Tuesday, January 21, 2020

सागर: साहित्य एवं चिंतन ... साहित्य और समाज के प्रति समर्पित लेखिक डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह - डाॅ. वर्षा सिंह

Dr Varsha Singh
अपनी दीदी के कॉलम में जगह पाना किसी लॉटरी लगने से कम नहीं... आप भी पढ़िए कि वर्षा दीदी ने आज #आचरण में अपने #कॉलम में क्या लिखा मेरे बारे में...
Thank you Varsha Di 


वर्षा दीदी की फेसबुक वाॅल से साभार ....

https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=2719265908169792&id=100002592286536
स्थानीय दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में प्रकाशित मेरा कॉलम "सागर साहित्य एवं चिंतन " । जिसमें इस बार मैंने लिखा है मेरे शहर सागर की साहित्यकार डॉ. (सुश्री) शरद सिंह, जो मेरी छोटी बहन भी हैं, पर आलेख। पढ़िए और जानिए मेरे शहर के वर्तमान साहित्यिक परिवेश को ....
सागर: साहित्य एवं चिंतन
साहित्य और समाज के प्रति समर्पित लेखिक डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
- डाॅ. वर्षा सिंह
------------------------------
परिचय:- डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
जन्म:- 29 नवम्बर 1963
जन्म स्थान:- पन्ना, मध्यप्रदेश
माता-पिता:- डाॅ (श्रीमती) विद्यावती सिंह ‘‘मालविका’’ एवं स्व. रामधारी सिंह
शिक्षा:- डबल एम.ए., पीएच.डी., बीएड।
लेखन विधा:- गद्य एवं पद्य
प्रकाशन:- विभिन्न विधाओं में पचास से अधिक पुस्तकें प्रकाशित।
------------------------------
समग्र हिन्दी साहित्य में स्त्रीविमर्श एवं आधुनिक हिन्दी कथा लेखन के क्षेत्र में सागर नगर की डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह का योगदान अतिमहत्वपूर्ण है। उन्होंने अपने पहले उपन्यास ‘‘पिछले पन्ने की औरतें’’ से हिन्दी साहित्य जगत में अपनी विशेष उपस्थिति दर्ज कराई। परमाननद श्रीवास्तव जैसे समीक्षकों ने उनके इस उपन्यास को हिन्दी उपन्यास शैली का ‘‘टर्निंग प्वाइंट’’ कहा है। यह हिन्दी में रिपोर्ताजिक शैली का ऐसा पहला मौलिक उपन्यास है जिसमें आंकड़ों और इतिहास के संतुलित समावेश के माध्यम से कल्पना की अपेक्षा यथार्थ को अधिक स्थान दिया गया है। यही कारण है कि यह उपन्यास हिन्दी के ‘‘फिक्शन उपन्यासों’’ के बीच न केवल अपनी अलग पहचान बनाता है अपितु शैलीगत एक नया मार्ग भी प्रशस्त करता है। शरद सिंह जहां एक ओर नए कथानकों को अपने उपन्यासों एवं कहानियों का विषय बनाती हैं वहीं उनके कथा साहित्य में धारदार स्त्रीविमर्श दिखाई देता है। शरद सिंह के चारो उपन्यासों ‘‘पिछले पन्ने की औरतें’’, ‘‘पचकौड़ी’’ ‘‘कस्बाई सिमोन’’ और ‘‘शिखण्डी’’ के कथानकों में परस्पर भिन्नता के साथ ही इनमें शैलीगत् भिन्नता भी है। ‘‘पिछले पन्ने की औरतें’’ में वे जहां बेड़िया समाज की स्त्रियों के जीवन पर विस्तार से प्रकाश डालती हैं, वहीं पचकौड़ी में बुन्देलखण्ड के सामंतवादी परिवेश में स्त्रीजीवन की दशा का चित्रण करते हुए वर्तमान सामाज, राजनीति एवं पत्रकारिता पर भी गहरा विमर्श करती हैं। ‘‘कस्बाई सिमोन’’ में वे एक अलग ही विषय उठाती हुई ‘‘लिव इन रिलेशन’’ को अपने उपन्यास का आधार बनाती हैं। इस विषय पर यह हिन्दी में पहला उपन्यास माना जाता है। हाल ही में उनका चैथा उपन्यास ‘‘शिखण्डी’’ प्रकाशित हुआ है जो ‘महाभारत’ के एक प्रमुख पात्र शिखण्डी के जीवन पर नया दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है।
Sagar Sahitya Avam Chintan Dr.(Miss) Sharad Singh - Dr. Varsha Singh
          लेखिका शरद सिंह का जन्म मध्यप्रदेश के एक छोटे से जिले पन्ना में 29 नवम्बर 1963 को हुआ था। जब वे साल भर की थीं तभी उनके सिर से उनके पिता श्री रामधारी सिंह का साया उठ गया। उनका तथा उनकी बड़ी बहन वर्षा सिंह का पालन-पोषण उनकी मां विद्यावती सिंह ने किया। शरद सिंह जी के नाना संत श्यामचरण सिंह शिक्षक होने के साथ ही गांधीवादी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। उदारमना संत श्यामचरण सिंह ने उज्जैन स्थित अपना घर बेच कर स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की सहायता की। इससे उन्हें समाज में तो सम्मान मिला किन्तु आर्थिक स्थिति डावांडोल हो गई। तब पुत्री विद्यावती सिंह ने नौकरी करने का निर्णय किया और शीघ्र ही वे शिक्षका बन गईं। उन्होंने अपने छोटे भाई कमल सिंह की पढ़ाई का जिम्मा भी अपने ऊपर ले लिया। घर की आर्थिक स्थिति सम्हल गई। किन्तु नियति ने कुछ और ही विधान रच रखा था। विद्यावती सिंह का देवरिया (उत्तर प्रदेश) निवासी रामधारी सिंह से विवाह हुआ। जब वे अपने पिता के घर पर थीं तभी एक दिन अचानक अपने पति रामधारी सिंह की मृत्यु की सूचना मिली। इसके बाद मानो उनका जीवन ही बदल गया। ससुराल पक्ष के मुंहमोड़ लेने के बाद उन्होंने तय किया कि वे किसी भी परिवारजन से एक पैसा भी लिए बिना अपनी दोनों पुत्रियों का लालन-पालन करेंगी।

शरद सिंह की मां श्रीमती विद्यावती सिंह अपने समय की ख्यातिलब्ध लेखिका एवं कवयित्री रही हैं। वे विद्यावती ‘‘मालविका’’ के नाम से साहित्य सृजन करती रही हैं। ‘‘मध्ययुगीन हिन्दी संत साहित्य पर बौद्ध धर्म का प्रभाव’’ विषय पर लिखे गए शोधात्मक ग्रंथ पर विद्यावती जी को जहां आगरा विश्वविद्यालय ने पीएच. डी. की उपाधि प्रदान की वहीं इस ग्रंथ ने उन्हें हिन्दी साहित्य में उल्लेखनीय प्रतिष्ठा दिलाई। यह कहा जा सकता है कि साहित्य सृजन का गुण शरद सिंह को अपनी मां एवं बहन डॉ. वर्षा सिंह से विरासत में मिला। डॉ. वर्षा सिंह हिन्दी गजल के क्षेत्र में प्रतिष्ठित हस्ताक्षर हैं। उनके छः गजल संग्रह एवं गजल विधा पर एक शोधात्मक पुस्तक प्रकाशित हो चुकी है।
डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह ने अपने जन्म से मई 1988 तक पन्ना मध्यप्रदेश में रहते हुए शिक्षा ग्रहण की तथा उसी दौरान पत्रकारिता भी की। तदोपरांत जून 1988 से वे अपनी माताजी एवं बड़ी बहन के साथ सागर मध्यप्रदेश की विगत लगभग 32 वर्ष से निवासी हो चुकी हैं। यूं तो शरद सिंह ने बाॅयोलाॅजी विषयों के साथ हायर सेंकेंड्री परीक्षा उत्तीर्ण की किन्तु उनका अहिंसा प्रेमी मन एक मेंढ़क का डिसेक्शन करने के बाद ही द्रवित हो उठा और उन्होंने अपनी आगे की पढ़ाई के लिए कला संकाय को चुना। अवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय रीवा से मध्यकालीन भारतीय इतिहास विषय में प्रथम एम.ए. की उपाधि प्राप्त की। इसके बाद डाॅ.हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय सागर से प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व में प्रथम श्रेणी एवं विवि मेरिट में प्रथम स्थान प्राप्त करते हुए अपना द्वितीय एम. ए. किया जिसमें उन्हें विश्वविद्यालय द्वारा स्वर्णपदक प्रदान किया गया। इसके बाद प्रख्यात पुराविद् डाॅ. कृष्णदत्त वाजपेयी एवं डाॅ. विवेकदत्त झा की प्रेरणा से डाॅ. एस.के. वाजपेयी के निदेशन में शोधकार्य पूर्ण कर ‘खजुराहो की मूर्तिकला का सौंदर्यात्मक अध्ययन’ विषय में डाॅ.हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय सागर से ही पीएच. डी. की उपाधि प्राप्त की। शिक्षणकार्य के प्रति रूचि के कारण उन्होंने प्रथम श्रेणी में बी.एड. किया तथा स्थानीय इम्मानुएल ब्वायज़ हा.से. स्कूल एवं जैन उ.मा.विद्यालय में क्रमशः तीन-तीन वर्ष अध्यापन कार्य किया। इसके साथ ही अल्पकालिक तौर पर बाल भारती स्कूल, अंकुर विद्यालय एवं आर्य कन्या विद्यालय सागर में भी अध्यापन कार्य किया।

