Thursday, May 19, 2022
बतकाव बिन्ना की | काए के अव्वल ? ठेंगा सें ! | डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम | साप्ताहिक प्रवीण प्रभात
Wednesday, May 18, 2022
चर्चा प्लस | क्या रूफ हार्वेस्टिंग से ज़्यादा ज़रूरी हैं रूफ-पूल? | डॉ. (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर
चर्चा प्लस
क्या रूफ हार्वेस्टिंग से ज़्यादा ज़रूरी हैं रूफ-पूल?
- डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
आमतौर पर आम आदमी को सलाह दी जाती है कि लंबे समय तक नल को खुला न छोड़ें, ध्यान से पानी खर्च करें, पानी बचाएं आदि-आदि। लेकिन उन लोगों के बारे में कुछ क्यों नहीं कहते जो बड़े निजी लॉन की सिंचाई करते हैं या निजी होम पूल बनाते हैं? क्या उन्हें भी पानी बचाने की सलाह नहीं दी जानी चाहिए? छत के रूफ हार्वेस्टिंग के बजाय रूफ टॉप निजी पूलों का तेजी से चलन बढ़ रहा है। यदि पानी बचाने में भी अमीर-ग़रीब का भेद किया जाता रहा तो ‘पानी बचाओ अभियान’ कैसे सफल होगा?
एक आर्किटेक्ट समूह के प्रबंध निदेशक पीयूष प्रकाश कहते हैं कि ‘‘आप एक मेट्रो में 250 वर्गमीटर के छोटे घर में रह रहे हों। तो भी आप अपना नहाने का पूल बनवा सकते हैं। एक सामान्य आकार के पूल के लिए एक निजी पूल की लागत 4-8 लाख रुपये के बीच आती है। उनके समूह ने पिछले कुछ वर्षों में भारत में 100 से अधिक निजी पूल बनाए हैं।’’ पीयूष प्रकाश के एक सहयोगी, अमित बहल आगे कहते हैं कि ‘‘उपयोग में आसान गैजेट्स आ जाने के कारण निजी पूल का निर्माण, रखरखाव और स्वच्छता के बारे में परेशान होने की आवश्यकता अब नहीं रही।’’
बात सुनने में लुभावनी लगती है लेकिन एक छोटा पूल क्या है? जबकि पूल के आकार और आयाम अलग-अलग होते हैं। जो लगभग 10 फीट गुना 10 फीट या उससे छोटा होता है, उसे आमतौर पर एक छोटा पूल माना जाता है। गहराई के मामले में, तीन फीट भिगोने और तैरने के लिए मानक है, और चार से पांच फीट और उससे अधिक छोटे पूल के लिए सबसे अच्छी गहराई है। 10 गुना 10 गुना 2.5 फीट माप वाले सबसे छोटे पूल में 1,052 गैलन पानी की क्षमता होती है। याद रखना चाहिए कि 1 लीटर 0.264 गैलन के बराबर होता है। छोटे पूल के 1,052 गैलन पानी का अर्थ है 4782.487 लीटर पानी। जो तैरने, नहाने के काम के बाद बहा दिया जाता है।
5 फीट की औसत गहराई वाले 12 बाई 24 फुट आयताकार पूल में लगभग 10,800 गैलन पानी भरा जाता है। समान गहराई वाले 16 बाई 32 फुट वाले पूल में लगभग 19,200 गैलन पानी लगता है और 20 बाय 40 फुट पूल में 30,000 गैलन पानी की ज़रूरत पड़ती है। भूतल पर जगह की कमी के कारण इन दिनों छत या छत पर पूल बनाने का चलन बढ़ गया है। भारत में केवल रूफटॉप स्विमिंग पूल की कीमत 900 से 1300 रुपये प्रति वर्ग फीट है जबकि 10 फीट व्यास गुना 30 इंच गहरी छत या टैरेस पूल में 3639 लीटर पानी होता है। वहीं, भारत में घरेलू जल उपयोग के लिए मानक मानदंड 135 लीटर प्रति व्यक्ति प्रति दिन (एलपीसीडी) है, जिसे केंद्रीय सार्वजनिक स्वास्थ्य और पर्यावरण इंजीनियरिंग संगठन द्वारा निर्धारित किया गया है। तो, सवाल यह है कि 4 लोगों के परिवार को कितना पानी इस्तेमाल करना चाहिए? आमतौर पर 4 लोगों का एक परिवार नहाने, खाना पकाने, धोने, मनोरंजन और पानी के लिए 12,000 गैलन का उपयोग करता है।
