Tuesday, September 16, 2025

पुस्तक समीक्षा | भावनाओं की प्रखरता है मनीष जैन की कविताओं में | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

'आचरण' में प्रकाशित पुस्तक समीक्षा 
 पुस्तक समीक्षा

भावनाओं की प्रखरता है मनीष जैन की कविताओं में
- समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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कविता संग्रह  - कुछ कही : कुछ अनकही 
कवि       - मनीष जैन
प्रकाशक  - 63/1, कटरा बाजार, सागर (म.प्र.)
मूल्य       - 200/-
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काव्य अभिव्यक्ति का सबसे कोमल माध्यम होता है क्योंकि यह भावनाप्रधान होता है। यदि यह कहा जाए तो गलत नहीं होगा कि हर व्यक्ति के भीतर एक कवि मौजूद होता है। कभी व्यक्ति अपने भीतर के कवि को पहचान लेता है और अपनी भावनाओं तादात्म्य स्थापित कर लेता है। तब काव्य उसकी भावनाओं की अभिव्यक्ति का माध्यम बन जाता है। कवि मनीष जैन ने भी अपने मन की कोमल भावनाओं को पहचान कर उन्हें काव्यात्मक अभिव्यक्ति का रूप दिया है। फिर भी हर अभिव्यक्ति कभी पूरी नहीं होती है, बहुत कुछ कहने पर भी बहुत कुछ अनकहा रह जाता है। इसी भाव के आधार पर है कवि मनीष जैन का काव्य संग्रह ‘‘कुछ कही: कुछ अनकही’’। 

10 मार्च 1975 सागर, मध्य प्रदेश में जन्मे मनीष जैन ने डॉ. हरीसिंह गौर वि.वि. से  बी. फार्मा तथा इंदौर आई.पी.एस. से एम.बी.ए. किया है। वर्तमान में वे ज्ञानवीर विश्वविद्यालय, सागर के कुलसचिव के पद पर कार्य कर रहे हैं। प्रस्तावना में मनीष जैन ने लिखा है कि “मैंने अपने गुजरे कल से आज तक के सफर में जो देखा, सुना, महसूस किया, ख्वाबों खयालों से, चर्चाओं से, किताबों से कुछ जाना कुछ माना और जिसको लिखा मैंने, जैसे सागर में मिलती नदियां हों, नदियों में घुलती श्रद्धा हो, सागर की गहराई में सीप हों, सीपों में छुपे मोती हों, सागर के लहरों का संगीत हो, संगीत में मचलते पैर हों, पैर के निशान बनती रेत हो, रेत के ढलते आशियां हो, आशियां में बसते ख्वाब हों, ख्वाबों के टूटने पर आँसु हों, आँसुओं में धुंधले होते चेहरे हों, चेहरे जो कुछ पराये कुछ अपने हों, अपनों से कुछ कहीं कुछ अनकही बातें हों।” उनके इस उद्गार से उनकी कविताओं की भाव भूमि का स्पष्ट पता चलता है। 
मनीष जैन की कविताओं में जीवन दर्शन है और विचारों की परिपक्वता भी। उनकी कविताओं की प्रकृति बताती है कि वे सप्रयास कुछ नहीं लिखते, कविताएं स्वतः उनके मन से प्रवाहित होती है। यह कविता देखिए- 
शब्द नहीं है पास मेरे 
सागर को सागर कहना है
सूरज को सूरज कहना है 
अवतार को भगवन कहना है
इस जीवन का सार बता दे 
परदा है पर पार बता दे 
उनकी अमृत वाणी को 
प्यास सभी की कहना है
आशीष ही जिनकी दौलत है उनकी 
कल्याण करे जो जग का
उनके चरण कमल को 
जग का साहिल कहना है
दिल की करनी को जो बदल दे
आँखों की तस्वीर बदल दे 
ऐसी गीता को भाग्य विधाता कहना है।

कवि मनीष जैन अपनी कुछ कविताओं में नास्टैल्जिक हो उठते हैं और स्वयं को लक्षित कर के स्वयं से ही प्रश्न करते हैं। जैसे यह कविता है-
मैं अकेला ही खड़ा था जंग के मैदान में 
मेरी लड़ाई खुद से थी 
जंग के मैदान में मैं क्या हूँ एक प्रश्न है
मुझसे क्या चाहते हैं बड़ा प्रश्न है
मैं जो हूँ प्रश्न ही नहीं है
हो रहे हैं प्रश्न के प्रहार मुझ पर
जंग के मैदान में
पहचान खुद की खो चुकी है
आँख कई बार रो चुकी है
आडंबर का अंबर सर्वव्याप्त है
यथार्थ की धरा लुप्त हो चुकी है
जंग के मैदान में
तुम्हारे अंदर की लौ अब बुझ चुकी है
जाने क्या वजह है कि
जलने की चाह भी रूक चुकी है जंग के ।

वस्तुतः स्वयं से जंग तभी थमती है जब व्यक्ति स्वयं को पहचान लेता है, पूरी तरह से नहीं फिर भी आंशिक पहचान का हो जाना भी स्वयं को पहचानने से कम नहीं होता है। कवि मनीष जैन जीवन के यथार्थ को स्वीकार कर लेने का आग्रह करते हैं। यूं भी सत्य को स्वीकार कर लेने से बड़ी और कोई स्वीकार्यता नहीं होती है। जब स्वयं की पहचान हो जाती है तो भावनाएं भी किसी ग़ज़ल की अभिव्यक्ति सी संवेदनात्मक हो जाती हैं-
सच तो सच है 
पर आज सच को भी सहारा चाहिए 
आइना तुम्हे तुमसा ही दिखाएगा 
कभी खुद को औरों में भी ढूँढ़ना चाहिए 
बुढ़ापे की झुर्रियों में है छुपे कई साल देखो 
एक सवाल के तुम्हें बोलो कितने जवाब चाहिए 
किसी की यादों का झोंका गर 
आँखो में आँसू ला दे 
कागज को रूमाल बनाकर 
गजल कोई लिख देना चाहिए।

मनीष जैन ने एक ऐसे विषय को अपनी कविता का विषय बनाया है जिस पर चिंतन किया जाना आवश्यक है। यह विषय है आत्मघात अथवा आत्महत्या। कोई इंसान किन मानसिक परिस्थितियों में पड़ का आत्मघाती कदम उठाता है इसे समझने का प्रयास प्रायः कम ही किया जाता है। लोग परिणाम देखते हैं और निष्कर्ष गढ़ने लगते हैं। किन्तु मनीष जैन उस तह को टटोलते हैं जहां किसी भी प्रकार की प्रबल विवशता आत्मघात के लिए उकसाती है-
कितना मजबूर वो इंसा होगा 
खुद को मारने को जो मजबूर होगा 
यूँ ही नहीं रूठ जाता किसी से कोई
दरम्याँ उनके कोई मसला जरूर होगा
जिसका हुनर ही उसका अभिशाप बन गया 
वो हाथ कटा ताज का मजदूर होगा 
बिछड़ते वक्त उसकी आँख में आँसू नहीं थे 
हर वादे की तरह यह वादा भी उसने निभाया होगा 
खुशियाँ जिंदगी में है मृग तृष्णा की तरह
हर नये कदम के साथ लक्ष्य और दूर होगा 

संग्रह में दार्शनिक तीव्रता की कविताएं ही नहीं वरन छायावादी भाव की कविताएं भी हैं जैसे यह कविता देखिए- 
आज रात चांद सोया नहीं 
जागते-जागते सुबह हो गई 
ना जाने उसे किसका था इंतजार 
इसी इंतजार में सुबह हो गई 

मनीष जैन का यह प्रथम काव्य संग्रह है जो कवि में मौजूद अपार संभावनाओं की ओर स्पष्ट संकेत करता है। संग्रह की कविताओं में शिल्पगत शिथिलता अथवा कच्चापन अवश्य है किन्तु भावनाओं की प्रखरता ने उन्हें परिपक्वता प्रदान किया है जिससे सभी कविताएं अच्छी बन पड़ी हैं। ‘‘कुछ कही: कुछ अनकही’’ काव्य संग्रह में छोटी-बड़ी कुल 50 कविताएं हैं। शिल्प की दृष्टि से बेशक ये कविताएं अनगढ़ प्रतीत हो सकती हैं किंतु इनमें शब्दों का सुघड़ संयोजन एवं भावों का स्पष्ट प्रस्तुतिकरण है। जैसाकि आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने कहा है कि ‘‘काव्य भावना प्रधान होता है अतः कला पक्ष का तीव्र आग्रह कभी-कभी शिथिल भी हो सकता है।’’ बस, अनेक स्थानों पर प्रूफ का दोष खटकता है। फिर भी इसमें कोई संदेह नहीं कि संग्रह की कविताएं पढ़े जाने के बाद देर तक चेतना के परिसर में टहलती हुई अनुभव होती हैं और यही खूबी इन्हें पठनीय बनाती है।  
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(16.09.2025 )
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Saturday, September 13, 2025

