Tuesday, February 28, 2012

मेरी नई पुस्तक ....


श्रेष्ठ सिख कथाएं
सुनील साहित्य सदन,
3320-21, जटवाड़ा, दरियागंज,
नई दिल्ली - 110002

Thursday, February 2, 2012

देवी से डर्टी पिक्चर के बीच

 
- डॉ. शरद सिंह




 भारतीय स्त्री के सामाजिक विकास की कथा यदि लिखी जाए तो उसमें आए उतार-चढ़ावों से स्त्री के संघर्ष की कथा बखूबी उभरकर सामने आ जाएगी। दिलचस्प बात है कि मुस्लिम आक्रमणकर्ताओं का वास्ता देकर पर्दा प्रथा, सती प्रथा, बालविवाह जैसी कुप्रथाओं को हर बार परिस्थितिजन्य "बेचारगी" कह दिया जाता है। जबकि इन्हीं कारणों एवं परिस्थितियों के बारे में दूसरे पक्ष से विचार करें तो समाज की और विशेष रूप से पुरुषों की वह कमजोरी साफ-साफ दिखाई देती है जिसमें वे हाथ में तलवार धारण करके भी अपनी स्त्रियों को बचाने में सक्षम साबित नहीं होते हैं और अप्रत्यक्ष रूप से कहते हैं कि "हम तुम्हारी रक्षा नहीं कर सकते हैं इसलिए या तो तुम पर्दे के पीछे छिपी रहो या फिर आग में, पानी में कहीं भी कूद कर अपने प्राण दे दो।" जो स्त्रियां भयभीत हो गईं या जिनमें परिस्थिति के अनुरूप स्वयं को ढालने का साहस नहीं था, उन्होंने अपने पुरुषों की बात मान ली। लेकिन जिनमें संकटों से जूझने का साहस था वे जीवित नहीं और उनके जीवत रहने से ही सामाजिक पीढ़ियों का सतत प्रवाह जारी रह सका।

समाज का ढांचा चंद्रमा की सतह के समान ऊबड़-खाबड़ है, कहीं समतल है तो कहीं गहरी खाइयां। यदि स्त्री पुरुषप्रधान समाज की आकांक्षाओं के अनुरूप चले तो सब कुछ ठीक-ठाक है, अन्यथा सब कुछ गड़बड़ है। इसका एक कारण यह भी है कि सदियों से दुर्गा, सरस्वती, लक्ष्मी, सीता आदि देवियों की छवि परंपरागत रूप से भारतीय जनमानस में बैठी हुई है जो समाज ने स्वयं गढ़ी हैं और दुर्भाग्यवश स्त्रियों ने इन्हें आंख मूंद कर समर्थन भी दिया। इसीलिए आमतौर पर भारतीय स्त्री में इसी छवि को ढूंढ़ा जाता है तब मुसीबतों का पहाड़ स्त्रियों पर ही टूटता है। यह छवि टूटती दिखाई देती है तो बवाल मच जाता है। दक्षिण भारतीय अभिनेत्री सिल्क स्मिता के जीवन पर बनी फिल्म "डर्टी पिक्चर" में उन मानकों के टूटने की कथा है जो स्त्री के लिए गढ़े गए हैं। इसमें समाज के उस दोहरेपन की कथा है जो समाज में सर्वत्र व्याप्त है। यह उस औरत के जीवन की कथा है जिसने पुरुषों की दबी हुई लालसा के आधार पर अपनी क्षमता को साबित करना चाहा और किया भी। पुरुषों की दबी हुई लालसा और समाज का दोहरापन कुछ-कुछ ऐसी ही है जैसे पाठ्यपुस्तक में छिपाकर वयस्क सामग्री वाली पत्रिका पढ़ी जाए। स्त्री को जब यह लगता है कि यदि वह वयस्क सामग्री बन जाएगी तो पुरुष उसे हाथोहाथ लेंगे। ऐसा होता भी है। लेकिन यह स्थिति एक भ्रम के समान जब टूटती है तब स्त्री पाती है कि उसके तमाम प्रशंसक पुरुष तो अपनी-अपनी खोल में वापस दुबक चुके हैं और वह बीच बाजार में एक बिकाऊ वस्तु की भांति अकेली खड़ी अपनी बोली लगने की प्रतीक्षा कर रही है।