डाॅ. शरद सिंह ने डाॅ.हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय सागर के एवीआरसी विभाग में फिल्म निर्माण सहायक के रूप में काम करते हुए उन्होंने अनेक शैक्षणिक फिल्मों के लिए पटकथालेखन, संपादन सहित फिल्म निर्माण का कार्य किया। किन्तु शीघ्र ही उन्हें अहसास हुआ कि वे एक कर्मचारी के रूप में बंधकर कार्य नहीं कर सकती हैं। तब उन्होंने स्वतंत्र लेखिका के रूप में लेखन कार्य करने एवं समाज सेवा से जुड़ने निर्णय लिया और उन्होंने विश्वविद्यालय की अपनी नौकरी से त्यागपत्र दे दिया। इसके बाद डाॅ. शरद सिंह ने कभी मुड़ कर नौकरियों की ओर नहीं देखा। इस तरह की खुद्दारी विरले लोगो में ही मिलती है। डाॅ. शरद सिंह अपने इस निर्णय के संबंध में बताती हैं कि -‘‘मेरे इस निर्णय ने मुझे अपने और परायों के भेद को अच्छी तरह समझा दिया। अरे लगी-लगाई नौकरी छोड़ दी कहते हुए कुछ लोगों ने मुंह मोड़ लिया लेकिन वहीं कुछ लोग ऐसे भी थे जिन्होंने मेरे इस निर्णय का स्वागत किया। मेरे इस निर्णय में मेरा हर तरह से साथ दिया मेरी दीदी वर्षा सिंह ने।’’
पारिवारिक साहित्यिक वातावरण में शरद सिंह ने बाल्यावस्था से ही लेखनकार्य शुरू कर दिया था। 24 जुलाई 1977 को शरद सिंह जी की पहली कहानी दैनिक जागरण के रीवा (म.प्र.) संस्करण में प्रकाशित हुई जिसका शीर्षक था ‘भिखारिन’। स्त्री विमर्श संबंधी उनकी पहली प्रकाशित कहानी - ‘काला चांद’ थी जो जबलपुर (म.प्र.) से प्रकाशित होने वाले समाचारपत्र दैनिक नवीन दुनिया, के ‘नारीनिकुंज’ परिशिष्ट में 28 अप्रैल 1983 को प्रकाशित हुई थी। इस परिशिष्ट का संपादन वरिष्ठ साहित्यकार राजकुमार ‘सुमित्र’ किया करते थे। राष्ट्रीय स्तर पर उनकी प्रथम चर्चित कहानी ‘गीला अंधेरा’ थी। जो मई 1996 में भारतीय भाषा परिषद् कलकत्ता से प्रकाशित होने वाली पत्रिका ‘‘वागर्थ’’ में प्रकाशित हुई थी। उस समय ‘वागर्थ’ के संपादक प्रभाकर श्रोत्रिय थे।
समीक्षक जगत ने शरद के लेखन को विविधता पूर्ण लेखन करार देते हुए रेखांकित किया है। इसी क्रम में स्त्री विमर्श पर उसने विशेष लेखन कार्य किया। जैसे बीड़ी बनाने वाली महिलाओं तथा तेंदूपत्ता संग्रहण करने वाली महिलाओं पर पुस्तक “पत्तों में कैद औरतें” तथा विश्व के विभिन्न देशों की स्त्रियों की स्थिति पर केंद्रित किताब ‘‘औरत तीन तस्वीरें’’। बाबासाहेब अंबेडकर के विचारों के स्त्री पक्ष को सामने लाने के लिए उन्होंने विशेष अध्ययन के उपरांत “डॉ. अम्बेडकर का स्त्री विमर्श” पुस्तक लिखी। उपन्यास, कहानी संग्रह, नाटक, जीवनियां, आदिवासी जीवन पर केंद्रित पुस्तकें, गजलों, कविताओं सहित विज्ञान पर केंद्रित पुस्तकें तथा इतिहास विशेष रुप से प्राचीन भारतीय इतिहास और खजुराहो पर उसने महत्वपूर्ण पुस्तकें लिखी हैं। अब तक शरद की लगभग 50 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। उनकी कहानियों का विभिन्न भाषाओं में अनुवाद प्रकाशित हो चुका है तथा उनके उपन्यासों एवं कहानियों पर देश के अनेक विश्वविद्यालयों में शोधकार्य हुआ है। जहां तक लेखन और प्रकाशन का प्रश्न है तो डाॅ.शरद सिंह के अब तक चार उपन्यास- पिछले पन्ने की औरतें, पचकौड़ी, कस्बाई सिमोन तथा शिखण्डी प्रकाशित हो चुका हैं। उनकी प्रकाशित अन्य पुस्तकों में कहानी संग्रह - ‘बाबा फ़रीद अब नहीं आते’, ‘तीली-तीली आग’, ‘छिपी हुई औरत और अन्य कहानियां’, ‘गिल्ला हनेरा’ (पंजाबी में अनूदित कहानी संग्रह), ‘राख तरे के अंगरा’ (बुन्देली में कहानी संग्रह ), ‘श्रेष्ठ जैन कथाएं’ तथा ‘श्रेष्ठ सिख कथाएं’। स्त्री-विमर्श एवं महिला सशक्तिकरण पुस्तकें-‘पत्तों में क़ैद औरतें’, ‘औरत तीन तस्वीरें’, ‘डाॅ. अम्बेडकर का स्त्रीविमर्श’, ‘आधी दुनिया पूरी धूप’। जीवनी की छः पुस्तकें-‘दीन दयाल उपाध्याय’, ‘श्यामा प्रसाद मुखर्जी’, ‘वल्लभ भाई पटेल’, ‘महात्मा गांधी’, ‘महामना मदनमोहन मालवीय’, ‘अटल बिहारी वाजपेयी’। इतिहास पर पुस्तकें-‘खजुराहो की मूर्तिकला के सौंदर्यात्मक तत्व’, ‘प्राचीन भारत का सामाजिक एवं आर्थिक इतिहास’। विज्ञान एवं पर्यावरण पर पुस्तकें -‘न्यायालयिक विज्ञान की नई चुनौतियां’, ‘सस्ता एवं सुरक्षित ऊर्जा स्रोत: सौर तापीय ऊर्जा’। नाटक संग्रह-‘आधी दुनिया-पूरी धूप, ‘गदर की चिनगारियां’। धर्म एवं दर्शन संबंधी सह लेखन पुस्तक-‘महामती प्राणनाथ: एक युगान्तकारी व्यक्तित्व’। भारत के आदिवासी जीवन पर पुस्तक-‘भारत के आदिवासी क्षेत्रों की लोककथाएं’। मध्यप्रदेश के आदिवासी जीवन पर दस पुस्तकें- ‘आदिवासियों का संसार’,‘आदिवासी परम्परा’,‘आदिवासी लोक कथाएं, ‘आदिवासी लोक नृत्य-गीत’, ‘आदिवासियों के देवी-देवता’, ‘आदिवासी गहने और वेशभूषा’, ‘कोंदा मारो सींगा मारो’,‘शहीद देभोबाई’,‘मणजी भील और बुद्धिमान वेत्स्या’,‘शहीद उदय किरार’। बुंदेलखण्ड की लोककथाओं पर पुस्तक-‘बुंदेली लोक कथाएं’। नवसाक्षरों के लिए कथा पुस्तकें- ‘बधाई की चिट्ठी’, ‘बधाई दी चिट्ठी’ (पंजाबी में अनुवाद), ‘बेटी-बेटा एक समान’,‘महिलाओं को तीन ज़रूरी सलाह’,‘औरत के कानूनी अधिकार’, ‘मुझे जीने दो, मां!’,’फूल खिलने से पहले’,‘मंा का दूध’, ‘दयाबाई’, ‘जुम्मन मियां की घोड़ी’। तीन काव्य संग्रह -‘आंसू बूंद चुए’(नवगीत संग्रह),‘कर्णप्रिया की आत्मकथा’ (खण्डकाव्य), ‘पतझड़ में भीग रही लड़की’(ग़ज़ल संग्रह)। डाॅ. शरद सिंह की कहानियों का पंजाबी, उर्दू, उड़िया, मराठी एवं मलयालम में अनुवाद हो चुका है। साथ ही दो कहानी संग्रह पंजाबी में अनूदित एवं प्रकाशित हो चुके हैं।
डाॅ. शरद सिंह को उनके साहित्य सृजन एवं पत्रिका संपादन के लिए अनेक सम्मान एवं पुरस्कार प्रदान किया जा चुके जिनमें कुछ प्रमुख हैं- गृह मंत्रालय, भारत सरकार का ‘गोविन्द वल्लभ पंत पुरस्कार -2000’ ‘न्यायालयिक विज्ञान की नई चुनौतियां’, पुस्तक के लिए, साहित्य अकादमी, मध्यप्रदेश संस्कृति परिषद, म.प्र. शासन का ‘‘पं. बालकृष्ण शर्मा नवीन पुरस्कार’’, म.प्र. हिन्दी साहित्य सम्मेलन का ‘‘वागीश्वरी सम्मान’’, श्रेष्ठ संपादन हेतु राज्यस्तरीय ‘‘पं. रामेश्वर गुरू पुरस्कार 2017’’ भोपाल, म.प्र., ‘नई धारा’ सम्मान, पटना, बिहार, ‘विजय वर्मा कथा सम्मान’, मुंबई, ‘पं. रामानन्द तिवारी स्मृति प्रतिष्ठा सम्मान’, इन्दौर म.प्र., ‘जौहरी सम्मान’, भोपाल म.प्र., ‘गुरदी देवी सम्मान’, लखनऊ, उत्तरप्रदेश, ‘अंबिकाप्रसाद ‘दिव्य रजत अलंकरण-2004’, भोपाल, मध्यप्रदेश, ‘श्रीमंत सेठ भगवानदास जैन स्मृति सम्मान’, सागर, म.प्र., ‘कस्तूरी देवी चतुर्वेदी लोकभाषा लेखिका सम्मान -2004’, भोपाल, म.प्र., ‘मंा प्रभादेवी सम्मान’, भोपाल, म.प्र., ‘शक्ति सम्मान 2016’, सागर, म.प्र., ‘एक्सीलेंस अवार्ड फाॅर क्रिएटर्स 2018, सागर टी.वी. न्यूज’ सागर, म.प्र., ‘शिवकुमार श्रीवास्तव सम्मान’, सागर, म.प्र., ‘निर्मल सम्मान’’ सागर, म.प्र., ‘विट्ठलभाई पटेल सम्मान’, सागर म.प्र., क्षत्रिय समाज साहित्य सम्मान, सागर, म.प्र., ‘दादा डालचंद जैन स्मृति प्रतिभा सम्मान’, सागर, म.प्र., ‘सुधा सावित्री तिवारी स्मृति कवयित्री सम्मान’, सागर, म.प्र. - आदि अनेक राष्ट्रीय एवं प्रादेशिक स्तर के सम्मान।
आज उन्हें देश के प्रतिष्ठित लिटरेचर फेस्टिवल में तथा महाविद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों में व्याख्यान हेतु ससम्मान आमंत्रित किया जाता है। वे अब तक जिन उल्लेखनीय आयोजनों में शामिल हो चुकी हैं उनमें से कुछ प्रमुख हैं - राष्ट्रीय इतिहास संगोष्ठी, ललितपुर 2002 में इतिहासकार के रूप में व्याख्यान, भारत भवन, भोपाल 2005 एवं 2014 में कहानी पाठ, लखनऊ में ‘कथाक्रम’ साहित्यिक समारोह में व्याख्यान, बुंदेलखंड विश्वविद्यालय, झांसी द्वारा आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में ‘स्त्रीविमर्श लेखन‘, 2014 पर व्याख्यान, बेंगलुरु लिट् फेस्ट 2014 में स्त्री लेखन पर व्याख्यान, स्वराज भवन, भोपाल 2014 में कहानी पाठ, विश्व हिन्दी सम्मेलन, भोपाल 2015 में हिन्दी के विकास पर विचार-विमर्श, चंडीगढ़ लिट्रेचर फेस्टिवल 2015 में उपन्यास ‘कस्बाई सिमोन’ का अंशपाठ एवं चर्चा, सिंहस्थ 2016 (उज्जैन) में महिला सशक्तिकरण पर व्याख्यान, अजमेर लिट्रेचर फेस्टिवल 2016 दो सत्रों में स्त्री-लेखन पर चर्चा, विश्व पुस्तकमेला 2017 में कहानीपाठ, स्पंदन संस्था, भोपाल द्वारा ‘स्त्री सर्जनात्मकता: एक यात्रा’, 2018 में कहानी पाठ, मध्यप्रदेश राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, भोपाल द्वारा आयोजित पावस व्याख्यानमाला में सतत् तीन वर्ष से व्याख्यान, ‘‘वैश्विक जीवन मूल्य और रामकथा’’ पर अंतर्राष्ट्रीय शोध सेमिनार 2018, शासकीय महाविद्यालय, गढ़ाकोटा में रामकथा की विश्वव्यापकता पर व्याख्यान, भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद्, नई दिल्ली द्वारा प्रायोजित ‘‘अतुल्य भारत: संस्कृति और राष्ट्र’’ अंतर्राष्ट्रीय शोध संगोष्ठी 2018, में व्याख्यान, लखनऊ विश्वविद्यालय, गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय, जयपुर विश्वविद्यालय, डाॅ हरीसिंह गौर केन्द्रीय विश्वविद्यालय सागर आदि देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों में व्याख्यान, ‘आजतक’ न्यूजचैनल के इंटरनेशनल लिटरेचर फेस्टिवल ‘‘साहित्य आजतक-2019’’ में साहित्य पर चर्चा-विमर्श, इन्दौर लिटरेचर फेस्टिवल 2020 साहित्य पर चर्चा-विमर्श। इनके सहित अनेक राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय आयोजनों में उल्लेखनीय सहभागिता।
डाॅ. शरद सिंह के कथा साहित्य पर देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों में शोध कार्य किए जा चुके हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में उनके लेख एवं कहानियों का नियमित प्रकाशन होता रहता है। उनकी रचनाएं रेडियो एवं टेलीविजन से भी नियमित प्रसारित होती रहती हैं। डाॅ शरद सिंह विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में स्तम्भ लेखन कर चुकी हैं जिनमें प्रमुख हैं-‘नई दुनिया’ समाचारपत्र में स्त्री मुद्दों पर स्तंभ लेखन, ‘नेशनल दुनिया’ (दिल्ली) में महिला संबंधी स्तंभ लेखन, ‘आचरण’ समाचारपत्र में ‘वामा’ स्तंभ लेखन, ‘आचरण’ समाचारपत्र में ‘बतकाव’ व्यंग-स्तंभ लेखन, ‘इंडिया इन साईड’ (लखनऊ) मासिक पत्रिका में ‘वामा’ महिला काॅलम। इन दिनों वे ‘नवभारत’ के संपादकीय पृष्ठ पर स्तम्भ लेखन, ‘सागर दिनकर’ (सागर) दैनिक समाचारपत्र में ‘चर्चा प्लस’ सामयिक विषयों पर काॅलम तथा ‘दैनिक बुंदेली मंच (छतरपुर) दैनिक समाचारपत्र में ‘शून्यकाल’ सामयिक विषयों पर काॅलम लिख रही हैं। वे दिल्ली से प्रकाशित होने वाले साहित्यिक पत्रिका ‘‘सामयिक सरस्वती’’ की कार्यकारी संपादक हैं।
समाज की शोषित एवं पीड़ित महिलाओं के पक्ष में लगातार कार्यरत शरद सिंह नवदुनिया प्रजामण्डल सहित सागर नगर की अनेक सामाजिक संस्थाओं से संबद्ध रहते हुए नगर स्वच्छता अभियान, वृक्षारोपण, जलसेवा आदि समाजसेवा के कार्यों से जुड़ी हुई हैं। डाॅ शरद सिंह का साहित्यसृजन हिन्दी साहित्य जगत के लिए एक अमूल्य निधि है। वे अपनी सफलताओं पर रूकी नहीं हैं अपितु निरन्तर साहित्य साधना में संलग्न हैं।
--------------
( दैनिक, आचरण दि. 21.01.2020)
#आचरण #सागर_साहित्य_एवं_चिंतन #वर्षासिंह #मेरा_कॉलम #MyColumn #Varsha_Singh #Sagar_Sahitya_Evam_Chintan #Sagar #Aacharan #Daily