टॉपिक एक्सपर्ट | जो हिन्दी बचहे सो बुंदेली सोई बचहे | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | पत्रिका | बुंदेली कॉलम

(पत्रिका | टॉपिक एक्सपर्ट | बुंदेली में)
टॉपिक एक्सपर्ट
जो हिन्दी बचहे सो बुंदेली सोई बचहे
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

     कहनात आए के जो मताई पे संकट होए तो मौसी, बुआ, फुआ सबई पे संकट घिरन लगत हैं। काए से के मताई तो मताई होत आए चाए जैसी दसा में होए। सो, जो मताई खों संकट से ने बचा पाए तो मौसी, बुआ, फुआ खों कां से बचाहे? आप ओरें सोच रये हुइयो के कल हिन्दी को दिवस आए औ  जे आज रिस्तेदारी गिनान लगीं। अब का करो जाए, बातई ऐसी आए। का है के हिन्दी अपनी मताई घांई ठैरी औ बुंदेली सग्गी मौसी। रई अंग्रेजी की, तो बा रई पाउनी, जो रै गई किराएदार बन के। मनो कछू किराएदार ऐसे होत आएं के रैबे आए कछू समै की कै के औ फेर मकान मालिक खों खदेड़ के मकान खों कब्जान लगत हैं। ऐसई अंग्रेजी ने हिन्दी के संगे करो आए। पैले जे अंग्रेजी अंग्रेज ब्यापारियन के संगे पाऊनी बनके आई फेर किराएदार घांई इतेई टिक गई। फेर ऊने ऐसो महौल बनाओ के जो अंग्रेजी जानहे, ऊको लाट साब घांई नौकरी मिलहे औ जो ने जानहे ऊको चपड़ासी से ऊंचो कछू ने मिलहे। जेई ने हिन्दी खों खदेड़ दऔ। बाकी 2020 वारी नई शिक्षा नीति ने तीन भासा को फार्मूला दे के कछू अच्छो करो है।
    बाकी होता का है के अपन ओरें खुदई अंग्रेजी से चिमटे रैत आएं। चाए कर्जा काए ने लेने परै मनो मोड़ा-मोड़ी खों पढ़ाहें सो अंग्रेजी स्कूल में। मनो उते ने पढ़ाओ तो जनम सफल ने हुइए। सो जे खयाल अब छोड़ो चाइए। काए से के हिन्दी पढ़े से बी अच्छी नौकरी मिलत है। औ अपन खों तो जे सोई ध्यान राखने के जो हिन्दी बचहे तो बुंदेली बी बची रैहे ने तो बुंदेली को पूछबे वारे ने बचहें। सो, खाली हिन्दी के मईना में नोंई, पूरे साल भरे हिन्दी पे भरोसा राखो, बुंदेली खों संगे राखो।
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Thank you Patrika 🙏
Thank you Dear Reshu Jain 🙏
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Friday, September 12, 2025

शून्यकाल | वृद्धाश्रम पोषक पीढ़ी नहीं समझ सकती भगीरथ का पितृमोक्ष कर्म | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नयादौर

शून्यकाल

वृद्धाश्रम पोषक पीढ़ी नहीं समझ सकती भगीरथ का पितृमोक्ष कर्म

- डाॅ (सुश्री) शरद सिंह                                                                                 
       संयुक्त परिवार की व्यवस्था बहुत पीछे छूट जा रही है। एकल परिवार में संवेदनाओं एवं समर्पण की कमी साफ दिखाई देने लगी है। यहां तक कि अपने वृद्ध माता-पिता के लिए वृद्धाश्रम तलाशे जाते हैं। भले ही वे वृद्धाश्रम फाइव स्टार सुविधाओं वाले क्यों न हों, किंतु रहते तो अपनों से दूर हैं। जहां अपने जैसे होते हैं किंतु अपने नहीं होते। अपने माता-पिता को वृद्धाश्रम के हवाले करने वाली पीढ़ी भगीरथ के पितृमोक्ष कर्म को क्या कभी समझ सकेगी?
 किसी कठिन कार्य को अथक प्रयास करके पूरा करना “भगीरथ प्रयास” कहलाता है। कौन थे भगीरथ? वस्तुतः भगीरथ अयोध्या के इक्ष्वाकु वंशी राजा थे। वे अंशुमान के पौत्र और राजा दिलीप के पुत्र थे। वंशवृक्ष के क्रमानुसार देखें तो सगर के बाद उनके पुत्र अंशुमान राजा हुए, अंशुमान के बाद दिलीप और राजा दिलीप के बाद भगीरथ। 
    राजा सगर ने अश्वमेध यज्ञ किया और इस दौरान उनके घोड़े को ऋषि कपिल ने अपने आश्रम में बांध लिया। सगर के पुत्र अश्व को ढूंढते हुए ऋषि कपिल के आश्रम में पहुंचे और उन लोगों ने आश्रम को अपवित्र कर दिया। तब क्रोधित होकर ऋषि कपिल ने उन सभी को भस्म कर दिया, जिससे उनकी आत्माओं को मोक्ष नहीं मिला और वे भटकने लगीं।
   राजा सगर ने अपने पुत्रों की आत्माओं को मोक्ष दिलाने का प्रयास किया किंतु वह सफल नहीं हुए। राजा सगर के बाद अंशुमान ने भी अपने पिता तथा संबंधियों को मोक्ष दिलाने का प्रयास किया किंतु वह भी असफल रहे। अंशुमान ने इस बात का पता किया की अपने संबंधियों की आत्माओं को किस तरह मोक्ष दिलाया जाए? ऋषियों ने उन्हें बताया की इतनी बड़ी संख्या में आत्माओं को मुक्ति दिलाने के लिए एक बड़ी प्रवाहित जल राशि की आवश्यकता होगी जो आकाश में स्थित गंगा के माध्यम से ही संभव है। किंतु गंगा को पृथ्वी पर कैसे लाया जाए यह जटिल प्रश्न था। इस जटिल प्रश्न का उत्तर ढूंढने के लिए अंशुमान ने अपने पुत्र दिलीप को राज्य-भार सौंपा और स्वयं  तपस्या करने लगे। अंशुमान मैं तपस्या करते हुए अपने प्राण त्याग दिए किंतु उन्हें गंगा को पृथ्वी पर लाने का उपाय नहीं मिला। इसी प्रकार राजा दिलीप भी गंगा को पृथ्वी पर लाने की चिंता करते हुए रोग ग्रस्त हो गए तथा उनका भी प्राणांत हो गया। तब राजा भगीरथ ने अपनी कठिन साधना और घोर तपस्या के बल से उन्होंने पहले ब्रह्मा को प्रसन्न किया और उनसे दो वर मांगे- पहला वर कि  गंगा जल चढ़ाकर वे अपने भस्मीभूत पितरों को स्वर्ग प्राप्त करवा सकें और दूसरा यह कि उनको कुल की सुरक्षा करने वाला पुत्र प्राप्त हो। क्योंकि भागीरथ उसे समय तक निःसंतान थे। ब्रह्मा ने उन्हें दोनों वर दिए।
     भगीरथ यह सोचकर प्रसन्न हुए कि अब वह अपने पूर्वजों को मोक्ष दिल सकेंगे किंतु उन्हें इस बात का अनुमान नहीं था कि गंगा को धरती पर लाना आसान नहीं है। भागीरथ ने गंगा से निवेदन किया कि वे धरती पर उतरें और उनके पूर्वजों की भस्म को अपने जल में समाकर पूर्वजों को मोक्ष प्रदान करें। गंगा ने भागीरथ की प्रार्थना स्वीकार कर ली और वे आकाश से पृथ्वी पर उतरीं। किंतु गंगा का वेग इतना अधिक था की पृथ्वी की ऊपरी सतह गंगा के जल को संभाल नहीं सकी और गंगा अपनी जल राशि सहित धरती में समा गईं।
   प्रथम प्रयास असफल होने पर भगीरथ दुखी तो हुए किंतु उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। एक बार फिर उन्होंने गंगा से प्रार्थना की कि वह पृथ्वी पर पधारें। भागीरथ के निवेदन पर गंगा ने कहा कि वे यदि फिर पृथ्वी पर आएंगी तो पहले की भांति धरती में समझ जाएंगी। अतः उनके बैग को कम करने के लिए कोई उपाय ढूंढें। भगीरथ ने एक बार फिर ब्रह्मा की तपस्या की। इस बार उन्होंने पर के अंगूठे पर खड़े होकर एक वर्ष तक तपस्या की जिससे प्रसन्न होकर ब्रह्मा ने गंगा को रोकने का उपाय बताते हुए कहा कि उन्हें भगवान शिव से सहायता लेनी चाहिए वह अपनी जटाओं में गंगा को धारण करके उन्हें धरती में सामने से रोक सकते हैं। भगीरथ ने इस बार भगवान शिव की तपस्या की और उनसे सहायता करने का वचन मांगा। भगवान शिव ने भगीरथ को आश्वासन दिया कि वह गंगा को अपनी जटाओं में धारण कर लेंगे ताकि वे धरती में ना सम सकें।
    भगीरथ ने एक बार फिर गंगा से प्रार्थना की कि वे शिव की जटाओं से होती हुईं पृथ्वी पर उतरें ताकि उनका वेग काम हो जाए। गंगा ने प्रार्थना स्वीकार कर ली और वह आकाश से उतरकर शिव की जटाओं में जा पहुंचीं। किंतु वे शिव की जटाओं में इस तरह उलझ गई कि उन्हें जटाओं से बाहर निकलने का मार्ग नहीं मिला और वह धरती तक नहीं पहुंच सकीं।
      एक बार फिर असफल होने के बाद भगीरथ ने भगवान शिव की फिर तपस्या की। शिव ने प्रसन्न होकर गंगा को अपनी जटाओं से निकलने का मार्ग देते हुए उन्हें बिंदुसर की ओर छोड़ा। तब गंगा सात धाराओं के रूप में प्रवाहित हुईं। पूर्व दिशा में ह्लादिनी, पावनी और नलिनी,पश्चिम में सुचक्षु, सीता और महानदी सिंधु के रूप में। सातवीं धारा राजा भगीरथ के पीछे-पीछे चलीं और उस स्थान पर पहुंची जहां भगीरथ के पूर्वजों की भस्म बिखरी हुई थी। गंगा ने भस्म को अपनी जल राशि में स्वीकार किया इसके बाद राजा भगीरथ भी  गंगा में स्नान करके पवित्र हुए। 
     फिर गंगा भगीरथ के पीछे-पीछे चलकर  समुद्र तक पहुंच गयीं। इस अथक प्रयास से प्रसन्न होकर ब्रह्मा ने भगीरथ से कहा कि —“हे भगीरथ, जब तक समुद्र रहेगा, तुम्हारे पितर देववत माने जायेंगे तथा गंगा तुम्हारी पुत्री कहलाकर भागीरथी नाम से विख्यात होगी। साथ ही वह तीन धाराओं में प्रवाहित होगी, इसलिए त्रिपथगा कहलायेगी।”
    महाभारत के अनुसार भगीरथ अंशुमान का पौत्र तथा दिलीप का पुत्र था। उसे जब विदित हुआ कि उसके पितरों को अर्थात सगर के साठ हज़ार पुत्रों को सदगति तब मिलेगी जब वे गंगाजल का स्पर्श प्राप्त कर लेंगे। तब भागीरथ ने हिमालय जाकर कठोर तपस्या की। उनकी तपस्या से गंगा प्रसन्न गईं। किन्तु गंगा ने कहा कि वे तो सहर्ष पृथ्वी पर अवतरित हो जाएंगी, पर उनके पानी के वेग को शिव ही थाम सकते हैं, अन्य कोई नहीं। अत: भगीरथ ने पुन: तपस्या प्रारम्भ की। शिव ने प्रसन्न होकर गंगा का वेग थामने की स्वीकृति दे दी। गंगा भूतल पर अवतरित होने से पूर्व हिमालय में शिव की जटाओं पर उतरीं। फिर पृथ्वी पर अवतरित हुई तथा भगीरथ का अनुसरण करते हुए उस सूखे समुद्र तक पहुँचीं, जिसका जल अगस्त्य मुनि ने पी लिया था। उस समुद्र को भरकर गंगा ने पाताल स्थित सगर के साठ हज़ार पुत्रों का उद्धार किया। गंगा स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल का स्पर्श करने के कारण त्रिपथगा कहलायी। गंगा को भगीरथ ने अपनी पुत्री बना लिया। 

