Monday, July 30, 2012

मेरी नई पुस्तक - डॉ. अम्बेडकर का स्त्री विमर्श...

अपनी नई पुस्तक के लिए आप सभी का स्नेह चाहती हूं. कृपया इसे अपना स्नेह प्रदान करें...... 
 
पुस्तक का नाम - डॉ. अम्बेडकर का स्त्री विमर्श
लेखिका- डॉ.(सुश्री) शरद सिंह 
सहलेखक- गुलाब चंद

प्रकाशक – भारत बुक सेन्टर, 17, अशोक मार्ग, लखनऊ (उत्तर प्रदेश)- 226001

Woman discourse of Dr Ambedkar 
written by Dr (Ms) Sharad Singh, 
Co-writer Mr Gulab Chand

Published by Bharat Book Centre, 17, Ashok Marg, Lucknow  (UP) -226001

इस पुस्तक का विवरण एवं भूमिका अवलोकनार्थ प्रस्तुत कर रही हूं....... 





पुस्तक की भूमिका





पुस्तक के फ्लैप्स 



Friday, July 27, 2012

बीड़ी जलाइ ले ....

  - डॉ. शरद सिंह
 
जागरूकता के अभाव में बीड़ी बनाने वाली महिलाओं और उनके परिवार के सदस्यों पर ज़बर्दस्त खतरा मंडराता रहता है।
                                                                    

      मालती बीड़ी बनाती है। जिस समय मालती बीड़ी बनाती है उस समय उसका बेटा उसकी गोद में लेटा हुआ किलकारियां भरता रहता है। उस दौरान नियमित रूप से प्रतिदिन तम्बाकू के बारीक कण मालती और उसके दुधमुंहे बेटे की सांसों में प्रवेश करते रहते हैं। मालती नहीं जानती है कि बीड़ी लपेटने का काम उसे नाक-मुंह पर कपड़ा बांध कर करना चाहिए। मालती नहीं जानती है कि लगातार बैठे-बैठे बीडि़यां लपेटने से उसकी उंगलियों में उठने वाली मरोड़ और कमर में होने वाले दर्द से कैसे बचा जाए? मालती नहीं जानती है कि इस काम ने जिस प्रकार उसकी मंा को अस्थमा का मरीज बनाया उसी तरह उसे या उसके बेटे को किसी भी प्राणघातक बीमारी से जकड़ सकता है। वह तो बस इतना जानती है कि बीडि़यां बना कर वह अपने परिवार को कम से कम एक समय की रोटी तो दे ही सकती है। वह सिर्फ़ इतना जानती है कि यदि बीड़ी न होती तो वह और क्या बनाती? उसे तो और कुछ बनाना आता ही नहीं है। बीड़ी लपेटने का काम मालती के परिवार को जीने का सहारा तो दे रहा है लेकिन उनसे बदले में धीरे-धीरे जीवन ले भी रहा है। यही विडम्बना है इस काम की। 
‘इंडिया इनसाइड’ के जुलाई 2012 अंक  में प्रकाशित डॉ शरद सिंह का लेख