स्त्री के साथ छल दोनों स्थिति में किया जाता है-देवी के रूप में भी और डर्टी पिक्चर के रूप में भी। पहली स्थिति में वह देवी से कब देवदासी बना दी जाती है, उसे पता ही नहीं चलता...और दूसरी स्थिति में वह कब दिलों की रानी से डर्टी पिक्चर की डर्टी हीरोइन बना दी जाती है, वह समझ ही नहीं पाती है। वहीं एक तीसरी स्थिति भी है जो स्त्री को अपने समग्र के साथ जीने का और आगे बढ़ने का भरपूर अवसर देती है यदि वह उस अवसर को पहचान कर उसका लाभ उठा ले। विद्या बालन की क्षमता के रूप में सामने आता है। "परिणिता" की विद्या बालन एक देवी रूप का चरित्र निभाती है किंतु "डर्टी पिक्चर" की विद्या बालन सिल्क स्मिता के चरित्र को निभाती हुई "डर्टी हीरोइन" की छवि के साथ सामने आती हैं। एक विशुद्ध भारतीय चेहरे-मोहरे वाली विद्या बालन ने अपने अभिनय से सिद्ध कर दिया कि समाज में "सेक्स" आज भी भी उतना ही बिकता है जितनी की स्त्री की देवी वाली छवि, क्यों कि पुरुषप्रधान समाज अपनी प्रकट आकांक्षाओं के साथ बाकी आकांक्षाओं को भी छोड़ना नहीं चाहता है। इसीलिए दोनों छवियां समनांतर बनी हुई हैं। इनमें कभी एक का पलड़ा भारी हो जाता है तो कभी दूसरी का। वहीं एक बात और उभरकर सामने आई कि आज की स्त्री सम्हल कर चलना सीख गई है। सत्तर-अस्सी के दशक और इक्कीसवीं सदी के पहले दशक के बाद की स्त्री में बहुत अंतर आ चुका है। उसने दोनों छवियों के बीच का रास्ता ढूंढ़ लिया है, ठीक मध्यवर्ग की तरह यह न तो शोषित है और न ही विद्रोही। मानो वह घोषणा कर रही हो कि "मेरी क्षमता देखो और तय करो कि तुम मुझे दोनों में से किस पाले में रखना चाहते हो? यदि दोनों में नहीं तो मुझे अपने लिए स्वयं रास्ता बनाने दो और और आगे बढ़ने दो, बस तुम मेरे साथ-साथ चलो, न आगे-आगे और न पीछे-पीछे।"
 (साभार- दैनिकनईदुनियामें 22.01.2012 को प्रकाशित मेरा लेख)

(एक लम्बी यायावरी और .... दो पुस्तकों का लेखन पूरा करने के बाद पुनः हाज़िर हूं......)  


Wednesday, September 21, 2011

इंगलुक शिनवात्रा और महिला तस्करी की चुनौती


- डॉ. शरद सिंह 

अपने परिवार की नौवीं संतान इंगलुक शिनवात्रा उच्च शिक्षा प्राप्त महिला हैं। इंगलुक ने देश के उत्तरी शहर चियांग माइ से स्नातक की डिग्री हासिल करने के बाद अमेरिका के केंटुकी स्टेट यूनिवर्सिटी से परा-स्नातक की डिग्री हासिल की। उसके बाद अपने भाई थाकसिन द्वारा स्थापित दूरसंचार कंपनी एआईएस में प्रबंध निदेशक के पद पर कार्य किया। इंगलुक ने प्रधानमंत्री पद से पूर्व और कोई राजनीतिक पद नहीं संभाला है। वे थाईलैंड की 28 वीं प्रधानमंत्री हैं।