अपने पूर्वजों की आत्मा को मोक्ष दिलाने के लिए भगीरथ ने तब तक प्रयास किया जब तक वे सफल नहीं हो गए। उनका अपने पूर्वजों के प्रति इसने और सम्मान का भाव था जिसके कारण वह निरंतर तपस्या करते रहे और उन्होंने अपने पूर्वजों की भटकती आत्मा को मोक्ष दिला कर ही अपने वंशज होने के कर्तव्य की पूर्णता का अनुभव किया।
      भगीरथ के प्रयासों को देखते हुए यह विचार करने की आवश्यकता है की जो पीढ़ी अपने जीवित माता-पिता के प्रति संवेदनहीन होती जा रही है वह अपने पूर्वजों के प्रति भला कैसी निष्ठा रखेगी? बाजारवाद से प्रभावित होकर पितृ मोक्ष के दिखावे वाली कार्यों को पूर्ण करना वह आत्मिक शांति अथवा पुण्य नहीं दिला सकता है जो अपने जीवित माता-पिता की सेवा करने से तथा उन्हें अपने साथ रखने से पुण्य प्राप्त होता है। क्या युवा  पीढ़ी के वे लोग इस बात को समझ सकेंगे जो अपने माता-पिता को बोझ मानने लगते हैं तथा साथ रखने में संकोच करते हैं अथवा उनके लिए अच्छे से अच्छा वृद्धाश्रम ढूंढ कर अपने कर्तव्य को पूर्ण मान लेते हैं। पितृपक्ष में इस बिंदु पर चिंतन करना अत्यंत आवश्यक है ताकि युवा पीढ़ी को अपनी परंपराओं एवं पूर्वजों के प्रति संवेदनशील होने के महत्व को समझाया जा सके।  
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शून्यकाल | वृद्धाश्रम पोषक पीढ़ी नहीं समझ सकती भगीरथ का पितृमोक्ष कर्म | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नयादौर
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Thursday, September 11, 2025

बतकाव बिन्ना की | पितर पूछ रए, सबरे कौव्वा हरें कां गए? | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

   
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बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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बतकाव बिन्ना की
पितर पूछ रए, सबरे कौव्वा हरें कां गए?
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