सुहागरानी की कहानी इससे अलग नहीं है। विवाह के साल भर बाद सुहागरानी ने एक बेटे को जन्म दिया।  अपनी गोद में अपने बेटे को लिटा कर वह पूरी-पूरी दोपहर बीडि़यां लपेटती रहती। वह अपने बेटे के लिए पैसे जोड़ना चाहती थी। सट्टेदार उसके पति का परिचित था अतः उसकी बनाई बीडि़यों में ‘छट्टा की बीडि़यां’ (ख़राब बनी बीडि़यां) अधिक नहीं निकलती थीं। उसे अमूमन ठीक-ठाक पैसा मिल जाता था। सुहागरानी ने अपने इकलौते बेटे के लिए बीडि़यां बना कर अतिरिक्त पैसे जोड़े किन्तु बदले में अपने बेटे से उसका स्वास्थ्य छीन लिया। सुहागरानी के बेटे को तीन वर्ष की आयु में पहुंचते तक दमा रोग हो गया। सुहागरानी और उसके पति ने अपने बेटे का बहुत इलाज कराया किन्तु विशेष लाभ नहीं हुआ। बीड़ी में भरे जाने वाले ज़र्दा (तम्बाकू) के कण उसके बेटे के फेफड़ों पर अपना असर दिखा चुके थे। दवाओं के कारण इतना अवश्य हुआ कि सुहागरानी का बेटे जीवित है, दमे के रोगी का जीवन जी रहा है। दुर्भाग्यवश, सुहागरानी यह मानने को कभी तैयार नहीं हुई कि उसके बीडि़यां बनाने के दौरान वातावरण में उड़ने वाले ज़र्दे के कण (पार्टीकल्स) के कारण उसके बेटे को दमा हुआ। परिणामतः उसने बीडि़यां लपेटना अनवरत जारी रखा है।
देश में लगभग 50 लाख श्रमिक बीड़ी श्रमिक के रूप में कार्यरत हैं जिनमें अधिकांश महिला श्रमिक हैं। बीड़ी उद्योग मनुष्य द्वारा तम्बाकू के प्रयोग से जुड़ा एक महत्वपूर्ण उद्योग है। इस उद्योग में बीड़ी लपेटने का काम मुख्य रूप से औरतों द्वारा किया जाता है। ये औरतें प्रमुखतः निम्न आर्थिक वर्ग की रहती हैं। इनकी आर्थिक स्थिति ही इन्हें बीड़ी लपेटने के कार्य के लिए प्रेरित करती है। इसके साथ ही दूसरा प्रेरक कारण होता है इनका सामाजिक बंधन और तीसरा, अशिक्षा।
 बीड़ी लपेटने (बीड़ी रोलिंग) का काम करने वाली औरतें उस वर्ग की रहती हैं जिसमें शिक्षा का प्रसार न्यूनतम है। ऐसे लगभग प्रत्येक परिवार की एक ही कथा है कि आमदनी कम और खाने वाले अधिक। जिसके कारण एक अप्रत्यक्ष चक्र चलता रहता है -आर्थिक तंगी के कारण अपने बच्चों को शिक्षा के बदले काम में लगा देना इस प्रकार के अधिकांश व्यक्ति अकुशल श्रमिक के रूप में अपना पूरा जीवन व्यतीत कर देते हैं। ठीक यही स्थिति इस प्रकार के समुदाय की औरतों की रहती है। ऐसे परिवारों की बालिकाएं अपने छोटे भाई-बहनों को सम्हालने और अर्थोपार्जन के छोटे-मोटे तरीकों में गुज़ार देती हैं। इन्हें शिक्षित किए जाने के संबंध में इनके माता-पिता में रुझान रहता ही नहीं है। ‘लड़की को पढ़ा कर क्या करना है?’ जैसा विचार इस निम्न आर्थिक वर्ग पर भी प्रभावी रहता है। इस वर्ग में बालिकाओं का जल्दी से जल्दी विवाह कर देना उचित माना जाता है। ‘आयु अधिक हो जाने पर अच्छे लड़के नहीं मिलेंगे’, जैसे विचार अवयस्क विवाह के कारण बनते हैं। छोटी आयु में घर-गृहस्थी में जुट जाने के बाद शिक्षित होने का अवसर ही नहीं रहता है।
‘इंडिया इनसाइड’ के जुलाई 2012  

मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में फैले बुन्देलखण्ड भू-भाग में औरतों को आज भी पूरी तरह से काम करने की स्वतंत्रता नहीं है। गांव और शहरी क्षेत्र, दोनों स्थानों में आर्थिक रूप से निम्न तथा निम्न मध्यम वर्ग के अनेक परिवार ऐसे हैं जिनके घर की स्त्रियां आज भी तीज-त्यौहारों पर ही घर से बाहर निकलती हैं और वह भी घूंघट अथवा सिर पर साड़ी का पल्ला ओढ़ कर। इस परिवेश में बीड़ी लपेटने का काम मुख्य रूप से औरतों द्वारा किया जाना स्वाभाविक है। यह काम ऐसा है जिसे वे अपने घर के किसी कोने में बैठ कर, सिर पर पल्ला या घूंघट ओढ़ कर भी कर सकती हैं। इसीलिए बुन्देलखण्ड में बीड़ी लपेटने के काम में औरतों की संलग्नता सर्वाधिक है। 
बीड़ी महिला श्रमिकों द्वारा समय-समय पर अपनी समस्याओं को ले कर प्रदर्शन एवं आंदोलन किए जाते हैं। ‘सेवा’ जैसे अनेक सामाजिक संगठन तथा श्रमिक संगठन उनके इस प्रयास को सहायता एवं समर्थन देते रहते हैं। स्थानीय स्तर पर भी आवाज़ें उठाई जाती हैं। किन्तु जागरूकता का अभाव होने के कारण बीड़ी बनानेवालियों और उनके परिवार के सदस्यों को स्वास्थ्य के प्रति जोखिम से छुटकारा अभी भी नहीं है। 
(‘इंडिया इनसाइड’ के जुलाई 2012 अंक में मेरे स्तम्भ ‘वामा’ में प्रकाशित मेरा लेख साभार)

