पुस्तक समीक्षा
गहन संवेदनाओं रेखांकन है हरजिंदर सिंह सेठी की कविताओं में
- समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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कविता संग्रह - मेरी धरती के लोग
कवि - हरजिंदर सिंह सेठी
प्रकाशक - न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन, सी-515, बुद्ध नगर, इंद्रपुरी, नई दिल्ली-110012
मूल्य - 250/-
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हरजिंदर सिंह सेठी एक चिरपरिचित नाम हैं, पाठकों के लिए भी और मेरे लिए भी। इनके विविधतापूर्ण लेखन ने एक बड़ा पाठक वर्ग अपने लिए पाया है। 22 जुलाई 1947 को गाजियाबाद में जन्मे हरजिंदर सिंह सेठी वर्तमान में मुंबई में निवासरत हैं। इनकी शिक्षा तथा इनका कार्यक्षेत्र भी मुंबई ही रहा है। जीवन से गहरा जमीनी जुड़ाव रखते हैं। इनकी अभी इस कविता संग्रह के पूर्व छः पुस्तकें प्रकाशित हुईं - गुरु तेग बहादुर एक युग व्यक्तित्व (जीवनी), यह चुप रहने का समय नहीं (कविता संग्रह), सौ सवाल सौ जवाब (इतिहास), कुछ किताबें कुछ लोग (समीक्षा संस्मरण), नामदेव वाणी: व्याख्या विवेचन (अध्ययन) तथा बादशाह दरवेश (जीवन गाथा)। इनमें से सेठी जी ने अपनी प्रथम पुस्तक "गुरु तेग बहादुर एक युग व्यक्तित्व" मेरी माता जी डाॅ विद्यावती ‘मालविका’’ जी को डाक द्वारा भेंट की थी। उसी दौरान मैंने सेठी जी की पुस्तक पढ़ कर गुरु तेगबहादुर जी के बारे में विस्तार से ज्ञान प्राप्त किया। तदोपरांत मेरी दीदी डाॅ वर्षा सिंह जी का भी सेठी जी से संक्षिप्त पत्र संवाद रहा। अब जब अपनी नवीनतम पुस्तक उन्होंने मुझे प्रेषित की तो मुझे लगा कि मैं एक पारिवारिक परंपरा को जी रही हूं। किसी परिचित की पुस्तक समीक्षार्थ हाथों में होना धर्मसंकट खड़ा करता है किन्तु जब मैंने हरजिंदर सिंह सेठी का यह नवीनतम काव्य संग्रह पढ़ा तो मेरे सारे संकट स्वतः कट गए। इस काव्य संग्रह की समस्त कविताएं इतनी सशक्त एवं संवादनात्मक हैं कि वे स्वयं अपनी प्रकृति से परिचित कराती हैं तथा निष्पक्षता से प्रशंसा करने के लिए बाध्य करती हैं।
‘‘मेरी धरती के लोग’’ नाम है हरजिंदर सिंह सेठी के नवीनतम काव्य संग्रह का। इसका मुखपृष्ठ ही बहुत कुछ बयान कर जाता है जिसमें पूरी ताकत से एक मालवाहक रिक्शा खींचता हुए रिक्शाचालक की तस्वीर है। ये या इन जैसे मेहनककश भी तो हमारी धरती के लोग हैं। किन्तु हममें से अधिकांश देख कर नाक-भौं सिकोड़ने लगते हैं। उनकी दृष्टि में ये बुनियादी लोग नहीं वरन ‘छोटे लोग’ हैं जिनसे कोई वास्ता रखना गोया गुनाह है। ऐसे ही मनुष्यों की तथा उनके परिवेश की कविताएं हैं ‘‘मेरी धरती के लोग’’ में। इस संदर्भ में कवि ने अपने संग्रह की पहली कविता ‘‘सूरज उगने तक’’ में ही अपने कवित्व का ध्येय स्पष्ट कर दिया है, कुछ पंक्तियां देखिए-
मेरे पास कहने के लिए
अपना तो कुछ भी नहीं।
वही लिखता हूं
00000000
मैं तो हूं सिर्फ अनुवादक
उनकी भावनाओं का।
कठिन समय से गुजरती
उनकी जिंदगी की क्रूरताओं को
रूपांतरित करता हूं अपने शब्दों में।
एक कप चाय और एक बड़ापाव खा कर अथवा एक कप चाय के साथ आधा प्लेट पोहा खा कर घंटों पैडल रिक्शा चलाना, हम्माली करते हुए अपने कंधों और पीठ पर सैंकड़ों किलो बोझा ढोना क्या आसान है? फिर भी लोग उनसे मोल-भाव करने से नहीं हिचकते हैं। एक हम्माल से जो पांच रुपए वे कम कराते हैं उनसे उनके लिए चबा का थूक देने वाला शायद एक पान भी न आए किन्तु उसी पांच रुपए से वह मेहनतकश एक कप कट चाय पी कर कई किलो बोझा और ढो सकता है। गरीबी सपने तो देती है किन्तु उन सपनों को पूरा करने की क्षमता सोख लेती है। इस मार्मिक सत्य को अपनी कविता ‘‘ढाबे में पहाड़’’ में बड़ी स्पष्टता से सेठी जी ने वर्णित किया है-
