Monday, August 25, 2014

मेरा साक्षात्कार ....





प्रिय मित्रो,
मैं अपना साक्षात्कार आपसे साझा करना चाहती हैं जो युवा आलोचक और लेखक सुंदरम शांडिल्य ने लिया है तथा संस्कार टीवी समूह की प्रसिद्ध पत्रिका "संस्कार पत्रिका" में प्रकाशित हुआ है। August 2014 के अंक में।

Dear Friends,
I would like to share my Interview which has taken young critic and writer Sundaram Shandilya. Published in renowned magazine "Sanskar Patrika" (For Sanskar TV Group), August 2014
Dr Sharad Singh's interview in "Sanskar Patrika" Magazine in August 2014
Dr Sharad Singh's interview in "Sanskar Patrika" Magazine in August 2014
Dr Sharad Singh's interview in "Sanskar Patrika" Magazine in August 2014
Cover of "Sanskar Patrika" ,August 2014.



Wednesday, August 20, 2014

स्वागत इरोम !

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स्वागत इरोम !

मित्रो,
मेरी किताब औरत तीनः तस्वीरेंका पहला लेख इरोम शर्मीला पर है...14 वर्ष बाद आखिर उन्हें न्याय मिला....

इरोम शर्मीला होने का अर्थ


- डॉ. शरद सिंह 

         जब कोई औरत कुछ करने की ठान लेती है तो उसके इरादे किसी चट्टान की भांति अडिग और मजबूत सिद्ध होते हैं। मणिपुर की इरोम चानू शर्मीला इसका एक जीता-जागता उदाहरण हैं। इसी साल चार नवंबर को उनकी भूख हड़ताल के ग्यारह साल पूरे हो गए। इतनी लंबी भूख हड़ताल का कोई दूसरा उदाहरण नहीं मिलता। वे अपना जीवन दांव पर लगा कर निरंतर संघर्ष करती रही हैं। इरोम शर्मीला ने मात्र २८ वर्ष की आयु में अपनी भूख हड़ताल आरंभ की थी। उस समय कुछ लोगों को लगा था कि यह एक युवा स्त्री द्वारा भावुकता में उठाया गया कदम है और शीघ्र ही वह अपना हठ छोड़कर सामान्य जिंदगी में लौट जाएगी। वह भूल जाएगी कि मणिपुर में सेना के कुछ लोगों द्वारा स्त्रियों को किस तरह अपमानित किया गया। किंतु २८ वर्षीया इरोम शर्मीला ने न तो अपना संघर्ष छोड़ा और न आम जिंदगी का रास्ता चुना। वे न्याय की मांग को लेकर संघर्ष के रास्ते पर जो एक बार चलीं तो उन्होंने कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा। यह स्त्री का वह जुझारूपन है जो उसकी कोमलता के भीतर मौजूद ऊर्जस्विता से परिचित कराता है।

  
                  शर्मीला ने यह रास्ता क्यों चुना इसे जानने के लिए सन्‌ २००० के पन्ने पलटने होंगे। सन्‌ २००० के ०२ नवंबर को मणिपुर की राजधानी इम्फाल के समीप मलोम में शांति रैली के आयोजन के सिलसिले में इरोम शर्मीला एक बैठक कर रही थीं। उसी समय मलोम बस स्टैंड पर सैनिक बलों द्वारा अंधाधुंध गोलियां बचाई गईं। जिसमें करीब दस लोग मारे गए। इन मारे गए लोगों में ६२ वर्षीया लेसंगबम इबेतोमी तथा बहादुरी के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित सिनम चन्द्रमणि भी शामिल थीं। एक ऐसी महिला जिसे बहादुरी के लिए सम्मानित किया गया और एक ऐसी स्त्री जो "सीनियर सिटिजन" की आयु सीमा में आ चुकी थीइन दोनों महिलाओं पर गोलियां बरसाने वालों को तनिक भी हिचक नहीं हुईइस नृशंसता ने निरपराध और निहत्थे नागरिकों पर गोलियां चलाई गई थीं। शर्मीला ने इस घटना की तह में पहुंच कर मनन किया और पाया कि यह सेना को मिले "अफस्पाक" रूपी विशेषाधिकार का दुष्परिणाम है। इस कानून के अंतर्गत सेना को वह विशेषाधिकार प्राप्त है जिसके तहत वह संदेह के आधार पर बिना वारंट कहीं भी घुसकर तलाशी ले सकती हैकिसी को गिरफ्तार कर सकती है तथा लोगों के समूह पर गोली चला सकती है। 

