Tuesday, February 12, 2013

डॉ. अम्बेडकर के जीवन को प्रभावित करने वाली स्त्रियां-भाग2

 

 

- डॉ. शरद सिंह

                 बुआ मीराबाई

         मीराबाई रामजी सकपाल की बहन और भीमराव की बुआ थीं। वे उत्साही होने के साथ परिवार-प्रबंधन में निपुण थीं। दुर्भाग्यवश उनका वैवाहिक जीवन सुखद नहीं था। पति से अनबन के कारण उन्हें मायके में अपने छोटे भाई रामजी सकपाल के साथ रहना पड़ रहा था। भीमराव की मां भीमाबाई का निधन होने के बाद मीराबाई ने भीमराव को मां की कमी नहीं होने दी। भीमराव के प्रति उनका अगाध स्नेह था। एकबार जब भीमराव परिवार की आर्थिक स्थिति को सहारा देने के उद्देश्य से कुली का कार्य करने लगे थे, तब मीराबाई को बहुत दुख हुआ था। किन्तु मीराबाई कुली के काम को छोटा बताकर भीमराव में गलत संस्कार नहीं डालना चाहती थीं। अतः उन्होंने भीमराव क काम करने से नहीं रोका।
     मीराबाई अत्यंत मितव्ययी थीं। वे कम से कम पैसों में घर-गृहस्थी चलाना जानती थीं। किन्तु बालक भीमराव को यही लगता था कि बुआ के पास पर्याप्त पैसा है। इसीलिए जब भीमराव के मन में विचार आया कि कुली का काम कर के वे परिवार को इच्छित सहयोग नहीं कर सकते हैं और उन्हें मुंबई जा कर मिल में काम करना चाहिए, तो उन्हें मुंबई जाने के लिए धन की आवश्यकता का अनुभव हुआ। उन्हें लगा कि बुआ जिस बटुवे को हमेशा अपनी कमर में खोंसे रहती हैं, उसमें अवश्य इतना पैसा निकल आएगा कि वे उस पैसे से मुंबई पहुंच जाएंगे। वे बुआ से पैसे मांग कर अपने मुंबई जाने का इरादा प्रकट नहीं करना चाहते थे। अतः उन्होंने बुआ के बटुए से चुपचाप पैसे निकालने का निश्चय किया। रात को भीमराव और उनके बड़े भाई बुआ की दाईं-बाईं ओर सोते थे तथा यह क्रम बदलता रहता था। जिस रात भीमराव बटुवे की ओर सोए, उन्होंने चुपके से बटुवा खोल कर देखा। बटुवे में झांकते ही वे सन्न रह गए। बटुवे में मात्रा दो पैसे थे। भीमराव का यह भ्रम टूट गया कि बुआ के पास पर्याप्त पैसे हैं। वे सोच में पड़ गए कि इतने कम पैसों में बुआ इतने सारे सदस्यों का लालन-पालन कैसे कर रही हैं? उन्हें अपने किए पर पश्चाताप हुआ और उन्होंने मुंबई जाने का निश्चय छोड़ कर पढ़ाई में मन लगाने का निश्चय किया। उन्हें लगा कि पढ़-लिख कर ही वे परिवार का सहारा बन सकते हैं। इस घटना के बाद भीमराव के व्यक्तित्व का कायाकल्प हो गया। पढ़ाई के प्रति उदासीन रहने वाला बालक पढ़ाई के प्रति समर्पित हो गया। जो शिक्षक पहले भीमराव के ठीक से न पढ़ने की शिकायत   उनके पिता से करते रहते थे, वे अब भीमराव की बुद्धिमानी को देखते हुए उन्हें आगे पढ़ाने का आग्रह करने लगे। यह परिवर्तन बुआ मीराबाई के मितव्ययी स्वभाव और ममत्व के कारण हुआ।
    इस प्रकार भीमराव को जन्मजात मिले संस्कार न केवल यथावत् रहे अपितु पुष्पित-पल्लवित होते रहे।

                            ( ‘डॉ. अम्बेडकर का स्त्री विमर्श’पुस्तक से )
                     

डॉ. अम्बेडकर का स्त्री विमर्श, भारत बुक सेन्टर, 17, अशोक मार्ग, लखनऊ (उत्तर प्रदेश)- 22600

Published by Bharat Book Centre, 17, Asok Road, Lucknow (Uttar Pradesh)-22600

 

