Wednesday, November 12, 2025

चर्चा प्लस | कहां है रीजनल इंडस्ट्रियल कॉन्क्लेव का फालोअप? | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर


चर्चा प्लस | कहां है रीजनल इंडस्ट्रियल कॉन्क्लेव का फालोअप? | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर 


चर्चा प्लस
कहां है रीजनल इंडस्ट्रियल कॉन्क्लेव का फालोअप?
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
    सितम्बर 2024 में सागर में रीजनल इंडस्ट्रियल कॉन्क्लेव हुआ था जिसमें निवेशकों ने कई महत्वपूर्ण घोषणाएं की थीं। तब से अब तक किसी निवेशक ने अपने वादे के अनुसार रुचि ली या नहीं, आमजनता को इसकी कोई जानकारी नहीं है। जबकि यह प्रशासन की जिम्मेदारी है कि वह रीजनलझं इंडस्ट्रियल कॉन्क्लेव के फालोअप से आमजन को अवगत कराता रहे। इससे लोगों में भविष्य के प्रति उम्मींद बंधती है। जो पलायन करने के बारे में विचार कर रहे होंगे वे भी यहीं रुक कर अपना भाग्य आजमाना पसंद करेंगे। अभी तो मात्र यही समझ में आता है कि सागर उत्साही सांसद केन्द्र सरकार की योजनाओं को लागू कराने के लिए कृतसंकल्प हैं। लेकिन इस बीच निवेशकों का आगाज़ कैसा है, यह भी तो पता लगते रहना चाहिए। 

बुंदेलखंड आरम्भ उत्तर प्रदेश तथा मध्य प्रदेश में फैला हुआ है। बुंदेलखंड के इन दोनों हिस्सों की आर्थिक दशा बेहतर नहीं कही जा सकती है। लेकिन उत्तर प्रदेश का बुंदेलखंड बाजी मारता हुआ दिखाई दे रहा है। बात माॅल्स, काॅरीडोर या बाजार एवं काॅलोनीज़ के विस्तार की नहीं है, बात है बुनियादी विकास की। उत्तर प्रदेश में योगी सरकार ने बुंदेलखंड इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट अथॉरिटी के अंत बुंदेलखंड के विकास का बीडा उठाया है।  बुंदेलखंड औद्योगिक विकास प्राधिकरण का क्षेत्र उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में स्थित है, जिसमें मुख्य रूप से झांसी जिले के 33 गांव शामिल हैं। इस क्षेत्र को 65,000 एकड़ से अधिक में एक बड़े औद्योगिक शहर के रूप में विकसित किया जा रहा है। बुंदेलखंड इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट अथॉरिटी मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में स्थित है, जिसका मुख्यालय झांसी में है। इस परियोजना के तहत 33 गाँवों की 65,000 एकड़ से अधिक भूमि को औद्योगिक और व्यावसायिक विकास के लिए चिन्हित किया गया है। विकास का उद्देश्य है कि इस क्षेत्र को एक अत्याधुनिक, विश्व स्तरीय औद्योगिक और आर्थिक केंद्र के रूप में विकसित किया जाना है, जिसमें आधुनिक बुनियादी ढांचा और रहने की सुविधाएं शामिल होंगी। यानी बुंदेलखंड इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट अथॉरिटी बुंदेलखंड इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट अथॉरिटी एक नया शहर बसा रही है। इसमें उद्योग, घर और हरियाली सब होगा। यह शहर दस लाख लोगों को बसाएगा। यहाँ रोजगार के भरपूर अवसर मिलेंगे और पलायन रुकेगा।

बुंदेलखंड इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट अथॉरिटी शहर का 35 प्रतिशत हिस्सा पूर्वी क्षेत्र में उद्योगों के लिए होगा, जबकि 15-20 प्रतिशत हिस्सा पश्चिमी क्षेत्र में आवासीय उद्देश्यों के लिए रखा गया है। इसमें होटल, स्कूल और रिसॉर्ट जैसी सुविधाएं शामिल होंगी। यह शहर लगभग दस लाख लोगों को बसाने में सक्षम होगा। इन दोनों हिस्सों को 200 मीटर चैड़ी सड़क अलग करेगी, जो चार एक्सप्रेसवे की चैड़ाई के बराबर होगी। कुल जमीन का तीस प्रतिशत हिस्सा हरियाली के लिए आरक्षित किया गया है। इसमें पार्क, छोटे जंगल, जल निकाय और ट्रेकिंग के रास्ते शामिल होंगे। इस नई टाउनशिप में चैड़ी सड़कें, सीवेज सिस्टम, गैस पाइपलाइन, एसटीपी (सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट), सीइटीपी (कंबाइंड एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट) और सोलर लाइटिंग सिस्टम जैसी सभी आधुनिक सुविधाएं होंगी। साथ ही, एक एकीकृत कमांड कंट्रोल सिस्टम भी होगा।  बीडा उद्योगपतियों के लिए इसलिए भी उपयुक्त है क्योंकि यह पूर्व-पश्चिम और उत्तर-दक्षिण गलियारों के जंक्शन पर स्थित है। यहाँं सड़क और रेल मार्ग से अच्छी कनेक्टिविटी है। जल्द ही यहाँ एक हवाई अड्डा भी बनने की उम्मीद है। जमीन सस्ती है और किसी भी कानूनी पचड़े से मुक्त है। यहाँ काम करने के लिए पर्याप्त लोग भी उपलब्ध हैं। उनके अनुसार, कंटेनर कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया और भारत अर्थ मूवर्स सहित लगभग बीस उद्योगों ने यहाँ आने की सहमति दे दी है। उन्होंने यह भी बताया कि वे एक मल्टी-मोडल लॉजिस्टिक्स पार्क, यानी एक तरह का ड्राई पोर्ट स्थापित करने पर भी विचार कर रहे हैं।

     अब तक, बुंदेलखंड इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट अथॉरिटी ने 10,000 किसानों से 20,000 एकड़ जमीन का अधिग्रहण कर लिया है और उन्हें 2,700 करोड़ रुपये का मुआवजा दिया है। मास्टर प्लान, जमीन आवंटन के नियम और भवन निर्माण के नियम गवर्निंग बॉडी द्वारा मंजूर किए जा चुके हैं। भविष्य का लक्ष्य 1,000 एकड़ जमीन पर अत्याधुनिक बुनियादी ढांचे के साथ एक एक्टिवेशन एरिया बनाना है। इसके लिए एक विस्तृत परियोजना रिपोर्ट तैयार की जा रही है, जिसे दिसंबर 2026 तक पूरा करने का लक्ष्य है।

दूसरी ओर बीडा बुंदेलखंड इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट अथॉरिटी एक आत्मनिर्भर एकीकृत औद्योगिक टाउनशिप बनने जा रही है, जिसमें सभी आधुनिक सुविधाएं और भरपूर हरियाली होगी। बुनियादी ढांचे की गुणवत्ता के मामले में यह नोएडा और ग्रेटर नोएडा से बेहतर होगी। यह स्थानीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देगी और बड़े पैमाने पर पलायन को रोकेगी। स्थानीय लोगों को आगे बढ़ने का एक बड़ा अवसर मिलेगा।
यह सारे प्रयास एवं योजनाएं पढ़ने, सुनने में ही बहुत अच्छी एवं आशाएं जगाने वाली लग रही हैं। वहीं मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड के लिए बुंदेलखंड विकास प्राधिकरण नामक एक अथॉरिटी है, जो इस क्षेत्र के विकास की जिम्मेदारी संभालती है। इस प्राधिकरण के अधिकार क्षेत्र में मध्य प्रदेश के सागर संभाग के सागर, दमोह, छतरपुर, टीकमगढ़, पन्ना और ग्वालियर-चंबल संभाग के दतिया जिले को शामिल किया गया है, जिसमें निवाड़ी जिला भी शामिल है। इसकी वर्तमान स्थिति एवं परिदृश्य खबरों से ओझल है। बीडीए का कर रहा है इसका ठीक-ठीक पता आमजन को नहीं है। खैर, अब बात करते हैं उस  रीजनल इंडस्ट्रियल कॉन्क्लेव की जो सितम्बर 2024 में बड़े धूमधाम से सागर में सम्पन्न हुआ था। देश-विदेश से निवेशक सागर आए थे। सागर रीजनल इंडस्ट्रियल कॉन्क्लेव में खूब प्रस्ताव आए थे। कहा गया था कि बुंदेलखंड रीजन में उद्योगों का जाल बिछेगा। इसके साथ ही सागर में एयरपोर्ट बनेगा। बुंदेलखंड में अलग-अलग सेक्टर में निवेश को लेकर 6600 करोड़ रुपए के प्रस्ताव आए। पूरे मध्य प्रदेश में 19,000 करोड़ रुपए के प्रस्ताव आए। बुंदेलखंड के संभागीय मुख्यालय सागर में आयोजित रीजनल इंडस्ट्रियल कॉन्क्लेव में देश भर के उद्योगपतियों ने निवेश की इच्छा जताई। दोपहर तक सागर, दमाोह, छतरपुर और निवाड़ी सहित अन्य क्षेत्र में करीब 6600 करोड़ रुपए के निवेश की घोषणा की गई थी। पूरे प्रदेश में करीब 19 हजार करोड़ से अधिक के निवेश के प्रस्ताव कॉन्क्लेव के माध्यम से आए।