शून्यकाल ... बुंदेलखंड में आज भी कमी है सुरक्षित मातृत्व की - डॉ शरद सिंह


Dr (Miss) Sharad Singh
शून्यकाल 
बुंदेलखंड में आज भी कमी है सुरक्षित मातृत्व की
  - डॉ शरद सिंह                      
      मातृत्व स्त्री-जीवन को ही नहीं वरन् समूचे समाज को पूर्णता प्रदान करता है। मातृत्व संतति को सुनिश्चित करता है और संतति से ही समाज की संरचना पीढ़ी-दर-पीढ़ी अगे बढ़ती है। किन्तु विडम्बना यह है कि हमारी सामाजिक व्यवस्था में जहां एक ओर मातृत्व का भरपूर स्वागत किया जाता है, खुशियां मनाई जाती हैं, वहीं गर्भवती के उचित आहार-पोषण के प्रति लापरवाही बरती जाती है। प्रत्येक गर्भवती के आहार-पोषण की आवश्यकता अलग-अलग होती है और यह चिकित्सकीय जांच द्वारा ही पता लगाया जा सकता है। जहां तक गर्भवती की जांच का प्रश्न है तो आज भी बुंदेलखंड के ग्रामीण अंचल में शिक्षा की कमी, पारम्परिक अंधविश्वासों एवं मान्यताओं के चलते गर्भवती की जांच कराने में कोताही बरती जाती है। भारत की जनसंख्या तेजी से बढ़ रही है पर सबसे अधिक दुर्भाग्य की बात ये है कि बढ़ती जनसंख्या के बावजूद लड़कियों का अनुपात घटता जा रहा है। भारत की 2001 की जनगणना के अनुसार, हर हजार लड़कों पर 927 लडकियां थीं, यद्यपि 2011 की जनगणना में ये आंकडें 943 लड़कियों पर आ पहुंचे, जो संतोषजनकतो थे फर उत्साहजनक नहीं।
      बुंदेलखंड के ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी शिक्षा की कमी और स्वास्थ्य संबंधी जागरूकता के प्रति लापरवाही को बोलबाला है। यद्यपि प्रदेश यारकार की ओर से समय-समय पर जननी सुरक्षा योजना जैसी योजनाएं लागू की गईं और इन योजनाओं के बारे में ग्रामीणजन को जानकारी देने का अभियान भी चलाया गया। फिर भी अनेक परिवार ऐसे हैं जिनकी रूचि इस बात पर टिकी रहती है कि गर्भस्थ शिशु लड़का है या लड़की? सरकारी पाबंदी के कारण अतः ऐसे लोगों की रुचि जननी को सरकार की ओर से मिलने वाली राशि में सिमट कर रह जाती है। भले ही उचित पोषण के अभाव में मां और शिशु दोनों की जान ख़तरे में रहती है। इसी मसले का दूसरा पक्ष यह भी है कि स्वयं गर्भवती महिलाओं को पता नहीं होता है कि अपने पोषण जरूरतों की पूर्ति तथा भ्रूण के विकास के लिए उनके शरीर को अतिरिक्त आयरन और फोलिक एसिड की आवश्यकता होती है। प्राप्त सरकारी आंकड़ों के अनुसार सन् 2018 में किए गए एक सर्वे में बुंदेलखंड के ग्रामीण अंचलों में लगभग 46.8 प्रतिशत गर्भवती महिलाओं में खून की कमी पाई गई थी। इन हालातों के चलते बुंदेलखंड के जिलों में गर्भवती महिलाओं में एनीमिया का प्रतिशत सबसे अधिक पाया गया है। प्रसवपूर्व चिकित्सकीय जांच को लेकर इन ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी जागरूकता की कमी है। 

Shoonyakaal Column of  Dr Sharad Singh in Dainik Bundeli Manch, 11.01.2020
        स्वास्थ्य विभाग ने सन् 2012 में मातृत्व एवं शिशु मृत्यु दर में कमी लाने के लिए मदर एंड चाइल्ड ट्रैकिंग सिस्टम नामक एक महत्वाकांक्षी योजना शुरू की थी। इसके तहत गर्भवती माताओं व उनके नवजात शिशु का पंजीकरण किया जाता है, ताकि उन्हें लंबे समय तक स्वास्थ्य सेवाएं दी जा सकें । आशा या एएनएम द्वारा जमीनी स्तर पर गर्भवती महिला एवं उनके शिशु की हेल्थ हिस्ट्री दर्ज की जाती है, जो स्वास्थ्य सुविधाओं को न सिर्फ बेहतर बनाने में बल्कि, लाभार्थी को भी स्वास्थ्य योजनाओं के प्रति जागरूक करने में मदद करती है। मार्च 2013 से फरवरी 2014 माह तक प्रदेश स्तर पर एकत्रित एमसीटीएस की रिपोर्ट के आधार पर रैंक तैयार की गई। इसमें बुंदेलखंड के उत्तर प्रदेशीय अंचल की स्थिति काफी खराब पाई गई थी। प्रदेश के 75 जनपद के परफार्मेंस में प्रसूता पंजीकरण में झांसी जनपद का स्थान 50 वां एवं नवजात शिशु पंजीकरण में 35 वां स्थान था।
    प्रसव के दौरान होने वाली मृत्यु के सबसे प्रमुख कारण हैं-अशिक्षा और गरीबी। सरकारी आंकड़ों के अनुसार आर्थिक रूप से कमजोर तबके की हर पांच मिनट में एक गर्भवती महिला प्रसवकाल के दौरान मौत के मुंह में चली जाती है। स्त्री के गर्भवती होने पर हर घर में बधाईयां गाई जाती हैं चाहे वह अमीर हो या गरीब। सरकार ने श्रमिक गर्भवतियों के लिए अनेक नियम-कानून बनाए हैं लेकिन उसका लाभ उन्हें कितना मिल पाता है इसमें कागजी और ज़मीनी आंकड़ों में बहुत अन्तर है। लगभग 52 प्रतिशत महिलाएं अपने स्वास्थ्य की चिन्ता किए बिना गर्भधारण करती हैं क्योंकि उन्हें गर्भधारण का निर्णय करने का अधिकार नहीं होता है। परिवार के अभिलाषाएं और पति की इच्छा उन्हें इस बात का अधिकार ही नहीं देती हैं कि उन्हें गर्भ धारण करना चाहिए या नहीं? अथवा उन्हें कब और कितने अंतराल में गर्भधारण करना चाहिए? ग्रामीण क्षेत्रों में और शहरी क्षेत्रों की झुग्गी-झोपड़ी बस्तियों में लगभग 70 प्रतिशत महिलाएं घरों में अप्रशिक्षित दाइयों से प्रसव कराती हैं। यह भी उनकी इच्छा और अनिच्छा की सीमा से परे होता है। उन्हें यह तय करने का अधिकार नहीं होता है कि वे कहां और किससे प्रसव कराएं? अर्थात् एक गर्भवती का गर्भधारण से ले कर प्रसव तक की यात्रा उसकी इच्छा की सहभागिता से परे तय होती है। इसी दुर्भाग्य के चलते प्रतिवर्ष लगभग एक लाख महिलाएं प्रसवकाल में अथवा इससे पूर्व प्रसव संबंधी परेशानियों के कारण अपने प्राण गवां देती हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार प्रसव के दौरान गर्भवती की मृत्यु का 24.8 प्रतिशत कारण हैमरेज, 14.9 प्रतिशत कारण संक्रमण और 12.9 प्रतिशत कारण एक्लैंपसिया है। मध्यप्रदेश के बुंदेलखंड में ‘जननी एक्सप्रेस’ के द्वारा गर्भवती को अस्पताल पहुंचाए जाने की मुफ़्त सुविधा राज्य सरकार की ओर से मुहैया कराई जा रही है किन्तु जागरूकता की कमी के कारण परिवार यह तय नहीं कर पाता है कि गर्भवती को अस्पताल कब पहुंचाया जाए? ‘जननी एक्सप्रेस’ बुलाने में भी इतनी देर कर दी जाती है कि या तो वाहन में ही प्रसव की स्थिति निर्मित हो जाती है या फिर गर्भवती की हालत गंभीर होने लगती है। ऐसी दशा में सुरक्षित मातृत्व अभियान को पूरी ईमानदारी से और पूरी गंभीरता से चलाया जाना जरूरी है। 
 परिवार खुश होता है कि उनकी बहू उनके परिवार को संतान देने वाली है, पति प्रसन्न होता है कि उसकी पत्नी उसे पिता का दर्जा दिलाने वाली है किन्तु इन खुशियों के बीच गर्भवती की सही देखभाल, स्वास्थ्य-सुरक्षा तथा उसकी इच्छा-अनिच्छा की इस तरह अनदेखी कर दी जाती है कि दुष्परिणाम गर्भवती की मृत्यु के रूप में सामने आता है। जबकि एक गर्भवती का दायित्व सरकार या कानून से कहीं अधिक परिवार पर होता है, इस बात को परिवार और समाज को समझना ही होगा।      
            ---------------------
(छतरपुर, म.प्र. से प्रकाशित "दैनिक बुंदेली मंच", 20.01.2020)
#दैनिकबुंदेलीमंच #कॉलम #शून्यकाल #शरदसिंह #गर्भवती #सुरक्षितमातृत्व #ColumnShoonyakaal #Shoonyakaal #Column #SharadSingh #miss_sharad

