Thursday, May 19, 2022

बतकाव बिन्ना की | काए के अव्वल ? ठेंगा सें ! | डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम | साप्ताहिक प्रवीण प्रभात

"काए के अव्वल ? ठेंगा सें !" ये है मेरा बुंदेली कॉलम-लेख "बतकाव बिन्ना की" अंतर्गत साप्ताहिक "प्रवीण प्रभात" (छतरपुर) में।
हार्दिक धन्यवाद #प्रवीणप्रभात  🙏
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बतकाव बिन्ना की
काए के अव्वल ? ठेंगा सें !
- डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
            भैयाजी गुनगुनात भए ठाड़े हते। मनो उनको मूड अच्छो कहानो। ने तो बे ऐसो गानो-मानो नईं गुनगुनात आएं।
‘‘का हो गओ भैयाजी? कोनऊ लाटरी-माटरी खुल गई का?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘जेई समझो बिन्ना!’’ भैयाजी बड़े खुस-खुस मूड में बोले।
‘‘हैं? बाकी आप तो कभऊं लाटरी के टिकट खरीदतेई नईयां, फेर कोन सी लाटरी खुल गई?’’ मैंने अचरज से पूछी।
‘‘है कोनऊ?’’ भैयाजी मुस्कात भए गोलमाल से बोले।
‘‘कहूं आपने आईपीएल को सट्टा-मट्टा तो नईं खेल लओ?’’ मोरो माथा ठनको।
‘‘अरे नईं! तुम तो जानत हो बिन्ना, मोए तो क्रिकेट को क नई आऊत, ऊपे सट्टा का खेलबी? जे सट्टा-मट्टा मोए ऊंसई नईं पोसात। अपनी मेहनत को कमाओ, जोन में सार आए। मोरो तो कहनो आए के कोनऊं खों सट्टा, जुआ नईं खेलो चाइए। जे इनसे कछु मिलत नइयां, ऊपरे से घर को पइसा और फुंक जात आए।’’ भैयाजी ने अच्छो-खासो लेक्चर दे डारो।
‘‘बात तो सही कै रए हो आप! मनो अब तो टीवी पे विज्ञापन आउत आएं जुआ खेलबे के। मनो सीदे-सीदे नई, पर जे खोलो, वो खेलो बोल-बोल के उकसाऊत आएं। औ अपनो पल्ला झाड़बे के लाने जे सोई बोल देत आएं कि इसकी आदत पड़ जेहे सो अपनी जुम्मेदारी पे खेलो। जुआ खेलाओ तुम औ जुम्मेदार रए खेलबे वारो। खूब दूकानदारी चला रए भैया हरें।’’ मोए बे सबरे विज्ञापन याद आ गए जीमें बड़े-बड़े हीरो-हिरोइन नच-नच के कैंत आएं के खेलो-खेलो। उनें सो विज्ञापन करे के पईसा मिल गए, मनो दूसरे की कोन पड़ी उनें।
‘‘हऔ, मनो जे बी सो बोलत हैं के ईकी आदत पड़ सकत है, जैसे बो बिड़ी-सिगरेट औ दारू के संगे लिखो रैत आए के तुम तो पियो मनो जे तुमाए स्वास्थ्य के लाने हानिकारक आए। काए, इमें सोई सरकार खों रेवेन्यू मिलत हुइए?’’ भैयाजी बोले।
‘‘खैर, जे सब छोड़ो, आप सो जे बताओ के आप काए इत्ते खुस दिखा रए? ऊपर से गाना गुनगुना रए? अबई सो अनवरसिटी की कोनऊ एलुमनी मीट बी नई भई के आपकी कोनऊ पुरानी सहेली आप खों मिल गई होऐं।’’ मैंने भैयाजी की तनक टांग खिंचाई करी।  
‘‘देखो-देखो, कहां की कै रईं!’’ कहत भए भैयाजी मुस्कुरा परे। हो सकत, के उनखों सच्ची में अपनी कोनऊ सहेली याद आ गई होए।
‘‘अरे बिन्ना, मोए खुसी जे बात की हो रई के कोनऊ क्षेत्र में सही अपनो देस को, अपने शहरन को नांव दुनिया के टाॅप 15 शहरन में तो आ गओ।’’ भैयाजी चहकत भए बोले।
‘‘दुनिया के 15 शहरन में? मोए तो पतो परो है के हमाए बैडमिंटन वारे खिलाड़ियन ने 14 बार के चैंपियन इंडोनेशिया के खिलाड़ियन खों हरा के 73 साल में पैलई बार थाॅमस कप जीत के अपनो देस को नाम रोसन करो आए। जे पन्द्रा शहर कहां से आए?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘लेओ, तुमने जे वाली खबर पढ़ी, मनो बो वाली ने पढ़ी जीमें लिखो रओ के दुनिया के सबसे गरम शहरन में हमाए देस के 12 शहर आएं औ ऊमें बी दो अपने प्रदेस के। नौगांव औ खजुराहो। सो सोचो, जे कित्ती बड़ी बात कहानी! ऊमें बी अपनो बुंदेलखंड खों ले लेओ सो, बांदा सबसे पैले नंबर पे ठाड़ो कहानो। काए से के उते गरमी को पारा 49 डिग्री लो पौंच गओ आए। अपन ओरें अव्वल आए कहाने।’’ भैयाजी ऐसे खुस हो के बोल रए हते मनो अपने देस ने कोनऊ ओलम्पिक में सोना ने जीत लेओ होए।
‘‘काए के अव्वल? ठेंगे से! जे कोन-सी नोनी बात कहानी? ई खबर पे आप काए अकड़ कर रए? जे तो शरम की बात कही जाओ चाइए।’’ मोए ताव आ गओ।
‘‘जे का कै रई बिन्ना? अरे, कोनऊ सूची में होए मनो अपने देस को नांव सो टाॅप पंद्रा में कहानो।’’ भैयाजी मोए घूरत भए बोले। मनो मोरो दिमाग कहूं हिरा गओ होए।
‘‘जे हमाए इते इत्ती गरमी काए पड़न लगी? पैले तो ने पड़त्ती।’’ मैने भैयाजी से पूछी।
‘‘मोए का पतो?’’ भैयाजी कुनमुनात भए बोले।
‘‘आप खों काए नई पतो? अबई ऊ दिनां सो बड़े बढ़-चढ़ के बोल रए हते।’’
‘‘कबे?’’
‘‘अरे, ऊ दिना, जब आप मंदिर गए हते औ आपकी चप्पलें उते चोरी हो गई रईं। आप नंगे पांव घरे लौट रए हते औ आपके गोड़े जर रए हते।’’ मैंने याद दिलाई।
‘‘हओ-हऔ, याद आ गई। सो ऊसे का?’’
‘‘ऊसे जे के पैलऊं जित्ते पेड़-पौधा अपने इते हते, अब इत्ते नई बचे। सो धूप खों को रोकहे? ठंडक खों को बनाए रखहे? हमने पानी को सोई ठीक-ठिकानो नई रखो सो पानी खों संकट बढ़ गओ। अब आपई बताओ के जे जो गरमी के सारे रिकाॅर्ड टूटे जा रए ऊ लाने अपन ओरें जिम्मेदार नाइयां, सो औ कोन आए?’’ 
‘‘कै तो तुम सच रईं। जे तो हमने सोचई नईं।’’ भैयाजी सोचत भए बोले।
‘‘हऔ भैयाजी, जे जो सूची छपी बता रए आप, जे कोनऊ बड़वारी की सूची नोईं। जे हमाई लापरवाही की सूची आए। तनक समझो।’’ मैंने भैयाजी से कही।
‘‘सो, इत्ते पेड़े काट डारे हमने के इत्ती गरमी पड़न लगी?’’ भैयाजी भैराने से बोले।
‘‘हऔ तो! उते बक्सवाहा में को जंगल काट रए? हमें सो हीरे चाएने न, जंगल चाए कटें चाए बरें। चाए खेतन की जमीन होए, चाए जंगल की जमीन होए, हमें सो अपनी बिल्डिंगे बनाऊंनी है। सड़कें चैड़ी करीं सो ठीक, मनो पैले कहूं शहरी-वन सो उगा लेते। अब दसा जे है के मूड़ें जरत आएं, गोड़े जरत आएं मनो हमें का? रिकाॅर्डतोड़ गरमी परत है सो परन देओ। हमें सो, खुसी मनाओ चाइए के हमाओ नांव जलवायु बिगारन वारन की सूची में पैलऊं पंद्रा में आ गओ!’’ मोरे मों से कछु ज्यादई निकर गओ।
‘‘अब हमें ताना ने मारो! हो गई गलती। हमने सो सोची के चलो कहूं कोनऊं सूची में अपने शहरन को नांव सो आओ। मनो जे है तो शरम की बात , तुमने सांची कही बिन्ना!’’ भैयाजी शरमात भए बोले।
‘‘चलो, कोई बात नईं भैयाजी! होत का है के अपन ओरें अपने शहर के नांव, अपने देस को नांव दुनिया में सबसे ऊपर देखन चात आएं, जेई उत्साह में गड़बड़ी हो जात आए। चलो कछु नईं, अब सो आप समझई गए।’’ मैंने भैयाजी खों ढाढस बंधाई।
‘‘पर मोए सो अच्छो नई लग रओ! हमें सो जे सूची से सबक लेओ चाइए।’’ भैयाजी बोले।
‘‘भैयाजी, जे कोनऊं ई एकई साल में गरमी नोई बढ़ गई। हर साल बढ़त-बढ़त इते लो आ गई। हमने पैलऊं ध्यान दे लओ होतो सो ऐसे दिन ने देखने परते। मनो, अबे भौत कछु नई बिगरो आए। आज बी अपन ओरें सब ठीक कर सकत आएं।’’ मैंने कही। 
‘‘बो कैसे?’’
‘‘बो ऐसे के पेड़ कटबे से बचा के, जल्दी बढ़बे वारे पेड़ लगा के और पानी के स्रोत बचा के। कुआ गंदो ने करें, बावड़ियां साफ कर ले, नदी तालबन पे मोटर लगा के फालतू पानी खेंच के बरबाद ने करें। बस, इत्तई में तो भौतई दसा सुधर जेहे।’’   
‘‘मोए बताओ के मोए का करो चाइए?’’ भैयाजी अकुलाने से बोले।
‘‘कछु नईं, पैले सो आप अपने घरे जाओ। ठंडो पानी पिओ। भौजी के काम में हाथ बंटाओ। काए से के पेड़ लगाबे खों काम सो अब पानी बरसबे के बाद हुइए। बाकी कोनऊं तला, बावड़ी साफ करने खों चलने होए सो कल चल सकत आएं, तनक ठंडी बेरा में।’’ मैंने भैयाजी खों समझाओ।
‘‘हओ, जे ठीक कही तुमने। कल चलबी।’’ कैत भए भैयाजी अपने घरे की ओर चल परे।
मोए सोई बतकाव करनी हती सो कर लई। चाए सूची में नांव छपे, चाए ने छपे मोए का करने। मोए सो पेड़ लगाने है औ पानी बचाने है। आप आरें बी जेई करो। बाकी, बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की। सो, सबई जनन खों शरद बिन्ना की राम-राम!     
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(19.05.2022)
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Wednesday, May 18, 2022

