जाए कि स्वतंत्रता का क्या अर्थ है तो वह बेहिचक धाराप्रवाह अपनी व्यक्तिगत स्वतंत्रता की बातें करने लगेगा। यदि वह युवा है और उसके माता-पिता उस पर अंकुश रखते हैं तो वह अपने माता-पिता के अंकुश से स्वतंत्र होने की बात करेगा। यदि कोई व्यक्ति पारिवारिक पेरेशानियों में फंसा हुआ है तो उन परेशानियों से मुक्ति में ही उसे अपनी स्वतंत्रता दिखाई देगी। यदि कोई आॅफिस के कामों के बोझ से लदा हुआ है तो उसके लिए उस बोझ से मुक्ति ही स्वतंत्रता है। यानी आज हम स्वतंत्रता के निहायत व्यक्तिगत संस्करणों के साथ जीने लगे हैं। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि हमने अपनी आंखों से स्वतंत्रता आंदोलन नहीं देखा है। जिन्होंने देखा है, वे हमारे बुजुर्ग हैं और हमारे पास उनके संस्मरण सुनने, उनसे अंाखों देखा हाल जानने की फुर्सत नहीं है। ऐसी दशा में हम स्वतंत्रता को स्वतंत्रता दिवस से जोड़ कर एक दिन के लिए समारोही हो जाना पसंद करते हैं, उससे आगे हमें सोचने की फुर्सत नहीं होती है। जबकि स्वतंत्रता मात्र एक शब्द नहीं है, यह अपने आप में एक ऐसी व्यवस्था है जो मनुष्य को मनुष्य होने का बोध कराती है।

      यदि आज टिक-टाॅक या व्हाट्सएप्प पर नियंत्रण की बात आती है तो हमें लगता है कि हमारी स्वतंत्रता छिनी जा रही है। अभी साल-डेढ़ साल पहले यही हुआ। व्हाट्एप्प पर पांच से अधिक मैसेजे एक साथ करने पर पाबंदी लगा दी गई। जिस पर व्हाट्सएप्प यूज़र को लगा कि उनकी स्वतंत्रता को सीमित कर दिया गया है। एक बौखलाहट भरा स्वर उभरा लेकिन जल्दी ही यह स्वर शांत भी हो गया क्योंकि लोगों ने इस वास्तविकता को स्वीकार किया कि माॅबलिचिंग के कारण ऐसी पाबंदी लगाई गई थी। किसी भी घटना के होने और उसे समझने के बीच ही सारी कठिनाइयां छिपी रहती हैं जैसे ही बात समझ में आ जाती है मुश्क़िलें भी दूर होने लगती हैं। इसीलिए हमें समझना होगा कि स्वतंत्रता का वास्तविक अर्थ हमारी व्यक्तिगत स्वतंत्रता नहीं बल्कि देश की स्वतंत्रता  है। यदि देश स्वतंत्र है तो हम स्वतंत्र हैं। इसलिए देश की स्वतंत्रता को बनाए रखने के लिए उस स्वतंत्रता के प्रति जो भी जरूरी है वह हमें करना होगा। जैसे-आत्मनिर्भरता, आत्मसंयम, समझदारी, अपने मतदान अधिकार का सही प्रयोग, गलत बातों का खुल कर विरोध, अच्छी बातों का मुखर हो कर समर्थन आदि।

मुखर होने का मतलब यह नहीं है कि जो जी में आए वह अनाप-शनाप बका जाए। इनदिनों टेलीविज़न के अधिकांश समाचार चैनलों में जिस तरह की डिबेट होती है उसे देख-सुन कर यही लगता है जैसे इंसान आपस में चर्चा नहीं कर रहे हैं बल्कि जानवर एक दूसरे पर चींख-चिल्ला रहे हैं। एक तो उनकी चींख-चिल्लाहट में आवाजें एक-दूसरे पर इतनी बोव्हरलेप होती हैं कि उन्हें समझना कठिन रहता है। यदि समझ में आ भी जाएं तो यह समझ में नहीं आता है कि वे डिबेटियर्स मूल मुद्दे से भटक कर कितनी दूर निकल गए हैं। यदि राजनीतिक डिबेट हुई तो एक-दूसरे के नेताओं की जन्मपत्रियां खुलने लगती हैं। भले ही उससे मूल विषय का कोई सरोकार न हो। यह आमजन को भटकाने का बड़ा सुंदर तरीका है जो बोलने की स्वतंत्रता का लाभ उठाते हुए अपना लिया गया है। एक डिबेटियर की हार्टअटैक से मौत के बाद स्थिति की गंभीरता को समझते हुए इलेक्ट्राॅनिक मीडिया को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दुरुपयोग करने से स्वयं को रोकना होगा, इसके पहले कि किसी कठोर कानून के शिकंजे में उन्हें जकड़ा जाए।   

जब हम स्वतंत्रता की बात करते हैं तो आर्थिक स्वतंत्रता भी मायने रखती है। इसी से शुरू होता है आत्मनिर्भरता का सफर। देखा जाए तो आत्मनिर्भरता और आर्थिक स्वतंत्रता एक-दूसरे के पूरक हैं। यदि हम आत्मनिर्भर हैं तो हम स्वतंत्रतापूर्वक अपने आर्थिक संसाधनों का उपभोग कर सकते हैं। वहीं यदि हम अपने आर्थिक संसाधनों पूरा उपयोग करते हुए स्वदेशी को महत्व देंगे तो आत्मनिर्भरता बढ़ती जाएगी। यदि चीन दुनिया के बाज़ार पर पांव पसार सकता है तो हम क्यों नहीं। हमारे यहां तो चीन से अधिक स्वतंत्रता है। लेकिन एक कमी है जिसके कारण हम चीन से पिछड़ जाते हैं। वह कारण है भ्रष्टाचार। भ्रष्टाचार ने आज तक हज़ारों उद्यमियों को पनपने से पहले ही तोड़ कर मसल दिया है। जब फाइलें ही आगे नहीं सरकेंगी तो उद्योग के पहिए कैसे घूमेंगे? ऐसे भ्रष्टाचारी तत्व जिस तरह स्वतंत्रता का दुरुपयोग करते हैं उसे देख कर बड़े-बुजुर्ग यह कहने को मजबूर हो जाते हैं कि इससे तो अंग्रेजों का जमाना अच्छा थां यदि हमारे बड़े-बुजुर्गों की यह पीड़ा हमारी चेतना को झकझोर नहीं पाती है तो इसका अर्थ है कि हम स्वतंत्रता का आदर करना ही नहीं जानते हैं। 
  