Sunday, July 8, 2012

आर्थिक जगत की विश्वसनीय साथी

 
-डॉ. शरद सिंह


     परिवार में आर्थिक कार्यों का संचालन सदियों से कौन करता चला आ रहा है? जाहिर है कि स्त्री। पहले पुरुष का काम था धनार्जन और
स्त्री का काम था उस धन का परिवार के हित में उपयोग और सही ‘इन्वेस्टमेंट’। यह प्रायः गहनों के रूप में हुआ करता था। बहरहाल, जब स्त्री को धन के संचालन की समझ हमेशा से रही तो उसे एक न एक दिन आर्थिक मामलों की विशेषज्ञ के रूप में सामने तो आना ही था। चंदा कोचर, इंदिरा नूयी, शहनाज़ हुसैन, रीता सिंह आदि वे नाम हैं जो आज भारत के आर्थिक जगत् में मील का पत्थर साबित हो रहे हैं या कहा जाए तो एक ऐसा लाईस हाऊस जिसके प्रकाश में देश की अन्य महिलाएं भी तेजी से आगे बढ़ रही हैं। अनेक भारतीय महिलाएं आर्थिक मामलों में सलाह देने का काम कर रही हैं तो कई ने पूरे आत्मविश्वास के साथ अपना व्यापार चला रखा है।  आर्थिक जगत भी महिलाओं को विश्वसनीय और मेहनती निवेशक, सहयोगी अथवा कर्मचारी के रूप में स्वीकार कर चुका है। व्यापार-व्यवसाय के क्षेत्रा में महिलाएं अब आर्थिक मामलों को ले कर भयभीत नहीं रहती हैं वरन् आत्मनिर्भर होती जा रही हैं। 
रीता सिंह

         मेस्को स्टील ग्रुप की रीता सिंह के ये उद्गार मायने रखते हैं कि -‘जब मैंने अपना बिजनेस शुरू किया था तो मुझे यह भी नहीं पता था कि कर्ज लेने के लिए बिजनेस प्रपोजल किस तरह से लिखा जाता है। लेकिन मैंने कभी मुड़कर नहीं देखा।’ 

बैकिंग क्षेत्र में भी महिलाओं ने अपना सिक्का जमा रखा है। चंदा कोचर भारतीय उद्योग जगत और बैंकिंग के क्षेत्र में जाना माना नाम हैं। चंदा कोचर ने अपनी मेहनत, विश्वास और लगन से पुरुष प्रधान बैंकिंग व्यवसाय में अपनी एक अलग पहचान बनाई। मैनेजमेंट ट्रेनी की छोटी सी पोस्ट से बैंक के उच्चतम पद तक पहुंचने वाली चंदा की सफलता एक महिला की दृढ़ इच्छाशक्ति की कहानी कहती है। आज अनेक महिलाएं चंदा कोचर से प्रेरणा ले रही हैं।
चंदा कोचर

