Wednesday, September 11, 2019

बुंदेलखंड के संग्रहालय और रुझान में कमी - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह ... नवभारत में प्रकाशित

Dr (Miss) Sharad Singh
बुंदेलखंड के संग्रहालय और रुझान में कमी 
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

(नवभारत में प्रकाशित) 


विगत दिनों सागर नगर में एक निजी संग्रहालय सत्यम कला एवं संस्कृति संग्रहालय के रजिस्ट्रेशन के बाद के प्रथम आयोजन में मुझे शामिल होने का अवसर मिला। संग्रहालय की ओर से प्रदर्शनी भी थी और परिचर्चा भी। विषय था-‘‘संस्कृति के संरक्षण में संग्रहालयों की भूमिका’’। मैंने वहां कहा कि ‘‘संग्रहालय अतीत को वर्तमान और भविष्य से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।’’ किन्तु आयोजन के बाद मेरे मन में प्रश्न उठा कि क्या आज भी संग्रहालयों के प्रति लोगों में रुझान है? प्रश्न का उत्तर पीड़ादायक निकला। उल्लेखनीय है कि यह संग्रहालय निजी प्रयासों से स्थापित किया गया है, जिसके संस्थापक-अध्यक्ष दामोदर अग्निहोत्री एवं संरक्षक उमाकांत मिश्र हैं। चूंकि मैं प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व की विद्यार्थी रही हूं और खजुराहो की मूर्तिकला के कलात्मक सौंदर्य पर पीएच.डी. किया है क्योंकि भारतीय कला, संस्कृति, इतिहास एवं पुरातत्व से हमेशा मुझे अगाध प्रेम रहा। 

बुंदेलखंड के संग्रहालय और रुझान में कमी - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह ... नवभारत में प्रकाशित
    बहरहाल, बुंदेलखंड पुरासंपदा का धनी है। यहां इतिहास की अनेक धरोहरें मौजूद हैं। इसीलिए अंग्रेजों के समय से बुंदेलखंड में संग्रहालय स्थापित किए जाने लगे थे। छतरपुर जिले के धुबेला संग्रहालय में खड़ी लार्ड किचनर की मूर्ति आज भी इस बात की गवाही देती है कि अंग्रेज भी बुंदेलखंड की पुरासंपदा एवं ऐतिहासिक महत्व की वस्तुओं से अत्यंत प्रभावित थे। इसका सबसे बड़ा उदाहरण खजुराहो है। पुरातत्व संग्रहालय, खजुराहो मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में स्थित है। खजुराहो का पुरातत्व संग्रहालय शुरु में जार्डाइन संग्रहालय के नाम से जाना जाता था। 1952 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के बाद इसका नाम खजुराहो का पुरातत्व संग्रहालय रखा गया। 1910 में इसे श्री डबल्यू.ए. जार्डाइन ने बनवाया था। यह संग्रहालय बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें खजुराहो के मंदिरों से लाई गई अनेक वास्तुकलाओं तथा मूर्तियों के अवशेष रखे हैं।
महाराजा छत्रसाल संग्रहालय धुबेला का उद्धाटन 12 सितम्बर 1955 में भारत के प्रथम प्रधान मंत्री पण्डित जवाहरलाल नेहरू ने किया था। इस संग्रहालय में बुन्देलखण्ड एवं बघेलखण्ड की पुरासामग्री सुरक्षित है, जो वीथिकाओं (गैलरीज़) एवं खुले में प्रदर्शित है। यहां प्रतिमाएं, शिलालेख, सती स्तम्भ लेख संग्रहीत है। यहां बुंदेला महाराज छत्रसाल के शस्त्र से ले कर वस्त्र तक सहेजे गए हैं।
उत्तर प्रदेश के बांदा जिले में बुंदेलखण्ड छत्रसाल संग्रहालय है। इस संग्रहालय की स्थापना वर्ष 1955 में की गई थी। संग्रहालय में कई समृद्ध मूर्तियों, टेरीकोटा, सिक्के और पत्थर से बनी वस्तुओं आदि को प्रदर्शित किया गया है। इस संग्रहालय में एक अलग से विभाग है, जो कि प्राकृतिक विज्ञान से सम्बन्धित है।

