बतकाव बिन्ना की | ग्लोबल नए साल की सबई जनों खों राम-राम!
- डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
‘‘काए भैयाजी, कैसो मनाओ नओ साल?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘जो अपनो साल नोंई।’’ भैयाजी बोले।
‘‘काए नइयां?’’ मैंने पूछी।
‘‘अपनो नओ साल चैत से चलत आए। जो तो बिदेसियन को नओ साल आए।’’ भैयाजी बोले।
‘‘बात तो आप सई कए रए मनो जा ग्लोबल नओ साल तो आए। औ अपन जो ईको मनाएं तो ईमें कोनऊं हर्जा नईं।’’ मैंने कई।
‘‘काए हर्जा नईं?’’ भैयाजी ने पूछी।
‘‘हर्जा काए नईं? जा बिदेसी आए।’’ भैयाजी बोले।
‘‘औ बा काए आए जोन कलैण्डर अपन दिवार पे टांगे रैत आएं? औ जोन के हिसाब से अपनो पूरो साल चलत आए? फेर बा बी तो बिदेसी आए। ऊको बी छोड़ दओ जाए। चैत वारे मईना से बजट बने, सरकार चले औ सबई कछू होए।’’ मैंने कई।
‘‘मनो अपनो त्योहार तो अपन अपने कलैण्डर से मनाउत आएं।’’ भैयाजी बोले।
‘‘सो का भओ? बात तो चल रई जा नओ साल मानबे औ ने मानबे की।’’ मैंने कई।
‘‘हऔ! जा तो अंग्रेज डार गए सो अपन ढोउत फिर रए।’’ भैयाजी बोले।
‘‘सो, अपन उनको डारो भओ काए ढोऊत फिर रए? अपन को बी चाइए के ईको कचरा में मैंक देवें। मनो बा अंगरेजी भाषा का करहो आप? अंगरेजी पढ़ा-पढा के तो मुतके बाप-मताई अपनों मूंड़ ऊंचो करे फिरत आएं। बा बी तो बिदेसी आए।’’ मैंने कई।
‘‘अब ऊसे का छुटकारा मिलहे? जा तो कैबे की बातें आएं।’’ भैयाजी फुसफुसात भए बोले।
‘‘का कई? तनक ऊचों बोलो आप, मोए सुने नईं परी।’’ मैंने जानबूझ के कई।
‘‘अरे हम जा कै रए के अंग्रेजी पढ़ाबो तो बाप‘मताई की मजबूरी बन गई आए।’’ भैयाजी बोले।
‘‘काए की मजबूरी? का अपनी भाषा में पढ़ों नई जा सकता? के अपनी भाषा में पढ़े से नौकरी ने मिलहे? आपई सोचो के जब अपनी भाषा के अलावा औ कछू ने पढ़ाओ जैहे तो सब कछू अपई भाशा में हुइए। पढ़ाई बी औ नौकरी बी। बाकी जोन खों बिदेस जाने होए सो पढ़हे बिदेसी भाषा। अखीर जर्मन औ जपानी पढ़त आएं के नईं?’’ मैंने कई।
‘‘नईं, कै तो सई रईं तुम! बाकी जा नओ साल मनाए ने मनाए से का फरक परहे?’’भैयाजी बोले।
‘‘जेई सो मैं कै रई के जे नओ साल मना बी लओ जाए सो का फरक परहे? अपनी संसकृति इत्ती कच्ची नोंई के जो अपन जा नओ साल मनाहें तो संकरायत भूल जैहें। ई नओ साल मनाए से अपनी संकरायत को महत्व कम नई हो जाने। औ सूदी सी एक बात भैयाजी के जे आए ग्लोबल नओ साल। ईको मनाए से अपन गुलाम नई हो जाहें।’’ मैंने कई।
‘‘मने हम समझे नईं।’’ भैयाजी ने कई।
‘‘मैं जा कै रई के दुनिया के हर देस को अपनो नओ साल भओ करत आए। मने चीन वारों को अले आए, जापान वारों को अलग आए औ साउदी वारों को अलग। मनों बे ओरें सोई जे वारो नओ साल मनात आएं। सो जो ग्लोबल नओ साल कहाओ के नईं?’’ मैंने भैयाजी खों समझाओ।
‘‘हऔ, जा तो तुमाई मानी।’’ भैयाजी बोले।