‘‘काए भौजी, भैयाजी नईं दिखा रए?’’ मैंने भौजी से पूछी।
‘‘बे कारी बरिया लौं गए।’’ भौजी ने बताई।
‘‘कारी बरिया? उते काए खों गए? हमने तो सुनी आए के उते तांत्रिक-मांत्रिक कछू उल्टो-सूदो पूजा-पाठ करत आएं। सो, भैयाजी उते का करबे के लाने गए?’’ मोए जा सुन के अचरज भऔ के भैयाजी कारी बरिया के इते गए आएं? का आए, के ऊको कारी बारिया जे लाने कओ जात आए के उते एक भौत पुरानो बरिया को पेड़ आए। ऊ पेड़ के नैंचे कारी जू की एक मूरत धरी आए। उते मनौती वारी लुगाइयां मनौती को धागा बांधवे जात आएं औ अमावस औ पूरनमासी को उते तांत्रिक हरें कछू स्पेशल पूजा करत आएं। सो अमावस औ पूरनमासी को रात की बेरा ऊ तरफी कोनऊं नईं फटकत। मनो आज तो ऐसो कछू आए नईं औ फेर जे दिन को टेम ठैरो, सो भैयाजी काए के लाने गए हुइएं?
‘‘सो भैयाजी काए के लाने उते गए?’’ मैंने फेर के भौजी से पूछी।
‘‘अरे उनकी ने कओ! बे हमाई कोन सुनत आएं। तुम तो जानत आओ के आजकाल करै दिन मने पितरों के दिन चल रए। अब ईमें कौब्बा खों भोग देनो जरूरी आए। औ कौव्वा हरें दिखात लौं नइयां। हमने तो कई तुमाए भैयाजी से के छत पे बरा औ पुड़ी डार देओ। जो कौव्वा आहें सो बे खा लैहें ने तो कोनऊं औ पंछी खा लैहे। अब तुमई बताओ के जो कौव्वा नईं दिखा रए तो अपन ओंरे का कर सकत आएं। पर तुमाए भैयाजी खों तो जो दिमाक में चढ़ गई सो चढ़ गई। कोनऊं ने उनको बता दओ के उते कारी बरिया पे कौव्वा आत आएं, सो बे बड़ा-पुड़ी ले के कारी बरिया खों चले गए। बाकी हमने उने समझाई रई के आप जा तो रए हो मनो उते बारा बजे के टेम पे ने रुकियो।’’ भौजी बोलीं।
‘‘काए बारा बजे का होत आए?’’ मैंने पूछी।
‘‘ऐसो कओ जात आए के दुफारी के बारा बजे बरिया को भूत उठ बैठत आए। अब रामजाने का सांची औ का झूठी? बाकी तुमें याद हुइए के पर की साल बा हल्के को मोड़ा खेलत-खेलत कारी बरिया के इते पौंच गऔ रऔ औ दुफारी के बारा बजतई सात ऊपे भूत चढ़ गओ। ईके बाद बा छै मईना बीमार रओ। वा तो ऊकी मताई ने उते बालाजी जा के झरवाओ, तब कऊं जा के ऊपे से भूत भागो।’’ भौजी ने कई।
‘‘आप मानत आओ भूत-प्रेत खों?’’ मैंने भौजी से पूछी।
‘‘मानत तो नईयां, बाकी रिस्क को ले? कऊं सई में कोनऊं भूत-वूत भओ तो?’’ भौजी बोलीं।
हम ओरें बतकाव करई रई तीं के इत्ते में भैयाजी हांपत-हांपत घरे लौटे।
‘‘का भओ? कौव्वा मिले?’’ भौजी ने उने देखतई सात पूछी।
‘‘तनक पानी तो पिलाओ पैले। गाला सूको जा रओ। भौतई गरमी आए। ऐसी सड़ी गरमी के का कई जाए!’’ भैयाजी अपने गमछा से अपने मों पे पंखा सो करन लगे। 
‘‘पंखा चल रओ भैयाजी!’’ मैंने भैयाजी खों याद दिलाओ।
‘‘हऔ! बाकी पतो सो नई पर रओ।’’ भैयाजी ऊंसई पंखा झलत से बोले। 
‘‘तनक देर में ठंडो लगहे। अभईं आप बायारे से निंगत आ रए न, जेई से ज्यादा गरमी लग रई हुइए।’’ मैंने भैयाजी खों तनक सहूरी बांधगे को प्रयास करो।
इत्ते में भौजी पानी ले आईं। भैयाजी की दसा ऐसी हती के बे एकई घूंट में पूरो गिलास भर पानी गटक गए। ईके बाद भैयाजी की दसा ठीक भई।
‘‘सो का भओ? कौव्वा मिले?’’ भौजी ने फेर के पूछी।
‘‘कां मिले? उते बरिया तरे ठाड़ें-ठाड़े गोड़े औ दुखन लगे।’’ भैयाजी बोले।
‘‘उते आपई भर पौंचे हते के औ बी कोनऊं रओ?’’ भौजी ने पूछी।
‘‘दो-चार जने औ रए। हम ओरें उते कुल्ल देर ‘कां-कां’ पुकारत ठाड़े रए, बाकी उते कौव्वा तो कौव्वा, कौव्वा की छायारीं लौं ने आई।’’ भैयाजी बोले।
‘‘हमने तो पैलेई कई रई के सुनी-सुनाई पे ने भगत फिरो। अब कौव्वा ने मिल रए तो जे बात अपने पुरखा लौं जानत आएं। बे बुरौ ने मानहें। आप तो हमाई कई मानो औ छत पे धर दओ करे। जो इते से कोनऊं कौव्वा कड़हे तो खा लैहे, ने तो कछू औ पंछी खा लैहे। काए से जब कौव्वाप ने मिलें तो करो का जाए?’’ भौजी ने भौयाजी खों समझाओ।
‘‘भौजी सई कै रईं, भैयाजी! नाएं-मांए भगत फिरबे को मौसम ने आए जे। यां तो पानी गिरत आए ने तो भड़भडावे वारी धूप कढ़ आत आए। ईमें बीमार पड़बे को डर रैत आए।’’ मैंने भैयाजी से कई।
‘‘सो तो सई कै रईं तुम! भारी गरमी आए। इत्तो पानी गिरो मनो ठंडक ने आई।’’ भैयाजी बोले।
‘‘अब तो पितर हरें सोई हेरत हुइएं के सबरे कौव्वां कां बिला गए?’’ भौजी बोलीं।
‘‘का आए भौजी के कौव्वा हरें ऊंचे पेड़न पे अपनो घोसला बनात आएं। अब अपने धनी-धोरी हरों ने मकान औ कालोनी बनाबे के चक्कर में सबरे पेड़े कटा दए। अब कौव्वा कां रएं? कां अपनो घोंसला बनाएं? जेई लाने तो इते कौव्वा नईं दिखात। अबई ओरें सोचो के जोन से ऊको घर छीन लओ जाए तो बो उते काए खों रैहे? बा उते जाहे जिते ऊके बाल-बच्चा पल सकें।’’ मैंने भौजी से कई।
‘‘सई कै रईं बिन्ना! हमें याद ठैरी के हमाए उते मायके में नीम को ऊंचो सो पेड़ रओ, ऊपे कौव्वा को घोंसला रओ। औ हमाई मताई बतात रईं के कोयल सोई अपनो अंडा कौव्वा के घोसला में दे के चली जात आए। कौव्वा ऊको अंडा बी अपनो अंडा समझ के पालत-पोसत रैत आए औ अंडा फूटबे पे कौव्वा के बच्चा तो कां-कां करत आए औ कोयल के बच्चा कूं-कूं करन लगे आएं। तब कौव्वा खों पतो परत के ऊके संगे का धांधली करी गई।’’ भौजी ने कई।
‘‘जे सई आए भौजी। बाकी अप ओरें चाओ तो मोसे पूछ सकत आओ के सबरे कौव्वा कां मिलहें।’’ मैंने भैयाजी औ भौजी दोई से कई।
‘‘कां मिलहें?’’ दोई ने एक संगे पूछी।
‘‘सबरे कौव्वा टीवी चैनल में मिलहें। कछू एंकर के रूप धरे तो कछू डिस्कन वारे पाउना के रूप में। आप ओरन ने देखो हुइए के उते कित्ती कांव-कांव होत आए। इत्ती कांव-कांव तो असली वारे कौव्वा बी नईं करत आएं।’’मैंने हंस के कई।
‘‘जा तुमने सई कई बिन्ना। बरा-पुड़ी के ले हमें कोनऊं टीवी चैनल पे जाओ चाइए रओ।’’ भैया सोई हंसन लगे।
‘‘अबे बी कछू नईं बिगरो! अबे तो करै दिन चलहें। औ भौजी, जो कोनऊं दिनां पुरखां हरें पूछें के सबरे कौव्वा कां हिरा गए सो उने बोल दइयो के बे सबरे टीवी प्रोगराम में बैठे।’’ मैंने भौजी से कई। फेर मैंने कई के, ‘‘ बात असल में जे आए के जे जो सबरे रीत-रिवाज बनाए गए, ले जेई के लाने के अपन ओरें पेड़-पौधा, पसु-पक्छी सबई की परवा करें। सो सबके लाने कोनऊं ने कोनऊं त्योहार बना दए गए। अब अपने ओरन खों कौव्वा खों तो भोग लगाने, मनो कौव्वा खों रैन नई देने, सो कैसे काम चलहे?’’ मैंने कई।
‘‘तुम कछू कओ, अब हम तो जा रए कोनऊं टीवी चैनल वारों के इते। काए से हमें कौव्वा तो जिमानेंई आए।’’ भैयाजी बोले औ हंसन लगे। 
 बाकी बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लौं जुगाली करो जेई की। मनो सोचियो जरूर ई बारे में के कौव्वा के घोंसला के लाने हमने कित्ते पेड़ लगाए? औ संगे जे सोई सोचियो के जबें पितरों के इते पौंचबी तो उनें का जवाब देबी?    
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Wednesday, September 10, 2025