भाई की उंगली पकड़े
छोटे-छोटे पैर रखता
पहाड़ से नीचे उतर आया है/बीर सिंह।
बीर सिंह रहेगा
दिल्ली के किसी होटल या ढाबे में
फर्श पर लगायेगा झाडू,/मांजेगा बर्तन
चाय का गिलास रखेगा टेबल पर
ग्राहक के सामने।
विकास अथवा प्रगति के क्या मायने होने चाहिए? क्या यही कि शहर फैलते जाएं, उनमें चमचमाती सड़कें पसरती जाएं और गरीबों को बदनुमा दाग मान कर पीछे, बहुत पीछे धकिया दिया जाए, जहां से वे दिखाई भी न दे सकें और फिर देश को खुशहाल मान लिया जाए। यह खरी सच्चाई अपने पूरे खुरदेरेपन के साथ उतर आई है सेठी जी की कविता ‘‘स्मार्ट सिटी’’ में। एक अंश कविता का-
यहां से दिखेगी
एक खुशहाल और उन्नत देश की तस्वीर।
यहां से नहीं दिखेंगी
टीन टप्पर वाली झुग्गी झोंपड़ियां
कीचड़, बदबू और कूड़े के ढेर वाली बस्तियां,
अंधेरी गलियां, टूटे फूटे रास्ते।
बिजली और पेयजल के लिए
तरसते लोग।
सच को ढांक कर ढोंग भले ही किया जा सके किन्तु सच को देर तक छिपाए नहीं रखा जा सकता है। फिर भी साहित्य का एक हिस्सा आज मानो लकवाग्रस्त हो गया है। उसने सच बयानी से अपना नात तोड़ लिया है। ऐसे पंगु साहित्य के एक-एक शब्द साहित्य की वास्तविक आत्मा को आहत करते हैं। जैसे ‘‘कविता आजकल’’ में हरजिंदर सिंह सेठी लिखते हैं-
आजकल बहुत उदास है
कविता क्रांति की भाषा बोलने वाली
एक दम शांत चुप है।
क्षीण पड़ गया है, प्रतिरोध का स्वर
लड़खड़ा रहे हैं, उसके सारे शब्द
निरीह से जाकर बैठ गए हैं
दाहिने कोने में
जहां जिंदगी सहम गई है।
निःसंदेह जब समाज को दर्पण दिखाने वाला, लड़खड़ाने वाले को सहारा देने वाला साहित्य लाचारी का कंबल ओढ़ लेता है तो ज़िन्दगी सहम जाती है तथा अव्यवस्थाएं सिर उठाने लगती हैं। जब व्यवस्थाएं चरमराती हैं तो हमारी अपनी बेटियां भी सुरक्षित नहीं रहती हैं। ‘‘कब तक’’ शीर्षक से सेठी जी प्रश्न करते हैं कि-
कब तक भय के माहौल में
जिएंगी लड़कियां।
कब तक चुप्पी ओढ़कर
बैठे रहेंगे हम लोग
कब तक बने रहेंगे गूंगे
कब तक जलाते रहेंगे मोमबतियां।
मोमबत्तियां जलाने का प्रतीक उस लाचारी को दर्शाता है जहां हम सकल पीड़ा से दुखी तो हैं, अपने दुख का प्रदर्शन भी कर रहे हैं किन्तु पुरजोर प्रतिकार करने का साहस नहीं जुटा पा रहे हैं। दरअसल यह संवेदनाओं में आती जा रही कमी का प्रत्यक्ष उदाहरण है। ऐसा ही एक उाहरण है जब किसी की मृत्यु को भुनाने का प्रयास किया जाता है। यह संवेदनाओं की अकाल मृत्यु नहीं तो और क्या है। ‘‘एक कवि की मौत पर’’ कविता इसका खांटी बयान करती है-
मैंने कवि की मृत्यु पर
गहरा दुःख व्यक्त किया
और अखबार में खबर छपवाई।
मैंने उसकी उपलब्धियों पर
पत्रिकाओं में लेख लिखे
और ढेर सा पारिश्रमिक पाया।
कुल 60 कविताओं में संग्रह की अंतिम कविता है ‘‘मेरी धरती के लोग’’। यह कविता इस संग्रह की सभी कविताओं का मानो निचोड़ प्रस्तुत करती है तथा उनकी उपस्थिति का स्मरण कराती है जिन्हें सामने देखते हुए भी अनदेखा कर दिया जाता है-‘‘मुझे अच्छे लगते हैं-/यह बशीरा/जो रिक्शा चलाता है/यह अन्ना/जो ठेला खींचता है/यह गोपालन/जो भाजी बेचती है,/यह सरबतिया/जो खोमचा लगाती है/यह सोहन सिंह/जो टैक्सी चलाता है।
हरजिदर सिंह सेठी की कविताएं पाठकों की आत्मा से संवाद करने में सक्षम हैं। इन्हें पढ़ने वाला ठिठक कर सोचेगा और उनकी ओर कम से कम एक बार अवश्य दृष्टिपात करेगा जिन्हें वह देख कर भी नहीं देखता है। इस लिहाज़ से हरजिंदर सिंह सेठी के इस काव्य संग्रह ‘‘मेरी धरती के लोग’’ की हर कविताएं अवश्य पढ़ी जानी चाहिए।
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