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Sunday, January 25, 2026

शून्यकाल | हमारा भी दायित्व है अपने गणतंत्र के अनुरूप बनना | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नयादौर

शून्यकाल
हमारा भी दायित्व है अपने गणतंत्र के अनुरूप बनना
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
       .हम भारत के लोग...’ हमने अपनी आकांक्षाओं, आशाओं एवं विश्वास के साथ संविधान की संरचना को स्वीकार किया और सच्चे गणतंत्र की राह में आगे बढ़ने की शपथ ली। हमने तो हमेशा अपने गणतंत्र से अनेकानेक आशाएं रखीं लेकिन क्या कभी सोचा कि हमने उन आशाओं का क्या किया जो हमारे गणतंत्र को हमसे रही होंगी? क्या हम गणतंत्र की आशाओं पर खरे उतरे हैं या फिर हमने अपने गणतंत्र को अपना निजीतंत्र बनाते जा रहे हैं। अपनी वैश्विक छवि के साथ-साथ सबसे नीचे की पंक्ति के नागरिकों के जीवन-स्तर को ध्यान में रखते हुए इस संदर्भ में कभी-कभी हमे आत्मावलोकन भी करना चाहिए।
    
    एक लम्बी परतंत्रता के बाद स्वतंत्रता किसी भी कीमत पर मिले स्वीकार्य थी। कीमत भी हमने चुकाई। भारतीय भू-भाग का बंटवारा हुआ। अमानवीयता का तांडव देखना पड़ा। उसके बाद ग़रीबी, बदहाली, शरणार्थियों का सैलाब, बेरोज़गारी और सांप्रदायिक तनाव ने स्वतंत्रता की खुशी को कई-कई बार हताहत किया। फिर भी स्वतंत्रता विजयी रही और हमने अपना संविधान गढ़ा तथा उसे स्वयं पर लागू किया। इसके  पहले संविधान सभा के सामने चुनौती थी कि नए गणतंत्र का निर्माण ऐसे हो कि देश में फैली भाषाई, धार्मिक, जातीय, सांस्कृतिक विविधता को आत्मसात किया जा सके और लोगों को सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक दृष्टि से न्याय सुनिश्चित किया जा सके। एक ऐसा गणतंत्र जिसमें नागरिकों को बराबरी का दजर्र मिले। जिसमें शासन की शक्ति किसी एक राजा अथवा अधिनायक के पास न हो कर जनता और उसके चुने प्रतिनिधियों के हाथ में हो।

      गणतंत्र के साथ सुनहरी आशाएं जागीं। देश तरक्की करेगा तो हम भी तरक्की करेंगे। या फिर इसके उलट कि हम तरक्की करेंगे तो देश भी तरक्की करेगा। लेकिन इस ‘हम भारत के लोग’ में से ‘हम’ पर ‘मैं’ का प्रभाव बढ़ता गया और ‘मैं’ ने ‘हम’ को निर्बल बना दिया। कभी-कभी उन्मादी भी। हमने अपनी परम्पराओं को सहेजा संवारा और उनसे सबक लिया। समयानुसार सड़ी-गली परम्पराओं को काट कर फेंका भी लेकिन उन्माद की अवस्था में पहुंचते ही हम सत्य, अहिंसा और परमार्थ के समीकरण को भुला कर हिंसक व्यवहार करने लगते हैं। जीव मात्र के प्रति उदार विचार की परम्परा के पोषक हम यदि जलीकट्टू का समर्थन करने लगते हैं तो वहीं हमारा ‘अहिंसा परमोधर्म’ का आह्वान टूटने लगता है। हमने अपने संविधान में अहिंसा को र्प्याप्त जगह दी है। परमोधर्म को भी उच्च स्थान दिया है फिर हिंसा को अपनी गौरवमयी परम्परा कहते हुए संविधान की धाराओं को कैसे सुरक्षित रख सकते हैं?