कुछ योजनाओं की घोषणाएं की गई थी उनमें से कुछ के काम शुरू हो भी चुके हैं किन्तु आमजन उससे लगभग अनभिज्ञ है। एक महत्पूर्ण घोषणा थी कि ढाना में बनेगा एयरपोर्ट बनेगा। जी हां, सागर के ढाना में स्थित एयर स्ट्रिप को अब एयरपोर्ट बनाया जा सकेगा। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कॉन्क्लेव में बताया कि हमें ढाना एयरपोर्ट सहित प्रदेश में 1800 करोड़ की लागत से एयरपोर्ट बनाने का प्रस्ताव मिला। इसके अलावा बंसल ग्रुप सागर में देश का सबसे बड़ा और प्रदेश का पहला डेटा सेंटर बनाएगा। इसमें करीब 1700 करोड़ का निवेश आएगा। एआई के दौर में यह सागर सहित प्रदेश के लिए बड़ी उपलब्धि होगी। प्राप्त जानकारी के अनुसार ढाना एयरपोर्ट का काम प्रगति पर है किन्तु इस प्रगति की गति के बारे में प्रशासन कह ओर से अपडेट नहीं दिया जा रहा है। 
दूसरी महत्वपूर्ण घोषणा थी सागर में चांदी क्लस्टर बनाए जाने की। सीएम डाॅ मोहन यादव ने मंच से जानकारी देते हुए बताया था कि सागर में चांदी क्लस्टर बनाया जाएगा। इसके अलावा यहां स्टील, सीमेंट, हॉस्पिटल, होटल, फर्नीचर क्लस्टर, एयरपोर्ट सहित अन्य सेक्टरों में निवेश की घोषणा की गई थी। इनमें एक ग्रुप ने निवाड़ी में 3200 करोड़ का इंटीग्रेटेड स्टील प्लांट स्थापित करने की घोषणा की थी। आयरन और माइनिंग में भी निवेश किया जाएगा। इससे 10 हजार लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार मिलेगा। इसी प्रकार मेडिकल इंडस्ट्री और अन्य उपक्रमों में भी गीतांजलि ग्रुप निवेश करने की घोषण की थी।

इसी प्रकार बंसल ग्रुप बुंदेलखंड सहित पूरे एमपी में 4 सुपर स्पेशियालिटी हॉस्पिटल, 5 स्टार होटल और 100 मेगावाट का सोलर प्लांट लगाए जाने की घोषण की गई थी। इसमें करीब 1350 करोड़ रुपए के निवेश तय किया गया था। वहीं, मध्य भारत एग्रो सागर के बंडा इलाके में 500 करोड़ का नया इंवेस्टमेंट करने की घोषणा की थी। कार्यक्रम में सीएम ने बुंदेलखंड सहित प्रदेश के लिए 96 औद्योगिक इकाईयों के लिए 240 एकड़ भूमि आवंटित करने के आदेश पत्र प्रदान किए थे। इससे 1565 करोड़ रुपए का निवेश होगा तो 6000 रोजगार सृजित होने का अनुमान था। सागर में फर्नीचर क्लस्टर के लिए 10 इकाईयों को आदेश पत्र भी दिए गए थे।

बुंदेलखंड में डॉ. मोहन यादव द्वारा कराए गए पहले रीजनल इंडस्ट्रीज कॉन्क्लेव में जिन सेक्टरों में निवेश की घोषणा की गई थी, उसमें चांदी उद्योग के लिए क्लस्टर, एयरपोर्ट, स्टील प्लांट, सीमेंट प्लांट, सुपर स्पेशियालिटी हॉस्पिटल, 5 स्टार होटल, फर्नीचर क्लस्टर, तेंदूपत्ता, रॉक फास्फेट प्लांट सहित खनिज क्षेत्र में निवेश की बात कही गई थी। विशेश यह भी था कि रीजनल इंडस्ट्रियल कॉन्क्लेव केवल सागर या बुंदेलखंड तक सीमित नहीं था। बल्कि इसमें देश भर के कारोबारियों के अतिरिक्त विदेशों से भी निवेशक  आए थे जिनमें थाईलैंड के महावाणिज्य दूत व मंगोलिया राजदूत तथा यूरोप से कुछ व्यवसायी आए थे।

यदि यह सब कुछ रीजनल इंडस्ट्रियल कॉन्क्लेव की घोषणाओं के अनुरुप होता है तो मध्यप्रदेश के बुंदेलखंड के विकास का चेहरा भी बदल जाएगा। इस क्षेत्र से रोजगार के लिए होने वाले पलायन रुकेंगे। चौतरफा विकास होगा। यहां तक कि आरम्भिक स्तर पर ‘‘सेटअप’’ के लिए रोजगार के अवसर मिलने लगेंगे। किन्तु लगभग सवा साल बाद निवेश की क्या स्थिति है अथवा घोषणाओं के अनुरुप काम शुरू हुआ है या नहीं इसका फालोअप आमजन के पास नहीं है जबकि ऐसी योजनाएं आमजन को केन्द्र में रख कर ही बनाई जाती हैं तथा इनका विकास किया जाता है। जिस प्रकार से उत्तरप्रदेश के बुंदेलखंड में बीडा समाचारों के माध्यम से अपनी उपस्थिति याद दिलाता रहता है उसी तरह बीडीए और रीजनल इंडस्ट्रियल कॉन्क्लेव का भी फालोअप जारी होते रहना चाहिए ताकि आमजन अपने भावी विकास को ले कर आश्वस्त हो सके।   

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Tuesday, November 11, 2025

पुस्तक समीक्षा | इतिहास की एक गरिमामयी प्रेमकथा की तथ्यात्मक एवं रोचक प्रस्तुति | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