चर्चा प्लस | अंग्रेजी के मोहपाश में बंध कर हिन्दी का भला नहीं हो सकता | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर


चर्चा प्लस


अंग्रेजी के मोहपाश में बंध कर हिन्दी का भला नहीं हो सकता


- डाॅ (सुश्री) शरद सिंह                                                             

सितम्बर आते ही हिन्दी मास, हिन्दी पखवाड़ा और हिन्दी दिवस के प्रति जागरूकत बढ़ जाती है। शेष माह में हिन्दी अंग्रेजी की सेविका की भांति जीती-खाती रहती है। पढ़ने में यह बात जितनी भी बुरी लगे किन्तु सच यही है। हिन्दी के मार्ग में कहीं न कहीं सबसे बड़ा रोड़ा इसकी रोजगार से बढ़ती दूरी की है। इस तथ्य से हम मुंह नहीं मोड़ सकते हैं कि हमारे युवाओं में यहां युवा का अर्थ एक पीढ़ी पहले के युवाओं से भी है, अंग्रेजी पढ़ कर अच्छे रोजगार के अवसर बढ़ जाते हैं जबकि हिन्दी माध्यम से की हुई पढ़ाई कथित ‘स्लम अपाॅच्र्युनिटी’ देती है। इस बुनियादी बाधा को दूर करने के लिए हमें तय करना होगा कि हम पढ़ाई के लिए हिन्दी का कौन-सा स्वरूप रखें जिससे हिन्दी रोजगार पाने के लिए की जाने वाली पढ़ाई का शक्तिशाली माध्यम बन सके।


वर्ष 2025 का हिन्दी मास आरम्भ हुए सप्ताह भर बीत गया है। पहले गणेशोत्सव की धूम और अब पितृपक्ष की व्यस्तता। लगभग हर घर के बच्चे जा रहे हैं अं्रग्रेजी माध्यम स्कूलों में पढ़ने। सो, हिन्दी के प्रति उतनी जागरूकता ही पर्रूाप्त समझी जा रही है जितनी सरकारी आदेश के हिसाब से जरूरी है। मुझे याद आ रही है विगत वर्ष ठीक दस वर्ष पहले 2015, जुलाई की 19 तारीख। मध्यप्रदेश राष्ट्रभाषा प्रचार समिति एवं हिन्दी भवन न्यास के तत्वावधान में भोपाल में पावस व्याख्यानमाला का आयोजन में मनोज श्रीवास्तव ने एक महत्वपूर्ण तथ्य रखा था कि हम बार-बार संयुक्त राष्ट्रसंघ स्वीकृत भाषासूची में हिन्दी को शामिल किए जाने की मांग करते हैं, किन्तु विश्व श्रम संगठन अथवा सार्क संगठन में भी हिन्दी के लिए स्थान क्यों नहीं मांगते हैं? उसी समय विश्वनाथ सचदेव ने इस ओर ध्यान दिलाया कि जहां हम हिन्दी के प्रति अगाध चिन्ता व्यक्त करते नहीं थकते हैं, वहीं अंग्रेजी माध्यम के शासकीय विद्यालय खोल रहे हैं, क्या यह हमारा अपनी भाषा के प्रति दोहरापन नहीं है?
यह अत्यंत व्यावहारिक पक्ष है कि हम अपने दैनिक बोलचाल में खड़ी बोली का प्रयोग करते हैं जो आसानी से सबकी समझ में आ जाती है। यहां तक कि अहिन्दी भाषी भी इसे समझ लेते हैं किन्तु जब हिन्दी के विद्वान तकनीकी अथवा वैज्ञानिक शब्दावली के लिए जिन हिन्दी शब्दों का चयन करते हैं, वे प्रायः संस्कृतनिष्ठ होते हैं। जैसे- ‘चार पैरों वाले’ के स्थान पर ‘चतुष्पादीय’। जब किसी को पांव में ठोकर लगती है तो उससे हम यह नहीं पूछते कि ‘तुम्हारे पद में आघात तो नहीं लगा?’ हम यही पूछते हैं कि ‘तुम्हारे पैर में चोट तो नहीं लगी?’ जिस शब्दावली से विद्यार्थी परिचित होता है, उससे इतर हम उसके सामने इतनी कठिन शब्दावली परोस देते हैं कि वह तुलनात्मक रूप से अंग्रेजी को सरल मान कर उसकी ओर आकर्षित होने लगता है। संदर्भवश एक बात और (व्यक्तिगत राग-द्वेष से परे यह बात कह रही हूं) कि जो संस्कृतनिष्ठ हिन्दी शब्दावली की पैरवी करते हैं वे ही महानुभाव अपने बेटे-बेटियों को ही नहीं वरन् पोते-पोतियों को अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा दिलाने की होड़ में जुटे हुए भारी ‘डोनेशन’ देते दिखाई पड़ते हैं और गर्व से कहते मिलते हैं। कोई विद्यार्थी किस भाषाई माध्यम को शिक्षा के लिए चुनता है (अथवा उसे चुनने के लिए प्रेरित किया जाता है) यह मसला उतना महत्वपूर्ण नहीं है, जितना कि भाषा को ले कर हमारे दोहरे चरित्र का मसला है। हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्ज़ा दिलवाने तथा विश्वस्तर पर हिन्दी को प्रतिष्ठित कराने की लड़ाई आज आरम्भ नहीं हुई है, यह तो पिछली सदी के पूर्वार्द्ध से छिड़ी हुई है।

हिन्दी के पक्ष में संघर्ष

पं. मदन मोहन मालवीय ने हिन्दी को प्रतिष्ठा दिलाने के लिए सतत् प्रयास किया। न्यायालय में हिन्दी को स्थापित कराया। महामना पहले ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने हिंदी भाषा के उत्थान एवं उसे राष्ट्र भाषा का दर्जा दिलाने के लिए इस आन्दोलन को एक राष्ट्र व्यापी आन्दोलन का स्वरुप दे दिया और हिंदी भाषा के विकास के लिए धन और लोगो को जोड़ना आरम्भ किया। आखिरकार 20 अगस्त सन् 1896 में राजस्व परिषद् ने एक प्रस्ताव में सम्मन आदि की भाषा में हिंदी को तो मान लिया पर इसे व्यवस्था के रूप में क्रियान्वित नहीं किया। लेकिन 15 अगस्त सन् 1900 को शासन ने हिंदी भाषा को उर्दू के साथ अतिरिक्त भाषा के रूप में प्रयोग में लाने पर मुहर लगा दी।
बीसवीं सदी में थियोसोफिकल सोसाइटी की एनी बेसेंट ने कहा था, ‘भारत के सभी स्कूलों में हिंदी की शिक्षा अनिवार्य होनी चाहिए।’
पुरुषोत्तम दास टंडन ने महामना के आदर्शों के उत्तराधिकारी के रूप में हिंदी को निज भाषा बनाने तथा उसे राष्ट्र भाषा का गौरव दिलाने का प्रयास आरम्भ कर दिया था। सन् 1918 ई. में हिंदी साहित्य सम्मेलन के इन्दौर अधिवेशन में सभापति पद से भाषण देते हुए महात्मा गांधी ने हिन्दी को राष्ट्रभाषा के योग्य ठहराते हुए कहा था कि, ‘मेरा यह मत है कि हिंदी ही हिन्दुस्तान की राष्ट्रभाषा हो सकती है और होनी चाहिए।’ इसी अधिवेशन में यह प्रस्ताव पारित किया गया कि प्रतिवर्ष 6 दक्षिण भारतीय युवक हिंदी सीखने के लिए प्रयाग भेजें जाएं और 6 उत्तर भारतीय युवक को दक्षिण भाषाएं सीखने तथा हिंदी का प्रसार करने के लिए दक्षिण भारत में भेजा जाएं। इन्दौर सम्मेलन के बाद उन्होंने हिंदीसेवा को राष्ट्रीय व्रत बना दिया। दक्षिण में प्रथम हिंदी प्रचारक के रूप में महात्मा गांधी ने अपने सबसे छोटे पुत्र देवदास गांधी को दक्षिण में चेन्नई भेजा। महात्मा गांधी की प्रेरणा से सन् 1927 में मद्रास में तथा सन् 1936 में वर्धा में राष्ट्रभाषा प्रचार सभाएं स्थापित की गईं।
अटल बिहारी वाजपेयी ने संयुक्त राष्ट्रसंघ के अधिवेशन में हिन्दी में भाषण दिया था। वे चाहते रहे कि हिन्दी को राष्ट्रभाषा होने का सम्मान मिले। इसीलिए जो हिन्दी के प्रति अनिच्छा प्रकट करते थे उनके लिए अटल बिहारी का कहना था कि ‘‘क्या किसी भाषा को काम में लाए बिना, क्या भाषा का उपयोग किए बिना, भाषा का विकास किया जा सकता है? क्या किसी को पानी में उतारे बिना तैरना सिखाया जा सकता है?’’
क्या हम आज महामना मदनमोहन मालवीय और अटल बिहारी वाजपेयी के उद्गारों एवं प्रयासों को अनदेखा तो नहीं कर रहे हैं? वस्तुतः ‘राष्ट्रभाषा’ शब्द प्रयोगात्मक, व्यावहारिक व जनमान्यता प्राप्त शब्द है। राष्ट्रभाषा सामाजिक, सांस्कृतिक स्तर पर देश को जोड़ने का काम करती है अर्थात् राष्ट्रभाषा की प्राथमिक दायित्व देश में विभिन्न समुदायों के बीच भावनात्मक एकता स्थापित करना है। राष्ट्रभाषा का प्रयोग क्षेत्र विस्तृत और देशव्यापी होता है। राष्ट्रभाषा सारे देश की सम्पर्कभाषा होती है। इसका व्यापक जनाधार होता है। राष्ट्रभाषा का स्वरूप लचीला होता है और इसे जनता के अनुरूप किसी रूप में ढाला जा सकता है।
सम्मेलनों में सिमटी हिन्दी चिन्ता

