Sunday, May 18, 2014

शोध से निकलती हैं कहानियां.....Stories emerge from research


Dr. Sharad Singh
 Dear Friends,
A Good News ! My Interview is published in today's Dainik Jagran (in Jhankar Supplement). My this interview took by Ms Smita ji. So, I'm thankful to Dainik Jagran and Ms Smita ji.
So, Dear Friends ....Plz read it and share ...

http://epaper.jagran.com/ePaperArticle/18-may-2014-edition-Jhansi-page_22-4244-2248-266.html

http://epaper.jagran.com/ePaperArticle/18-may-2014-edition-Delhi-City-page_30-7216-5471-4.html

शोध से  निकलती हैं कहानियां ....... Stories emerge from research

Jhankar, Dainik Jagran -18. 05. 2014.

Wednesday, May 14, 2014

बहुजन साहित्य की संकल्पना अधिक हितकर ...


'फारवर्ड प्रेस' पत्रिका के 'बहुजन साहित्यिक वार्षिकी' (May 2014)में बहुजन साहित्य की अवधारणा पर एक अत्यंत महत्वपूर्ण परिचर्चा आयोजित की गई जिसमें पंकज बिष्ट, मंगलेश डबराल, सुरेन्र्द स्निग्ध, जयप्रकाश कर्दम, विजय बहादुर सिंह, प्रेमपाल शर्मा, मूलचंद सोनकर, डॉ.रामचंद्र, कृष्णा अग्निहोत्री, रामधारी सिंह दिवाकर, अनिता भारती, राणा प्रताप, गिरिजेश्वर प्रसाद, पुंज प्रकाश सहित मेरे विचार भी शामिल हैं। यूं तो ये पूरा विशेषांक पठनीय है पर मैं बहुजन साहित्य पर प्रकाशित अपने विचार यहां शेयर कर रही हूं-
Dr Sharad Singh's view on Bahujan literature published in spacial issue of  'Forward Press' Magazine, May 2014 

Sunday, May 4, 2014

संस्कार, संस्कृति और समाज का आकलन करती पुस्तक ...कैलाश चन्द्र पंत की पुस्तक पर समीक्षात्मक लेख


Dr Sharad Singh
 ‘संस्कार, संस्कृति और समाज’-लेखकः कैलाश चन्द्र पंत
संस्कार, संस्कृति और समाज का आकलन करती पुस्तक
                                           - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

संस्कार, संस्कृति और समाज - ये तीनों तत्व परस्पर एक-दूसरे के पूरक हैं। समाज मनुष्यों के समूह से बनता है और मनुष्य में पाए जाने वाले गुणों से उपजे आचरण संस्कार का निर्माण हैं। जबकि संस्कार वह सांचा है जो संस्कृति को आकृति प्रदान करती है। यदि संस्कार उत्तम होंगे तो संस्कृति का स्वरूप भी सुसंस्कृति का होगा किन्तु यदि संस्कार में खोट होगा तो अपसंस्कृति का जन्म होगा। वरिष्ठ एवं वयोवृद्ध लेखक कैलाश चन्द्र पंत की पुस्तक संस्कार, संस्कृति और समाजइसी तथ्य का आकलन करती है। 26 अप्रैल 1936 को मध्यप्रदेश के महू में जन्में श्री कैलाश चन्द्र पंत का एक लम्बा जीवन-अनुभव है और समाज के प्रति उनकी एक विशिष्ट दृष्टि है।
पुस्तक में समाज और संस्कृति के साथ ही संस्कारों की विवेचना करते हुए उनके बारह लेख संग्रहीत हैं। अपने पहले लेख संस्कार, संस्कृति और समाजमें पंत जी लिखते हैं कि जिन भारतीय संस्कारों की प्रशंसा विदेशी विद्वान भी किया करते थे, उन संस्कारों का आज क्षरण होता जा रहा है। वे क्षरण का कारण ढूंढते हुए वेद व्यास, जयशंकर प्रसाद एवं महात्मा गांधी के संबंध में फ्रेड्रिक फिशर का उद्धरण देते हैं। फ्रेड्रिक फिशर ने अपनी पुस्तक दैट स्ट्रैंज लिटिल ब्राउन मैनमें महात्मा गांधी के संबंध में लिखा था कि यदि महात्मा गांधी ने सत्याग्रह और अहिंसा से साम्राज्यवाद से मुक्ति की बात किसी योरोपीय देश में लोगों से कही होती तो वे उसे पागल करार देकर उसकी बात अनसुनी कर देते।पंत जी लिखते हैं कि फ्रेड्रिक फिशर भी यह मानते थे कि यदि भारत की जनता ने प्रतिरोध के शस्त्र के रूप में महात्मा गांधी के सत्य और अहिंसा के मार्ग को स्वीकार किया तो यह जनता के भीतर मौजूद संस्कारों का प्रतिफल था। संस्कारों को परिभाषित करते हुए लेखक ने (पृ. 15 में) लिखा है कि अंग्रेजी में कहावत है कि मेन इज़ ए सोशल एनिमलकिन्तु भारतीय संस्कृति में मेनअर्थात् मनुष्य को सामाजिक प्राणी माना जाता है, सामाजिक पशुनहीं।
Dr Sharad Singh in Pathak Manch, Sagar, MP - 30.04.2014