Wednesday, January 15, 2020

चर्चा प्लस ... दो पीढ़ियों की दूरी मिटाती है मकर संक्रांति - डाॅ. शरद सिंह

Dr ( Miss) Sharad Singh
चर्चा प्लस ... 

दो पीढ़ियों की दूरी मिटाती है मकर संक्रांति
- डाॅ. शरद सिंह 


मकर संक्रांति तिल-गुड़, स्नान और पतंग का त्यौहार है। यूं तो सूर्य के धनु से मकर राशि में प्रवेश को उत्तरायण माना जाता है और सूर्य के उत्तरायण में प्रवेश के संक्रांतिकाल को मकर संक्रांति के पर्व के रूप में मनाया जाता है। यह मात्र धार्मिक पर्व नहीं वरन् एक सामाजिक पर्व है और इसमें निहित है संदेश दो पीढ़ियों के बीच निकटता लाने का। यह संदेश आज के परिवेश में बेहद महत्वपूर्ण है जब आज परिवार बिखर रहे हैं, वृद्धाश्रम खुलते जा रहे हैं और बड़ों ओर बच्चों के बीच दूरियां बढ़ती जा रही हैं जेनेरेशन गेप के नाम पर। मकर संक्रांति में पिता-पुत्र के पारस्परिक मेल की रोचक कथा भी मौजूद है जिसे जानना और समझना जरूरी है।

सूर्य पर आधारित मकर संक्रांति का भारतीय संस्कृति में बहुत महत्व माना गया है। वेद और पुराणों में भी इस दिन का विशेष उल्लेख मिलता है। मकर संक्रांति खगोलीय घटना है, जिससे जड़ और चेतन की दशा और दिशा तय होती है। सूर्य के धनु से मकर राशि में प्रवेश को उत्तरायण माना जाता है। वर्ष को दो भागों में बांटा गया है। पहला उत्तरायण और दूसरा दक्षिणायन। उक्त दो अयन को मिलाकर एक वर्ष होता है। मकर संक्रांति के दिन सूर्य पृथ्वी की परिक्रमा करने की दिशा बदलते हुए थोड़ा उत्तर की ओर बढ़ता जाता है, इसलिए इस काल को उत्तरायण कहते हैं। सूर्य है तो जीवन है। इसीलिए, सूर्य का एक राशि से दूसरी राशि में जाना वैदिक ज्योतिष के अनुसार काफी महत्वपूर्ण घटना है। सूर्यदेव जिस दिन धनु से मकर राशि में पहुंचते हैं उसे मकर संक्रांति का दिन कहते हैं। सूर्य के मकर राशि में आते ही मलमास समाप्त हो जाता है। इसी दिन से ही देवताओं का दिन शुरू होता है, जो आषाढ़ मास तक रहता है। दक्षियायन देवताओं के लिए रात्रि का समय होता है। ठीक इसी समय से सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायन हो जाता है। मकर संक्रांति को उत्तरायण भी कहते हैं, क्योंकि इस दिन से सूर्यदेव उत्तर दिशा की ओर बढ़ना शुरू कर देते हैं। इस दिशा परिवर्तन के समय को ही मकर संक्रांति कहते हैं।
Charcha Plus - दो पीढ़ियों की दूरी मिटाती है मकर संक्रांति  -  Charcha Plus Column by Dr Sharad Singh, 15.01.2020
       मकर संक्रांति समूचे भारत में मनाया जाता है, चाहे इसका नाम प्रत्येक प्रांत में अलग-अलग हो और इसे मनाने के तरीके भी भिन्न हों, किंतु यह बहुत ही महत्व का पर्व है। मकर संक्रांति को गुजरात में उत्तरायण, पंजाब में लोहड़ी पर्व, गढ़वाल में खिचड़ी संक्रांति और केरल में पोंगल के नाम से मनाया जाता है। वहीं सिंधी लोग इस त्योहार को तिरमौरी कहते हैं। इस अवसर पर गुजरात समेत कई राज्यों में पतंगें भी उड़ाई जाती है। इस समय से दिन बड़े और रात छोटी होने के साथ ही मौसम ठंडी से गर्मी की तरफ बढ़ने लगता है। मकर संक्रांति की विभिन्न परंपराओं में स्नान, दान का विशेष महत्व है, किन्तु इसके अलावा इसदिन पारंपरिक खिचड़ी और तिल के उपयोग से पकवान बनाने की भी मान्यता है। देश के हर कोने में अलग अलग तरीके से खिचड़ी और तिल के व्यंजन पकाए जाते हैं। इन्हें मकर संक्रांति के दिन बनाया जाता है और भगवान को भोग लगाने के बाद अगले दिन सूर्य उदय के पश्चात ही ग्रहण किया जाता है।
किन्तु मकर संक्रांति के दिन खिचड़ी क्यों बनाई जाती है? इसदिन तिल के प्रयोग से तरह तरह के पकवान क्यों तैयार किए जाते हैं? इसके पीछे का कारण क्या है? आइए इनके पीछे छिपी पौराणिक कहानियों के बारे में जानते हैं। श्रीमद्भागवत एवं देवी पुराण में दर्ज एक कथा के अनुसार शनि देव का हमेशा से ही अपने पिता सूर्य देव से वैर था। एक दिन सूर्य देव ने शनि और उसकी माता छाया को अपनी पहली पत्नी संज्ञा के पुत्र यमराज से भेद भाव करते हुए देख लिया। इससे नाराज होकर उन्होंने अपने जीवन से छाया और शनि को निकालने का कठोर फैसला लिया। इससे नाराज होकर शनि और छाया ने सूर्य को कुष्ठ रोग हो जाने का शाप दिया और वहां से चले गए। पिता को कुष्ठ रोग से परेशान होते देख यमराज ने तपस्या की। आखिरकार सूर्य देव कुष्ठ रोग से मुक्त हुए। किन्तु उनके मन में अभी भी शनी देव को लेकर क्रोध था। क्रोधित अवस्था में ही वे शनि देव के घर (कुंभ राशि में) गए और उसे जलाकर काला कर दिया। इसके बाद शनि और उनकी माता छाया को कष्ट भोगना पड़ा।
अपनी सौतेली मां और शनी देव को दुख में देखकर यमराज ने उनकी मदद की। सूर्य देव को दोबारा उनसे मिलने भेजा। इस बार जब सूर्य देव वहां पहुंचे तो शनि देव ने काले तिल से उनकी पूजा की। चूंकि घर में सब कुछ जल चुका था, इसलिए शनि देव के पास केवल तिल ही थे। शनि की पूजा से प्रसन्न होकर सूर्य देव ने शनि देव को वरदान दिया और कहा कि तुम्हारे दूसरे घर ‘मकर’ में आने पर तुम्हारा घर धन-धान्य से भर जाएगा। इसी कारण से मकर संक्रांति के दिन सूर्य देव की तिल से पूजा की जाती है और अगले दिन तिल का सेवन किया जाता है।
एक अन्य कथा के अनुसार शनिदेव का जन्म महर्षि कश्यप के अभिभावकत्व में कश्यप यज्ञ से हुआ। छाया शिव की भक्तिन थी। जब शनिदेव छाया के गर्भ में थे तो छाया ने भगवान शिव की इतनी कठोर तपस्या कि वे खाने-पीने की सुध तक उन्हें न रही। भूख-प्यास, धूप-गर्मी सहने के कारण उसका प्रभाव छाया के गर्भ में पल रहे शनि पर भी पड़ा और उनका रंग काला हो गया। जब शनिदेव का जन्म हुआ तो रंग को देखकर सूर्यदेव ने छाया पर संदेह किया और उन्हें अपमानित करते हुए कह दिया कि यह मेरा पुत्र नहीं हो सकता। मां के तप की शक्ति शनिदेव में भी आ गई थी उन्होंने क्रोधित होकर अपने पिता सूर्यदेव को देखा तो सूर्यदेव बिल्कुल काले हो गये, उनके घोड़ों की चाल रुक गई। परेशान होकर सूर्यदेव को भगवान शिव की शरण लेनी पड़ी और शिव ने उनको उनकी गलती का अहसास कराया। सूर्यदेव ने अपनी गलती के लिये क्षमा याचना की जिसके बाद उन्हें फिर से अपना असली रूप वापस मिला।
ये दोनों कथाएं इस बात का संदेश देती हैं कि पिता और पुत्र में भूल चाहे जिससे भी हुई हो, उन्हें परस्पर मिल कर, एक दूसरे से बातचीत कर के मसले को सुलझा लेना चाहिए। यह संदेश आज के परिवेश में बेहद महत्वपूर्ण है जब आज परिवार बिखर रहे हैं, वृद्धाश्रम खुलते जा रहे हैं और बड़ों ओर बच्चों के बीच दूरियां बढ़ती जा रही हैं जेनेरेशन गेप के नाम पर। मिल-बैठ कर परस्पर दुख-सुख जानने का चलन परिवारों से खत्म होता जा रहा है, जिसके लिए मकर संक्रांति में पिता-पुत्र के पारस्परिक मेल की रोचक कथाओं को जानना और समझना जरूरी है। बुंदेलखंड में तो यह मान्यता भी है कि मकर संक्रांति पर जब कोई पिता अपने पुत्र से मिलने जाते है, तो उनके बीच के मतभेद दूर हो जाते हैं। -------------------------
(सागर दिनकर, 15.01.2020)


#चर्चाप्लस   #डाॅशरदसिंह #SharadSingh #SagarDinkar #CharchaPlus #मकरसंक्रांति #MakarSankranti

शून्यकाल ... बदलते माहौल में मकर संक्रांति पर्व की परंपरा - डाॅ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
शून्यकाल ...