पुस्तक समीक्षा | इतिहास की एक गरिमामयी  प्रेमकथा की तथ्यात्मक एवं रोचक प्रस्तुति | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण
पुस्तक समीक्षा
इतिहास की एक गरिमामयी  प्रेमकथा की तथ्यात्मक एवं रोचक प्रस्तुति
- समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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लेखक      - राजगोपाल सिंह वर्मा
प्रकाशक     - हिन्दी युग्म, सी-31, सेक्टर 20, नोएडा (उ.प्र.) - 201301
मूल्य       - 399/-
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जितना कठिन इतिहास का लेखन है उतना ही कठिन इतिहास के तथ्यों पर लिखना है। इतिहास संबंधित लेखन हमेशा साक्ष्य मांगता है। कल्पना का सहारा लिया जाता है किन्तु तत्कालीन ऐतिहासिक तथ्यों की शर्तों पर। इसी प्रकार इतिहास में राजा-रजवाड़ों पर भले ही कल्पना की उड़ान को थोड़ी उन्मुक्तता दे दी जाए किन्तु जब बात किसी ऐसे व्यक्तित्व की हो जिसकी छवि एक वीर स्वतंत्रता संग्राम सेनानी की हो तो लेखन और अधिक सावधानी मांगता है। सत्य भी प्रस्तुत कर दिया जाए और छवि भी सुरक्षित रहे, यह दोधारी तलवार लेखक से अथक श्रम मांगती है। लेखक राजगोपाल सिंह वर्मा न केवल श्रमसाध्य लेखन में निपुण है वरन वे ऐतिहासिक तथ्यों को पूरी सच्चाई के साथ प्रस्तुत करने में भी माहिर हैं। उनकी नवीनतम पुस्तक ‘‘सुभाष-एमिली: अधूरे प्रेम की पूरी कहानी’’ सुभाषचंद्र बोस के एमिली के प्रति प्रेम को बड़ी सुंदरता एवं तथ्यात्मकता से सामने रखती है। 
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में सुभाषचंद्र बोस का अपना अलग ही स्थान रहा है। स्वतंत्रता संग्राम के लिए बाकायदा सेना का गठन, महिला ब्रिगेड का गठन, अंतर्राष्ट्रीय सहयोग पाने की अर्थपूर्ण चेष्टा आदि वे प्रयास थे जिन्होंने सुभाष चंद्र बोस के इरादों को स्पष्ट कर दिया था कि यदि आवश्यकता पड़ी तो अंग्रेजों से युद्ध कर के देश को स्वतंत्र कराएंगे। यद्यपि महात्मा गांधी सुभाषचंद्र बोस के सैन्य प्रयास से सहमत नही थे किन्तु वे ‘‘नेताजी’’ के नाम से ख्याति प्राप्त सुभाष को रोक भी नहीं सके। गांधी जी के प्रयासों के नरमदल के समानान्तर गरमदल भी अपने प्रयास में संलग्न रहा। 
एमिली शेंकल से सुभाषचंद्र बोस की भेंट सन 1943 में हुई थी। वे ऑस्ट्रियाई मूल की थीं। 26 दिसम्बर 1910  जन्मीं एमिली शेंकल आकर्षक व्यक्तित्व की धनी थीं। सुभाषचंद्र बोस ने उनके व्यक्तित्व, बुद्धिमत्ता से प्रभावित हो कर उन्हें अपना निज सचिव बनाया। धीरे-धीरे उनके बीच प्रेम पुष्पित-पल्लवित हुआ जिसके परिणामस्वरू उन्होंने दिसंबर 1937 में गुप्त रूप से विवाह कर लिया। यह विवाह आस्ट्रिया में भारतीय रीति-रिवाज से सम्पन्न हुआ था। कुछ समय बाद उनकी संतान के रूप में एक पुत्री ने जन्म लिया जो आज अनिता बोस फाफ के नाम से जानी जाती हैं। फरवरी 1943 में बोस अपनी बेटी को एमिली के पास छोड़कर जर्मन पनडुब्बी से जापान अधिकृत दक्षिणी एशिया में पहुँचे। वहाँ उन्होंने आजाद हिन्द फौज का गठन किया। सुभाष जापान के सहयोग से सीधी सैन्य कार्रवाई करके भारत को परतंत्रता से मुक्त कराना चाहते थे। अपने इस अभियान में वे सफलतापूर्वक आगे बढ़ रहे थे कि उनका विमान ताइपेई (ताइवान) में 18 अगस्त 1945 को दुर्घटनाग्रस्त हो गया। प्राप्त तथ्यों के अनुसार सुभाष मंचूरियन पेनिनसुला की ओर जा रहे थे।
     सुभाषचंद्र एवं एमिली की पुत्री अनिता बोस फाफ ऑग्सबर्ग यूनीवर्सिटी में प्रोफेसर रह चुकी हैं। इस समय वे अपने पति प्रो मार्टिन फाफ के साथ उनकी जर्मनी में रहती हैं। माँ के साथ रहने के कारण वियेना में लोग उसे अनिता शेंकल फाफ के नाम से जानने लगे। अपनी शिक्षा पूर्ण करने के बाद अनिता ने प्रोफेसर मार्टिन फाफ के साथ विवाह कर लिया। उनके पति बुण्डेस्टैग जर्मनी की संसद के सदस्य थे और जर्मन सोशल डिमोक्रेटिक पार्टी से सम्बन्ध रखते थे। उन दोनों के एक बेटा व दो बेटियां कुल तीन बच्चे हैं। बेटे का नाम है पीटर अरुण और बेटियों का थॉमस कृष्णा व माया कैरीना। अनिता अपने पति की जर्मन सोशल डिमोक्रेटिक पार्टी में सहयोग करती रहती हैं।
       सभी जानते हैं कि सुभाष चंद्र बोस का जन्म 23 जनवरी, 1897 को कटक, ओडिशा में हुआ था और वे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के एक प्रमुख नेता थे। उन्होंने ब्रिटिश सरकार की नौकरी से इस्तीफा दे दिया और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हो गए, जहाँ वे एक प्रभावशाली नेता बने। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान, उन्होंने आजाद हिंद फौज का गठन किया, जिसका उद्देश्य भारत को ब्रिटिश शासन से मुक्त कराना था। उन्होंने  स्वतंत्रता की अलख जगाने के लिए जनता को कुछ अद्वितीय नारे दिए, जैसे- तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा, दिल्ली चलो और जय हिन्द। इन नारों ने भारतीयों में देशभक्ति और क्रांति की भावना को जागृत किया। दुर्भाग्यवश 18 अगस्त, 1945 को एक विमान दुर्घटना में उनकी मृत्यु हो गई, हालांकि उनकी मृत्यु से जुड़े रहस्य आज भी कायम हैं।
            एमिली शेंकल बौर उनकी पुत्री अनिता को सुभाषचंद्र बोस के परिवार की ओर से कोई सहायता नहीं मिली। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद एमिली ने तारघर में नौकरी करके अपना व अपनी पुत्री का पालन पोषण किया। एमिली 1996 तक जीवित रही। उसकी बेटी अनिता के अनुसार एमिली ने सुभाषचन्द्र बोस के साथ अपने सम्बन्धों को कभी सार्वजनिक नहीं किया। वह अपने पति का नाम गुप्त रखकर ही इस दुनिया से चली गयी। यह एक स्वातंत्र्य योद्धा की एक ऐसी प्रेम कथा है जिसमें पूरी गरिमा के साथ प्रेम का निर्वहन किया गया किन्तु परिस्थितियों ने इसे दुखांत की ओर धकेला। लेखक राजगोपाल सिंह वर्मा ने ऊपर से सीधी-सादी प्रेम कथा दिखने वाले इस सत्य प्रसंग में उस मानवीय पक्ष को रेखांकित किया है जो सुभाष और एमिली की अधूरी प्रेमकथा को पूरी तरह से बयान करता है। देखा जाए तो यह प्रेम-कथा नहीं, बल्कि इतिहास का वह तथ्यात्मक दस्तावेज है, जो सुभाषचंद्र बोस के लौह व्यक्त्वि से पर्दा उठा कर उनके कोमल पक्ष को प्रस्तुत करता है। एक ऐसे योद्धा की प्रेम कथा जो देश के लिए समर्पित था किन्तु उसके सीने में भी दिल धड़कता था। उसे भी किसी से प्रेम हो सकता था। पुस्तक के आरंभिक पन्ने में ही लेखक ने सुभाषचंद्र बोस का एक वक्तव्य दिया है जो इस प्रकार है-‘‘मैं तुम्हारे अंदर की औरत को प्यार करता हूं, तुम्हारी आत्मा से प्यार करता हूं। तुम पहली औरत हो जिससे मैंने प्यार किया है।’’
       सुभाषचंद्र बोस का यह उद्गार बताता है कि उन्हें एमिली से कितना अधिक प्रेम था। साथ ही इस बात का भी साक्ष्य देता है कि प्रेम मनुष्य को उसके लक्ष्य से नहीं डिगाता है वरन उसे दृढ़तापूर्वक अपने कर्तव्यपथ पर  बढ़ने की प्रेरणा देता है। सुभाष एमिली के प्रेम में पड़ कर अपने लक्ष्य से विचलित नहीं हुए वरन वे तेजी से अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते रहे। लेखक राजगोपाल वर्मा ने सुभाषचंद्र बोस और एमिली के  उस संबंध की व्याख्या की है जहां युद्ध और स्वतंत्रता प्राप्ति के लक्ष्य के कड़े कर्तव्यबोध के बीच प्रेम का अंकुर फूटता है और प्रेम को देश, काल, परिस्थितियों से परे उस ऊंचाई तक ले जाता है जहां उनके प्रेम को न केवल सामाजिक वरन ऐतिहासिक स्वीकृति मिलती है। देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू ने व्यक्तिगत पहल से न केवल एमिली शेंकल को नेताजी की पत्नी और अनिता को उनकी पुत्री के रूप में सार्वजनिक मान्यता दिलाई, बल्कि उन्हें आजीवन गरिमापूर्ण सहायता भी सुनिश्चित की। अर्थात प्रेम ने नेहरू और सुभाष के मध्य पाई जाने वाली वैचारिक असहमति पर भी विजय प्राप्त की। इस पुस्तक को लिख कर लेखक राजगोपाल सिंह वर्मा ने गोया एक ऐतिहासिक दस्तावेज को रोचक ढंग से लेखबद्ध किया है। पुस्तक के पहले अध्याय में उस समय का विवरण है जब सुभाषचंद्र बोस कथित हवाई दुर्घटना में मारे गए थे। उस दुर्घटना का रहस्य हमेशा रहस्य ही रहा। 
कुल 33 उपशीर्षकों में विभक्त पुस्तक के कलेवर में सरकारी अभिलेख, समाचार, शोघपत्र, निजी पत्र आदि को तथ्यों के रूप में प्रस्तुत किया गया है जो सामग्री की विश्वसनीयता को सिद्ध करते हैं। पुस्तक में एमिली एवं सुभाषचंद्र के तत्कालीन छायाचित्र दिए गए हैं। साथ ही पुस्तक के अंत में संदर्भसूची है जो लेखक के श्रम एवं तथ्यों की प्रामाणिकता को साबित करती है। शिशिर कुमार बोस एवं सुगत बोस ने एमिली और सुभाषचंद्र के पत्रों को संपादित कर जनता के साामने लाने की अनुमति दी। तथ्यों को अंग्रेजी, जर्मन और बांग्ला से अनूदित कर हिन्दी में इस पुस्तक में उपलब्ध कराया गया है। त्वरित उपलब्धि और प्रसिद्धि की भूख वाले आज के समय में राजगोपाल सिंह वर्मा जैसे लेखक ही इतना श्रम और धैर्य रख कर इस पुस्तक को उचित स्वरूप दे सकते थे, जो कि उन्होंने दिया। 
        ‘‘सुभाष-एमिली: अधूरे प्रेम की पूरी कहानी’’ पुस्तक न केवल एक ऐतिहासिक सत्य से परिचित कराती है वरन मानवीय भावनाओं के प्रति समझ को बढ़ाती हुई तत्कालीन ऐतिहासिक परिवेश को समझने में भी सहायता करती है। इस पुस्तक को पढ़ना, तत्कालीन देश-काल में विचरण करने के समान प्रतीत होता है, ठीक किसी टाईम कैप्सूल में बैठ कर समय को लांघने की भांति। यह इतनी रोचक ढंग से लिखी गई है कि किसी भी पाठक का इसे बार-बार पढ़े जाने का मन करेगा।       
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Monday, November 10, 2025