44 वर्षीया इंगलुक शिनवात्रा देश के पूर्व प्रधानमंत्री थाकसिन शिनवात्रा की छोटी बहन हैं अतः राजनीतिक वातावरण से उनका पुराना परिचय है। इंगलुक शिनवात्रा थाईलैंड की पहली महिला प्रधानमंत्री चुनी गईं। थाईलैंड में संसद के लिए आम चुनाव 03 जुलाई, 2011 को कराया गया था। चुनाव आयोग ने थाईलैंड में संसद के लिए हुए आम चुनाव के परिणाम की घोषणा 4 जुलाई, 2011 को की। इस आम चुनाव में इंगलुक शिनवात्रा के नेतृत्व वाली फू थाई पार्टी ने 500 सीटों वाली थाई संसद में 265 सीटें जीतीं। इस दल ने प्रधानमंत्री अभिसित वेज्जाजीवा की सत्ताधारी डेमोक्रेटिक पार्टी को पराजित किया। ब्रिटिश मूल के अभिसित वेज्जाजीवा की डेमोक्रेटिक पार्टी को कुल 159 सीटें मिलीं।  
             
      इंगलुक शिनवात्रा को चार और पार्टियों का समर्थन प्राप्त है, जिससे उनके पक्ष में बहुमत २९९ का हो गया। इंगलुक शिनवात्रा दृढ़ विचारों की महिला मानी जाती हैं लेकिन थाईलैंड की प्रधानमंत्री के रूप में उनकी राह आसान नहीं है।
महिलाओं का भरपूर समर्थन
                                     
           थाईलैंड में महिला प्रधानमंत्री के रूप में सबसे बड़ी चुनौती महिला तस्करी अर्थात्‌ वूमेन ट्रैफिकिंग की है। थाईलैंड लगभग दो दशक पहले महिलाओं की तस्करी के क्षेत्र में सबसे अग्रणी देशों में गिना जाता था। थाईलैंड अब भी वूमेन ट्रैफिकिंग के मार्ग में सहायक देश माना जाता है। महिला तस्करी के विरुद्ध विश्वसंगठन (कोलिटेशन अगेन्स ट्रैफिकिंग इन वूमेन सीएटी डब्ल्यू) की एशिया पेसफिक रिपोर्ट के अनुसार रूस, यूगोस्लाविया, पोलैंड और चेक और स्लोवाक गणराज्यों, दक्षिण अमेरिका से महिलाओं की तस्करी थाईलैंड के रास्ते से की जाती है। थाईलैंड के रास्ते संचालित महिला तस्करी नीदरलैंड और जर्मनी यूरोपीय संघ, जापान, भारत, मलेशिया और मध्य पूर्व के देशों तक फैली हुई है। इसी विश्व संगठन के अनुसार थाईलैंड चीन, वर्मा, लाओस तथा कम्पूचिया के ग्रामीण क्षेत्रों से १८ से ३० वर्ष आयु वर्ग की महिलाएं बैंकाक के रास्ते विश्व के विभिन्न देशों में भेजी जाती हैं। इस तरह निकटवर्ती देशों के साथ ही महिलाओं के साथ ही थाई महिलाएं भी तस्करी की शिकार हैं। वेश्यावृत्ति के लिए उनकी तस्करी की जाती है। इस अवैध व्यापार के कारण थाईलैंड में देह व्यापार भी फल फूल रहा है। 
अपने परिवार के साथ इंगलुक शिनवात्रा
                                                                            