चर्चा प्लस | क्या रूफ हार्वेस्टिंग से ज़्यादा ज़रूरी हैं रूफ-पूल? | डॉ. (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर

चर्चा प्लस 
क्या रूफ हार्वेस्टिंग से ज़्यादा ज़रूरी हैं रूफ-पूल?
- डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह                                               

 आमतौर पर आम आदमी को सलाह दी जाती है कि लंबे समय तक नल को खुला न छोड़ें, ध्यान से पानी खर्च करें, पानी बचाएं आदि-आदि। लेकिन उन लोगों के बारे में कुछ क्यों नहीं कहते जो बड़े निजी लॉन की सिंचाई करते हैं या निजी होम पूल बनाते हैं? क्या उन्हें भी पानी बचाने की सलाह नहीं दी जानी चाहिए? छत के रूफ हार्वेस्टिंग के बजाय रूफ टॉप निजी पूलों का तेजी से चलन बढ़ रहा है। यदि पानी बचाने में भी अमीर-ग़रीब का भेद किया जाता रहा तो ‘पानी बचाओ अभियान’ कैसे सफल होगा?

एक आर्किटेक्ट समूह के प्रबंध निदेशक पीयूष प्रकाश कहते हैं कि ‘‘आप एक मेट्रो में 250 वर्गमीटर के छोटे घर में रह रहे हों। तो भी आप अपना नहाने का पूल बनवा सकते हैं। एक सामान्य आकार के पूल के लिए एक निजी पूल की लागत 4-8 लाख रुपये के बीच आती है। उनके समूह ने पिछले कुछ वर्षों में भारत में 100 से अधिक निजी पूल बनाए हैं।’’ पीयूष प्रकाश के एक सहयोगी, अमित बहल आगे कहते हैं कि ‘‘उपयोग में आसान गैजेट्स आ जाने के कारण निजी पूल का निर्माण, रखरखाव और स्वच्छता के बारे में परेशान होने की आवश्यकता अब नहीं रही।’’

बात सुनने में लुभावनी लगती है लेकिन एक छोटा पूल क्या है? जबकि पूल के आकार और आयाम अलग-अलग होते हैं। जो लगभग 10 फीट गुना 10 फीट या उससे छोटा होता है, उसे आमतौर पर एक छोटा पूल माना जाता है। गहराई के मामले में, तीन फीट भिगोने और तैरने के लिए मानक है, और चार से पांच फीट और उससे अधिक छोटे पूल के लिए सबसे अच्छी गहराई है। 10 गुना 10 गुना 2.5 फीट माप वाले सबसे छोटे पूल में 1,052 गैलन पानी की क्षमता होती है। याद रखना चाहिए कि 1 लीटर 0.264 गैलन के बराबर होता है। छोटे पूल के 1,052 गैलन पानी का अर्थ है 4782.487 लीटर पानी। जो तैरने, नहाने के काम के बाद बहा दिया जाता है।
5 फीट की औसत गहराई वाले 12 बाई 24 फुट आयताकार पूल में लगभग 10,800 गैलन पानी भरा जाता है। समान गहराई वाले 16 बाई 32 फुट वाले पूल में लगभग 19,200 गैलन पानी लगता है और 20 बाय 40 फुट पूल में 30,000 गैलन पानी की ज़रूरत पड़ती है। भूतल पर जगह की कमी के कारण इन दिनों छत या छत पर पूल बनाने का चलन बढ़ गया है। भारत में केवल रूफटॉप स्विमिंग पूल की कीमत 900 से 1300 रुपये प्रति वर्ग फीट है जबकि 10 फीट व्यास गुना 30 इंच गहरी छत या टैरेस पूल में 3639 लीटर पानी होता है। वहीं, भारत में घरेलू जल उपयोग के लिए मानक मानदंड 135 लीटर प्रति व्यक्ति प्रति दिन (एलपीसीडी) है, जिसे केंद्रीय सार्वजनिक स्वास्थ्य और पर्यावरण इंजीनियरिंग संगठन द्वारा निर्धारित किया गया है। तो, सवाल यह है कि 4 लोगों के परिवार को कितना पानी इस्तेमाल करना चाहिए? आमतौर पर 4 लोगों का एक परिवार नहाने, खाना पकाने, धोने, मनोरंजन और पानी के लिए 12,000 गैलन का उपयोग करता है।

इंटरनेशनल ग्राउंड वाटर रिसोर्स असेसमेंट सेंटर की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, पूरी दुनिया में 270 करोड़ लोग ऐसे हैं, जो पूरे साल में 30 दिनों तक पानी के संकट का सामना करते हैं। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार यदि अगले तीन दशकों में पानी की खपत एक प्रतिशत की दर से बढ़ती है, तो दुनिया को एक बड़े जल संकट से गुजरना होगा। भारत में भी पिछले दो-तीन दशकों से भूजल स्तर तेजी से बिगड़ रहा है। 2001 के आंकड़ों पर नजर डालें तो आज की तस्वीर काफी गंभीर है। भारत में प्रति व्यक्ति भूजल उपलब्धता 5,120 लीटर तक पहुंच गई है। 1951 में यह उपलब्धता 14,180 लीटर थी। अब यह 1951 की उपलब्धता का केवल 35 प्रतिशत है। 1991 में यह आधी हो गई थी। अनुमान के मुताबिक, वर्ष 1951 की तुलना में 2025 तक प्रति व्यक्ति प्रति दिन भूजल का केवल 25 प्रतिशत ही बचेगा। केंद्रीय भूजल बोर्ड (सीजीडब्ल्यूबी) के आंकड़ों के अनुसार, यह उपलब्धता वर्ष तक घटकर केवल 22 प्रतिशत रह जाएगी। 2050. एक महत्वपूर्ण तथ्य के अनुसार मनुष्य प्रतिदिन औसतन 321 बिलियन गैलन पानी का उपयोग करता है। इसमें अकेले धरती के भीतर से 77 अरब गैलन पानी निकाला जाता है। आंकड़े बताते हैं कि दुनिया के 1.6 अरब लोगों को शुद्ध पेयजल नहीं मिल रहा है।

एक रिपोर्ट के अनुसार, पृथ्वी पर केवल 0.5 प्रतिशत पानी ही उपयोग योग्य और उपलब्ध ताजा पानी है। संयुक्त राष्ट्र मौसम विज्ञान एजेंसी के महासचिव का कहना है, ‘‘जिस गति से पृथ्वी का तापमान बढ़ रहा है, उससे पानी की उपलब्धता भी बदल रही है। गांवों में पीने के पानी की समस्या भी कम विकट नहीं है. वहां की 90 प्रतिशत आबादी पीने के पानी के लिए भूजल पर निर्भर है। हालांकि, कृषि क्षेत्र के लिए भूजल के बढ़ते दोहन के कारण, कई गांव पीने के पानी की समस्या का सामना कर रहे हैं।’’ वैज्ञानिक चिंतित हैं कि दुनिया के अधिकांश क्षेत्रों में पानी की गुणवत्ता में गिरावट आ रही है, और प्रजातियां मीठे पानी के जीवों की विविधता और पारिस्थितिकी को तेजी से नुकसान हो रहा है। समुद्री पारिस्थितिकी की तुलना में भी यह क्षरण अधिक है।