झांसी के राजकीय संग्रहालय की स्थापना सन 1978 में की गई थी। उद्देश्य था देश - विदेश के सैलानियों को वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई और बुंदेलखंड की प्राचीन मूर्तिकला, राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम में बुंदेलों के योगदान और लोक कला संस्कृति से परिचय कराना। संग्रहालय में 14 वीथिकाएं हैं राजकीय संग्रहालय में सैलानी आकर्षित हों, इसके लिए वर्ष 2016 में 1857 की क्रांति के दृश्यों को दिखाने वाली वीथिका संग्रहालय के सभागार में बनाई गई थी। यह वीथिका 31 दिसंबर को सिर्फ एक घंटे के लिए ही खोली गई थी। तब इसका शुभारंभ हुआ था। संग्रहालय में लगभग 17,000 अद्भूत प्राचीन मूर्तियों, पांडुलिपियों, अस्त्र शस्त्रों, पेटिंग, शिलालेख, सिक्के आदि का विशाल संग्रह है। मूर्तियों में छठवीं शताब्दी से लेकर 16 - 17 वीं शताब्दी तक की हैं। जो बुंदेलखंड के ललितपुर तथा अन्य जिलों में पाई गई थीं।
मध्यप्रदेश में शास द्वारा जिला स्तरों पर पुरातत्व संघ का गठन किए जाने के उपरांत सागर संभाग के जिलों में भी संग्रहालयों की स्थापना एवं विस्तार हुआ। जिला पुरातत्व संघ संग्रहालय के लिये विभाग द्वारा संरक्षित स्मारक किले भवन में संग्रहालय का प्रारंभ 25 अगस्त 1989 को तत्कालीन राज्यपाल सरला ग्रेवाल द्वारा किया गया। यहां संग्रहीत प्रतिमायें शैव, वैष्णव, शाक्त, जैन तथा बौद्ध संप्रदाय से संबंधित हैं। प्राचीनतम कृतियों में छठी-सातवीं शती का नृत्यवाद्य शिल्पखण्ड महत्वपूर्ण है। जिला पुरातत्व संग्रहालय हिन्दूपत महल पन्ना म.प्र. पुरातत्व संग्रहालय द्वारा संचालित जिला स्तरीय प्रमुख संग्रहालय है। म.प्र. के पुरातत्व संघो में सर्वप्रथम 1958-59 में जिला पुरातत्व संघ पन्ना की स्थापना हुई और संघ के प्रयत्नों से राजेन्द्र उद्यान में प्रतिमाओं को मुक्ताकाश में प्रदर्शित किया गया है। संग्रहालय में शैव, शाक्त, वैष्णव जैन प्रतिमाएं धातु प्रतिमाऐं, सिक्के, अभिलेख, तोप सुरक्षित एवं प्रदर्शित है।
इसी क्रम में सागर नगर में भी पुरातत्व संग्रहालय पर ध्यान दिया गया। किन्तु धीरे-धीरे यह शासकीय अवहेलना का शिकार होता गया। पहले जहां एक छोटे से स्थान में प्रतिमाएं संग्रहीत थीं, उन्हें निकाल कर मुक्ताकाश में खड़ा कर दिया गया जहां उनका तेजी से क्षरण होने लगा। इस दौरान जिला अध्यक्ष की अध्क्षता में जिला पुरातत्व संघ का गठन किया गया (जिसमें मुझे भी सदस्य मनोनीत किया गया था)। प्रशासन और संघ के संयुक्त प्रयास से पुरातत्व संग्रहालय के लिए एक ऐतिहासिक भवन प्राप्त हुआ जिसमें प्रतिमाओं को मुक्ताकाश से उठा कर सहेजा गया। इसके बाद जिला पुरातत्व संघ लगभग बिखर गया और उसकी नियमित बैठकें बंद हो गईं।
समूचे बुंदेलखंड में अनेक छोटे-बड़े शासकीय एवं निजी संग्रहालय हैं किन्तु आज मोबाईल और इंटरनेट में व्यस्त आमजन खुद से ही बेखबर रहता है ऐसे में उनसे संग्रहालयों के प्रति रुझान दिखाने की उम्मींद करना खुद को भ्रम में डालने जैसा लगता है। जहां संस्कृति, परम्पराएं और इतिहास को सहेजा जाता हो ऐसे स्थानों अर्थात् संग्रहालयों के प्रति जागरूकता साल में मात्र ‘संग्रहालय दिवस’ का नहीं वरन् प्रतिदिन का विषय होना चाहिए। अन्यथा रुझान की कमी के चलते बुंदेलखंड के अधिकांश संग्रहालय भी अपनी चमक खो देंगे।
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(नवभारत, 30.08.2019)
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चर्चा प्लस ... सीख लेना चाहिए आज के नेताओं को पटेल और नेहरू के पारस्परिक संबंधों से - डाॅ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
चर्चा प्लस ...

सीख लेना चाहिए आज के नेताओं को पटेल और नेहरू के पारस्परिक संबंधों से
- डाॅ. शरद सिंह

आज जब एक सांसद विरोधी दल पर आरोप लगाती हैं कि वह ‘मारकमंत्र’ का प्रयोग कर रहा है तो जरूरी हो जाता है वल्लभ भाई पटेल और नेहरू के पारस्परिक संबंधों को याद करना। क्योंकि दो परस्पर विरोधी विचारों की उपस्थिति से ही लोकतंत्र मजबूत बनता है। दोनों एक-दूसरे पर लगाम लगाए रखते हैं और परिमार्जन करते रहते हैं। डाॅ. बी. के. केसकर के अनुसार-‘‘नेहरू और पटेल दो विरोधी तत्वों का एक ऐसा मिश्रण थे, जो एक-दूसरे के पूरक थे।’’ फिर भी दोनों ने मिल कर राष्ट्र को आधुनिक स्वरूप दिया।
 
