Friday, January 26, 2024

गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं 🇮🇳 - डॉ (सुश्री) शरद सिंह


गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं 🇮🇳

- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

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Thursday, January 25, 2024

चर्चा प्लस | क्या गणतांत्रिक लोकतंत्र में रामराज्य की स्थापना संभव है? | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर

चर्चा प्लस  
क्या गणतांत्रिक लोकतंत्र में रामराज्य की स्थापना संभव है? 
- डाॅ (सुश्री) शरद सिंह                                                                                        
      22 जनवरी 2024 को अयोध्या में रामलला की प्राणप्रतिष्ठा के साथ ही एक ऐसे अध्याय का आरंभ हुआ जिसे न केवल सांस्कृति अपितु राजनीतिक दृष्टि से भी देखा जा रहा है। धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र में सभी को एक मत में सहमत कर लेना राजनीतिक दृष्टि से निःसंदेह बड़ी सफलता है। इसी के साथ रामराज्य की चर्चा भी चलती रही। श्रीराम की बात हो और रामराज्य की बात न हो, यह तो संभव ही नहीं है। किन्तु त्रेतायुग का रामराज्य एक राजतंत्र था और देश का वर्तमान तंत्र गणतांत्रिक लोकतंत्र है। क्या गणतांत्रिक लोकतंत्र में रामराज्य की स्थापना की जा सकती है? संवैधानिक दृष्टि से यह किस तरह संभव है? करते हैं आकलन संविधान के आधार पर ही।    
संविधान की मूल प्रति में कुछ चित्र एवं रेखाचित्र अंकित हैं। जब डाॅ. भीमराव अंबेडकर ने भारत के संविधान का अंतिम ड्राफ्ट तैयार कर लिया तो उसके प्रकाशन के पूर्व उसकी सज्जा हेतु उस पर कुछ चित्र एवं रेखाचित्र भी प्रकाशित किए जाने पर विचार किया गया। इस कार्य हेतु सर्वसम्मति से उस समय के प्रसिद्ध चित्रकार श्री नन्दलाल बोस, शांति निकेतन को अधिकृत किया गया। बोस एवं उनकी टीम ने भारतीय इतिहास के चुनिंदा महात्माओं, गुरुओं, शासकों एवं पौराणिक पात्रों को दर्शाते हुए विभिन्न चित्रों को संविधान के अलग-अलग भागों में सजाया गया जिनमें श्रीराम का चित्र भी है। न केवल श्रीराम का अपितु संविधान के भाग 3 में श्री राम, सीता जी एवं लक्ष्मण जी का चित्र है। इस भाग में नागरिकों के मौलिक अधिकार दर्ज़ हैं। आखिर मौलिक अधिकारों के खण्ड में ही श्रीराम, सीता और लक्ष्मण के चित्र क्यों अंकित किए गए हैं? यह माना जाता है कि रामराज्य आम नागरिकों के मौलिक अधिकारों की सुरक्षा एवं उपलब्धता का परिचायक है इसीलिए मौलिक अधिकारों के खण्ड में श्रीराम, सीता और लक्ष्मण के चित्र अंकित किए गए। यद्यपि कुछ विद्वान इस बात को ले कर असमंजस में रहते हैं कि रामराज्य में भले ही जनतांत्रिक मूल्यों को प्रमुखता दी गई, फिर भी वह था तो राजतंत्र। एक परंपरागत राजा द्वारा संचालित। इसीलिए जब भारतीय लोकतंत्र में रामराज्य की स्थापना का विषय उठता है तो कई अंतःप्रश्न भी उठ खड़े होते हैं। वैसे तंत्र को लेकर प्रश्नों का उठना और उस पर चिंतन किया जाना ही तो वास्तविक लोकतंत्र है अन्यथा राजतंत्र, सैन्यतंत्र अथवा तानाशाही में इसके लिए कोई अनुमति नहीं रहती है।