इस घटना के बाद इरोम ने निश्चय किया कि वे इस दमनचक्र का विरोध करके रहेंगी चाहे कोई उनका साथ दे अथवा न दे। इरोम शर्मीला ने भूख हड़ताल में बैठने की घोषणा की और मणिपुर में लागू कानून सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम (अफस्पाक) को हटाए जाने की मांग रखी। इस एक सूत्री मांग की लेकर उन्होंने अपनी भूख हड़ताल आरंभ कर दी। शर्मीला ने तीन नवम्बर की रात में आखिर बार अन्न ग्रहण किया और चार नवंबर की सुबह से उन्होंने भूख हड़ताल शुरू कर दी। इस भूख हड़ताल के तीसरे दिन सरकार के आदेश पर इरोम शर्मीला को गिरफ्तार कर लिया गया। उन पर आत्महत्या करने का आरोप लगाते हुए धारा ३०९ के तहत कार्रवाई की गई और न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया। उल्लेखनीय है कि धारा ३०९ के तहत इरोम शर्मीला को एक साल से ज्यादा समय तक न्यायिक हिरासत में नहीं रखा जा सकता था इसलिए एक साल पूरा होते ही कथित तौर पर उन्हें रिहा कर दिया गया। फिर उन्हें गिरफ्तार कर न्यायिक हिरासत के नाम पर उसी सीलन भरे वार्ड में भेज दिया गया। तब से वह लगातार न्यायिक हिरासत में हैं। जवाहरलाल नेहरू अस्पताल का वह वार्ड जहां उन्हें रखा गया हैउसे जेल का रूप दे दिया गया है। वहीं उनकी नाक से जबरन तरल पदार्थ दिया जाता है।

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अफस्पाक" शासन के ५३ वर्षों में २००४ का वर्ष मणिपुर की महिलाओं द्वारा किए गए एक और संघर्ष के लिए चर्चित रहा।असम राइफल्स के जवानों द्वारा थंगजम मनोरमा के साथ किए बलात्कार और हत्या के विरोध में मणिपुर की महिलाओं ने कांगला फोर्ट के सामने नग्न होकर प्रदर्शन किया। उन्होंने जो बैनर ले रखा थाउसमें लिखा था "भारतीय सेना आओहमारा बलात्कार करो"। इस प्रदर्शन पर बहुत हंगामा हुआ। मीडिया ने इसे भरपूर समर्थन दिया तथा दुनिया के सभी देशों का ध्यान मणिपुर की स्थिति की ओर आकर्षित हुआ। 

         
             इरोम शर्मीला और उन महिलाओं को संघर्ष इस बात का प्रतीक है कि स्त्रियों को जिस दैहिक लज्जा का वास्ता दिया जाता हैवे न्याय के पक्ष में उस लज्जा की भी सहर्ष तिलांजलि दे सकती हैं। यानी स्त्री न्याय और सत्य के लिए किसी भी सीमा तक जाकर संघर्ष करने की क्षमता रखती है। वस्तुतः यही है इरोम शर्मीला होने का अर्थ कि स्त्री की दृढ़ इच्छाशक्ति को तोड़ा नहीं जा सकता है।ह इरोम शर्मीला और उन महिलाओं को संघर्ष इस बात का प्रतीक है कि स्त्रियों को जिस दैहिक लज्जा का वास्ता दिया जाता हैवे न्याय के पक्ष में उस लज्जा की भी सहर्ष तिलांजलि दे सकती हैं। यानी स्त्री न्याय के लिए किसी भी सीमा तक संघर्ष करने की क्षमता रखती है। वस्तुतः इरोम शर्मीला होने का अर्थ यही है कि स्त्री की दृढ़ इच्छाशक्ति को तोड़ा नहीं जा सकता है।

Tuesday, June 17, 2014

विवाहेत्तर संबंधों का राजनीतिक एपीसोड ....

