बतकाव बिन्ना की
काय, आज कौन सो डे आए?
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
‘‘काए आज कौन सो दिन आए?’’ भैया जी ने भौजी से पूछी।
‘‘आज? आज बृहस्तपत वार आए, मनो गुरुवार। काए, जा काए पूछ रए?’’ भौजी ने पूछी।
‘‘औ कौन सो दिन आए?’’ भैयाजी ने पूछी।
‘‘आज 12 तारीख आए।’’ भौजी फेर के बोलीं।
‘‘अरे, हम तारीख नईं पूछ रए, हम दिन पूछ रए के आज कौन सो दिन आए, मने कौन सो डे आए?’’भैयाजी बोले।
‘‘आज दसमीं तिथि आए। काए काल कछू की पूजा कराने है का?’’ भौजी ने फेर के पूछी।
‘‘हमने तुमसे तिथि नोंई पूछी। हम तुमसे जा पूछ रए के आज कोन सो डे आए?’’ भैयाजी ने कई।
‘‘हऔ, तुम तो ऐसे कै रए जैसे हमें डे को मतलब नईं पतो। डे मने दिन औ दिन मने तिथि। हमने आपके लाने पूरो तो बता दओ के आज गुरुवार, दसमीं तिथि आए औ कलेंडर के हिसाब से 12 तारीख आए। को जाने औ का पूछ रए हो आप?’’ भौजी झुंझलात भई बोलीं।
जा सब देख के मोए हंसी आन लगी। काए से के मोए समझ में आ गई हती के भैयाजी भौजी से का पूछबो चा रए। मैंने देखी की इते भौजी झुंझलान लगी हतीं औ उते भैयाजी बोर फील करन लगे हते सो मैंने दोई की मदद करबे की सोची।
‘‘भौजी, भैयाजी तिथि नोंई पूछ रए।’’ मैंने कई।
‘‘सो, जे का पूछ रए? हमें तो कछू समझ ने आ रई।’’ भौजी बोलीं।
‘‘जे बैलेंटाईन वारे डे के बारे में पूछ रए। के आज कोन सो डे आए?’’मैंने भौजी खों समझाई।
‘‘हैं? जे इनको का सूझ रई? अपन खों का लेने बैलेंटाईन से? औ वा बी ई उम्मर में?’’ भौजी कछू चकित भईं फेर झेंपत सी बोलीं।
‘‘सो ऊमें का भौजी? आप ओरें काए नईं मना सकत बैलेंटाईन? ऊमें का खराबी आए?’’ मैंने सोई जान के भौजी से पूछी।
‘‘नईं, मने खराबी तो कछू नईं। मनों कछू बी अच्छे से मनाओ जाए तो अच्छो है, लेकन जो आजकल मोड़ा-मोड़ी बैलेंटाईन के नांव पे अत्ते करन लगत आएं बा गलत आए।’’ भौजी ने बड़े पते की बात करी।
‘‘सई कई भौजी। कोनऊं को गुलाब को फूल भेंट करबे में कोनऊं खराबी नोंई, गर जो आपके मन में मैल ने होए।’’ मैंने भौजी को समर्थन करो।
‘‘तो का आज गुलाब मने रोज़ डे आए का?’’ भौजी ने पूछी औ भैयाजी के हातन की तरफी देखन लगीं के बे कऊं गुलाब ले के तो नईं आए?
‘‘हमाओ गुलाब कां आए?’’ भैयाजी के हातन में गुलाब को फूल ने देख के भौजी ने उनसे पूछी।
‘‘आज गुलाब डे नोंईं। बा तो 7 फरवरी को हतो, जब हमने तुमाई चुटिया में गुलाब खोंसो रओ।’’ भैयाजी शरमात भए बोले।
‘‘अरे, सो ऊ दिनां काए नईं बताओ हमें? खैर, सो आज का आए?’’ भौजी ने पूछी।
‘‘आज तो हग डे आए।’’ भैयाजी चुटकी सी लेत भए बोले।
‘‘का कई?’’ भौजी ने फेर के पूछी।
‘‘हमने कई आज हग डे आए, मने गले लगबे को दिन।’’ भैयाजी हंसत भए बोले।
‘‘कछू तो शरम खाओ। बिन्ना के आंगू हमसे ऐसो बोल रए।’’ भौजी झेंपत भईं बोलीं।
‘‘अरे, सो हम कछू गलत थोड़ेई कै रए। गले तो ईद, दिवारी पे बी मिलो जात आए। अबईं तुमई कै रई हतीं के जो मन में कछू गलत बात ने होए तो कछू में कछू दोस नईं आए। औ अब तुमईं मों बना रईं। मने तुमाए मन में कछू गलत वारे खयाल आए।’’ भैयाजी ने भौजी खों चुटकी लई।
‘‘हऔ, हमें पतो, हम तो ऊंसई कै रए हते।’’ भौजी अपनी बात सम्हारत भईं बोलीं।
‘‘तुमें तो याद बी ने हुइए के कोन सो दिन का कहाउत आए?’’ भैयाजी बोले।