यह ठीक है कि अगर आपके पास पैसा है तो आप इसे अपनी विलासिता पर खर्च कर सकते हैं लेकिन इस शर्त पर नहीं कि यह दूसरों के लिए असुविधा का कारण बने। पूल में स्नान करने की हर किसी की इच्छा होती है और सार्वजनिक पूल में जाकर यह इच्छा पूरी की जा सकती है। सार्वजनिक पूल का विस्तार करना बेहतर है। इससे उतने पानी की खपत नहीं होगी, जितना कि एक पूल वाले हर हजारवें घर में होगी। यदि हम अपने अतीत में देखें, तो सिंधु घाटी में सार्वजनिक तालाबों के अवशेष मिले हैं, जिससे पता चलता है कि सिंधु सभ्यता में सार्वजनिक स्नानघरों (पूल) का प्रचलन था। जबकि वे सभी शहर सिंधु नदी के तट पर स्थित थे और पानी की प्रचुर उपलब्धता थी। फिर भी वे पानी का सम्हल कर इस्तेमाल करते थे।
इनदिनों निजी पूल का बड़ा बाजार विकसित हो रहा है। लेकिन बाजार और बुनियादी जरूरतों के बीच संतुलन होना चाहिए। ऐसा लगता है जैसे हम अपनी बुनियादी कमियों को नजरअंदाज करने की आदत को अपनाते जा रहे हैं। पेड़ों की कमी है, फिर भी बचे हुए पेड़ों को काटा जा रहा है और भवनों का निर्माण किया जा रहा है। पार्किंग की कोई जगह नहीं है फिर भी सबसे बड़ी कार खरीदने में दिलचस्पी है। वायु प्रदूषण बढ़ रहा है लेकिन हम इस पर ध्यान नहीं देते हैं। इसी तरह, जिन्हें पीने का साफ पानी मिल रहा है, उनके पास पीने के पानी के प्रदूषण के बारे में सोचने का समय नहीं है।
अब जब हम जानते हैं कि जल संकट का विकट समय चल रहा है, तो हमें समझना होगा कि जल का कोई विकल्प नहीं है। प्रश्न है कि रूफ वाटर हार्वेस्टिंग क्या है? संक्षेप में कहा जाए तो इस तकनीक में मकान की छत की ढाल के अनुसार बरसाती पानी के आउटलेट से जल स्रोत तक पीवीसी पाइप लगाए जाते हैं। स्रोत के समीप इसी पाइप लाइन में फिल्टर लगाया जाता है। बस यही है रूफ वाटर हार्वेस्टिंग और इस तरह आकाश का पानी पाताल की गहराई में पहुंचता है। इससे भूमि में जल का स्तर बना रहता है। रूफ वाटर हार्वेस्टिंग के अंतर्गत बारिश के पानी को संचित कर, उसे फिल्टर कर पीने तथा अन्य उपयोग में भी लाया जा सकता है। इससे भू-स्रोतों में उपलब्ध पानी पर उपयोग का दबाव कम हो जाता है और भूमि में जल संतुलन बना रहता है।
मानव अस्तित्व जल पर निर्भर है। जल ही सृष्टि का मूल आधार है। जल ही भोजन है, जल है, वनस्पति है अर्थात् जल का कोई विकल्प नहीं है। जल संरक्षण ही पर्यावरण की रक्षा का उपाय है। जल का पुनर्भरण करना ही जल का उत्पादन करना है। हमें यह समझना होगा कि पानी के लिए इंसान की जरूरत किसी भी अन्य जरूरत से ज्यादा महत्वपूर्ण है। कुल मिलाकर यह समझना होगा कि पानी है तो कल है। हमें निजी पूल की विलासिता के बदले रूफ हार्वेस्टिंग को चुनना होगा।
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(18.05.2022)
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Tuesday, May 17, 2022

पुस्तक समीक्षा | ख़ैरियत है हुज़ूर : एक अछूते विषय पर एक अनूठा उपन्यास’’ | समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह

प्रस्तुत है आज 17.05.2022 को  #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई देश की प्रतिष्ठित कथाकार उर्मिला शिरीष  के उपन्यास "ख़ैरियत है हुज़ूर" की समीक्षा... आभार दैनिक "आचरण" 🙏
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पुस्तक समीक्षा
ख़ैरियत है हुज़ूर : एक अछूते विषय पर एक अनूठा उपन्यास
समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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उपन्यास  - ख़ैरियत है हुज़ूर
लेखिका  - उर्मिला शिरीष
प्रकाशक  - शिवना प्रकाशन, पी.सी. लैब, सम्राट काॅम्प्लेक्स बेसमेंट, बस स्टेंड, सिहोर (मप्र)-466001
मूल्य     - 150 /- 
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उर्मिला शिरीष हिंदी साहित्य जगत की जानी-मानी वरिष्ठ लेखिका हैं। उनका कथा कौशल हिंदी पाठक समुदाय को हमेशा आकर्षित करता है। उनके अनेक कहानी संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। अभी सन 2022 में उनका उपन्यास ‘‘खैरियत है हुजूर’’ प्रकाशित हुआ है। यह उपन्यास जगत में उनकी ज़ोरदार दस्तक है। शिवना प्रकाशन से प्रकाशित यह उपन्यास कथातत्वों के एक अलग ही धरातल पर पाठकों को ले जाने में सक्षम है। वस्तुतः विमर्श के अनेक स्वरूप और अनेक आयाम इस समय हिंदी साहित्य जगत में उपस्थित हैं। फिर भी जब कोई लेखिका उपन्यास लिखती है तो उस में स्त्री विमर्श की अपेक्षा की जाती है। इसे पूर्वाग्रह करें या समसामयिक आग्रह किंतु यह भी सच है कि जब एक लेखिका पात्रों को रचती है तो स्त्री पात्र बहुत बारीकी से उसमें मुखर होते हैं। ‘‘खैरियत है हुजूर’’ भी अपवाद नहीं है किंतु यह उपन्यास मात्र स्त्री विमर्श नहीं रचता है अपितु एक गहन समाज विमर्श भी रचता है। यह उपन्यास समूची व्यवस्था को खंगालता है और अपनी अंतरात्मा में झांकने को विवश करता है। यह कठिन समय का दौर है जब इलेक्ट्राॅनिेक मीडिया की चकाचैंध है, बाज़ारवाद से जन्मी अनेक लिप्साएं हैं, धन कमाने की अंधी दौड़ा है। ऐसा बहुत कुछ है आज के समय में जिनके बीच हम जी रहे हैं और उन्हें समझते हुए भी पूरी तरह से नहीं समझ पा रहे हैं। एक प्रकार का डिलेमा यानी भ्रम जो हमसे हमारी सच परखने की क्षमता धीरे-धीरे छीनता जा रहा है और इन सबसे भी ऊपर न्यायव्यवस्था की दीर्घकालीन प्रक्रिया।

उपन्यास की नायिका शुचिता प्रत्यक्षतः एक कामकाजी महिला है किन्तु भीतर से एक आम भारतीय गृहणी। वह अपने पति और बच्चों के साथ एक आम-सा जीवन जी रही है जो रोजमर्रा की आपाधापी में बंधा हुआ है। उसकी अपने पति की भांति ढेर सारी आकांक्षाएं नहीं हैं। उसे तो खीझ आती है अपने पति संजीव की धन कमाने की ललक देख कर। उसे इस बात से भी चिढ़ है कि उसका पति डाॅक्टरी की पढ़ाई पढ़ कर भी ऐसे लोगों की संगत में क्यों है जो मदिरापान के आदी हैं। धीरे-घीरे यह विषय पति-पत्नी के बीच झड़प का मुद्दा बनता जाता है। फिर भी यह कोई ऐसी परिस्थितियां नहीं कही जा सकती हैं जो हर आठवें-दसवें भारतीय परिवार में न उत्पन्न होती हों। परंतु अचानक कुछ ऐसा घटित होता है जो शुचिता और संजीव के लगभग सामान्य जीवन की शांति को भंग कर देता है। उनकी दिनचर्या को छिन्न-भिन्न कर देता है और शुचिता के विश्वास की चूलों को हिला कर रख देता है। एक लंपट डॉक्टर के द्वारा उपन्यास की नायिका का रास्ता रोकने से शुरू हुआ कथानक तेजी से करवटें लेता हुआ इस तरह आगे बढ़ता है कि उपन्यास को पढ़ने वाला पाठक हर मोड़ पर चैंकता है। ठिठक कर विचार करता है। सोचता है कि अब आगे क्या होगा? इस उपन्यास की आधार घटना की वास्तविकता के बारे में लेखिका ने स्पष्ट नहीं किया है किंतु प्रत्येक चरण में व्यापम घोटाला जैसे घोटाले याद आने लगते हैं जिनमें नौकरी दिलाने के नाम पर छल-कपट होता है, यौन शोषण किया जाता है। मामला खुलने पर कई बार बड़ी मछलियां कानून के जाल से साफ़ बची रह जाती हैं, छोटी मछलियां फंस जाती हैं और कई बार ऐसा भी होता है कि कुछ निर्दोष उसकी चपेट में आ जाते हैं। घोटालों जैसे विषय पर इस तरह का यह पहला सशक्त उपन्यास कहा जा सकता है।