वर्तमान समाज में संस्कारों में आती जा रही गिरावट के कारण के संदर्भ में लेखक ने बल पूर्वक अपनी बात रखते हुए कहा है कि ‘‘वर्तमान का जो परिदृष्य है उसने अर्थ केन्द्रित चिन्तन को जन्म दिया है। अर्थ जब जीवन का मुख्य उदेश्य हो जाए तो लोभ, मद, ईष्र्या उसके अनुवर्ती भाव हो जाते हैं।’’ (पृ. 21)
दूसरा लेख है साहित्य, संस्कृति और शिक्षा। इसमें पंत जी लिखते हैं कि साहित्य, संस्कृति और शिक्षा का परस्पर संबंध बहुत गहरा और आपस में निर्भर है।वे आगे लिखते हैं कि विद्या का अर्थ ही चेतना को मुक्त करने वाली कहा गया है। मुक्त चेतना से ही विवेक विकसित होता है, चिन्तन का मार्ग खुलता है। तभी मानव चेतना उन शाश्वत मूल्यों की प्रतिष्ठा कर पाती है जिनको स्वीकृत कर किसी विशिष्ट समूह द्वारा उनका अनुपालन करने से एक राष्ट्र का निर्माण होता है।’’ (पृ. 29)
पंत जी के इस चिन्तन के संदर्भ में श्रीमद् भगवतगीताका वह श्लोक याद आता है कि -
क्रोधाम्दवति सम्मोहह, सम्मोहास्मृति विभ्रमः
स्मृति भ्रंशाद बुद्धि नाशो, बुद्धि नाशा प्रणश्यति।।
अर्थात् विवेक का नाश करने वाला क्रोध व्यक्ति को इस तरह सम्मोहित कर लेता है  कि वह क्रोध के वशीभूत हो कर काम करने लगता है। इस तरह क्रोध विवेक को नष्ट कर के भ्रम की स्थिति उत्पन्न कर देता है। भ्रम से बुद्धि अर्थात् सच और झूठ को परखने की क्षमता का नाश हो जाता है और बुद्धि का नाश होना प्राणों के नाश होने का कारण बनता है।
अतः शिक्षा भले-बुरे की परख करने की क्षमता का विकास करती है जिससे सांस्कृतिक मूल्यों का संरक्षण होता है और साहित्य सांस्कृति मूल्यों और शिक्षा के मध्य सेतु का काम करती है।
पुस्तक में प्रत्येक लेख किसी न किसी बिन्दु पर एक दूसरे से सम्बद्ध हैं। जैसे ‘‘जड़ों से उच्छेदित करती शिक्षामें वर्तमान शिक्षा पद्धति एवं पश्चिमी संस्कृति से प्रभावित वर्तमान लोकाचार की विवेचना की गई है। ‘‘विकृति इतिहास के दुष्प्रभाव’’ शीर्षक लेख में इतिहास के पुनर्लेखन की आवश्यकता को रेखांकित किया गया है। इस लेख में लेखक ने महात्मा गांधी द्वारा नई शिक्षा प्रणाली के संदर्भ में दिए गए अंग्रेज विद्वान हक्सले के उद्धरण को सामने रखा है। गांधी जी ने हक्सले के बारे में लिखा था कि -उस आदमी ने सच्ची शिक्षा पाई है, जिसके शरीर को ऐसी आदत डाली गई है कि वह उसके बस में रहता है, जिसका शरीर चैन से और आसानी से सौंपा गया काम करता है।‘ (पृ.40)
मैं यहां संदर्भगत बता दूं कि अंग्रेजी के सुप्रसिद्ध उपन्यासकार एवं आलोचक आल्ड्स  हक्सले  का जन्म 26 जुलाई 1894 को लन्दन के निकट स्थित, उपनगर सरे के एक उच्च माध्यम वर्गीय परिवार में हुआ। हक्सले के पिता लियोनार्ड हक्सले स्वयं भी एक कवि, संपादक एवं जीवनीकार थे। हक्सले की शिक्षा-दीक्षा ईटन कॉलेज बर्कशायर में हुई। 1908 से लेकर 1913 तक हक्सले  बर्कशायर  में रहे। इस बीच हक्सले की माँ का देहांत हो गया। हक्सले जब 16 वर्ष के थे तभी उन्हें आंखों की गंभीर बीमारी हो गई। जिसके कारण हक्सले पूरी तरह से अंधे हो गए। लगभग 18 महीने की गहन चिकित्सा के बाद उनकी आंखों में मात्र इतनी रौशनी लौटी की वे प्रयास करके कुछ पढ़-लिख सकें। इसी बीच उन्होंने ब्रेल लिपि भी सीखी। कमजोर दृष्टि होते हुए भी हक्सले ने सन् 1913 से 15 के वर्षों में आक्सफोर्ड से स्नातक की परीक्षा उत्तीर्ण की। आड्ल्स हक्सले साहित्यकार और वैज्ञानिक की वंश परम्परा में जन्मे अपनी तरह के बौद्धिक थे , जिनमें  एक वैज्ञानिक , सत्यान्वेषी चिन्तक के गुण मौजूद थे। वे कविमना भी थे। सन् 1916 में उनकी पहली कविता संग्रह प्रकाशित हुआ। इसके बाद उन्होंने विविध विषयों पर कई पुस्तकें लिखीं। उनकी मृत्यु 22 नवम्बर सन् 1063 में हुई। महात्मा गांधी आल्ड्स  हक्सले के जीवन से बहुत प्रभावित रहे।
महात्मा गांधी मानते थे कि शिक्षा वही दी जानी चाहिए जो व्यक्ति को सत्य से परिचित करा सके। इसी बात को आधार बनाते हुए पंत जी ने आग्रह किया है कि भारतीय इतिहास जो कि पश्चिमी पूर्वाग्रह से ग्रस्त हो कर लिखा गया है, उसे पुनः लिखा जाना चाहिए। पंत जी लिखते हैं कि ‘‘गांधीवादी विचारक धर्मपाल ने अंग्रेजों के द्वारा फैलाए गए इस झूठ की पोल खोल दी कि - (1) अंग्रजों से आने के पूर्व भारत में शिक्षा व्यवस्था नहीं थी। (2) लड़कियों और षूद्रों को पढ़ने की अनुमति नहीं थी, (3) भारत में औद्योगिक उत्पादन नहीं होता था, (4) भारत एक असम्य और आदिमयुग में जीने वाला देश था।’’ (पृ.49,.50)