बदलते माहौल में मकर संक्रांति पर्व की परंपरा
- डाॅ. शरद सिंह

 

पारिवारिक विखण्डन और न्यूक्लियर परिवारों के चलन ने अन्य परंपराओं की भांति इस त्यौहारी परंपरा को भी क्षति पहुंचाई है। मकर संक्रांति (बुड़की) के पर्व का बड़ा ही महत्व रहा है। एक समय था जब ‘सकरायत स्नान’ करने वाली महिलाएं ‘बुड़की’ लगाने के लिए सुमधुर लोकगीत गाती हुई झुंड के झुंड जलाशयों पर पहुंचती थीं जहां मर्दाना घाट अलग होता था और जनाना घाट अलग। जलाशयों के रास्ते मेले से सजे होते थे।
बुंदेलखंड में आज भी मकर संक्रांति के त्यौहार का बहुत महत्व है किन्तु ग्रामीण क्षेत्रों में में वह जहां अपने मौलिक रूप में बचा है वहीं शहरी क्षेत्रों में उसमें औपचारिकता का समावेश हो गया है। लोग सुबह से तिल से स्नान कर मंदिरों में दर्शन करने जाते और उसके बाद मेले में जाकर पूरा दिन व्यतीत करते हैं। मुझे याद है पन्ना नगर में संक्रंाति का वह उत्साह जो मेरे बचपन की यादों के साथ भली-भांति रचा-बसा है। मेरा घर वहां हिरणबाग नामक काॅलोनी में था जो धरम सागर तालाब के निकट था। धरम सागर अपने नाम के अनुरूप धार्मिक महत्व के क्रियाकलापों से सम्बद्ध रहा। मकर संक्रांति पर धरम सागर के रास्ते में मेला लगता था और ‘‘सकरायत’’ या ’’बुड़की’’ नहाने वाले अर्थात् संक्रांति-स्नान करने वाले स्त्री-पुरुष, बच्चे गाना गाते हुए धरम सागर जाते थे। मैंने भी एक बार धरम सागर में संक्रति स्नान किया था। मुझे सबसे आकर्षित करता था वहां का मेला जिसमें मिट्टी से बने तरह-तरह के खिलौने बिकने आते थे। मिट्टी के घोड़े और हाथी बनाए जाते थे जिनमें पाहिए लगे होते थे। इनकी सुंदरता देखते ही बनती थी। इनमें लगाम और महावत सहित सुंदर चित्रकारी भी होती थी। ये हाथी, घोड़े इस प्रकार के होते थे कि जिनमें सुतली बांधकर हम बच्चे आसानी से दौड़ा सकते थे। खिलौने के रूप में बैलगाड़ी की बनाई जाती थी। घरेलू कामकाज से जुड़े खिलौने जैसे गेहूं पीसने की चक्की भी मिलती थी। इसमें बाक़ायदे दो पाट होते थे। गेहूं अथवा अनाज डालने के लिए छेद भी बना होता था। साथ ही चक्की में मूठ फंसाने के लिए भी छेद होता था। आज भी ये खिलौने बनते हैं किन्तु इन्हें खरीदने वालों और इनसे खेलने वालों की कमी हो गई है। आज नन्हें बच्चों के नन्हें हाथों में मोबाईल गेम खेलने के लिए मोबाईल पकड़ा दिया जाता है।
Shoonyakaal Column of  Dr Sharad Singh in Dainik Bundeli Manch, 15.01.2020
     एक त्यौहार के रूप में मकर संक्रांति पर्व का आज भी बुंदेलखंड में महत्वपूर्ण स्थान है। बुंदेलखंड में तिल, लाई के लड्डू और शक्कर से बने घड़िया घुल्ला से संक्रांति का स्वागत किया जाता है। पर्व से ठीक एक दिन पहले सभी घरों में मूंग दाल की मंगौड़ी, भजिया पकवान बनाए जाते हैं। इसके बाद पर्व पर संक्रंाति-स्नान किया जाता है। इस पर्व में खिचड़ी अवश्य बनाई जाती है। प्रचलित मान्यता के अनुसार मकर राशि में सूर्य के प्रवेश के बाद दिन धीरे- धीरे बढ़ने लगते हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार इस विशेष दिन पर भगवान सूर्य अपने पुत्र शनि के पास जाते है, उस समय शनि मकर राशि का प्रतिनिधित्व कर रहे होते है। पिता और पुत्र के बीच स्वस्थ सम्बन्धों को मनाने के लिए, मतभेदों के बावजूद, मकर संक्रांति को महत्व दिया गया। बुंदेलखंड में ऐसा माना जाता है कि इस विशेष दिन पर जब कोई पिता अपने पुत्र से मिलने जाते है, तो उनके बीच के मतभेद दूर हो जाते हैं।
बुंदेलखंड के अनेक स्थानों पर आज भी मकर संक्रांति और संक्रांति के मेले जनरूचि के केन्द्र रहते हैं। जैसे पन्ना जिले में मुख्य रूप से अजयगढ़ के अजयपाल किला में लगने वाला और नीचे मैदान में लगने वाला विशाल मेला। जिले से लगभग 25 किमी दूर सारंग धाम मंदिर में लगने वाला मेला, जहां दूर-दूर से श्रद्धालु आते हैं। अमानगंज के निकट पंडवन मेला, पवई के हनुमान भाटे एवं कलेहन का मेलाा। मान्यता है कि मकर संक्रांति के समय देवी देवता भी विभिन्न रूप धारण कर तीर्थ स्थान नदी आदि स्थान पर स्नान करते है। मान्यतानुसार कलेहन नदी में मकर संक्रांति पर स्नान करने तथा दान करने से विशेष महत्व मिलता है।
बांदा में संक्रांति मेले का एक अलग ही रूप दिखाई देता है। वहां का मेला प्रेम और त्याग की स्मृति में सजता है। मकर संक्रांति पर बांदा नगर की सीमा पर यह मेला केन नदी और भूरागढ़ दुर्ग के बीच स्थित युवा नटबली और उसकी प्रेमिका की याद में लगता है। कहा जाता है कि महोबा जनपद के सुंगिरा का रहने वाला नोने अर्जुन सिंह भूरागढ़ दुर्ग का किलेदार था। यहां से कुछ किलोमीटर दूर सरबई (म.प्र.) गांव है। वहां नट जाति के लोग आबाद थे। करतब दिखाने नट भूरागढ़ आते थे। किले में काम करने वाले एक युवा नट और किलेदार की पुत्री के बीच प्रेम हो गया। किलेदार को इसका पता चला तो पहले तो वह बेटी पर नाराज हुआ फिर उसने प्रेमी युवा नट से यह शर्त रखी कि सूत की रस्सी पर चलकर नदी पार करके किले में आए। अगर ऐसा कर लेगा तो वह अपनी पुत्री से उसकी शादी कर देगा। नटबली ने शर्त मान ली। मकर संक्रांति के दिन नटबली ने नदी के इस पार से लेकर किले तक सूत की रस्सी बांधी और रस्सी पर चलता हुआ वह किले की ओर बढ़ने लगा। युवा नट दुर्ग में पहुंचने को ही था कि तभी किलेदार नोने अर्जुन सिंह ने रस्सी काट दी। नट नीचे चट्टानों पर आ गिरा और मारा गया। यह देख किलेदार की पुत्री ने भी दुर्ग से छलांग लगाकर जान दे दी। इन दोनों प्रेमी-प्रेमिकाओं की याद में घटनास्थल पर दो मंदिर बनाए गए। यह आज भी मौजूद हैं। नट बिरादरी के लोग इसे विशेष तौर पर पूजते हैं। हर साल मकर संक्रांति के दिन यहां नटबली मेला लगता है।
सागर नगर की लाखा बंजारा झील के चकराघाट में हाजारों की संख्या में श्रद्धालु स्नान करने पहुंचते हैं और वहां मेले जैसा माहौल दिखाई देता है। सागर जिले के ग्रामीण अंचलों में आज भी संक्रांति पर लमटेरा गीत गाए जाते हैं। वस्तुतः मकर संक्रांति स्नान से जुड़ा त्यौहार है अतः बुंदेलखंड में जलाशयों से इसका सीधा संबंध है। चूकि बुंदेलखंड में जलाशयों की दशा पहले जैसी नहीं रही तथा बड़ी संख्या में लोग भी जलाशयों में पहुंच कर स्नान करने के आदी नहीं रहे अतः जलाशयों और श्रद्धालुओं के पारस्परिक अंतसंबंधों में भी कमी आई है। आज मकर संक्रांति तिल गुड़ के लड्डुओं और चाईनीज़ पतंगों के त्यौहार के रूप में सिमट-सा गया है।
-----------------------------
छतरपुर, म.प्र. से प्रकाशित "दैनिक बुंदेली मंच", 15.01.2020)

#दैनिकबुंदेलीमंच #कॉलम #शून्यकाल #शरदसिंह #ColumnShoonyakaal #Shoonyakaal #Column #SharadSingh #DainikBundeliManch #MakarSankranti

Monday, January 13, 2020

शून्यकाल .....सभी के लिए जानना जरूरी है पॉक्सो एक्ट - डॉ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
शून्यकाल .....
सभी के लिए जानना जरूरी है पॉक्सो एक्ट
  - डॉ. शरद सिंह                                     
 आजकल आए दिन नाबालिगों के साथ दुष्कर्म की घटनाएं घटित हो रही हैं। इन घटनाओं के संबंध में पॉक्सो एक्ट के अंतर्गत अपराध पंजीबद्ध किए जाते हैं। किन्तु कानून संबंधी आवश्यक ज्ञान की कमी के कारण अधिकांश लोग नहीं जानते हैं कि पॉक्सो एक्ट क्या है और इसके अंतर्गत क्या प्रावधान रखे गए हैं? वर्तमान में बच्चियों के विरुद्ध बढ़ती आपराधिक गतिविधियों के चलते प्रत्येक व्यक्ति को पाक्सो एक्ट जैसे कानून के बारे में जानकारी होनी चाहिए।   