फोर्ब्स पत्रिका में दुनिया की सशक्त महिलाओं की सूची में जगह बनाने वाली चंदा का जन्म 17 नवंबर 1961 को जोधपुर, राजस्थान में हुआ था। उनकी स्कूली पढ़ाई जयपुर से हुई। इसके बाद वे मुंबई आ गईं जहां पर जय हिन्द कालेज से आर्ट्स में स्नातक की डिग्री हासिल की। सन् 1982 में स्नातक की डिग्री लेने के बाद उन्होंने मुंबई के जमनालाल बजाज इंस्टिट्यूट आफ बिजनेस स्टडी से मैनेजमेंट में मास्टर डिग्री हासिल की। मैनेजमेंट स्टडी में अपनी शानदार प्रस्तुति के लिए उन्हें ‘वोकहार्ड्ट गोल्ड मेडल’ और कास्ट एकाउंटेंसी में सर्वाधिक अंक के लिए ‘जेएन बोस गोल्ड मेडल’ दिया गया। 1984 में मास्टर डिग्री लेने के बाद चंदा ने आईसीआईसीआई बैंक में मैनेजमेंट ट्रेनी के रूप में प्रवेश किया और अपने काम और अनुभव के साथ-साथ वे लगातार आगे बढ़ती गईं। उन्होंने बैंक को सफलता के नए आयामों तक पहुंचाया। उनके नेतृत्व में ही बैंक ने अपने रीटेल बिजनेस की शुरुआत की। बैंकिंग के क्षेत्र में अपने योगदान के कारण चंदा को कई सम्मान प्रदान किए गए जिसमें भारत सरकार द्वारा दिया जाने वाला ‘पद्म विभूषण’ भी शामिल है। चंदा कोचर के बारे में फार्च्यून पत्रिका ने लिखा था कि उन्होंने अपने बैंक की अंतर्राष्ट्रीय पहुंच को और विस्तार दिया है। 
नैना लाल किदवई

    फार्च्यून पत्रिका ने कारोबार जगत की सर्वाधिक 10 प्रभावशाली महिलाओं की सूची में शामिल पेप्सिको की भारतीय अमेरिकी अध्यक्ष एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी भारतीय मूल की इंदिरा नूयी और एचएसबीसी इंडिया की मुख्य कार्यकारी नैना लाल किदवई ने भी आर्थिक जगत् में अपनी विशेष जगह बना रखी है। 
इंदिरा नूयी

28 अक्टूबर 1955 को मद्रास में जन्मी और इंदिरा नूयी ने 1974 में मद्रास क्रिष्चियन कालेज से रसायन विज्ञान में स्नातक की डिग्री और कलकत्ता के इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ मैनेजमेंट से प्रबंधन में स्नातकोत्तर डिप्लोमा हासिल किया। भारत में अपने कैरियर की शुरुआत करके, नूई ने जॉनसन एंड जॉनसन और कपडे़ की फर्म मेट्टुर बिअर्डसेल में उत्पाद प्रबंधक के पद पर काम किया। सन् 1978 में वह येल स्कूल ऑफ मैनेजमेंट में भर्ती हुई और सार्वजनिक और निजी प्रबंधन में मास्टर डिग्री प्राप्त किया तथा 1980 में स्नातक होकर, नूई ने बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप में काम किया। सन् 1994 में नूई, पेप्सीको में शामिल हुईं और 2001 में उन्हें अध्यक्ष और सीओ नामित किया गया। इंदिरा नूयी के बारे में फार्च्यून पत्रिका ने लिखा था कि -‘उनके नेतृत्व में पेप्सिको कम्पनी तेज प्रगति किया है। सभी संकेत सकारात्मक मिल रहे हैं। कम्पनी का राजस्व 35.1 अरब डालर पर जा पहुंचा है। वहीं कम्पनी को कुल 6.4 अरब डालर का संचालन लाभ हुआ है। कम्पनी ने पिछले साल की तुलना में इस साल प्रति शेयर तीन डालर अधिक की कमाई की है।’ आर्थिक जगत की पत्रिका फार्च्यून ने यह भी लिखा था कि ‘2001 में क्वेकर फूड्स के अधिग्रहण, जिसमें नूयी ने केंद्रीय भूमिका निभाई थी, से पेप्सिको को खास लाभ हुआ।’
शहनाज़ हुसैन

       भारतीय महिलाएं वे सारे मिथक तोड़ती जा रही हैं जिनमें उन्हें ‘आर्थिक व्यवस्थापन’ के क्षेत्रा के योग्य नहीं समझा जाता था और उनसे पारिवारिक खर्चों के बारे में भी हिदायत दी जाती थी कि वे परिवार के पुरुषों से पूछे बिना कहीं कुछ भी खर्च न करें। आज महिलाएं आर्थिक जगत की विश्वसनीय साथी बन कर उभरी हैं।

(साभार- दैनिक ‘नेशनल दुनियामें 08.07.2012 को प्रकाशित मेरा लेख) 

Friday, June 29, 2012

है कोई मीरा उर्फ सबीना जैसी....

