Wednesday, November 19, 2014

बुंदेली व्रत-कथाओं में स्त्रीविमर्श...


प्रिय मित्रो,
अक्षर पर्वका एक बेहतरीन, पठनीय एवं विचारणीय उत्सव अंकलोकसाहित्य एवं लोक संस्कृति पर केन्द्रित....

मेरा भी एक लेख इसमें शामिल है- बुंदेली व्रत-कथाओं में स्त्रीविमर्श’...आप भी इसे पढ़ें...

एक बेहतरीन विशेषांक के कुशल सपादन के लिए संपादक सर्वमित्रा सुरजन को हार्दिक बधाई !!!
Akshar Parv, November 2014

Akshar Parv, November 2014

Akshar Parv, November 2014

Akshar Parv, November 2014

Akshar Parv, November 2014

Thursday, October 30, 2014

‘साईको’ होते समाज के विरुद्ध

मित्रो, ‘इंडिया इन साइड’ के Oct 2014 अंक में ‘वामा’ स्तम्भ में प्रकाशित मेरा लेख आप सभी के लिए ....
पढ़ें, विचार दें और शेयर करें....
आपका स्नेह मेरा उत्साहवर्द्धन करता है.......
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वामा (प्रकाशित लेख...Article Text....)

‘साईको’ होते समाज के विरुद्ध

- डॅा. (सुश्री) शरद सिंह

भारतीय रेलवे का बीना जंक्शन प्रशासनिक तौर पर एक छोटा-सा तहसीली इलाका है। इसी बीना शहर में एक नग्न युवती पेड़ों के पीछे छिपी हुई थी। इंसानों की उस पर दृष्टि पड़ी तो उसके इर्द-गिर्द भीड़ लगाने लगे। वह घबरा कर भागी। वह घबराई हुई युवती बदहवासी में बिजली के हाईटेंशन टाॅवर पर चढ़ती चली गई और लगभग 70 फुट की ऊंचाई पर पहुंच कर वह अपना संतुलन खो बैठी और गिर गई। 70 फुट की ऊंचाई से नीचे गिरते ही उसकी मौत हो गई। यह हृदयविदारक घटना घटी उस युवती के साथ जिसने अपना जीवन अभी ठीक से शुरू भी नहीं किया था। मध्यप्रदेश के डिंडौरी जिले के एक छोटे से गंाव की आदिवासी लड़की अपने और अपने परिवार के सपने को सच करने के लिए नौकरी का साक्षात्कार देने जबलपुर गई। फिर जबलपुर से इन्दौर गई। इन्दौर में चार युवकों ने उसे सहायता देने का झांसा दे कर उसके साथ बलात्कार किया। इसके बाद एक युवक उसे इन्दौर से बीना पहुंचा कर रेलवे स्टेशन पर छोड़ गया। बीना में भी उसके साथ सामूहिक बलात्कार किया गया। दिन के उजाले में उस निर्वस्त्र युवती को भीड़ ने घेर लिया। वह आतंकित युवती भीड़ से भयाक्रांत हो कर आत्मघाती कदम उठा बैठी।
क्या यह मामूली-सी घटना है जिसके रोज घटित होने पर भी हम अख़बार का पन्ना पलट कर यह सोचते हुए आगे की ख़बर पर जा टिकते हैं कि यह हमारे परिवार की बेटी के साथ नहीं हुआ है और न ही कभी हो सकता है। कितनी अच्छी खुशफहमी में जीने लगे हैं हम? जो आज दूसरे के साथ घटा है वह हमारे परिजनों के साथ नहीं घट सकता है, इसकी क्या गारंटी? मानवता को लज्जित करने वाली इस घटना से ऐसा प्रतीत होने लगा है गोया समाज साइको हो चला है। बलात्कार का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। दिल्ली, मुंबई, बदायुं, बीना और न जाने कितने शहर। लगभग हर शहर, कस्बे या गंाव से लगभग प्रतिदिन बलात्कार की एक न एक घटना पढ़ने को मिल जाती है।
ऐसा कहा जाता है कि जब अंधेरा बढ़ रहा हो उसी समय आशा की किरण भी फूटती दिखाई देती है। यह किरण दिखाई दी बीना के इस जघन्य बलात्कार कांड के बाद। पोस्टमार्टम करने वाले चिकित्सक दम्पति ने पुलिस के हील-हवाले के बावजूद खुलासा किया कि युवती के साथ बलात्कार किया गया था। पोस्टमार्टम करने वाली चिकित्सक डाॅ. मंजू कैथोरिया ने कहा कि ‘मैं भी एक मां हूं, मेरे बच्चे भी बड़े हो रहे हैं। एक लड़की जो मौत के बाद भी मासूम लग रही थी। उसका शव हमारे सामने पड़ा थां शरीर पर जगी-जगी पर घाव थे। एकाएक ऐसा लगने लगा कि हमारे सामने ही उस युवती के सामथ कोई दुष्कर्म कर रहा हो। सारी हृदयविदारक घटना अंाखों के सामने झूलने लगी। जो उस लड़की के साथ हुआ, वह और किसी के साथ नहीं होना चाहिए। ऐसी घटनाएं हमें अन्दर तक हिला देती हैं। ऐसा करने वालों को हर हाल में सजा मिले।‘