यदि बात हम अपने समाज की करें तो हमने सामाजिक स्वतंत्रता तो पाई है लेकिन जात-पांत, ऊंच-नीच, साम्प्रदायिकता आदि से आज भी मुक्त नहीं हुए हैं। आज भी हमारी चर्चा का विषय आरक्षण के मुद्दे पर अटका रहता है। उससे आगे सोचने की आदत हमें नहीं पड़ी है। क्योंकि राजनेता अपने निहित स्वार्थों के चलते आगे नहीं सोचने देना चाहते हैं। जहां हमें सामाजिक समानता ज़मीन पर खड़े होना चाहिए था वहां आज हम और भी छोटी-छोटी इकाइयों में बंटते जा रहे हैं। आज समाज का हर वर्ग अपने तरह का अलग-अलग वोट बैंक बन गया है। यही हाल धर्म का है। ईश्वर एक है के तथ्य को मानते हुए भी हर धर्म एक है को हम नहीं मान पाते हैं। हमारे भीतर के धार्मिक उन्माद को मिटाने के बजाए उसे बढ़ा कर हमें वोटबैंक में बदला जाता है और हम खुद को बदलने देते हैं। 
देश को स्वतंत्रता मिले 73 साल हो गए लेकिन आज भी हमारे देश में आए दिन बलात्कार के नृशंस अपराध होते रहते हैं जो स्त्री-प्रगति के चित्र पर रक्त के धब्बे के समान दिखाई देते हैं। स्वतंत्रता मिले 73 साल हो गए लेकिन आज भी बेरोजगारी युवाओं को निगलती जा रही है। सच तो यह है कि स्वतंत्रता मिले 73 साल हो गए लेकिन हम स्वतंत्रता के वास्तविक अर्थ को मानो भुलाते जा रहे हैं और स्वतंत्रता के नाम पर अनाचार को बढ़ते देख रहे हैं। यह वह स्वतंत्रता नहीं है जिसके लिए महात्मा गांधी ने डंडे खाए अथवा शहीदों ने फांसी के फंदे को हंसते-हंसते अपने गले में डाला। इसीलिए स्वतंत्रता शब्द के मूलभाव को आज समझने की बहुत ज़रूरत है कि स्वतंत्रता अधिकारों को पाने और उसके सदुपयोग में निहित होती है। स्वतंत्रता स्त्री के सम्मान और आत्मनिर्भरता में मौजूद होती है। स्वतंत्रता स्वस्थ वैचारिक बहस में फलती-फूलती है। जी हां, स्वतंत्रता मात्र एक शब्द नहीं है, यह तो मनुष्य को मनुष्य बनाए रखने वाला आत्मनियंत्रित तंत्र है जिसका पालन करना और सम्मान करना हमारा कर्त्तव्य है।     
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(दैनिक सागर दिनकर में 15.08.2020 को प्रकाशित)
#दैनिक #सागर_दिनकर #शरदसिंह #स्वतंत्रतादिवस #DrSharadSingh  #miss_sharad #IndependenceDay2020 #indepenceday

Wednesday, June 17, 2020

विशेष लेख - उपचुनाव के जोश में होश खोना जनता के लिए भारी ना पड़ जाए - डाॅ. ( सुश्री) शरद सिंह, दैनिक जागरण में प्रकाशित

Dr (Miss) Sharad Singh


उपचुनाव के जोश में होश खोना जनता के लिए भारी ना पड़ जाए - डाॅ. शरद सिंह

दैनिक जागरण में प्रकाशित मेरा यह लेख ... आप भी पढ़िए...


❗हार्दिक आभार "दैनिक जागरण"🙏
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विशेष लेख
उपचुनाव के जोश में होश खोना जनता के लिए भारी ना पड़ जाए
- डाॅ. ( सुश्री) शरद सिंह