इंटरनेशनल ग्राउंड वाटर रिसोर्स असेसमेंट सेंटर की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, पूरी दुनिया में 270 करोड़ लोग ऐसे हैं, जो पूरे साल में 30 दिनों तक पानी के संकट का सामना करते हैं। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार यदि अगले तीन दशकों में पानी की खपत एक प्रतिशत की दर से बढ़ती है, तो दुनिया को एक बड़े जल संकट से गुजरना होगा। भारत में भी पिछले दो-तीन दशकों से भूजल स्तर तेजी से बिगड़ रहा है। 2001 के आंकड़ों पर नजर डालें तो आज की तस्वीर काफी गंभीर है। भारत में प्रति व्यक्ति भूजल उपलब्धता 5,120 लीटर तक पहुंच गई है। 1951 में यह उपलब्धता 14,180 लीटर थी। अब यह 1951 की उपलब्धता का केवल 35 प्रतिशत है। 1991 में यह आधी हो गई थी। अनुमान के मुताबिक, वर्ष 1951 की तुलना में 2025 तक प्रति व्यक्ति प्रति दिन भूजल का केवल 25 प्रतिशत ही बचेगा। केंद्रीय भूजल बोर्ड (सीजीडब्ल्यूबी) के आंकड़ों के अनुसार, यह उपलब्धता वर्ष तक घटकर केवल 22 प्रतिशत रह जाएगी। 2050. एक महत्वपूर्ण तथ्य के अनुसार मनुष्य प्रतिदिन औसतन 321 बिलियन गैलन पानी का उपयोग करता है। इसमें अकेले धरती के भीतर से 77 अरब गैलन पानी निकाला जाता है। आंकड़े बताते हैं कि दुनिया के 1.6 अरब लोगों को शुद्ध पेयजल नहीं मिल रहा है।
एक रिपोर्ट के अनुसार, पृथ्वी पर केवल 0.5 प्रतिशत पानी ही उपयोग योग्य और उपलब्ध ताजा पानी है। संयुक्त राष्ट्र मौसम विज्ञान एजेंसी के महासचिव का कहना है, ‘‘जिस गति से पृथ्वी का तापमान बढ़ रहा है, उससे पानी की उपलब्धता भी बदल रही है। गांवों में पीने के पानी की समस्या भी कम विकट नहीं है. वहां की 90 प्रतिशत आबादी पीने के पानी के लिए भूजल पर निर्भर है। हालांकि, कृषि क्षेत्र के लिए भूजल के बढ़ते दोहन के कारण, कई गांव पीने के पानी की समस्या का सामना कर रहे हैं।’’ वैज्ञानिक चिंतित हैं कि दुनिया के अधिकांश क्षेत्रों में पानी की गुणवत्ता में गिरावट आ रही है, और प्रजातियां मीठे पानी के जीवों की विविधता और पारिस्थितिकी को तेजी से नुकसान हो रहा है। समुद्री पारिस्थितिकी की तुलना में भी यह क्षरण अधिक है।
यह ठीक है कि अगर आपके पास पैसा है तो आप इसे अपनी विलासिता पर खर्च कर सकते हैं लेकिन इस शर्त पर नहीं कि यह दूसरों के लिए असुविधा का कारण बने। पूल में स्नान करने की हर किसी की इच्छा होती है और सार्वजनिक पूल में जाकर यह इच्छा पूरी की जा सकती है। सार्वजनिक पूल का विस्तार करना बेहतर है। इससे उतने पानी की खपत नहीं होगी, जितना कि एक पूल वाले हर हजारवें घर में होगी। यदि हम अपने अतीत में देखें, तो सिंधु घाटी में सार्वजनिक तालाबों के अवशेष मिले हैं, जिससे पता चलता है कि सिंधु सभ्यता में सार्वजनिक स्नानघरों (पूल) का प्रचलन था। जबकि वे सभी शहर सिंधु नदी के तट पर स्थित थे और पानी की प्रचुर उपलब्धता थी। फिर भी वे पानी का सम्हल कर इस्तेमाल करते थे।