लोकतंत्र यानी डेमोक्रेसी तथा गणतंत्र यानी रिपब्लिक। हमारा देश दोनों प्रकार के तंत्र को संयुक्त रूप से अपना कर चल रहा है। लोकतंत्र और गणतंत्र में क्या अंतर है? इसे अति संक्षेप में कुछ इस तरह समझा जा सकता है कि लोकतंत्र में जनता के पास स्वयं की शक्ति होती है, वहीं सरकार के गणतंत्र रूप में शक्ति व्यक्तिगत नागरिकों की होती है। लोकतंत्र में यह बहुमत की इच्छा सर्वोपरि होती है जिसमें मौजूदा अधिकारों की अवहेलना (ओवरराइड) करने का उसे अधिकार होता है। सरकार के गणतंत्र रूप में संविधान अधिकारों की रक्षा करता है, इसलिए लोगों की कोई भी इच्छा किसी भी अधिकार पर हावी नहीं हो सकती है यानी क्षति पहुंचाने की दृष्टि से अवहेलना नहीं कर सकती है। लोकतंत्र प्रमुख रूप से लोगों की सामान्य इच्छा पर केंद्रित होता है। वहीं, गणतंत्र मुख्य रूप से संविधान पर केंद्रित होता है। लोकतंत्र में सरकार पर कोई बंदिश नहीं होती। वहीं, एक गणराज्य में सरकार पर संविधान का अंकुश होता है। अब भारतीय गणतांत्रिक लोकतंत्र के परिप्रेक्ष्य में रामराज्य को समझना आसान होगा।
        भारत को स्वतंत्र कराने में अपना अहम योगदान देने वाले महात्मा गांधी ने ‘‘रामराज्य’’ को सदा उत्तम माना। उन्होंने एक ऐसे समाज की कल्पना की जो श्रीराम के द्वारा संचालित शासन के आदर्शों के अनुरूप हो। महात्मा गांधी मानते थे कि समाज का ढांचा ऐसा होना चाहिए जिसमें सभी समान हों। सभी को समान न्याय और जीवन जीने के समान अवसर मिलें। इसीलिए वे रामराज्य को एक आदर्श शासनतंत्र के रूप में मानते थे। हिन्दू संस्कृति में श्रीराम द्वारा किया गया आदर्श शासन ‘‘रामराज्य’’ के नाम से प्रसिद्ध है। महात्मा गांधी ‘‘रामराज्य’’ को ले कर अपनी धारणा के प्रति स्पष्ट एवं दृढ़ थे। उन्होंने समय-समय पर अपने लेखों द्वारा रामराज्य की संकल्पना केा समझाने का प्रयास भी किया।
       22 मई, 1921 को अहसहयोग आंदोलन के दौरान गुजराती ‘नवजीवन’ में महात्मा गांधी ने लिखा था कि -‘‘कुछ मित्र रामराज्य का अक्षरार्थ करते हुए पूछते हैं कि जब तक राम और दशरथ फिर से जन्म नहीं लेते तब तक क्या रामराज्य मिल सकता है? हम तो रामराज्य का अर्थ स्वराज्य, धर्मराज्य, लोकराज्य करते हैं। वैसा राज्य तो तभी संभव है जब जनता धर्मनिष्ठ और वीर्यवान् बने। अभी तो कोई सद्गुणी राजा भी यदि स्वयं प्रजा के बंधन काट दे, तो भी प्रजा उसकी गुलाम बनी रहेगी. हम तो राज्यतंत्र और राज्यनीति को बदलने के लिए प्रयत्न कर रहे हैं। बाद में हमारे सेवक के रूप में अंग्रेज रहेंगे या भारतीय हमें इसकी चिंता नहीं करनी पड़ेगी। हम अंग्रेज जनता को बदलने का प्रयास भी नहीं करते। हम तो स्वयं अपने-आप को बदलने का प्रयास कर रहे हैं।’
       20 मार्च, 1930 को दांडी मार्च के समय महात्मा गांधी ने हिन्दी पत्रिका ‘नवजीवन’ में ‘स्वराज्य और रामराज्य’ शीर्षक से एक लेख लिखा जिसमें उन्होंने रामराज्य की अपनी संकल्पना को स्पष्ट किया था - ‘‘स्वराज्य के कितने ही अर्थ क्यों न किए जाएं, तो भी मेरे नजदीक तो उसका त्रिकाल सत्य एक ही अर्थ है, और वह है रामराज्य। यदि किसी को रामराज्य शब्द बुरा लगे तो मैं उसे धर्मराज्य कहूंगा। रामराज्य शब्द का भावार्थ यह है कि उसमें गरीबों की संपूर्ण रक्षा होगी, सब कार्य धर्मपूर्वक किए जाएंगे और लोकमत का हमेशा आदर किया जाएगा। सच्चा चिंतन तो वही है जिसमें रामराज्य के लिए योग्य साधन का ही उपयोग किया गया हो। यह याद रहे कि रामराज्य स्थापित करने के लिए हमें पाण्डित्य की कोई आवश्यकता नहीं है. जिस गुण की आवश्यकता है, वह तो सभी वर्गों के लोगों- स्त्री, पुरुष, बालक और बूढ़ों- तथा सभी धर्मों के लोगों में आज भी मौजूद है। दुःख मात्र इतना ही है कि सब कोई अभी उस हस्ती को पहचानते ही नहीं हैं। सत्य, अहिंसा, मर्यादा-पालन, वीरता, क्षमा, धैर्य आदि गुणों का हममें से हरेक व्यक्ति यदि वह चाहे तो क्या आज ही परिचय नहीं दे सकता?’’