नवाबों के जमाने की एक कहावत है कि जिन्हें नज़ला (सर्दी) हो उन्हें बारिश में छाता ले कर ही घर से निकलना चाहिए। यानी जिन्हें दल बदलने के बाद अंदर-बाहर दोनों ओर से विरोध की सुगबुगाहट झेलनी पड़ रही हो, उन्हें एक-एक कदम फूंक-फूंक कर रखना चाहिए। एक भी चूक सारे राजनीतिक समीकरण बिगाड़ सकती है। उस पर यदि यह चूक चुनावी तैयारी के जोश में होश खो कर कोरोना को दावत देने वाली हो तो समर्थकों और आमजनता को भी गहरे संकट में डाल सकती है।
जी हां, सुरखी उपचुनाव की तैयारियां गरमाने लगी हैं। राजनीतिक आयोजनों का सिलसिला शुरू हो गया है। कोरोना संक्रमण से बचाव को ध्यान में रखते हुए जहां केन्द्रीय स्तर पर वर्चुअल रैलियां निकाली जा रही हैं, वहीं सागर जिले में ‘‘भीड़-जोड़’’ आयोजन हो गया। वैसे सोशल डिस्टेंसिंग और मास्क को अनदेखा कर के जो भी राजनीतिक आयोजन हो रहे हैं, वे आग से खेलने से कम नहीं हैं। लेकिन सवाल यह है कि कोई भी सार्वजनिक आयोजन प्रशासन की अनुमति के बिना तो होता नहीं है तो फिर प्रशासन ऐसी गंभीर चूक होने कैसे दे रहा है? माॅनीटरिंग की कमी और तुरंत संज्ञान में लेने में ऐसी ढील आमजनता के संदर्भ में तो देखने को नहीं मिलती है।
इस बार कांग्रेस की बात में दम है। मामला भले ही राजनीतिक मुद्दे के तौर पर हो लेकिन कोरोना संक्रमण के कारण यह जनहित में अतिसंवेदनशील भी है। मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी के कार्यकारी अध्यक्ष एवं पूर्व मंत्री सुरेंद्र चौधरी और सागर जिला ग्रामीण कांग्रेस के अध्यक्ष नरेश जैन आदि कांग्रेसी नेताओं ने आरोप लगाया है कि कोरोना वायरस को लेकर जारी केंद्रीय गाइड लाइन का खुला कर मंत्री गोविंद सिंह राजपूत द्वारा बिना अनुमति के राजनैतिक आयोजन किया गया। कांग्रेसी नेताओं ने मंत्री गोविंद सिंह राजपूत पर प्रकरण दर्ज करने की मांग शासन प्रशासन से की। मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी के कार्यकारी अध्यउल्लंघनक्ष सुरेंद्र चौधरी के अनुसार विगत 13 जून को मंत्री गोविंद सिंह राजपूत ने सैकड़ों लोगों को एकत्रित कर राहतगढ़ में भारतीय जनता पार्टी की सदस्यता ग्रहण का कार्यक्रम आयोजित किया जो विभिन्न दैनिक समाचार पत्रों के साथ-साथ सोशल मीडिया पर भी प्रसारित हुआ। सुरेंद्र चौधरी ने प्रमाण सहित यह बात सामने रखी और जिला प्रशासन की कार्यप्रणाली पर निशाना साधा कि भगवान महावीर स्वामी की जयंती मनाने वालों पर प्रकरण दर्ज कर दिया गया, बंडा में जैन मुनि जी के दर्शन करने पहुंचे लोगों पर मुकदमा दर्ज कर दिया गया, यहां तक कि शवयात्रा में जाने वालों पर भी मामला दर्ज कर दिया गया लेकिन राहतगढ़ सहित अन्य स्थानों पर बिना अनुमति के भारतीय जनता पार्टी के राजनैतिक आयोजन कर शासन की गाइड लाइन की सरेआम धज्जियां उड़ाने की खुली छूट प्रशासन द्वारा दी गई। उल्लेखनीय है कि विगत मई माह में सागर जिले के बंडा में जैनमुनि प्रमाण सागर महाराज और अन्य मुनि विहार करते हुए पहुंचे थे। उनके दर्शनों के लिए बंडा के हज़ारों लोग सड़कों पर उतर आए। उस समय यह मामला बहुत गरमाया था। जब भीड़ का वीडियो सामने आया तो पुलिस व प्रशासन ने इस मामले की जांच शुरू की थी।
सागर जिला ग्रामीण कांग्रेस के अध्यक्ष नरेश जैन ने भी जिला प्रशासन पर आक्षेप लगाया है कि आमजन पर तो गाइडलाइन का पालन करने के लिए सख्ती बरती जाती है जबकि भारतीय जनता पार्टी के लोग शासन की गाइड लाइन का पालन करने के बजाय बिना अनुमति के राजनैतिक आयोजन करते रहते हैं और प्रशासन मौन रहता है। भले ही यह आरोप राजनीति प्रेरित हो लेकिन ध्यान देने योग्य है। आखिर मामला जानलेवा कोरोना वायरस के संक्रमण के फैलाव से जुड़ा हुआ है। इस समय कोई भी जोखिम उचित नहीं ठहराया जा सकता है। यूं भी कोरोना वायरस से संक्रमित व्यक्तियों की संख्या को लेकर सागर की स्थिति अभी सुधरी नहीं है। संक्रमण रोकने की दृष्टि से जिले के अनेक क्षेत्र चौदह दिन से भी अधिक समय से कन्टेमेंट क्षेत्र बने हुए हैं। कन्टेमेंट क्षेत्र की जनता खामोशी से असुविधाओं का सामना कर रही है क्योंकि सवाल संक्रमण को फैलने से रोकने का है।
यहां याद दिलाना ज़रूरी है कि सागर कलेक्टर के आदेश के अनुसार बिना मास्क पहने बाहर निकलने वालों पर सख्त कार्रवाई के साथ ही जुर्माने का प्रावधान है। नियमों का पालन हो सके इसके लिए जिले के संबंधित अधिकारियों को भी निर्देश दिया जा चुका है। जिले में कन्टेमेंट का उल्लंघन करने और बिना काम के बाहर निकलने वालों के खिलाफ भी सख्त कार्रवाई के आदेश हैं। कोरोना से बचाव के लिए सुरक्षा नियमों का पालन हो सके इसके लिए जिले की पुलिस को अलर्ट पर रखा गया है। यह सब कुछ प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार किया है आमजनता ने। लोगों के मन में संक्रमण का डर अभी भी मौजूद है। हो भी क्यों न, आखिर उन्होंने अपने बीच के लोगों को कोरोना से संक्रमित होते देखा है। फिर भी कुछ नासमझ अपनी नासमझी दिखा ही देते हैं। लॉकडाउन खुलने के बाद करीब 70-80 फीसदी शहरवासी प्रतिदिन अपने घर से बाहर निकल रहे हैं। उनमें ऐसे भी लोग हैं जो बाजारों में खरीदारी के दौरान शारीरिक दूरी का पालन नहीं करते हैं। कुछ लोग मास्क लगाने में भी लापरवाही कर रहे हैं। नतीजतन कोरोना संक्रमण की जकड़ में आ रहे हैं और संक्रमितों के आंकड़े बढ़ते जा रहे हैं।
जब कोरोना वायरस के संक्रमण का खतरा अभी गहराया हुआ हो तो ऐसे में प्रत्येक राजनीतिक दल के नेताओं को अपनी जिम्मेदारी का ध्यान रखते हुए आपदा नियमों का गंभीरता से पालन करना चाहिए। भावी चुनाव के जोश में होश खोना जनता के लिए भारी पड़ सकता है। इस समय संयम ही सबसे बड़ा शस्त्र है जिससे कोरोना को हराया जा सकता है।
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Josh me Hosh khona Janta Ke Liye Bhari na par Jaye - Dr Sharad Singh, Jagaran, 17.06.2020

(दैनिक जागरण में 17.06.2020 को प्रकाशित)
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विशेष लेख - एक सबक है सुशांत का जाना - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह, दैनिक जागरण में प्रकाशित

Dr (Miss) Sharad Singh


दैनिक जागरण में प्रकाशित मेरा यह लेख ... आप भी पढ़िए...

❗हार्दिक आभार "दैनिक जागरण"🙏

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विशेष लेख
एक सबक है सुशांत का जाना
- डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह

विशेषरूप से युवावर्ग सुशांत के इस तरह जाने से सबक ले और इस बात को गांठ में बांध ले कि अपनों से दूर रह कर पैसा और प्रसिद्धि अकेलापन और अवसाद देती है मन का सुकून नहीं। चांद पर प्लाट खरीदने की क्षमता भी कभी-कभी ज़िन्दगी जीने की इच्छा को मार देती है।