इनदिनों निजी पूल का बड़ा बाजार विकसित हो रहा है। लेकिन बाजार और बुनियादी जरूरतों के बीच संतुलन होना चाहिए। ऐसा लगता है जैसे हम अपनी बुनियादी कमियों को नजरअंदाज करने की आदत को अपनाते जा रहे हैं। पेड़ों की कमी है, फिर भी बचे हुए पेड़ों को काटा जा रहा है और भवनों का निर्माण किया जा रहा है। पार्किंग की कोई जगह नहीं है फिर भी सबसे बड़ी कार खरीदने में दिलचस्पी है। वायु प्रदूषण बढ़ रहा है लेकिन हम इस पर ध्यान नहीं देते हैं। इसी तरह, जिन्हें पीने का साफ पानी मिल रहा है, उनके पास पीने के पानी के प्रदूषण के बारे में सोचने का समय नहीं है।
अब जब हम जानते हैं कि जल संकट का विकट समय चल रहा है, तो हमें समझना होगा कि जल का कोई विकल्प नहीं है। प्रश्न है कि रूफ वाटर हार्वेस्टिंग क्या है? संक्षेप में कहा जाए तो इस तकनीक में मकान की छत की ढाल के अनुसार बरसाती पानी के आउटलेट से जल स्रोत तक पीवीसी पाइप लगाए जाते हैं। स्रोत के समीप इसी पाइप लाइन में फिल्टर लगाया जाता है। बस यही है रूफ वाटर हार्वेस्टिंग और इस तरह आकाश का पानी पाताल की गहराई में पहुंचता है। इससे भूमि में जल का स्तर बना रहता है। रूफ वाटर हार्वेस्टिंग के अंतर्गत बारिश के पानी को संचित कर, उसे फिल्टर कर पीने तथा अन्य उपयोग में भी लाया जा सकता है। इससे भू-स्रोतों में उपलब्ध पानी पर उपयोग का दबाव कम हो जाता है और भूमि में जल संतुलन बना रहता है।
मानव अस्तित्व जल पर निर्भर है। जल ही सृष्टि का मूल आधार है। जल ही भोजन है, जल है, वनस्पति है अर्थात् जल का कोई विकल्प नहीं है। जल संरक्षण ही पर्यावरण की रक्षा का उपाय है। जल का पुनर्भरण करना ही जल का उत्पादन करना है। हमें यह समझना होगा कि पानी के लिए इंसान की जरूरत किसी भी अन्य जरूरत से ज्यादा महत्वपूर्ण है। कुल मिलाकर यह समझना होगा कि पानी है तो कल है। हमें निजी पूल की विलासिता के बदले रूफ हार्वेस्टिंग को चुनना होगा।
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(18.05.2022)
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Tuesday, May 17, 2022
पुस्तक समीक्षा | ख़ैरियत है हुज़ूर : एक अछूते विषय पर एक अनूठा उपन्यास’’ | समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
Sunday, May 15, 2022
Article | Who will buy the insurance policy for earth? | Dr (Ms) Sharad Singh | Central Chronicle
संस्मरण | नीले, हरे रंग और रंगरेजन बड़ी बी | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नवभारत
नवभारत मेंं 15.05.2022 को प्रकाशित
हार्दिक आभार #नवभारत 🙏
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संस्मरण
नीले, हरे रंग और रंगरेजन बड़ी बी
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
हमसे न पूछो रंगरेजवा से पूछो
जिसने गुलाबी रंग दिना, दुपट्टा मेरा...