बच्चों के साथ आए दिन यौन अपराधों के समाचार समाज को लज्जित करते रहते हैं। बच्चे न घर में सुरक्षित हैं और न ही खुले आसमान के नीचे। विकास के दावों के बीच भारत के अनुभव और ज़मीनी सच्चाई बच्चों की असुरक्षा की अलग कहानी कहती है। विगत वर्ष उत्तरप्रदेश के रामपुर में 7 साल की बच्ची को जंगल में ले जाकर बलात्कार किया गया। अमरोहा में 5 साल की बच्ची से बलात्कार हुआ। मुज़फ़्फ़रनगर में एक चिकित्सक ने सिरदर्द का इलाज़ कराने आई 13 साल की बच्ची के साथ बलात्कार किया। मध्य प्रदेश के इंदौर में 20 अप्रैल 2018 को फुटपाथ पर सो रही चार महीने की बच्ची को चुपचाप उठा लिया गया। उस मासूम के साथ बलात्कार किया गया और उसका सिर पटक पटक कर उसकी हत्या कर दी गई। उस बच्ची का परिवार राजबाड़ा में गुब्बारे बेचकर जीवनयापन करता था। हाल ही में हुए अलीगढ़कांड जैसे अपराधों ने तो नृशंसता की सारी हदें पार कर दीं। यह चिंताजनक स्थिति दिन प्रति दिन और भयानक रूप लेती जा रही है।

इस तरह के मामलों की बढ़ती संख्या देखकर ही सरकार ने वर्ष 2012 में एक विशेष कानून बनाया था। जो बच्चों को छेड़खानी, बलात्कार और कुकर्म जैसे मामलों से सुरक्षा प्रदान करता है। उस कानून का नाम पॉक्सो एक्ट। इस पॉक्सो एक्ट का पूरा नाम है - ‘‘प्रोटेक्शन आफ चिल्ड्रेन फ्राम सेक्सुअल अफेंसेस एक्ट’’। महिला और बाल विकास मंत्रालय ने पॉक्सो एक्ट-2012 को बच्चों के प्रति यौन उत्पीड़न और यौन शोषण और पोर्नोग्राफी जैसे जघन्य अपराधों को रोकने के लिए बनाया था। वर्ष 2012 में बनाए गए इस कानून के तहत अलग-अलग अपराध के लिए अलग-अलग सजा तय की गई है। जिसका कड़ाई से पालन किया जाना भी सुनिश्चित किया गया है। इस अधिनियम की धारा 4 के तहत वो मामले शामिल किए जाते हैं जिनमें बच्चे के साथ दुष्कर्म या कुकर्म किया गया हो. इसमें सात साल सजा से लेकर उम्रकैद और अर्थदंड भी लगाया जा सकता है।
Shoonyakaal Column of  Dr Sharad Singh in Dainik Bundeli Manch, 11.01.2020
              पॉक्सो एक्ट की धारा 6 के अधीन वे मामले लाए जाते हैं जिनमें बच्चों को दुष्कर्म या कुकर्म के बाद गम्भीर चोट पहुंचाई गई हो। इसमें दस साल से लेकर उम्रकैद तक की सजा हो सकती है और साथ ही जुर्माना भी लगाया जा सकता है। पॉक्सो अधिनियम की धारा 7 और 8 के तहत वो मामले पंजीकृत किए जाते हैं जिनमें बच्चों के प्राईवेटपार्ट से छेडछाड़ की गई हो। इस धारा के आरोपियों पर दोष सिद्ध हो जाने पर पांच से सात साल तक की सजा और जुर्माना हो सकता है। पॉक्सो एक्ट की धारा 3 के तहत पेनेट्रेटिव सेक्सुअल असॉल्ट को भी परिभाषित किया गया है। जिसमें बच्चे के शरीर के साथ किसी भी तरह की हरकत करने वाले शख्स को कड़ी सजा का प्रावधान है। दरअसल, 18 साल से कम उम्र के बच्चों से किसी भी तरह का यौन व्यवहार इस कानून के दायरे में आ जाता है। यह कानून लड़के और लड़की को समान रूप से सुरक्षा प्रदान करता है। इस कानून के तहत पंजीकृत होने वाले मामलों की सुनवाई विशेष अदालत में होती है।

पॉक्सो एक्ट लागू किए जाने के बाद बारह वर्ष से कम उम्र की बच्चियों के साथ दुष्कर्म में फांसी की सजा का प्रावधान रखा गया था,  किन्तु बाद में अनुभव किया गया कि बालकों को भी इस एक्ट के तहत न्याय दिए जाने की व्यवस्था होनी चाहिए। इसीलिए एक्ट में संशोधन किया गया और  बालकों को भी यौन शोषण से बचाने और उनके साथ दुराचार करने वालों को फांसी की सजा का प्रावधान तय किया गया। इसके अंतर्गत केन्द्रीय मंत्रिमंडल ने लड़की-लड़कों दोनों यानी बच्चों को यौन उत्पीड़न से बचाने के बाल यौन अपराध संरक्षण कानून (पॉस्को) 2012 में संशोधन को मंजूरी दे दी। संशोधित कानून में 12 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के साथ दुष्कर्म करने पर मौत की सजा तक का प्रावधान है। इसके अलावा बाल यौन उत्पीड़न के अन्य अपराधों की भी सजा कड़ी करने का प्रस्ताव है।

बच्चों के हित संरक्षित करने और बाल यौन अपराध को रोकने के उद्देश्य से लाया जा रहा पोस्को संशोधन विधेयक  के संबंध में तत्कालीन महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने स्पष्ट कहा था कि सभी बच्चों को इससे बचाने के लिए जेन्डर न्यूट्रल कानून पोस्को में संशोधन किया जाएगा। संशोधित कानून में पोस्को कानून की धारा 4, 5, 6, 9, 14, 15 और 42 में संशोधन करने का प्रस्ताव है। धारा 6 एग्रीवेटेड पेनीट्रेटिव सैक्सुअल असाल्ट पर सजा का प्रावधान करती है। अभी इसमें न्यूनतम 10 वर्ष की कैद है जो कि बढ़कर उम्रकैद व जुर्माना तक हो सकती है। प्रस्तावित संशोधन में न्यूनतम 20 वर्ष की कैद जो बढ़ कर जीवन पर्यन्त कैद और जुर्माने के अलावा मृत्युदंड तक का प्रावधान किया गया है। धारा 5 में संशोधन करके जोड़ा जाएगा कि अगर यौन उत्पीड़न के दौरान बच्चे की मृत्यु हो जाती है तो उसे एग्रीवेटेड पेनीट्रेटिव सैक्सुअल असाल्ट माना जाएगा। इसके अलावा प्राकृतिक आपदा के शिकार बच्चे का यौन उत्पीड़न भी इसी श्रेणी का अपराध माना जाएगा।
धारा चार में संशोधन करके 16 साल से कम उम्र के बच्चे के साथ पेनीट्रेटिव सैक्सुअल असाल्ट में न्यूनतम सात साल की सजा को बढ़ा कर न्यूनतम 20 साल कैद करने का प्रस्ताव है जो कि बढ़ कर उम्रकैद तक हो सकती है। पैसे के बदले यौन शोषण और बच्चे को जल्दी बड़ा यानी वयस्क करने के लिए हार्मोन या रसायन देना भी एग्रीवेटेड सैक्सुअल असाल्ट माना जाएगा। धारा 15 में संशोधन होगा जिसमें व्यवसायिक उद्देश्य से बच्चों की पोर्नोग्राफी से संबंधित सामग्री एकत्रित करने पर न्यूनतम तीन साल की सजा का प्रावधान किया जा रहा है इससे ये धारा गैर जमानती अपराध की श्रेणी में आ जाएगी।

भारतीय दंड संहिता में धारा 376 में बलात्कार के अपराधी को सजा दी जाती है। लेकिन अगर बलात्कार पीड़िता कोई नाबालिग हो, तो उसके साथ एक और धारा बढ़ जाती है। उसे बलात्कार के अलावा पाक्सो ऐक्ट के तहत भी सजा दी जाती है. 27 दिसंबर, 2018 को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अगुवाई वाली कैबिनेट ने इसी पॉक्सो ऐक्ट को और भी कड़ा कर दिया। अब इस ऐक्ट के तहत दोषी लोगों को फांसी तक की सजा हो सकती है। इस ऐक्ट को बच्चों को यौन अपराधों से बचाने, यौन उत्पीड़न और पोर्नोग्राफी से बचाने के लिए लागू किया गया था. 2012 में ये ऐक्ट इसलिए बनाया गया था, ताकि बच्चों के साथ होने वाले यौन अपराधों का ट्रायल आसान हो सके और अपराधियों को जल्द सजा मिल सके. इस ऐक्ट में 18 साल से कम उम्र वाले को बच्चे की कैटेगरी में रखा जाता है. 2012 से पहले बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों को लेकर कोई खास नियम-कानून नहीं था।
यदि पीड़ित बच्चा अथवा बच्ची मानसिक रूप से बीमार है या बच्चे से यौन अपराध करने वाला सैनिक, सरकारी अधिकारी या कोई ऐसा व्यक्ति है, जिस पर बच्चा भरोसा करता है, जैसे रिश्तेदार, पुलिस अफसर, टीचर या डॉक्टर, तो इसे और संगीन अपराध माना जाएगा। अगर कोई किसी नाबालिग लड़की को हॉर्मोन्स के इंजेक्शन देता है, ताकि वक्त के पहले उनके शरीर में बदलाव किया जा सके, तो ऐसे भी लोगों के खिलाफ पॉक्सो ऐक्ट के तहत केस दर्ज किया जाता है।