इस दुश्चक्र में फंसी अभागी औरतों को नया जीवन प्रदान करने की गंभीर चुनौती इंगलुक शिनवात्रा के सामने है। बैंकाक पोस्ट के एक समाचार के अनुसार बड़ी संख्या में थाई महिलाओं को यौनाचार में धकेल दिया जाता है। इनमें से अधिकांश औरतें गरीब घरों की होती हैं जिन्हें अच्छे वेतन वाली नौकरी का लालच दे कर दुश्चक्र में फंसाया जाता है। जून 1997 में इसी तरह की एक घटना प्रकाश में आई। महिला तस्करी से जुड़े एक आदमी ने तीन बहनों को कुआलालंपुर, मलेशिया में एक रेस्तरां में नौकरी दिलाने का वादा किया। वह उन्हें मलेशिया तो ले गया किंतु नौकरी दिलाने के बजाय उन्हें वेश्यावृत्ति में झोंक दिया। तीनों बहनों में से एक बहन किसी प्रकार अपनी मां को फोन करने में सफल हो गई। तब मां ने बेटियों को बचाने के लिए थाई पुलिस के आगे गुहार की।
विजयी मुद्रा में इंगलुक शिनवात्रा
                               
थाई पुलिस ने मलेशियाई पुलिस के साथ मिलकर एक सफल प्रयास किया और तीनों बहनों को वेश्यावृत्ति के दलदल से बचा लिया। किंतु अधिकांश लड़कियां और महिलाएं जो एक बार इस दलदल में फंसती हैं, उनका उबर पाना बिना कानूनी प्रयास के लगभग असंभव रहता है। एशियाई आर्थिक संकट के कारण स्थितियां और अधिक दुरूह हो चली हैं। एशियाई देशों की मुद्रा के मूल्य के गिरावट ने महंगाई बढ़ाने के साथ-साथ रोजगार के अवसर कम कर दिए हैं और पारिवारिक आय पर भी करारी चोट की है। ऐसी दशा में वूमेन ट्रैफिकिंग जैसे अपराध महिलाओं के जीवन को तेजी से अपनी लपेट में लेता जाएगा।  
इंगलुक शिनवात्रा
      एक महिला होने के नाते इंगलुक शिनवात्रा को महिलाओं की पीड़ा समझ कर उन्हें ट्रैफिकिंग के भयावह अपराध से बचाना होगा जिसके लिए सबसे पहले महिला तस्करी के विरुद्ध कानून और कड़ा करना आवश्यक होगा। चुनाव जीतने के बाद इंगलुक शिनवात्रा ने अपनी फेकबुक पोस्ट में कहा था कि एक प्रधानमंत्री के रूप में उनकी प्राथमिकताओं में रोजगार उपलब्ध कराना और आंतरिक शांति व स्थिरता स्थापित करना रहेगा।
                                                                    
इंगलुक ने सत्य, न्याय और सभी के लिए कानून के शासन से वादा किया तथा सन्‌ 2020 तक अपने लक्ष्यों को प्राप्त कर लेने की आशा व्यक्त की थी। यदि इंगलुक शिनवात्रा अपने घोषित उद्देश्यों में सफल हो पाती हैं तथा वूमेन ट्रैफिकिंग पर अंकुश लगा पाती हैं तो उनका यह कार्य एशिया प्रशांत क्षेत्र ही नहीं अपितु समूचे एशिया पर सकारात्मक प्रभाव डालेगा। 
(साभार- दैनिकनईदुनियामें 04.09.2011 को प्रकाशित मेरा लेख)

Friday, September 9, 2011

ये जीवट वाली औरतें

- डॉ. शरद सिंह

    सुबह होते ही लगभग हर दूसरे-तीसरे घर में प्रतीक्षा होने लगती है उस जीवट औरत की जो आमतौर पर कामवाली बाई के नाम से जानी जाती है। चाहे उसे उसके नाम से पुकारा जाए, चाहे उसे कोई नाम दे दिया जाए किंतु इससे कामवाली बाइयों का महत्व कम नहीं होता है। यदि वह समय पर नहीं आती है तो मालकिन का मानसिक तनाव सिर चढ़कर बोलने लगता है। देर-सबेर उसके आते ही यह तनाव फट पड़ता है। इतनी देर से क्यों आई? आज फिर कोई बहाना? यदि ऐसे ही देर किया करोगी तो तुम्हारी छुट्टी मैं कोई और कामवाली ढूंढ़ लूंगी! ऐसे न जाने कितने वाक्य हैं जो कामवाली कहलाने वाली औरतों को आए दिन सुनने पड़ते हैं।