       1934 में, महात्मा गांधी ने लिखा, ‘‘मेरे सपने का रामराज्य राजकुमार और रंक के समान अधिकार सुनिश्चित करता है।’’ उन्होंने इसे ‘‘शुद्ध नैतिक अधिकार पर आधारित लोगों की संप्रभुता’’ के रूप में भी वर्णित किया, जिसका अर्थ है कि यह लोकतांत्रिक होगी।
     आज फिर एक बार जब रामराज्य की अवधारणा को ले कर संशय जागने लगता है, जो कि लोकतंत्र में स्वाभाविक है, महात्मा गांधी के विचारों में उन संशयों के स्पष्ट उत्तर मिलते हैं। 26 फरवरी, 1947 को एक प्रार्थना-सभा में किसी ने महात्मा गांधी से प्रश्न किया था कि आप रामराज्य की पैरवी करते हैं किन्तु इससे तो सिर्फ हिन्दुत्व को संरक्षण मिलेगा और शेष धर्मावलंबी स्वयं को असुरक्षित पाएंगे। तब महात्मा गांधी ने उत्तर देते हुए कहा था - ‘‘जिस आदमी की कुर्बानी की भावना अपने संप्रदाय से आगे नहीं बढ़ती, वह खुद तो स्वार्थी है ही, वह अपने संप्रदाय को भी स्वार्थी बनाता है। मैंने अपने आदर्श समाज को रामराज्य का नाम दिया है। कोई यह समझने की भूल न करे कि राम-राज्य का अर्थ है हिन्दुओं का शासन। मेरा राम खुदा या गॉड का ही दूसरा नाम है। मैं खुदाई राज चाहता हूं जिसका अर्थ है धरती पर परमात्मा का राज्य। ऐसे राज्य की स्थापना से न केवल भारत की संपूर्ण जनता का, बल्कि समग्र संसार का कल्याण होगा।’’
       25 मई, 1947 को एक साक्षात्कार में महात्मा गांधी ने आर्थिक असमानता को रामराज्य के लिए संकट बताते हुए कहा था - ‘‘आज आर्थिक असमानता है. समाजवाद की जड़ में आर्थिक असमानता है. थोड़ों को करोड़ और बाकी लोगों को सूखी रोटी भी नहीं, ऐसी भयानक असमानता में रामराज्य का दर्शन करने की आशा कभी न रखी जाए. इसलिए मैंने दक्षिण अफ्रीका में ही समाजवाद को स्वीकार कर लिया था. मेरा समाजवादियों से और दूसरों से केवल यही विरोध रहा है कि सभी सुधारों के लिए सत्य और अहिंसा ही सर्वोपरि साधन है।’’
     रामराज्य द्वारा लोकतंत्र को ले कर महात्मा गांधी के विचारों को संक्षेप में स्मरण करने के बाद फिर उसी प्रश्न पर आते हैं कि भारतीय संविधान के मौलिक अधिकारों के खंड पर श्रीराम, सीता और लक्ष्मण के चित्र क्यों अंकित किए गए? अब इस प्रश्न का उत्तर और अधिक व्यवहारिक हो कर ढूंढते हैं। वस्तुतः गुलामी के दीर्घकाल जो गुलामवंश से ही आरम्भ हुआ, फिर खिल्जी, तुगलक, लोदी और मुगल आए। मुगलों का शासन समाप्त होने से पहले ही ब्रिटिश साम्राज्य ने अपनी जड़ें हमारे देश में जमा लीं। फिर दो सौ साल उन्होंने हमें गुलाम बनाए रखा। एक गुलाम के अपने कोई अधिकार नहीं होते हैं अर्थात् गुलाम के कोई मौलिक अधिकार नहीं होते हैं और न वह अपने किसी भी मौलिक अधिकार का दावा कर सकता है। उसे उतने ही अधिकार मिले होते हैं जितने उसका मालिक उसे देता है। गुलामी में जीने के अधिकार भी मालिक की मुट्ठी में होते हैं। योरोपियन राजसत्ता में ग्लेडिएटर्स का ‘‘मनोरंजन युद्ध’’ इसका सबसे घृणित उदाहरण था। जिसमें बलशाली योद्धाओं जिन्हें ग्लेडिएटर्स कहा जाता था, उन्हें अपने मालिक एवं मालिक द्वारा शासित जनता के मनोरंजन के लिए तब तक ‘‘एरीना’’ यानी खेल के स्टेडियम में युद्ध करते रहना पड़ता था जब तक कि कोई दूसरा उन्हें मार न दे। कभी शेर जैसे खूंखार पशुओं, तो कभी अन्य बलशाली योद्धाओं से उन्हें लड़ना पड़ता था। इसका आशय था कि उनका जीवन दूसरे की मृत्यु पर निर्भर था। सभी ग्लेडिएटर्स आमतौर पर युद्धबंदी होते थे। एक की मौत पर दूसरे की ज़िन्दगी की कल्पना ही अमानवीयता से भरी हुई है। समय के साथ योरोपीय जनतंत्र ने इसे उतार फेंका। ‘‘ग्लेडिएटर्स’’ इतिहास के पन्नों में सिमट कर रह गए। लोकतंत्र ऐसी किसी भी अमानवीयता का पक्षधर कभी नहीं रहता है। इसीलिए भारतीय लोकतंत्र में गुलामी को कोई स्थान नहीं है। अवयस्क बच्चों से होटलों, कारखानों अथवा नौकर के रूप में घरों पर काम कराना भी दण्डनीय अपराध माना जाता है क्यों कि बच्चों से इस तरह काम कराना उन्हें गुलाम बनाने की भांति है।