कथानक बिल्कुल नया है और उसका ट्रीटमेंट भी। मध्यमवर्गीय कामकाजी परिवार की स्त्री शुचिता (जिसका नाम आरंभ में पता नहीं चलता है) जो इस उपन्यास की नायिका है उस समय हतप्रभ रह जाती है जब उसके घर आर्थिक अन्वेषण ब्यूरो के अधिकारी आते हैं, वह घर की तलाशी लेते हैं और उसके पति को पूछताछ के लिए पकड़ कर अपने साथ ले जाते हैं। वह सपने में भी नहीं सोच सकती थी कि उसके घर पर कभी इस तरह का छापा पड़ सकता है। उसके समक्ष अनेक जटिल प्रश्न  खड़े हो जाते हैं कि अब वह क्या करें? कहां जाए? कैसे अपने पति की मदद करें और उससे पुलिस के चंगुल से कैसे बचाए? इन सारे प्रश्नों का उत्तर उसके पास नहीं है लेकिन उसके पास उसका साहस है। अपने पति पर अविश्वास नहीं करती है किंतु जब वह अपने ससुर के पास सहायता मांगने जाती है तो उसे सबसे पहले अपने ससुर का विश्वास टूटता हुआ दिखाई देता है। उसका ससुर कहता है-‘‘मुझे तो पहले ही लगता था कि इसके लक्षण ठीक नहीं हैं। उसकी गलत लोगों के साथ संगति है। रात के दो-दो, तीन-तीन बजे तक घर से बाहर रहना। मगर हमारी कौन सुनता है! वह सब जो उसके साथ आते थे ..मक्कार और बदमाश लोग फर्जी काम करते थे। पता नहीं कहां-कहां तक उनका रैकेट होगा।’’ 
जब पिता को ही अपने बेटे पर विश्वास न हो तो उससे सहायता की उम्मीद कैसे की जा सकती है? एक बार फिर वही प्रश्न के अब क्या किया जाए? पुलिस लगातार उसके पति को रोके हुए है, पूछताछ करने के लिए। इधर शुचिता अपने बच्चों की देखभाल करते हुए यह जानने को हाथ-पांव मारती रहती है कि उसके पति को कब छोड़ा जाएगा? हर बार निराशा ही उसके हाथ लगती है। वकील, कानूनी दांवपेंच में पैसा पानी की तरह बहाना पड़ता है।

बीच में एक लंबा फ्लैशबैक है जो कथानक की नींव से परिचित कराता है। ऊपर से  देखने में तो यह छात्र जीवन की एक आम भारतीय प्रेम कथा लगती है, जिसका विवाह के रूप में परंपरागत पटाक्षेप हो जाता है। लेकिन उस फ्लैशबैक में देशकाल से परिचित कराती दो घटनाओं की चर्चा है जिनमें से एक है तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की उनके सुरक्षाकर्मियों द्वारा हत्या और दूसरी भोपाल में यूनियन कार्बाइड जो पेस्टिसाइड की अमेरिकन कंपनी थी, में गैस लीक होने के कारण बड़ी संख्या में जनहानि का होना। हर बड़ी घटना के साथ अनेक छोटी-छोटी अंतर्घटनाएं भी जुड़ी होती हैं। कुछ साथ घटित होती है और कुछ आगे चलकर आकार लेती हैं। ऐसे ही एक घटना धीरे-धीरे आकार लेती गई वह थी गैस त्रासदी के मुआवजे के जोड़-तोड़ की घटना। बहुत ही कम शब्दों में और बहुत सटीक विवरण दिया है लेखिका उर्मिला शिरीष ने- ‘‘जो भोपाल में उस रात नहीं भी थे वह भी अब गैस प्रभावित हो गए थे और अचानक ही भोपाल की जनसंख्या चार-पांच लाख से बढ़कर पन्द्रह लाख हो गई थी। आने वाले समय में गैस राहत के नाम पर सैकड़ों धंधे शुरू हो गए और एक अस्पताल भी बन गया अब मजदूर मिलना मुश्किल हो गए थे।’’

फ़र्ज़ी सर्टीफिकेट्स बनाने का बाज़ार हमेशा गर्म रहता है, चाहे वह झूठे गैसत्रासदी पीड़ित का हो अथवा नौकरी पाने के लिए योग्यता का झूठा सर्टीफिकेट। शुचिता को नहीं पता कि उसका पति सचमुच अपराधी है अथवा नहीं। यह बात और है कि सारी दुनिया यहां तक कि उसके पति के सगे रिश्तेदार भी उसे अपराधी ठहरा रहे थे। शुचिता को उसकी कमियां उसकी बुराइयां भी याद आती है कि वह किस तरह से शराब पीकर आता था, दोनों में किस तरह से झड़प होती थी। फिर भी वह अपने पति को यूं अकेला तो नहीं छोड़ सकती थी। जो कुछ भी संभव हो पा रहा था, वह दौड़-धूप कर रही थी। घर के माहौल और उसकी परिस्थितियों का विवरण देते हुए लेखिका ने लिखा है- ‘‘घर में जैसे मातम पसर गया था। मृत्यु से भी ज्यादा मारक मातम। दोनों बच्चे मां की परेशानी से परेशान थे। दुखी थे। उदास थे। चुप थे। अब वह एकदम अकेली थी। सब गायब थे। राकेश अन्य रिश्तेदार सब का आना-जाना बंद था। कोई अपना नाम खराब नहीं करना चाहता था। हां, जेल में कब कौन मिलने जाएगा, यह तय किया जा रहा था। जेल के नियमानुसार सप्ताह  में एक बार मिल सकते थे।’’

तमाम संघर्ष के दौरान मर्मांतक पीड़ा का वह पल भी आता है जब शुचिता अपने पति की केस फाईल की काॅपी वकील से मांग कर पढ़ती है और उसमें पति पर लगाए गए आर्थिक अपराधों के साथ ही यौन शोषण का आरोप अपनी आंखों से पढ़ती है। यदि कोई पुरुष होता तो अपनी पत्नी की ऐसी यौन-संलिप्ता के बाद उससे किनारा कर लेता किन्तु एक स्त्री, वह भी पत्नी तमाम अविश्वास के बावज़ूद स्थितियों को हर दृष्टि से समझने की कोशिश करती है। वह सत्यता जानने के लिए कथित पीड़िता से मिलना भी मंजूर करती है। जहां उसके आगे कई नए पन्ने खुल कर सामने आते दिखाई देते हैं।
उपन्यास में केन्द्रीय जेल के आंतरिक वातावरण का बखूबी वर्णन है जो चेतावनी देता है कि कोई भी अपराध करने से पहले सोच लें कि जेल की दुनिया कितनी कठोर और संवेदनहीन है। बाजार का प्रभाव वहां भी है। यदि आपकी जेब में पैसा है तो वहां भी आपको सुविधाएं मुहैया हो जाएंगी और नहीं है तो वहां भी आप दलित-शोषित जिंदगी गुजारने पर मजबूर रहेंगे।  यदि जेल की दुनिया में कदम नहीं रखना चाहते हैं तो सावधान रहें, सतर्क रहें। लेकिन कई बार यह चेतावनी भी बेकार साबित होती है जब कोई व्यक्ति अचानक दूसरों की दुर्भावनाओं का शिकार हो जाता है और न चाहते हुए भी उस दुनिया में जा पहुंचता है जो अपराधियों की दुनिया कहलाती है। एक गहन द्वंद्व और अंतद्र्वन्द्व, साथ ही संघर्ष की कड़ी परीक्षाएं। 

सत्ताईस साल, चार माह, अठारह दिन के बाद घटनाक्रम उस निष्कर्ष पर पहुंचता है जहां उसे आरंभ के कुछ सप्ताह में ही पहुंच जाना चाहिए था। न्याय व्यवस्था की दीर्घकालिक प्रक्रिया जहां दोषियों को दंड तक पहुंचाती है वहीं निर्दोषों को भी सज़ा सुनाए जाने से पहले ही लम्बे दंड का भागी बना देती है। यह उपन्यास अनेक ऐसे ज्वलंत प्रश्न अपने पीछे छोड़ जाता है जो मानस को झकझोरने वाले हैं। उपन्यास का विन्यास कसा हुआ है। पात्र हर कदम पर सामने खड़े दिखाई देते हैं। उपन्यास की भाषा इतनी सरल और सहज है कि किसी भी बौद्धिक स्तर के पाठक से संवाद कर सकती है। सबसे महत्वपूर्ण है इसका कथानक जो व्यापम जैसी अनेक घटनाओं के पर्दे के पीछे के परिदृश्य से जोड़ता है, जिस पर सनसनी फैलाने वाला इलेक्ट्राॅनिक मीडिया भी चर्चा नहीं करता है। इसके लिए लेखिका उर्मिला शिरीष बधाई की पात्र हैं। सकल समाज से सरोकारित इस उपन्यास को अवश्य पढ़ा जाना चाहिए।            
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#पुस्तकसमीक्षा #डॉशरदसिंह #डॉसुश्रीशरदसिंह #BookReview #DrSharadSingh #miss_sharad #आचरण

Sunday, May 15, 2022

Article | Who will buy the insurance policy for earth? | Dr (Ms) Sharad Singh | Central Chronicle

⛳ Today my article "Who will buy the insurance policy for earth?" has been published in the Sunday edition of #CentralChronicle. Please read it.  
🌷Hearty thanks Central Chronicle 🙏
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Article
Who will buy the insurance policy for earth?