    9 दिसम्बर 1946 को हुई संविधान सभा की पहली बैठक में विभिन्न जातियों, धर्मों, आर्थिक, राजनीतिक विचारों के लोग शामिल थे और सामाजिक आधार को फैलाने की कोशिश की गई थी ताकि भारत अपने आप में जिस तरह से अद्वितीय विविधता को समेटे है उसी के अनुरूप नए गणतंत्र का निर्माण हो सके। भारतीय संविधान में नैतिकता और राजनीतिक परिपक्वता को आधार बनाया गया। लेकिन समूचे देश में महिलाओं साथ बढ़ते दुर्व्यवहार को देखते हुए यह लगने लगता है कि हमारे तंत्र से अब नैतिकता का लोप होने लगा है। गोया भारतीय स्त्री बर्बरयुग के किसी नए संस्करण को जी रही हो। भारत इस समय मानव तस्करी का वैश्विक मार्ग बन चुका है। यह बर्बरता भी हमारे संवैधानिक उसूलों का सिर झुकाने को र्प्याप्त है।
गणतांत्रिक भारत में देश की विविधता और जटिलता को एक राजनीतिक व्यवस्था के रूप में अपनाया गया और ऐसा करते समय विभिन्न क्षेत्रों में बहुलतावाद का सम्मान किया गया। राजनीतिक क्षेत्र में लोकतंत्र, सांस्कृतिक क्षेत्र में संघीय ढांचे और धार्मिक मामलों में धर्मनिरपेक्षता के सहारे एक नए गणतंत्र के मायनों को स्पष्ट किया गया। गणतंत्र के गठन के बाद से ही नीति निर्धारकों की प्राथमिकता देश के संघीय ढांचे को बनाए रखना थी।

यह सच है कि कोई भी तंत्र हो उसकी अपनी व्यक्तिगत समस्याएं होती हैं। लेकिन गणतंत्र की परिकल्पना मैं संवैधानिक समस्याओं के लिए कई रास्ते खुले रखे गए। संशोधनों के द्वारा संवैधानिक ढांचे में लचीलापन भी बनाए रखा गया। फिर भी प्रत्येक नए चुनाव में चाहे वह लोकसभा का हो या विधान सभा का या फिर किसी पंचायत अथवा निगम का, गरिमा के सीमाएं चटकती मिली हैं। गणतंत्रता के क्या है मायने आज हमारे देश में। इतने लम्बे अरसे में कितने नियमों का ईमानदारी से हमने निर्वाह किया है और कितने ऐसे संवैधानिक नियम है जिनको हमने संविधान के पन्नों पर लिख कर भुला दिया है। हमारा देश भारतवर्ष एक जनतांत्रिक देश है। जहां जनता के द्वारा चुने गये प्रतिनिधियों द्वारा ही देश की शासन व्यवस्था चलायी जाती है। गणतंत्र दिवस हमारे देश के इतिहास का वो दिन है, जिस दिन संविधान पूर्णरुपेण लागू किया गया था। देश की समस्त गतिविधियां इन संवैधानिक नियमों के आधार पर ही सुचारु ढंग से संचालित होती है। संविधान हमे जीने के तौर तरीके सीखाता है। एक सभ्य और कर्मठ राष्ट्र के सपने को साकार करता है हमारा संविधान। देश की गणतंत्रत को बनाये रखने हेतु प्रशासन के साथ साथ जनता का भी महत्वपूर्ण योगदान होता है। संविधान के नियम सबों के लिए बराबर होते है। वो किसी भी प्रकार के जातिभेद या वर्चस्व की भावना से ऊपर होता है। फिर भी भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और विभिन्न प्रकार के संकट आज भी मुंहबाए खड़े हैं। अगर हम सिर्फ अपनी उन्नति के बारे में सोचते है तो ये हमारी संकीर्ण मानसिकता का परिचायक है। हमे अपने देश और समाज के विषय में भी सोचने की जरूरत है। हमें ऐसे कार्यों की ओर स्वयं को अग्रसर करना है, जिनमें स्वयं के साथ सम्पूर्ण राष्ट्र की प्रगति भी सम्मिलित हो। जैसे हमारा संविधान हमें अपने अधिकारों और कर्तव्यों की समझ देता है। वैसे ही हमें भी देश के प्रति अपनी भावना परिलक्षित करनी चाहिए। युवावर्ग जो कि किसी भी राष्ट्र की प्रगति और उसके भविष्य का एकमात्र कार्यवाहक होता है।युवाओं की सहनशीलता, कर्तव्यपरायणता और कर्मठता ही राष्ट्र की अखण्डता रुपी महल के लिए ईंट का कार्य करते है। एक एक ईंट मिलकर ही एक विशाल महल का निर्माण करता है। आज जबकि हम इक्कीसवी सदी में कदम रख चुके है। तकनीक के साथ साथ लोगों की मानसिकता भी अब बदल चुकी है। ऐसे समय में गणतंत्र दिवस को सिर्फ एक राष्ट्रीय दिवस अथवा एक दिन का उत्सव मान कर, टीवी के छोटे पर्दे पर झांकियां देख कर, नेताओं के भाषण सुन कर भुला देना और दूसरे दिन से यह भी याद न रखना कि हमारा कोई संविधान भी है, हमारा कोई गणतंत्र भी है जिसके प्रति हम उत्तरदायी हैं, यह हमारी नासमझी ही नहीं अपराध भी है।