पंत जी आगे लिखते हैं कि ‘‘भारत को अपनी अस्मिता का बोध तभी होगा जब भारतीय मेधा मौलिक शोध विश्व के समक्ष रखेगी।’’ (पृ.50)
यहां भी संदर्भगत् मैं विचारक धर्मपाल के बारे में संक्षिप्त जानकारी देना चाहूंगी कि गांधी की भारत में की गई स्वराज साधना के बाद जिनका भी जन्म हुआ उसने गांधी के साथ प्रत्यक्ष या परोक्ष संवाद अवश्य बनाया। देश के प्रमुख गांधीवादी विचारकों में पहला नाम विनोबा का है तो दूसरा लोहिया का, तीसरा एन. के. बोस का और चैथा जे.पी.एस. ओबेराय का। इसी कड़ी में पांचवा नाम धर्मपाल का है। धर्मपाल का जन्म सन् 1922 में उत्तरप्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले में हुआ था। उनका निधन सन् 2006 में हुआ। सन् 1949 में एक अंग्रेज महिला फिलिप से उनका विवाह हुआ था।
धर्मपाल ने भारत के सनातन मूल्यों को समझने के लिए महात्मा गांधी के विचारों को माध्यम के रूप में चुना। सन् 1942 से 1966 तक धर्मपाल गांधीवादी रचनात्मक कार्य में लगे रहे। फिर सन् 1966 से 1986 तक उनका अधिकांश समय शोध एवं लेखन को समर्पित रहा। धर्मपाल ने कई महत्वपूर्ण पुस्तकें लिखी हैं। जिनमें से सन् 1971 में सिविल डिसओबीडियेन्स इन इंडियन ट्रेडिशन विद् सम अर्ली नाईन्टीन्थ सेन्चुरी डाक्युमेंट्सका प्रकाशन हुआ। सन् 1971 में ही उनकी दूसरी महत्वपूर्ण पुस्तक इंडियन साइंस एण्ड टेक्नालाजी इन दि एटीन्थ सेन्चुरी: सम कन्टेम्पररी एकाउन्ट्सप्रकाशित हुई। सन् 1972 में उनकी तीसरी पुस्तक आई दि मद्रास पंचायत सिस्टम: ए जनरल ऐसेसमेंट।  उनकी सभी पुस्तकों में दि ब्यूटीफुल ट्रीनामक पुस्तक का विशेष महत्व है।
कैलाश चन्द्र पंत की पुस्तक संस्कार, संस्कृति और समाजके अन्य लेख भी अपने आप में महत्वपूर्ण हैं। स्वदेशी भावना प्रेम’, ‘विश्व हिन्दी सम्मेलन होने का अर्थ’, ‘भारतीयता की प्रतिनिधि भाषा’, ‘धर्म की भ्रामक धारणा’, ‘धर्मान्तरणः राष्ट्र के विखंडन का खतरा’, ‘संस्कारों के रोपण की भारतीय शैली’, ‘जड़ों की पहचानऔर संस्कृति का व्यापक फलकवे लेख हैं जिनमें कैलाश चंद्र पंत जी ने संस्कृति एवं सांस्कृतिक मूल्यों की भारतीय अवधारणा को वर्तमान परिदृष्य में जांचा-परखा है। वे स्वदेशी भावना प्रेमऔर विश्व हिन्दी सम्मेलन होने का अर्थलेखों में मातृभाषा एवं संवाद भाषा के रूप में हिन्दी की महत्ता को खंगालते हैं। पंत जी लिखते हैं कि आज जो ग्लोबल विलेजका संदेश दिया जा रहा है, वह वस्तुतः भारतीय संस्कृति का वसुधैव कुटुम्बकमही तो है।
संस्कारों के रोपण की भारतीय शैलीलेख में लेखक ने सर्वे भवन्तु सुखिनःको भारतीय संस्कारों का मूलमंत्र कहा है। इसी तारतम्य में जड़ों की पहचानलेख में लेखक ने तुलसीदास जी के रामराज्य की अवधारणा का उल्लेख किया है -
दैहिक दैविक भौतिक तापा, राम राज्य नहिं काहुहि व्यापा।
सब नर करहिं परस्पर प्रीती, चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती।। 
पंत जी लिखते है कि भारत में मूलतः राज्य की अवधारणा का यही सिद्धांत रहा है। इसे आज के भौतिक युग में यूटोपिया (अति आदर्शवादी) कह कर खारिज नहीं किया जा सकता। (पृ.94)
संस्कार, संस्कृति और समाजएक ऐसी पुस्तक है जिसमें भारतीय संस्कृति के मूल्यों को आधार बना कर वर्तमान में दिखाई पड़ने वाले सांस्कृतिक विचलन को बखूबी परखा गया है। आयु की परिपक्वता एवं अनुभवों की सघनता प्रतयेक व्यक्ति को एक निष्चित विचारधारा को अपनाने को प्रेरित करती है, यह तथ्य इस पुस्तक के लेखों स्पष्ट रूप से अनुभव किया जा सकता है जो कि लेखक की वैचारिक स्पष्टता का द्योतक है और पुस्तक में संग्रहीत लेखों के विषयों के प्रति चिन्तन-मनन करने को प्रेरित करता है। यह पुस्तक सांस्कृतिक मूल्यों की दृष्टि से आत्मावलोकन एवं आत्ममंथन के लिए भी प्रेरित करती है इस संदर्भ में पुस्तक के कलेवर की गुणवत्ता को स्वीकार किया जा सकता है।