        
कामवाली बाइयों को डांटते-फटकारते समय शायद ही किसी को याद रहता हो कि उनका भी घर परिवार है और उन पर भी ढेरों जिम्मेदारियां हैं। यदि वह चुपचाप मालकिन के मनोनुकूल काम करती रहे तो सब ठीक है लेकिन जहां उसने एक भी गड़बड़ की तो उसके साथ कहा सुनी तय रहती है। यदि किसी कार्यालय में काम करने वाली महिला अपने कार्यालय में देर से पहुंचती है तो वह पूरी आशा रखती है कि उसके अधिकारी को उसके प्रति दयाभाव दिखाना चाहिए और उसकी लेटलतीफी को अनदेखा कर देना चाहिए लेकिन कामवाली बाई की लेटपतीफी सहनीय नहीं होती है।

       
बहरहाल, एक ओर जिनके तीन-चार बच्चे हों (या इससे भी अधिक) कम या अनिश्चित आमदनी वाला पति हो, सास-ससुर, ननद-देवर यानी भरा-पूरा परिवार हो, वह अलस्सुबह जागकर पहले अपने घर के काम निपटाती है फिर चल पड़ती है चार पैसे कमाने की जुगत में। उसकी लालसा रहती है कि उसे अधिक से अधिक घरों में काम मिल जाए ताकि कुछ अधिक पैसे कमा सके। 
पहले घर में पहुंच कर वह झाडू लगाती है, बरतन मांजती है, यदि कपड़े धोने का काम भी साथ में है तो कपड़े भी धोती है, फिर भोजन पकाती है। भोजन पकाने के बाद उसे खाने की मेज पर या फ्रिज में रखने के बाद उसके काम की समाप्ति होती है। यही क्रम दूसरे घर में रहता है। फिर तीसरे, चौथे, पांचवें अर्थात जितने घरों में वह काम करती है, यही सारी काम उसे करने होते हैं। एक ही काम को बार-बार दोहराते हुए न तो उसे बोर होने का समय रहता है और न अधिकार। पैसे कमाने हैं तो काम तो करना ही पड़ेगा। सुबह से शाम तक या लगभग रात तक कामवाली बाई का दायित्व निभाने के बाद जब वह थकी-हारी अपने घर लौटती है तो अकसर उसे हिस्से में ही आते हैं उसके अपने घर के काम-काज। इस व्यस्ततम दिनचर्या में जिस भी घर में पहुंचने में उसे देर हो जाती है वहां चार बातें सुनने को मिलती हैं।                         
देर होने का कारण भले ही छोटा क्यों न हो, उसे बढ़ा-चढ़ाकर बताना उसकी विवशता हो जाती है ताकि मालकिन पसीज जाए और उसे काम से निकालने के बारे में न सोचे। वह सच है कि शहरों में अब कामवाली बाइयों की यूनियनें गठित होने लगी हैं। राज्य सरकारें भी उसके अधिकारों और सम्मान के बारे में सजग हो चली है। लोकसभा में महिला एवं बालविकास मंत्री कृष्णा तीरथ द्वारा महिलाओं का कार्यस्थल में लैंगिक उत्पीड़न से संरक्षण संबंधी विधेयक 2010 पटल पर रखा गया था। यद्यपि इसमें घरेलू नौकरानियों के दैहिक शोषण के संबंध में स्पष्ट व्याख्या नहीं थी। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने घरों में काम करने वाली महिलाओं को कामवाली बाई के बदले बहन जी अथवा दीदी के संबोधन से पुकारने की अपील की। उनका मानना है कि इससे घरेलू काम-काज करने वाली औरतों के सम्मान को बढ़ाया जा सकता है। उन्होंने घरेलू नौकरानियों की महापंचायत के आयोजन किए जाने का भी आह्वान किया। उन्हें फोटोयुक्त परिचय पत्र तथा प्रशिक्षण दिए जाने की भी योजना है।
       