वह व्यक्ति मज़दूर या कामगार नहीं था जिसे लाॅकडाउन में अपने रोजगार और घर से विस्थापित हो कर सैंकड़ों किलोमीटर का पैदल सफ़र करना पड़ा हो। अपने अभिनय के दम पर उसने इतना धन कमा लिया था कि जिससे वह चांद पर भी प्लाट खरीद सका। जी हां, #बाॅलीवुड #अभिनेता #सुशांत_सिंह_राजपूत। एक करोड़पति अभिनेता। इंडियन #क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान महेंद्र सिंह #धोनी के जीवन पर बनी फिल्म में उन्होंने लीड रोल निभाया था। सुशांत सिंह राजपूत एक फिल्म के लिए 5 से 7 करोड़ रुपये लेते थे। वहीं, विज्ञापन के लिए 1 करोड़ रुपये तक लेते थे। उन्होंने कई रीयल एस्टेट प्रॉपर्टीज में भी निवेश किया हुआ था। बताया जाता है कि उनकी कुल संपत्ति 80 लाख डॉलर यानी 60 करोड़ रुपये से भी अधिक थी। उनकी फिल्म ‘एमएस धोनी’ ने कुल 220 करोड़ रुपये की कमाई की थी। सुशांत सिंह राजपूत ने 34 वर्ष की छोटी-सी आयु में फिल्मों, विज्ञापनों और निवेश के जरिए करोड़ों कमाए। बॉलीवुड के दूसरे सेलेब्रिटीज की तरह सुशांत भी मुंबई के पॉश इलाके बांद्रा में आलीशान घर में रहते थे। उन्हें कारों और बाइक्स का भी काफी शौक था। इसलिए उनके पास कारों की पूरी फ्लीट थी।


सफलता सुशांत सिंह राजपूत के कदम चूम रही थी। उनकी हर फिल्म कमाई का नया रिकॉर्ड बना रही थी। ऐसे में उनकी फीस भी लगातार बढ़ती जा रही थी। कहीं कोई आर्थिक तंगी का मसला नहीं। असफलता का मसला भी नहीं। फिर भी इस युवा अभिनेता ने आत्महत्या जैसा #पलायनवादी कदम उठाया। आखिर क्यों? इस ‘क्यों’ का उत्तर सब ढूंढ रहे हैं। इस ‘क्यों’ का उत्तर शायद ही कभी मिले। लेकिन इस घटना से एक सबक ज़रूर मिला है कि पैसा और प्रसिद्धि भी वह सुख और शांति नहीं दे सकते हैं जो ज़िन्दगी से प्रेम करना सिखा सके।

Ek Sabak Hai Sushant Ka Jana - Dr (Miss) Sharad Singh, Dainik Jagaran, 16.06.2020
कुछ समय पहले सुशांत सिंह राजपूत की मैनेजर #दिशा_सलियन ने भी मुंबई में 12वीं मंजिल से कूदकर खुदकुशी कर ली थी। बताया जा रहा था कि वह अपने मंगेतर संग मुंबई के मलाड में रहती थीं। घटना की जानकारी मिलते ही उन्हें बोरिवली के हॉस्पिटल ले जाया गया जहां उन्हें मृत घोषित कर दिया गया था। आत्महत्या के पीछे अभी कोई भी वजह सामने नहीं आई। इससे पहले ‘क्राइम पेट्रोल’ एक्ट्रेस #प्रेक्षा_मेहता ने भी पंखे से लटककर खुदकुशी की थी। बॉलीवुड इस समय मुश्किल दौर से गुजर रहा है। कई #सेलेब्स ने काम न मिलने के चलते खुदकुशी की है। सोचने की बात है कि काम न मिलने की स्थिति में विस्थापित प्रवासी मज़दूरों ने आत्महत्या करने के बजाए डट कर संकट का सामना किया लेकिन ये सेलेब्स #हताशा और #अवसाद से घिर गए। आखिर इसकी वज़ह क्या हो सकती है?


आज के #बाजारवाद और #भौतिकतावाद के युग में हम जिस तरह पैसे और प्रसिद्धि के जाल में तेजी से जकड़़ते जा रहे हैं, वह हमें अपने आप से ही दूर करता जा रहा है। जिसके पास #पैसा या #प्रसिद्धि नहीं है, वह यही सोचता है कि इन दोनों से दुनिया की सारी खुशियां खरीदी जा सकती हैं, पाई जा सकती हैं। लेकिन सच्चाई यही है कि यह दोनों सबसे पहले अपनों से दूर करना शुरू कर देते हैं। इसके बाद खुद पर से भी ध्यान हटता जाता है क्योंकि लक्ष्य ‘‘स्वांतः सुखाय’’ आए नहीं बल्कि ‘‘दुनिया दिखाय’’ हो जाता है। प्रदर्शन का मोह हमें भला और बुरा सोचने का अवसर नहीं देता है। वहीं दूसरी ओर जब व्यक्ति इस प्रदर्शन के #मायाजाल में लिपटकर गलत-सही कर्मों में भेद करना भी छोड़ देते हैं, तब वे अनचाही परिस्थितियों के संजाल में उलझते जाते हैं। जहां से अवसाद की यात्रा शुरू होती है। अपने ही हाथों कमाया गया एकाकीपन व्यक्ति को वह अवसाद की ओर धकेलता जाता है। एक स्थिति वह आती है जब व्यक्ति आत्महत्या की ओर अपने क़दम बढ़ा देता है। अपने ही हाथों अपनी जीवन लीला समाप्त कर लेता है। यही तो किया बॉलीवुड अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत ने। सुशांत ने पंखे में लटक कर आत्महत्या कर ली। वे पिछले छः माह से अधिक समय से अवसाद दूर करने की दवा खा रहे थे।



वह मानसिक स्थिति जब इंसान सही और गलत में भेद नहीं कर पाता है और अपने भ्रम पर ही अटूट विश्वास करने लगता है, उसी स्थिति में वह आत्मघात जैसे कदम उठाता है। #मनोवैज्ञानिक इस स्थिति को #सीजोफ्रेनिया कहते हैं। यह भ्रम को सच मान लेने की चरम स्थिति है। मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि सीजोफ्रेनिया का मनोरोग आत्मीयता और प्रेम पा कर ठीक होने लगता है। लेकिन यह आत्मीयता भौतिकतावाद की दौड़ में तेजी से गुम होती जा रही है। अगर अवसाद (डिप्रेशन) की स्थिति घेरने लगे तो अपनी समस्याएं बेझिझक अपनो से साझा करें और अपनो के निकट रहें। आखिर सुशांत सिंह राजपूत ने जो आत्मघाती कदम उठाया उससे उनके करोड़ों फैन्स तो आहत हुए ही, वे अपनी बहनों और पिता के सीने पर दुखों का पहाड़ छोड़ जाने के अपराधी हैं। इसीलिए जरूरी है कि किसी भी प्रकार का आत्मघाती विचार आते ही पहले अपने परिवार और मित्रों के बारे में सोचना चाहिए कि वे इस दुख को कैसे झेलेंगे। यही समय है कि विशेष रूप से युवावर्ग सुशांत के इस तरह जाने से सबक ले और इस बात को गांठ में बांध ले कि अपनों से दूर रह कर पैसा और प्रसिद्धि अकेलापन और अवसाद देती है मन का सुकून नहीं।
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(दैनिक जागरण में 16.06.2020 को प्रकाशित)
#लॉकडाउन #दैनिकजागरण #शरदसिंह #DrSharadSingh #miss_sharad #कोरोना #postforawareness #अनलॉक
Late Sushant Singh Rajput Bolywood Actor