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  दिनांक 30.04.2014 को पाठकमंच, सागर इकाई में मेरे द्वारा पढ़ा गया कैलाश चन्द्र पंत की पुस्तक  ‘संस्कारसंस्कृति और समाज’ पर समीक्षात्मक लेख 

Thursday, May 1, 2014

भीड़ में स्त्री को छूने मचलते गंदे हाथ ...


प्रिय मित्रो,
समाचार पत्र नई दुनिया की पत्रिका नायिका में मेरा आलेख प्रकाशित हुआ था आपसे साझा कर रही हूं ...
इसे इस लिंक पर भी पढ़ सकते हैं ...

http://naiduniaepape...r.jagran.com/epapermain.aspx


Wednesday, April 23, 2014

राजनीति के समीकरण में महिलाओं का गणित


चुनावी संदर्भ पर विशेष ......
Dr Sharad Singh

मित्रो, ‘इंडिया इन साइड’ के April 2014 अंक में ‘वामा’ स्तम्भ में प्रकाशित मेरा लेख आप सभी के लिए ....
पढ़ें, विचार दें ....आपका स्नेह मेरा उत्साहवर्द्धन करता है.......
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वामा (प्रकाशित लेख...Article Text....)......
राजनीति के समीकरण में महिलाओं का गणित 
- डॅा. (सुश्री) शरद सिंह

राजनीति के समीकरण में महिलाओं के गणित को हर बार इतनी चतुराई से रखा जाता है कि मानो चुनाव परिणाम आते ही यह गणित भी हल हो जाएगा। हर बार की तरह 2014 के लोकसभा चुनाव में भी प्रत्येक राजनीतिक दलों ने अपनी जीत सुनिष्चित करने के लिए महिलाओं रिझाने का हर संभव प्रयास कर किया। किसी ने तैंतीस प्रतिषत आरक्षण का पुराना राग अलापा तो किसी ने रसोई गैस सिलेंडरों की सब्सिडी और गैर सब्सिडी संख्या के पासे फेंके। ग्रामीण एवं पिछड़े वर्ग की महिलाओं को अपने दल के प्रति आकर्षित करने के लिए टी.वी. टॉकशोनुमा कार्यक्रम भी किए गए। कुल मिला कर निचोड़ यही कि प्रत्येक पार्टी की यह मंषा रही है कि महिलाओं के सारे के सारे वोट उनकी झोली में आ कर गिरें। पूरे के पूरे शत-प्रतिशत । लेकिन यही गणित टिकट वितरण के समय नहीं रहता है। चाहे 2004 का आम चुनाव हो या 2009 का, महिला उम्मीदवारों की संख्या पुरुष उम्मींदवारों से बहुत कम रही। यदि प्रत्याशी का चुनाव करने, वोट दे कर उन्हें सांसद या विधायक बनवाने की योग्यता महिलाओं में देखी जाती है लेकिन ऐसा लगता है कि महिला प्रत्याशी के मामले में यह विष्वास कहीं भटक जाता है।

स्वतंत्रता से पहले ही देश में पहली बार 1917 में महिलाओं को राजनीति में भागीदारी की मांग उठी थी, जिसके बाद वर्ष 1930 में पहली बार महिलाओं को मताधिकार मिला। हमारे देश में महिलाएं बेशक राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, लोकसभा में विपक्ष की नेता और लोकसभा अध्यक्ष के साथ-साथ अन्य कई महत्वपूर्ण राजनीतिक पदों पर आसीन रही हैं, लेकिन राजनीति में महिलाओं की भागीदारी में अधिक सुधार नहीं हुआ। इसे दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि संसद में 33 प्रतिशत आरक्षण दिलाने के लिए लाया गया महिला आरक्षण विधेयक कुछ पार्टियों के रवैये के चलते सालों से लंबित पड़ा है। इससे ज्यादा दुख की बात है कि राष्ट्रीय दल भी 10.15 प्रतिशत से अधिक महिलाओं को लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए टिकट नहीं देते हैं। 
एक समय था जब महिलाओं को सक्रिय राजनीति में आने नहीं दिया जाता था। इसलिए नहीं कि महिलाओं में राजनीति की समझ नहीं थी बल्कि इसलिए कि राजनीतिक गलियारों को महिलाओं के योग्य नहीं माना जाता था। निःसंदेह इक्कीसवीं सदी के आरम्भ तक परिदृश्य कहुत कुछ बदला। पंचायतों से ले कर संसद तक महिलाओं की पहुंच दिखाई देने लगी। मगर प्रश्न वही कि इन महिलाओं का प्रतिशत पुरुषों की तुलना में कितना रहा... दस प्रतिशत, बीस प्रतिशत या तीस प्रतिशत। पंचायतों पंच, सरपंच के रूप में क्रियाशील दिखाई देने वाली महिलाओं के सिक्के के दो पहलू हैं। एक पहलू में वे महिलाएं हैं जो अपने दम-खम से पंचायत के निर्णय लेती हैं और गांवों के विकास के ढांचे तैयार करती हैं। दुर्भाग्य से ऐसी महिलाओं का प्रतिशत बहुत ही कम है। अधिसंख्या उन महिलाओं की है जो -महिलाओं के लिए आरक्षित सीट- होने के कारण चुनाव में खड़ी कर दी गईं। परिवार के पुरुषों के दांवपेंच ने उन्हें जिताया और चुनाव जीतने के बाद वे एक बार फिर अपने घर की चैखट के भीतर सिमट कर रह गईं। इसके बाद उनके नाम से उनके -सरपंच पति- उनका काम सम्हालने लगे। जब भी निचले स्तर पर राजनीति में महिलाओं की भागीदारी के आंकड़े सामने रखे जाते हैं तो उन आंकड़ों में यह विभाजनरेखा नहीं होती है। अतः जमीनी सच्चाई से परे ये सुनहरे आंकड़े राजनीति में महिलाओं की तरक्की के शंखनाद करते नज़र आते हैं।