मीरा और नत्थू खान विवाह के बाद


-डॉ. शरद सिंह


प्रेम करना और लिव-इन-रिलेशन में रहना महानगरों के लिए भले ही कोई विशेष बात न रह गई हो किन्तु छोटे शहरों और कस्बों के लिए आज भी यह सब आसान नहीं है। दो भिन्न जातियों, भिन्न धर्मों के बीच प्रेम का मार्ग इतना कठिन होता है कि हरियाणा जैसे प्रदेशों में तो ‘जातीय प्रतिष्ठा का प्रश्न’ बन कर खाप-पंचायतों तक जा पहुंचता है। दो भिन्न धर्मावलम्बी प्रेमी-प्रेमिका के प्रेम को समाज आसानी से पचा नहीं पाता है।  बुन्देलखण्ड में खाप-पंचायतों का बोलबाला तो नहीं है किन्तु यहां समाज भी इतना उदार नहीं है कि भिन्न धर्मावलम्बियों के बीच प्रेम संबंध और विवाह संबंध को सुगमता से स्वीकार कर ले। लेकिन कहा जाता है न कि प्यार करने वाले कभी डरते नहीं, वे समाज के सभी नियम-कानून से ऊपर उठ कर अपने प्यार को परवान चढ़ाते हैं। यदि जोड़ा युवा हो तो परवान चढ़ना फिर भी कठिन नहीं होता है जितना कि जोड़े के प्रौढ़ावस्था का होने पर। न सिर्फ प्रौढ़ावस्था अपितु बाल-बच्चेदार।
अकसर इस बात पर चर्चा होती रहती है कि आधुनिक सामाजिक ढांचे ने परिवार को जिस तरह छोटी-छोटी इकाइयों में बांट दिया है उसमें युवा पति-पत्नी और उनके अध्ययनशील बच्चे, बस इतनी ही रह गई है परिवार की परिभाषा।  इस तरह के परिवार में वृद्धों के लिए तो कोई जगह होती ही नहीं है। तो फिर वृद्ध किसके सहारे जिएं? पाश्चात्य संकल्पना के इस पारिवारिक ढांचे में वृद्ध कहीं भी ‘फिट’ नहीं बैठते हैं। जबकि उन्हें भी सहारे की, परस्पर बातचीत और दुख-सुख बांटनेवाले की आवश्यकता पड़ती है। इसीलिए प्रौढ़ावस्था के बाद ‘कैम्पेनियन’ के सहारे जीने की भी चर्चा बार-बार उठती है। किन्तु प्रश्न उठता है कि हमारा पढ़ा-लिखा, अत्याधुनिक युवा वर्ग उस दोहरी मानसिकता से बाहर आ गया है जहां स्वयं के लिए वह ‘लिव इन रिलेशन’ की सिफारिश करता है और अपने एकाकी माता-पिता के लिए कैम्पेनियन भी सहन नहीं कर पाता है, उन्हें अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा धूल में मिलती हुई दिखाई देती है, भले ही माता अथवा पिता अकेलेपन में घुटते रहें। ऐसी दोहरी मानसिकता वालों के सामने एक ठोस उदाहरण रखा एक बहुत ही छोटे से गांव के बहुत ही सामान्य परिवार के दो प्रौढ़ों ने। 
बुन्देली स्त्री