-    Dr (Ms) Sharad Singh
Writer, Author & Social Activist
Blogger - "Climate Diary Of Dr (Ms) Sharad Singh"

We take our life insurance policies but who will take the climate, environment and earth insurance policies?  Is there any future of our life without them? We take our life insurance policies for our future security.  They provide financial security to our family and us in case of any tragedy that may happen to us in future. We become worry-free by taking a variety of security policies. But does anyone ever think of insuring the earth?  The earth is our home and world.  Can we imagine our life without Earth? Who will take the insurance policy for Earth? 

Among the living beings on earth, we humans consider ourselves to be wiser than other creatures because we have developed our skills. But it also does not mean that other beings do not have intelligence. Man is not able to weave as efficiently as a bird weaves its nest alone. Even making it his home requires teamwork. If dolphins are able to understand human words, then ants not only make their settlements but also store them in food for future. So how can we say that they do not have intelligence? But there is one thing that proves us humans to be superior to all other creatures, that we can remember our long past and predict long future because we have reasoning ability. That is why today we can easily understand what phase of climate and environment are going through. Today we know that the temperature on earth is continuously increasing. The ozone layer, which protects the earth from ultraviolet rays, radiation from the sun, is in danger. Today we can assess that we have brought natural resources to the brink of destruction to get our modern resources. If this were not true, there would be no voices to reduce the use of fossil fuels on a global scale. Germany does not announce the permanent closure of its coal mines.

We humans are family animals and live in society and community. We buy different types of security insurance policies, such as health protection, home security, vehicle security, education security, accident insurance etc., to keep our family and our future safe. So why don't we worry about our home which is the collective home of all of us human beings. Which is the basis of our life. That is, our earth. Now the time has come that we have to worry about the future of the earth. 

Climate change has been emerging as a very serious problem in the last few years. There are many causes of climate change, which affect the life going on in the earth in many ways. Due to the widespread changes in the climatic conditions, the entire population of many plants and animals has become extinct and the population of many others has reached the verge of extinction. In some areas, certain types of trees have become extinct collectively and due to this the area under forest cover is decreasing. Due to climate change, the water system is having a very bad effect, due to which glaciers are melting and rainfall is becoming uncontrollable. All these situations are promoting the imbalance happening in our environment, due to which the environment is being affected in a very bad way. There are two causes of climate change- first, due to natural causes and second humanitarian reasons. Natural causes are the sliding of glaciers, the eruption of volcanoes and the human-caused greenhouse effect, which we also call global warming. But the truth is that what we consider to be a natural cause has also been increased by us humans.
It can be seen in such a way that ever since machines have been used to the maximum extent, the hazards on natural resources have increased. To run machines, fossil fuels are required such as coal and oil, burning fossil fuels, coal and oil, releases a lot of carbon dioxide, which generates gases like methane, ozone, chlorofluorocarbons, nitrous oxide, which is known as global warming.

Climate change is having a very bad effect on the Earth's atmosphere. Trees play a huge role in balancing the carbon dioxide on the earth because they take in carbon dioxide and give us oxygen. Due to the influence of the environment, many species of trees are going extinct, which is becoming a big problem for us. Our North and South poles are important for controlling the climate. These are having a huge impact due to changing climate control. If this climate change continues like this, then life will be completely extinct in the future.

Impact on water: Due to climate change, water is having a very bad effect. Rainfall conditions are also having a very bad effect, causing drought and flood-like conditions in many places on the earth. Many people are facing a serious problem. Somewhere the homes of many people are drowning, and somewhere they are desperate to drink water. Due to the continuous increase in temperature, there is a crisis of glacier melting, which is arising as a serious problem.

Humans changed the Earth's climate in just 120 years. This conclusion has been drawn in the Sixth Assessment Report “Climate Change 2021: The Physical Science Basis” released by the United Nations Intergovernmental Panel on Climate Change (IPCC) on 9 August 2021. At present the earth cannot be compared with the pre-industrial period of 1850-1900. This was a time when the climate was stable without the effects of greenhouse gases released by the burning of fossil fuels.
We have made our earth sick. We have made him unbalanced. Now our earth needs all types of insurance policies like health, accident, future protection etc. Who will buy insurance policies for earth? Even if a billionaire buys it, will any insurance claimant survive if the earth crashes? It is meant to say that if the earth is to be protected in the future, then its present has to be protected. All the policies should be not for the future but for the present so that we can save the future of mankind along with the earth and the earth.
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 (15.05.2022)
#ClimateCahnge  #MyClimateDiary
#KnowYourClimate
#KnowYourEnvironment
#unclimatechange
#svetheearth  #Environment

संस्मरण | नीले, हरे रंग और रंगरेजन बड़ी बी | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नवभारत


नवभारत मेंं 15.05.2022 को प्रकाशित
हार्दिक आभार #नवभारत 🙏

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Km
संस्मरण
नीले, हरे रंग और रंगरेजन बड़ी बी
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