हमारे गणतंत्र का दूसरा महत्वपूर्ण अंग तंत्र है। लेकिन आजकल ऐसा लगता है जैसे तंत्र अनियंत्रित होता जा रहा है। उसे अपनी मनमानी करने से रोकने का दायित्व जिनका है कहीं कहीं तो वे खुद ही भ्रष्टाचार की मिसाल निकल आते हैं। तंत्र के इस कथन की भी अनदेखी नहीं की जा सकती कि आज के दौर में सत्ता दल का राजनैतिक हस्तक्षेप प्रशासनिक अमले पर इतना अधिक रहता हैं कि वे चाहकर भी निष्पक्ष और निर्भीक होकर काम नहीं कर सकते हैं। कोई भी जनप्रतिनिधि जब एक बार अपने राजनैतिक हित साधने के लिये तंत्र का उपयोग कर लेता हैं तो फिर गणतंत्र के मूल्यों में गिरावट आने लगती है। आर्थिक मुद्रास्फीति से कहीं अधिक घातक होती है नैतिकता की स्फीति।किसी भी समस्या को हल करने के लिये गण को तंत्र का साथ देने और तंत्र को त्वरित निराकरण के प्रयास करने आवश्यक होते हैं। आज महंगाई सबसे बड़ी समस्या हैं। हालांकि विश्व स्तरीय आर्थिक मंदी, अंर्तराष्ट्रीय बाजार की उथल पुथल, नोटबंदी के बाद की आर्थिक स्थिति ने देश को भी हिला कर रख दिया है। लेकिन इतना कह देने मात्र से सरकार के कर्तव्यो की इतिश्री नहीं हो जाती है। और ना ही केन्द्र और राज्य सरकार एक दूसरे पर दोषारोपण़ करके बच सकतीं है। गण चुस्त और दुरुस्त रहें तथा तंत्र पूरी मुस्तैदी से देश के विकास और आम आदमी की खुशहाली के लिये संकल्पित हो, तभी देश एक बार फिर अपने स्वर्णिम मुकाम पर पहुंच सकेगा।
आज हम चारों ओर देख रहे हैं की बहुत सारे सरकारी कर्मचारी उन लोगों से घूस ले रहे हैं रिश्वत ले रहे हैं। क्या यही हम हमारे देश के प्रति कर्तव्य निभा रहे हैं । इसमें जिम्मेदार सिर्फ वह सरकारी आदमी नहीं है जिम्मेदार आम आदमी भी है रिश्वत लेने वाला और देने वाला भी जिम्मेदार है और रिश्वत देने वाला भी उतना ही जिम्मेदार है क्योंकि लोग अपना कर्तव्य भूल जाते हैं डॉक्टर, इंजीनियर या किसी भी विभाग के सरकारी कर्मचारी इस दूषित व्यवहार को अपनाते हैं और पूरे देश को इसका खामियाजा भुगतना पड़ता है। विकास के पहिए ऐसे आचरण से ही बाधित हो जाते हैं। प्रश्न यह है कि सुरक्षा मामलों में भी भ्रष्टाचार के दाग़ जब उभर कर सामने आने लगे हैं तो यह मान ही लेना चाहिए कि हम अपने संवैधानिक उसूलों से भटक गए हैं। यदि स्वतंत्रता के दशकों बाद भी हम खुले में शौचमुक्त देश बनाने के लिए संघर्ष करते दिखाई दे रहे हैं तो विश्व के सक्षम राष्ट्रों से किस आधार पर अपनी तुलना कर सकते हैं? बहरहाल अब समय आ गया है कि हमें खुद को धोखा देने से रोकना होगा और सही मायने में खुद के लिए तय करना होगा कि हम अपने गणतंत्र के अनुरूप एक सही तथा अच्छे नागरिक कैसे साबित हो सकते हैं।
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Saturday, January 25, 2020

गणतंत्र हमारा - डॉ शरद सिंह

Happy Republic Day by Dr (Miss) Sharad Singh

आजादी का भान कराता है गणतंत्र हमारा।
दुनिया भर में मान बढ़ाता है गणतंत्र हमारा।
- डॉ शरद सिंह
🇮🇳 गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं 🇮🇳