‘‘सो, इत्तो औ मान लेओ के जब अपने देस के तीन नांव आएं भारत, हिन्दुसतान औ इंडिया, सो अपन तीन तरां के त्योहर तो मनाई सकत आएं। फेर खुशियां मनाए से कछू घटत नइयां। इत्ती छोटी सोच नईं रखो चाइए। अपनी संस्कृति ऐसी नइयां के कोनऊं के त्योहर मना लेबे से खराब हो जैहे। अपन ओरें अनेकता में एकता वारे ठैरे। ऊमें बी वसुधैव कुटुम्बकम वारे। औ जो नओ साल जेई धरती में मनाओ जात आए, सो अपने मना लेबे में का हरजा?’’ मैंने भैयाजी से कई।
‘‘बा तो सब ठीक आए। तुमाई बात में दम बी दिखा रई। मनो आजकाल ईके नांव पे होटल में बड़ो हुल्लड़ होत आए। बा तो ठीक नइयां।’’ भैयाजी हार मानबे वारे तो हते नईं।
‘‘कोन ने कई के हुल्लड़ होत आए? जो जात नइयां बेई ऐसो कैत आएं। औ जो जात आएं बे अगली साल को इंतजार करन लगत आएं। औ फेर सौ बात की एक बात, के बे होटल वारे कोनऊं बंदूक की नोंक पे तो लेजात नइयां? लोग खुदई पास खरदत आएं औ खुसी-खुसी जात आएं। अब ईमें कोनऊं खों माए पेट पिरात आए?’’ मैंने कई।
‘‘तुम तो ऐसे कै रईं के जैसे तुमईं हो आई हो।’’ भैयाजी बोले।
‘‘नईं, मैं काए को जाती? मोए नईं पोसात बा भीड़-भड़क्का। सो मैं कभऊं नईं जात आओं। बाकी मोए नई पोसात तो मैं सबईं खों मना करन लगों जे बी तो ठीक नइयां। जोन खों भलो लगे सो जाए। ऊके पइया, ऊकी खुसियां, अपन खो का?’’ मैंने कई।
‘‘चलो हम कुल्ल देर से सुन रए तुम दोई की गिचड़। अब जा पे डारो पानी औ जो सोचो के संकरायत को का करने? कां जाने?’’ भौजी हम दोई खों टोंकत भई बोलीं।
‘‘हऔ, सई कई आपने। नओ साल तो सुरू हो चुको, अब संकरायत की सुध लई जाए।’’ मैंने कई।
‘‘नरबदा जी के दरसन के लाने चलने होए सो चलो। बरमान चलो जाए।’’ भैयाजी बोले।
‘‘हऔ, जा ठीक रैहे।’’ भौजी बोलीं।
‘‘औ तुम बिन्ना? तुमें बरमान चलने के कऊं और?’’ भैयाजी ने मोंसे पूछी।
‘‘आप खों तो पतो आए के नरबदा जी के दरसन के लाने तो मोरो जी बरहमेस मचलत आए। बरमन चलो। मैं सो आगे-आगे चलहों।’’ मैंने हंस के कई।
‘‘हऔ, औ बंबुलिया गात भई।’’ भोजी हंस के बोलीं।
‘‘बिलकुल! बंबुलिया सो मोरी आत्मा में बसत आए।’’ मैंने बी कई।
‘‘सो, पक्को आए? फेर तुम ओरें पांछू ने हटियों। हम गाड़ी के लाने अगई से बोल देबी।’’ भैयाजी बोले।
‘‘हऔ, मोरी तरफी से तो पूरो पक्को आए।’’ मैंने कई।
‘‘औ, हमाई तरफी से बी।’’ भौजी बोलीं।
‘‘चलो बन गओ संकरायत को प्रोग्राम।’’ भैयाजी बोले।
‘‘देख लेओ भैयाजी, नओ साल मनाए से बी कछू फरक नईं परो।’’ मैंने हंस के कई।
भैयाजी सोई हंसन लगे।
‘‘सो, तुम दोई खों ग्लोबल नए साल की बधाई।’’ भौजी सोई हंसत भई बोलीं।
बाकी बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़िया हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की। औ सोचो के ई नए साल में का-का काम करने। फालतू की गिचड़ में ने परियो। सई कई के नईं?
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बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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