Charcha Plus - चर्चा प्लस ... सीख लेना चाहिए आज के नेताओं को पटेल और नेहरू के पारस्परिक संबंधों से - डाॅ. शरद सिंह
      वल्लभ भाई पटेल और नेहरू दोनों ही आधुनिक भारत के निर्माता माने जाते हैं। दोनों में अनेक समानता होने के बावजूद वैचारिक भिन्नता भी थी। दोनों के परिवेश भिन्न थे, विचार भिन्न थे, इसीलिए उनके मध्य सहज मतभेद समय-समय पर उभर कर सामने आते रहे।
सरदार वल्लभ भाई पटेल का जन्म एक साधारण कृषक परिवार में हुआ था। बचपन से ही संषर्घमय जीवन व्यतीत करने के कारण उनके स्वभाव में कठोरता आ गई थी। उनके स्वभाव में गंभीरता थी और इच्छाशक्ति में लोहे जैसी मजबूती। वल्लभ भाई बैरिस्टर की पढ़ाई के लिए इंग्लैण्ड जाना चाहते थे किन्तु उनके पास इतने पैसे नहीं थे कि वे इंग्लैण्ड जा सकें। उन्होंने वकालत कर के धन जोड़ा और जब इंग्लैण्ड जाने का समय आया तो उनके बड़े भाई विट्ठल भाई पटेल ने उनसे आग्रह किया कि वे उन्हें पहले इंग्लैण्ड जाने दें। वल्लभ भाई मान गए और उन्हें इंग्लैण्ड जाने के लिए और प्रतीक्षा करना पड़ी।
इसके ठीक विपरीत जवाहरलाल नेहरू का जन्म एक अति सम्पन्न और रसूखदार परिवार में हुआ था। बचपन से ही इंग्लैण्ड में शिक्षा और पालन-पोषण के कारण उन पर पाश्चात्य संस्कृति का प्रभाव पड़ा था। लक्ष्य प्राप्ति के लिए उन्हें वैसे संषर्घ नहीं करने पड़े जैसे वल्लभ भाई पटेल को करने पड़े। राजनीतिक जीवन के प्रारम्भ से ही उन्हें अपने पिता मोतीलाल नेहरू और गांधी जी का सतत समर्थन मिलता रहा। नेहरू ने स्वयं को कांग्रेस पार्टी के संगठन के कार्यों से पृथक रख कर कार्य किया जबकि वल्लभ भाई पटेल एक संगठनकर्ता के रूप में कांग्रेस पार्टी के ‘सरदार’ बन कर कार्य करते रहे। इन विपरीत स्वभावों से जुड़ी इन दोनों धुरियों को महात्मा गांधी ने एक साथ बांधे रहने का कार्य किया था। गांधी के प्रति दोनों की आस्था समान थी। राष्ट्रीय संग्राम में वल्लभ भाई पटेल की सेवाए भी कम न थीं, पर गांधी जी के मंशा को समझकर उन्होंने नेहरू को प्रधानमंत्री और स्वयं उपप्रधानमंत्री रहना स्वीकार किया।
भारतीय कांग्रेस के इतिहास लेखक डाॅ. पट्टाभि सीतारमैया ने लिखा था-‘‘इस बात पर प्रायः आश्चर्य प्रकट किया जाता है कि यदि इन दोनों विरोधियों का सहयोग इतना सुखदायक, इतना उपयुक्त और इतना एकाकार न होता तो दिल्ली की केंद्रीय सरकार की कैसी दशा होती? यदि दो मित्र एक- दूसरे की बात को हमेशा काटते रहें तो उनका सहयोग आदर्श नहीं हो सकता। यदि दो साथी एक-दूसरे के ऊपर सदा आक्रमण करते रहें तो वे कोई उन्नति नहीं कर सकते हैं और न कोई निर्णय कर सकते हैं। पर हमारे यह दोनों नेता बिल्कुल भिन्न प्रकार के हैं। अतएव हमको उनकी पृथक-पृथक विशेषताओं को समझना चाहिए, जिसके कारण वे एक-दूसरे को उपयोगी सहयोग देते रहें। यह कहना तो अतिशयोक्ति होगी कि सरदार पटेल और नेहरू जी का दृष्टिकोण एक था, किंतु वे भिन्नता में भी एकता के अद्भुत उदाहरण थे। एक हाथ की कोई भी दो उंगलियां एक जैसी नहीं होतीं। एक-दूसरे से मतभेद रखना और भिन्न-भिन्न मार्ग पर चलना स्वाभाविक है। इन दोनों नेताओं के मतभेद सरकार में अपने-अपने विभागों के कारण भी थे। गृहमंत्री को आंतरिक सुरक्षा तथा शांति की उच्चतम भावना को बनाये रखना पड़ता है, जबकि प्रधानमंत्री को किसी विशेष मामले या स्वीकृत नीति के संबंध में विदेशों की प्रतिक्रिया को ध्यान में रखना पड़ता है। पर हमारे सरदार और प्यारे नेहरू दोनों ने ही सहयोग कला में अपनी उच्च योग्यता का परिचय दिया।’’
इन दोनों नेताओं के पारस्परिक संबंधों के बारे में हरिभाऊ उपाध्याय ने लिखा है कि-‘‘ जवाहरलाल नेहरू तथा सरदार के मिजाज में बहुत अंतर था। यहां तक कि उन दोनों की कार्यप्रणाली भी एक-दूसरे से भिन्न प्रकार की थी, किंतु भारत के स्वतंत्र होने के पश्चात सरदार नेहरू जी को अपना नेता मानने लगे थे। इसके बदले नेहरू जी सरदार को अपना परिवार का सबसे वरिष्ठ पुरुष मानते थे। दोनों के मतभेद के विषय में प्रायः अफवाहें फैल जाती थीं और विभेदात्मक नीति वाले अत्यंत प्रसन्न होकर उनमें फूट पड़ जाने की आशा करने लगते थे, किंतु सरदार ने कभी पानी को सिर से ऊपर नहीं निकलने दिया। यदि कोई उन दोनों में से किसी की भी नीति पर आक्रमण करता तो उक्त आलोचक को वह दोनों फटकार देते।’’
यद्यपि कुछ ऐतिहासिक तथ्य सरदार पटेल के प्रति जवाहरलाल नेहरु के दुराव भरे व्यवहार की ओर भी संकेत करते हैं। विशेषरूप से कश्मीर और हैदराबाद के मामलों में। प्रधानमंत्री नेहरु ने एक केबिनेट मीटिंग के दौरान पटेल से दो टूक शब्दों में कह दिया था कि ”आप एक पूर्णतया साम्प्रदायिक हैं और मैं आपके सुझावों और प्रस्तावों के साथ कभी पार्टी नहीं बन सकता।’’
हतप्रभ सरदार पटेल ने मेज पर से अपने पेपर इकट्ठेे किए और धीरे-धीरे चलते हुऐ कैबिनेट कक्ष से बाहर चले गए। यह अंतिम अवसर था जब पटेल ने कैबिनेट बैठक में भाग लिया। 1947 बैच के आई.एस. अधिकारी एम. के. नायर ने अपने संस्मरण ”विद नो इल फीलिंग टू एनीबडी” में लिखा है कि ”उन्होंने तब से नेहरु से बोलना भी बंद कर दिया।”
जवाहरलाल नेहरू और वल्लभ भाई पटेल के पारस्परिक संबंध सामंजस्य और असामंजस्य दोनों से परिपूर्ण थे। उनके पर्याप्त एकता और सौहाद्र्य भी था और पर्याप्त मतभेद भी। फिर भी उन्होंने परस्पर अभद्र अथवा अव्यावहारिक बातें नहीं कहीं। इसीलिए ये दोनों विपरीत ध्रुवीय नक्षत्र भारतीय राजनीति के मंच पर ससम्मान एक साथ चमकते रहे। जवाहरलाल नेहरू और वल्लभ भाई पटेल जैसी नेतृत्व क्षमता का अभाव उस समय और अधिक खटकने लगता है जब मंत्री, मुख्यमंत्री, सांसद, विधायक जैसे महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक पदों पर आसीन नेतागण अजीबो-गरीब आरोप-प्रत्यारोप करने लगते हैं। वस्तुतः आज के नेताओं को सीख लेने की जरूरत है जवाहरलाल नेहरू और वल्लभ भाई पटेल के परस्पर संबंधों एवं मिल कर किए गए राजनीतिक कार्यों से कि किस तरह दो विपरीत विचारों के व्यक्ति एक-दूसरे के पूरक बन कर देश का भला कर सकते हैं। यदि नेहरू और पटेल मिल कर कार्य नहीं करते तो जितने राज्यों के विलय हुए, वे भी नहीं हो पाते और न ही देश आधुनिक स्वरूप में ढल पाता।
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(दैनिक ‘सागर दिनकर’, 28.08.2019)
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Tuesday, August 27, 2019