Thursday, January 10, 2013

डॉ. अम्बेडकर के जीवन को प्रभावित करने वाली स्त्रियां-भाग 1

प्रभाव दो प्रकार के होते हैं- अच्छे और बुरे। विद्वान व्यक्ति अच्छे प्रभाव की मीमांसा करते हैं और बुरे प्रभाव के कारणों का विश्लेषण करते हैं जो उनकी दृष्टि को सम्यक बनाता है। डॉ. अम्बेडकर के जीवन पर भी विभिन्न स्त्रियों का भिन्न प्रभाव पड़ा किन्तु उन्होंने उन प्रभावों को सभी स्त्रियों के हित के परिप्रेक्ष्य में देखा।

जीवनदायिनी मां भीमाबाई 

 
भीमाबाई के पिता सूबेदार मेजर धर्मा मुरबाड़कर थाने जिले के मुरबाड़ नामक स्थान के रहने वाले थे। उनका परिवार आर्थिक दृष्टि से सुसंपन्न था। धर्मा मुरबाड़कर अपनी युवा होती बेटी भीमाबाई के विवाह को लेकर चिंतित थे। वे अपनी बेटी के लिये सुयोग्य वर की तलाश में थे। संयोगवश धर्मा मुरबाड़कर सेना की जिस कमान में थे, उसी में  रामजी सकपाल भी नियुक्त थे। धर्मा मुरबाड़कर ने रामजी सकपाल को देखा तो वे उनके व्यवहार एवं व्यक्तित्व से बहुत प्रभावित हुये। उन्होंनें रामजी सकपाल के साथ अपनी बेटी भीमाबाई का विवाह करने का निश्चय किया। रामजी सकपाल के परिवार आर्थिक स्थिति मुरबाड़कर की अपेक्षा कमजोर थी इसीलिये धर्मा मुरबाड़कर की पत्नि इस विवाह के पक्ष में नही थीं। वहीं उनका बड़ा पुत्रा पिता की पसंद से सहमत था। उसे भी रामजी सकपाल अपनी बहन के योग्य प्रतीत हुये। अंततः सन् 1865 में रामजी सकपाल और भीमाबाई का विवाह संपन्न हो गया।
भीमाबाई वाक्चातुर्य की धनी, सुन्दर, सुशील और धर्मपरायण थीं। वे अत्यन्त स्वाभिमानी थीं। उनके स्वाभिमान का पता एक घटना से भी चलता है जब भीमाबाई की मां ने निर्धन परिवार में ब्याही अपनी पुत्री का समाचार सुना कि परिवार के अन्य सदस्य भीमाबाई की अवहेलना करने लगे थे। तब भीमाबाई ने दृढ़संकल्प लेते हुए स्पष्ट शब्दों में कह दिया था कि ‘मैं तभी मायके जाऊंगी जब आभूषणों से संपन्न अमीरी प्राप्त कर लूंगी।’
          भीमाबाई का यह संकल्प उनके धैर्य की परीक्षा लेने वाला था। रामजी सकपाल की नियुक्ति सान्ताक्रूज के पास हो गयी। वे अपने अल्प वेतन से पैसे बचाकर भीमाबाई के पास भेजते थे जो पूरे परिवार के लिये पर्याप्त नहीं था। परिवार के खर्चों को पूरा करने के लिये भीमाबाई ने सान्ताक्रूज में सड़क पर बजरी (कंकड़-पत्थर) बिछाने की मजदूरी का काम करना शुरू कर दिया। कुछ समय बाद भाग्य ने करवट ली और रामजी सकपाल की योग्यता को पहिचान कर उन्हें पूणे के पन्तोजी विद्यालय में पढ़ने का अवसर दिया गया परीक्षा पास करने के उपरान्त उन्हें फौजी छावनी के विद्यालय में अध्यापक का पदभार सौंपा गया। शीघ्र ही उन्हें प्रधान अध्यापक बना दिया गया। वे लगभग चैदह वर्ष तक प्रधान अध्यापक रहे। जिससे उनकी आर्थिक स्थिति सुदृढ़ होती गयी और भीमाबाई का संकल्प पूरा हुआ। उनके मायके वालों ने भीमाबाई से संबंध सुधार लिए। इस बीच भीमाबाई ने तेरह संतानों को जन्म दिया जिनमें सात संताने ही जीवित रहीं, शेष का बचपन में ही निधन हो गया था।
            भीमाबाई बहुत अधिक व्रत-उपवास करती थीं। साथ ही उनकी बीमारी का सही निदान न होने के कारण स्वास्थ्य लगातार गिरने लगा। रामजी सकपाल का स्थानांतरण अलग-अलग छावनियों में होता रहता था। वे पत्नी के स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए कुछ समय एक ही स्थान पर पदस्थ रहना चाहते थे। आखिरकार उन्हें यह अवसर प्राप्त हुआ, जब उनका स्थानांतरण मध्यप्रदेश (वर्तमान) के इन्दौर के निकट महू छावनी के स्कूल में किया गया। महू में रहते समय रामजी सकपाल और भीमाबाई ने कामना की कि उनका एक ऐसा पुत्रा उत्पन्न हो जो दीन दुखियों की सेवा करे। भीमाबाई की यह प्रार्थना शीघ्र ही फलीभूत हुयी और उन्होंने 14अप्रेल 1891 को एक पुत्रा को जन्म दिया जिसका नाम भीमराव रखा गया। भीमराव को अपनी मां का स्नेह अधिक समय तक नहीं मिल पाया। अस्वस्थता के कारण भीमाबाई का निधन हो गया।
         भीमराव अपनी मां को ‘बय’ कह कर पुकारते थे। उन्हें अपनी मां से अगाध स्नेह था। मां की मृत्यु के उपरान्त भी वे अपनी ‘बय’ को कभी भुला नहीं सके।
         स्वाभिमान, दृढ़ इच्छाशक्ति और किसी भी संकट का साहस के साथ सामना करने का गुण भीमराव को अपनी मां भीमाबाई से मानो अनुवांशिक रूप में मिला था। यह गुण भी उन्हें अपनी मां से ही मिला था कि कोई भी काम छोटा नहीं होता है। ये सारे गुण भीमराव को जीवन में सतत आगे बढ़ाते रहे।