इस ऐक्ट ने यौन अपराध को रिपोर्ट करना अनिवार्य कर दिया है। यानी अगर आपको किसी बालिका के साथ होने वाले यौन अपराध की जानकारी है, तो ये आपकी कानूनी ज़िम्मेदारी है कि उस संबंध में रिपोर्ट की जाए। ऐसा न करने पर अपराध की जानकारी छिपाने के अपराध में 6 महीने की जेल और जुर्माना हो सकता है। ऐक्ट के अनुसार किसी केस के स्पेशल कोर्ट के संज्ञान में आने के 30 दिनों के अंदर क्राइम के सबूत इकट्ठे कर लिए जाने चाहिए और स्पेशल कोर्ट को ज़्यादा से ज़्यादा से एक साल के अंदर ट्रायल पूरा कर लिया जाना चाहिए। बालिका का मेडिकल 24 घंटे के भीतर हो जाना चाहिए। ऐक्ट के तहत स्पेशल कोर्ट को सुनवाई कैमरे के सामने करने की कोशिश करनी चाहिए। साथ ही, कोर्ट में बालिका के माता-पिता या कोई ऐसा व्यक्ति उपस्थित होना चाहिए, जिस पर पीड़ित बालिका भरोसा करती हो।
पॉक्सो ऐक्ट अनुसार केस जितना गंभीर हो, सज़ा उतनी ही कड़ी होनी चाहिए। बाकी कम से कम 10 साल जेल की सज़ा तो होगी ही, जो उम्रकैद तक बढ़ सकती है और जुर्माना भी लग सकता है. बच्चों के पॉर्नॉग्राफिक मटीरियल रखने पर तीन साल तक की जेल और जुर्माना हो सकता है। अप्रैल 2018 में  केंद्र सरकार ने पॉक्सो में एक अहम बदलाव किया। जिसके तहत प्रावधान रखा गया कि 12 साल से कम उम्र की बच्चियों से बलात्कार करने पर मौत की सज़ा दी जाएगी अर्थात् इस ऐक्ट की कुछ धाराओं में दोषी पाए जाने पर मौत की सजा तक का प्रावधान कर दिया गया है। इस ऐक्ट में कहा गया है कि अगर कोई आदमी चाइल्ड पोर्नोग्राफी को बढ़ावा देता है, तो उसके खिलाफ भी पॉक्सो ऐक्ट के तहत कड़ी सजा का प्रावधान किया गया है। इस ऐक्ट की धारा 4, धारा 5, धारा 6, धारा 9, धारा 14, धारा 15 और धारा 42 में संशोधन किया गया है। धारा 4, धारा 5 और धारा 6 में संशोधन के बाद अब अपराधी को इस ऐक्ट के तहत मौत की सजा दी जा सकती है।

बच्चों को नृशंस अपराधों से बचाने के लिए तथा उन्हें न्याय दिलाने के लिए सभी को यह जानकारी होनी चाहिए कि पाक्सो एक्ट क्या है और उसके तहत कौन से प्रावधान हैं क्योंकि कानून की जानकारी अपराध का विरोध करने की शक्ति देती है।   
-------------------------
(छतरपुर, म.प्र. से प्रकाशित "दैनिक बुंदेली मंच", 13.01.2020)

#दैनिकबुंदेलीमंच #कॉलम #शून्यकाल #शरदसिंह #ColumnShoonyakaal #Shoonyakaal #Column #SharadSingh #DainikBundeliManch

Saturday, January 11, 2020

शून्यकाल ...बुंदेली को जरूरत है एक सशक्त राजनीतिक आवाज़ की - डॉ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
मेरा कॉलम "शून्यकाल"... "दैनिक बुंदेली मंच" में... Please आप भी पढ़िए इसे🌿  (11.01.2020)


शून्यकाल ...

बुंदेली को जरूरत है एक सशक्त राजनीतिक आवाज़ की
 - डॉ. शरद सिंह
       भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची भारत की भाषाओं से संबंधित है। इस अनुसूची में 22 भारतीय भाषाओं को शामिल किया गया है. इनमें से 14 भाषाओं को संविधान में शामिल किया गया था। सन 1967 ई. में, सिन्धी भाषा को अनुसूची में जोड़ा गया। इसके बाद, कोंकणी भाषा, मणिपुरी भाषा, और नेपाली भाषा को 1992 ई. में जोड़ा गया। हाल में 2003 में बोड़ो भाषा, डोगरी भाषा, मैथिली भाषा, और संथाली भाषा शामिल किए गए। भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में 38 अन्य भाषाओं को शामिल करने की मांग है जिनमें बुंदेली भी एक है। भाषा का दर्जा दिए जाने के का एक आधार यह भी निर्धारित किया गया है कि जिस बोली का अपना स्वतंत्र व्याकरण हो उसके भाषाई दर्जे के अधिकार पर गौर किया जा सकता है। इस दृष्टि से बुंदेली का अपना विशेष व्याकरण है और अपनी अलग शब्दावली है जो इसे स्वतंत्र पहचान देती है।  
बुंदेली को भाषा के रूप में आठवीं अनुसूची में शामिल किए जाने के लिए समय-समय पर मांग उठती रही है। यद्यपि कोई बड़ा प्रभावी आंदोलन नहीं छेड़ा गया। भोपाल के ही आंचलिक क्षेत्रों में, विदिशा, रायसेन, होशंगाबाद, सीहोर, राजगढ़ आदि जिलों में अथवा जबलपुर, ग्वालियर संभाग के जिलों में बोलीगत परिवर्तन के साथ बुंदेली ही बोलते हैं। बुन्देली समृद्ध भाषा है और इसमें साहित्य और लोकसाहित्य का अपार भण्डार है। बुन्देली बुन्देलखण्ड क्षेत्र में बहुतायत में प्रयोग की जाती है। बुन्देलखण्ड के आधार पर ही इसका नाम ’बुन्देली’ पड़ा। इसे ’बुन्देलखण्डी’ भी कहा जाता है। बुन्देली बुन्देलखण्ड की संस्कृति और अस्मिता की पहचान है। एक अनुमानित गणना के अनुसार सागर, जबलपुर, ग्वलियर, भोपाल और झांसी संभाग के जिलों के बुन्देली बोलने वालों की कुल संख्या लगभग पांच करोड़ के आसपास है। बुंदेली भाषा अति प्राचीन है लेकिन उसे हिंदी साहित्य के इतिहास में वह स्थान नहीं मिल पाया जिसकी वह हकदार है। बुंदेलखंड के अनेक विद्वानों द्वारा इस दिशा में प्रयास किया गया। अनेक संस्थाओं ने प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति को पत्र लिखे किन्तु यह मांग जन आंदोलन का रूप नहीं ले सकी। संभवतः इसीलिए बुंदेली को भाषा का दर्जा दिलाने का प्रयास पिछड़ता रहा। यद्यपि बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय, झांसी और डॉ हरीसिंह केन्द्रीय विश्वविद्यालय, सागर में बुंदेली भाषा का स्नातक और स्नातकोत्तर स्तर पर अध्ययन-अध्यापन हो रहा है और इसमें शोध भी किए जा रहे हैं।
Shoonyakaal Column of  Dr Sharad Singh in Dainik Bundeli Manch, 11.01.2020
            बुंदेली को भाषा का सम्मान दिलाने की दिशा में पृथक बुंदेलखण्ड की मांग को भी जोड़ कर देखा जाता रहा है। पृथक बुंदेलखण्ड राज्य की मांग करने वालों का यह मानना है कि यदि बुंदेलखण्ड स्वतंत्र राज्य का दर्जा पा जाए तो विकास की गति तेज हो सकती है। यह आंदोलन राख में दबी चिंनगारी के समान यदाकदा सुलगने लगता है। बुंदेलखंड राज्य की लड़ाई तेज करने के इरादे से 17 सितंबर 1989 को शंकर लाल मेहरोत्रा के नेतृत्व में बुंदेलखंड मुक्ति मोर्चा का गठन किया गया था। आंदोलन सर्व प्रथम चर्चा में तब आया जब मोर्चा के आह्वान पर कार्यकर्ताओं ने पूरे बुंदेलखंड में टीवी प्रसारण बंद करने का आंदोलन किया। यह आंदोलन काफी सफल हुआ था। इस आंदोलन में पूरे बुंदेलखंड में मोर्चा कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारियां हुईं। आंदोलन ने गति पकड़ी और मोर्चा कार्यकर्ताओं ने वर्ष 1994 में मध्यप्रदेश विधानसभा में पृथक राज्य मांग के समर्थन में पर्चे फेंके। कार्यकर्ताओं का उत्साह बढ़ा और वर्ष 1995 में उन्होंने शंकर लाल मेहरोत्रा के नेतृत्व में संसद भवन में पर्चे फेंक कर नारेबाजी की। तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव के निर्देश पर स्व. मेहरोत्रा व हरिमोहन विश्वकर्मा सहित नौ लोगों को रात भर संसद भवन में कैद करके रखा गया। विपक्ष के नेता अटल विहारी वाजपेई ने मोर्चा कार्यकर्ताओं को मुक्त कराया। वर्ष 1995 में संसद का घेराव करने के बाद हजारों लोगों ने जंतर मंतर पर क्रमिक अनशन शुरू किया, जिसे उमा भारती के आश्वासन के बाद समाप्त किया गया। वर्ष 1998 में वह दौर आया जब बुंदेलखंडी पृथक राज्य आंदोलन के लिए सड़कों पर उतर आए। आंदोलन उग्र हो चुका था। बुंदेलखंड के सभी जिलों में धरना-प्रदर्शन, चक्का जाम, रेल रोको आंदोलन आदि चल रहे थे। इसी बीच कुछ उपद्रवी तत्वों ने बरुआसागर के निकट 30 जून 1998 को बस में आग लगा दी थी, जिसमें जन हानि हुई थी। इस घटना ने बुंदेलखंड राज्य आंदोलन को ग्रहण लगा दिया था। मोर्चा प्रमुख शंकर लाल मेहरोत्रा सहित नौ लोगों को रासुका के तहत गिरफ्तार किया गया। जेल में रहने के कारण उनका स्वास्थ्य काफी गिर गया और बीमारी के कारण वर्ष 2001 में उनका निधन हो गया।  पृथक्करण की मांग ले कर राजा बुंदेला भी सामने आए। आज भी पृथक बुंदेलखण्ड की मांग सुगबुगाती रहती है। यह सच है कि पृथक बुंदेलखण्ड और बुंदेली को भाषाई दर्जे की बात एकरूप हो कर कभी नहीं उठी।
सन् 2017 में ओरछा में बुंदेलखण्ड साहित्य एवं संस्कृति परिषद, भोपाल के तत्वाधान में बुंदेली भाषा का दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया गया था। जिसमें मधुकर शाह, काशी हिंदू वि.वि. के प्रो. कमलेश कुमार जैन, बुंदेलखण्ड वि.वि. के कुलपति प्रो. सुरेन्द्र दुबे, जर्मनी के होमवर्ग वि.वि. की प्रो. तात्याना, बुंदेलखण्ड साहित्य एवं संस्कृति परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री कैलाश मड़वैया ने बुंदेली को भाषा का स्थान दिलाने के पक्ष में अपने विचार प्रकट किए थे। बुंदेली भाषा को पाठ्यक्रम में जोड़ने की आवश्यकता पर बल दिया गया था जिस पर बुंदेलखण्ड यूनीवर्सिटी द्वारा इस दिशा में सार्थक कदम उठाने का निश्चय प्रकट किया गया था। कैलाश मड़्वैया ने बुंदेली भाषा के शब्दों के संग्रह एवं मानकीकरण पर प्रस्तावना रखी थी। इस विषय पर गहन चर्चा हुई थी कि क्या बुंदेली भाषा शिक्षा का माध्यम बन सकती है? यह बात होम्वर्ग यूनीवर्सिटी, जर्मनी की प्रोफेसर तात्याना रखी थी। ओरछा के राष्ट्रीय सम्मेलन की भांति अलग-अलग मंचों से अनेक बार सम्मेलनों और सेमिनारों के जरिए बुंदेली को भाषाई दर्जा दिलाए जाने की आवाज़ उठाई गई। दुर्भाग्यवश एक सशक्त राजनीतिक आवाज़ की कमी ने बुंदेली के संघर्ष को बार-बार हाशिए पर धकेल दिया। यही गनीमत है कि छोटी-छोटी इकाइयों के रूप में संर्घष जारी है।  
------------------------------
(छतरपुर, म.प्र. से प्रकाशित "दैनिक बुंदेली मंच", 11.01.2020)

#दैनिकबुंदेलीमंच #कॉलम #शून्यकाल #शरदसिंह #ColumnShoonyakaal #Shoonyakaal #Column #SharadSingh #DainikBundeliManch

Wednesday, January 8, 2020

चर्चा प्लस ... अभी और कितना पतन शेष है भारतीय राजनीति का - डाॅ. शरद सिंह

Dr ( Miss) Sharad Singh


चर्चा प्लस ...            
 