जीवन प्रबंधन की प्रेरणा देते विघ्नहर्ता गणेश - डाॅ. शरद सिंह .. ‘‘दैनिक जागरण’’ के सभी संस्करणों में प्रकाशित

‘‘दैनिक जागरण’’ के सभी संस्करणों में प्रकाशित सप्तरंग परिशिष्टि में मेरा लेख ‘‘जीवन प्रबंधन की प्रेरणा देते विघ्नहर्ता गणेश’’ प्रकाशित हुआ है। इसे आप भी पढ़िए... - डाॅ. शरद सिंह
🙏हार्दिक धन्यवाद ‘‘दैनिेक जागरण’’ 🙏
https://epaper.jagran.com/epaper/27-aug-2019-4-delhi-city-edition-delhi-city-page-23.html
 
Dr Sharad Singh article on Lord Ganesh - Saptrang, Dainik Jagaran in all edition , 27 Augast 2019

'राजस्थान पत्रिका' समाचारपत्र के सागर संस्करण "पत्रिका" के सफलतापूर्वक 4 वर्ष पर मेरी शुभकामनाएं - डाॅ. शरद सिंह

'राजस्थान पत्रिका' समाचारपत्र के सागर संस्करण "पत्रिका" के सफलतापूर्वक 4 वर्ष पूरे होने पर प्रकाशित मेरी शुभकामनाएं...- डाॅ. शरद सिंह
27.08.2019 
'राजस्थान पत्रिका' समाचारपत्र के सागर संस्करण "पत्रिका" के सफलतापूर्वक 4 वर्ष पर मेरी शुभकामनाएं - डाॅ. शरद सिंह, 27.08.2019
 

Wednesday, August 21, 2019

चर्चा प्लस ... पद्मश्री कुर्रतुलऐन हैदर की पुण्यतिथि (21 अगस्त) पर विशेष : 'आग का दरिया पार’ करने वाली लेखिका - डाॅ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
चर्चा प्लस ... 
 
पद्मश्री कुर्रतुलऐन हैदर की पुण्यतिथि (21 अगस्त) पर विशेष:

 
'आग का दरिया पार’ करने वाली लेखिका

 
- डाॅ. शरद सिंह

 
भारतीय साहित्य का इतिहास साक्षी है कि महिलाओं में मुखर होने का साहस बहुत देर से आया। सामाजिक दबाव के कारण वे चाह कर भी अपनी दशा-दिशा को साहित्य में नहीं उतार पाती थीं। हिन्दी की प्रथम मौलिक कहानी मानी जाने वाली कहानी ‘दुलाईवाली’ की लेखिका को ‘बंग महिला’ के छद्म नाम से रचनाएं लिखनी पड़ी थीं। ऐेसे विपरीत वातावरण में ‘मेेरे सनमख़ाने’ और ‘आग का दरिया’ जैसी कृतियां लिखना आग के दरिया में उतरने के समान था। कुर्रतुलऐन हैदर आग के दरिया में न केवल उतरीं बल्कि उन्होंने इसे हिम्म्त के साथ पार भी किया।

 
Charcha Plus - पद्मश्री कुर्रतुलऐन हैदर की पुण्यतिथि (21 अगस्त) पर विशेष - आग का दरिया पार करने वाली लेखिका  -  Charcha Plus Column by Dr Sharad Singh