            ( ‘डॉ. अम्बेडकर का स्त्री विमर्श’पुस्तक से )
                     

डॉ. अम्बेडकर का स्त्री विमर्श, भारत बुक सेन्टर, 17, अशोक मार्ग, लखनऊ (उत्तर प्रदेश)- 22600

Published by Bharat Book Centre, 17, Asok Road, Lucknow (Uttar Pradesh)-22600

Wednesday, December 19, 2012

पटना़, बिहार में......

Dr Sharad Singh with Memento of Nai Dhara Rachana Samman -2012
पटना़, बिहार में  ‘नई धारा रचनाकार सम्मान- 2012 पाने तथा सहधर्मी साथियों से मिलने के  सुखद पल... त्रिपुरा के पूर्व राज्यपाल महामहिम प्रो. सिद्धेश्वर प्रसाद के करकमलों से सम्मान प्राप्त करना और भी सुुुखद ....
Dr Sharad Singh,,Patna, Bihar- 30.11.2012

Dr Sharad Singh,,Patna, Bihar- 30.11.2012

Dr Mahip Singh ji, Siddheshwar Prasad ji, Ramkumar Krishak ji ..Patna, Bihar- 30.11.2012

Dr Mahip Singh ji, Siddheshwar Prasad ji, Ramkumar Krishak ji and Dr Sharad Singh, Patna, Bihar- 30.11.2012
Siddheshwar Prasad ji, Ramkumar Krishak ji and Dr sharad Singh, Patna, Bihar- 30.11.2012

Nai Dhara Rachana Samman Invitation Card - Front Page


Nai Dhara Rachana Samman Invitation Card - Back Page
Dainik Jagaran, Patna, Bihar- 01.12.2012


Rashtriya Sahara, Patna, Bihar- 01.12.2012
From Left- Dr Sharad Singh,Smt. Usha Kiran Khan and Shri Ramkumar Krishak at Smt Usha Kiran Khan's House, Patna, Bihar ‘नई धारा रचनाकार सम्मान’ के सिलसिले में पटना यात्रा के दौरान....(30.11.2012)

From Left- Shri Ramkumar Krishak, Usha Kiran Khan and Dr Sharad Singh Smt Usha Kiran Khan's House, Patna, Bihar ‘नई धारा रचनाकार सम्मान’ के सिलसिले में पटना यात्रा के दौरान....(30.11.2012)

From Left-Shri Ramkumar Krishak, Dr Sharad Singh with Dr Maheep Singh, Patna, Bihar ‘नई धारा रचनाकार सम्मान’ के सिलसिले में पटना यात्रा के दौरान....(30.11.2012)

Dr Sharad Singh with Dr Maheep Singh, Patna, Bihar ‘नई धारा रचनाकार सम्मान’ के सिलसिले में पटना यात्रा के दौरान....(30.11.2012)


From Left-Shri Ramkumar Krishak, Dr Sharad Singh, Dr Maheep Singh and Shri Mahesh Bhardwaj, Patna, Bihar ‘नई धारा रचनाकार सम्मान’ के सिलसिले में पटना यात्रा के दौरान....(30.11.2012)