भारत षासन के एक सर्वेक्षण के अनुसार आम चुनाव 2009 में महिलाओं की सबसे बड़ी संख्या 59 लोकसभा में आई थी, जबकि उसके पहले सदन में महिला सदस्यों की संख्या 45 थी। 15वीं लोकसभा में महिलाओं की सदस्यता 10.86 प्रतिशत थी और 13वीं लोकसभा भी 9.02 प्रतिशत सदस्यता के साथ इसके काफी करीब थी। 1996 से निचले सदन में सदैव कम से कम 40 महिलाएं चुनी जाती रही है। महिलाओं की सबसे कम संख्या लोकसभा में 1977 में थी जब मात्र 19 सदस्य ही निचले सदन में पहुंच पायी थी, जो कि लोकसभा की कुल सीटों का महज 3.50 प्रतिशत ही था। इसके अतिरिक्त इतिहास में और कोई दूसरा अवसर नहीं है जिसमें की महिलाएं 20 संख्या तक भी नहीं पुहंच पायी। महिलाओं के चुनाव लड़ने के संबंध में महिला प्रतिभागियों की सर्वाधिक संख्या 1996 के चुनाव में 599 थी जिसके बाद 2009 में 556 महिला उम्मीदवारों की संख्या और 2004 में 355 थी। यह 1980 की सातवीं लोकसभा थी जब महिला उम्मीदवारों ने 100 के आंकड़े को पार किया। उससे पहले महिला उम्मीदवारों की संख्या हमेशा 100 के नीचे ही रही थी। चुनाव लड़ने में महिलाओं की भागीदारी पुरूषों की तुलना में काफी कम हैं। 9वें आम चुनाव तक महिलाओं की भागीदारी पुरूषों से 30 गुना कम थी। जबकि, 10वें आम चुनाव से इस भागीदारी में सुधार हुआ। 

राजनीति में महिलाओं के स्वतंत्र अस्तित्व के न्यून आंकड़ों के पीछे कहीं राजनीति और अपराध की परस्पर भागीदारी तो जिम्मेदार नहीं है, इस प्रश्न को टटोलना भी जरूरी है। यदि विगत कुछ दशकों के पन्ने पलटे जाएं तो कए भयावह दृश्य आंखों के समाने उभरने लगता है। एक चेहरा उभरता है नैना साहनी का जो दिल्ली प्रदेश युवा कांग्रेस की महासचिव थी। नैना के पति सुशील शर्मा उसी दल में प्रदेश युवक कांग्रेस अध्यक्ष थे। सुशील शर्मा नैना को तंदूर में जलाने के अभियुक्त पाए गए। नैना की तरह सुषमा सिंह भी जघन्य अपराध की शिकार हुई। सुषमा सिंह को मगरमच्छ को खिला दिया गया था। इसी तरह मधुमिता शुक्ला, गीतिका शर्मा, पूर्णिमा सिंह, शहला मसूद आदि अनेक ऐसे नाम हैं जो राजनीति की सीढि़यां चढ़ ही रही थीं कि उनके अस्तित्व को ही मिटा दिया गया। यह राजनीति का हिंसात्मक रूप ही है जो आम महिलाओं को राजनीति की ओर मुड़ने से संभवतः रोकता है। इसके परे वही दूसरा तथ्य कि राजनीतिक दलों में पुरुषों का वर्चस्व व्याप्त है। अपराधी प्रवृत्ति के पुरुषों को यह नागवार गुजरता होगा कि कोई महिला उनसे आगे कैसे बढ़ रही है। 
भारतीय राजनीति में महिलाओं की भागीदारी पुरुषों के बराबर होनी चाहिए लेकिन ऐसा तभी संभव है जब प्रत्याशी के रूप में भी महिलाओं की योग्यता पर उतनी ही विश्वास किया जाए जितना कि एक मतदाता के रूप में किया जाता है। 2014 के आम चुनाव में जिस तरह प्रत्येक दलों ने महिला मतदाताओं को रिझाने का प्रयास किया, उसी तरह प्रत्याशी का टिकट देते समय भी किया गया होता तो इस चुनाव में ही महिला उम्मीदवारों की संख्या बढ़ गई होती। महिलाओं के हित में योजनाओं के निर्माण और क्रियान्वयन के लिए सक्रिय राजनीति में महिलाओं की अधिक से अधिक भागीदारी आवश्यक है।