पहला विश्व हिन्दी सम्मेलन 10 जनवरी से 14 जनवरी 1975 तक नागपुर में आयोजित किया गया था। सम्मेलन का आयोजन राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा के तत्वावधान में हुआ। सम्मेलन से सम्बन्धित राष्ट्रीय आयोजन समिति के अध्यक्ष महामहिम उपराष्ट्रपति बी. डी. जत्ती थे। सम्मेलन के मुख्य अतिथि थे माॅरीशस के प्रधानमंत्राी शिवसागर रामगुलाम। सम्मेलन में तीन महत्वपूर्ण प्रस्ताव पारित किए गए थे- 1.संयुक्त राष्ट्र संघ में हिन्दी को आधिकारिक भाषा के रूप में स्थान दिया जाए 2. वर्धा में विश्व हिन्दी विद्यापीठ की स्थापना हो तथा 3. विश्व हिन्दी सम्मेलनों को स्थायित्व प्रदान करने के लिये अत्यन्त विचारपूर्वक एक योजना बनायी जाए।
भोपाल में आयोजित विश्व हिन्दी सम्मेलन इस क्रम में दसवां सम्मेलन था। सन् 1975 से 2015 तक प्रत्येक विश्व हिन्दी सम्मेलन में हिन्दी के प्रति वैश्विक चिन्ताएं व्यक्त की जाती रहीं, हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए योजनाएं बनती रहीं किन्तु  यदि हम अंग्रेजी के प्रति अपनी आस्था और समर्पण को इसी तरह बनाए रहेंगे, एक ओर विश्व हिन्दी सम्मेलन जैसे महत्वांकांक्षी आयोजन करेंगे और दूसरी ओर ठीक उसी समय अंग्रेजी माध्यम के सरकारी विद्यालय खोलंेगे तो हमारे हिन्दी के प्रति आग्रह को विश्व किस दृष्टि से ग्रहण करेगा?
हिन्दी के प्रति हमारी कथनी और करनी में एका होना चाहिए। हिन्दी समाचारपत्र अपनी व्यवसायिकता को महत्व देते हुए अंग्रेजी के शीर्षक छापते हैं जबकि एक भी अंग्रेजी समाचारपत्र ऐसा नहीं मिलेगा जिसमें हिन्दी लिपि में अथवा हिन्दी के शब्दों को शीर्षक के रूप में प्रयोग में लाया जा रहा हो। ‘‘सैलेब्स’’ हिन्दी के समाचारपत्र में मिल जाएगा लेकिन अंग्रेजी के समाचारपत्र में ‘‘व्यक्तित्व’’ अथवा ऐसा ही कोई और शब्द शीर्षक में देखने को भी नहीं मिलेगा।

हिन्दी को रोजगार से जोड़ना होगा

विश्व में हिन्दी का गौरव तभी तो स्थापित हो सकेगा जब हम अपने देश में हिन्दी को उचित मान, सम्मान और स्थान प्रदान कर दें। हिन्दी के मार्ग में कहीं न कहीं सबसे बड़ा रोड़ा इसकी रोजगार से बढ़ती दूरी की है। इस तथ्य से हम मुंह नहीं मोड़ सकते हैं कि हमारे युवाओं में यहां युवा का अर्थ एक पीढ़ी पहले के युवाओं से भी है, अंग्रेजी पढ़ कर अच्छे रोजगार के अवसर बढ़ जाते हैं जबकि हिन्दी माध्यम से की हुई पढ़ाई कथित ‘स्लम अपाॅच्र्युनिटी’ देती है। इस बुनियादी बाधा को दूर करने के लिए हमें तय करना होगा कि हम पढ़ाई के लिए हिन्दी का कौन-सा स्वरूप रखें जिससे हिन्दी रोजगार पाने के लिए की जाने वाली पढ़ाई का शक्तिशाली माध्यम बन सके। दो में से एक मार्ग तो चुनना ही होगा- या तो संस्कृतनिष्ठ हिन्दी को विभिन्न विषयों का माध्यम बना कर युवाओं को उससे भयभीत कर के दूर करते जाएं या फिर हिन्दी के लचीलेपन का सदुपयोग करते हुए उसे रोजगार की भाषा के रूप में चलन में ला कर युवाओं के मानस से जोड़ दें। यूं भी भाषा के साहित्यिक स्वरूप से जोड़ने का काम साहित्य का होता है, उसे बिना किसी संशय के साहित्य के लिए ही छोड़ दिया जाए। आखिर हिन्दी को देश में और विदेश में स्थापित करने के लिए बीच का रास्ता ही तो चाहिए जो हिन्दी को रोजगारोन्मुख बनाने के साथ उसके लचीलेपन को उसकी कालजयिता में बदल दे। त्रिभाषी फार्मूला इस दिशा में एक अच्छी पहल है किन्तु इसके परिणाम भी उतनी तीव्रता से सामने नहीं आ रहे हैं जितनी तीव्रता से आना चाहिए। जब तक हम अंग्रेजी के मोह से बंधे रहेंगे तब तक हिन्दी क्या, कोई भी भारतीय भाषा पूरा सम्मान और विश्वास नहीं पा सकती है। 
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Tuesday, September 9, 2025

पुस्तक समीक्षा | पर्यावरण और जीवन संरक्षण के अंतर्संबंधों को समझाती बेहतरीन पुस्तक | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