Friday, May 29, 2020

विशेष लेख : परीक्षा, प्रमोशन और पाॅलिटिक्स - डाॅ शरद सिंह


Dr (Miss) Sharad Singh
विशेष लेख    
परीक्षा, प्रमोशन और पाॅलिटिक्स
           - डाॅ शरद सिंह
             स्कूल से लेकर काॅलेज तक की परीक्षाओं को ले कर घमासान छिड़ा हुआ है। कुछ स्टूडेंट्स फेडरेशन चाहते हैं कि कोरोना लाॅकडाउन और कोरोना के संकट को देखते हुए छात्रों को परीक्षा में जरनल प्रमोशन दे दिया जाए। वहीं प्रशासन, अभिभावक और विद्यार्थियों का एक बड़ा प्रतिशत चाहता है कि परीक्षाएं होनी चाहिए। मध्यप्रदेश में जरनल प्रमोशन के पक्षधर ‘‘हैशटैग जरनल प्रमोशन टू एम पी स्टूडेंट्स’’ पर समर्थन में सोशल मीडिया अभियान चला रहे हैं। वहीं प्रदेश के मुख्यमंत्री ने परीक्षाएं कराए जाने का निर्णय ले लिया है। तारीखें भी तय कर दी गई हैं। ऐसे में राजनीति न गरमाए, यह हो नहीं सकता। ज़ाहिर है कि एक बार फिर प्रतिभाशाली छात्र राजनीति के दो पाटों के बीच खड़े दिखाई दे रहे हैं। 

इन दिनों कुछ स्टूडेंट्स फेडरेशन सोशल मीडिया पर ‘‘हैशटैग जरनल प्रमोशन टू एम पी स्टूडेंट्स’’ ट्रेंड कराकर सुरक्षा की दृष्टि से और अलग-अलग परेशानियां बताकर जनरल प्रमोशन की मांग कर रहे हैं। यह सीएम और राज्यपाल को बताना चाह रहे हैं कि आईआईटी बॉम्बे जैसे संस्थानों ने स्टूडेंट्स को जनरल प्रमोशन देने का निर्णय लिया है। यह सभी की सुरक्षा के लिए बेहतर है। छात्र बड़ी संख्या में अपनी बात रख रहे हैं। उनके पास बड़े ठोस तर्क हैं। उनमें सबसे बड़ा तर्क है कोरोना वायस के संक्रमण का। इस बीच मध्यप्रदेश शासन के उच्च शिक्षा विभाग एवं माध्यमिक शिक्षा मंडल, मध्य प्रदेश ने यूजी और पीजी तथा 12वीं, हायर सेकेंडरी के बचे हुए पेपर कराने का फैसला लिया है। तारीखें घोषित कर दी गई है। इस निर्णय पर सलाह-मशविरा करने को सीएम शिवराज सिंह चैहान अधिकारियों के साथ राज्यपाल लालजी टंडन से मिलने पहुंचे थे। इसके बाद निर्णय को अंतिम रूप दिया गया कि मध्यप्रदेश की यूनिवर्सिटी और कॉलेजों में किसी भी कक्षा में जनरल प्रमोशन नहीं दिया जाएगा। कोरोना वायरस संक्रमण को रोकने के लिए लगाए गए लॉकडाउन को लेकर सभी परीक्षाओं को आगे बढ़ा दिया गया था। परीक्षा के दौरान शारीरिक दूरी के साथ अन्य नियमों का पालन भी करवाया जाएगा।
Charcha Plus Column of Dr (Miss) Sharad Singh, 29.05.2020
      राज्यपाल लालजी टंडन से मुलाकात के दौरान मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान ने इसके लिए सहमति दी है। अब उच्च शिक्षा विभाग जल्द ही निर्देश जारी करेगा। तकनीकी विश्वविद्यालय की परीक्षा 16 से 30 जून के बीच होगी। फर्स्ट ईयर में नए प्रवेश लेने वाले विद्यार्थियों का शिक्षण सत्र अक्टूबर से प्रारंभ होगा। प्रथम और द्वितीय वर्ष से द्वितीय और तृतीय वर्ष में जाने वाले विद्यार्थियों का शैक्षणिक सत्र 1 सितंबर से प्रारंभ होगा। मध्य प्रदेश में स्नातक अंतिम वर्ष और स्नातकोत्तर अंतिम वर्ष की परीक्षाएं 29 जून से 31 जुलाई के बीच होंगी। बाकी परीक्षाएं कोरोना संक्रमण ठीक होने के बाद आयोजित की जाएंगी। किसी भी कक्षा में जनरल प्रमोशन नहीं दिया जाएगा। शैक्षणिक सत्र जुलाई के बाद शुरू हो जाएगा। वैसे एमपी बोर्ड ने तो संशोधित टाइम टेबल भी जारी कर दिया है लेकिन जैसे-जैसे परीक्षा की तारीख नजदीक आ रही है स्टूडेंट्स भड़कते जा रहे हैं। वह किसी भी कीमत पर परीक्षा देने को तैयार नहीं है। उनका कहना है कि यदि परीक्षा कक्ष में बैठने के कारण कोरोनावायरस का इंफेक्शन हो गया तो कौन जिम्मेदार होगा?

उल्लेखनीय है कि कोरोना वायरस के संक्रमण को रोकने के लिए देश में लॉकडाउन किया गया। लोगों का अपने घरों से बाहर निकलना सुरक्षित नहीं था। ऐसे में छात्रों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए और कोरोना वायरस के प्रसार को रोकने के लिए सभी राज्यों की तरह मध्यप्रदेश सरकार ने भी मार्च-अप्रैल में होने वाले शिक्षा कार्यक्रमों और परीक्षाओं को स्थगित कर दिया था। अब परिस्थितियों का आकलन करते हुए परीक्षा कराए जाने का निर्णय लिया गया। परीक्षा और जरनल प्रमोशन पर राजनीति करने वालों को सबसे बड़ा सहारा इस बात का मिला है कि परीक्षा के निर्णय को ले कर सभी राज्यों में एकरूपता नहीं है। महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में अलग-अलग नीतियां निर्धारित की जा रही हैं जिससे पक्ष-विपक्ष दोनों को अपने-अपने मतलब की सनद मिल रही है। मसलन वे उदाहरण दे-दे कर अपने तर्क प्रस्तुत कर रहे हैं। दरअसल छत्तीसगढ़ सरकार ने माध्यमिक शिक्षा के अध्य्यनरत छात्रों को जनरल प्रमोशन दिया हैं। एनएसयूआई के प्रदेश अध्यक्ष ने विश्वव्यापी महामारी कोविड 19 को मद्देनजर रखते हुए प्रदेश में सभी कॉलेजों के छात्रों को जनरल प्रमोशन दिए जाने को लेकर ज्ञापन सौंपा। इसके पहले छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस के छात्र संगठनों ने भी जनरल प्रमोशन देने की मांग की थी। एबीवीपी छात्र नेता व पं. रविशंकर शुक्ल विवि के पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष ने भी जनरल प्रमोशन देने की मांग उठाई थी।