#HappyRepublicDay

Thursday, January 25, 2018

चर्चा प्लस ... गणतंत्र के प्रति युवाओं का दायित्व - डॉ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
मेरा कॉलम.... चर्चा प्लस
गणतंत्र के प्रति युवाओं का दायित्व
- डॉ. शरद सिंह
(दैनिक सागर दिनकर, 24.01.2018)
भारतीय गणतंत्र में युवाओं को अनेक अधिकार दिए गए। युवाओं की बौद्धिकता एवं समझबूझ को देखते हुए मतदान की आयु में संशोधन किया गया। यह माना गया कि आज का युवा अधिक विवेकशील और विचारवान है। वह तटस्थतापूर्वक राजनीतिक निर्णय ले सकता है। लेकिन विगत कुछ समय से युवाओं और विशेष रूप से अवयस्क युवाओं ने जिस प्रकार आपराधिक तेवर दिखाए हैं वह चौंकाने वाले हैं। आज वह समय है जब भारत समूचे विश्व की अगुवाई करने की स्थिति में आता जा रहा है। ऐसी स्थिति में युवाओं का भी दायित्व बनता है कि वे अपने देश की छवि और विकास के प्रति स्वयं को पूरी लगन और निष्ठा से प्रस्तुत करें। 

Gantantra Ke Prati Yuvaon Ka Dayitwa - Charcha Plus Column of Dr Sharad Singh in Sagar Dinkar Dainik
 गणतंत्र का आशय है वह तंत्र जनता द्वारा निर्धारित एवं शासित हो। बहुत ही सुंदर संकल्पना। यह हम भारतीयों का सौभाग्य है कि हम विश्व के सबसे बड़े गणतंत्र के नागरिक हैं। इस गणतांत्रिक व्यवस्था को आकार में आए अब छः दशक से अधिक का समय हो चुका है। सन् 1950 में गणतंत्र की स्थापना के बाद हमने गणतांत्रिक मूल्यों में विश्वास किया है और उसी में जीवनयापन किया है। 69 वां गणतंत्र दिवस ... लगभग 68-69 वर्ष का समय कोई संक्षिप्त समय नहीं होता। इस बीच वैश्विक पटल पर पूंजीवाद ने पांव पसारे और साम्यवाद सिमटता चला गया। चीन एक विशेष शक्ति बन कर उभरा और कई अरब देश आतंकी संगठनों के निशाना बने। किन्तु भारतीय गणतंत्र अडिग बना रहा। इसका सबसे बड़ा कारण इसका संवैधानिक लचीलापन है। गणतंत्र का यह भी अर्थ है कि देश के नागरिकों के पास वह सर्वोच्च शक्ति होती है जिसके द्वारा वे देश के नेतृत्व के लिये राजनीतिक नेता के रुप में अपने प्रतिनिधि चुन सकते हैं। ये चुने हुए मुखिया वंशानुगत आधार पर नहीं होते हैं। प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से जनता द्वारा निर्वाचित किया जाता है। वहीं चुने हुए मुखिया का दायित्व होता है कि वह जनता के दुख-सुख का ध्यान रखते हुए देश के विकास के लिए काम करे। दुख है कि कुछ ऐसे अवसर भी आए हैं जब नागरिकों को चाहे स्थानीय स्तर पर, राज्य स्तर पर या फिर राष्ट्रीय स्तर पर नेतृत्व चुनने के बाद ठगा-सा महसूस करना पड़ा। लेकिन जल्दी ही जनता ने अपनी भूल को सुधारते हुए सत्ता परिवर्तन का शंखनाद कर के जता दिया कि भारतीय गणतंत्र को किसी भी प्रकार की तानाशाही में नहीं बदला जा सकता है। और यह संभव हो सका तत्कालीन बुजुर्ग नेतृत्वकर्ताओं के साथ खड़ी होने वाली युवाशक्ति के कारण। जब कभी ऐसा लगने लगता है कि फलां धारा समसामयिक मूल्यों पर खरी नहीं उतर रही है तो उसमें बेझिझक आवश्यक संशोधन कर लिए जाते हैं। भारतीय गणतंत्र में युवाओं को भी अनेक अधिकार दिए गए। युवाओं की बौद्धिकता एवं समझबूझ को देखते हुए मतदान की आयु में संशोधन किया गया। यह माना गया कि आज का युवा अधिक विवेकशील और विचारवान है। वह तटस्थतापूर्वक राजनीतिक निर्णय ले सकता है। लेकिन विगत कुछ समय से युवाओं और विशेष रूप से अवयस्क युवाओं ने जिस प्रकार आपराधिक तेवर दिखाए हैं वह चौंकाने वाले हैं।