       हिन्दी हो या उर्दू दोनों में लेखिकाओं एवं कवयित्रियों की अभिव्यक्ति पर अनेक बंधन रहे। यह बंध आज इक्कीसवीं सदी में टूटने लगे हैं किन्तु बीसवीं सदी के मध्य तक स्थिति इतनी सुगम नहीं थी। भारतीय साहित्य का इतिहास साक्षी है कि महिलाओं में मुखर होने का साहस बहुत देर से आया। सामाजिक दबाव के कारण वे चाह कर भी अपनी दशा-दिशा को साहित्य में नहीं उतार पाती थीं। हिन्दी की प्रथम मौलिक कहानी मानी जाने वाली कहानी ‘दुलाईवाली’ की लेखिका राजेन्द्र बाला घोष को ‘बंग महिला’ के छद्म नाम से रचनाएं लिखनी पड़ी थीं। जब महिला साहित्यकार को अपना छद्मनाम से कहानियां लिखनी पड़ें, ऐेसे विपरीत वातावरण में ही आगे चल कर ‘मेेरे सनमख़ाने’ और ‘आग का दरिया’ जैसी कृतियां लिखना आग के दरिया में उतरने के समान था। कुर्रतुलऐन हैदर आग के दरिया में न केवल उतरीं बल्कि उन्होंने इसे हिम्म्त के साथ पार भी किया। कुर्रतुलऐन हैदर की मृत्यु 21 अगस्त 2007 को नोएडा, उत्तर प्रदेश में हुई। उस समय उनकी आयु 80 वर्ष थीं। वे भारतीय साहित्य जगत् में लेखिकाओं के लिए एक बेहतरीन मिसाल हैं।
कुर्रतुलऐन हैदर का जन्म 20 जनवरी 1926 ई. अलीगढ़, उत्तर प्रदेश में उर्दू के जाने-माने लेखक सज्जाद हैदर यलदरम के यहां हुआ था। उनकी मां बिन्ते बाक़र भी उर्दू की लेखक रही हैं। कुर्रतुलऐन हैदर के पिता सज्जाद हैदर यिल्दिरम अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में रजिस्ट्रार थे। कुर्रतुलऐन हैदर के परिवार में तीन पीढ़ियों से लिखने की परंपरा रही। कुर्रतुलऐन हैदर के पिता की गणना उर्दू के प्रतिष्ठित कथाकारों में होती थी। कुर्रतुलऐन हैदर की मां नजर सज्जाद हैदर ‘उर्दू’ की ‘जेन ऑस्टिन’ कहलाती थीं। कुर्रतुलऐन को बचपन से ही लिखने की रुचि रही।
वे बचपन से रईसी व पाश्चात्य संस्कृति में पली-बढ़ीं थीं। उन्होंने प्रारंभिक शिक्षा लालबाग, लखनऊ, उत्तर प्रदेश स्थित गांधी स्कूल में प्राप्त की और अलीगढ़ से हाईस्कूल पास किया। लखनऊ के आईटी कालेज से बी.ए. और लखनऊ विश्वविद्यालय से एम.ए. किया। फिर लन्दन के हीदरलेस आर्ट्स स्कूल में शिक्षा ग्रहण की। लखनऊ में अपने पिता की मौत के बाद कुर्रतुलऐन हैदर भी अपने बड़े भाई मुस्तफा हैदर के साथ पाकिस्तान चली गयीं लेकिन 1951 में वह लन्दन जाकर स्वतंत्र लेखक-पत्रकार के रूप में बीबीसी लन्दन से जुड़ गईं। बाद में ‘द टेलीग्राफ’ की रिपोर्टर और इम्प्रिंट पत्रिका की प्रबन्ध सम्पादक भी रहीं। वह इलेस्ट्रेड वीकली की सम्पादकीय टीम में भी रहीं। सन 1956 में जब वह भारत भ्रमण पर आईं तो उनके पिताजी के अभिन्न मित्र मौलाना अबुल कलाम आजाद ने उनसे पूछा कि क्या वे भारत में बसना चाहेंगी? और वे तुंरत राजी हो गईं तथा जीवनपर्यन्त भारत में ही रहीं। अपने एक साक्षात्कार में उन्होंने अपने भारत लौटने के बारे कहा था कि -‘‘मैं यहां लौट कर कैसे नहीं आती? मेरी जड़ें और मेरा दिल तो यहीं था।’’
उन्होंने अपना कैरियर भले ही एक पत्रकार की हैसियत से शुरू किया लेकिन इसी दौरान वे लिखती भी रहीं और उनकी कहानियां, उपन्यास, अनुवाद, रिपोर्ताज वगैरह सामने आते रहे। साहित्य अकादमी में उर्दू सलाहकार बोर्ड की वह दो बार सदस्य रहीं। विजिटिंग प्रोफेसर के रूप में वह जामिया इस्लामिया विश्वविद्यालय, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय और अतिथि प्रोफेसर के रूप में कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय से भी जुड़ी रहीं। वे अविवाहित रहीं।
सन् 1959 में जब उनका उपन्यास ‘आग का दरिया’ प्रकाशित हुआ, भारत और पाकिस्तान के साहित्य जगत में तहलका मच गया। भारत विभाजन पर तुरन्त प्रतिक्रिया के रूप में हिंसा, रक्तपात और बर्बरता की कहानियां तो बहुत छपीं लेकिन अनगिनत लोगों की निजी एवं एक सांस्कृतिक-ऐतिहासिक त्रासदी को एकदम बेबाकी से कुर्रतुलऐन हैदर ने ही प्रस्तुत किया। ‘ऐनी आपा’ के निकनेम से प्रसिद्ध कुर्रतुलऐन हैदर के उपन्यास ‘आग का दरिया’ में उन्होंने आहत मनुष्यता और मनोवैज्ञानिक अलगाव के मर्म को अंदर तक बड़ी बारीकी से छुआ। जो प्रसिद्धि और लोकप्रियता ‘आग का दरिया’ को मिली, वह किसी अन्य उर्दू साहित्यिक कृति को शायद ही नसीब हुई हो। इस उपन्यास में लगभग ढाई हजार वर्ष के लम्बे वक्त की पृष्ठभूमि को विस्तृत कैनवस पर फैलाकर उपमहाद्वीप की हजारों वर्ष की सभ्यता-संस्कृति, इतिहास, दर्शन और रीति-रिवाज के विभिन्न रंगों की एक ऐसी तस्वीर खींची गई, जिसने अपने पढ़ने वालों को कदम-कदम पर चौेकाया।
कुर्रतुलऐन हैदर ने लिखा था कि -‘‘दुनिया की तरफ से इस्लाम का ठेका इस वक़्त पाकिस्तान सरकार ने ले रखा है। इस्लाम कभी एक बढ़ती हुई नदी की तरह अनगिनत सहायक नदी-नालों को अपने धारे में समेट कर शान के साथ एक बड़े भारी जल-प्रपात के रूप में बहा था, पर अब वही सिमट-सिमटा कर एक मटियाले नाले में बदला जा रहा है। मजा यह है की इस्लाम का नारा लगाने वालों को धर्म, दर्शन से कोई मतलब नहीं। उनको सिर्फ इतना मालूम है कि मुसलमानों ने आठ सौ साल ईसाई स्पेन पर हुकूमत की, एक हजार साल हिन्दू भारत पर और चार सौ साल पूर्वी यूरोप पर।’’ इस तरह का बयान, वह भी किसी स्त्री द्वारा दिया जाना सामाजिक तबके में हंगामा पैदा करने के लिए काफी था। कुर्रतुलऐन को उनके बेबाक लेखन के लिए हतोत्साहित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी गई लेकिन वे डरी नहीं और कलम-कागज थामें डट कर खड़ी रहीं। उनके प्रमुख उपन्यास हैं-‘मेरे भी सनमख़ाने (1949), सफीना-ए-गमे-दिल (1952), आग का दरिया (1959), आखि़री शब के हमसफर (1979 गर्दिशे-रंगे-चमन (1987), चांदनी बेगम (1990), कारे-जहां-दराज है(1978-79), शीशे के घर (1952), पतझर की आवाज (1967) और रोशनी की रफ्तार (1982)। उनके लेखन के लिए उन्हें साहित्य अकादमी, सोवियत लैण्ड नेहरू सम्मान, गालिब सम्मान, ज्ञानपीठ, पद्मश्री से सम्मानित किया गया। अपने जिस साहसी लेखन के लिए कुर्रतुलऐन हैदर को विरोधों एवं अपमानों का समाना करना पड़ा, उसी लेखन ने उन्हें आग का दरिया पार करने वाली साहसी लेखिका की पहचान और सम्मान भी दिलाया।
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(दैनिक ‘सागर दिनकर’, 21.08.2019)