हमसे न पूछो रंगरेजवा से पूछो
जिसने गुलाबी रंग दिना, दुपट्टा मेरा...
   - ये है फिल्म "पाक़ीज़ा"  के गाने की मशहूर पंक्तियां जिसमें रंगरेज का जिक्र आया है। फारसी शब्द "रंगरेज" भी उन दिनों एक मुहावरे की तरह चलता था। जब मैं छोटी थी तो मुझे याद है कि मेरे बचपन के शहर पन्ना में एक ही रंगरेज परिवार था। दिलचस्प है कि तब मुझे मालूम भी नहीं था कि वे रंगरेज हैं। यद्यपि मैंने उन्हें कपड़ा रंगते देखा था। मिट्टी की बड़ी-बड़ी नांद में गहरा हरा, नीला, काला और लाल रंग का पानी भरा हुआ होता था।
     उस रंगरेज परिवार में मुझे सिर्फ एक सदस्य का नाम याद है। वह नाम था "बड़ी बी"। वस्तुतः यह उनका नाम भी नहीं, मात्र एक संबोधन था। वे परिवार की मुखिया थीं, इसलिए उन्हें बड़ी बी कहा जाता था। हमारे घर के कपड़े भी उन्हीं के यहां रंगने को दिए जाते थे। विशेष रुप से मां की वह साड़ियां जो पर्दे के रूप में उपयोग में लाए जाने के लिए रंगाई जाती थीं।  वर्षों तक हमारे घर में रेडीमेड पर्दों के बजाय साड़ी के पर्दे ही काम में लाए जाते रहे और वे सभी नीले रंग के होते थे।  एक बार मैंने मां से पूछा था कि हम लोग नीले रंग से ही परदे क्यों रंगवाते हैं? तब उन्होंने कहा था कि नीले रंग के पर्दे अच्छे लगते हैं। दरअसल, बड़ी बी के यहां नीले के अलावा हरा, काला और लाल रंग का काम होता था और मां को नीला रंग पसंद था।
    पन्ना शहर में छोटे बाज़ार से बड़े बाज़ार तक जाने वाले मार्ग के बीच में जैन मंदिर से कुछ आगे और  जड़िया परिवार के घर से पहले रंगरेजों का घर था। घर के बाहर मोटे पत्थर की फर्शियों पर वे कपड़ा रंगने का काम करते थे। आमतौर पर नंगे हाथों से ही वे रंगाई का काम करते थे जिसके कारण उनके हाथ लाल, नीले, हरे, काले दिखाई देते थे। यह पक्के रंग उनके हाथों से कैसे छूटते थे यह मुझे पता नहीं। बड़ी बी वही फर्शी पर चौकी डालकर बैठी रहती थीं। वे इस बात का ध्यान  रखती थीं कि कोई काम में कोताही न करने पाए। सभी काम ठीक-ठाक हो। यदि उन्हें कहीं कोई लापरवाही करता दिखाई दे जाता तो वे उसे बुरी तरह झिड़कतीं। वहीं ग्राहकों के साथ उनका व्यवहार बहुत ही नर्म रहता था। मैं भी जब मां के साथ बड़ी बी के पास जाती थी तो बड़ी बी मां को देखकर उनके सम्मान में चौकी से उठ खड़ी होती थीं। फिर मुझे और मां को भी बैठने के लिए चौकियां देती थीं। हम दोनों के बैठने के बाद वे स्वयं बैठती थीं।        
        एक बार मेरी तबीयत खराब हो गई थी मुझे टाइफाइड हो गया था लगभग 2 माह मैं दवाएं खाती हुई बिस्तर पर रही। उस दौरान एक अजीब-सा फितूर मेरे दिमाग में घुस गया था। मैंने मां से जिद की कम से कम ड्राइंग रूम और उसके पीछे वाले कमरे के बीच जो दरवाजा है उस दरवाजे के पर्दे कोकाकोला कलर में रंगवा दीजिए। बड़ी अजीब-सी मांग थी मेरी, जिसका कोई औचित्य नहीं था। घर में नीले रंग के परदे पहले से ही लगे हुए थे। वे पर्दे तभी बदले जाते जब मां की कुछ और पुरानी साड़ियां निकलतीं।  उस दौरान मां की कोई ऐसी साड़ी नहीं थी जिससे वे पहनना छोड़ने वाली हों। लेकिन मेरी बीमारी को ध्यान में रखते हुए उन्होंने बिना सोचे विचारे अपनी एक साड़ी जो गुलाबी रंग की थी, बहुत ही सुंदर, उन पर जंचती भी थी, उसे कोकाकोला रंग में रंगवाने के लिए दे दिया था। जब वह साड़ी रंग कर आई और मां ने उसे सिलकर पर्दे का रूप दे दिया, तब मैंने मां से पूछा था कि आपने पहले कभी नहीं बताया कि बड़ी बी के यहां कोकाकोला कलर में भी कपड़े रंगे जाते हैं। तब उन्होंने बताया था, "बड़ी बी के यहां कोकाकोला कलर में कपड़े कभी  नहीं रंगे जाते हैं। यह तो उन्होंने तुम्हारी विशेष फरमाइश को ध्यान में रखकर लाल रंग और काले रंग को मिलाकर कोकाकोला कलर बनाया है।"  यह सुनकर मुझे बहुत मजा आया। लेकिन अब सोचती हूं तो मुझे लगता है कि मैंने दोनों पर ज्यादती की थी, मां पर भी और बड़ी बी पर भी। मां को अपनी एक साड़ी कुर्बान करनी पड़ी, वह भी मेरी जिद के कारण। बड़ी बी को मेरी ज़िद को ध्यान में रखते हुए अलग से सिर्फ एक साड़ी के लिए  रंग बनाना पड़ा, जोकि निश्चित रूप से एक ज्यादती ही थी ।
        जब मैं बहुत छोटी थी तो मुझे इस बात का एहसास नहीं था कि वह रंगरेज परिवार जिसकी मुखिया बड़ी बी हैं किस जाति, धर्म का है? क्योंकि  मेरा उस मामले से कोई सरोकार नहीं था। थोड़ी बड़ी होने पर मुझे पता चला कि वह रंगरेज परिवार मुस्लिम है।  कॉलेज पहुंचते-पहुंचते मेरी जिज्ञासा और अधिक बढ़ गई। यद्यपि तब तक उनका काम सिमटने लगा था और उनका नाम भी। अब वह रंगरेज के बजाए "कपड़ा डाई करने वाले" कहलाने लगे थे।        
         समय के साथ हमने जिन मुहावरे जैसे शब्दों को खोया उनमें से एक "रंगरेज" भी है। नई पीढ़ी "टाई डाई वालों"  या "डाईर" को तो जानती है लेकिन रंगरेज को नहीं जानती है। अब कपड़ा रंगने की वह पद्धति भी यदाकदा ही देखने को मिलती है। सादे गर्म पानी, सादे ठंडे पानी और पानी में घुले हुए रंगो से भरी हुई नांदें जिनके पास खड़े होने से भाप का एहसास होता था, बिल्कुल उस अपनत्व की उष्मा की तरह जो बड़ी बी लुटाती थीं। मुझे नहीं पता कि आप में से कितने लोगों ने उस पुरानी पद्धति वाले पुराने रंगरेजों को देखा है, लेकिन मैंने देखा था, पन्ना में उस रंगरेज परिवार को बसे हुए और अपना काम करते हुए।
      मुझे पिछले कुछ वर्षों में दो बार बड़ी बी की शिद्दत से याद आई। एक तो तब जब मैं एक कहानी लिख रही थी जिसका मैंने नाम रखा था " मन न रंगाए रंगाए जोगी कपड़ा।"  कबीर की पंक्तियों पर । दूसरे तब मुझे बड़ी बी बहुत याद आती है जब पिछले दिनों मेरी एक परिचित ने पश्चिम बंगाल से अपने स्वयं के हैंडलूम वर्कशॉप से एक साड़ी बुनवाकर मेरे लिए बतौर उपहार भेजी। उस सूती साड़ी का रंग फीका न पड़े इसके लिए क्या उपाय किया जाए यह मैंने सागर में ही निवासरत अपनी एक युवा परिचित श्रीमती स्वाति हल्वे से पूछा तब उन्होंने डाई कलर फिक्सर के बारे में मुझे बताया जोकि कारगर साबित हुआ। उस दौरान मुझे बड़ी बी की बहुत याद आई। शायद उनके यहां भी इसी तरह का कोई कलर फिक्सर काम में लाया जाता रहा होगा। उस रंगरेज परिवार ने पन्ना के अनेक परिवारों के कपड़े रंगे होंगे। पर अपनी विशेषताओं से उन्होंने तो मेरा मन ही अपने रंग में रंग दिया।           
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#संस्मरण #डॉसुश्रीशरदसिंह #हिंदीसाहित्य #लेख #memoir #mymemories #DrMissSharadSingh

Friday, May 13, 2022

बतकाव बिन्ना की | जो कोनऊ प्रेम-व्रेम नोंई, पगलेटपना आए | डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम | साप्ताहिक प्रवीण प्रभात