      अतः एक दीर्घकालीन गुलामी के बाद जब देश स्वतंत्र हुआ तो आमजनता को उनके मौलिक अधिकार दिए गए। अनुच्छेद 14 में समानता के अधिकार के अनुसार संविधान एवं कानून के समक्ष धनी अथवा निर्धन, शक्तिशाली अथवा कमजोर सब सामान हैं। अनुच्छेद 15 इसके लिए निहित प्रावधानों द्वारा राजकीय व गैर-राजकीय व्यक्ति एवं संस्थाओं को नागरिकों के मध्य भेदभाव के बिना समान व्यवहार करने हेतु बाध्य किया गया है। अनुच्छेद 21 में ‘प्राण और दैहिक स्वतंत्रता’ अर्थात जीने के अधिकार के अंतर्गत सभी को सम्मान पूर्वक जीवनयापन के साथ-साथ मृत्यु के पश्चात गरिमामय अंतिम संस्कार का भी अधिकार प्राप्त है। समानता का अधिकार ये भी कहता है कि किसी विवाद की स्थिति में हर व्यक्ति को न्यायिक प्रक्रिया में स्वयं का पक्ष पूर्ण रूप से प्रस्तुत करने का पूरा अधिकार है। भारत का संविधान किसी के अधीन न होकर अपने नागरिकों के अधिकारों का एक स्वतंत्र एवं सार्वभौम संरक्षक का स्थान प्राप्त है। इसीलिए आमजन के हित में तथा उनके अधिकारों के संरक्षण के लिए समय-समय पर संविधान में आवश्यक संशोधन भी किए जाते हैं ताकि उसका मूलउद्देश्य बाधित न हो।
          रामराज्य शक्ति के संतुलन एवं सम्मान का भी अनुमोदन करता है। यदि रामकथा को ध्यान से पढ़ें तो उसमें निषादराज से श्रीराम की मित्रता हुई तथा सुग्रीव का सहयोग किया एवं भाल्लुकराज जामवंत से सहयोग लिया किन्तु वनवास के बाद अयोध्यापति होते ही उन्होंने इन छोटे राजाओं के शासन पर बलपूर्वक कब्जा नहीं किया, जोकि वे कर सकते थे। उन्होंने अपनी राजशक्ति का मान रखा तथा इन छोटे शासकों के साथ मैत्रीभाव रखे, इन्हें अपना गुलाम नहीं बनाया। भारतीय गणतंत्र इसी नीति का परिपालन करता आ रहा है। चाहे श्रीलंका हो या बांग्लादेश, नेपाल हो या भूटान हो सभी छोटे पड़ोसी देशों के साथ भारत समानता एवं सम्मान का भाव रखता है। यह भी गणतंत्रीय व्यवस्था का रामराज्यीय रूप है।
       देश के आमनागरिकों को समानता का अधिकार प्राप्त है। जो इस अधिकार की अवहेलना करता है अर्थात् दूसरों का अधिकार छीनने का प्रयास करता है उसे दण्ड का भागी बनना पड़ता है। अतः संविधान के मौलिक अधिकारों के खंड में श्रीराम, सीता एवं लक्ष्मण के चित्र का होना सटीक ही है। इसे मात्र हिन्दुत्व से जोड़ कर नहीं देखा जाना चाहिए और न ही हिन्दुत्व को संकुचित दृष्टि से देखना चाहिए। हिन्दुत्व ‘‘वसुधैवकुटुम्बकम’’ पर आधारित है अतः उसमें अर्थात् सच्चे हिन्दुत्व में मानवों को ले कर भेदभाव किए जाने का प्रश्न ही नहीं है। इसीतरह रामराज्य की वास्तविक संकल्पना ग्राह्य हो सकती है, उसमें से राजतत्व हटा कर। लोकतंत्र वस्तुतः रामराज्य का परिमार्जित रूप माना जा सकता है जिसमें संवैधानिक रूप से हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, जैन, पारसी आदि नहीं वरन ‘‘हम भारत के लोग’’ हैं। इस दृष्टि से रामराज्य का वह स्वरूप गणतंत्र में सदा स्वीकार्य होगा जिसमें ‘‘हम भारत के लोग’’ का एकाभाव एवं मौलिक अधिकारों की उपस्थिति बनी रहे।
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Tuesday, January 23, 2024

एकता समिति के साथ रामलला उत्सव मनाया डॉ (सुश्री) शरद सिंह ने

🚩 श्री रामलला की प्राण प्रतिष्ठा के उपलक्ष्य में कल एकता समिति सागर ने भी राधा टॉकीज़ तिहारे के निकट प्रसादी वितरण का आयोजन किया था। जिसमें मुझे भी शामिल होने का अवसर मिला।
🚩 मैंने भी श्री राम की आरती, की फुलझड़ी जलाई तथा श्री राम के वंदन में एक स्वरचित भजन भी प्रस्तुत किया।
🚩 एकता समिति के भाई पप्पू तिवारी जी, एमडी त्रिपाठी जी, प्रदीप पाठक जी आदि के साथ उत्सव मनाने में अत्यंत आनंद का अनुभव हुआ।
🚩 एकता समिति सागर का हार्दिक आभार 🚩🙏🚩