India Inside, April 2014-page-017

Thursday, March 20, 2014

बाबा नागार्जुन के उपन्यासाें में सात सवालों-सी सात नायिकाएं

लेख                                  
 
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

नागार्जुन मानवीय संवेदना के चितेरे उपन्यासकार थे। उनके कथा साहित्य में जहां एक ओर बिहार के मिथिलांचल के ग्राम्य जीवन, सामाजिक समस्याओं, राजनीतिक आन्दोलनों एवं सांस्कृतिक जीवन की अभिव्यक्ति दिखार्इ पड़ती है वहीं उनके उपन्यासों में मानवीय दशाओं एवं चरित्रों का अदभुत खरापन उभर कर सामने आता है। जिस वातावरण से उनके कथा-पात्र आते हैं उसी वातावरण का निर्वहन समूची कथावस्तु-विस्तार में होता चलता है। नागार्जुन के कथा समाज में स्त्री-पुरुष, युवक-युवतियां, वर्ण और जातिगत भेद , सम्पन्न-विपन्न तथा पोषण एवं शोषण के ऐसे पारदर्शी चित्र चित्रित मिलते हैं कि जिनके आर-पार देखते हुए समाज की बुनियादी दशाओं को बखूबी टटोला तथा परखा जा सकता है। नागार्जुन ने अपनी कविताओं में जिस प्रकार सामाजिक विकृतियों पर प्रहार किया है वह समाज दर्शन की गहन दृष्टि के बिना संभव नहीं था। उन्होंने आमजन के जीवन को निकट से देखा और अनुभव किया था। उन्होंने ग्रामीण परिवेश में स्त्री के कष्टप्रद जीवन को मानवीय स्तर पर जांचा और परखा था। गांव में स्त्री के रहन-सहन का सूक्ष्म चित्रण नागार्जुन के गध साहित्य में भी देखने को मिलता है। जहां परिवार के पुरुष सदस्य इकटठे हों वहां स्त्री की उपसिथति स्वीकार नहीं की जाती है। पुरुषों के बीच स्त्रियों का क्या काम? जैसी मानसिकता के कारण ग्रामीण स्त्री पारिवारिक मसलों में भी शामिल नहीं हो पाती है। जहां पुरुष हों वहां पुरुष का ही कब्जा रहता है, चाहे घर का आंगन ही क्यों न हो। इस तथ्य को 'वरुण के बेटे में  नागार्जुन ने बड़े ही सहज ढंग से प्रस्तुत किया है-''प्रायमरी स्कूल का वह मितहा मकान गांव के पूर्वी छोर पर था, तीन तरफ से घिरा हुआ। अंगनर्इ का अगला हिस्सा तग्गर कनेर, बेला हरसिंगार के बाड़ों से घिरा था। बिरादरी के बालिग मेम्बरान जुटे थे, भोला, खुरखुन, बिलुनी, रंगलाल....नंदे वगैरह-सारे के सारे। पचास-साठ जने होंगे। औरत एक भी नहीं। रतिनाथ की चाची और जमुनिया का बाबा जैसे उपन्यासों में नागार्जुन भारतीय समाज में स्त्रियों के शोषण के विरुद्ध डट कर खड़े मिलते हैं।
मधुबनी वह क्षेत्र जहां नागार्जुन से स्त्रियों की सामाजिक दशा को जाना और परखा, दरभंगा का वह पूरा इलाका जहां नागार्जुन ने स्त्रियों को अपने असितत्व के लिए संघर्ष करते देखा, उनके उपन्यासों में रचा-बसा है। इसीलिए उनके उपन्यासों की स्त्री समस्त भारतीय सित्रयों का प्रतिनिधित्व करती हुर्इ कुछ सवाल समाज के सामने रखती दिखार्इ देती है और नागार्जुन की यह खूबी थी कि उन्होंने सवालों पर ही अपने विचारों को नहीं रोका, उन्होंने उन सवालों का उत्तर भी स्वयं ही दिया। प्रस्तुत लेख में नागार्जुन के उपन्यासों की सात नायिकाओं पर चर्चा की गर्इ है जो सात सवालों की भांति सामने आती हैं और उन सवालों के उत्तर भी वे स्वयं देती हैं। 

नागार्जुन के साहित्य में ग्राम्य जीवन की प्रमुखता है। ग्रामीण परिवेश में जीवनयापन करने वाली सित्रयों की दशा को रेखांकित करने में नागार्जुन ने अपनी पैनी दृषिट का भरपूर उपयोग किया है। उनके उपन्यासों की नायिकाएं परम्परागत भारतीय स्त्री होते हुए भी अपने भीतर अनेक प्रश्न समेटे हुए दिखार्इ देती हैं। उनका बाहय कलेवर भले ही शोषित स्त्री का हो किन्तु उनके भीतर एक विद्रोहणी की झलक स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है। यही कारण है कि बाबा नागार्जुन के उपन्यासों की सात नायिकाएं व्यवस्था को ललकारती हुर्इं समाज के समक्ष सात सवालों की तरह आ खड़ी होती हैं। ये नायिकाएं हैं- गौरी, मधुरी, बिसेसरी, चम्पा, भुवन, इमरतिया और पारो।

गौरी

'रतिनाथ की चाची उपन्यास की नायिका है गौरी। गौरी के व्यकितत्व में विपरीतध्रुवीय दो पक्ष दिखायी देते हैं। एक पक्ष में गौरी एक परम्परागत गृहस्थ स्त्री के रूप में सामने आती है। जो अधेड़ रोगी पति की मृत्यु के कारण विधवा हो जाती है। अपने दुष्कर्मी देवर जयनाथ की कामवासना की शिकार होती है। अपने देवर की कुचेष्टा के संबंध में वह कहती है- 'मैं और कुछ नहीं जानती, वह भादों का महीना था। अमावस्या की रात थी। एक घनी और अंधेरी छाया मेरे बिस्तर की तरफ बढ़ आयी, उसके बाद क्या हुआ इस बात का होश अपने को नहीं रहा। 

यह उस स्त्री के उदगार थे जो संबंधों के नारकीय पक्ष का अनुभव करके  स्तब्ध रह जाती है। उसके जीवन में दुखों का अंत यहीं नहीं होता, गर्भवती गौरी को सामाजिक अपमान सहन करना पड़ता है। अन्य औरतें उसे व्यभिचारिणी और कुलटा कहती हैं। इतना ही नहीं उसका अपना बेटा उमानाथ अपने पिता की बरसी पर जब घर आता है तो वह मां को चरित्रहीन मान कर उसके बाल पकड़ कर खींचता है तथा पैरों से ठोकर मारता है। गौरी एक परम्परागत गृहणी की भांति हर तरह का अपमान एवं मार-पीट सहती रहती है। एक परम्परागत गृहणी की भांति उसका दान-धर्म में भी अगाध विश्वास है।
गौरी का दूसरा पक्ष ठीक विपरीत है। अपने दूसरे पक्ष में वह एक जागरूक स़्त्री के रूप में दिखायी पड़ती है। गांव में मलेरिया फैलने पर मलेरिया की मुफत दवा बांटती है, जमींदारों के विरुद्ध संघर्ष करने वाली क्रांतिकारी किसान सभा संगठन में अपना दो साल पुराना फटा कम्बल दे कर सहायता करती है तथा अखिल भारतीय सूत प्रतियोगिता में अव्वल आती है। यह जागरूक गौरी अपने सगे पुत्र से मिलने वाला अपमान पी कर अपने भतीजे रतिनाथ पर ममता उंढ़ेलती है। इस प्रकार नागार्जुन ने गौरी के रूप में स्त्री के व्यकितत्व को एक सामाजिक प्रश्न के रूप में सामने रखते हुए स्वयं उसका उत्तर दिया है कि एक भारतीय स्त्री अपने व्यकितत्व को अलग-अलग कर्इ खानों में बांट कर भी संघर्षरत रहती है। वस्तुत: यह संघर्ष ही उसके व्यकितत्व के तमाम हिस्सों को एक सूत्र में बांधे रहता है।