जिसने भी इस घटना को सुना वह सचमुच भीतर तक हिल गया। लेकिन प्रतिरोध सामाजिक से अधिक राजनीतिक स्तर पर सामने आया। प्रदेश में भाजपा सरकार होने के कारण कांग्रेस ने हल्लाबोल किया। ऐसा लग रहा था कि मामला राजनीतिक हो कर रह जाएगा लेकिन उसी दौरान बीना शहर के अधिवक्ताओं ने वह कदम उठाया जो दिल्ली या मुंबई जैसे महानगरों के अधिवक्ताओं ने भी नहीं उठाया था। आतंक फैलाने की नीयत से भारत आए कसाब की ओर से लड़ने के लिए वकील उपलब्ध हो गया। निर्भया के बलात्कारियों को बचाने के लिए एक वकील ने एड़ी-चोटी का जोर लगाया। किन्तु बीना शहर के अधिवक्ताओं ने बलात्कारियों की पैरवी करने से मना कर दिया। उन्होंने एक स्वर से यही कहा कि -‘जो कृत्य इन सभी ने किया, उसके लिए पैरवी करना अपराधी का साथ देने के समान होगा।’
काश! यह जज़्बा, यह मानसिकता सकल समाज की बन जाए। यदि समाज अपराध सिद्ध बलात्कारियों का बहिष्कार करना शुरू कर दे, उन्हें बचाने के लिए आगे न आए तो बलात्कार जैसी अमानवीय घटनाओं पर अंकुश लग सकता है।
सर्वोच्च न्यायालय का भी कहना है कि बलात्कार से पीडि़त महिला बलात्कार के बाद स्वयं अपनी नजरों में ही गिर जाती है, और जीवनभर उसे उस अपराध की सजा भुगतनी पड़ती है, जिसे उसने नहीं किया। चिन्ता का विषय यह है कि हर वर्ष बलात्कार के मामलों में बढ़ोतरी होती जा रही है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार भारत में प्रतिदिन लगभग 50 बलात्कार के मामले थानों में पंजीकृत होते हैं। बहुत सारे मामलों की रिपोर्ट ही नहीं हो पाती। कभी पीडि़ता के परिवारवाले बदनामी के डर से पीछे हट जाने हैं, तो कभी रसूखवालों का दबाव उन्हें पीछे हटने को विवश कर देता है और कभी थाने में रिपोर्ट लिखने में कोताही बरती जाती है।
बलात्कार के अपराध को हल्के ढंग से नहीं लिया जा सकता है किन्तु दुख है कि समाज की मानसिक प्रवृत्ति इसे रोजमर्रा की मामूली घटना के रूप में लेने की बनती जा रही है। यदि राजनीतिक विरोध या प्रतिरोध सामने न आए तो शायद सामाजिक प्रतिरोध कहीं दिखाई ही नहीं देगा। यह स्थिति अत्यंत चिन्ताजनक है। इस बिगड़ रही मानसिकता में सबसे ज्यादा चिंता की बात तो यह है कि बलात्कार को घिनौना अपराध मानने की बजाए समाज के प्रतिनिधि इसके बेहूदे विश्लेषण जुट जाते हैं। कोई लड़की के पहनावे को दोषी ठहराता है तो कोई उसके अकेले घर से बाहर निकलने के प्रति उंगली उठाता है। इस पर भी तसल्ली नहीं होती है तो ‘‘लड़कों से भूल हो जाती है’’ जैसा बयान दे दिया जाता है।
निर्भया कांड के अपराधियों की सजा के संबंध में सुझाव देने के लिए गठित की गई जस्टिस जे.एस. वर्मा समिति ने यह महत्वपूर्ण सुझाव भी दिया था कि बेतुके बयान देने वाले जनप्रतिनिधियों की सदस्यता तत्काल खत्म कर दी जानी चाहिए। समिति के इस सुझाव पर अमल नहीं किया गया। न ही समाज के सोच में भी कोई बदलाव नहीं आया। दुर्भाग्य है कि निर्भया कांड के बाद आई जागरूकता मानो शीत निष्क्रियता में चली गई। बलात्कार की दर थमने की बजाए बढ़ती ही गई है। यदि बलत्कृत होती है तो यह भी लड़की का दोष है या फिर बलात्कारी चूंकि बेटा है इसीलिए उसे हर हाल में दण्ड से बचाना ही है। इस सोच को मानसिक रुग्गणता ही कहा जाएगा। इसी दूषित मानसिकता के चलते बलात्कार की प्रवृत्ति में बढ़ोत्तरी तो होगी ही। समाज को अपनी ही साइको (रुग्गण) मानसिकता के विरुद्ध खड़ा होना ही होगा तभी स्त्री के विरुद्ध बढ़ते जा रहे जघन्य अपराध थम सकेंगे।