- ये है फिल्म "पाक़ीज़ा" के गाने की मशहूर पंक्तियां जिसमें रंगरेज का जिक्र आया है। फारसी शब्द "रंगरेज" भी उन दिनों एक मुहावरे की तरह चलता था। जब मैं छोटी थी तो मुझे याद है कि मेरे बचपन के शहर पन्ना में एक ही रंगरेज परिवार था। दिलचस्प है कि तब मुझे मालूम भी नहीं था कि वे रंगरेज हैं। यद्यपि मैंने उन्हें कपड़ा रंगते देखा था। मिट्टी की बड़ी-बड़ी नांद में गहरा हरा, नीला, काला और लाल रंग का पानी भरा हुआ होता था।
उस रंगरेज परिवार में मुझे सिर्फ एक सदस्य का नाम याद है। वह नाम था "बड़ी बी"। वस्तुतः यह उनका नाम भी नहीं, मात्र एक संबोधन था। वे परिवार की मुखिया थीं, इसलिए उन्हें बड़ी बी कहा जाता था। हमारे घर के कपड़े भी उन्हीं के यहां रंगने को दिए जाते थे। विशेष रुप से मां की वह साड़ियां जो पर्दे के रूप में उपयोग में लाए जाने के लिए रंगाई जाती थीं। वर्षों तक हमारे घर में रेडीमेड पर्दों के बजाय साड़ी के पर्दे ही काम में लाए जाते रहे और वे सभी नीले रंग के होते थे। एक बार मैंने मां से पूछा था कि हम लोग नीले रंग से ही परदे क्यों रंगवाते हैं? तब उन्होंने कहा था कि नीले रंग के पर्दे अच्छे लगते हैं। दरअसल, बड़ी बी के यहां नीले के अलावा हरा, काला और लाल रंग का काम होता था और मां को नीला रंग पसंद था।
पन्ना शहर में छोटे बाज़ार से बड़े बाज़ार तक जाने वाले मार्ग के बीच में जैन मंदिर से कुछ आगे और जड़िया परिवार के घर से पहले रंगरेजों का घर था। घर के बाहर मोटे पत्थर की फर्शियों पर वे कपड़ा रंगने का काम करते थे। आमतौर पर नंगे हाथों से ही वे रंगाई का काम करते थे जिसके कारण उनके हाथ लाल, नीले, हरे, काले दिखाई देते थे। यह पक्के रंग उनके हाथों से कैसे छूटते थे यह मुझे पता नहीं। बड़ी बी वही फर्शी पर चौकी डालकर बैठी रहती थीं। वे इस बात का ध्यान रखती थीं कि कोई काम में कोताही न करने पाए। सभी काम ठीक-ठाक हो। यदि उन्हें कहीं कोई लापरवाही करता दिखाई दे जाता तो वे उसे बुरी तरह झिड़कतीं। वहीं ग्राहकों के साथ उनका व्यवहार बहुत ही नर्म रहता था। मैं भी जब मां के साथ बड़ी बी के पास जाती थी तो बड़ी बी मां को देखकर उनके सम्मान में चौकी से उठ खड़ी होती थीं। फिर मुझे और मां को भी बैठने के लिए चौकियां देती थीं। हम दोनों के बैठने के बाद वे स्वयं बैठती थीं।
एक बार मेरी तबीयत खराब हो गई थी मुझे टाइफाइड हो गया था लगभग 2 माह मैं दवाएं खाती हुई बिस्तर पर रही। उस दौरान एक अजीब-सा फितूर मेरे दिमाग में घुस गया था। मैंने मां से जिद की कम से कम ड्राइंग रूम और उसके पीछे वाले कमरे के बीच जो दरवाजा है उस दरवाजे के पर्दे कोकाकोला कलर में रंगवा दीजिए। बड़ी अजीब-सी मांग थी मेरी, जिसका कोई औचित्य नहीं था। घर में नीले रंग के परदे पहले से ही लगे हुए थे। वे पर्दे तभी बदले जाते जब मां की कुछ और पुरानी साड़ियां निकलतीं। उस दौरान मां की कोई ऐसी साड़ी नहीं थी जिससे वे पहनना छोड़ने वाली हों। लेकिन मेरी बीमारी को ध्यान में रखते हुए उन्होंने बिना सोचे विचारे अपनी एक साड़ी जो गुलाबी रंग की थी, बहुत ही सुंदर, उन पर जंचती भी थी, उसे कोकाकोला रंग में रंगवाने के लिए दे दिया था। जब वह साड़ी रंग कर आई और मां ने उसे सिलकर पर्दे का रूप दे दिया, तब मैंने मां से पूछा था कि