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डॉ (सुश्री) शरद सिंह द्वारा गुजराती समाज के साथ श्रीरामलला प्राण प्रतिष्ठा में दीप प्रज्वलन

🚩श्रीराम मंदिर अयोध्या में प्राण प्रतिष्ठा महोत्सव के उपलक्ष्य में कल शाम श्री गुजराती समाज शिक्षण संस्थान की ओर से सुंदरकांड एवं महाप्रसाद का आयोजन किया गया था जिसमें मैंने भी सम्मिलित होकर दीपक जला कर अपनी श्रद्धा अर्पित की। 
🚩आयोजक थे सी जे पटेल एंड कंपनी सागर के महेंद्र भाई शाह एवं दीपिका बेन शाह। 
🚩मैं आभारी हूं भाई चंद्रकांत पटेल जी एवं भाभी भावना बेन पटेल जी की जिन्होंने मुझे इस पुनीत अवसर पर आमंत्रित कर सागर के गुजराती समाज के साथ उत्सव मनाने का आत्मीय अवसर प्रदान किया।🙏
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पुस्तक समीक्षा | नदियों के सांस्कृतिक महत्व को पुनःस्मरण कराती पुस्तक | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

प्रस्तुत है आज 23.01.2024 को  #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई डॉ श्यामसुंदर दुबे की। पुस्तक "भारत की नदियां" की समीक्षा।
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पुस्तक समीक्षा      
नदियों के सांस्कृतिक महत्व को पुनःस्मरण कराती पुस्तक     
- समीक्षक डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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पुस्तक     - भारत की नदियां
लेखक     - श्यामसुन्दर दुबे
प्रकाशक    - ग्रंथलोक, 1/7342, नेहरू मार्ग, ईस्ट गोरखपार्क, शाहदरा दिल्ली-110032
मूल्य        - 220/-
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नदियां इस धरती पर सभ्यताओं एवं संस्कृतियों की जननी रही हैं। सभी प्राचीन सभ्यताओं का जन्म और विकास नदी तटों के समीप ही हुआ है। नदियां केवल जलधाराएं ही नहीं अपितु उस क्षेत्र के जनजीवन और लोक-संस्कृति का अभिन्न अंग होती हैं। भारत में आदिकाल से ही नदियों के महत्व को समझ लिया गया था जिसके कारण इन्हें धर्म और जीवन से जोड़ा गया। इससे नदियों को भी पर्याप्त संरक्षण मिला। भारत सहित विश्व भर में नदियां सामाजिक व सांस्कृतिक रचनात्मक कार्यों का केन्द्र स्थल रही हैं। भारत में नदियां लोकोत्सवों का भी केन्द्र रहती हैं। विशेष अवसरों एवं त्योहारों के समय करोड़ों लोग नदियों में स्नान करते हैं। यहां समय-समय पर नदियों के किनारे विशेष मेलों का आयोजन किया जाता है जिनमें विभिन्न वर्गों के लोग बिना किसी भेदभाव के हिस्सा लेते हैं। नदियों के तट पर कुम्भ, सिंहस्थ जैसे विशाल मेले होते हैं जिनमें शामिल होने देश-दुनिया से लोग आते हैं। करोड़ों लोग एकत्र होते हैं। ऐसे अवसरों पर विभिन्न स्थानों से आने वाले व्यक्ति अपने विचारों व संस्कृति का आदान-प्रदान करते हैं। अर्थात् नदियां संस्कृति की जननी ही नहीं वरन् संस्कृतिक समन्वय एवं परस्पर विनियम का माध्यम भी बनती हैं। भारतीय संस्कृति में नदियों का महत्व अतुलनीय है। फिर भी आर्थिक विकास की अंधी दौड़ में हमने  नदियों के किनारे अपने औद्योगिक संस्थान स्थापित किए किन्तु नदियों के संरक्षण एवं उसके जल की शुद्धता को भूलते चले गए। अपनी इसी लापरवाही के चलते हमने गंगा-यमुना जैसी पवित्र नदियों को भी प्रदूषित कर दिया। प्रदूषण ने लगभग देश की हर नदी को प्रभावित किया है। आज जब हम नदियों के अस्तित्व एवं उनके जल के शुद्धिकरण को ले कर चिंतित है, निरंतर प्रयासरत हैं, ऐसे समय संस्कृतिविद डाॅ. श्यामसुन्दर दुबे की पुस्तक ‘‘भारत की नदियां‘‘ बहुत अधिक महत्व रखती है। इस पुस्तक में उन्होंने देश की समस्त प्रमुख नदियों के बारे में विस्तार से विवरण देते हुए इन नदियों  के बारे में लिखा है।