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Thursday, August 15, 2019

स्वतंत्रता संग्राम में बुंदेलखंड की महिलाओं का योगदान - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह - नवभारत में प्रकाशित

Dr (Miss) Sharad Singh

स्वतंत्रता संग्राम में बुंदेलखंड की महिलाओं का योगदान 
  - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह 
       ( #नवभारत में प्रकाशित )
        स्वतंत्रता संग्राम में बुंदेलखंड की महिलाओं का योगदान याद आते ही सबसे पहला नाम मानस में कौंधता है झांसी की रानी लक्ष्मीबाई का। जिन्होंने हाथ में तलवार लेकर घोड़े पर सवार होकर और अपने मातृत्व धर्म को निभाते हुए पीठ पर अपने नन्हें बालक को बांधकर युद्ध के मैदान में अपनी वीरता का परिचय दिया। महाराष्ट्र में जन्मी लक्ष्मी बाई जब बुंदेलखंड में झांसी की रानी बनकर आईं तो उसके बाद उन्होंने बुंदेलखंड को पूरी तरह से अपना लिया और उसके प्रति समर्पित हो गईं। झांसी की रक्षा के लिए उन्होंने न केवल अंग्रेजों से लोहा लिया वरन् अपनी जान की बाजी भी लगा दी। 
स्वतंत्रता संग्राम में बुंदेलखंड की महिलाओं का योगदान  - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह  - नवभारत में प्रकाशित
झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की भांति वीरांगना झलकारी बाई का नाम भी स्वतंत्रता संग्राम में स्वर्ण अक्षरों में लिखा हुआ है। वे एक बहुत छोटे से गांव जिसका नाम था लड़िया, में कोरी परिवार में पैदा हुई थीं। झलकारी का बचपन का नाम झलरिया था। उनके माता-पिता की आर्थिक दशा अत्यंत शोचनीय थी किंतु उन्होंने अपनी बेटी झलकारी का लालन-पालन पूरे ममत्व और लगन से किया। समय आने पर झलकारी बाई का विवाह झांसी में निवास करने वाले पूरन कोरी के साथ हुआ। झांसी में रहते हुए झलकारी बाई रानी लक्ष्मी बाई के संपर्क में आईं। वे लक्ष्मी बाई के व्यक्तित्व से बेहद प्रभावित हुईं। रानी ने भी एक सखी के समान झलकारी बाई को अपनाया। झलकारी बाई ने रानी की वफादारी का हलफ उठाया। ण्क बार उन्होंने अपने पति पूरन कोरी से कहा था कि ‘‘हम पर रानी को एहसान है। हमने उनको नमक खाओ है। हम दिखा देहें के झलकारी का है।’’ 
रानी लक्ष्मी बाई ने स्त्रियों के जो विशाल सेना बनाई थी उसमें झलकारी को मुख्य स्थान दिया गया था। झलकारी ने भी लक्ष्मी बाई के हर सैन्य अभियान में उनका साथ दिया। एक बार झलकारी ने सभी जाति की स्त्रियों को इकट्ठा करके इतना जोशीला भाषण दिया था कि महिलाएं इतनी उत्तेजित हो उठी थीं कि उन्होंने स्वयं अपने हाथों में बंदूक उठाकर अंग्रेजों पर निशाना साधना शुरू कर दिया था। झलकारी ने इस बुंदेली कहावत को चरितार्थ कर दिया था कि ‘‘गर्दन कट जाए पर शीश नहीं झुकेगा’’।
जैतपुर बुंदेलखंड की एक छोटी-सी रियासत थी 27 नवंबर 1842 को लार्ड एलेन रोने जैतपुर पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया था। उस समय जैतपुर के राजा परीक्षित थे जो आजादी के दीवाने थे। उन्होंने अंग्रेजों संे युद्ध किया किन्तु सैन्यबल की कमी होने से उन्हें पराजय का मुंह देखना पड़ा। अंग्रेज सरकार ने जैतपुर का शासन अपने चाटुकार सामंत को दे दिया। जैतपुर के राजा इस दुख को सहन न कर सके और उनका प्राणांत हो गया। राजा परीक्षित की रानी को अपने पति के राज्य को पुनः प्राप्त करने के लिए अंग्रेज सरकार के विरुद्ध क्रांति का रास्ता अपनाना पड़ा। जैतपुर, सिमरिया को रानी ने अंग्रेजों से छीन लिया। तब स्थानीय मजिस्ट्रेट के आदेश के विरुद्ध रानी ने जैतपुर में एक हथियारबंद सेना रख्ना शुरू कर दिया। जैतपुर की रानी को मजिस्ट्रेट ने दोबारा चेतावनी दी कि वे जैतपुर से अपने हथियारबंद सेना हटा दें। लेकिन रानी मजिस्ट्रेट के दबाव को मानने को तैयार नहीं हुई। अंततः रानी को चेतावनी दी गई। फिर भी वे नहीं झुंकीं।
जालौन उत्तर प्रदेश का एक छोटा सा हिस्सा है। इसी जालौन में वीरांगना ताई बाई ने सन् 1857 की क्रांति में हिस्सा लेकर लगभग 7 माह जालौन जनपद में स्वतंत्र क्रांतिकारी सरकार स्थापित करके उसके प्रमुख के रूप में कार्य किया और अन्य प्रमुख क्रांतिकारियों जैसे राव साहब तात्या टोपे आदि की धन तथा सैन्य बल से सहायता की। अंग्रेज तो उनसे अधिक नाराज थे कि जनपद के जनमानस से उनकी स्मृति को मिटाने के लिए उनके किले को तुड़वा कर जमीन में मिला दिया गया। 
 बांदा नवाब की बेटी राबिया बेगम का नाम भी बुंदेलखंड की स्वतंत्रता संग्राम सेनानी महिलाओं में एक अग्रणी नाम है। अल्पायु में ही उन्हें इस बात का एहसास हो गया था कि जब तक अंग्रेजों को बुंदेलखंड से दूर नहीं किया जाएगा तब तक बुंदेलखंड का विकास नहीं हो सकेगा। बुंदेलखंड के विभिन्न राज्य सुरक्षित नहीं रह सकेंग। इसी बात को ध्यान में रखते हुए उन्होंने अपने हाथों में तलवार ले कर अंग्रेजों का सामना किया और अपने प्राणों की आहुति दे दी।
 सन् 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के बाद देश में स्वतंत्रता आंदोलन क्रमशः चलता रहा। महात्मा गांधी के नेतृत्व में असहयोग आंदोलन चलाया गया। इस असहयोग आंदोलन में भी बुंदेलखंड की महिलाओं ने बढ़-चढ़कर भाग लिया। झांसी की पिस्ता देवी तथा चंद्रमुखी देवी की प्रमुख भूमिका रही। इन दोनों महिलाओं ने नगर के मोतीलाल पुस्तकालय के सामने विदेशी वस्त्रों की होली जलाई थी। झांसी की ही लक्ष्मण कुमारी शर्मा, रानी राजेंद्र कुमारी, काशीबाई आदि महिलाएं भी स्वतंत्रता संग्राम में अपना योगदान देकर अमर हो गई।
हमीरपुर जिले में असहयोग आंदोलन में सहयोग दिया राजेंद्र कुमारी ने। रानी राजेंद्र कुमारी ने खादी को अपनाया तथा स्वतंत्रता संग्राम के पक्ष में पर्चे भी बांटे, जेल गईं। राठ की गंगा देवी, वीरा गांव की गुलाब देवी, बांदा की अनुसूया देवी ने अपने नेतृत्व में महिलाओं को संगठित किया तथा घर-घर जाकर स्वतंत्रता आंदोलन के महत्व को समझाने का बीड़ा उठाया जिसके कारण उन्हें अंग्रेजों का विरोध झेलना पड़ा। सुप्रसिद्ध साहित्यकार एवं स्वतंत्रता संग्राम सेनानी वृंदावन लाल वर्मा की पत्नी कांति देवी भी स्वाधीनता आंदोलन की अग्रणी महिलाओं में से एक रहीं। छतरपुर रियासत की सरयू देवी पटेरिया गांधीजी के सविनय अवज्ञा आंदोलन को बुंदेलखंड में प्रसारित करने में अग्रणी रहीं जिसके कारण उन्हें गर्भवती स्थिति में भी जेल में रखा। पन्ना, दमोह और सागर की महिलाएं भी स्वतंत्रता आंदोलन में पीछे नहीं रहीं। सभी ने अपने पारिवारिक कर्तव्यों को निभाते हुए स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया और देश को आजाद कराने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
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(नवभारत, 15.08.2019)
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Wednesday, August 14, 2019