आपने पहले कभी नहीं बताया कि बड़ी बी के यहां कोकाकोला कलर में भी कपड़े रंगे जाते हैं। तब उन्होंने बताया था, "बड़ी बी के यहां कोकाकोला कलर में कपड़े कभी नहीं रंगे जाते हैं। यह तो उन्होंने तुम्हारी विशेष फरमाइश को ध्यान में रखकर लाल रंग और काले रंग को मिलाकर कोकाकोला कलर बनाया है।" यह सुनकर मुझे बहुत मजा आया। लेकिन अब सोचती हूं तो मुझे लगता है कि मैंने दोनों पर ज्यादती की थी, मां पर भी और बड़ी बी पर भी। मां को अपनी एक साड़ी कुर्बान करनी पड़ी, वह भी मेरी जिद के कारण। बड़ी बी को मेरी ज़िद को ध्यान में रखते हुए अलग से सिर्फ एक साड़ी के लिए रंग बनाना पड़ा, जोकि निश्चित रूप से एक ज्यादती ही थी ।
जब मैं बहुत छोटी थी तो मुझे इस बात का एहसास नहीं था कि वह रंगरेज परिवार जिसकी मुखिया बड़ी बी हैं किस जाति, धर्म का है? क्योंकि मेरा उस मामले से कोई सरोकार नहीं था। थोड़ी बड़ी होने पर मुझे पता चला कि वह रंगरेज परिवार मुस्लिम है। कॉलेज पहुंचते-पहुंचते मेरी जिज्ञासा और अधिक बढ़ गई। यद्यपि तब तक उनका काम सिमटने लगा था और उनका नाम भी। अब वह रंगरेज के बजाए "कपड़ा डाई करने वाले" कहलाने लगे थे।
समय के साथ हमने जिन मुहावरे जैसे शब्दों को खोया उनमें से एक "रंगरेज" भी है। नई पीढ़ी "टाई डाई वालों" या "डाईर" को तो जानती है लेकिन रंगरेज को नहीं जानती है। अब कपड़ा रंगने की वह पद्धति भी यदाकदा ही देखने को मिलती है। सादे गर्म पानी, सादे ठंडे पानी और पानी में घुले हुए रंगो से भरी हुई नांदें जिनके पास खड़े होने से भाप का एहसास होता था, बिल्कुल उस अपनत्व की उष्मा की तरह जो बड़ी बी लुटाती थीं। मुझे नहीं पता कि आप में से कितने लोगों ने उस पुरानी पद्धति वाले पुराने रंगरेजों को देखा है, लेकिन मैंने देखा था, पन्ना में उस रंगरेज परिवार को बसे हुए और अपना काम करते हुए।
मुझे पिछले कुछ वर्षों में दो बार बड़ी बी की शिद्दत से याद आई। एक तो तब जब मैं एक कहानी लिख रही थी जिसका मैंने नाम रखा था " मन न रंगाए रंगाए जोगी कपड़ा।" कबीर की पंक्तियों पर । दूसरे तब मुझे बड़ी बी बहुत याद आती है जब पिछले दिनों मेरी एक परिचित ने पश्चिम बंगाल से अपने स्वयं के हैंडलूम वर्कशॉप से एक साड़ी बुनवाकर मेरे लिए बतौर उपहार भेजी। उस सूती साड़ी का रंग फीका न पड़े इसके लिए क्या उपाय किया जाए यह मैंने सागर में ही निवासरत अपनी एक युवा परिचित श्रीमती स्वाति हल्वे से पूछा तब उन्होंने डाई कलर फिक्सर के बारे में मुझे बताया जोकि कारगर साबित हुआ। उस दौरान मुझे बड़ी बी की बहुत याद आई। शायद उनके यहां भी इसी तरह का कोई कलर फिक्सर काम में लाया जाता रहा होगा। उस रंगरेज परिवार ने पन्ना के अनेक परिवारों के कपड़े रंगे होंगे। पर अपनी विशेषताओं से उन्होंने तो मेरा मन ही अपने रंग में रंग दिया।
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Friday, May 13, 2022
बतकाव बिन्ना की | जो कोनऊ प्रेम-व्रेम नोंई, पगलेटपना आए | डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम | साप्ताहिक प्रवीण प्रभात
Wednesday, May 11, 2022
चर्चा प्लस | पृथ्वी की छत में कोई छेद न होने दें | डॉ. (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर
चर्चा प्लस
पृथ्वी की छत में कोई छेद न होने दें !
- डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
पिछले कोरोना काल में बड़ी संख्या में हताहत हुए। जबकि, वैज्ञानिकों ने पाया कि दुनिया के अलग-अलग देशों में लॉकडाउन ने हानिकारक उत्सर्जन को कम किया, जिससे ओजोन परत में बढ़ते छिद्रों को कम करने में मदद मिली। लेकिन यह स्थायी समाधान नहीं था। दुनिया हमेशा के लिए लॉकडाउन नहीं रह सकती। अगर जंगलों को काटा गया, जलाया गया और फिर से जहरीले उत्सर्जन में वृद्धि हुई, तो फिर से ओजोन परत के लिए खतरा पैदा हो जाएगा। ये बातें आम आदमी को अनावश्यक लग सकती हैं, लेकिन ओजोन परत का संबंध इंसानों समेत हर जीव की सांस से है। इसलिए सभी को सोचना होगा।
प्रत्येक मनुष्य, प्रत्येक प्राणी को जीवित रहने के लिए श्वास की आवश्यकता होती है। हवा और पर्यावरण की पवित्रता ही स्वस्थ सांस दे सकती है। लेकिन हम इंसानों ने अपने हाथों से अपना घर जलाने और प्रदूषण फैलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। दिल्ली को ही लें तो हर साल सर्दियों में स्मॉग की वजह से वहां लोगों का दम घुटने लगता है. सांस की बीमारियां बढ़ती हैं और अब सांस लेने से तेजी से फैलने वाले कोरोना संक्रमण ने खतरा बढ़ा दिया है। मास्क के पीछे फंसी सांसें और उस पर साफ हवा की कमी स्वास्थ्य के लिए घातक परिणाम दे सकती है। लेकिन शुद्ध हवा, शुद्ध वातावरण कहां से आता है, जब हमने वातावरण को जहरीली गैसों का ‘‘डंपिंग स्टेशन’’ बना दिया है। यह सोचकर सुखद है कि इस कोरोना काल में दुनिया भर के देशों में किए गए लॉकडाउन ने पृथ्वी की छत यानी ओजोन परत की मरम्मत की है। कोरोना वायरस के प्रकोप के चलते दुनिया के ज्यादातर देशों को लॉकडाउन कर दिया गया है। उद्योगों का संचालन बंद था। सड़कों पर परिवहन सीमित हो गया। इससे वायु प्रदूषण अपने न्यूनतम स्तर पर पहुंच गया। नदियों का पानी साफ होने लगा, आसमान साफ और नीला नजर आने लगा। लॉकडाउन के दौरान बड़े पैमाने के उद्योग बंद होने से जहरीली गैसों के उत्सर्जन में भारी गिरावट आई, जिससे ओजोन परत के छिद्र सिकुड़ने लगे, सिकुड़ने लगे. लेकिन यह स्थायी समाधान नहीं है। कोरोना संक्रमण के बावजूद दुनिया अपनी पुरानी पटरी पर लौट आई है। यह आवश्यक भी है। उद्योग के बिना, अर्थव्यवस्था और विकास ढह जाएगा, और बेरोजगारी और भूख का प्रबंधन करना कठिन और कठिन हो जाएगा। कहने का तात्पर्य यह है कि जो हम अपनी नग्न आंखों से नहीं देखते हैं, वह हमारे जीवन के लिए भी महत्वपूर्ण है - ओजोन परत।