‘‘भारत की नदियां‘‘ पुस्तक लिखने का विचार लेखक श्यामसुन्दर दुबे के मन में कैसे आया, इस बारे में उन्होंने लिखा हैकि -‘‘पच्चीस साल बाद एक कार्यक्रम में चित्रकूट जाना हुआ। रामघाट पर भीड़-भाड़ थी। घाट का फर्श कुछ चौड़ा हो गया था। शायद संगमरमर की चीपें लगा दी गई थी। इसलिए चिकनापन बढ़ गया था। इस नएपन के बावजूद रामघाट मुझे बदला-बदला नहीं लग रहा था। बदलाव दिख रहा था तो केवल मंदाकिनी के प्रवाह में! नदी की धारा विगत पच्चीस वर्षों में थोड़ी-बहुत सिमटी है। गहराई में फर्क पड़ा है। जहां जिस स्थान पर मैंने कभी डुबकी लगायी थी, अब वहां पानी घुटनों तक भी नहीं बचा था। कीचड़ ऐसा था कि मंदाकिनी का रंग एकदम काला पड़ गया था। पहले पानी के आरपार तलहटी तक नजरें पहुंच जाती थी। अब पानी को भेदना भी असंभव था। गहराई में कीचड़ और शैवालों का अंधेरा-सा फैला था। हवा के झौकों के साथ संड़ाध की तरंग-सी उठ जाती थी। स्नानार्थियों का अभाव था। घाट के नीचे धारा अटक गयी थी। आगे बीच नदी में दोनों किनारों तक पसरा एक खेत ही उभर आया था। प्रवाह स्तब्ध था। एक उल्खनक मशीन अपनी विशाल भुजा के राक्षसी पंजे से मंदाकिनी की अवरूद्ध धारा को प्रवाह देने के लिए घाट से सटे हिस्से को खोद रही थी। नदी के कूल खेतों में बदल गये थे। मंदाकिनी संकटग्रस्त थी। यदि यही आलम रहा तो श्रीराम की प्रिय नदी मंदाकिनी का नामों निशान ही मिट जायेगा।’’  
पुस्तक की भूमिका में ही लेखक ने इस बात की चर्चा की है कि आज का युवा नदियों के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक एवं प्रकृतिक महत्व के बारे में जानता ही नहीं है। उन्होंने चित्रकूट की ही एक घटना का जिक्र किया है -‘‘किनारों पर पड़ी बेंचों पर कुछ युवा बैठे थे। मैंने उनसे जानना चाहा कि क्या वे इस नदी को जानते हैं। उन्होंने उतर स्वरूप ‘न’ में अपना सिर हिला दिया।’’ फिर उन्होंने आगे लिखा है कि- ‘‘पुस्तकें बिक रहीं थीं। किंतु मंदाकिनी पर कोई किताब नहीं थी। किसी किताब में उसका वर्णन भी नहीं था।’’ इसके बाद लेखक डाॅ. श्यामसुन्दर दुबे के मन में चिन्ता जागी कि-‘‘नदियों का स्मृतिपरक सांस्कृतिक और भौगोलिक प्रवाह मानवीय चेतना पटल से गायब होता जा रहा है। हमारा सरोकार नदियों से टूट रहा है। नदियां अकेली पड़ती जा रही हैं। यह नदी जो बाहर बहती है, अपनी संपूर्णता में हमारे भीतर भी बहनी चाहिये।’’
नदियों के प्रति ज्ञान को पुनर्स्थापित करने, पुनःजाग्रत करने के उद्देश्य से डाॅ. श्यामसुन्दर दुबे ने इस किताब को लिखने का निश्चय किया। जब उद्देश्य श्रेष्ठ हों तो कार्य भी श्रेष्ठता से ही पूर्ण होता है। इस पुस्तक में लेखक ने नदियों का परिचय देते हुए उनके पौराणिक एवं लोक दोनों महत्व को प्रस्तुत किया है। जब हम अपनी नदियों के पौराणिक महत्व के बारे में पढ़ते हैं तो हम अपने गौरवशाली अतीत एवं समृद्ध परम्पराओं के बारे में भी ज्ञान प्राप्त करते हैं। फिर जब हमें अपनी नदियों के सांस्कृतिक महत्व का ज्ञान होता है तो हमें उनके अस्तित्व की स्वाभाविक रूप से चिन्ता होने लगती है। अतः इस परिप्रेक्ष्य में डाॅ. श्यामसुन्दर दुबे ने इस पुस्तक को लिख कर प्रकृति एवं संस्कृति के प्रति बहुत बड़ा योगदान दिया है।
पुस्तक का सम्पूर्ण कलेवर तीन भागों में विभक्त है। खण्ड एक में नदी के बारे में मानवीय भावनाओं एवं नदी की प्रकृति का तीन बिन्दुओं में विवरण है- 1. धरती की वत्सल अनुभूतियों-सी 2. पहाड़ों की गंभीरता का उजलापन तथा, 3. पाल-तनी-नावों सी स्मृतियां।