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो द्वारा दिए गए आंकाड़ें विगत कुछ वर्षों से निरंतर चकित रहे हैं। यदि वर्ष 2013 के आंकड़ों पर दृष्टि डालें तो वर्ष 2013 में गिरफ्तार किए गए अवयस्क अपराधियों में कुल 35244 अवयस्क अपराधी ऐसे थे जो अपने अभिभावकों के साथ ही रहते हुए अपराध में लिप्त थे। प्राप्त आकड़ों के अनुसार, गिरफ्तार किए गए 16-18 आयु वर्ग के नाबालिगों की संख्या साल 2003 से 2013 तक बीच बढ़कर 60 प्रतिशत हो गई थी। अवयस्कों द्वारा किए जा रहे संगीन अपराधों में निरंतर वृद्धि को देखते हुए जनवरी 2018 में हाईकोर्ट ने दिल्ली पुलिस को आदेश दिया था दिल्ली पुलिस नाबालिगों के किए गए अपराध का भी डोजियर बनाए। ये डोजियर 16 से 18 साल के उन नाबालिगों का बनेगा जो संगीन अपराध करते हैं। माह जनवरी 2018 में दिल्ली पुलिस ने हाईकोर्ट में एक रिपोर्ट पेश की थी, जिसमें खुलासा किया गया था कि दिल्ली में हुए अपराधों में वर्ष 2016 में नाबालिगों द्वारा 18 फीसदी अपराध किए गए, इनमें हत्या और रेप जैसी संगीन वारदातें भी शामिल हैं। इसके अलावा 27 प्रतिशत चोरी और लूट के मामलों में भी नाबालिगों की भूमिका पाई गई। पुलिस के मुताबिक अपराध करने वालों में 16 से 18 वर्ष की आयु के नाबालिग ज्यादा हैं। ये रिपेर्ट हाईकोर्ट में दिल्ली पुलिस ने पश्चिमी दिल्ली में हुए मर्डर के साथ पेश की। इस मर्डर में तीन नाबालिगों ने एक राहगीर से 600 रुपए लूटे थे और जब उसने इसका विरोध किया था तो उन लोगों ने उसकी निर्ममता से हत्या कर दी थी। इस मामले में तीनों नाबालिगों को बाल सुधार गृह भेजा गया था। पुलिस ने दलील दी थी कि तीनों नाबालिग की उम्र 18 साल में महज तीन से पांच महीने का अंतर था। इस पर हाईकोर्ट ने कहा कि कानून को नहीं बदला जा सकता, लेकिन ये जरूर किया जा सकता है कि इनके डोजियर को बनाया जाए, ताकि भविष्य में जब ये लोग इस तरह के अपराधों को करें तो इनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जा सके। इससे पूर्व सामाजिक न्याय व अधिकारिता मंत्रालय की रिपोर्ट पर गृह मंत्रालय केंद्र सरकार को एक रिपोर्ट पेश कर चुका है, जिसके तहत 17 साल से अधिक के नाबालिग जो संगीन अपराध करते हैं उन्हें भी आम बदमाशों की श्रेणी में रखा जाए। इस पर जुलाई, 2016 में सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की थी कि जब नाबालिग अपराध करने में नहीं कतराते और उनके उम्र को हथियार बनाकर क्राइम को पेशा बना लिया है तो ऐसे में इन लोगों के खिलाफ सख़्त कानून बनाना चाहिए।