मधुरी

दूसरी नायिका है मधुरी जो 'वरुण के बेटे उपन्यास की प्रमुख नायिका है। वह खुरखुन की बड़ी बेटी है। वह देखने में सामान्य युवती है। उसका कद मझोला है। उसका मंगल नामके युवक से प्रेम संबंध था, किन्तु विवाह के बाद वह इस संबंध को स्थगित कर देना ही उचित समझती है। वह मंगल से कहती है 'देखेा मंगल! अब हम छोकरा-छोकरी नहीं रहे । धूल-मिटटी के बचकाने खेल काफी खेल चुके। सयान समझदार मां- बाप और सास -ससुर ने तुम पर जो जिम्मेदारी सौंपी है, उनसे जी चुराना कायरता होगी। तुम्हें अपनी घरवाली के प्रति वफादार होना, मुझे अपने घरवाले के प्रति।......मैं तुम्हारा घर बरबाद नहीं करना चाहती मंगल, मैं नहीं चाहती कि एक औरत की सिंदूरी मांग पर कालिख पोतती रहूं।

यही मधुरी मछुआरों के साथ जमींदारी का विरोध करती है, तो उसमें एक ऐसी स्त्री की छवि दिखार्इ पड़ती है जो समाज के आदर्श रूप की पक्षधर है, जो अन्याय का विरोध करने का साहस रखती है और जिसे निम्न वर्ग की भलार्इ की चिन्ता है।

मधुरी के रूप में 'वरुण के बेटे में भी नायिका का व्यकितत्व और चरित्र स्पष्ट दो भागों में बंटा दिखायी देता है। पहला भाग मधुरी के विवाह के पहले का है जिसमें वह एक प्रेयसी, अल्हड़ युवती है। जिसके क्रियाकलाप यह सवाल खड़ा करते हैं कि क्या वह कभी किसी संकट का सामना कर सकेगी अथवा किसी संघर्ष को आकार दे सकेगी ? इस प्रश्न के उत्तर के रूप में मधुरी के जीवन का दूसरा पक्ष सामने आता हैं। जिसमें वह जन चेतना की अलख जगाती दिखायी पड़ती है। वह स्वयं पुलिसियान के पिछले छोर पर खड़ी हो कर, दाहिना हाथ घुमा-घुमा कर नारे लगाती है और मछुआरा संघ के लोगों का उत्साहवर्द्धन करती है। इस प्रकार नागार्जुन इस तथ्य को स्पष्ट करते हैं कि एक स़्त्री समय और परिसिथति की आवश्यकता के अनुरूप स्वयं को किस प्रकार ढाल लेती है। यह नागार्जुन के सूक्ष्म आकलन-दृषिट का कमाल है।

बिसेसरी

बिसेसरी 'नर्इ पौध उपन्यास की प्रमुख नारी पात्र है। यूं तो इस उपन्यास में कोर्इ भी नारी पात्र नायिका के रूप में नहीं है, किन्तु बिसेसरी रूपी पात्र कथानक में नायिका के समान उभरता है। बिसेसरी पिताविहीन गरीब घर की कन्या है। उसका नाना नौ सौ रुपए के बदले उसका बेमेल विवाह कराना चाहता है, जिससे वह व्याकुल हो उठती है। इसी के साथ बिसेसरी में वह स़्त्री प्रकट होती है जो सामंती परम्पराओं, रूढि़यों और थोथी नैतिकता की बलिवेदी पर स्त्रियों को चढ़ाए जाने की कटटर विरोधी है। यह चेतनासम्पन्न बिसेसरी गांव के प्रगतिशील युवकों की सहायता से बेमेल विवाह का विरोध करती है। 

वस्तुत: हमेशा यह प्रश्न उठता है कि स्त्रियों को सामाजिक दमन से कौन बचा सकता है? बाबा नागार्जुन इस प्रश्न का उत्तर 'नर्इ पौध की नायिका बिसेसरी के रूप में देते हैं। उनका विचार था कि स्त्री की जागरूकता ही उसे सामाजिक दमन से बचा सकती हैं। यदि स्त्री को अपना असितत्व बचाना है तो उसे स्वयं की क्षमताओं को पहचानना होगा।
 
चम्पा

चम्पा 'कुम्भीपाक उपन्यास की वह प्रमुख नायिका है, जिसका स्थान इसी उपन्यास की दूसरी नायिका भुवन के बराबर है। 'कुम्भीपाक में नागार्जुन ने वेश्यावृत्ति के दलदल में झोंक दी जाने वाली सित्रयों की लाचारी को बड़ी ही बारीकी से प्रस्तुत किया है। ''कुम्भीपाक में स्त्रियों को बेचने वालों के विरुद्ध स्त्रियों के संघर्ष की गाथा है। नागाजर्ुन ने ''कुम्भीपाक के स्त्रीपात्रों के माध्यम से जता दिया कि जो सित्रयां समाज द्वारा प्रताडि़त हैं वे समाज के ठेकेदारों के विरुद्ध विद्रोह का बिगुल भी बजा सकती हैं।
चम्पा एक सुन्दर स्त्री है। वह अपने जीजा की कामवासना का शिकार होती है जो एक हर प्रकार से भ्रष्ट इंसान है। चम्पा अपने जीवन की त्रासदी के बारे में बताती हुर्इ कहती है कि 'जीजा ने मुझे कुलसुम, सरदार जी ने सतवंत कौर और शर्मा जी ने चम्पा  बनाया। इस प्रकार वह अपने जीवन के कुम्भीपाक होने के तथ्य को एक वाक्य में उजागर कर देती है। लेकिन समय और परिसिथति के साथ उसके चरित्र में आमलचूल परिवर्तन होता है। अनैतिक कायोर्ं से जीवनयापन करने वाली चम्पा के जीवन का उददेश्य उन सित्रयों की मदद करना हो जाता है जो वेश्यावृत्ति के दलदल में फंसी हुर्इ हैं। चम्पा के जीवन में आने वाले परिवर्तन के द्वारा नागार्जुन ने यह सिद्ध किया है कि यदि घोर अनैतिक कार्यों में लिप्त स्त्री को उचित अवसर मिले तो वह स्वयं को सच्चरित्रता की प्रतिमूर्ति के रूप में स्थापित कर सकती है। क्या ऐसा सचमुच सम्भव है ? इसी प्रश्न का उत्तर नागार्जुन चम्पा के रूप में देते हैं।