'आचरण' में प्रकाशित पुस्तक समीक्षा -
पर्यावरण और जीवन संरक्षण के अंतर्संबंधों को समझाती बेहतरीन पुस्तक
- समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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पुस्तक   - पर्यावरण और जीवन संरक्षण 
लेखक   - आर. सी. चौकसे
प्रकाशक  - अमन प्रकाशन, डॉ. पन्नालाल साहित्याचार्य मार्ग जवाहरगंज वार्ड, सागर (म.प्र.) 470002
मूल्य      - 300/
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    लेखक रमेश चंद्र चौकसे सहायक वन संरक्षक के पद से सेवानिवृत हुए किंतु उन्होंने अपने सेवाकाल के दौरान प्रकृति से जो तादात्म्य स्थापित किया वह सेवानिवृत्ति के बाद भी बना रहा इसीलिए उन्होंने पर्यावरण पर केंद्रित पुस्तक लिखने का विचार बनाया जिसके परिणाम स्वरुप “पर्यावरण और जीवन संरक्षण” पुस्तक प्रकाशित हुई। इस पुस्तक की अकादमिक मूल्यवत्ता के साथ-साथ सामान्य पाठकों के लिए भी पर्याप्त उपयोगिता है।
इस समय पर्यावरण हमारी सबसे बड़ी चिंता का विषय है क्योंकि पर्यावरण में उत्पन्न होते जा रहे हैं असंतुलन के कारण जलवायु पर भी गहरा प्रभाव पड़ रहा है। पर्यावरण परिवर्तन के साथ जलवायु परिवर्तन भी तेजी से हो रहा है जिसके कारण मौसमों में भी अनियमित आ गई है। प्राकृतिक रूप से होने वाली जलवायु तथा अन्य खनिज तत्वों की यथोचित वितरण प्रणाली प्रभावित हुई है जिसके कारण जिन स्थानों पर कभी बाढ़ नहीं आती थी तथा कम वृष्टि का लगभग अकाल जैसा संकट बना रहता था वहां बाढ़ आने लगी है और जहां बाढ़ आई थी वह धीरे-धीरे सूखे का संकट उत्पन्न होने लगा है यह प्राकृतिक बदलाव हमें विवश करता है कि हम पर्यावरण की स्थिति पर ध्यान दें उसे असंतुलित होने से बचाए और इसके लिए आवश्यक है कि हम पर्यावरण को समझे कि वह हमारे लिए क्यों उपयोगी है और हम उसे कैसे बचा सकते हैं कैसे संरक्षित कर सकते हैं लेखक आरसी चौकसे ने पर्यावरण पर समुचित दृष्टि डाली है। उन्होंने अपनी पुस्तक में पर्यावरण के बारे में विस्तार से जानकारी दी है कि पर्यावरण क्या है उसकी क्या परिभाषाएं हैं पर्यावरण का क्या महत्व है तथा प्रकृति एवं मानव में परस्पर क्या संबंध है और किस तरह का संबंध बना रहना चाहिए।
जैसा कि डॉ. सुजाता मिश्र ने पुस्तक की संपादकीय लिखते हुए लेख किया है कि “पुस्तक में पर्यावरण और जीवन संरक्षण के विभिन्न पहलुओं को समग्र दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया गया है। यह न केवल वैज्ञानिक तथ्यों, आंकड़ों और अनुसंधानों पर आधारित है, बल्कि इसमें लेखक के व्यक्तिगत अनुभवों और वन विभाग में उनके कार्यकाल के दौरान प्राप्त अन्तर्दृष्टियों का भी समावेश है। यह पुस्तक छात्रों, शिक्षकों, नीति-निर्मिताओं और पर्यावरण प्रेमियों के लिए एक मूल्यवान माध्यम है, जो उन्हें पर्यावरण चुनौतियों को समझने और उनके समाधान के लिए कार्य करने की प्रेरणा देती है। लेखक के विचार पर्यावरण संरक्षण के प्रति एक समग्र दृष्टिकोण को दर्शाते हैं। उनका मानना है कि पर्यावरण संरक्षण केवल सरकारी नीतियों या वैज्ञानिक हस्तक्षेप तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक सामुदायिक प्रयास है, जिसमें प्रत्येक व्यक्ति की भूमिका महत्वपूर्ण है। उनकी यह सोच इस पुस्तक के प्रत्येक अध्याय में स्पष्ट रूप से झलकती है।” 
इस पुस्तक की संपादक डॉ. सुजाता मिश्र ने आगे लिखा है कि ‘‘ सम्पादन के दौरान, मैंने लेखक के साथ गहन विचार-विमर्श किया ताकि प्रत्येक अध्याय में शामिल जानकारी तथ्यात्मक रूप से सटीक और प्रासंगिक हो। कुछ अध्यायों में, हमने स्थानीय उदाहरणों और केस स्टडीज को शामिल करने पर विशेष ध्यान दिया ताकि पाठक भारतीय परिप्रेक्ष्य में पर्यावरणीय मुद्दों को बेहतर ढंग से समझ सकें। इसके अलावा, मैंने यह भी सुनिश्चित किया कि पुस्तक का प्रवाह ऐसा हो जो पाठकों को शुरू से अन्त तक बाँधे रखे । इस पुस्तक को सम्पादित करते समय, मुझे चौकसे जी की पर्यावरण के प्रति गहरी सम्वेदनशीलता और उनके विचारों की स्पष्टता ने गहरा प्रभावित किया। उनके अनुभवों को शब्दों में पिरोना और उन्हें एक सुसंगठित रूप देना मेरे लिए एक रचनात्मक और बौद्धधिक यात्रा थी। मैं आशा करती हूँ कि मेरे सम्पादन ने इस पुस्तक को और अधिक प्रभावशाली और पठनीय बनाने में योगदान दिया है।’’
लेखक ने संपूर्ण कलेवर को दो भागों में विभक्त किया है। इनमें से प्रथम भाग के अंतर्गत पांच इकाइयां है तथा दूसरे भाग के अंतर्गत तीन इकाइयां हैं। जैसे, प्रथम भाग की प्रथम इकाई में पर्यावरण प्रकृति एवं मानव संबंध - पारिस्थितिकी एवं जीवन पोषण तंत्र, पर्यावरण की परिभाषाएं, पर्यावरण का महत्व प्रकृति एवं मानव संबंध धर्म व संस्कृति का पर्यावरण से संबंध है पारिस्थितिकी एवं जीवन पोषण तंत्र तथा पर्यावरण एवं जागरूकता चेतन की आवश्यकता विषय सहेजे गए हैं।
 प्रथम भाग की दूसरी इकाई में लेखक ने पर्यावरण प्रदूषण वृक्षारोपण वायुमंडल एवं ओजोन परत एवं जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण की परिभाषा, ग्रामीण प्रदूषण औद्योगिक प्रदूषण तथा निदान, वायुमंडल ओजोन परत ग्रीनहाउस गैस एवं ग्लोबल वार्मिंग वायु प्रदूषण के रोकथाम के उपाय जलवायु प्रदूषण कारण दुष्प्रभाव एवं उपाय के साथ ही वृक्षारोपण द्वारा मृदा प्रदूषण धूल प्रदूषण एवं अशुद्ध जल शुद्धीकरण हेतु हरित पट्टी 100 मीटर में तैयार कर विभिन्न प्रजाति के पौधे लगाकर वृक्षारोपण किया जाने के महत्व को भी विस्तार से समझाया है। इसी इकाई में ध्वनि प्रदूषण के कारण एवं परिभाषा भू चरण शहरी प्रदूषण एवं नगरीय क्षेत्रों में बढ़ता प्रदूषण एवं प्रभाव भूरे बादल की काली छाया, जलवायु परिवर्तन एक समस्या जैसे मुद्दों को विमर्श के लिए चुना है।
 प्रथम भाग की तीसरी इकाई में प्राकृतिक संसाधन और संरक्षण, ऊर्जा के संसाधन एवं जैव विविधता, प्राकृतिक संसाधन के संरक्षण में मनुष्य की भूमिका, जैव विविधता, ऊर्जा के संसाधन खाद्य आहार संसाधन, ऊर्जा के संसाधन, खाद्य आहार संसाधन तथा विश्व खाद्य समस्या पर दृष्टिपात किया है।
प्रथम भाग की चैथी इकाई में प्राकृतिक आपदा एवं प्रबंधन, प्राकृतिक प्रकोप एवं आपदा प्रबंधन, बाढ़ आपदा, भूकंप आपदा, चक्रवात आपदा, भूस्खलन आपदा पर ध्यान केंद्रित किया है।  प्रथम भाग की पांचवीं इकाई में पर्यावरण संरक्षण कानून, वन्य प्राणी संरक्षण अधिनियम, केंद्र सरकार की सामान्य शक्तियां धारा 3 से धारा 9 तक, पर्यावरण नियंत्रण की धाराएं 10 से धारा 14 तक पर्यावरण अप संघा संबंधी धाराएं 15 से 17 तक अधिनियम 1986 राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के कर्तव्य अधिनियम 1974 जल प्रदूषण कानून नियंत्रण एवं निवारण अधिनियम 1974 वन्य प्राणी संरक्षण अधिनियम 1972 एवं वन संरक्षण अधिनियम 1988 कुछ वन्य प्राणी एवं पक्षियों के नाम चित्र सहित भी इस खंड में दिए गए हैं अधिनियम की धारा 9 की सूची आदि का विवरण भी इस इकाई में मौजूद है।
दूसरे भाग की प्रथम इकाई में राष्ट्रीय उद्यान अभ्यारण एवं अपशिष्ट प्रबंधन भारत में राष्ट्रीय उद्यान एवं अभ्यारण भारत में वन्य जीव अभ्यारण वनों की कटाई के प्रमुख कारण आर्थिक मजबूती प्राकृतिक संसाधनों पर भी आधारित है जैसे विषय उठाए गए हैं। इसी इकाई में औद्योगिक एवं शहरी क्षेत्र में प्लास्टिक कचरा का निष्पादन तूफान एवं आज की घटनाएं भारत में परली से संबंधित घटनाएं चीन और जापान द्वारा परली नहीं जलाते उसका उपयोग करते हैं इस बात की जानकारी तथा भारत बन सकता है ग्रीन हाइड्रोजन का एक्सपोर्ट हब जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा की गई है।