इस बीच एक और मंथन चलता रहा। केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय की ओर से जारी दिशा निर्देशों के अनुसार अंतिम वर्ष के छात्रों को जनरल प्रमोशन नही दिया जाएगा, उन्हें भी इस महामारी में राहत दिलाने के लिए छात्रों ने परीक्षाओं का आयोजन होने पर इन छात्रों को परीक्षावार कोरोना बोनस अंक देने की मांग की है। इसके अंतर्गत जनरल प्रमोशन सिर्फ प्रथम और द्वितीय वर्ष के बीए, बीकॉम, बीएससी, बीबीए आदि कक्षाओं में दे सकते हैं। रहा मध्यप्रदेश में परीक्षाओं और पढ़ाई के सत्र का प्रश्न तो अब ग्रेजुएशन फाइनल ईयर और पोस्टग्रेजुएशन फाइनल ईयर की परीक्षाएं 29 जून से 31 जुलाई के बीच होंगी। किसी भी कक्षा में जनरल प्रमोशन नहीं दिया जाएगा। इधर सीबीएसई ने छात्रों को अपने निकट का परीक्षा सेंटर चुनने का विकल्प दे दिया है।

अब ध्यान दें परीक्षा पर पाॅलिटिक्स के प्रश्न पर, तो विचारणीय है कि जो दल छत्तीसगढ़ में जरनल प्रमोशन की मांग उठा रहे हैं वही दल मध्यप्रदेश में मांग क्यों नहीं उठा रहे हैं ? दरअसल, छात्रों को अपना भला-बुरा स्वयं तय करना चाहिए। उन्हें सरकारी व्यवस्थाओं पर भरोसा है और वे यह मानते हैं कि कोरोना संक्रमण से बचाव के सभी नियमों का पालन करते हुए सरकार उनकी परीक्षा ले सकती है तो उन्हें सरकार के क़दम का स्वागत करना चाहिए। यदि उन्हें सरकारी सुरक्षा व्यवस्थाओं पर संदेह है तो परीक्षा तिथियां बढ़वाने की मांग करनी चाहिए, जरनल प्रमोशन की नहीं। जरनल प्रमोशन कोई सम्मानजनक स्थिति नहीं है। जरनल प्रमोशन से आगे बढ़े हुए छात्रों की योग्यता पर निजी क्षेत्र शंका की दृष्टि से देखेंगे। यदि जरनल प्रमोशन होता है तो उन छात्रों की मेहनत पर पानी फिर जाएगा जो पढ़ाकू हैं और जिन्होंने इस कोरोना लाॅकडाउन के दौरान घर में रह कर जम कर पढ़ाई की है। आमतौर पर वे छात्र ही जरनल प्रमोशन की मांग के पक्ष में हैं जिन्होंने ढंग से पढ़ाई नहीं की है और अब जरनल प्रमोशन की बहती गंगा में नहा कर बिना परीक्षा के अगली कक्षा में पहुंच जाना चाहते हैं। छात्रों के भावी कैरियर के लिए जरनल प्रमोशन उचित नहीं ठहरता है। किन्तु जीवन की सुरक्षा से बढ़ कर कुछ नहीं होता है अतः यदि छात्रों को अपनी सुरक्षा का डर है तो उन्हें खुल कर अपनी बात प्रदेश सरकार के आगे स्वयं रखनी होगी। लेकिन जरनल प्रमोशन के मायाजाल को भुला कर। छात्रों को याद रखना ही होगा कि परीक्षाएं ही योग्यता को साबित करने का अवसर होती हैं और यह अवसर उन्हें राजनीतिक ‘‘तू-तू, मैं-मैं’’ में पड़ कर नहीं गंवाना चाहिए।          
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(दैनिक सागर दिनकर में 29.05.2020 को प्रकाशित)
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Thursday, May 21, 2020

विशेष लेख - कोरानाकाल के कलंक : धिक्कार है ऐसे लोगों को - डाॅ शरद सिंह


 Dr (Miss) Sharad Singh
विशेष लेख 
 कोरानाकाल के कलंक : 
           धिक्कार है ऐसे लोगों को
              - डाॅ शरद सिंह
      कोरोनाकाल समूची मानवजाति के लिए एक अभिशाप की तरह है। प्रत्येक व्यक्ति जब इससे जूझ रहा हो, डर के साए में जी रहा हो, ऐसे वातावरण में भी अपराधी मनोवृत्ति के लोग अपराध करने से बाज नहीं आ रहे हैं। यह उनके मानव होने को भी कलंकित करती है।  
      हाल ही में एक 24 वर्षाीय महिला जिसे कोरोना की संभावना के चलते क्वारंटाईन किया गया था घृणित अपराध की शिकार हो गई। जिस परिसर में उसे क्वारंटाईन किया गया था वहां नहाते समय दो युवकों ने उसकी वीडियो बना ली। इसके बाद वे युवक उस महिला पर अवैध शारीरिक संबंध बनाने के लिए दबाव बनाने लगे। साथ ही उन्होंने धमकी दी कि यदि उस महिला ने उनकी यह बात नहीं मानी तो वे वीडियो वायरल कर देंगे। यह अच्छी बात है कि उस महिला ने साहस की परिचय दिया और पुलिस के पास जा कर रिपोर्ट लिखा दी। इस घटना का अमानवीय पक्ष यह है कि एक कोरोना संभावित महिला जो स्वयं भयावह मानसिक दशा से गुज़र रही हो, उसे ब्लैकमेल करने का प्रयास किया गया। जबकि उसके प्रति सहानुभूति भरा दृष्टिकोण होना चाहिए था। दूसरा पक्ष यह भी कि उन हवस के अंधे युवकों को यह भी नज़र नहीं आया कि यदि कल को वह महिला कोरोना पाॅजिटिव निकलती है तो क्या वे उससे अवैध संबंध बनाने के बाद संक्रमण से अछूते रह जाएंगे? शायद ऐसे ही मानसिकता कें लोग छोटी बच्चियों को भी अपनी हवस का शिकार बनाते हैं। जिन्हें अपनी हवस के आगे उम्र, स्थिति, परिस्थिति, मानवता आदि कुछ भी दिखाई नहीं देती है। लानत है ऐसे लोगों को।
Charcha Plus, Column of Dr (Miss) Sharad Singh in Dainik Sagar Dinkar,  20.05.2020 
.         लाॅकडाउन के कारण अपराध का ग्राफ कुछ तो नीचे आया क्योंकि इस दौरान अधिकांश घर सूने नहीं रहे। लेकिन दूकानें चोरों कें लिए आसान निशाना रहीं। इस दौरान एक और तरह का अपराध तेजी से बढ़ा है। राष्ट्रीय महिला आयोग के आंकड़ों के अनुसार, फरवरी और मार्च की तुलना में अप्रैल में महिलाओं संबंधी साइबर क्राइम की संख्या बढ़ी है। 25 मार्च से 25 अप्रैल तक साइबर अपराध की कुल 412 शिकायतें मिली हैं जिनमें 396 शिकायतें अश्लील प्रदर्शन, अश्लील वीडियो, धमकी, फिरौती की मांग से लेकर ब्लैकमेल करना तक की थीं।  महिलाओं की तस्वीरों में छेड़-छाड़ कर उनकी मॉर्फ्ड तस्वीरों को इंटरनेट पर अपलोड करने की धमकी दिए जाने संबंधी शिकायतें मिलीं। जब पूरा देश बंद है, लोग घर से काम कर रहे हैं और इंटरनेट पर काफी समय बिता रहे हैं तो साईबर अपराधी भी सक्रिय हो गए हैं। हर किसी को जो इंटरनेट से जुड़ा है उसे भी सतर्क रहना होगा।