Tuesday, November 20, 2012

‘डॉ. अम्बेडकर का स्त्री विमर्श’ का विमोचन ... Dr Sharad Singh's Book Released at Press Club Lucknow


Shree Times,Hindi Daily, Lucknow,18.11.2012

मेरी पुस्तक डॉ. अम्बेडकर का स्त्री विमर्शका विमोचन विगत 17.11.2012 को लखनऊ (उप्र) के प्रेस क्लब में अरूणाचल प्रदेश के पूर्व राज्यपाल आदरणीय माता प्रसाद जी के करकमलों द्वारा सम्पन्न हुआ।
  

उक्त अवसर पर गुलाबचंद (अपर महानिदेशक प्रसार भारती लखनऊ) डॉ. परशुराम पाल (असोसिएट प्रोफेसर लखनऊ विश्वविद्यालय), सुरेश उजाला (संपादक ‘उत्तर प्रदेश’ पत्रिका), महेन्द्र भीष्म (कथाकार), वीरेन्द्र बाहरी (भारत बुक सेंटर), तरुण बाहरी (भारत बुक सेंटर) तथा  लखनऊ के जुझारू पत्रकारों एवं प्रेस छायाकारों सहित भी बड़ी संख्या में उपस्थित थे।  

उस महत्वपूर्ण पल को आप सब से साझा कर रही हूं .......

Lokmat Samachar, Hindi Daily, Lucknow,18.11.2012
Amar Ujala, Hindi Daily, Lucknow,18.11.2012

High Tech News,Hindi Daily  Lucknow,18.11.2012

Hindustan, Hindi Daily, Lucknow,18.11.2012

Hindustan,City Live, Hindi Daily, Lucknow,18.11.2012
Awadh nama, Hindi Daily, Lucknow,18.11.2012

Rashtriya Swaroop, Hindi Daily, Lucknow,18.11.2012

Swadesh Chetna, Hindi Daily, Lucknow,18.11.2012
Swatantra Bharat, Hindi Daily, Lucknow,18.11.2012


 

Sunday, November 4, 2012

‘लिव इन रिलेशन’ यानी प्रेम और अधिकार का द्वन्द्व

लेख
  
- डॉ. शरद सिंह

 ‘ये किसने कहा कि मैं तुमसे शादी करना चाहती हूं? कि तुमसे बच्चे पैदा करना चाहती हूं? तुम्हें पसंद करती हूं.....बस, इसीलिए तुम्हारा साथ चाहती हूं।’ मैंने कहा था।
‘फिर पसंद? प्रेम नहीं?’
ां-हां, वहीं...प्रेम....प्रेम करती हूं तुमसे।’
‘मेरे साथ रहोगी...बिना शादी किए? लिव इन रिलेशन?’ रितिक ने चुनौती-सी देते हुए पूछा था और मैं रितिक के जाल में फंस गई थी। कारण कि मैं अपने जीवन को अपने ढंग से जीना चाहती थी और ‘लिव इन रिलेशन’ वाला फंडा मुझे अपने ढंग जैसा लगा था। बिना विवाह किए किसी पुरुष के साथ पति-पत्नी के रूप में रहने की कल्पना ने मुझे रोमांचित कर दिया था। इसमें मुझे अपनी स्वतंत्रता दिखाई दी। मैं जब चाहे तब मुक्त हो सकती थी....वस्तुतः मुझे तो मुक्त ही रहना था....बंधन तो व
ां होता जहां किसी नियम का पालन किया जाता।
बंधन!...... बंधन के जो रूप मैंने अब तक देखे थे उनमें स्त्र को ही बंधे हुए पाया था। पुरुष तो बंध कर भी उन्मुक्त था...पूर्ण उन्मुक्त। वह पत्नी के होते हुए भी एक से अधिक प्रेमिकाएं रख सकता था, रखैलें रख सकता था, यहां-वहां फ्लर्ट कर सकता था...फिर भी समाज की दृष्टि में वह क्षमा योग्य ही बना रहता। सच तो यह है कि मैंने अपने बचपन में ही बंधन को तार-तार होते देखा था। वैवाहिक बंधन का विकृत रूप ही तो था वह जो किसी फसिल के समान मेरे मन की चट्टानों के बीच दबा हुआ था, एकदम सुरक्षित।
- यह एक छोटा-सा अंश है ‘कस्बाई सिमोन’ उपन्यास का। जो अनेक प्रश्न सामने रख जाता है। 