ओजोन परत में छेद का पता पहली बार वर्ष 1980 में लगाया गया था। जैसे-जैसे प्रदूषण बढ़ता गया, ओजोन छिद्र भी बढ़ता गया। जिससे सूरज की अल्ट्रावायलेट किरणें धरती पर पहुंचने लगीं, इससे त्वचा का कैंसर, मोतियाबिंद और प्रतिरक्षा प्रणाली को नुकसान के साथ-साथ पौधों को भी नुकसान पहुंचा। इससे बचने के लिए वर्ष 1987 में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल संधि की गई। ओजोन परत पृथ्वी के वायुमंडल की एक परत है। ओजोन परत सूर्य से आने वाली पराबैंगनी किरणों से हमारी रक्षा करती है। वायुमंडल में 91 प्रतिशत से अधिक ओजोन गैसें यहां मौजूद हैं, वहीं दूसरी ओर जमीनी स्तर पर ओजोन परत सूर्य की पराबैंगनी किरणों से बचाने के लिए एक सन स्क्रीन की तरह काम करती है। ओजोन परत की खोज 1913 में फ्रांसीसी भौतिकविदों फैब्री चार्ल्स और हेनरी बुसन ने की थी। पृथ्वी से 30-40 किमी की ऊंचाई पर 91 प्रतिशत ओजोन गैस मिलकर ओजोन परत बनाती है। ओजोन सूर्य की उच्च-आवृत्ति प्रकाश का 93 से 99 प्रतिशत अवशोषित करती है। ओजोन परत में छेद के लिए क्लोरोफ्लोरोकार्बन यानी सीएफसी गैसों को भी जिम्मेदार माना जा रहा है। 1985 में, ब्रिटिश अंटार्कटिक सर्वेक्षण के वैज्ञानिकों ने पहली बार अंटार्कटिक के ऊपर ओजोन परत में एक बड़े छेद की खोज की। वैज्ञानिकों को पता चला कि इसके लिए क्लोरोफ्लोरोकार्बन जिम्मेदार हैं। जिसके बाद दुनिया भर के देश इस गैस के इस्तेमाल को रोकने के लिए राजी हो गए और 16 सितंबर 1987 को मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर किए गए।
मानव द्वारा बनाए गए रसायनों से ओजोन परत को काफी नुकसान होता है। ये रसायन ओजोन परत को पतला कर रहे हैं। कारखानों और अन्य उद्योगों से निकलने वाले रसायन हवा में फैलकर प्रदूषण फैला रहे हैं। ओजोन परत के क्षरण के कारण जलवायु परिवर्तन हो रहा है। ऐसे में अब गंभीर संकट को देखते हुए इसके संरक्षण को लेकर पूरी दुनिया में जागरूकता अभियान चलाया जा रहा है. लेकिन कोरोना संक्रमण के दौरान जहां लॉकडाउन ने उद्योगों को बाधित किया है और ओजोन परत को अस्थायी रूप से सैनिटाइज किया है, वहीं दूसरी ओर स्थायी समाधान की दिशा में कदम उठाकर लोगों और उनके धरना-प्रदर्शनों में बाधा आ रही है. अक्सर सरकारें बड़े उद्योगों के उत्पादन के घातक तरीकों को अपने दम पर रोकने में सक्षम नहीं होती हैं, लेकिन जब उन्हें जनता के दबाव के रूप में समर्थन दिया जाता है, तो वे ठोस कदम उठाने में सक्षम होते हैं। पर्यावरण के हित में किए जा रहे सक्रिय सामूहिक प्रयासों की गति में आई मंदी एक बार फिर पर्यावरण के समीकरण और जहरीली गैसों के उत्सर्जन को चिंताजनक स्तर पर ले जा सकती है। जितना भी फॉसिल फ्यूल एनर्जी का इस्तेमाल कर रहे हैं उतना पृथ्वी का तापमान बढ़ रहा है। आईपीसीसी की रिपोर्ट के अनुसार तापमान 1850 ईसवी की तुलना में 1.25 डिग्री सेल्सियस डिग्री बढ़ चुका है और अगले 10 साल में 1.5 डिग्री सेल्सियस तापमान और बढ़ने की आशंका है। वैश्विक स्तर पर जिस तेजी से गर्मी बढ़ती जा रही है, वो निश्चित ही सबके लिए खतरे की घंटी है।