‘‘काए नईं याद, हमें सोमवार से ले के इतवार तक सबई दिन याद आएं। कौ तो सुनाएं, सोम, मंगल, बुध....।’’ भौजी गिनान लगीं के भैयाजी ने टोंको।
‘‘बस-बस, जे वारे दिन नईं पूछ रए। हम तो बैलेंटाइन वारे दिन पूछ रए।’’ भैयाजी बोले।
‘‘हमें का पतो? औ काए याद राखें, कोन सी हमें बा दिन कोनऊं पूजा करने, के उपवास राखने?’’ भौजी बोलीं।
‘‘बात तो तुमाई सही आए मनो, पतो तो होने चाइए के रोज डे से बैलेंटाइन शुरू होत आए। फेर प्रपोज डे, चाॅकलेट डे, टेडी डे, प्रामिस डे, हग डे, किस डे औ अखीर में होत आए बैलेंटाइन डे।’’ भैया जी ने भौजी खों बताई।
‘‘अरे, अरे, जेई तो सल्ल आए के किस डे पे सबरे खुल्लम खुल्ला... जेई से तो जा सब हमें नईं पुसात।’’ भौजी मों बनात भईं बोलीं।
‘‘हऔ, अकेले में करो चाइए।’’ भैयाजी हंसत भए बोले।
‘‘सो जो कैसो त्योहर कहाओ जोन को अकेले में मनाओ जाए? ईंसे तो अपने त्योहार नोंने के अबईं शिवरातें पे सबईं मंदिर जाहें उते शिव औ पार्वती जू के ब्याओ में सामिल हूंहे।’’ भौजी बोलीं।
‘‘हऔ भौजी, आप सई कै रईं। अपने इते के त्योहर ई टाईप के बनाए गए आएं जोन खों सब मिल के धूम-धाम से मना सकत आएं। ने कोऊ खों लट्ठ घुमाबे की जरूरत औ ने कोनऊं गलत हरकत। सब कछू अच्छो-अच्छो सो रैत आए। मैंने तो सोई ई बेर बड़े शिवजी लौं जाबे की सोस रईं।’’ मैंने कई।
‘‘हऔ तो अपन ओरें संगे चलबी। हम ओरें बी जेई बहाने दरसन कर आबी।’’ भौजी बोलीें।
‘‘जे ठीक रैहे। हम सोई सोस रए हते के ई बेर कऊं दरसन के लाने जाओ चाइए। बरमान में तो बड़ी भीर परहे। सो इतई ठीक रैहे।’’ भैयाजी बोले।
‘‘चलो तो जा पक्की रई। अपन ओरें बड़े शिवजी लौं चलहें। बाकी भैयाजी अब मोए जाबे की परमीसन देओ ताके आप अपनो हग डे कंटीन्यू कर सको।’’ मैंने भैयाजी खों टोंट मारी।
‘‘अरे, राम को नांव लेओ! हमें का करने हग डे को? तुमाई भौजी तो बरहमेस की हमाई आएं। इनें का एकई दिनां गले लगा के अफर जाहें का?’’ भैयाजी सोई हंसत भए बोले।
‘‘आप सोई कछू बी बके जा रए। कोनऊं हग-फग नईं होने। आप चलो औ अपनों काम करो।’’ भौजी झेंपत भईं भैयाजी खों झिड़कन लगीं।
‘‘सई में, मोए अब इते से चलो जाओ चाइए।’’ कैत भई मैं उठ खड़ी भई।
‘‘अरे, तुमें कऊं नईं जाने। हम नईं मानत जे सब। तुम तो इतई बैठो।’’ भौजी ने मोरो हात पकर के मोए बिठा लओ।
‘‘हम सोई कां मानत आएं, हम तो तुमाई भौजी सेे ऊंसई ठिठोली कर रए हते। ने तो हमें तो ई नांव से कछू औ सूझन लगत आए।’’ भैयाजी ठठा के हंसन लगे।
‘‘छी! आप औ!’’ भौजी मों दाब के हंसन लगीं।
रामधई! कछू बी कई जाए मनो अपने देस के त्योहार सई में त्येाहार घांई लगत आएं। जीमें खीब मजो आत आए। सबरे त्योहारन को कोऊ ने कोऊ मोसम औ प्रकृति से कछू ने कछू ताल्लुक रैत आए। अपने जे सबरे त्योहार बी तो आपस में हिल मिल के रैबो सिखात आएं। मोए तो सोई अपने त्योहार ज्यादई अच्छे लगत आएं। बाकी जोन खों जोन पुसाए, मोए का।
मनो बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की। जे सोचियों जरूर के अपने त्योहार दुनिया में सबसे नोंने आएं के नईं?
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बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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