मेरे काव्य संग्रह "तीन पर्तों में देवता" का उल्लेख मध्य प्रदेश संदेश में

मेरे काव्य संग्रह "तीन पर्तों में देवता" का उल्लेख मध्य प्रदेश संदेश में।
सुखद लगता है जब अपनी पुस्तक का उल्लेख "मध्य प्रदेश संदेश" जैसी प्रदेश की महत्वपूर्ण पत्रिका में किया गया हो 😊🤗🌹

हार्दिक आभार "मध्यप्रदेश संदेश" 
एवं हार्दिक आभार अशोक मनवानी जी  🚩🙏🚩
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Saturday, November 8, 2025

टॉपिक एक्सपर्ट | जड़कारो आ गओ है, अपनो अच्छे से ख्याल राखियो | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | पत्रिका | बुंदेली कॉलम

टॉपिक एक्सपर्ट | जड़कारो आ गओ है, अपनो अच्छे से ख्याल राखियो | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | पत्रिका | बुंदेली कॉलम
टाॅपिक एक्सपर्ट 
जड़कारो आ गओ है, अपनो अच्छे से ख्याल राखियो 
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
अब आप कैहो के जड़कारो सो, हर की साल आऊत आए, ईमें नओ का आए? सो, नओ तो कछू नइयां, सिवाय ईके के मौसम बदल रओ जीसे सबई तरफी खांसी औ सरदी फैली आए। जोन को देखो बोई खांस रओ, छींक रओ। सो अपन को ऐसे लोगन से तनक दूरी बना के रैने। का आए के अपन ओरों मन से कछू हरों खों इत्तो सऊर नईं रैत के खांसे के टेम पे मों पे एक ठइयां रुमाल राख लेवें। बे तो बिंदास सामनेवारों के मों पे खखरत रैत आएं। जेई से खांसी फैलत जात आए। सो, बे न अपनों मों ढांपें तो अपन खुदई अपनो मों ढांप लो। संगे अब ठंडो-मंडो खाबो-पीबो छोड़ देओ। भले दुपारी में गरम सो लगे। काए से के जेई ठंडो-गरम तो नुकसान करत आए।
    औ एक बात औ के जड़कारो के संगे आ गओ आए शादी-ब्याओ को सीजन। बुरौ ने मानियो पर सांची कए रए के शादी-ब्याओ में भैया हरें सो खीब अच्छो सूट-मूट डांट के पौंचत आएं, मनो अपनी बैन हरें कछू ज्यादा दिखावा में पड़ जात हैं औ पतरी सी धुतिया-हुन्ना पैन्ह के पौंच जात आएं। देखत में तो बे बड़ी खबसूरत दिखात आएं पर ठंडी खा के बीमार परे को डर बनो रैत आए। सो, ऐसो हुन्ना पैन्हियो के फैसन को फैसन हो जाए औ ठंडी बी ने खाने परे। ने तो होत का आए के घंटा खांड़ के दिखावा में मईना भर को कष्ट पल्ले पड़ जात आए। सो, हमाई जेई बिनती आए सबई जने से के जड़कारो में अपनो ख्याल राखियो।
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Thank you Patrika 🙏
Thank you Dear Reshu Jain 🙏
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Friday, November 7, 2025

शून्यकाल | डॉ. अम्बेडकर के जीवन को प्रभावित करने वाली स्त्रियां | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नयादौर

शून्यकाल | डॉ. अम्बेडकर के जीवन को प्रभावित करने वाली स्त्रियां | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नयादौर
शून्यकाल 
डॉ. अम्बेडकर के जीवन को प्रभावित करने वाली स्त्रियां
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

        डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने 'हिन्दू कोड बिल’ के जरिए स्त्रियों को समान अधिकार और संरक्षण दिए जाने की पैरवी की। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि स्त्रियों को संपत्ति,विवाह-विच्छेद, उत्तराधिकार, गोद लेने का अधिकार दिया जाए। स्त्री का विवाह की उसकी मर्जी के बिना न किया जाए। स्त्रियों को पढ़ने का भरपूर अवसर दिया जाए। ऐसे स्त्री-अधिकारों के पक्षधर डॉ. अम्बेडकर के जीवन को भी कुछ स्त्रियों ने प्रभावित किया था। डॉ. अम्बेडकर के महापरिनिर्वाण दिवस के अवसर पर यहां प्रस्तुत हैं मेरी पुस्तक ‘‘डॉ. अम्बेडकर का स्त्रीविमर्श’’ का एक अंश।

   डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने अपने जीवन में स्त्रियों के हित की रक्षा करने के लिए अनेक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक कदम उठाए। उनके इन कदमों के पीछे वे स्त्रियां मौजूद थीं जिन्होंने जाने-अनजाने डॉ. अम्बेडकर के जीवन को प्रभावित किया। उनमें जीवनदायिनी मां भीमाबाई, बुआ मीराबाई, सौतेली मां जिजाबाई, प्रथम पत्नी रमाबाई प्रमुख थीं। 

*जीवनदायिनी मां भीमाबाई -* डॉ. अम्बेडकर की मां भीमाबाई वाक्चातुर्य की धनी, सुन्दर, सुशील और धर्मपरायण थीं। वे अत्यन्त स्वाभिमानी थीं। रामजी सकपाल अपने अल्प वेतन से पैसे बचाकर भीमाबाई के पास भेजते थे जो पूरे परिवार के लिये पर्याप्त नहीं था। परिवार के खर्चों को पूरा करने के लिये भीमाबाई ने सान्ताक्रूज में सड़क पर बजरी (कंकड़-पत्थर) बिछाने की मजदूरी का काम करना शुरू कर दिया। कुछ समय बाद भाग्य ने करवट ली और रामजी सकपाल की योग्यता को पहिचान कर उन्हें पूणे के पन्तोजी विद्यालय में पढ़ने का अवसर दिया गया परीक्षा पास करने के उपरान्त उन्हें फौजी छावनी के विद्यालय में अध्यापक का पदभार सौंपा गया। शीघ्र ही उन्हें प्रधान अध्यापक बना दिया गया। वे लगभग चौदह वर्ष तक प्रधान अध्यापक रहे। जिससे उनकी आर्थिक स्थिति सुदृढ़ होती गयी। इस बीच भीमाबाई ने तेरह संतानों को जन्म दिया जिनमें सात संताने ही जीवित रहीं, शेष का बचपन में ही निधन हो गया था।
भीमाबाई बहुत अधिक व्रत-उपवास करती थीं। साथ ही उनकी बीमारी का सही निदान न होने के कारण स्वास्थ्य लगातार गिरने लगा। रामजी सकपाल का स्थानांतरण अलग-अलग छावनियों में होता रहता था। महू (मध्यप्रदेश में इन्दौर के निकट) में रहते समय रामजी सकपाल और भीमाबाई ने कामना की कि उनका एक ऐसा पुत्र उत्पन्न हो जो दीन दुखियों की सेवा करे। भीमाबाई की यह प्रार्थना शीघ्र ही फलीभूत हुई और उन्होंने 14 अप्रैल 1891 को एक पुत्र को जन्म दिया जिसका नाम भीमराव रखा गया। भीमराव को अपनी मां का स्नेह अधिक समय तक नहीं मिल पाया। अस्वस्थता के कारण भीमाबाई का निधन हो गया।
भीमराव अपनी मां को ‘बय’ कह कर पुकारते थे। उन्हें अपनी मां से अगाध स्नेह था। मां की मृत्यु के उपरान्त भी वे अपनी ‘बय’ को कभी भुला नहीं सके। स्वाभिमान, दृढ़ इच्छाशक्ति और किसी भी संकट का साहस के साथ सामना करने का गुण भीमराव को अपनी मां भीमाबाई से मानो अनुवांशिक रूप में मिला था। यह गुण भी उन्हें अपनी मां से ही मिला था कि कोई भी काम छोटा नहीं होता है। ये सारे गुण भीमराव को जीवन में सतत आगे बढ़ाते रहे।