दूसरे खण्ड है ‘‘नदी-विस्तार’’। इसमें देश की विभिन्न नदियों के रूप में नदी के अस्तित्व के विस्तार से परिचित कराया गया है। यह खण्ड नदियों के सांस्कृतिक महत्व के बारे में गहराई से जानने का अवसर देता है। इस खंड में जिन नदियों के बारे में जानकारी दी गई है, वे हैं-सिंधु, सरस्वती, गंगा, यमुना, शतलज, झेलम, सरयू, गंडकी, बागमती, कोसी, विशाला, नर्मदा, क्षिप्रा, बेतवा, सोन, ब्रह्मपुत्र, चंबल, केन, गोदावरी तथा कृष्णा। देश की इन प्रमुख बीस नदियों के उद्गम एवं विस्तार के बारे में जानकारी देते हुए लेखक ने उनके पौराणिक नामों के बारे में भी बताया है। जैसे यमुना नदी के बारे में लेखक ने जानकारी दी है कि -‘‘यमुना को कालिन्दी, सूर्यतनया आदि नामों से जाना जाता है। पौराणिक दृष्टि से यमुना सूर्य की पुत्री और यमराज की भगिनी है। इस दृष्टि से वह शनि की भी बहिन कहलायेगी। बहुत संभव है कि यमुना के नीले जल के कारण शनि और यम से उसकी रंग समानता का अभिप्राय इस तरह की मियक संरचना में निहित हो। यमुना को गंगा की भी बहिन माना गया है। लोक में गंगा-यमुना दो बहिनों का संबोधन प्राप्त होता है। एक ही पिता हिमालय से जन्म लेने के कारण गंगा और यमुना को संभवतः बहिन कह दिया गया हो। यमुना का महत्व कृष्णावतार के बाद और अधिक बढ़ा है। कृष्ण की प्रिय नदी के रूप में यमुना का स्मरण पौराणिक साहित्यों के साथ-साथ प्राकृत-अपभ्रंश तथा हिन्दी साहित्य में किया गया है। यमुना को कहीं-कहीं कृष्ण की पत्नी के रूप में भी मान्यता प्राप्त है। यमुना का उद्गम, महाहिमालय में बंदरपूंछ चोटी के हिम पिघलने से हुआ है। जहाँ यह हिम पिघलता है वहां ही यमुनोत्री स्थान है। धवल बर्फ से निसृत होने के कारण ही इसे सूर्य पुत्री की तरह स्मरण किया गया है। भौगोलिक दृष्टि से इसका प्रारंभ यमुनोत्री के गर्भ से 8 कि.मी. उ०प्र० की ओर 6315 मीटर की ऊचाई से टहरी गढ़वाल जिले की सीमा से होता है। यमुना नदी पश्चिम की ओर से प्रवाहित होती हुई प्रयाग में गंगा नदी से संगम करती है। यही एक मात्र ऐसी नदी है जो गंगा में पश्चिम दिशा से प्रवाह बनाती हुई मिलती है।’’
इसी प्रकार लेखक ने सरयू नदी के बारे में बताया है कि -‘‘सरयू नदी को घाघरा, घर्घरा अथवा घग्गर भी कहा जाता है। सरयू का उल्लेख ऋग्वेद के पांचवे तथा दसवें मंडल में अनितभा, कुभा, ग्रुभु, सिंधु और सरस्वती के नामों के साथ आया है ‘मा वो रसाऽनितभा कुभा क्रमुर्भावः सिंधुर्निरी रमत। मा वः परिष्ठात् सस्युः पुरीषिण्यस्मे इत सुम्नमस्तुव ।’ इसका सरयू नाम उणादि सूत्र सर्लेश्यूः के अनुसार सृगतौ से अयु प्रत्यय लगाकर निष्पन्न हुआ है। इस शब्द का अर्थ होता है बहने वाली नदी।’’ उन्होंने आगे लिखा है कि -‘‘महाकवि कालिदास ने सरयू नदी का विस्तार से वर्णन किया है। उन्होंने अपने वर्णन में इसके उद्गम स्थल का भी जिक्र किया है। ‘पयोधरैः पुण्य जनाङ्गनानाम निर्विष्ट हेमास्वुजरेणु यस्याः । ब्राह्म सरः कारण माप्तवायो बुद्धे रिवाव्यका मुदाहरन्ति।’ सरयू नदी का कारण स्थान ब्रह्मसर उसी प्रकार है, जिस प्रकार आप्तवाक् बुद्धि का कारण स्थान अव्यक्त है। निष्कर्षतः ये माना गया है कि मानसरोवर का जल गंगा छू के द्वारा अंतःस्थ रूप से राक्षसताल में आता है, और वहां से ही कर्णाली (सरयू) नदी प्रकट होकर बहती है। आम धारणा है कि सरयू नेपाल से निकलती है।’’
    न केवल उत्तर भारत अपितु दक्षिण भारत में प्रवाहित नदियों के बारे में भी लेखक ने सुंदर परिचय संजोया है। गोदावरी नदी के बारे में लेखक ने रोचक पौराणिक कथा का भी उल्लेख किया है-‘‘गोदावरी और गंगा के जल में अद्भुत साम्य है- उसका स्वाद और उसके गुण गंगा जैसे हैं। गोदावरी शब्द की संरचना में गोदा शब्द के मायने है गायों का समुदाय। गोदावरी का उद्गम क्षेत्र गायों से परिपूर्ण है। गोदावरी का एक नाम गौतमी भी है। इस नाम के साथ एक पौराणिक आख्यान संलग्न है। गौतम ऋषि त्र्यम्बक पर्वत पर निवास करते थे। एक बार इस क्षेत्र में भयंकर अकाल पड़ा। अकाल पीड़ित जन गौतम ऋषि के पास इस निवेदन के साथ पहुंचे कि वे कृपा करें और जल-प्राप्ति का संसाधन जुटाएँ। आर्त्तजनों की प्रार्थना से गौतम ऋषि का हृदय पिघल गया। वे शंकर की आराधना हेतु तपस्या लीन हो गए। तपस्या का आलम यह था कि ऋषि के शरीर पर बामियां अंग आयीं। तपस्या से शंकर प्रसन्न हुए और गौतम ऋषि की इच्छानुसार गोदावरी को पृथ्वी लोक में भेज दिया। गोदावरी के आते ही अकाल की छाया छिन-भिन्न हो गई। गौतम ऋषि के द्वारा गोदावरी का अवतरण इस धरा पर हुआ इसलिए इस नदी का नाम गौतमी रखा गया।’’