और अंत में, एक बहुत ही रोचक कहानी। बहुत पहले एक राजकुमारी हुआ करती थी जिसका नाम विद्योत्तमा था। वे असाधारण विद्वान थीं। उसने वादा किया था कि वह उससे शादी करेगी जो उससे ज्यादा विद्वान है। कई विद्वान उनसे शादी करने आए लेकिन बहस में उन्हें हराकर लौट गए। विवाह में असफल विद्वानों ने अपने अपमान का बदला लेने की साजिश रची और उसकी शादी किसी महान मूर्ख से करने का फैसला किया। वे सब कुछ महान बेवकूफ खोजने के लिए निकल पड़े। रास्ते में उसकी मुलाकात एक व्यक्ति से हुई जो उस पेड़ की डाली काट रहा था जिस पर वह बैठा था। ऐसा मूर्ख उसने कभी नहीं देखा था। उसे पेड़ से नीचे उतारा गया और समझाया गया कि अगर वह पूरी तरह चुप रहा तो उसकी शादी राजकुमारी से कर दी जाएगी। उस व्यक्ति का परिचय विद्योत्तमा को यह कहकर दिया गया था कि वह एक अद्वितीय विद्वान है लेकिन इस समय मौन व्रत का पालन कर रहा है, इसलिए आप जो कुछ भी पूछना चाहते हैं, वह इशारों से पूछा जाना चाहिए। विद्योत्तमा ने उसकी ओर उंगली उठाई जिसका अर्थ था कि ब्रह्म एक है। वह व्यक्ति समझ गया कि वह मेरी एक आंख तोड़ना चाहती है। उसने दो उंगलियां उठाईं, जिसका मतलब था कि अगर तुम एक आंख तोड़ोगे तो मैं तुम्हारी दोनों आंखें तोड़ दूंगा। लेकिन पंडितों ने इस संकेत की व्याख्या की कि ब्रह्म के दो रूप हैं। एक आदमी और एक प्रकृति। अब विद्योत्तमा ने पांच तत्वों को बताने के लिए पांच अंगुलियां दिखाईं। लेकिन वह व्यक्ति समझ गया कि विद्योत्तमा मुझे थप्पड़ मारना चाहती है। उसने उसे मुक्का दिखाया कि अगर तुम मुझे थप्पड़ मारोगे तो मैं मुक्का मारूंगा। पंडितों ने समझाया है कि पांच तत्व हैं, लेकिन जब वे एक साथ आते हैं, तभी उनका अर्थ होता है। विद्योत्तमा ने उस व्यक्ति को विद्वान माना और दोनों का विवाह हो गया। लेकिन शादी की पहली ही रात को उस व्यक्ति की मूर्खता का राज खुल गया और विद्योत्तमा ने इस धोखे से क्रुद्ध होकर उसे बड़ा मूर्ख कहकर धक्का दे दिया। वह आदमी सीढ़ियों से लुढ़कते हुए नीचे गिर गया। उसी क्षण उस व्यक्ति ने मन ही मन यह प्रण कर लिया कि जब तक ज्ञानी नहीं हो जाता, तब तक वह विद्योत्तमा को अपना मुख नहीं दिखायेगा। उस व्यक्ति ने न केवल ज्ञान अर्जित किया बल्कि ‘‘अभिज्ञान शकुंतलम’’ ‘‘मेघदूतम’’ आदि जैसे महान कविताओं की रचना भी की और कालिदास के नाम से प्रसिद्ध हुए। इस कथा को याद करने का उद्देश्य यह है कि हम जिस धरती पर रहते हैं, कालिदास के मूर्ख रूप को जीते हुए हमने पृथ्वी और उसके पर्यावरण को काफी नुकसान पहुंचाया है। अब जरूरत है बुद्धिमान कालिदास की तरह प्रतिज्ञा लेने की और बुद्धिमान बनकर अपनी धरती की छत को बचाने की। इसके लिए जरूरी है कि हम अधिक से अधिक पेड़ लगाएं, पुराने पेड़ों को काटे जाने से रोकें और जल संरक्षण द्वारा भूमि में जल की मात्रा को कम न होने दें।
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(11.05.2022)
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