दूसरे भाग की दूसरी इकाई में जलवायु परिवर्तन एवं ग्लोबल वार्मिंग एवं प्रभाव नासा की सेटेलाइट रिपोर्ट जिसमें भारत में पराली जलाने से सेहत के खतरे के बारे में बताया गया है अमेरिका में ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन पर आईआईटी बॉम्बे के प्रोफेसर चेतन सिंह सोलंकी द्वारा मूल्यांकन भविष्य और जलवायु को सुरक्षित बनाने के लिए 10 हस्तियों का प्रयास, बूंद बूंद पानी को तरस सकते हैं हिंदू को हिमालय क्षेत्र, दुनिया पर युद्ध कितने भरी पर्यावरण पर बड़े देशों की छुट्टी उचित नहीं जलवायु परिवर्तन पर खतरा पर्यावरणीय घटनाओं को कम करने के उपाय धरती के गर्म होने से सूखा और जंगलों की आग, लॉस एंजेलिस आग की त्रासदी। इन विषयों पूरी गंभीरता से प्रस्तुत किया गया है।
दूसरे भाग की तीसरी इकाई में भारत एवं विश्व में पर्यावरण एवं जीवन संरक्षण से संबंधित किया जा रहे कार्य एवं सापेक्ष मूल्यांकन प्रस्तुत किया गया है साथ ही भारतवर्ष एवं राज्यों में किया जा रहे कार्य, ग्रीन क्रांति, सौर ऊर्जा, सोलर पैनल, पवन ऊर्जा एवं भूत आप ऊर्जा से बिजली उत्पन्न करना, जीवाश्म ऊर्जा एवं गैर जीवाश्म ऊर्जा एवं ग्रीन हाइड्रोजन गैस की भारत एवं विश्व के अन्य देशों में वर्तमान स्थिति भी बताई गई है प्रदूषण से हाफ रही अर्थव्यवस्था ग्लोबल वार्मिंग का 167 का खतरा एवं जियोथर्मल से देश का अनूठा टर्मिनल जैसे विषय इस इकाई में अपना विशेष महत्व रखते हैं इनके अतिरिक्त परिभाषा शब्दकोश तथा कुछ अन्य जानकारियां भी पुस्तक में समाहित की गई है।
पुस्तक के आरंभ में पुस्तक की कलेवर पर टिप्पणी करते हुए डॉ सत्यम वर्मा ने लिखा है कि “पर्यावरण विज्ञान जैसे महत्वपूर्ण और जटिल विषय को आम जनता और विद्यार्थियों के लिए सरल भाषा में प्रस्तुत करना अपने आप में एक चुनौतीपूर्ण कार्य होता है, और इस दिशा में सेवानिवृत्त वन अधिकारी श्री आर.सी. चौकसे जी का यह प्रयास अत्यन्त सराहनीय है। उनकी पुस्तक ष्पर्यावरण प्रदूषण और संरक्षणष् एक ऐसी रचना है, जो पर्यावरणीय ज्ञान को व्यापक जनसमूह तक पहुँचाने में सहायक सिद्ध होती है।”
स्वयं लेखक आरसी चौकसे ने अपनी प्रस्तावना में पुस्तक को लिखे जाने के संबंध में जो आशा व्यक्त की है वह महत्वपूर्ण है वे लिखते हैं-”आशा हैं पर्यावरण एवं प्रदूषण से संबंधित यह पुस्तक जन चेतना हेतु अच्छे परिणाम देगी।”
पुस्तक लेखन के समय 82 वर्ष की आयु पूर्ण कर चुके लेखक रमेश चंद्र चौकसे द्वारा इस कामना के साथ यह पुस्तक लिखी जाना कि पृथ्वी सुरक्षित रहे, पर्यावरण संतुलित रहे तथा जीवन संरक्षित हो बहुत महत्व रखता है। यह पुस्तक अपने आप में पर्यावरण पर संपूर्ण चर्चा करने वाली तथा पर्यावरण और जीवन संरक्षण के अंतर संबंध को समझने वाली एक बेहतरीन पुस्तक है जो न केवल विद्यार्थियों के लिए अपितु प्रत्येक व्यक्ति के लिए आवश्यक है क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति को पर्यावरण में हो रहे परिवर्तन उसके कारण एवं दुष्प्रभाव तथा पर्यावरण के संपूर्ण परिवेश को जानना एवं समझना आवश्यक है। चूंकि मैं स्वयं पर्यावरण संरक्षण एवं जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को रोकने के मुहिम से जुड़ी हूं अतः इस पुस्तक की अर्थवत्ता का दावे के साथ समर्थन कर सकती हूं। पुस्तक निश्चित रूप से पठनीय एवं संग्रहणीय है तथा नागरिकों में पर्यावरण के प्रति जागरूकता लाने में सहायक है।
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(09.09.2025 )
#पुस्तकसमीक्षा #डॉसुश्रीशरदसिंह  #bookreview #bookreviewer  #आचरण  #DrMissSharadSingh

Monday, September 8, 2025

मध्य प्रदेश हिंदी साहित्य सम्मेलन के कहानी पाठ में डॉ (सुश्री )शरद सिंह द्वारा अध्यक्षता

कल दोपहर मध्य प्रदेश हिंदी साहित्य सम्मेलन की सागर इकाई के द्वारा "सागर के कथाकार" कार्यक्रम का आयोजन किया गया। मुझे इस आयोजन की अध्यक्षता करने का सुअवसर मिला, जिसके लिए मैं आभारी हूं मध्य प्रदेश हिंदी साहित्य सम्मेलन तथा भाई पलाश सुरजन जी की, साथ ही प्रदेश कार्यकारिणी सदस्य महेश प्रकाश श्रीवास्तव जी, सागर इकाई के अध्यक्ष भाई आशीष ज्योतिषी जी एवं सागर इकाई के सचिन भाई पुष्पेंद्र दुबे जी की 🌹🙏🌹

🚩 अपना अध्यक्षीय श्री उद्बोधन देते हुए मैंने कहा कि कथाकारो द्वारा पढ़ी गई कहानियों में स्त्री विमर्श का गाढ़ा रंग तथा समाज विमर्श, वृद्ध विमर्श आदि कई शेड्स देखने को मिले। कहानी वाचिक परंपरा की विधा है। यूं कहानी कही जाती है लिखी नहीं जाती। किंतु कहानी को सुनाने की जो वाचिक परंपरा रही उसमें एक वाचक से दूसरे वाचक तक कहानी के प्रवाह में मूल कथानक बदलता चला जाता था और वह कहानी अपना मूल स्वरूप खो कर लोक कथा में परिवर्तित हो जाती थी। मूल स्वरूप को सुरक्षित रखने के लिए कहानी को लिपिबद्ध किया जाने की आवश्यकता महसूस की गई होगी और तभी से कहानी को लिखने का चलन आरंभ हुआ होगा। 

       एक बात और जो मैं व्यक्तिगत रूप से मानती हूं की कथानक कहानीकार को स्वयं चुनता है कहानीकार कथानक को नहीं और कथानक ही अपनी लंबाई-चौड़ाई निर्धारित करता है, जिससे कोई कथानक लघु कथा में सिमट जाता है तो कोई उपन्यास का आकार ले लेता है।
        सागर में कथा लेखन की समृद्ध परंपरा रही है शिवकुमार श्रीवास्तव, रमेश दत्त दुबे, ज्वाला प्रसाद ज्योतिषी, ज़हूर बख़्श, अनिलचंद्र मैत्रा और अकिंचन जी आदि कथाकारों की कथाएं तत्कालीन सागर  के परिवेश से परिचित कराती हैं। इन्हें पढ़ा जाना चाहिए।"
    होटल सुकून के सभागार में आयोजित इस कार्यक्रम का कुशल संचालन किया भाई पुष्पेंद्र दुबे कुमार सागर ने, स्वागत उद्बोधन दिया भाई आशीष ज्योतिषी जी ने तथा आभार प्रदर्शन किया भाई महेश प्रकाश श्रीवास्तव जी ने।
(07.09.2025)

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