पुस्तक के ‘‘खण्ड-तीन’’ में ‘‘नदी-संक्षेप’’ शीर्षक से कुछ और नदियों के बारे में संक्षेप में जानकारी दी गई है। ये नदियां हैं- वाणगंगा, रावी, व्यास, रामगंगा, कालीगंगा, ताप्ती, महानदी, तवा, हसदो, कालीसिंध, इन्द्रावती, बनास, माही, पार्वती, लूनी, साबरमती, आयड़, पिनाकिन, टौंस, पेरियार उमियम, हुगली, बौगाई, दामोदर मंदाकिनी शिवनाथ, रिहंद, कन्हार माँड, अंरपा, सबरी, हांप, ईब, मनियारी, लीलगर, सांदुला, खारून, जोंक बोराई नदी, कोटरी डंकनी शंखनी, नारंगी, गुदरा, और बाघ। इस प्रकार लेखक ने अपनी इस 136 पृष्ठ की पुस्तक में भारत की नदियों के बारे में असीमित ज्ञान समाहित कर दिया है। बिलकुल गागर में सागर की भांति।
पुस्तक की भाषा सरल एवं रोचक है। पौराणिक कथाओं एवं संदर्भों से पुस्तक की मूल्यवत्ता और अधिक बढ़ गई है। यह पुस्तक न केवल युवाओं के लिए वरन उन सभी के लिए पठनीय है जो नदियों के महत्व को भुलाते जा रहे हैं क्योंकि जब हम नदियों के गौरव के साथ जुड़ेगे तभी हम उन्हें संरक्षित रखने के लिए तत्पर होंगे। अतः यह प्रकृति संरक्षण के संदर्भ में भी महत्वपूर्ण पुस्तक कही जा सकती है।
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Sunday, January 21, 2024

डॉ (सुश्री) शरद सिंह अयोध्या में 2007 में | यादें

अयोध्या को जैसा मैंने पाया था 2007 में 🚩
रामलला ने चाहा तो भविष्य में एक बार फिर देखूंगी ... Hope so 😊🚩🙋
🌹🙏🌹🙏🌹
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Saturday, January 20, 2024

टॉपिक एक्सपर्ट | पत्रिका | ऐसी हुलास ईसे पैले कभऊं ने देखी | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

पत्रिका | टॉपिक एक्सपर्ट | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली में
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टाॅपिक एक्सपर्ट
ऐसी हुलास ईसे पैले कभऊं ने देखी
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
            अपने इते रामलला की भौतई किरपा रई। चाए कोनऊं मंदिर होए, उते रामजू ,सीतामैया, लछमन भैया औ बजरंगबली के संगे बिराजे। जो हमाई बात को भरोसो ने होय तो पुरानी मकरोनिया से भोपाल रोड लौं देख लेओ। ने तो जैसीनगर रोड से गढ़पैरा लौं देख लेओ। सबई जांगा रामजू बिराजे दिखाहें। चाए नओ मंदिर होय, चाए पुरानों रामजी के बिना काम नईं चलत। वैसे अपने इते सागर में कछू भौतई पुराने मंदिर सोई आएं। एक तो बड़ा बजार को देव रामबाग मंदिर आए। ऐसई एक मंदिर आए कटरा में मराठी समाज वारों को। और बी मुतके मंदिर आएं जोन की बड़ी सिद्धी ठैरी। सिद्धी होय बी काय नईं? रामलला सबई की मन्नतें पूरी करत आएं। बाकी ई टेम तो ऐसा लग रओ है मनो पूरो सागर रामलला को एक बड़ो सो मंदिर बन गओ होय। 
         काए से के जेई 22 जनवरी खों अजोध्या में रामलला की प्राणप्रतिष्ठा होने। जेई की हुलास में पूरो सागर हिलोरें ले रओ। जेई खुशी में जैन समाज वारे प्रसादी बांट रए, सिख समाज वारे लंगर करा रए, मुस्लिम औ इसाई समाज वारे बधाइयां दे रए। मनो सबई खुशियां मना रए। ऐसो लग रओ के रामलला ने सबई खों भाईचारा की एक डोर में बांध देओ होय। रामधई, ऐसी हुलास तो पैले कभऊं नई देखी। तनक देखों, कोऊं मंदिरन खों सजा रओ, सो कोऊ बुलौव्वा के चाउंर लेके घर-घर जा रओ, तो कोऊ रामजी वारो झंडा हरेक घरे पौंचा रओ। काए से के अपने सागर में अनेकता में एकता सो हमेसई से रई औ अब खुल के दिखा रई। राम करे के जोई माहौल बरहमेस बनो रए औ शहर में ऐसई हुलास छाई रए।
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Thank you patrika 🙏
Thank you Dear Reshu Jain 🙏
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