भुवन

भुवन चम्पा के समकक्ष 'कुम्भीपाक की नायिका है। उसका असली नाम इंदिरा था। वह जिला मुगेर में पैदा हुर्इ थी। सम्पन्न परिवार की थी। उसका पति पायलेट था, जो विवाह के कुछ माह बाद ही हवार्इ दुर्घटना में मारा गया। भुवन पति की मृत्यु के समय  चार माह की गर्भवती थी। एक रिश्तेदार चिकित्सा कराने बहाने उसे आसनसोल ले गया और वहीं एक धर्मशाला में अकेली छेाड़ कर भाग गया। इसके बाद भुवन का जीवन उसी कुम्भीपाक में जा समाया, जहां चम्पा रहती थी। जल्दी ही भुवन को इस बात का अनुभव होता है कि जिस दलदल में वह रह रही है उसमें भविष्य नाम की कोर्इ चीज नहीं है। वह कुम्भीपाक से मुक्त होने के लिए संघर्ष करती है। भुवन को नीरू नाम की युवती से सहायता मिलती है और वह कुम्भीपाक से मुक्ति पा कर काशी चली जाती है, जहां से उसके सामाजिक सम्मान का मार्ग प्रश्स्त होने लगता है।
जब भी वेश्यावृत्ति में संलग्न सित्रयों की समाज की मुख्यधारा में जुड़ने की बात आती है तो प्रश्न उठता है कि क्या यह सचमुच सम्भव है ? नागार्जुन भुवन को समाज में पुन: स्थान दिला कर घोषणा करते दिखायी देते हैं कि यह सम्भव है।

इमरतिया

इमरतिया इसी नाम के उपन्यास की प्रमुख नायिका है। वह सन्यासनी है और जमनिया के मठ में रहती है। सन्यासनी होने के बावजूद उसके भीतर की स्त्री एक सामान्य स्त्री के समान है। उसकी कामभावना मरी नहीं है। वह नाटक देखने में रुचि रखती है, किन्तु मठ में बाबा के द्वारा किए जाने वाले घिनौने कृत्यों का विरोध करती है। मठ के जिस बाबा के प्रति उसके मन में श्रद्धा भावना थी वह धीरे-धीरे समाप्त हो जाती है। 
लोग इमरतिया को देवदासी और योगिनी की उपाधि देते हैं। किन्तु वह मठ में होने वाले अनाचार के विरुद्ध चेतना लाने का प्रयास करती है। इमरतिया के रूप में नागार्जुन यह प्रश्न सामने रखते हैं कि क्या मठों के  अनाचार में फंसी हुर्इ स्त्रियां कभी मुक्त हो सकती हैं ? इमरतिया का चरित्र एक नायिका के रूप में इस प्रश्न का उत्तर देता है और आश्वस्त कराता है कि यदि नारी चाहे तो वह अनाचार से मुक्त हो सकती है।


पारो

यह 'पारो नामक उपन्यास की नायिका है। उपन्यास का नाम नायिका के नाम पर ही है। पारो एक ऐसी स्त्री की छवि है जो गरीब परिवार में जन्म लेती है। विभिन्न प्रकार के संघर्षों का सामना करती है फिर भी साहस नहीं छोड़ती है। 'वह लम्बी छरहरी थी। चेहरा भी लम्बा था। हाथ सींक जैसे। देह लक-लक पतली। टांगें संटी जैसी। कैसी गजब की उसकी अांखें थीं। बुद्धि चातुर्य में वह बढ़-चढ़ कर थी। छोटी उम्र में ही संस्कृत, व्याकरण, अमरकोश, हितोपदेश कण्ठस्थ कर चुकी थी।
 रामायण और गीता भी पढ़ चुकी थी। ऐसी बुद्धिमती युवती को बेमेल विवाह के कष्ट झेलने पड़ते हैं। फिर भी वह जूझती रहती है। क्या स्त्री के सहनशकित की कोर्इ सीमा होती है ? नागार्जुन पारो का दृष्टांत प्रस्तुत करते हुए उत्तर देते हैं- 'नहीं!

आज हिन्दी साहित्य में स्त्री विमर्श का दौर है। स्त्री विमर्श के रूप में स्त्री की बहुमुखी प्रगति और जागरूकता के चित्र प्रस्तुत किए जाते हैं। नागार्जुन ने अपने उपन्यासों की सात नायिकाओं के द्वारा उन सात सवालों का हल ढ़ूंढ़ा और सामने रखा जो स्त्री विमर्श की बुनियाद के सवाल हैं। इन सवालों का निचोड़ यही है कि एक निर्बल स्त्री सबल स्त्री के रूप में कैसे ढल सकती है। इस सवाल का समीकरणीय उत्तर नागार्जुन के पास था, जिसे उन्होने इस रूप में सामनं रखा कि स्त्री द्वारा स्त्री की मदद और स्त्री के स्वयं का साहस परस्पर जुड़ जाए तो एक पूर्ण जागरूक स्त्री आकार ले सकती है। बाबा नागार्जुन ने अपने उपन्यासों की नायिकाओं के रूप में न केवल कालजयी चरित्र गढ़े अपितु समाज में स्त्री के स्थान को ले कर उठने वाले प्रश्नों के विश्लेष्णात्मक उत्तर भी दिए हैं।

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