राजधानी दिल्ली में 16 दिसम्बर, 2012 को निर्भया के साथ हुए सामूहिक बलात्कार की घटना में एक नाबालिग भी लिप्त था। उस समय नाबालिगों के खिलाफ सख्त कानून बनाने की देश भर में पुरजोर मांग की गई थी। इस घटना को दो साल पूरे होने जा रहे हैं, लेकिन राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2013 में नाबालिगों द्वारा छेड़छाड़ और बलात्कार के मामलों में 132 प्रतिशत तक की वृद्धि हुई। विगत एक-दो माह में जो घटनाएं सामने आई हैं वह और अधिक चिन्ता में डालने वाली हैं। गुरुग्राम के एक नामी स्कूल के एक लड़के ने स्कूल के एक बच्चे की हत्या केवल इसलिए कर दी, ताकि कुछ दिनों के लिए परीक्षा टल जाए, नोएडा में तो एक लड़के ने अपनी मां और बहन को इसलिए मार डाला, क्योंकि वे उसे डांटते थे तथा एक नाबालिग छात्र ने गुस्से में आ कर अपनी स्कूल शिक्षिका पर गोलियां बरसा दीं। ये घटनाएं भारतीय गणतंत्र के लिए चुनौती के समान हैं। यह भारतीय संस्कृति का भी चेहरा नहीं है। नवीन कुमार जग्गी, वरिष्ठ अधिवक्ता, सर्वोच्च न्यायालय एवं अन्तरराष्ट्रीय अध्यक्ष, बालकन जी बार इंटरनेशनल का मानना है कि ‘‘गंभीर अपराध करने पर नाबालिग को छोड़ा नहीं जाना चाहिए क्योंकि बार-बार अपराध करने वालों के सुधरने की संभावना नहीं रहती है। आयुसीमा का लाभ उठाकर नाबालिग अपराध करते हैं जिसका नुकसान समाज को उठाना पड़ता है। मेरा मानना है कि नाबालिग को अपराध के अनुपात में दंड मिलना चाहिए।’’
जिस तरह युवाओं में बढ़ती अपराध की प्रवृत्ति एक सच है, उसी तरह यह भी सच है कि कोई भी युवा जन्म ये अपराधी नहीं होता है। वातावरण उसे अपराध की ओर धकेल देता है। यदि आज युवा गंभीर अपराध में लिप्त दिखाई दे रहे हैं तो कहीं न कहीं दोष उस वातावरण का है जो ग्लोबलाईजेशन और इन्टरनेट के माध्यम से भ्रमित कर रहा है। वैसे इस तथ्य को भी नकारा नहीं जा सकता है कि जिस तरह युवाओं में अपराध की प्रवृत्ति बढ़ती दिखाई दे रही है वहीं दूसरी ओर आत्मविश्वास से भरी-पूरी युवा खेप भी नज़र आती है। आत्मविश्वास से भरा युवा वर्ग अपने कैरियर के प्रति जागरूक रहता है। वह अपने भविष्य का फैसला खुद करके स्वयं को सक्षम साबित करने के लिए तत्पर रहता है। आज का युवा मेहनत से नहीं घबराता है। वह सरकारी नौकरियों के बंधे-बंधाएं वेतन की बजाय पे पैकेज को बेहतर मानता है। लेकिन यहां चिन्ता का विषय यह है कि पैकेज़ब्रांड युवा वर्ग ‘‘हाई लाईफ-हाई लिविंग’’ के उसूलों पर चलते हुए विदेशों की ओर मुंह कर के खड़ा रहता है। उनके माता-पिता भी गर्व करते हैं यदि उनकी आंखों का तारा अपना देश छोड़ कर उनसे सात समुन्दर पार चला जाता है। जिस आत्मनिर्भर, आत्मविश्वासी और दृढ़निश्चयी युवा शक्ति की देश के गणतंत्र को आवश्यकता है वे देश से पलायन के सपने बुनते रहते हैं।
आज वह समय है जब भारत समूचे विश्व की अगुवाई करने की स्थिति में आता जा रहा है। ऐसी स्थिति में युवाओं का भी दायित्व बनता है कि वे अपने देश की छवि और विकास के प्रति स्वयं को पूरी लगन और निष्ठा से प्रस्तुत करें। इसके लिए युवाओं के माता-पिता को भी अपने दिवास्वप्नों से बाहर निकलना होगा, इससे उनकी संतानें उनके पास रहते हुए देश के विकास में भागीदार बन सकेंगी और उनका वृद्धावस्था का अकेलापन भी दूर कर सकेंगी। उन युवाओं को भी समझना होगा जो अपराध के प्रति आकर्षित होते हैं कि वे अपराध कर के बच तो पाएंगे नहीं, वरन् अपना और अपने परिवार का जीवन भी बरबाद कर बैठेंगे। वस्तुतः प्रत्येक युवा को यह समझना चाहिए कि गणतंत्र वह संवैधानिक वातावरण है जो उन्हें अवांछित अथवा अवैधानिक बिना दबाव के जीने और बहुमुखी विकास करने के अवसर देता है।
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