लाॅेकडाउन 1.0, 2.0, 3.0 और अब 4.0 में आम जन-जीवन की अधिकांश गतिविधियां बंद रहीं लेकिन अपराधियों की गतिविधियां इस दौरान भी ज़ारी रहीं। चरित्र पर संदेह के कारण हत्या, आपसी रंजिश के कारण हत्या, बेटे द्वारा पिता की हत्या, प्रेमियों द्वारा आत्महत्या, आर्थिक तंगी से परेशान हो कर आत्महत्या, बलात्कार, मारपीट, चोरी-डकैती थमी नहीं।

सागर शहर के भगवानगंज इलाके में आॅटोपार्टस और हार्डवेयर की कई छोटी-बड़ी दूकानें हैं। उनमें से एक दूकान में पिछवाड़े से दरवाज़ा तोड़ कर अज्ञात बदमाश घुस गए। उन्होंने दूकान के लाॅकर में रखे एक लाख सत्तर हज़ार रुपयों पर हाथ साफ़ कर दिया। भगवानगंज से ही लगे हुए इलाके सदर में एक सूने मकान से चोरों ने लगभग 80 हज़ार रुपए के सोने-चांदी के ज़ेवर चुरा लिए। उल्लेखनीय है कि यह सदर क्षेत्र इनदिनों कोरोना ब्लास्ट का केन्द्र होने और कंटनमेंट जोन बनने के कारण 24 घंटे पुलिस की सख्त निगरानी में है। जिनके घर से जेवर चोरी गए वे दम्पत्ति पिछले दो माह से शहर से बाहर थे। इसी सप्ताह घर लौटने पर उन्हें वरदात का पता चला।

चोरों के हौसले इतने बुलंद हैं कि उन्होंने सागर शहर के ही मोतीनगर थाना क्षेत्र में एक दालमिल के निकट के एक मंदिर के ताले तोड़ कर दानपेटी में रखी नगदी उड़ा दी। विडम्बना यह कि एक ओर मंदिर पुजारी संघ मंदिरों पर ताले डल जाने के कारण उत्पन्न अपने आर्थिक संकट के बारे में सरकार से गुहार लगाने को विवश हो गया और वहीं दूसरी ओर चोर-मंडली मंदिरों की दानपेटियों पर धावा बोल रही है।

बात अपराधियों के हौसलों की कही जाए तो दमोह के गैसाबाद थाना के हिनौता कला में एटीएम में की गई डकैती की चर्चा आएगी ही। हिनौता कला में रात 9.05 बजे एटीएम बूथ में लूट की वारदारत को फिल्मी स्टाईल अंजाम दिया गया। एटीएम बूथ में लूट की वारदात को अंजाम देने के लिए पहुंचे बदमाशों ने पहले बूथ में डायनामाइट फिट किया फिर उसमें बाइक से तार जोड़कर विस्फोट किया। शायद उन्हें इस बात की जानकारी थी कि बैंक के सीसीटीवी कैमरे बंद हैं। विस्फोट के कारण एटीएम में रखे रुपए हवा में उड़ने लगे। अपराधी उन्हें बटोरने में जुट गए। उसी दौरान ग्रामीणों ने विस्फोट की आवाज़ सुन कर एटीएम की ओर रुख किया लेकिन डकैतों ने माउजर लहरा कर ग्रामीणों को धमकाया और वहां से रुपए ले कर निकल गए।

कोरोना महामारी से बढ़ कर इस समय कोई संकट नहीं है। यह एक ऐसा संकट है जिसने सभी लोगों को एक ही नाव पर सवार कर दिया है। सोशल डिक्टेंसिंग, प्रवासी मजदूरों का सैंकड़ों की तादाद में सागर, दमोह, टीकमगढ़ से हो कर गुरज़ना। शहर के भीतरी तबके में कोरोना ब्लास्ट। कुलमिला कर संकटों की कोई कमी नहीं। लम्बे हो चले लाॅकडाउन से उकताई हुई जनता। बिना थके डटे हुए कोरोना वारियर्स। इस सारे परिदृश्य के बीच निरंतर बढ़ते अपराध के आंकड़े देख कर अपराधियों को कोसने का मन करता है। एक तो लोग पहले से परेशान हैं और उस पर आए दिन चोरों के धावे। इन चोरों, अपराधियों को शर्म भी नहीं आती है क्या? पुलिसतंत्र जनता की सुरक्षा हेतु लाॅकडाउन को टूटने से बचाने, आमजन की मदद करने में व्यस्त है। अब महाराष्ट्र तथा अन्य राज्यों से उत्तर प्रदेश के लिए सागर से हो कर गुज़रने वाले प्रवासी श्रमिकों को सुरक्षित उत्तर प्रदेश की सीमा तक पहुंचाने की जिम्मेदारी भी पुलिस पर ही है। अब वे कोरोना से जुड़ी व्यवस्थाएं सम्हालें या चोरों और अपराधियों के पीछे भागें? जब पूरा शहर, पूरा समाज, पूरी मानवता जीवन-संकट के दौर से गुज़र रही हो तब अपराध घटित होना मानवता पर दाग़ लगने के समान है। धिक्कार है ऐसे लोगों को जो मानवता के लिए संकट की घड़ी में अपराध जैसे अमानवीय कृत्य कर रहे हैं।
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(दैनिक सागर दिनकर में 20.05.2020 को प्रकाशित)
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Thursday, April 23, 2020