*बुआ मीराबाई -* मीराबाई डॉ. अम्बेडकर की बुआ थीं। वे उत्साही होने के साथ परिवार-प्रबंधन में निपुण थीं। दुर्भाग्यवश उनका वैवाहिक जीवन सुखद नहीं था। पति से अनबन के कारण उन्हें मायके में अपने छोटे भाई रामजी सकपाल के साथ रहना पड़ रहा था। भीमराव की मां भीमाबाई का निधन होने के बाद मीराबाई ने भीमराव को मां की कमी नहीं होने दी। भीमराव के प्रति उनका अगाध स्नेह था। मीराबाई अत्यंत मितव्ययी थीं। किन्तु बालक भीमराव को यही लगता था कि बुआ के पास पर्याप्त पैसा है। इसीलिए जब भीमराव के मन में विचार आया कि कुली का काम कर के वे परिवार को इच्छित सहयोग नहीं कर सकते हैं और उन्हें मुंबई जा कर मिल में काम करना चाहिए, तो उन्हें मुंबई जाने के लिए धन की आवश्यकता का अनुभव हुआ। उन्हें लगा कि बुआ जिस बटुवे को हमेशा अपनी कमर में खोंसे रहती हैं, उसमें अवश्य इतना पैसा निकल आएगा कि वे उस पैसे से मुंबई पहुंच जाएंगे। वे बुआ से पैसे मांग कर अपने मुंबई जाने का इरादा प्रकट नहीं करना चाहते थे। अतः उन्होंने बुआ के बटुए से चुपचाप पैसे निकालने का निश्चय किया। रात को भीमराव और उनके बड़े भाई बुआ की दाईं-बाईं ओर सोते थे तथा यह क्रम बदलता रहता था। जिस रात भीमराव बटुवे की ओर सोए, उन्होंने चुपके से बटुवा खोल कर देखा। बटुवे में झांकते ही वे सन्न रह गए। बटुवे में मात्र दो पैसे थे। भीमराव का यह भ्रम टूट गया कि बुआ के पास पर्याप्त पैसे हैं। वे सोच में पड़ गए कि इतने कम पैसों में बुआ इतने सारे सदस्यों का लालन-पालन कैसे कर रही हैं? उन्हें अपने किए पर पश्चाताप हुआ और उन्होंने मुंबई जाने का निश्चय छोड़ कर पढ़ाई में मन लगाने का निश्चय किया। उन्हें लगा कि पढ़-लिख कर ही वे परिवार का सहारा बन सकते हैं। इस घटना के बाद भीमराव के व्यक्तित्व का कायाकल्प हो गया। पढ़ाई के प्रति उदासीन रहने वाला बालक पढ़ाई के प्रति समर्पित हो गया। जो शिक्षक पहले भीमराव के ठीक से न पढ़ने की शिकायत उनके पिता से करते रहते थे, वे अब भीमराव की बुद्धिमानी को देखते हुए उन्हें आगे पढ़ाने का आग्रह करने लगे। यह परिवर्तन बुआ मीराबाई के मितव्ययी स्वभाव और ममत्व के कारण हुआ।


*सौतेली मां जिजाबाई -* भीमाबाई की मृत्यु के बाद डॉ. अम्बेडकर के पिता रामजी सकपाल ने दूसरा विवाह जिजाबाई से किया। जिजाबाई विधवा थीं। जिजाबाई भी रामजी सकपाल के प्रति पूर्ण समर्पिता रहीं। किन्तु बालक भीमराव को उस समय अपनी सौतेली मां पर बहुत क्रोध आता था जब वे उनकी ‘बय’ अर्थात् मां भीमाबाई के कपड़े और जेवर पहन लेती थीं। एक बार त्यौहार के अवसर पर जिजाबाई ने भीमाबाई के कपड़े-जेवर पहन लिए। यह देख कर उन्हें अपनी सौतेली मां पर बहुत क्रोध आया। वे अपनी सौतेली मां जिजाबाई से झगड़ा करने लगे। उसी समय रामजी सकपाल घर आ गए। उन्होंने झगड़े का कारण पूछा तो बालक भीम ने कारण बता दिया। यह सुन कर पिता ने भीमराव को ही डांट दिया। इस पर भीमराव को लगा कि उन्हें स्वयं पैसे कमाने होंगे। इसीलिए उन्होंने ढोर चराए, खेत पर काम किया और तो और कुली का भी काम किया। यद्यपि इसके बाद उनके ज्ञानचक्षु खुल गए और वे समझ गए कि यदि वे परिवार की सहायता करना चाहते हैं तो उन्हें अध्ययन में मन लगाना होगा।
आयु के बढ़ने के साथ-साथ भीमराव अपनी सौतेली मां जिजाबाई के मनोविज्ञान को समझते गए और वे उनके चिड़चिड़े स्वभाव को अनदेखा कर उन्हें सदा मान-सम्मान देते रहे। यहां तक कि जिजाबाई की मृत्यु के शोक में डूबे होने के कारण उन्होंने नवम्बर 1997 में दलित वर्ग द्वारा आयोजित सम्मेलन में भाग नहीं लिया।


*पत्नी रमाबाई -* डॉ. अम्बेडकर जब मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण की तभी उनके विवाह के लिए योग्य लड़की की खोज शुरू कर दी गई। उनके लिए रामीबाई को पसन्द किया गया। उस समय रामीबाई नौ साल की थीं और भीमराव सोलह साल के थे। विवाह के बाद रामीबाई का नाम बदल कर रमाबाई रखा गया। रमाबाई बचपन से ही शांत स्वभाव की थीं। वे मितव्ययी और सहनशील भी थीं। मैट्रिक उत्तीर्ण छात्र भीमराव को संविधान निर्माता बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर के स्वरूप तक पहुंचने में रमाबाई के समर्पित सहयोग को अनदेखा नहीं किया जा सकता है। डॉ. अम्बेडकर उच्चअध्ययन के लिए अमेरिका गए उन दिनों रमाबाई गर्भवती थीं। शीघ्र ही उन्होंने एक पुत्र को जन्म दिया जिसका नाम गंगाधर रखा गया। दुर्भाग्यवश गंगाधर बचपन में ही परलोक सिधार गया। उनके दूसरे पुत्र यशवंत का स्वास्थ्य प्रायः खराब रहता था जिसकी चिकित्सा के लिए वे जूझती रहती थीं किन्तु अपने पति डॉ. अम्बेडकर के अध्ययनकार्य को बाधित नहीं होने देती थीं। लंदन में अध्ययन के समय डॉ. अम्बेडकर को अपने मित्र से उधार मांग कर काम चलाना पड़ा। उस समय भी रमाबाई ने धन की कमी का उलाहना अपने पति को कभी नहीं दिया। उनका प्रयास यही रहता था कि पारिवारिक विषमताओं का प्रभाव डॉ. अम्बेडकर के जीवन पर न पड़ने पाए और वे निश्चिन्त भाव से अपने महान उद्देश्यों की पूर्ति में संलग्न रहें। रमाबाई के इस समर्पित भाव का डॉ. अम्बेडकर के जीवन पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा और वे भारतीय समाज की प्रत्येक स्त्री की जीवनदशा एवं संघर्षों के बारे में गहराई से समझ सके।