मध्यप्रदेश के बुन्देलखण्ड अंचल के ईशानगर जनपद के गहरवार गांव में एक महिला रहती है जिसका नाम था मीरा अहिरवार। लगभग पच्चीस वर्ष पूर्व एक विवाद के चलते उसके पति की हत्या कर दी गई थी। पति की मृत्यु के बाद मीरा ने अपने इकलौते पुत्रा सरमन को बड़े कष्टों से पाला। संकट की घड़ी में कोई नाते-रिश्तेदार मीरा की सहायता के लिए आगे नहीं आया। उस विपत्ति के समय गांव के ही कोटवार नत्थू खान ने मानवता के नाते मीरा की मदद की।
नत्थू के अच्छे व्यवहार ने मीरा का दिल जीत लिया। दोनों के मन में परस्पर प्रेम अंकुरित हो गया। धीरे-धीरे समय व्यतीत होता गया और मीरा का बेटा सरमन कमाने-खाने योग्य बड़ा हो गया। जिम्मेदारी का बोझ कम होने पर मीरा और नत्थू खान के बीच प्रेम और गहरा हो गया। गांव के लोगों को दोनों का यह प्रेम रास नहीं आया और वे दोनों को परेशान करने लगे। इसलिए मीरा और नत्थू खान ने कहरवार गांव छोड़ कर ईशनगर जा कर रहने का निश्चय किया। वे ईशनगर के खेलमैदान में झोपड़ी बना कर रहने लगे। किन्तु दोनों धर्मों के लागों को उनका इस तरह साथ रहना पसंद नहीं आया और उनका सामाजिक बहिष्कार कर दिया गया। बहिष्कार की परवाह न करते हुए दोनों लगभग पन्द्रह वर्ष तक ‘लिव इन रिलेशन’ में साथ-साथ रहे। इस बीच उन्हें सामाजिक मामलों में अनेक संकटों का सामना करना पड़ा।  
ग्रामीण परिवेश

एक दिन उन दोनों ने विवाह करने का निश्चय किया। प्रश्न भिन्न धर्म का था। मीरा ने के लिए प्रेम किसी भी जाति और धर्म से बड़ा था अतः उसने धर्मपरिवर्तन करने का साहसिक कदम उठाया और वह मुस्लिम धर्म अपना कर मीरा से सबीना बन गई। जिस दिन मीरा उर्फ़ सबीना बेगम की शादी नत्थू खान से हुई उस दिन नत्थू की उम्र लगभग 76 वर्ष और मीरा की उम्र लगभग 65 वर्ष थी। नत्थू खान की पहली पत्नी से पांच बेटे और चार बेटियों सहित नौ संताने हैं। वे सभी विवाहित हैं और उनके भी बाल-बच्चे हैं। मीरा का एक बेटा है। फिर भी दोनों के साथ-साथ रहने पर दोनों के परिवार वालों को भी आपत्ति थी। किन्तु विवाह के समय सभी परिवारजन और रिश्तेदार उपस्थित हुए और उन्हें इस विवाह को स्वीकार करना ही पड़ा। बुन्देलखण्ड के सामाजिक परिवेश में किसी पुरुष के लिए किसी भी उम्र में विवाह करना भले ही दुष्कर न हो किन्तु किसी महिला के लिए तो लगभग असंभव है। इस असंभव को संभव कर दिया मीरा उर्फ़ सबीना ने। फिल्मी-सी प्रतीत होने वाली यह घटना उन लोगों को चुनौती देती है जो स्वयं तो माता-पिता का सहारा बनते नहीं हैं और उन्हें भी अपना सहारा चुनने की स्वतंत्रता नहीं देते हैं तथा अंतिम सांस तक अकेलापन झेलने को विवश कर देते हैं।

(साभार- दैनिक ‘नेशनल दुनियामें 24.06.2012 को प्रकाशित मेरा लेख) 


Sunday, June 24, 2012

गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय में दिए गए व्याख्यान का वीडियो....... Video of Dr (Miss) Sharad Singh's lecture at Gurukul Kangri University, Haridwar (Uttarakhand), India


गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय में दिए गए व्याख्यान का वीडियो.......
Video of  Dr (Miss) Sharad Singh's lecture at Gurukul Kangri University, Haridwar (Uttarakhand), India 

इस वीडियो को देखने के लिए कृपया क्लिक करें -
PART-1 ....




PART-2 ....

PART-3 ....


PART-4 ....