महाराष्ट्र और केरल की भांति दिल्ली राज्य सरकार घरेलू कामगार एक्ट लागू करने के लिए प्रयास कर रही है। जिनके अंतर्गत कामवाली बाई को साप्ताहिक अवकाश के साथ-साथ अन्य सुविधाएं लेने की भी पात्र होंगी। दिल्ली सरकार के श्रम विभाग द्वारा साप्ताहिक अवकाश, न्यूनतम वेतन तथा अन्य सुविधाओं का खाका तैयार किया जा चुका है। यह लाभ उन सभी कामवाली बाइयों को मिलेगा जो अपना पंजीयन कराएंगी। यदि वह सब यथावत होता है तो इसमें कोई संदेह नहीं कि कामवाली बाइयों की जीवन दशा में सकारात्मक सुधार होकर रहेगा।

  
घरेलू जीवन के रोजमर्रा के तंत्र में कामवाली बाइयों के महत्व को किसी भी तरह से कम करके नहीं आंका जा सकता है। चाहे कामकाजी महिलाएं हों या खांटी घरेलू महिलाएं, कामवाली बाइयों के बिना उनके जीवन की तस्वीर पूरी नहीं उभरती है। कम से कम भारत में तो कामवाली बाइयों को बुनियादी आवश्यकता कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।
(साभार- दैनिकनईदुनियामें 24.07.2011 को प्रकाशित मेरा लेख)

Sunday, August 28, 2011

नशीली दवाओं के विरुद्ध अरब औरतें




- डॉ. शरद सिंह

 अरब में औरतें के अधिकारों को लेकर अनेक प्रश्न उठते रहे हैं लेकिन ये अरब औरतें अपने अधिकारों के साथ-साथ अपने बच्चों और समाज के प्रत्येक व्यक्ति के लिए आवाज उठाने लगी हैं। ये अरब औरतें नशीली दवाओं के विरुद्ध एकजुट होती जा रही हैं। संयुक्त अरब अमीरात के महिला विकास मंत्रालय के डायरेक्टर अमाल खशोगी ने एक ऐसा कार्यक्रम भी चला रखा है जो महिलाओं को नशीली दवाओं से होने वाली हानियों की समुचित जानकारी देता है। अमाल मानते हैं कि जब औरतें भी नशे की लत में डूबने लगती हैं, उस स्थिति में समस्या और विकट हो जाती है इसलिए यदि औरतें अपने घर अपने परिवार को बचाने के लिए नशीली दवाओं का विरोध करने लगी हैं तो सरकार हर हाल में उनका साथ देगी।

   मुस्लिम औरतों और वह भी यदि खाड़ी देशों की हों तो एक ही तस्वीर सामने आती है, बुर्के (हिजाब) में लिपटी, रूढ़िवादी परंपराओं की जंजीरों से जकड़ी और पुरुषों की दासता में जीती औरत। मगर अब खाड़ी देशों की औरतों की तस्वीर तेजी से बदल रही है। विशेष रूप से संयुक्त अरब अमीरात में औरतों के समुचित विकास पर ध्यान दिया जा रहा है।  
      
राजकुमारी लुलुआ
    अरब क्षेत्र में महिलाओं की दशा में सुधार लाने का श्रेय सऊदी के राजकुमार सऊद अल फैजल और उनकी बहन राजकुमारी लुलुआ को दिया जा सकता है जो लगातार इस दिशा में प्रयत्नशील हैं। राजकुमारी लुलुआ ने अरब महिलाओं की शिक्षा ओर शिक्षित महिलाओं को रोजगार से जोड़ने की महत्वपूर्ण पहल की। राजकुमार सऊद अल फैजल भी उनके साथ हैं। राजकुमारी लुलुआ का कहना है कि हम अपनी महिलाओं को पश्चिमी शैली में नहीं, अपनी स्वस्थ परंपराओं के अनुरूप विकास की मुख्यधारा से जोड़ रहे हैं, हम कट्टर रूढ़ियों से औरतों को बाहर निकलने में मदद कर रहे हैं।