*सविता देवी -* पत्नी रमाबाई की मृत्यु के उपरान्त डॉ. अम्बेडकर ने सामाज में जातिगत एकता का आदर्श स्थापित करते हुए ब्राह्मण परिवार की विधवा स्त्री सविता देवी से विवाह किया। सविता देवी सुशिक्षित थीं। पुत्र यशवंत राव के विवाह में डॉ. अम्बेडकर के सम्मिलित न हो पाने पर सविता देवी ने मां के रूप में विवाह में सहयोग दिया। वे डॉ. अम्बेडकर के अंतिम समय तक उनके साथ रहीं तथा उनके कार्यों में उन्हें सहयोग देती रहीं। विवाह से पहले उनकी पत्नी का नाम शारदा कबीर था। डॉ. अम्बेडकर के साथ ही उन्होंने ने भी बौद्ध धर्म ग्रहण कर लिया था।

डॉ. अम्बेडकर के जीवन से जुड़ी इन सभी स्त्रियों ने प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप से उन पर अपना स्थाई प्रभाव डाला। इन स्त्रियों के जीवन और समाज में उनके स्थान तथा उनके कर्त्तव्यबोध के प्रति डॉ. अम्बेडकर सदा चिन्तनशील रहे तथा इससे उन्हें समाज में स्त्री की दशा को समझने का पर्याप्त अवसर मिला।  
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शून्यकाल | डॉ. अम्बेडकर के जीवन को प्रभावित करने वाली स्त्रियां | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नयादौर
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Thursday, November 6, 2025

बतकाव बिन्ना की | किसानों खों बिजली मने जबरा मारे औ रोन न दे | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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बतकाव बिन्ना की | किसानों खों बिजली मने जबरा मारे औ रोन न दे
 - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
          जो अपने इते की कहनातें होत आएं, बे बड़े पते की होत आएं। जैसे अबे कल्ल की बात आए भैयाजी, भौजी औ मैं, हम तीनों बैठे बतकाव कर रए हते के तभई गांव से हल्के भैया आ गए। उने देखतई साथ भैयाजी ने पूछी के ‘‘काए हल्के, मोंमफली लाए के नईं?’’
‘‘हऔ, काय ने लाते? जब आपसे बोल दई ती सो बोल दई ती। चाय कछू हो जातो हम तो लातेई।’’ कैत भए हल्के भैया ने मोेमफली की थैलिया भौजी खों पकरा दई।
‘‘आप तो औ! हल्के भैया बैठ पाए नईं औ आप मोंमफली मांगन लगे। इने तनक सांस तो ले लेन देते।’’ भौजी ने भैयाजी खों झिड़को। फेर हल्के भैया से बोलीं,‘‘ठैरो आपके लाने पानी ला रई। पैले चाय पीहो के सूदे खाना खैहो?’’
‘‘खाने की रैन देओ! आप तो पैले हमें ठंडो पानी पिवाओ औ फेर अच्छी अदरक वारी चाय पिवा दइयो।’’ हल्के भैया बोले।
‘‘अरे नईं! हमने आपके लाने खाना बनाओ आए। बस, गरमा गरम गांकड़े सेंक देबी। सो, पैले चाय पीलो, सुस्ता लेओ फेर सबई जने खाना खा लइयो।’’ भौजी बोलीं। खवाबे-पिवाबे में बे बड़ी उदार ठैरीं। 
‘‘आपके लाने याद कहाई के हमने आपसे कई हती कि अगली बेरा जब हम आहें तो गांकड़े खाहें।’’ हल्के भैया खुस होत भए बोले।
‘‘काय ने याद रैहे? आप ऊंसई तो कछू नईं खात, कम से कम एक बेर तो आपने गाकड़े खाबे की बोली। हमें तो भौतई अच्छो लगो। जो खाबे खों मन होय आप तो फोन कर के बोल दए करो, हम बना के राखबी आपके लाने।’’ भौजी सोई खुस होत भई बोलीं।
‘‘औ बिन्नाजू आप कैसी हो? सब ठीक-ठाक तो आए न?’’ हल्के भैया ने मोसे पूछी।
‘‘हऔ भैया! सब ठीक आए। आप सुनाओ के का चल रओ? काए की बुआनी करी ई टेम पे?’’ मैंने हल्के भैया से पूछी।
‘‘काय की बुआनी? इते तो जे दसा आए के जबरा मारे औ रोन न दे।’’ हल्के भैया दुखी होत भए बोले। 
‘‘काय का हो गओ?’’ मैेने औ भैयाजी ने एक संग पूछो।
‘‘अब का बताएं अब तो किसानी करे में भौतई सल्ल बिंधत जा रई। को जाने का हुइए हम ओरन को?’’ हल्के भैया को मों उतर गओ।
‘‘का हो गओ? कछू तो बताओ।’’ भैयाजी ने फेर के पूछी।
‘‘का बताएं। सरकार ने कई रई के हम ओरन खों सिंचाई के लाने चैबीस घंटा पानी दओ जैहे। मनो बिजली विभाग वारे कै रए के 10 घंटा से ज्यादा बिजली नई दई जैहे। बिजली कंपनी के मालिक हरों ने तो उते काम करे वारन खों धमका दओ आए के जो कोऊ 10 घंटा से ज्यादा बिजली किसानों खों दई ऊकी तनखा से पइसा काटे जाहें। अब आपई बताओ के ईमें हम ओरें का करें? कां तो सोची रई के सरकार 24 घंटा बिजली दैहे सो अच्छी से सिंचाई हुइए, अच्छी खेती हुइए, अच्छी फसल हुइए, ओ इते बिजली कंपनी उल्टे हाथ से थपड़यात भई कै रई के किसानों कों कोऊ 10 घंटा से ज्यादा बिजली ने दे। अब ऊके करमचारी अपने मालिक की ने मानहें तो उनकी तनखा से कटहे। औ जो हम ओरें कछू कहबी सो बे कहन लगहें के 10 घंटा तो दे रए, औ का चाउने? अब उनखों कैसे समझाएं के ने तो सबई माटी एक सी होत औ ने सबई फसल एक सी होत। कऊं ज्यादा पानी लगत तो कऊं कम। अब आपई ओरें बताओ के हम ओरें का करें।’’ हल्के भैया ने अपनी पूरी प्राब्लम बता डारी। 
‘‘आपकी बात सुन के सो हमें जा लग रओ के कोनऊं दिनां बा बिजली वारे जा ने कैन लंगें के पैले अपनी फसल की जड़ें नप्पों औ बताओ के कित्तो पानी लगहे, फेर हम उत्तोई पानी देबी।’’ मैंने हल्के भैया से कई।
‘‘का मतलब?’’ हल्के भैया ने पूछी।
‘‘मतलब जे भैया के एक हतो आप घांई किसान। ऊको कोनऊं काम से कछू दिनां के लाने बायरे जाने रओ। ऊको समझ ने पर रई हती के कोन खों खेत सौंप के जाएं? काए से के सिंचाई को बखत रओ। ऊके खेत के चारो तरफी जंगल हतो जीमें बंदरा रैत्ते। बंदरा के मुखिया से ऊ किसान की अच्छी दोस्ती रई। सो, बंदरा के मुखिया ने किसान खों परेसान देखो तो ऊसे परेसानी को कारन पूछो। सो किसान ने ऊको अपनी परेसानी बताई। ईपे बा बंदरा मुखिया बोलो के बस, इत्ती सी बात? हमाई टीम के बंदरा कब काम आहें? जा सुन के किसान भौतई खुस भओ। पर ऊने कई के जो ऐसो हो जाए तो भौतई अच्छो रैहे। बस, तनक ध्यान जे राखने के जोन तरफी के पौधा खों जित्तो पानी चाउने, उत्तई दइयो। बंदरा मुखिया ने कई के तुम फिकर ने करो सब खों नप्प के पानी दओ जैहे।’’ मैंने तनक ठैर के सांस लई।
‘‘फेर का भओ?’’ हल्के भैया ने पूछी।
‘‘होने का रओ, किसान खुसी-खुसी बायरे चलो गओ औ बंदरा मुखिया अपनी टीम ले के ऊके खेत में आ गओ। ऊने अपनी टीम खों आदेस दओ के पौधन में पानी उत्तई डारने के जित्ती जरूरत होए। टीम ने पूछी के जे हमें कैसे पता परहे के कोन पौधा को कित्ती जरूरत आए? जा सुन के बंदरा मुखिया बोलो के गुड क्वेश्चन! औ इस क्वेश्चन को आंसर जो आए के तुम ओंरे पैले पौधा को उखाड़ के ऊकी जड़ नप्पियो औ फेर जड़ के हिसाब से पानी डारियो। टीम खों जो आइडिया भौतई पुसाओ। उन ओरन ने ऊंसई करो। जब किसान अपनो काम निपटा के कछू दिनां बाद अपने खेत को लौटो तो ऊने खेत की दसा देख के अपनो मूंड़ पकर लओ। पूरो खेत सिंचो तो दिखा रओ हतो मनो सारे सारी फसल औंदी दिखा रई हती। तब किसान ने बंदरा मुखिया से पूछो के जे ऐसी दसा कैसे भई तो बंदरा मुखिया बोलो के का पता पौधन खों का भओ? काए से हम ओंरे तो जड़े नप्प-नप्प के पानी डारत्ते। किसान ने सुनी तो उतई गश खा के गिर परो। सो आप ओरें गश ने खइयो जो कभऊं आप ओरन से कई जाए के फसल की जड़े नप्प के पानी डारो करे।’’ मैंने किसां सुनात भई हल्के भैया खों समझाओ।
‘‘सई कै रई बिन्ना। हम तो अच्छे बेवकूफ बने। हमने सुनी के चैबीस घंटे पानी मिलहे सो हमने जो पैले ज्वार बोने की सोची रई, ऊके बदले पिसी बो दई अब पतो पर रओ के दस घंटा से ज्यादा बिजली ने मिलहे। हम तो बुरे फंसे। सरकार औ बिजली कंपनी दोई ने मिल के जबरा मारो औ अब रोन बी नईं दे रए।’’ हल्के भैया घबड़ाए से बोले।
‘‘घबड़ाओ ने, सब ठीक रैहे।’’ भैयाजी ने हल्के भैया खों तनक सउरी बंधाई।
‘‘घबड़ाएं कैसे न, काए से के मौसम को बी कोनऊं भरोसो नई रै गओ आए। कभऊं बी ओला-पानी होन लगत आए। अब तो ऐसो लगत के हम किसानी ज्यादा दिन ने कर पाबी।
‘‘ऐसो ने कओ हल्के भैया! जो आप ओरें किसानी ने करहो, सो हम ओरो खों खाबे के लाने अनाज कां से मिलहे?’’ मैंने हल्के भैया से कई।
‘‘सो का करो जाए बिन्ना? ऐसई अधपर की ब्यबस्थाओं के कारन सो कितेक किसान खेतीबाड़ी बेंच के बड़े शहर चले गए जां उने मजूरी करने पर रई। जो इते सब ठीक रए तो इते से कोऊ काए खों जाए?’’ हल्के भैया ने कई।
‘‘फिकर ने करो भैया, कछू तो हल निकरहे। आप ओरें मिलके सरकार से कओ, बा कछू हल निकारहे। बाकी चलो आप ओरें, हम खाना परोस रए।’’ भौजी बोलीं।
हम ओरन ने हाथ धोओ। फेर बैठ गए जीमबे के लाने। बाकी थारी में जब भौजी ने गांकड़ धरी तो मोए हल्के भैया की पीरा चुभन लगी। हमाई-तुमाई थारी लौं आत-आत ई गाकड़ों के लाने किसान खों कित्ती मेनत करने परत आए, अपन नईं समझ सकत। मनो अब सबई खों समझने परहे।  
बाकी बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़िया हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की। मनो सोचियो जरूर के किसानों के हित की बतकाव करबे औ सई में ऊको हित करबे में अंतर कैसे मिट सकत आए?
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Wednesday, November 5, 2025