वामा 
                                                                                         - डॅा. (सुश्री) शरद सिंह

 कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने टीवी पत्रकार अमृता राय के साथ अपने रिश्ते की बात ट्विटर पर स्वीकार की तो लोग भैचक्के रह गए। उनका यह ट्वीट उनकी कुछ निजी तस्वीरों के सार्वजनिक होने के बाद आया। दिग्विजय सिंह के वेरिफाइड अकाउंट से ट्वीट किया गया कि मुझे अमृता राय के साथ अपने रिश्ते को स्वीकार करने में कोई हिचक नहीं है। अमृता राय ने अपने पति के साथ तलाक के लिए अर्जी दाखिल कर दी है।साथ ही उन्होंने आगे लिखा कि एक बार ये तय हो जाए तो हम इस रिश्ते को औपचारिक रूप दे देंगे। लेकिन मैं अपनी निजी जिंदगी में ताकझांक की निंदा करता हूं।
वहीं दूसरी ओर अमृता राय ने ट्वीट किया, ‘मैं अपने पति से अलग हो चुकी हूं। हमने तलाक के लिए अर्जी दे दी है। इसके बाद मैंने दिग्विजय सिंह से शादी करने का फैसला किया है।
India Inside, June 2014, Page 19

दिग्विजय सिंह के प्रेम संबंध के इस खुलासे के बाद राजनीतिक समाज में मानो बवाल मच गया। आम आदमी पार्टी के नेता और दिल्ली के पूर्व मंत्री सोमनाथ भारती ने दिग्विजय सिंह के ट्वीट पर प्रतिक्रिया देते हुए ट्वीट किया कि यह घृणित और खतरनाक है।भारती के इस ट्वीट ने समाजशास्त्रियों के लिए एक ज्वलंत चिन्तन सामने ला पटका कि विवाहेत्तर संबंध क्या सचमुच चरित्रहीनता की निशानी है? यदि आम नागरिक के संदर्भ में यह प्रश्न उठता तो बेझिझक हांमें ही उत्तर होता। किन्तु जिन्हें समाज को दिशा देने वाला माना जाता है यदि वे यानी राजनेता ही विवाहेत्तर संबंधों में लिप्त हों तो उत्तर ढूंढना जरूरी हो जाता है। इससे पहले शशि थरूर और सुनन्दा पुष्कर का प्रकरण सामने आया था जिसका दुखद अंत हुआ।
अपनी संदेहास्पद मृत्यु से ठीक दो दिन पहले ट्विटर पर अपने पति व केन्द्रीय मानव संसाधन राज्यमंत्री शशि थरूर और पाकिस्तानी महिला पत्रकार मेहर तरार के प्रेम प्रसंग को सार्वजनिक करने वाली सुनन्दा पुष्कर होटल लीला के कमरा नंबर 345 में संदिग्ध हालातों में मृत पाई गई। ट्विटर पर सुनन्दा द्वारा की गई टिप्पणियों से स्पष्ट था कि वह थरूर और मेहर तरार के बीच पैदा हुई नजदीकियों से बेहद आहत थी। मृत्यु से दो दिन पूर्व सुनन्दा ने ट्विटर पर लिखा था कि शशि थरूर बेवफा हो गए हैं और उन्हें पाकिस्तानी महिला मेहर तरार से प्यार हो गया है।
वर्ष 2010 में भी केन्द्रीय विदेश राज्यमंत्री होते हुए भी शशि थरूर के प्रेम संबंधों के चर्चे उस समय सुर्खियों में आए थे जब उन्होंने आईपीएल टीमों की नीलामी के समय केरला टीम में सुनन्दा पुष्कर को मुफ्त में हिस्सेदारी दिलाई थी। उस समय शशि थरूर का नाम खुल कर सुनन्दा पुष्कर से जुड़ा था। विवादों के बीच थरूर को मंत्री पद त्यागना पड़ा था, लेकिन कुछ समय बाद उन्होंने सुनन्दा से विवाह कर उन तमाम खबरों को सच साबित कर दिया जिसमें उनके और सुनन्दा के बीच प्रेम प्रसंग को प्रमुखता दी गई थी। थरूर ने सुनन्दा के साथ विवाह कर तीसरी बार दाम्पत्त्य जीवन की शुरूआत की थी, जबकि इससे पहले वह दो बार इस रिश्ते को निभाने में असफल रहे थे। किन्तु विवाह में परिवर्तित हुए इस प्रेम संबंध का ऐसा अंत हुआ जिसके बारे में किसी ने सोचा भी नहीं था।
चूंकि शशि थरूर का नाम प्रेम प्रसंगों के संदर्भ में प्रायः आता रहा था इसलिए सुनंदा और फिर मेहर के साथ उनके नामों को लिए जाने में आश्चर्य कम और चटखारे अधिक थे। किन्तु दिग्विजय सिंह की एक गंभीर किस्म के व्यक्ति की छवि रही अतः लोगो का चैंकना स्वाभाविक था। 67 साल के दिग्विजय सिंह की पत्नी आशा सिंह का पिछले साल कैंसर से निधन हो चुका है। वहीं 43 साल की अमृता राय के पति आनंद प्रधान आईआईएमसी में एसोसिएट प्रोफेसर हैं। दिग्विजय और अमृता के संबंधों का समाचार सामने आते ही सबका ध्यान आनंद प्रधान की ओर गया कि एक पति होते हुए वे अपनी पत्नी के विवाहेत्तर संबंध के बारे में क्या सोचते हैं? जल्दी ही आनंद प्रधान ने फेसबुक पर पोस्ट लिखकर अपनी बात रखीं. उन्होंने अपनी फेसबुक पोस्ट में यह लिखा-‘‘एक बड़ी मुश्किल और तकलीफ से गुजर रहा हूं। यह मेरे लिए परीक्षा की घडी है। मैं और अमृता लम्बे समय से अलग रह रहे हैं और परस्पर सहमति से तलाक के लिए आवेदन किया हुआ है। एक कानूनी प्रक्रिया है जो समय लेती है लेकिन हमारे बीच सम्बन्ध बहुत पहले से ही खत्म हो चुके हैं। अलग होने के बाद से अमृता अपने भविष्य के जीवन के बारे में कोई भी फैसला करने के लिए स्वतंत्र हैं और मैं उनका सम्मान करता हूं। उन्हें भविष्य के जीवन के लिए मेरी शुभकामनाएं हैं।’’
Cover Page India Inside June 2014