Tuesday, June 19, 2012

‘क्रांति की मां’ तवक्कुल करमान

– डॉ. शरद सिंह

यमन एक इस्लामिक देश है जहां पर्दा प्रथा का कड़ाई से पालन कराया जाता है। स्त्रियों को घर से बाहर निकलने की मनाही है। विवशता में ही वे घर से बाहर निकलें, यही उनसे अपेक्षा की जाती है। एक तो कठोर पुरुषवादी सामाजिक व्यवस्था और उस पर सत्ता पर कोई तानाशाह हो तो इसे करेला और नीम चढ़ा ही कहा जा सकता है। यमन की स्त्रियां इसी विषाक्त कड़वाहट को झेलने के लिए विवश हैं। किन्तु कहा जाता है कि अतिवाद से ही उदारवाद और परिवर्तन का अंकुर फूटता है। यही यमन में भी हुआ। सन् 2011 से पहले किसी ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि स्त्री-स्वातंत्रय विरोधी, कट्टरपंथी समाज वाले यमन की किसी 32 वर्ष की युवा स्त्री शांति का नोबल पुरस्कार दिया जाएगा। स्वयं यमन के लोग भी चौंक उठे थे जब उन्हें पता चला कि उनके देश की एक युवती जिसका नाम तवक्कुल कारमान है, उसे शांति के लिए नोबल पुरस्कार से सम्मानित किया गया है।

तवक्कुल कारमान मूल रूप से राजनीतिज्ञ नहीं पत्रकार हैं। संभवतः इसीलिए अपने देश की स्त्रियों की समस्याओं को देखने का उनका दृष्टिकोण राजनेताओं से भिन्न है। निश्चत रूप से उन्होंने समस्याओं की जड़ों तक जा कर हल ढूंढने का प्रयास किया होगा। इसीलिए उनका ध्यान सबसे पहले इस ओर गया कि उनके देश में आमतौर पर लड़कियों का विवाह सत्रह वर्ष की आयु पूरी होने के पहले ही कर दिया जाता है अर्थात् बालविवाह। इससे लड़कियों के स्वास्थ्य और समूचे जीवन पर बुरा असर होता है। अपना भला-बुरा सोचने की समझ पैदा होने से पहले ही उन्हें विवाह के बंधन में बांध कर शिक्षा पाने और देश के विकास में सहयोगी बनने से रोक दिया जाता है। तवक्कुल को यह विसंगति रास नहीं आई।  किन्तु रास्ता बहुत कठिन था। जो पुरुष सहयोगी घर से बाहर उनकी गतिविधियों को सहन कर रहे थे वे भी तवक्कुल के विरोध में जा खड़े हुए जब उन्हें लगा कि इससे उनके घर की औरतें कुछ अधिकार पा जाएंगी। उनकी बेटियां सत्राह वर्ष की आयु होने तक उनके घर पर ही रहेंगी। यह नया पर तवक्कुल के सहयोगी पुरुषों को आपत्तिजनक लगा। इसीलिए जब तवक्कुल ने एक कानून बनवाने की कोशिश की जिसके बाद 17 साल से कम उम्र की लड़कियों की शादी पर पाबंदी लग जाती तो उनकी पार्टी वालों ने ही उसका विरोध किया। तवक्क्कुल कारमान समझ गईं कि अतिवादी पुरुषों का विरोध उन्हें झेलना ही होगा। तवक्कुल के अपने ही साथी उन्हें इस्लाम विरोधी मानने लगे और उन पर आरोप लगाने लगे कि तवक्कुल की चले तो वे उनके घरों से औरतों को बाहर कर दें। तवक्कुल इस विरोध से डरी नहीं। वे जानती थीं कि यह तो होगा ही। क्यों कि यमन जैसे देश में जहां लड़कियों की कहीं भी आवाज सुनायी नहीं देती और पर्दा प्रथा के कारण चेहरे भी दिखाई नहीं देते वहां स्त्रियों के अधिकार की बात करने पर विरोध तो होगा ही। 