 "जो कोनऊ प्रेम-व्रेम नोंई, पगलेटपना आए" ये है मेरा बुंदेली कॉलम लेख "बतकाव बिन्ना की" अंतर्गत साप्ताहिक "प्रवीण प्रभात" (छतरपुर) में।
हार्दिक धन्यवाद #प्रवीण प्रभात 🙏
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बतकाव बिन्ना की
जो कोनऊ प्रेम-व्रेम नोंई, पगलेटपना आए
- डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
         ‘‘अच्छो भओ ऊ पकरो गओ। ससुरे खों जेल में बेंड़ के सौ जूते मारो चाइए। नईं जे कम हुईए...ऊको तो...ऊको तो...पब्लिक खों सोंप देओ चाइए।’’ भैयाजी दोई हाथन से अखबार सम्हालत बड़बड़ात भए मिले।
‘‘का हो गओ भैयाजी? कोन की ऐसी-तैसी कर रए?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘ऐसी-तैसी सो नई कर पा रए, जेई तो गम्म आए।’’ भैयाजी मिसमिसात भए बोले।
‘‘तनक बताओ तो कोन की कै रए?’’ मैंने फेर के पूछी।
‘‘अरे, बोई इन्दौर वारो।’’
‘‘को इन्दौर वारो?’’ मोए अचरज भओ के भैैयाजी कोन इन्दौर वारे खों कोस रए?
‘‘अरे, बोई, जी के कारन सात जने जिन्दा जल के मर गए। बड़ो आओ ससुरो प्रेमी बनत फिरत आए। काए ऐसे होत आएं प्रेमी? अच्छा तुमई बताओ बिन्ना के कहूं ऐसो प्रेम करो जात आए के प्रेमिका ने भगा दओ सो ऊके प्रान ई के पांछू पर गए?’’ भैयाजी लाल-पीले भए जा रए हते।
‘‘कै तो ठीक रए हो आप। जो प्रेम सच्चो होए सो ऐसो नई होत आए के एक-दूसरे खों मारबे खों चल दें। बाकी आप इन्दौर की कै रए अपने सागर, छतरपुर, दमोए सबई जांगा सो ऐसे हलकट फिरत रैत आएं।’’ मैंने भैैयाजी खों समझाओ।
‘‘हऔ सो बिन्ना! पैलऊं कोनऊ मोड़ी के पांछू पड़ गए, इकतरफा प्रेम करो, औ जो मोड़ी ने मानी सो कट्टा ले के चल परे मारबे के लाने। जे कोन टाईप को प्रेम कहानो? काए तुमें याद है के अपने मोतीनगर थाने के इलाका में जोई तो भओ हतो। ऊने मोड़ी पे देसी कट्टा से गाली चला दई रई, काए से के मोड़ी ऊको भाव नई दे रई हती। औ जे इन्दौर वारो औ सयानो कहलानो। बा कै रओ के हमने सो मोड़ी पे हजार-खांड़ रुपैया खरचा करो औ बा मोड़ी ने ब्रेकअप कऱ लओ। कोन ने कही रई के रुपइया खरचा करो। चलो मान लओ के मोड़ी ने कछु अपने लाने खरिदवा लओ हुइए। मनो पैलऊं मोड़ी जे ने समझ पाई हुइए के मोड़ा कित्तो बड़ो वारो खपट्ट आए। कछु बाद में समझ में आई हुइए सो ऊने नातो तोड़ लओ हुइए। काए से के जो मोड़ा खपट्ट ने होतो तो उते आग लगाबे के लाने काए जातो? ऐसो काम सो बदमासई करत आएं, तुमाए-हमाए जैसे ऐसो करबे की सोचई नई सकत आएं। बोलो सांची कही के नई?’’ भैयाजी ने पूछी।
‘‘हऔ भैयाजी! इकदम सांची कही आपने। बा मोड़ी मनो संगे रैती तो बी चैन से कोन रै पाती? बा मोड़ा प्रेम करबे की बात कै रओ है मनो ऊको मोड़ी संगे प्रेम-व्रेम नईयां, जे सो पगलेटपन कहो चाईए।’’ मैंने भैयाजी से कही। बाकी उनकी बात बिलकुल सही हती।
‘‘औ का बिन्ना! जे सीरीं-फरहाद, लैला-मजनूं, सस्सी-पुन्नूं का मूरख हते जो एक-दूसरे के लाने अपने प्रान देत रए। चलो उनकी छोड़ो, तुमें सो पतो आए के हमाई तुमाई भौजी से पैलऊं प्रेम भओ, फेर ब्याओ भओ। घरवालन से हमने साफ बोल दई रही के हम जोन मोड़ी से कै रए बोई संगे हमाओ ब्याओ कराओ ने तो हम नर्मदाजी की परकम्मा खों निकर जेहें, औ कभऊं लौट के ने आहें। हमाए घरवारे तुमाई भौजी के घरे गए। उन्ने बात करी। ब्याओ पक्को करो। औ धूम-धाम से हमाओ ब्याओ भओ। औ तुमने देखई आए बिन्ना, के हम तुमाई भौजी को कित्तो मान करत आएं। आज बी उन्हईं की सुनत आएं, उन्हई की सेवा करत आएं। जे कहाऊत आए प्रेम।’’ भैयाजी अपनी मूंछन पे ताव देत भए बोले।
‘‘हऔ भैयाजी! प्रेम में कछु चल जाए मनो ऐंड़ नई चलत। जो तुम कोनऊ से प्रेम करन लगे सो मनो बो तुमाई प्रापर्टी हो गई का? जे तो गलत बात आए। मोए सोई ऊ मोड़ा पे भौतई गुस्सा आ रओ है। ऊने अपने पगलैटपना में सात लोगन के प्रान ले लए। जे तो गनीमत के और ने मरे। बाकी भौतई गलत करो आए ऊने। ऊको सो भौतई कड़ी सजा मिलने चाइए।’’ मैंने कही। 
‘‘जे अबे दस-बीस साल में ऐसो कांड कछु ज्यादा सो होन लगे हैं, ने तो पैलऊं ऐसो नई होत्तो। पैले सो प्रेमी खों अगर धोखा मिल जाए सो बो खुदई जहर खा लेत्तो मनो अपनी प्रेमिका खों चिंटियां लो नईं काटत्तो। अब सो कहूं कटर ले के घूमत आएं, सो कहूं चाकू धर के। औ सयाने निकरे सो कट्टा खों जुगाड़ कर लेत आएं। कट्टा (देसी पिस्तौल) में पइसा फूंकत बेरा कलेजो नई दुखत आए, काए से के मूंड़ पे सो खून सवार रैत आए। अरे, ऐसई दबंगई दिखाने होए सो भर्ती हो जाओ ने पुलीस में, फौज में। उते दिखाइयो अपनी रंगदारी। बाकी जे फिलम औ टीवी सीरियल बारे जेई सब सो सिखात आएं। कैसे मोड़ी खों पिछैलो जाए, कैसे ऊको धोखा दे के अपनो बनाओ जाए, कैसे सास बाई खों छिड़ियन पे तेल डार के गिराओ जाए, बहू को कैसो जीबो मुसकिल करो जाए। मनो जो कोनऊ बुरई बात ने सूझ रई होए सो ऊको टीवी सीरियल में देख के कोनऊ बी सीख सकत आए।’’ भैयाजी बोले।
‘‘हऔ भैयाजी! अब तो फिलम में सोई हिरोइन की इज्जत करबे वारे करैक्टर कमई दिखात आएं। मोए तो बो कुमार गौरव औ बिजेता पंडित वारी फिलम को बो सीन आज लोे नई भूलो आए के जीमें बिजेता पंडित औ कुमार गौरव के हाथ एकई हथकड़ी से बंधे रए। बिजेता पंडित ने पथरा उठाओ औ हथकड़ी तोड़न लगी। बातई बात में पथरा कुमार गौरव के हाथ में घल गओ। कुमार गौरव ने तुरतई खेंच के एक लपाड़ा मार दओ बिजेता के गाल पे। मोए कभऊं नई पोसानो जे सीन। अरे, धोखा से लगओ पथरा सो का मोड़ी खों लपाड़ा मारो चाइए? जे ऐसई सीन से तो गलत असर परत आए देखबे वारन पे। ई के पैले कभऊं ऐसो सीन फिलमाओ नई गओ रओ। अब आपई सोचो भैयाजी, के जो हीरोई विलेन बन जेहे सो कहां धरी फेर लवस्टोरी?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘जेई तो हम कै रए बिन्ना, के ऐसो चलन ठीक नइयां। ऐसे खपट्ट प्रेमियन खों सो ऐसई सजा दई जाए के बाकी जने बी सौ बार सोचें कछु करबे के पैलऊं। बाकी हमने सोई देखी हती बा फिलम। का नाव हतो ऊ फिलम खों... अरे, अच्छो सो नाव हतो...’’ भैयाजी बोले।
‘‘लव स्टोरी।’’ मैंने याद कराई।
‘‘हऔ, लव स्टोरी हतो नाव, ठीक बताओ। हऔ, सो हम जे कै रए हते के ऐसे फर्जी प्रेमियन खों कूट-कूट के पतरो कर दओ चाइए।’’ भैयाजी बोले।
‘‘आजकाल सो घर गिरा दओ जात आए, बुलडोजर से।’’ मैंने कहीं।
‘‘फालतू में! अरे, जोन ने अपराध करो, बो तो मजे से जेल की रोटियां जीमें औ घरवारे बेघर हो जाएं जोन की बो पैलई नई सुनत रओ। ऐसे खपट्ट अपने घरवालन की कोन कभऊं सुनत आएं। बा तो इन्हई ओरन खों अच्छो सूंटो जाए के सबई खों सीख मिल जाए।’’ भैयाजी ताव खात भए बोले।
‘‘हऔ भैयाजी! कड़ो कदम सो उठााओ जाओ चाइए। जे सब हमाए संस्कृति में नोंई। ईपे लगाम लगो चाइए।’’ मैंने सोई भैयाजी की बात पे दम भरी।
‘‘हऔ बिन्ना, तुमने लगाम की अच्छी याद कराई। हमाई लगात सो तुमाई भौजी के हाथन में आए। सो, अब मोए जाने परहे पुदीना लाबे के लाने। तुमाई भौजी ने कच्ची मियां खरीद के धरी है पर पुदीना बढ़ा गओ रओ सो वोई लेबे के लाने निकरबई बारे हते के जे अखबार आ गओ औ हमाओ मुंडा भिन्ना गओ। अब चल रए।’’ कैत भए भैयाजी भागे बजार की ओरे।
सो भैयाजी पुदीना लाबे के लाने निकर पड़े। मोए सोई बतकाव करनी हती सो कर लई। चाए जेल होए चाए बुलडोजर चले, मोय का करने। बाकी ई किसम के अपराध रुको चाइए। बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की। सो, सबई जनन खों शरद बिन्ना की राम-राम!     
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(12.05.2022)
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Wednesday, May 11, 2022

चर्चा प्लस | पृथ्वी की छत में कोई छेद न होने दें | डॉ. (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर

चर्चा प्लस 
पृथ्वी की छत में कोई छेद न होने दें !
 - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह                                                                                
         पिछले कोरोना काल में बड़ी संख्या में हताहत हुए। जबकि, वैज्ञानिकों ने पाया कि दुनिया के अलग-अलग देशों में लॉकडाउन ने हानिकारक उत्सर्जन को कम किया, जिससे ओजोन परत में बढ़ते छिद्रों को कम करने में मदद मिली। लेकिन यह स्थायी समाधान नहीं था। दुनिया हमेशा के लिए लॉकडाउन नहीं रह सकती। अगर जंगलों को काटा गया, जलाया गया और फिर से जहरीले उत्सर्जन में वृद्धि हुई, तो फिर से ओजोन परत के लिए खतरा पैदा हो जाएगा। ये बातें आम आदमी को अनावश्यक लग सकती हैं, लेकिन ओजोन परत का संबंध इंसानों समेत हर जीव की सांस से है। इसलिए सभी को सोचना होगा।


प्रत्येक मनुष्य, प्रत्येक प्राणी को जीवित रहने के लिए श्वास की आवश्यकता होती है। हवा और पर्यावरण की पवित्रता ही स्वस्थ सांस दे सकती है। लेकिन हम इंसानों ने अपने हाथों से अपना घर जलाने और प्रदूषण फैलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। दिल्ली को ही लें तो हर साल सर्दियों में स्मॉग की वजह से वहां लोगों का दम घुटने लगता है. सांस की बीमारियां बढ़ती हैं और अब सांस लेने से तेजी से फैलने वाले कोरोना संक्रमण ने खतरा बढ़ा दिया है। मास्क के पीछे फंसी सांसें और उस पर साफ हवा की कमी स्वास्थ्य के लिए घातक परिणाम दे सकती है। लेकिन शुद्ध हवा, शुद्ध वातावरण कहां से आता है, जब हमने वातावरण को जहरीली गैसों का ‘‘डंपिंग स्टेशन’’ बना दिया है। यह सोचकर सुखद है कि इस कोरोना काल में दुनिया भर के देशों में किए गए लॉकडाउन ने पृथ्वी की छत यानी ओजोन परत की मरम्मत की है। कोरोना वायरस के प्रकोप के चलते दुनिया के ज्यादातर देशों को लॉकडाउन कर दिया गया है। उद्योगों का संचालन बंद था। सड़कों पर परिवहन सीमित हो गया। इससे वायु प्रदूषण अपने न्यूनतम स्तर पर पहुंच गया। नदियों का पानी साफ होने लगा, आसमान साफ और नीला नजर आने लगा। लॉकडाउन के दौरान बड़े पैमाने के उद्योग बंद होने से जहरीली गैसों के उत्सर्जन में भारी गिरावट आई, जिससे ओजोन परत के छिद्र सिकुड़ने लगे, सिकुड़ने लगे. लेकिन यह स्थायी समाधान नहीं है। कोरोना संक्रमण के बावजूद दुनिया अपनी पुरानी पटरी पर लौट आई है। यह आवश्यक भी है। उद्योग के बिना, अर्थव्यवस्था और विकास ढह जाएगा, और बेरोजगारी और भूख का प्रबंधन करना कठिन और कठिन हो जाएगा। कहने का तात्पर्य यह है कि जो हम अपनी नग्न आंखों से नहीं देखते हैं, वह हमारे जीवन के लिए भी महत्वपूर्ण है - ओजोन परत।