 अभी और कितना पतन शेष है भारतीय राजनीति का                                                 
   - डाॅ. शरद सिंह  

छात्रों को मोहरा बना कर अपनी राजनीतिक चालें चलने वाले और अपशब्दों की सीमाओं पर सीमाएं लांघते कथित राजनीतिज्ञों ने भारतीय राजनीति के चेहरे को इस कदर बिगाड़ रखा है कि धीरे-धीरे इसे पहचानना भी मुश्क़िल हो चला है। सविनय अवज्ञा और अहिंसा के बल पर स्वतंत्रता प्राप्त करने वाला देश आज बात-बात पर हिंसा की चपेट में आ रहा है। यह माहौल शांति के पुजारी देश भारत का तो नहीं लगता। किन्तु दुर्भाग्य से यही माहौल है आज देश में। हठधर्मिता और अपशब्द लोकतंत्र के सम्मान को निरंतर ठेस पहुंचा रहे हैं। आखिर यह कौन-सा चेहरा है राजनीति का? इस प्रश्न के उत्तर में ही मौजूद है यह प्रश्न भी कि भारतीय राजनीति का अभी और कितना पतन शेष है?

          किसी भी विचार के विरोध का तरीका यदि हिंसा और मार-पीट का हो तो उसे भारतीय लोकतंत्र के अनुरुप नहीं माना जा सकता है। इन तरीकों के अपनाए जाने में अनेक निर्दोष भी हिंसा के शिकार हो जाते हैं। यूं भी हिंसा किसी समस्या का समाधान कभी हो ही नहीं सकती है। वैचारिक विरोध करने का अधिकार सभी को है किन्तु हिंसा का अधिकार किसी को नहीं होता है। इससे भी बड़े दोषी वे लोग हैं जो हिंसा की लपटों में अपनी-अपनी रजनीतिक रोटियां सेंकने में व्यस्त हैं। 05 जनवरी की शाम को जेएनयू में नकाबपोश हथियारबंद लोगों ने छात्रों और शिक्षकों पर लाठी-डंडे और हथियारों से हमला किया, जिसमें करीब 34 छात्र और अध्यापक घायल हो गए। देश भर के छात्र इस घटना से सकते में आ गए और जेएनयू के घायल छात्रों के समर्थन में अपने-अपने घरों से निकल पड़े। जेएनयू में हिंसा के बाद देशभर में प्रदर्शन होने लगे। 06 जनवरी की शाम को यूथ कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने इंडिया गेट पर मशाल रैली निकाली। वहीं, मुंबई स्थित गेटवे ऑफ इंडिया पर छात्रों ने प्रदर्शन किया। तमिलनाडु में छात्रों ने कैंडल मार्च निकाला। इससे पहले दिल्ली पुलिस ने स्वतः संज्ञान लेते हुए अज्ञात आरोपियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की। सुरक्षा के मद्देनजर जेएनयू में 700 पुलिसकर्मी तैनात किए गए क्योंकि उत्तरी गेट पर छात्र एकत्रित होकर विरोध जता रहे थे। वहीं, कोलकाता में लेफ्ट और भाजपा समर्थक इसी मामले पर आमने-सामने हुए। 

Charcha Plus - Abhi Aur Kitna Patan Shesh Hai Bhartiya Rajniti Ka  -  Charcha Plus Column by Dr Sharad Singh, 08.01.2020
      दरअसल, जेएनयू में फीस बढ़ोतरी के खिलाफ प्रदर्शन के दौरान रविवार रात हिंसा हुई थी। नकाबपोशों ने छात्र-शिक्षकों को डंडे और लोहे की रॉड से बुरी तरह पीटा। वे ढाई घंटे तक कैंपस में कोहराम मचाते रहे। हमले में छात्र संघ अध्यक्ष आइशी घोष समेत कई घायल हो गए। आइशी ने एबीवीपी पर हमले का आरोप लगाया और कहा कि नकाबपोश गुंडों ने मुझे बुरी तरह पीटा। करीब 35 लोग जख्मी हो गए। जिनमें से 23 घायलों को इलाज के बाद एम्स से छुट्टी दे दी गई।
     इसके पूर्व 15 दिसंबर को जामिया यूनिवर्सिटी के छात्रों ने नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन का आयोजन किया था। प्रदर्शकारियों की रैली जब न्यू फ्रेंड्स कॉलोनी पहुंची तो पुलिस ने उन्हें आगे बढ़ने से रोकने की कोशिश की। इसी दौरान प्रदर्शनकारियों की भीड़ ने उग्र रूप धारण कर लिया. पुलिस ने भीड़ को नियंत्रित करने के लिए लाठी चार्ज किया और आंसू गैस के गोले दागे. प्रदर्शनकारियों उस वक्त वहां से हट गए और वापस लौट गए। इसके बाद पुलिस ने कथित रूप से लायब्रेरी में घुस कर छात्र-छात्राओं को डंडों से पीटा था। जिसके विरोध में देश भर कर के छात्रों ने अपनी तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की थी। देश के अनेक बुद्धिजीवी और कलाजगत के नामचीन व्यक्तित्व भी मैदान में उतर आए थे।
       अभी जामिया यूनिवर्सिटी के जख़्म भरे भी नहीं थे कि जेएनयू में जिस तरह से मार-पीट हुई उसने छात्रों की सुरक्षा व्यवस्था की धज्जियां उड़ा दीं। घटना को ले कर आरोप-प्रत्यारोप का स्तरहीन दौर चल ही रहा था कि एक चौंंकाने वाले बयान ने एक बार फिर सोचने पर मजबूर कर दिया कि कहीं छात्र राजनीतिज्ञों की लालसा के शिकार तो नहीं बनाए जा रहे हैं? 06 जनवरी को देर रात हिंदू रक्षा दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष भूपेंद्र तोमर उर्फ पिंकी चैधरी ने सोमवार देर रात वीडियो वायरल कर जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू), दिल्ली में हुए विद्यार्थियों व शिक्षकों पर हमले की जिम्मेदारी ले ली। एक मिनट 58 सेकंड के इस वीडियो में वह कहते नजर आए कि देश विरोधी गतिविधियां हिंदू रक्षा दल बर्दाश्त नहीं करेगा। देश विरोधी गतिविधियां करने वालों को ऐसा ही जवाब दिया जाएगा, जैसे रविवार शाम को दिया है। जेएनयू में छात्रों व शिक्षकों की पिटाई करने वाले उनके कार्यकर्ता थे। धर्म के खिलाफ जो भी बोलेगा, हम उसे बर्दाश्त नहीं करेंगे। उन्होंने जेएनयू को कम्यूनिस्टों का अड्डा बताते हुए कहा कि यहां देश विरोधी गतिविधियां हो रही हैं। हम ऐसे अड्डे बर्दाश्त नहीं करेंगे। पहले से ही हम लोग अपने धर्म के लिए प्राणों को न्योछावर करने लिए तैयार रहते हैं। अगर आगे भी किसी ने ऐसी देश विरोधी गतिविधियां करने की कोशिश की, तो इसी तरह से जवाब देंगे। बता दें कि पिंकी चैधरी दिल्ली में आम आदमी पार्टी के कार्यालय पर हमले के आरोप व अन्य मामलों में जेल जा चुके हैं। वीडियो जारी करने के अलावा उन्होंने पत्रकारों से व्यक्तिगत रूप से मिलकर भी हमले की जिम्मेदारी ली।
        रहा सवाल राजनीति के गिरते स्तर का तो अब नौबत यहां तक आ पहुंची है कि कथित राजनीतिज्ञ परस्पर एक-दूसरे पर नपुंसक, समलैंगिक जैसे ओछे आरोप लगाने में भी नहीं हिचक रहे हैं। भाजपा महासचिव कैलाश विजयवर्गीय ने मीडिया से चर्चा करते हुए प्रशासन की कार्रवाई पर निशाना साधा था। उन्होंने कहा थाकि, ‘‘प्रशासनिक कार्रवाई को यदि राजनीतिक रूप दिया गया तो भाजपा सड़क पर उतरकर आंदोलन करेगी। कई कार्रवाई में भाजपा के पदाधिकारी एवं कार्यकर्ताओं को टारगेट किया जा रहा है। इसकी शुुरुआत हनीट्रैप से हुई है। विजयवर्गीय ने कहा कि, मैंने कभी कमर के नीचे की राजनीति नहीं की। ना कभी भविष्य में करने की सोचता हूं। यदि मजबूरी में करना पड़ी तो वह भी करके बताऊंगा। इसलिए अधिकारी किसी भ्रम में ना रहें। हमने भी सरकार चलाई है। केंद्र में चला रहे हैं। मैं कमर के नीचे वार नहीं करता। मैंने संकल्प ले रखा है कि कमर के नीचे की राजनीति नहीं करता। वह संकल्प कभी टूट भी सकता है।’’
         जिस राजनीति में ‘‘कमर से नीचे की राजनीति’’ के जुमले भी सुर्खियां बनने लगे हैं, क्या उसे सभ्य समाज की सभ्य राजनीति कहा जा सकता है? इसी दौरान एक और अभद्र नमूना सामने आया। पहले कांग्रेस सेवादल की किताब में नाथूराम गोडसे और सावरकर के बीच समलैंगिक संबंध का दावा किया गया जिसके प्रतिरोध में अखिल भारतीय हिंदू महासभा के अध्यक्ष स्वामी चक्रपाणि ने कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी के बारे में विवादित टिप्पणी की है कि सुना है वे समलैंगिक हैं। समलैंगिकता अपराध नहीं है किन्तु उसे जिस प्रकार राजनीति में घसीटा गया उससे राजनीति के स्तर को गहरी चोट पहुंची। बहरहाल, हिंसा और अपशब्दों का यह दौर अब थमना चाहिए वरना कहीं ऐसा न हो कि भारतीय राजनीति का चेहरा पूरी तरह विकृत हो जाए।
                     -------------------------