तवक्कुल उस ‘इस्लाह पार्टी’ की सदस्य हैं जो यमन के तानाशाह अली अब्दुल्ला सालेह की कठोरता के कारण मुख्यधारा से कटते चले गए किन्तु उनके मन में परिवर्तन की लौ जलती रही। यह पार्टी मूलतः इस्लामी पार्टी है लेकिन तवक्कुल ने उस पार्टी में भी कुछ उदारवादी रुझान शामिल किया। भले ही उनकी पार्टी के लोग उनके प्रभाव के कारण उनसे डरते हैं लेकिन वे कारमान के उदार रवैये एक विरोध भी करते हैं। वहीं दूसरी यमन में तीस साल से चली आ रही तानाशाही को खत्म करने के लिए शुरू हुए आन्दोलन की नेता तवक्कुल को यमन के लोग ‘क्रांति की मां’ कह कर पुकारते हैं। इसी लिए तवक्कुल को विरोध में भी आशा की किरण दिखाई देती है। वे मानती हैं कि एक दिन अवश्य ऐसा आएगा जब उनके उदार विचारों विशेष रूप से स्त्रियों के हित में सामने रखे जाने वाले विचारों का उनके विरोधी भी सहृदयता से स्वागत करेंगे और आत्मसात करेंगे। तवक्कुल को विश्वास है कि उनके देश के कट्टर विचारों वाले पुरुष एक दिन इस तथ्य को समझ जाएंगे कि किसी भी देश का सर्वांगीण विकास तभी संभव है जब उस देश की स्त्रियों को बराबरी का अधिकार दिया जाए।
     
यमन में स्त्री शिक्षा की दर न्यूनतम है, स्त्री-स्वास्थ्य के मामले में भी पर्याप्त जागरूकता नहीं है, वस्तुतः वहां की स्त्रियां स्वयं को परम्परागत सामाजिक बंधनों के आगे विवश पाती हैं। कट्टरवादी पुरुषप्रधान समाज में आम स्त्री को यह अधिकार नहीं होता है कि वह परिवार के पुरुषों की अनुमति के बिना अपने जीवन को कोई दिशा दे सकें या अपनी बेटियों के लिए स्वतंत्राता के सपने देख सकें। तवक्कुल ने इस लगभग असंभव को संभव बनाने की दिशा में पहल करते हुए हर तरह का जोखिम उठाया। क्रांति और परिवर्तन के प्रयास के दौरान उन्होंने महिलाओं के अधिकारों के संरक्षण और सशक्तिकरण की मांग को छोड़ा नहीं वरन् प्रत्येक अवसर पर इन मांगों को सामने रखती रहीं। उनकी इसी दृढ़ता और सामाजिक शांति तथा विकास के प्रयासों के कारण उन्हें नोबल सम्मान दिया गया। अपनी भारत यात्रा के दौरान तवक्कुल भारतीय स्त्रियों की प्रगति से अत्यंत प्रभावित हुईं। उन्होंने ने माना कि ऐसे ही बहुमुखी विकास की आकांक्षा वे अपने देश की स्त्रियों के लिए भी रखती हैं।
(साभार- दैनिकनेशनल दुनियामें 16.06.2012 को प्रकाशित मेरा लेख) 

Friday, June 15, 2012

गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय, हरिद्वार में डॉ शरद सिंह का व्याख्यान ....

डॉ शरद सिंह

विगत 31 मई 2012 को गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय, हरिद्वार (उत्तराखण्ड) के पर्यावरण विभाग ‘‘संस्कृति को सहेजतीं बोलियां’’ विषय के अंतर्गत ‘‘बुन्देली बोली और लोक संस्कृति’’ विषय पर डॉ शरद सिंह ने अपना व्याख्यान दिया। यह सेमिनार आकाशवाणी  लखनऊ के पचहत्तरवें वर्ष के उपलक्ष्य में आयोजित किया गया। 

प्रो.स्वतंत्र कुमार, कुलपति, गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय, हरिद्वार डॉ.शरद सिंह को ‘स्मृति चिन्ह’ भेंट करते हुए।

श्री गुलाबचंद, अतिरिक्त महानिदेशक (मक्षे), आकाशवाणी लखनऊ एवं डॉ.शरद सिंह

कुलपति, गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय, हरिद्वार, श्री गुलाबचंद, अतिरिक्त महानिदेशक (मक्षे), आकाशवाणी लखनऊ एवं डॉ.शरद सिंह

डॉ.शरद सिंह तथा (पीछे का पंक्ति) में कवि बुद्धिनाथ मिश्र एवं कवि माहेश्वर तिवारी।

डॉ.शरद सिंह एवं अन्य कवि, वक्तागण