ओजोन परत में छेद का पता पहली बार वर्ष 1980 में लगाया गया था। जैसे-जैसे प्रदूषण बढ़ता गया, ओजोन छिद्र भी बढ़ता गया। जिससे सूरज की अल्ट्रावायलेट किरणें धरती पर पहुंचने लगीं, इससे त्वचा का कैंसर, मोतियाबिंद और प्रतिरक्षा प्रणाली को नुकसान के साथ-साथ पौधों को भी नुकसान पहुंचा। इससे बचने के लिए वर्ष 1987 में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल संधि की गई। ओजोन परत पृथ्वी के वायुमंडल की एक परत है। ओजोन परत सूर्य से आने वाली पराबैंगनी किरणों से हमारी रक्षा करती है। वायुमंडल में 91 प्रतिशत से अधिक ओजोन गैसें यहां मौजूद हैं, वहीं दूसरी ओर जमीनी स्तर पर ओजोन परत सूर्य की पराबैंगनी किरणों से बचाने के लिए एक सन स्क्रीन की तरह काम करती है। ओजोन परत की खोज 1913 में फ्रांसीसी भौतिकविदों फैब्री चार्ल्स और हेनरी बुसन ने की थी। पृथ्वी से 30-40 किमी की ऊंचाई पर 91 प्रतिशत ओजोन गैस मिलकर ओजोन परत बनाती है। ओजोन सूर्य की उच्च-आवृत्ति प्रकाश का 93 से 99 प्रतिशत अवशोषित करती है। ओजोन परत में छेद के लिए क्लोरोफ्लोरोकार्बन यानी सीएफसी गैसों को भी जिम्मेदार माना जा रहा है। 1985 में, ब्रिटिश अंटार्कटिक सर्वेक्षण के वैज्ञानिकों ने पहली बार अंटार्कटिक के ऊपर ओजोन परत में एक बड़े छेद की खोज की। वैज्ञानिकों को पता चला कि इसके लिए क्लोरोफ्लोरोकार्बन जिम्मेदार हैं। जिसके बाद दुनिया भर के देश इस गैस के इस्तेमाल को रोकने के लिए राजी हो गए और 16 सितंबर 1987 को मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर किए गए।
         मानव द्वारा बनाए गए रसायनों से ओजोन परत को काफी नुकसान होता है। ये रसायन ओजोन परत को पतला कर रहे हैं। कारखानों और अन्य उद्योगों से निकलने वाले रसायन हवा में फैलकर प्रदूषण फैला रहे हैं। ओजोन परत के क्षरण के कारण जलवायु परिवर्तन हो रहा है। ऐसे में अब गंभीर संकट को देखते हुए इसके संरक्षण को लेकर पूरी दुनिया में जागरूकता अभियान चलाया जा रहा है. लेकिन कोरोना संक्रमण के दौरान जहां लॉकडाउन ने उद्योगों को बाधित किया है और ओजोन परत को अस्थायी रूप से सैनिटाइज किया है, वहीं दूसरी ओर स्थायी समाधान की दिशा में कदम उठाकर लोगों और उनके धरना-प्रदर्शनों में बाधा आ रही है. अक्सर सरकारें बड़े उद्योगों के उत्पादन के घातक तरीकों को अपने दम पर रोकने में सक्षम नहीं होती हैं, लेकिन जब उन्हें जनता के दबाव के रूप में समर्थन दिया जाता है, तो वे ठोस कदम उठाने में सक्षम होते हैं। पर्यावरण के हित में किए जा रहे सक्रिय सामूहिक प्रयासों की गति में आई मंदी एक बार फिर पर्यावरण के समीकरण और जहरीली गैसों के उत्सर्जन को चिंताजनक स्तर पर ले जा सकती है। जितना भी फॉसिल फ्यूल एनर्जी का इस्तेमाल कर रहे हैं उतना पृथ्वी का तापमान बढ़ रहा है। आईपीसीसी की रिपोर्ट के अनुसार तापमान 1850 ईसवी की तुलना में 1.25 डिग्री सेल्सियस डिग्री बढ़ चुका है और अगले 10 साल में 1.5 डिग्री सेल्सियस तापमान और बढ़ने की आशंका है। वैश्विक स्तर पर जिस तेजी से गर्मी बढ़ती जा रही है, वो निश्चित ही सबके लिए खतरे की घंटी है।
और अंत में, एक बहुत ही रोचक कहानी। बहुत पहले एक राजकुमारी हुआ करती थी जिसका नाम विद्योत्तमा था। वे असाधारण विद्वान थीं। उसने वादा किया था कि वह उससे शादी करेगी जो उससे ज्यादा विद्वान है। कई विद्वान उनसे शादी करने आए लेकिन बहस में उन्हें हराकर लौट गए। विवाह में असफल विद्वानों ने अपने अपमान का बदला लेने की साजिश रची और उसकी शादी किसी महान मूर्ख से करने का फैसला किया। वे सब कुछ महान बेवकूफ खोजने के लिए निकल पड़े। रास्ते में उसकी मुलाकात एक व्यक्ति से हुई जो उस पेड़ की डाली काट रहा था जिस पर वह बैठा था। ऐसा मूर्ख उसने कभी नहीं देखा था। उसे पेड़ से नीचे उतारा गया और समझाया गया कि अगर वह पूरी तरह चुप रहा तो उसकी शादी राजकुमारी से कर दी जाएगी। उस व्यक्ति का परिचय विद्योत्तमा को यह कहकर दिया गया था कि वह एक अद्वितीय विद्वान है लेकिन इस समय मौन व्रत का पालन कर रहा है, इसलिए आप जो कुछ भी पूछना चाहते हैं, वह इशारों से पूछा जाना चाहिए। विद्योत्तमा ने उसकी ओर उंगली उठाई जिसका अर्थ था कि ब्रह्म एक है। वह व्यक्ति समझ गया कि वह मेरी एक आंख तोड़ना चाहती है। उसने दो उंगलियां उठाईं, जिसका मतलब था कि अगर तुम एक आंख तोड़ोगे तो मैं तुम्हारी दोनों आंखें तोड़ दूंगा। लेकिन पंडितों ने इस संकेत की व्याख्या की कि ब्रह्म के दो रूप हैं। एक आदमी और एक प्रकृति। अब विद्योत्तमा ने पांच तत्वों को बताने के लिए पांच अंगुलियां दिखाईं। लेकिन वह व्यक्ति समझ गया कि विद्योत्तमा मुझे थप्पड़ मारना चाहती है। उसने उसे मुक्का दिखाया कि अगर तुम मुझे थप्पड़ मारोगे तो मैं मुक्का मारूंगा। पंडितों ने समझाया है कि पांच तत्व हैं, लेकिन जब वे एक साथ आते हैं, तभी उनका अर्थ होता है। विद्योत्तमा ने उस व्यक्ति को विद्वान माना और दोनों का विवाह हो गया। लेकिन शादी की पहली ही रात को उस व्यक्ति की मूर्खता का राज खुल गया और विद्योत्तमा ने इस धोखे से क्रुद्ध होकर उसे बड़ा मूर्ख कहकर धक्का दे दिया। वह आदमी सीढ़ियों से लुढ़कते हुए नीचे गिर गया। उसी क्षण उस व्यक्ति ने मन ही मन यह प्रण कर लिया कि जब तक ज्ञानी नहीं हो जाता, तब तक वह विद्योत्तमा को अपना मुख नहीं दिखायेगा। उस व्यक्ति ने न केवल ज्ञान अर्जित किया बल्कि ‘‘अभिज्ञान शकुंतलम’’ ‘‘मेघदूतम’’ आदि जैसे महान कविताओं की रचना भी की और कालिदास के नाम से प्रसिद्ध हुए। इस कथा को याद करने का उद्देश्य यह है कि हम जिस धरती पर रहते हैं, कालिदास के मूर्ख रूप को जीते हुए हमने पृथ्वी और उसके पर्यावरण को काफी नुकसान पहुंचाया है। अब जरूरत है बुद्धिमान कालिदास की तरह प्रतिज्ञा लेने की और बुद्धिमान बनकर अपनी धरती की छत को बचाने की। इसके लिए जरूरी है कि हम अधिक से अधिक पेड़ लगाएं, पुराने पेड़ों को काटे जाने से रोकें और जल संरक्षण द्वारा भूमि में जल की मात्रा को कम न होने दें।
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(11.05.2022)
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