चर्चा प्लस ...स्वतंत्रता आंदोलन में बुंदेलखंड की महिलाओं का योगदान - डाॅ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
चर्चा प्लस ... 

स्वतंत्रता आंदोलन में बुंदेलखंड की महिलाओं का योगदान    
- डाॅ. शरद सिंह                                                               
           आज समाज को हम जाति, धर्म, लिंग के भेदभाव में बंटा हुआ पाते हैं किन्तु स्वतंत्रता आंदोलन के समय ये सारे भेद मानो मिट गए थे। जहां बुंदेलखंड के पुरुषों ने देश को आजाद कराने के लिए अपनी जान की बाज़ी लगाई वैसे ही बुंदेलखंड की महिलाओं ने अपने प्राण दांव पर लगा दिए थे। उन्होंने तलवार उठाई, वे जेल गईं और अंग्रेजों की बंदूकों की गोलियां भी खाईं। उन्होंने साबित कर दिया कि महिलाएं यदि ठान लें तों दुनिया की कोई ताकत उन्हे झुका नहीं सकती है, कोई डर उन्हें डरा नहीं सकता है। दरअसल, जिन्होंने गुलामी की पीड़ा नहीं झेली उनके लिए आजादी के महत्व को महसूस करना जरा कठिन हो सकता है। वह समय था जब देश भक्ति के तराने गाना भी अपराध था। आज अभिव्यक्ति की आजादी है जो उस समय नहीं थी। इस अभिव्यक्ति आजादी का सम्मान करना भी तो हमारा कर्तव्य है। स्वतंत्रता एक नेमत है और इसे सम्हाल कर रखना हमारा दायित्व है।
चर्चा प्लस ...स्वतंत्रता आंदोलन में बुंदेलखंड की महिलाओं का योगदान - डाॅ. शरद सिंह
      स्वतंत्रता संग्राम में बुंदेलखंड की महिलाओं का योगदान याद आते ही सबसे पहला नाम मानस में कौंधता है झांसी की रानी लक्ष्मीबाई का। जिन्होंने हाथ में तलवार लेकर घोड़े पर सवार होकर और अपने मातृत्व धर्म को निभाते हुए पीठ पर अपने नन्हें बालक को बांधकर युद्ध के मैदान में अपनी वीरता का परिचय दिया। महाराष्ट्र में जन्मी लक्ष्मी बाई जब बुंदेलखंड में झांसी की रानी बनकर आईं तो उसके बाद उन्होंने बुंदेलखंड को पूरी तरह से अपना लिया और उसके प्रति समर्पित हो गईं। झांसी की रक्षा के लिए उन्होंने न केवल अंग्रेजों से लोहा लिया वरन् अपनी जान की बाजी भी लगा दी। 
झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की भांति वीरांगना झलकारी बाई का नाम भी स्वतंत्रता संग्राम में स्वर्ण अक्षरों में लिखा हुआ है। वे एक बहुत छोटे से गांव जिसका नाम था लड़िया, में कोरी परिवार में पैदा हुई थीं। झलकारी का बचपन का नाम झलरिया था। उनके माता-पिता की आर्थिक दशा अत्यंत शोचनीय थी किंतु उन्होंने अपनी बेटी झलकारी का लालन-पालन पूरे ममत्व और लगन से किया। समय आने पर झलकारी बाई का विवाह झांसी में निवास करने वाले पूरन कोरी के साथ हुआ। झांसी में रहते हुए झलकारी बाई रानी लक्ष्मी बाई के संपर्क में आईं। वे लक्ष्मी बाई के व्यक्तित्व से बेहद प्रभावित हुईं। रानी ने भी एक सखी के समान झलकारी बाई को अपनाया। झलकारी बाई ने रानी की वफादारी का हलफ उठाया। ण्क बार उन्होंने अपने पति पूरन कोरी से कहा था कि ‘‘हम पर रानी को एहसान है। हमने उनको नमक खाओ है। हम दिखा देहें के झलकारी का है।’’ 
रानी लक्ष्मी बाई ने स्त्रियों के जो विशाल सेना बनाई थी उसमें झलकारी को मुख्य स्थान दिया गया था। झलकारी ने भी लक्ष्मी बाई के हर सैन्य अभियान में उनका साथ दिया। एक बार झलकारी ने सभी जाति की स्त्रियों को इकट्ठा करके इतना जोशीला भाषण दिया था कि महिलाएं इतनी उत्तेजित हो उठी थीं कि उन्होंने स्वयं अपने हाथों में बंदूक उठाकर अंग्रेजों पर निशाना साधना शुरू कर दिया था। झलकारी ने इस बुंदेली कहावत को चरितार्थ कर दिया था कि ‘‘गर्दन कट जाए पर शीश नहीं झुकेगा’’।