चर्चा प्लस | सड़क दुर्घटनाएं, यातायात व्यवस्था और हम | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर

(दैनिक, सागर दिनकर में 05.11.2025 को प्रकाशित)  
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चर्चा प्लस
सड़क दुर्घटनाएं, यातायात व्यवस्था और हम 
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
      सड़कों पर गाड़ियां बढ़ी हैं और साथ ही सड़क दुर्घटनाएं भी। विशेष रूप से मंझोले शहरों में स्थिति भयावह है क्योंकि वहां गाड़ियों की भरमार तो है लेकिन चालकों में ट्रैफिकसेंस नहीं है और यातायात व्यवस्था चरमराई रहती है। नाबालिग बच्चों को भी बाईक और स्कूटी चलाते देखा जा सकता है। कमाल हैं वे माता-पिता भी जिन्हें अपने नाबालिग बच्चों को बाईक सौंपते हुए डर नहीं लगता है। यातायात का सबसे बुनियादी स्लोगन है ‘‘कभी नहीं से देर भली’’। लेकिन आज चालकों को देख कर लगता है कि वे सोचते हैं-‘‘देरी से कभी नहीं भली’’। क्या यह रवैया उचित है?  

अभी कल ही की बात है, मैं सिविल लाइन्स से मकरोनिया लौट रही थी। अपनी स्कूटी से। इतने में जोर का हाॅर्न सुनाई देने लगा। पीछे से कोई बाईकर लगातार हाॅर्न बजाता हुआ पीछे से तेजी से चला आ रहा था। पल भर बाद ही वह मेरे बाजू से गुज़रा। इतनी स्पीड से कि मेरे बहुत किनारे होने पर भी मुझे उसके गुज़रने से हवा का झोंका-सा लगा। मेरे आगे बाईक पर जा रहे दो युवाओं में से एक ने तो बौखला कर चिल्ला कर उसे गाली भी दे डाली। परन्तु वह तो हवा-हवाई हो गया था। उसकी स्पीड ऐसी थी मानो किसी रेसिंग ट्रेक पर बाईक दौड़ा रहा हो और उसे गोल्ड मेडल जीतना हो। जबकि उस रोड पर अच्छा-खासा ट्रैफिक रहता है। उसकी स्पीड इतनी अधिक थी कि यदि उसे इमर्जेंसी ब्रेक लगाना पड़ता तो सिर के बल पलटना तय था। बेशक उसने हैलमेट लगा रखा था लेकिन पूरे जोर से सिर के बल गिरने पर सिर फूटने से भले बचता लेकिन गरदन तो टूटती ही। उसकी उस स्पीड से दूसरे चालक घबरा गए थे, चैंक गए थे। मैं भी। घर आ कर मैंने सोचा कि उसे इतनी जल्दी कहां थी जाने की जो वह अपनी हाई स्पीड की परवाह नहीं कर रहा था। सच पूछा जाए तो उसे कहीं जल्दी नहीं पहुंचना रहा होगा। बस, आजकल युवा बाईकर्स में जो शोआॅफ का चलन है उसी को वह फालो कर रहा था। अपनी जान जोखिम डाल कर। न सिर्फ खुद की बल्कि उनकी भी जो उसकी बाईक की चपेट में आ सकते थे। कहां था उस समय गति नियंत्रक? नहीं, सागर जैसे छोटे शहर में गति मापक शहर के अंदर की सड़कों पर नहीं हैं। केवल निर्देश हैं जिन्हें देखने की आदत चालकों को नहीं है। 
यूं भी सुबह-सवेरे जब अखबार उठा कर शीर्षक पढ़ो तो कई बार राजनीति से भी अधिक सड़क दुर्घटनाओं की ख़बरें रहती हैं। कहीं कोई अनियंत्रित वाहन किसी पर चढ़ गया तो कहीं कोई वाहन चालक ओवरटेक करते हुए किसी भारी वाहन के तले आ कर कुचल गया। इतना ही नहीं, सड़क पर खेलते बच्चे और आवारा पशु भी दुर्घटनाओं को दावत देते रहते हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार देश में हर घंटे औसतन 55 सड़क हादसे हो रहे हैं, जिसमें 20 लोगों की मौत होती है। इस आधार पर भारत में सड़क दुर्घटनाओं में मृत्यु दर लगभग 17 प्रति 100,000 व्यक्तियों पर थी। एनसीआरबी के 2021 के आंकड़ों के अनुसार भारतीय रेलवे में 17,993 दुर्घटनाएँ हुईं, जो वर्ष 2020 की तुलना में 38 प्रतिशत की वृद्धि है, जिसमें सबसे अधिक दुर्घटनाएँ महाराष्ट्र में हुईं। वर्ष 2025 में अब तक यह संख्या और अधिक बढ़ चुकी है। वर्ष 2025 में अब तक हुईं 13,000 से अधिक सड़क दुर्घटनाएं, लगभग 7,700 मौतें दर्ज हो चुकी हैं। अकेले उत्तर प्रदेश में इस साल 1 जनवरी से 20 मई के बीच सड़क हादसों की संख्या 13,000 से ज्यादा रही, जिनमें लगभग 7,700 लोगों की जान चली गई। ये आंकड़े बेहद चैंकाने वाले हैं और राज्य में सड़क सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ाते हैं। अगर पिछले वर्षों से तुलना करें तो 2024 में कुल 46,052 सड़क दुर्घटनाएं हुई थीं, जिनमें 24,118 मौतें और 34,665 लोग घायल हुए थे। वहीं 2023 में ये संख्या थोड़ी कम थी। जब 44,534 हादसों में 23,652 लोगों की मौत हुई थी और 31,098 लोग घायल हुए थे।
मध्य प्रदेश 2023 में सड़क दुर्घटनाओं में देश के सबसे खतरनाक राज्यों में से एक रहा, जहां छब्त्ठ रिपोर्ट के अनुसार 14,098 मौतें दर्ज हुईं, जो देश की कुल मौतों का 9।8ः है। 54,763 दुर्घटनाओं में 5।4 प्रतिशत की वृद्धि हुई। पुलिस ट्रेनिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट (पीटीआरआई) के आंकड़ों के अनुसार प्रदेश में वर्ष 2024 में 14 हजार 791 लोगों की मृत्यु सड़क दुर्घटनाओं में हुई है, जबकि 2023 से 13 हजार 798 लोगों की जान चली गई थी।ग्रामीण क्षेत्रों की सड़कों पर हुई मौतों की संख्या शहरी क्षेत्र की तुलना में दोगुना से भी अधिक है। ग्रामीण क्षेत्र की सड़कों पर दुर्घटनाओं से लगभग नौ हजार लोगों की मौत हुई है। पिछले चार वर्ष से यह संख्या आठ हजार से नौ हजार के बीच है। इसका कारण यह है कि भीड़ नहीं होने के कारण लोग तेज गति से वाहन चलाते हैं। दूसरा यह की सड़कों पर संरक्षा (सेफ्टी) मापदंडों का पालन भी ठीक से नहीं हो पाता।
मध्य प्रदेश में सड़क दुर्घटना की वजह से हर साल करीब 14 हजार लोगों की जान चली जाती है। इसमें 53 प्रतिशत मौत दो पहिया वाहन चालकों की होती है। जिसका बड़ा कारण टू व्हीलर चालकों का हेलमेट नहीं पहनना है। एमपी में होने वाले रोड एक्सीडेंट को लेकर आईआईटी मद्रास ने रिसर्च किया है। जिसमें सामने आया कि दो पहिया वाहन चालकों की 75 प्रतिशत मृत्यु का कारण हेलमेट नहीं पहनना है। मध्य प्रदेश में होने वाले रोड एक्सीडेंट को लेकर आईआईटी मद्रास ने एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार की है। इसमें बताया गया है कि सड़क दुर्घटनाओं के कारण प्रदेश को हर साल 14,308 करोड़ से लेकर 38,055 करोड़ रुपए तक का नुकसान होने का अनुमान है। वहीं साल 2023 की बात करें तो रोड एक्सीडेंट के मामले में मध्य प्रदेश देश का चैथा राज्य था। जहां सबसे अधिक सड़क दुर्घटनाएं होती है। मध्य प्रदेश में साल 2023 में रोड एक्सीडेंट से 13,798 लोगों की मौत हुई है।