India Inside, October 2014

Monday, October 20, 2014

कबीर और सहजसमाधि परम्परा .....




रायपुर, छत्तीसगढ़ से प्रकाशित नारी का संबल पत्रिका में प्रकाशित मेरा लेख....







'Kabir aur Sahajsamadhi Parampara' by Dr Sharad Singh

'Kabir aur Sahajsamadhi Parampara' by Dr Sharad Singh

'Kabir aur Sahajsamadhi Parampara' by Dr Sharad Singh

Monday, August 25, 2014

मेरा साक्षात्कार ....





प्रिय मित्रो,
मैं अपना साक्षात्कार आपसे साझा करना चाहती हैं जो युवा आलोचक और लेखक सुंदरम शांडिल्य ने लिया है तथा संस्कार टीवी समूह की प्रसिद्ध पत्रिका "संस्कार पत्रिका" में प्रकाशित हुआ है। August 2014 के अंक में।

Dear Friends,
I would like to share my Interview which has taken young critic and writer Sundaram Shandilya. Published in renowned magazine "Sanskar Patrika" (For Sanskar TV Group), August 2014
Dr Sharad Singh's interview in "Sanskar Patrika" Magazine in August 2014
Dr Sharad Singh's interview in "Sanskar Patrika" Magazine in August 2014
Dr Sharad Singh's interview in "Sanskar Patrika" Magazine in August 2014
Cover of "Sanskar Patrika" ,August 2014.



Wednesday, August 20, 2014

स्वागत इरोम !

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स्वागत इरोम !

मित्रो,
मेरी किताब औरत तीनः तस्वीरेंका पहला लेख इरोम शर्मीला पर है...14 वर्ष बाद आखिर उन्हें न्याय मिला....

इरोम शर्मीला होने का अर्थ


- डॉ. शरद सिंह 

         जब कोई औरत कुछ करने की ठान लेती है तो उसके इरादे किसी चट्टान की भांति अडिग और मजबूत सिद्ध होते हैं। मणिपुर की इरोम चानू शर्मीला इसका एक जीता-जागता उदाहरण हैं। इसी साल चार नवंबर को उनकी भूख हड़ताल के ग्यारह साल पूरे हो गए। इतनी लंबी भूख हड़ताल का कोई दूसरा उदाहरण नहीं मिलता। वे अपना जीवन दांव पर लगा कर निरंतर संघर्ष करती रही हैं। इरोम शर्मीला ने मात्र २८ वर्ष की आयु में अपनी भूख हड़ताल आरंभ की थी। उस समय कुछ लोगों को लगा था कि यह एक युवा स्त्री द्वारा भावुकता में उठाया गया कदम है और शीघ्र ही वह अपना हठ छोड़कर सामान्य जिंदगी में लौट जाएगी। वह भूल जाएगी कि मणिपुर में सेना के कुछ लोगों द्वारा स्त्रियों को किस तरह अपमानित किया गया। किंतु २८ वर्षीया इरोम शर्मीला ने न तो अपना संघर्ष छोड़ा और न आम जिंदगी का रास्ता चुना। वे न्याय की मांग को लेकर संघर्ष के रास्ते पर जो एक बार चलीं तो उन्होंने कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा। यह स्त्री का वह जुझारूपन है जो उसकी कोमलता के भीतर मौजूद ऊर्जस्विता से परिचित कराता है।