क्या यह सामाजिक नैतिकता का प्रश्न होने के साथ अपराध की श्रेणी में आता है? भारतीय दण्ड संहिता में किसी विवाहित गैरतलाशुदा स्त्री से शारीरिक संबंध रखा जाना अपराध की श्रेणी में आता है यदि इस संबंध में वह स्त्री, उसका प्रेमी या उसका पति कानूनी आधार पर आपत्ति करे। इसी तथ्य को आधार बना कर भाजपा प्रवक्ता मीनाक्षी लेखी ने कहा था कि ‘‘गुप्त विवाह संभव नहीं है। एक वकील के नाते मैं कह सकती हूं कि अभी तलाक नहीं हुआ है और मामला यौन संबंधों का है।’’ मीनाक्षी लेखी ने कहा था कि इस मामले में दिग्विजय सिंह को सजा भी हो सकती है और ऐसा करना उक्त महिला पत्रकार के पति के अधिकार क्षेत्र में आता है। पति चाहे तो दग्विजय पर केस कर सकते हैं।
विवाहेत्तर संबंधों के मामले में चाहे इसमें स्त्री की प्रवृत्ति हो या पुरुष की प्रवृत्ति, यदि इस प्रेम त्रिकोण में तीनों की सहमति हो तो क्या इसे कानूनी जामा पहनाए बिना भी वैधानिक माना जा सकता है? यह एक बड़ा प्रश्न है। एक ऐसा प्रश्न जिसका उत्तर आमजन और रसूख वालों के लिए एक-सा होना चाहिए। अन्यथा यह भी अन्य अपराधों की तरह क्रीमीलेयरके लिए मान्य और सामान्य तबके के लिए अमान्य समझा जाता रहेगा। यदि पति-पत्नी में परस्पर निर्वाह संभव नहीं रह गया हो तो कानून भी तलाक लेने को गलत नहीं ठहराता है किन्तु तलाक लेने से पूर्व किसी अन्य व्यक्ति को अपना पति या पत्नी मान और उससे दैहिक संबंध बनाना किस हद तक उचित है? क्या समाज को इस खुलेपन को सहज भाव से अपना लेना चाहिए या इसे उच्चवर्गीयअधिकारों के रूप में ही छोड़ देना चाहिए? दिग्विजय सिंह और अमृता राय के परस्पर विवाहेत्तर संबंध के इस राजनीतिक एपीसोड के बाद इस तरह के कई प्रश्न उठ खड़े हुए हैं जिनका उत्तर  समाजशास्त्रियों, कानूनविदों और बुद्धिजीवियों को ढूंढना ही होगा।

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