प्रदेश में सड़क दुर्घटना से होने वाली मौत में 15 प्रतिशत भागीदारी महिलाओं की है। साल 2023 में रोड एक्सीडेंट की वजह से 2165 महिलाओं की मौत हुई। जबकि 84।4 प्रतिशत यानि 11,633 पुरुष सड़क दुर्घटना का शिकार हुए। वहीं इस दौरान नेशनल हाइवे पर एक्सीडेंट से 32 प्रतिशत यानि 4,476 लोगों की मृत्यु हुई। इसी तरह स्टेट हाइवे में 22 प्रतिशत यानि 2,960 लोगों की मौत हुई। जबकि 6,362 लोगों की मौत अन्य सड़कों पर हुई।
सड़क दुर्घटना में जान गंवाने वाले 75 प्रतिशत लोग 18 से 45 वर्ष की आयु के होते हैं। साल 2023 में सड़क दुर्घटना से 24 प्रतिशत मौत 18 से 25 वर्ष की आयु के लोगों की हुई। जबकि रोड एक्सीडेंट में जान गंवाने वाने 20 प्रतिशत लोग 25 से 35 वर्ष के रहे। वहीं 35 से 45 वर्ष वाले 22 प्रतिशत लोगों की जान एक्सीडेंट से हुई। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि सड़क दुर्घटना में जान गंवाने वाले 87 प्रतिशत लोग वर्किंग एज ग्रुप के हैं।
दुर्घटनाओं की बढ़ती संख्या का एक कारण यह भी है कि मध्य प्रदेश में ट्रैफिक पुलिस का अमला मात्र साढ़े तीन हजार है, जबकि जिस तरह से वाहनों की संख्या बढ़ रही है उससे इसका दोगुना पुलिस बल चाहिए।
मध्य प्रदेश में ब्लैक स्पाट यानी दुर्घटना संभावित क्षेत्रों की संख्या घटने की जगह बढ़ रही है। इनकी संख्या 400 से अधिक है। स्थायी तौर पर इस समस्या को हल करने के लिए जिम्मेदार एजेंसिया रुचि नहीं ले रही हैं।
पुलिस की चेकिंग के दौरान चालान की कार्रवाई में सबसे अधिक ध्यान हेलमेट और सीट बेल्ट नहीं लगाने वालों पर रहता है। दोनों को मिला लें तो प्रतिवर्ष आंकड़ा औसत 10 लाख के ऊपर रहता है, जबकि तेज गति से वाहन चलाने वालों में 50 हजार के विरुद्ध भी कार्रवाई नहीं होती।
लेकिन अपनी लापरवाही का ठीकरा दूसरों के सिर पर फोड़ कर मुक्त नहीं हुआ जा सकता है। हर नागरिक को साचना होगा कि वह अपनी जान की कितनी परवाह करता है? या फिर उसके सड़क दुर्घटना में मारे जाने पर उसके परिजन पर क्या बीतेगी? वही बाईकर युवक जिसका मैंने आरंभ में उल्लेख किया, संभवतः मित्रों से मिलने की जल्दबाजी में रेस कर रहा था। हर गाड़ी को ओवरटेक करता हुआ गाड़ी भगा रहा था। ईश्वर न करे, किन्तु उसे रास्ते में कुछ हो जाए तो उसके मित्र हमेशा उसकी प्रतीक्षा करते रह जाएंगे। उसकी बहन राखी बांधने को भाई की कलाई के लिए तरसेगी और माता-पिता अपने घर के चिराग के बुझने पर कैसा महसूस करेंगे यह बयान कर पाना लगभग असंभव है। इस प्रकार की कल्पना करने पर बात कठोर है किन्तु इस निर्मम सत्य को ठुकराया भी नहीं जा सकता है। क्या अक्ष्छा नहीं होगा कि जब कोई अपना वाहन ले कर सड़क पर निकले तो स्वयं की सुरक्षा और अपने परिजन की भावनाओं ध्यान में रखे। साथ चलते दूसरे राहगीरों की सुरक्षा का भी ध्यान रखे। सड़क आखिर सड़क होती है, कोई रेसिंग का मैदान नहीं जहां असीमित रफ्तार से गाड़ी दौड़ाई जा सकती हो। 
यह भी शर्म की बात है कि यातायात सुरक्षा सप्ताह मना कर याद दिलाने का प्रयास करना पड़ता है कि सड़क पर सुरक्षा के क्या नियम-कायदे है। सड़क दुर्घटनाओं के लिए जितनी जिम्मेदार यातायात व्यवस्था है उतनी ही जिम्मेदार वे लोग हैं जो अनियंत्रित गति से वाहन दौड़ाते हैं या फिर शराब पी कर वाहन चलाते हैं। यदि उन्हें कोई पकड़ नहीं रहा है, उनका कोई चालान नहीं काट रहा है तो इसका अर्थ यह नहीं है कि नियमों का उल्लंघन कर के अपनी और दूसरों की जान जोखिम में डालें। वह स्लोगन है न कि ‘‘सावधानी में ही सुरक्षा है।’’ सो कोई भी गाड़ी चलाते समय दो बातें दिमाग में हमेशा रखनी चाहिए कि कभी नहीं से देर भली और सावधानी में सुरक्षा है। वरना सड़क दुर्घटनाओं के आंकड़े इसी तरह बढ़ते रहेंगे और सैकड़ों परिवारों का जीवन से सुख उजड़ता रहेगा।                     
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