  
                  शर्मीला ने यह रास्ता क्यों चुना इसे जानने के लिए सन्‌ २००० के पन्ने पलटने होंगे। सन्‌ २००० के ०२ नवंबर को मणिपुर की राजधानी इम्फाल के समीप मलोम में शांति रैली के आयोजन के सिलसिले में इरोम शर्मीला एक बैठक कर रही थीं। उसी समय मलोम बस स्टैंड पर सैनिक बलों द्वारा अंधाधुंध गोलियां बचाई गईं। जिसमें करीब दस लोग मारे गए। इन मारे गए लोगों में ६२ वर्षीया लेसंगबम इबेतोमी तथा बहादुरी के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित सिनम चन्द्रमणि भी शामिल थीं। एक ऐसी महिला जिसे बहादुरी के लिए सम्मानित किया गया और एक ऐसी स्त्री जो "सीनियर सिटिजन" की आयु सीमा में आ चुकी थीइन दोनों महिलाओं पर गोलियां बरसाने वालों को तनिक भी हिचक नहीं हुईइस नृशंसता ने निरपराध और निहत्थे नागरिकों पर गोलियां चलाई गई थीं। शर्मीला ने इस घटना की तह में पहुंच कर मनन किया और पाया कि यह सेना को मिले "अफस्पाक" रूपी विशेषाधिकार का दुष्परिणाम है। इस कानून के अंतर्गत सेना को वह विशेषाधिकार प्राप्त है जिसके तहत वह संदेह के आधार पर बिना वारंट कहीं भी घुसकर तलाशी ले सकती हैकिसी को गिरफ्तार कर सकती है तथा लोगों के समूह पर गोली चला सकती है। 

इस घटना के बाद इरोम ने निश्चय किया कि वे इस दमनचक्र का विरोध करके रहेंगी चाहे कोई उनका साथ दे अथवा न दे। इरोम शर्मीला ने भूख हड़ताल में बैठने की घोषणा की और मणिपुर में लागू कानून सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम (अफस्पाक) को हटाए जाने की मांग रखी। इस एक सूत्री मांग की लेकर उन्होंने अपनी भूख हड़ताल आरंभ कर दी। शर्मीला ने तीन नवम्बर की रात में आखिर बार अन्न ग्रहण किया और चार नवंबर की सुबह से उन्होंने भूख हड़ताल शुरू कर दी। इस भूख हड़ताल के तीसरे दिन सरकार के आदेश पर इरोम शर्मीला को गिरफ्तार कर लिया गया। उन पर आत्महत्या करने का आरोप लगाते हुए धारा ३०९ के तहत कार्रवाई की गई और न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया। उल्लेखनीय है कि धारा ३०९ के तहत इरोम शर्मीला को एक साल से ज्यादा समय तक न्यायिक हिरासत में नहीं रखा जा सकता था इसलिए एक साल पूरा होते ही कथित तौर पर उन्हें रिहा कर दिया गया। फिर उन्हें गिरफ्तार कर न्यायिक हिरासत के नाम पर उसी सीलन भरे वार्ड में भेज दिया गया। तब से वह लगातार न्यायिक हिरासत में हैं। जवाहरलाल नेहरू अस्पताल का वह वार्ड जहां उन्हें रखा गया हैउसे जेल का रूप दे दिया गया है। वहीं उनकी नाक से जबरन तरल पदार्थ दिया जाता है।

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अफस्पाक" शासन के ५३ वर्षों में २००४ का वर्ष मणिपुर की महिलाओं द्वारा किए गए एक और संघर्ष के लिए चर्चित रहा।असम राइफल्स के जवानों द्वारा थंगजम मनोरमा के साथ किए बलात्कार और हत्या के विरोध में मणिपुर की महिलाओं ने कांगला फोर्ट के सामने नग्न होकर प्रदर्शन किया। उन्होंने जो बैनर ले रखा थाउसमें लिखा था "भारतीय सेना आओहमारा बलात्कार करो"। इस प्रदर्शन पर बहुत हंगामा हुआ। मीडिया ने इसे भरपूर समर्थन दिया तथा दुनिया के सभी देशों का ध्यान मणिपुर की स्थिति की ओर आकर्षित हुआ। 

         
             इरोम शर्मीला और उन महिलाओं को संघर्ष इस बात का प्रतीक है कि स्त्रियों को जिस दैहिक लज्जा का वास्ता दिया जाता हैवे न्याय के पक्ष में उस लज्जा की भी सहर्ष तिलांजलि दे सकती हैं। यानी स्त्री न्याय और सत्य के लिए किसी भी सीमा तक जाकर संघर्ष करने की क्षमता रखती है। वस्तुतः यही है इरोम शर्मीला होने का अर्थ कि स्त्री की दृढ़ इच्छाशक्ति को तोड़ा नहीं जा सकता है।ह इरोम शर्मीला और उन महिलाओं को संघर्ष इस बात का प्रतीक है कि स्त्रियों को जिस दैहिक लज्जा का वास्ता दिया जाता हैवे न्याय के पक्ष में उस लज्जा की भी सहर्ष तिलांजलि दे सकती हैं। यानी स्त्री न्याय के लिए किसी भी सीमा तक संघर्ष करने की क्षमता रखती है। वस्तुतः इरोम शर्मीला होने का अर्थ यही है कि स्त्री की दृढ़ इच्छाशक्ति को तोड़ा नहीं जा सकता है।