विश्व पुस्तक दिवस (23अप्रैल) पर विशेष लेख - किताबों की जादुई दुनिया - डॉ (सुश्री) शरद सिंह

web portal magazine हरमुद्दा.कॉम ने आज विश्व पुस्तक दिवस पर मेरा लेख "किताबों की जादुई दुनिया" अपने  दिनांक 23.04. 2020 के अंक में प्रकाशित किया है।
🚩हरमुद्दा.कॉम के प्रति हार्दिक आभार 🙏
आप इस Link पर भी मेरे इस लेख को पढ़ सकते हैं ...
https://harmudda.com/?p=17604
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विश्व पुस्तक दिवस (23अप्रैल) पर विशेष लेख -

*किताबों की जादुई दुनिया*
   *- डॉ (सुश्री) शरद सिंह*

       जिसने भी चार अक्षर का ज्ञान प्राप्त कर लिया हो वह किताबों की दुनिया में प्रवेश कर ही जाता है भले ही वह किताब आठ-दस पन्नों की  बुकलेट जैसी दुबली पतली किताब हो या कोर्स की जटिल अथवा साहित्य की मोटी-सी किताब हो । स्कूल के दिनों में अपनी किताबें होना बहुत सुखद अनुभूति देता है। स्कूल के दिनों में अपनी किताबों पर बड़े जतन से कवर चढ़ाना और उस पर अपना और अपनी कक्षा का नाम लिखना बहुत अच्छा लगता है। बचपन के दिन  स्कूली किताबों के अलावा  कॉमिक्स  और  बाल साहित्य  की पुस्तकों से  जुड़े रहते हैं। किताबों की दुनिया हमारे बचपन से ही हमें अपने आगोश में ले लेती है।  वह पुचकारती है, दुलारती है,  हमारी कल्पना शक्ति का विकास करती है  और हमें नित नई दुनिया से परिचित कराती है। वही समय होता है जब हम राजा-रानी के किस्से पढ़ते हैं, भूतों-प्रेतों के किस्से पढ़ते हैं, बहादुरी के किस्से पढ़ते हैं और अपने भय पर विजय पाते हुए अपने भीतर एक साहसी संसार गढ़ते हैं।
      स्कूल का समय पीछे छोड़ते हुए जब हम महाविद्यालय में पहुंचते हैं तो उस समय किताबों से भरे बस्ते का बोझ पीछे छूट जाता है और मिल जाती है किताबों की एक नई दुनिया, जो हमें पुस्तकालयों की ओर आकर्षित करती है। वह चाहे परंपरागत पुस्तकालय हो या आजकल के ऑनलाइन डिजिटल पुस्तकालय। किताबें पढ़ने की इच्छा कभी समाप्त नहीं होती। भले ही हम काग़ज़ पर छपी हुई पुस्तकें पढ़ें या कम्प्यूटर अथवा मोबाईल की स्क्रीन पर किताबें पढ़ें। भले ही हम समय अभाव में कम ही पढ़ पाएं, लेकिन अवसर मिलते ही किताबों की दुनिया में प्रवेश करने को उद्यत हो उठते हैं। महाविद्यालय जीवन वह फेज़ होता है जब हम रूमानियत से परिचित होते हैं। उस दौर में पढ़ाई की जरूरी किताबों के अलावा प्रेम और जासूसी से भरी रूमानियत वाली किताबें हमारी भावनाओं को कोमलता से परिपक्व बनाती रहती हैं। जिसका उस समय तो हमें अहसास नहीं होता है लेकिन वैचारिक परिपक्वता आने पर हमें अनुभव होता है कि हमने जो रूमानियत भरी किताबें अपने कॉलेज के जीवन में पढ़ी थीं उन्होंने हमें प्रेम से परिचित कराया और प्रेम को समझने तथा प्रेम को निभाने की क्षमता हमारे भीतर पैदा की। यह किताबें ही तो हैं जो जीवन की विभिन्न अनुभूतियों को हमारे भीतर जगाती हैं, पल्लवित-पुष्पित करती हैं और हमें विचार पूर्ण बनाती हैं। या यूं कहा जाए कि हमारे भीतर एक वैचारिक क्षमता पैदा करती हैं। ग़लत-सही को जांचने, जीवन को सुंदरतम रूप प्रदान करने की भावना भी हमें किताबों से ही मिलती है। पढ़ाई से जुड़ी किताबें जैसे कानून की किताबें हमें कानून सिखाती हैं, विज्ञान से जुड़ी किताबें हमें वैज्ञानिक तथ्यों से परिचित कराती हैं, इतिहास की किताबें हमें अपने अतीत से परिचित कराती हैं, उसी प्रकार साहित्यिक किताबें हमें भावनाओं और सम्वेदनाओं के साथ जीना सिखाती हैं।
          पाठकों के लिए किताबें अछूती अनुभूतियों का तिलस्म रचती हैं और उन्हें एक समानांतर दुनिया जीने का अवसर देती हैं। वहीं, एक लेखक (लेखिका) के लिए उसकी किताबें उसकी आकलन, अन्वेषण और अनुभूतिजनित अभिव्यक्ति का ख़जाना होती हैं। किताबें अकेलेपन को दूर करने वाली सच्ची  मित्र होती हैं। किताबों की दुनिया किसी जादुई दुनिया की तरह हमेशा हमें अपनी ओर आकर्षित करती है। किताबें वे हैं जिन्हें हम बैठ कर, लेट कर किसी भी मुद्रा में पढ़ सकते हैं, उनका आनंद उठा सकते हैं।  एक बार नाता जुड़ जाने के बाद किताबों से नाता  कभी नहीं टूटता है और यह नाता कभी तोड़़ना भी नहीं चाहिए ।
     अंत में सारांशतः मैं अपनी कविता की चंद पंक्तियों में किताबों की महत्ता व्यक्त कर रही हूं-
*बहुत  खूबसूरत  क़िताबों  की दुनिया*
*सवालों  में  जैसे   जवाबों  की दुनिया*
*है  सच्चाई  इसमें  जो  सारे  जहां की*
*इनमें ही शामिल है ख़्वाबों की दुनिया*
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सागर, मध्यप्रदेश