      
राजकुमारी लुलुआ की बातों में दम है। सदियों की परंपराओं को एक झटके के साथ तोड़ना कभी कारगर नहीं रहा। शिक्षा के प्रति रुचि लगा कर, स्वास्थ्य एवं समाज संबंधी बुराइयों के विरुद्ध जागरूकता ला कर आमूलचूल परिवर्तन लाया जा सकता है। यह सही रास्ता है। अब अरब औरतें इसी रास्ते पर बढ़ती जा रही हैं। यह भी सही है कि यह सब कुछ बहुत आसान नहीं है, इसमें अभी बहुत समय लगेगा फिर भी एक अच्छी पहल हमेशा अच्छी ही होती है। भारत में भी इस तरह के बहुत सार्थक प्रयास किए गए तब कहीं जाकर आज भारतीय औरतें खुली हवा में सांस ले पा रही हैं। भारत में भी नशीली दवाओं के विरुद्ध अनेक कानून हैं- मृत्युदंड को छोड़कर। नशेड़ियों को नशे की लत से मुक्त कराने के लिए अनेक स्वयंसेवी संगठन काम कर रहे हैं।
कभी-कभी घरेलू महिलाएं भी संगठित होकर स्वयं निकल पड़ती हैं शराब जैसे नशे का विरोध करने। किंतु अन्य नशीली सामग्रियों और उनके दुष्प्रभावों की जानकारी उन्हें नहीं के बराबर है। इसी तथ्य को अरब प्रशासन ने अपने यहां समझा और उस पर ध्यान दिया। वहां का प्रशासन अपने देश की औरतों को हर तरह के नशों के विरुद्ध सजग कर देना चाहता है।
       
संयुक्त अरब अमीरात के कानून के अनुसार नशीली दवाओं के तस्करी पर मृत्युदंड तक का प्रावधान है। फिर भी वहां का प्रशासन उस समय चौंका जब एक सलाहकार शोरा परिषद के समक्ष प्रस्तुत रिपोर्ट में यह तथ्य सामने आया कि लगभग एक लाख से अधिक युवा सऊदी पुरुष और महिलाएं किसी न किसी नशीली दवा के शिकार हैं। इसीलिए वहां की सरकार ने महिलाओं को नशामुक्ति के अपने अभियान में शामिल कर लिया क्योंकि महिलाएं घरेलू स्तर पर नशे की प्रवृत्ति को रोकने में कानून से भी अधिक कारगर साबित हो सकती हैं।

     
संयुक्त अरब अमीरात के मदीना, हाइल, जझान, ताबुक और कासिम आदि क्षेत्रों में सरकार की ओर से महिलाओं को विभिन्न स्तरों पर नशीली दवाओं नारकोटिक्स और उससे होने वाली हानि तथा नशीली दवाएं लेने से रोकने के उपायों की जानकारी देने वाले केंद्र काम कर रहे हैं।
         
दिलचस्प बात यह भी है कि इन केंद्रों के प्रति अरब औरतों में स्वतः उत्साह है। वे अपने पति, अपने बेटों, अपनी बेटियों और अपने अन्य परिवारजन को नशीली दवाओं से मुफ्त देखना चाहती हैं। हन्ना अल फरीह शासकीय संस्थान की यूनिट डायरेक्टर हैं। जझान के केंद्र में लगभग ६० औरतें जानकारी प्राप्त कर चुकी हैं जो अब नशीली दवाओं के विरुद्व उठ खड़ी हुई हैं। निश्चितरूप से यह अरब औरतों की जागृति की वह बयार है जो अन्य मुस्लिम देशों पर भी सकारात्मक प्रभाव डालेगी।
(साभार- दैनिकनईदुनियामें 31.07.2011 को प्रकाशित मेरा लेख)