जैतपुर बुंदेलखंड की एक छोटी-सी रियासत थी 27 नवंबर 1842 को लार्ड एलेन रोने जैतपुर पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया था। उस समय जैतपुर के राजा परीक्षित थे जो आजादी के दीवाने थे। उन्होंने अंग्रेजों संे युद्ध किया किन्तु सैन्यबल की कमी होने से उन्हें पराजय का मुंह देखना पड़ा। अंग्रेज सरकार ने जैतपुर का शासन अपने चाटुकार सामंत को दे दिया। जैतपुर के राजा इस दुख को सहन न कर सके और उनका प्राणांत हो गया। राजा परीक्षित की रानी को अपने पति के राज्य को पुनः प्राप्त करने के लिए अंग्रेज सरकार के विरुद्ध क्रांति का रास्ता अपनाना पड़ा। जैतपुर, सिमरिया को रानी ने अंग्रेजों से छीन लिया। तब स्थानीय मजिस्ट्रेट के आदेश के विरुद्ध रानी ने जैतपुर में एक हथियारबंद सेना रख्ना शुरू कर दिया। जैतपुर की रानी को मजिस्ट्रेट ने दोबारा चेतावनी दी कि वे जैतपुर से अपने हथियारबंद सेना हटा दें। लेकिन रानी मजिस्ट्रेट के दबाव को मानने को तैयार नहीं हुई। अंततः रानी को चेतावनी दी गई। फिर भी वे नहीं झुंकीं।
जालौन उत्तर प्रदेश का एक छोटा सा हिस्सा है। इसी जालौन में वीरांगना ताई बाई ने सन् 1857 की क्रांति में हिस्सा लेकर लगभग 7 माह जालौन जनपद में स्वतंत्र क्रांतिकारी सरकार स्थापित करके उसके प्रमुख के रूप में कार्य किया और अन्य प्रमुख क्रांतिकारियों जैसे राव साहब तात्या टोपे आदि की धन तथा सैन्य बल से सहायता की। अंग्रेज तो उनसे अधिक नाराज थे कि जनपद के जनमानस से उनकी स्मृति को मिटाने के लिए उनके किले को तुड़वा कर जमीन में मिला दिया गया। 
 बांदा नवाब की बेटी राबिया बेगम का नाम भी बुंदेलखंड की स्वतंत्रता संग्राम सेनानी महिलाओं में एक अग्रणी नाम है। अल्पायु में ही उन्हें इस बात का एहसास हो गया था कि जब तक अंग्रेजों को बुंदेलखंड से दूर नहीं किया जाएगा तब तक बुंदेलखंड का विकास नहीं हो सकेगा। बुंदेलखंड के विभिन्न राज्य सुरक्षित नहीं रह सकेंग। इसी बात को ध्यान में रखते हुए उन्होंने अपने हाथों में तलवार ले कर अंग्रेजों का सामना किया और अपने प्राणों की आहुति दे दी।
 सन् 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के बाद देश में स्वतंत्रता आंदोलन क्रमशः चलता रहा। महात्मा गांधी के नेतृत्व में असहयोग आंदोलन चलाया गया। इस असहयोग आंदोलन में भी बुंदेलखंड की महिलाओं ने बढ़-चढ़कर भाग लिया। झांसी की पिस्ता देवी तथा चंद्रमुखी देवी की प्रमुख भूमिका रही। इन दोनों महिलाओं ने नगर के मोतीलाल पुस्तकालय के सामने विदेशी वस्त्रों की होली जलाई थी। झांसी की ही लक्ष्मण कुमारी शर्मा, रानी राजेंद्र कुमारी, काशीबाई आदि महिलाएं भी स्वतंत्रता संग्राम में अपना योगदान देकर अमर हो गई।
हमीरपुर जिले में असहयोग आंदोलन में सहयोग दिया राजेंद्र कुमारी ने। रानी राजेंद्र कुमारी ने खादी को अपनाया तथा स्वतंत्रता संग्राम के पक्ष में पर्चे भी बांटे, जेल गईं। राठ की गंगा देवी, वीरा गांव की गुलाब देवी, बांदा की अनुसूया देवी ने अपने नेतृत्व में महिलाओं को संगठित किया तथा घर-घर जाकर स्वतंत्रता आंदोलन के महत्व को समझाने का बीड़ा उठाया जिसके कारण उन्हें अंग्रेजों का विरोध झेलना पड़ा। सुप्रसिद्ध साहित्यकार एवं स्वतंत्रता संग्राम सेनानी वृंदावन लाल वर्मा की पत्नी कांति देवी भी स्वाधीनता आंदोलन की अग्रणी महिलाओं में से एक रहीं। छतरपुर रियासत की सरयू देवी पटेरिया गांधीजी के सविनय अवज्ञा आंदोलन को बुंदेलखंड में प्रसारित करने में अग्रणी रहीं जिसके कारण उन्हें गर्भवती स्थिति में भी जेल में रखा। पन्ना, दमोह और सागर की महिलाएं भी स्वतंत्रता आंदोलन में पीछे नहीं रहीं। सभी ने अपने पारिवारिक कत्र्तव्यों को निभाते हुए स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया और देश को आजाद कराने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
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(दैनिक ‘सागर दिनकर’, 14.08.2019)
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