                         
‘लिव इन रिलेशन’ महानगरों में एक नई जीवनचर्या के रूप में अपनाया जा रहा है। यह माना जाता है कि स्त्र इसमें रहती हुई अपनी स्वतंत्राता को सुरक्षित अनुभव करती है। उसे जीवनसाथी द्वारा दी जाने वाली प्रताड़ना सहने को विवश नहीं होना पड़ता है। वह स्वयं को स्वतंत्रा पाती है। लेकिन महानगरों में अपरिचय का वह वातावरण होता है जिसमें पड़ोसी परस्पर एक-दूसरे को नहीं पहचानते हैं। कस्बों में सामाजिक स्थिति अभी धुर पारंपरागत है। ऐसे वातावरण में एक
स्त्र यदि ‘लिव इन रिलेशन’ को अपनाती है तो उसे क्या मिलता है?... और वह क्या खोती है?....क्या एक कस्बाई औरत ‘लिव इन रिलेशन’ में मानसिक सुकून पा सकती है? उस किन-किन स्तरों पर समझौते करने पड़ते हैं? बड़ा ही कठिन विमर्श है यह।
यह माना जाता है कि
स्त्र को आर्थिक अधिकार पुरुषों के बराबर न होने के कारण विवाहिताएं अपने पति द्वारा छोड़ दिए जाने से भयभीत रहती हैं। वे जानती हैं कि परितक्त्या स्त्र को समाज सम्मान की दृष्टि से नहीं देखता है। लेकिन यदि वह आर्थिक रूप से समर्थ हो, स्वयं कमाती हो तो क्या उसे समाज में सम्मान मिल सकता है? यदि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद महिलाओं की एक पीढ़ी का बहुमुखी विकास हो चुका होता तो आज देश में महिलाओं की दशा का परिदृश्य कुछ और ही होता। उस स्थिति में न तो दहेज हत्याएं होतीं, न मादा-भ्रूण हत्या और न महिलाओं के विरुद्ध अपराध का ग्राफ इतना ऊपर जा पाता। उस स्थिति में झारखण्ड या बस्तर में स्त्रियों को न तो ‘डायन’ घोषित किया जाता और न तमाम राज्यों में बलात्कार की घटनाओं में बढ़ोत्तरी हो पाती। महिलाओं को कानूनी सहायता लेने का साहस तो रहता।
 
स्त्र की शिक्षा पर उसका परिवार उसका दस प्रतिशत भी व्यय नहीं करता है जितना वह उस स्त्र के विवाह में दिखावे और दहेज के रूप में व्यय कर देता है। परिवार के लिए पुत्र का महत्व पुत्र की अपेक्षा आज भी अधिक है। स्त्र का दैहिक शोषण आज भी आम बात है।  घर, कार्यस्थल, सड़क, परिवहन, चिकित्सालय, मनोरंजन स्थल आदि कहीं भी स्त्र स्वयं को पूर्ण सुरक्षित अनुभव नहीं कर पाती है। अभी स्त्रियों को अपना भविष्य संवारने के लिए बहुत संघर्ष करना है। उन्हें अभी पूरी तरह सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक, राजनीतिक एवं मातृत्व का अधिकार प्राप्त करना है जिस दिन उसे अपने सारे अधिकार मिल जाएंगे जो कि देश की नागरिक एवं मनुष्य होने के नाते उसे मिलने चाहिए, उस दिन एक स्वस्थ समाज की कल्पना भी साकार हो सकेगी। जिसमें स्त्र और पुरुष सच्चे अर्थों में बराबरी का दर्जा रखेंगे।
                          

हर औरत अपने अस्तित्व को जीना चाहती है, पुरुष के साथ किन्तु अपने अधिकारों के साथ। पुरुष से अधिक नहीं तो पुरुष से कम भी नहीं। क्योंकि कम होने की पीड़ा सदियों से झेलती आ रही है और अब बराबर होने का सुख पाना चाहती है। यही ललक उसे ‘लिव इन रिलेशन’ के प्रति आकर्षित करती है। किन्तु यह तो जांचना आवश्यक है कि इसमें भी स्त्र क्या-क्या खोती है और क्या-क्या पाती है?  ‘लिव इन रिलेशन’ वस्तुतः प्रेम और अधिकार का द्वन्द्व है जिसकी तह तक पहुंचना हर स्त्र के लिए आवश्यक है।    
 -------------------------------------------------------------
 

(साभार- दैनिक नेशनल दुनियामें 04.11.2012 को प्रकाशित मेरा लेख)